हस्तरेखाशास्त्र
जीवन के अनेक रहस्य समेटे होता है शनि पर्वत
हथेली में स्थित शनि पर्वत आपकी आर्थिक लाइफ से लेकर लव लाइफ तक के खोलता है राज
शनि पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह शुभ संकेत नहीं माना जाता है। यदि हथेली के शनि पर्वत पर ये चिन्ह बना हो तो नियमित रूप से शनि देव की अराधना करनी चाहिए।
हाथ की मध्यमा उंगली के नीचे वाला स्थान शनि पर्वत का माना जाता है।
हस्तरेखा शास्त्र अनुसार हाथ की रेखाओं के अलावा हाथ के पर्वतों से भी व्यक्ति के जीवन के बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है। हाथ में हर ग्रह से संबंधित एक स्थान होता है। जिससे बिना कुंडली के आपकी ग्रहों की स्थिति के बारे में बहुत कुछ पता चल जाता है। यहां हम हाथ में मौजूद शनि पर्वत के बारे में बात करेंगे। हाथ की मध्यमा उंगली के नीचे वाला स्थान शनि पर्वत का माना जाता है।
यदि शनि पर्वत पूर्ण रूप से विकसित होता है तो व्यक्ति काफी भाग्यवान माना जाता है। ऐसा व्यक्ति अपनी मेहनत से जीवन में अच्छा मुकाम हासिल कर लेता है। शनि पर्वत के विकसित होने पर व्यक्ति अपने लक्ष्य की तरफ निरंतर बढ़ने का प्रयास करता है। ऐसा व्यक्ति अपने लक्ष्यों में इतना व्यस्त हो जाता है कि उसे घर परिवार की चिंता नहीं रहती। जिस कारण अकसर इन लोगों के अपने साथी से मनमुटाव होते रहते हैं। शनि पर्वत अच्छा होने पर व्यक्ति थोड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है।
शनि पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह शुभ संकेत नहीं माना जाता है। यदि हथेली के शनि पर्वत पर ये चिन्ह बना हो तो नियमित रूप से शनि देव की अराधना करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा चिन्ह होने पर व्यक्ति को जीवन भर परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं। शनि पर्वत पर क्रॉस और द्वीप का चिन्ह भी अच्छा संकेत नहीं होता है। इस चिन्ह के होने पर दुर्घटनाओं के आसार रहते हैं। ऐसे में वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। शनि मंत्र का जाप करें।
शनि के स्थान वाली उंगली अगर ज्यादा लंबी होती है तो ऐसे व्यक्ति शांति प्रिय होते हैं। ये लोग काफी ईमानदार और धार्मिक प्रवृत्ति के भी होते हैं। यदि शनि पर्वत पर अधिक रेखायें कटी फटी हो तो ये दोषपूर्ण माना जाता है। अगर हाथ में शनि के साथ सूर्य और गुरु पर्वत की स्थिति भी अच्छी हो तो ऐसे जातकों को जीवन में खूब सम्मान मिलता है। ऐसे लोग अपनी बुद्धि के बल पर खूब नाम और पैसा कमाने में कामयाब होते हैं।
जीवन के अनेक रहस्य समेटे होता है शनि पर्वत
हथेली में स्थित शनि पर्वत आपकी आर्थिक लाइफ से लेकर लव लाइफ तक के खोलता है राज
शनि पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह शुभ संकेत नहीं माना जाता है। यदि हथेली के शनि पर्वत पर ये चिन्ह बना हो तो नियमित रूप से शनि देव की अराधना करनी चाहिए।
हाथ की मध्यमा उंगली के नीचे वाला स्थान शनि पर्वत का माना जाता है।
हस्तरेखा शास्त्र अनुसार हाथ की रेखाओं के अलावा हाथ के पर्वतों से भी व्यक्ति के जीवन के बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है। हाथ में हर ग्रह से संबंधित एक स्थान होता है। जिससे बिना कुंडली के आपकी ग्रहों की स्थिति के बारे में बहुत कुछ पता चल जाता है। यहां हम हाथ में मौजूद शनि पर्वत के बारे में बात करेंगे। हाथ की मध्यमा उंगली के नीचे वाला स्थान शनि पर्वत का माना जाता है।
यदि शनि पर्वत पूर्ण रूप से विकसित होता है तो व्यक्ति काफी भाग्यवान माना जाता है। ऐसा व्यक्ति अपनी मेहनत से जीवन में अच्छा मुकाम हासिल कर लेता है। शनि पर्वत के विकसित होने पर व्यक्ति अपने लक्ष्य की तरफ निरंतर बढ़ने का प्रयास करता है। ऐसा व्यक्ति अपने लक्ष्यों में इतना व्यस्त हो जाता है कि उसे घर परिवार की चिंता नहीं रहती। जिस कारण अकसर इन लोगों के अपने साथी से मनमुटाव होते रहते हैं। शनि पर्वत अच्छा होने पर व्यक्ति थोड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है।
शनि पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह शुभ संकेत नहीं माना जाता है। यदि हथेली के शनि पर्वत पर ये चिन्ह बना हो तो नियमित रूप से शनि देव की अराधना करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा चिन्ह होने पर व्यक्ति को जीवन भर परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं। शनि पर्वत पर क्रॉस और द्वीप का चिन्ह भी अच्छा संकेत नहीं होता है। इस चिन्ह के होने पर दुर्घटनाओं के आसार रहते हैं। ऐसे में वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। शनि मंत्र का जाप करें।
शनि के स्थान वाली उंगली अगर ज्यादा लंबी होती है तो ऐसे व्यक्ति शांति प्रिय होते हैं। ये लोग काफी ईमानदार और धार्मिक प्रवृत्ति के भी होते हैं। यदि शनि पर्वत पर अधिक रेखायें कटी फटी हो तो ये दोषपूर्ण माना जाता है। अगर हाथ में शनि के साथ सूर्य और गुरु पर्वत की स्थिति भी अच्छी हो तो ऐसे जातकों को जीवन में खूब सम्मान मिलता है। ऐसे लोग अपनी बुद्धि के बल पर खूब नाम और पैसा कमाने में कामयाब होते हैं।
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*शनिवार के दिन करें भगवान शनि के शतनामावली का जाप
शनि देव की पूजा बहुत ही शुभ मानी जाती है। शनिवार के दिन छाया पुत्र की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि जो साधक शनिवार के दिन का व्रत रखते हैं और शनि देव की पूजा सच्चे भाव के साथ करते हैं, उन्हें सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।*
*ऐसे में अगर आप अशुभ ग्रहों के प्रभाव से बचना चाहते हैं या फिर शनि कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको शनि देव के १०८ नामों का जाप अवश्य करना चाहिए, जो यहां दिए गए हैं-*
*।।भगवान शनि के १०८ नाम।।*
१. ऊँ शनैश्चराय नमः
२. ऊँ शान्ताय नमः
३. ऊँ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः
४. ऊँ शरण्याय नमः
५. ऊँ वरेण्याय नमः
६. ऊँ सर्वेशाय नमः
७. ऊँ सौम्याय नमः
८. ऊँ सुरवन्द्याय नमः
९. ऊँ सुरलोकविहारिणे नमः
१०. ऊँ सुखासनोपविष्टाय नमः
११. ऊँ सुन्दराय नमः
१२. ऊँ घनाय नमः
१३. ऊँ घनरूपाय नमः
१४. ऊँ घनाभरणधारिणे नमः
१५. ऊँ घनसारविलेपाय नमः
१६. ऊँ खद्योताय नमः
१७. ऊँ मन्दाय नमः
१८. ऊँ मन्दचेष्टाय नमः
१९. ऊँ महनीयगुणात्मने नमः
२०. ऊँ मर्त्यपावनपदाय नमः
२१. ऊँ महेशाय नमः
२२. ऊँ छायापुत्राय नमः
२३. ऊँ शर्वाय नमः
२४. ऊँ शततूणीरधारिणे नमः
२५. ऊँ चरस्थिरस्वभा वाय नमः
२६. ऊँ अचञ्चलाय नमः
२७. ऊँ नीलवर्णाय नम:
२८. ऊँ नित्याय नमः
२९. ऊँ नीलाञ्जननिभाय नमः
३०. ऊँ नीलाम्बरविभूशणाय नमः
३१. ऊँ निश्चलाय नमः
३२. ऊँ वेद्याय नमः
३३. ऊँ विधिरूपाय नमः
३४. ऊँ विरोधाधारभूमये नमः
३५. ऊँ भेदास्पदस्वभावाय नमः
३६. ऊँ वज्रदेहाय नमः
३७. ऊँ वैराग्यदाय नमः
३८. ऊँ वीराय नमः
३९. ऊँ वीतरोगभयाय नमः
४०. ऊँ विपत्परम्परेशाय नमः
४१. ऊँ विश्ववन्द्याय नमः
४२. ऊँ गृध्नवाहाय नमः
४३. ऊँ गूढाय नमः
४४. ऊँ कूर्माङ्गाय नमः
४५. ऊँ कुरूपिणे नमः
४६. ऊँ कुत्सिताय नमः
४७. ऊँ गुणाढ्याय नमः
४८. ऊँ गोचराय नमः
४९. ऊँ अविद्यामूलनाशाय नमः
५०. ऊँ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः
५१. ऊँ आयुष्यकारणाय नमः
५२. ऊँ आपदुद्धर्त्रे नमः
५३. ऊँ विष्णुभक्ताय नमः
५४. ऊँ वशिने नमः
५५. ऊँ विविधागमवेदिने नमः
५६. ऊँ विधिस्तुत्याय नमः
५७. ऊँ वन्द्याय नमः
५८. ऊँ विरूपाक्षाय नमः
५९. ऊँ वरिष्ठाय नमः
६०. ऊँ गरिष्ठाय नमः
६१. ऊँ वज्राङ्कुशधराय नमः
६२. ऊँ वरदाभयहस्ताय नमः
६३. ऊँ वामनाय नमः
६४. ऊँ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः
६५. ऊँ श्रेष्ठाय नमः
६६. ऊँ मितभाषिणे नमः
६७. ऊँ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः
६८. ऊँ पुष्टिदाय नमः
६९. ऊँ स्तुत्याय नमः
७०. ऊँ स्तोत्रगम्याय नमः
७१. ऊँ भक्तिवश्याय नमः
७२. ऊँ भानवे नमः
७३. ऊँ भानुपुत्राय नमः
७४. ऊँ भव्याय नमः
७५. ऊँ पावनाय नमः
७६. ऊँ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः
७७. ऊँ धनदाय नमः
७८. ऊँ धनुष्मते नमः
७९. ऊँ तनुप्रकाशदेहाय नमः
८०. ऊँ तामसाय नमः
८१. ऊँ अशेषजनवन्द्याय नमः
८२. ऊँ विशेशफलदायिने नमः
८३. ऊँ वशीकृतजनेशाय नमः
८४. ऊँ पशूनां पतये नमः
८५. ऊँ खेचराय नमः
८६. ऊँ खगेशाय नमः
८७. ऊँ घननीलाम्बराय नमः
८८. ऊँ काठिन्यमानसाय नमः
८९. ऊँ आर्यगणस्तुत्याय नमः
९०. ऊँ नीलच्छत्राय नमः
९१. ऊँ नित्याय नमः
९२. ऊँ निर्गुणाय नमः
९३. ऊँ गुणात्मने नमः
९४. ऊँ निरामयाय नमः
९५. ऊँ निन्द्याय नमः
९६. ऊँ वन्दनीयाय नमः
९७. ऊँ धीराय नमः
९८. ऊँ दिव्यदेहाय नमः
९९. ऊँ दीनार्तिहरणाय नमः
१००. ऊँ दैन्यनाशकराय नमः
१०१. ऊँ आर्यजनगण्याय नमः
१०२. ऊँ क्रूराय नमः
१०३. ऊँ क्रूरचेष्टाय नमः
१०४. ऊँ कामक्रोधकराय नमः
१०५. ऊँ कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः
१०६. ऊँ परिपोषितभक्ताय नमः
१०७. ऊँ परभीतिहराय नमः
१०८. ऊँ भक्तसंघमनोऽभीष्टफलदाय नमः
*जय_शनिदेव*
शनि देव की पूजा बहुत ही शुभ मानी जाती है। शनिवार के दिन छाया पुत्र की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि जो साधक शनिवार के दिन का व्रत रखते हैं और शनि देव की पूजा सच्चे भाव के साथ करते हैं, उन्हें सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।*
*ऐसे में अगर आप अशुभ ग्रहों के प्रभाव से बचना चाहते हैं या फिर शनि कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको शनि देव के १०८ नामों का जाप अवश्य करना चाहिए, जो यहां दिए गए हैं-*
*।।भगवान शनि के १०८ नाम।।*
१. ऊँ शनैश्चराय नमः
२. ऊँ शान्ताय नमः
३. ऊँ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः
४. ऊँ शरण्याय नमः
५. ऊँ वरेण्याय नमः
६. ऊँ सर्वेशाय नमः
७. ऊँ सौम्याय नमः
८. ऊँ सुरवन्द्याय नमः
९. ऊँ सुरलोकविहारिणे नमः
१०. ऊँ सुखासनोपविष्टाय नमः
११. ऊँ सुन्दराय नमः
१२. ऊँ घनाय नमः
१३. ऊँ घनरूपाय नमः
१४. ऊँ घनाभरणधारिणे नमः
१५. ऊँ घनसारविलेपाय नमः
१६. ऊँ खद्योताय नमः
१७. ऊँ मन्दाय नमः
१८. ऊँ मन्दचेष्टाय नमः
१९. ऊँ महनीयगुणात्मने नमः
२०. ऊँ मर्त्यपावनपदाय नमः
२१. ऊँ महेशाय नमः
२२. ऊँ छायापुत्राय नमः
२३. ऊँ शर्वाय नमः
२४. ऊँ शततूणीरधारिणे नमः
२५. ऊँ चरस्थिरस्वभा वाय नमः
२६. ऊँ अचञ्चलाय नमः
२७. ऊँ नीलवर्णाय नम:
२८. ऊँ नित्याय नमः
२९. ऊँ नीलाञ्जननिभाय नमः
३०. ऊँ नीलाम्बरविभूशणाय नमः
३१. ऊँ निश्चलाय नमः
३२. ऊँ वेद्याय नमः
३३. ऊँ विधिरूपाय नमः
३४. ऊँ विरोधाधारभूमये नमः
३५. ऊँ भेदास्पदस्वभावाय नमः
३६. ऊँ वज्रदेहाय नमः
३७. ऊँ वैराग्यदाय नमः
३८. ऊँ वीराय नमः
३९. ऊँ वीतरोगभयाय नमः
४०. ऊँ विपत्परम्परेशाय नमः
४१. ऊँ विश्ववन्द्याय नमः
४२. ऊँ गृध्नवाहाय नमः
४३. ऊँ गूढाय नमः
४४. ऊँ कूर्माङ्गाय नमः
४५. ऊँ कुरूपिणे नमः
४६. ऊँ कुत्सिताय नमः
४७. ऊँ गुणाढ्याय नमः
४८. ऊँ गोचराय नमः
४९. ऊँ अविद्यामूलनाशाय नमः
५०. ऊँ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः
५१. ऊँ आयुष्यकारणाय नमः
५२. ऊँ आपदुद्धर्त्रे नमः
५३. ऊँ विष्णुभक्ताय नमः
५४. ऊँ वशिने नमः
५५. ऊँ विविधागमवेदिने नमः
५६. ऊँ विधिस्तुत्याय नमः
५७. ऊँ वन्द्याय नमः
५८. ऊँ विरूपाक्षाय नमः
५९. ऊँ वरिष्ठाय नमः
६०. ऊँ गरिष्ठाय नमः
६१. ऊँ वज्राङ्कुशधराय नमः
६२. ऊँ वरदाभयहस्ताय नमः
६३. ऊँ वामनाय नमः
६४. ऊँ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः
६५. ऊँ श्रेष्ठाय नमः
६६. ऊँ मितभाषिणे नमः
६७. ऊँ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः
६८. ऊँ पुष्टिदाय नमः
६९. ऊँ स्तुत्याय नमः
७०. ऊँ स्तोत्रगम्याय नमः
७१. ऊँ भक्तिवश्याय नमः
७२. ऊँ भानवे नमः
७३. ऊँ भानुपुत्राय नमः
७४. ऊँ भव्याय नमः
७५. ऊँ पावनाय नमः
७६. ऊँ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः
७७. ऊँ धनदाय नमः
७८. ऊँ धनुष्मते नमः
७९. ऊँ तनुप्रकाशदेहाय नमः
८०. ऊँ तामसाय नमः
८१. ऊँ अशेषजनवन्द्याय नमः
८२. ऊँ विशेशफलदायिने नमः
८३. ऊँ वशीकृतजनेशाय नमः
८४. ऊँ पशूनां पतये नमः
८५. ऊँ खेचराय नमः
८६. ऊँ खगेशाय नमः
८७. ऊँ घननीलाम्बराय नमः
८८. ऊँ काठिन्यमानसाय नमः
८९. ऊँ आर्यगणस्तुत्याय नमः
९०. ऊँ नीलच्छत्राय नमः
९१. ऊँ नित्याय नमः
९२. ऊँ निर्गुणाय नमः
९३. ऊँ गुणात्मने नमः
९४. ऊँ निरामयाय नमः
९५. ऊँ निन्द्याय नमः
९६. ऊँ वन्दनीयाय नमः
९७. ऊँ धीराय नमः
९८. ऊँ दिव्यदेहाय नमः
९९. ऊँ दीनार्तिहरणाय नमः
१००. ऊँ दैन्यनाशकराय नमः
१०१. ऊँ आर्यजनगण्याय नमः
१०२. ऊँ क्रूराय नमः
१०३. ऊँ क्रूरचेष्टाय नमः
१०४. ऊँ कामक्रोधकराय नमः
१०५. ऊँ कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः
१०६. ऊँ परिपोषितभक्ताय नमः
१०७. ऊँ परभीतिहराय नमः
१०८. ऊँ भक्तसंघमनोऽभीष्टफलदाय नमः
*जय_शनिदेव*
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कहानी का समय
मृत्यु का वरदान
एक नौजवान जीवन से निराश था। जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठा रोता रहता था। एक दिन मृत्यु की देवी वहाँ से गुज़री और उससे पूछा, “तुम इतना दुखी क्यों हो?”
उसने कहा, “क्योंकि मैं बेहद असफल हूँ।”
मृत्यु की देवी ने उसे वरदान दिया कि तुम बेहद सफल वैद्य बनोगे, लेकिन सबका इलाज मत करना। मरीज़ के पास जाकर आँख बंद कर लेना। तुम्हें अगर मैं मरीज़ के पैर की तरफ़ खड़ी दिखूँ, तो समझ जाना कि यह ठीक हो जाएगा। अगर मैं उसके सिर की ओर दिखूँ, तो जान लेना कि कुछ ही दिनों में मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगी। ऐसे मरीज़ का इलाज करने से मना कर देना।
नौजवान ने ऐसा ही करना शुरू किया और दूर-दूर तक एक सफल वैद्य के रूप में उसकी कीर्ति फैल गई, कि वह जिस मरीज़ को हाथ लगाता है, वह ठीक हो जाता है। वह सफल व धनवान हो गया।
एक रोज़ उस देश की राजकुमारी बीमार पड़ गई। राजा ने घोषणा करवाई कि जो इसका इलाज कर देगा, मैं इसकी शादी उसी से कराऊँगा। जगह-जगह से वैद्य आए, लेकिन सबने हाथ खड़े कर दिए। नौजवान वहाँ पहुँचा। उसे पहली ही नज़र में राजकुमारी से प्रेम हो गया, लेकिन उसने देखा कि मृत्यु की देवी उसके सिर की ओर खड़ी है।
वह कुछ देर सोचता रहा। वह किसी भी क़ीमत पर राजकुमारी को खोना नहीं चाहता था। उसने चार नौकर बुलाए और बिजली की तेज़ी से पलंग की दिशा बदल दी। अब मृत्यु की देवी राजकुमारी के पैरों की ओर खड़ी थी। नौजवान की इस चतुराई से वह बहुत क्रोधित हुई और पैर पटकते हुए वहाँ से चली गई। राजकुमारी ठीक हो गई।
लेकिन उसी रात से नौजवान को सपने आने लगे कि मृत्यु की देवी उसके सिरहाने खड़ी है। वह पूरी रात सिरहाने को पैताना और पैताने को सिरहाना करता रहता, लेकिन देवी हर बार उसके सिर की ओर ही रहती। इससे वह इतना आतंकित रहने लगा कि कुछ ही रातों बाद उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया।
उसके बाद, हर रोज़ वह आत्महत्या की कोशिशें करता और हर बार बच जाता। कहते हैं कि वह अमर है। अब भी उसी जंगल में भटकता है, ख़ुद को मारने की नई-नई तरकीबें ईजाद करता हुआ, पर हर बार ज़िंदा बच जाता हुआ।
जब मृत्यु नाराज़ होती है, जीवन का शाप देती है
मृत्यु के सामने व्यक्ति को समझदारी नहीं दिखानी चाहिए क्योंकि इससे बच पाना नामुमकिन है इस पर एक फिल्म सीरीज भी बनी है जिसका नाम है Final destination
आज इतना ही
जय श्री राम
मृत्यु का वरदान
एक नौजवान जीवन से निराश था। जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठा रोता रहता था। एक दिन मृत्यु की देवी वहाँ से गुज़री और उससे पूछा, “तुम इतना दुखी क्यों हो?”
उसने कहा, “क्योंकि मैं बेहद असफल हूँ।”
मृत्यु की देवी ने उसे वरदान दिया कि तुम बेहद सफल वैद्य बनोगे, लेकिन सबका इलाज मत करना। मरीज़ के पास जाकर आँख बंद कर लेना। तुम्हें अगर मैं मरीज़ के पैर की तरफ़ खड़ी दिखूँ, तो समझ जाना कि यह ठीक हो जाएगा। अगर मैं उसके सिर की ओर दिखूँ, तो जान लेना कि कुछ ही दिनों में मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगी। ऐसे मरीज़ का इलाज करने से मना कर देना।
नौजवान ने ऐसा ही करना शुरू किया और दूर-दूर तक एक सफल वैद्य के रूप में उसकी कीर्ति फैल गई, कि वह जिस मरीज़ को हाथ लगाता है, वह ठीक हो जाता है। वह सफल व धनवान हो गया।
एक रोज़ उस देश की राजकुमारी बीमार पड़ गई। राजा ने घोषणा करवाई कि जो इसका इलाज कर देगा, मैं इसकी शादी उसी से कराऊँगा। जगह-जगह से वैद्य आए, लेकिन सबने हाथ खड़े कर दिए। नौजवान वहाँ पहुँचा। उसे पहली ही नज़र में राजकुमारी से प्रेम हो गया, लेकिन उसने देखा कि मृत्यु की देवी उसके सिर की ओर खड़ी है।
वह कुछ देर सोचता रहा। वह किसी भी क़ीमत पर राजकुमारी को खोना नहीं चाहता था। उसने चार नौकर बुलाए और बिजली की तेज़ी से पलंग की दिशा बदल दी। अब मृत्यु की देवी राजकुमारी के पैरों की ओर खड़ी थी। नौजवान की इस चतुराई से वह बहुत क्रोधित हुई और पैर पटकते हुए वहाँ से चली गई। राजकुमारी ठीक हो गई।
लेकिन उसी रात से नौजवान को सपने आने लगे कि मृत्यु की देवी उसके सिरहाने खड़ी है। वह पूरी रात सिरहाने को पैताना और पैताने को सिरहाना करता रहता, लेकिन देवी हर बार उसके सिर की ओर ही रहती। इससे वह इतना आतंकित रहने लगा कि कुछ ही रातों बाद उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया।
उसके बाद, हर रोज़ वह आत्महत्या की कोशिशें करता और हर बार बच जाता। कहते हैं कि वह अमर है। अब भी उसी जंगल में भटकता है, ख़ुद को मारने की नई-नई तरकीबें ईजाद करता हुआ, पर हर बार ज़िंदा बच जाता हुआ।
जब मृत्यु नाराज़ होती है, जीवन का शाप देती है
मृत्यु के सामने व्यक्ति को समझदारी नहीं दिखानी चाहिए क्योंकि इससे बच पाना नामुमकिन है इस पर एक फिल्म सीरीज भी बनी है जिसका नाम है Final destination
आज इतना ही
जय श्री राम
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जिन चीजों की कीमत होती है उनका कोई मूल्य नहीं होता और जिन चीजों का मूल्य होता है उनकी कोई कीमत नहीं होती।
प्रेम का मूल्य है, कीमत क्या? ध्यान का मूल्य है, कीमत क्या? स्वतंत्रता का मूल्य है, कीमत क्या? और बाजार में बिकती हुई चीजें हैं, सब पर कीमत लगी है, पर उनका मूल्य क्या है?
जो व्यक्ति कीमत के ही जगत में जीता है वह संसारी है। जो मूल्य के जगत में प्रवेश करता है, वह संन्यासी है। मूल्य प्रसाद है परमात्मा का। लेकिन चूंकि प्रसाद है, इसलिए चूक जाने की संभावना है।
कीमत देनी पड़ती तो शायद तुम जीवन का मूल्य भी करते। चूंकि मिल गया है; तुम्हारी झोली में कोई अनजान ऊर्जा उसे भर गई है; तुम्हें पता भी नहीं चला और कोई तुम्हारे प्राणों में श्वास फूंक गया है; तुम्हें खबर भी नहीं, कौन तुम्हारे हृदय में धड़क रहा है—इसलिए भूले-भूले कंकड़-पत्थर बीन—बीन कर ही जीवन को गंवा मत देना।
जब तक परमात्मा की खोज शुरू न हो तब तक जानना ही मत कि तुम जिए। जीवन की शुरुआत परमात्मा की खोज से ही होती है। जन्म काफी नहीं है जीवन के लिए। एक और जन्म चाहिए।और धन्यभागी हैं वे, जिनके जीवन में हूक उठती है, पुकार उठती है; पीड़ा का जिन्हें अनुभव होता है; जो परमात्मा की तलाश पर निकल पड़ते हैं; जो सब दांव पर लगाने को राजी हो जाते हैं।
प्रेम का मूल्य है, कीमत क्या? ध्यान का मूल्य है, कीमत क्या? स्वतंत्रता का मूल्य है, कीमत क्या? और बाजार में बिकती हुई चीजें हैं, सब पर कीमत लगी है, पर उनका मूल्य क्या है?
जो व्यक्ति कीमत के ही जगत में जीता है वह संसारी है। जो मूल्य के जगत में प्रवेश करता है, वह संन्यासी है। मूल्य प्रसाद है परमात्मा का। लेकिन चूंकि प्रसाद है, इसलिए चूक जाने की संभावना है।
कीमत देनी पड़ती तो शायद तुम जीवन का मूल्य भी करते। चूंकि मिल गया है; तुम्हारी झोली में कोई अनजान ऊर्जा उसे भर गई है; तुम्हें पता भी नहीं चला और कोई तुम्हारे प्राणों में श्वास फूंक गया है; तुम्हें खबर भी नहीं, कौन तुम्हारे हृदय में धड़क रहा है—इसलिए भूले-भूले कंकड़-पत्थर बीन—बीन कर ही जीवन को गंवा मत देना।
जब तक परमात्मा की खोज शुरू न हो तब तक जानना ही मत कि तुम जिए। जीवन की शुरुआत परमात्मा की खोज से ही होती है। जन्म काफी नहीं है जीवन के लिए। एक और जन्म चाहिए।और धन्यभागी हैं वे, जिनके जीवन में हूक उठती है, पुकार उठती है; पीड़ा का जिन्हें अनुभव होता है; जो परमात्मा की तलाश पर निकल पड़ते हैं; जो सब दांव पर लगाने को राजी हो जाते हैं।
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*_#श्री हनुमान जी का जीवन चरित्र और परिचय (बच्चों को सिखाने के लिए)*
*_परिचय:_*
_श्री हनुमान जी, जिन्हें *"अनंत बलवंत"* के रूप में भी जाना जाता है, *हिंदू धर्म* के सबसे *पूजनीय और आदर्श भक्त* माने जाते हैं। वे *भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार हैं। उन्हें अंजनी पुत्र, केसरी नंदन, पवनपुत्र और राम भक्त* के नाम से भी जाना जाता है। *श्री हनुमान जी की शक्ति, भक्ति और निःस्वार्थ सेवा का उल्लेख कई धर्मग्रंथों* में मिलता है।_
*---*
*_जन्म और उत्पत्ति:_*
*_1. जन्म स्थान:_*
_हनुमान जी का जन्म कपि समाज में हुआ था। उनकी माता अंजना, वानर जाति की थीं और पिता केसरी, वानरों के राजा थे।_
*_2. जन्म की कथा:_*
_एक बार अंजना देवी ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप शिव जी ने उनके पुत्र रूप में अवतार लिया। यह भी कहा जाता है कि वायु देव के आशीर्वाद से अंजना को यह दिव्य पुत्र प्राप्त हुआ, इसलिए उन्हें *"पवनपुत्र"* भी कहा जाता है।_
*---*
*_गुण और विशेषताएँ:_*
*_1. शक्ति और बल:_*
_हनुमान जी अजेय योद्धा और अद्वितीय शक्ति के प्रतीक हैं। वे पर्वतों को उठा सकते हैं, समुद्र को पार कर सकते हैं और असुरों का नाश कर सकते हैं।_
*_2. भक्ति और निष्ठा:_*
_हनुमान जी भगवान श्रीराम के प्रति असीम भक्ति के प्रतीक हैं। वे निःस्वार्थ सेवा और भगवान के आदेशों का पालन करने में सबसे अग्रणी हैं।_
*_3. विद्या और ज्ञान:_*
_बचपन में सूर्य को ग्रहण करने के प्रयास में उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त की। वे वेदों, शास्त्रों और व्याकरण के महान ज्ञाता हैं।_
*_4. अमरता:_*
_हनुमान जी को वरदान मिला कि जब तक पृथ्वी पर रामकथा का प्रचार होगा, वे अमर रहेंगे।_
*---*
*_महत्वपूर्ण घटनाएँ:_*
*_1. रामायण में भूमिका:_*
_सीता जी की खोज के लिए श्रीराम ने हनुमान जी को भेजा।_
_लंका पहुंचकर उन्होंने सीता माता को भगवान श्रीराम का संदेश दिया।_
_रावण की अशोक वाटिका में उन्होंने अपनी शक्ति और भक्ति का प्रदर्शन किया।_
_संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी का जीवन बचाया।_
*_2. महाभारत में उपस्थिति:_*
_महाभारत में हनुमान जी ने भीम से भेंट की और अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में उपस्थित रहकर उनकी रक्षा की।_
*---*
*_शास्त्रों में वर्णन:_*
*_1. वाल्मीकि रामायण:_*
_वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी को एक आदर्श भक्त और सेवक के रूप में वर्णित किया गया है।_
*_2. हनुमान चालीसा:_*
_गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा में उनकी शक्ति, भक्ति और गुणों का वर्णन मिलता है।_
*_3. महाभारत और पुराण:_*
_महाभारत और विभिन्न पुराणों जैसे शिव पुराण, विष्णु पुराण, और श्रीमद्भागवत महापुराण में उनकी महानता का उल्लेख है।_
*---*
*_पूजा और महत्व:_*
*_1. हनुमान जयंती:_*
_हनुमान जी का जन्मदिन चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है।_
*_2. आराधना:_*
_उनकी पूजा से भय, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।_
*_3. संदेश:_*
_हनुमान जी हमें निःस्वार्थ सेवा, समर्पण, और आत्मबल का संदेश देते हैं।_
*_हनुमान जी का जीवन चरित्र हर युग में प्रेरणादायक और आदर्श है। उनके प्रति भक्ति से शक्ति, साहस और निष्ठा का संचार होता है।_*
*_ जय_श्री_राम_जय_हनुमान _*
*_परिचय:_*
_श्री हनुमान जी, जिन्हें *"अनंत बलवंत"* के रूप में भी जाना जाता है, *हिंदू धर्म* के सबसे *पूजनीय और आदर्श भक्त* माने जाते हैं। वे *भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार हैं। उन्हें अंजनी पुत्र, केसरी नंदन, पवनपुत्र और राम भक्त* के नाम से भी जाना जाता है। *श्री हनुमान जी की शक्ति, भक्ति और निःस्वार्थ सेवा का उल्लेख कई धर्मग्रंथों* में मिलता है।_
*---*
*_जन्म और उत्पत्ति:_*
*_1. जन्म स्थान:_*
_हनुमान जी का जन्म कपि समाज में हुआ था। उनकी माता अंजना, वानर जाति की थीं और पिता केसरी, वानरों के राजा थे।_
*_2. जन्म की कथा:_*
_एक बार अंजना देवी ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप शिव जी ने उनके पुत्र रूप में अवतार लिया। यह भी कहा जाता है कि वायु देव के आशीर्वाद से अंजना को यह दिव्य पुत्र प्राप्त हुआ, इसलिए उन्हें *"पवनपुत्र"* भी कहा जाता है।_
*---*
*_गुण और विशेषताएँ:_*
*_1. शक्ति और बल:_*
_हनुमान जी अजेय योद्धा और अद्वितीय शक्ति के प्रतीक हैं। वे पर्वतों को उठा सकते हैं, समुद्र को पार कर सकते हैं और असुरों का नाश कर सकते हैं।_
*_2. भक्ति और निष्ठा:_*
_हनुमान जी भगवान श्रीराम के प्रति असीम भक्ति के प्रतीक हैं। वे निःस्वार्थ सेवा और भगवान के आदेशों का पालन करने में सबसे अग्रणी हैं।_
*_3. विद्या और ज्ञान:_*
_बचपन में सूर्य को ग्रहण करने के प्रयास में उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त की। वे वेदों, शास्त्रों और व्याकरण के महान ज्ञाता हैं।_
*_4. अमरता:_*
_हनुमान जी को वरदान मिला कि जब तक पृथ्वी पर रामकथा का प्रचार होगा, वे अमर रहेंगे।_
*---*
*_महत्वपूर्ण घटनाएँ:_*
*_1. रामायण में भूमिका:_*
_सीता जी की खोज के लिए श्रीराम ने हनुमान जी को भेजा।_
_लंका पहुंचकर उन्होंने सीता माता को भगवान श्रीराम का संदेश दिया।_
_रावण की अशोक वाटिका में उन्होंने अपनी शक्ति और भक्ति का प्रदर्शन किया।_
_संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी का जीवन बचाया।_
*_2. महाभारत में उपस्थिति:_*
_महाभारत में हनुमान जी ने भीम से भेंट की और अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में उपस्थित रहकर उनकी रक्षा की।_
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*_शास्त्रों में वर्णन:_*
*_1. वाल्मीकि रामायण:_*
_वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी को एक आदर्श भक्त और सेवक के रूप में वर्णित किया गया है।_
*_2. हनुमान चालीसा:_*
_गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा में उनकी शक्ति, भक्ति और गुणों का वर्णन मिलता है।_
*_3. महाभारत और पुराण:_*
_महाभारत और विभिन्न पुराणों जैसे शिव पुराण, विष्णु पुराण, और श्रीमद्भागवत महापुराण में उनकी महानता का उल्लेख है।_
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*_पूजा और महत्व:_*
*_1. हनुमान जयंती:_*
_हनुमान जी का जन्मदिन चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है।_
*_2. आराधना:_*
_उनकी पूजा से भय, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।_
*_3. संदेश:_*
_हनुमान जी हमें निःस्वार्थ सेवा, समर्पण, और आत्मबल का संदेश देते हैं।_
*_हनुमान जी का जीवन चरित्र हर युग में प्रेरणादायक और आदर्श है। उनके प्रति भक्ति से शक्ति, साहस और निष्ठा का संचार होता है।_*
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👍6
*10 या 11 दिसंबर किस दिन मनाई जाएगी मोक्षदा एकादशी, ध्यान रखें सही तिथि, पूजा विधि और पारण का समय*
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि का आरंभ 11 दिसंबर को सुबह 03 बजकर 42 मिनट से शुरू होगा, जो अगले दिन यानी 12 दिसंबर को रात 1 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगा. हिन्दू धर्म में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है ऐसे में मोक्षदा एकादशी व्रत 11 को रखा जाएगा, वहीं पारण 12 को 07.05 AM से 09.09 AM बीच कर सकते हैं.
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि का आरंभ 11 दिसंबर को सुबह 03 बजकर 42 मिनट से शुरू होगा, जो अगले दिन यानी 12 दिसंबर को रात 1 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगा. हिन्दू धर्म में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है ऐसे में मोक्षदा एकादशी व्रत 11 को रखा जाएगा, वहीं पारण 12 को 07.05 AM से 09.09 AM बीच कर सकते हैं.
👍7
दास प्रथा के दिनों में एक मालिक के पास अनेकों गुलाम हुआ करते थे उन्हीं में से एक था गोपाल !
गोपाल था तो सिर्फ एक गुलाम लेकिन वह बड़ा ही चतुर और बुद्धिमान था उसकी ख्याति दूर दराज़ के इलाकों में फैलने लगी थी !एक दिन इस बात की खबर उसके मालिक को लगी ;उसने गोपाल को बुलाया और कहा-सुनते हैं कि तुम बहुत बुद्धिमान हो मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की परीक्षा लेना चाहता हूँ अगर तुम इम्तिहान में पास हो गए तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी !अच्छा जाओ एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा बढ़िया हो उसे ले आओ !
गोपाल ने आदेश का पालन किया और मरे हुए बकरे की जीभ लाकर मालिक के सामने रख दी कारण पूछने पर कि जीभ ही क्यों लाया गोपाल ने कहा -अगर शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा-ही-अच्छा होता है !
मालिक ने आदेश देते हुए कहा -अच्छा इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा बुरा हो उसे ले आओ !
गोपाल बाहर गया थोड़ी ही देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया फिर से कारण पूछने पर गोपाल ने कहा -अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं तो सब बुरा-ही-बुरा होता है !
उसने आगे कहते हुए कहा -मालिक वाणी तो सभी के पास जन्मजात होती है परन्तु बोलना किसी-2 को ही आता है कि क्या बोलें कैसे शब्द बोलें कब बोलें ?इस कला को बहुत ही कम लोग जानते हैं एक बात से प्रेम झरता है और दूसरी बात से झगड़ा होता है !
कड़वी बातों ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किए हैं !इस जीभ ने ही दुनिया में बड़े-बड़े कहर ढाए हैं !जीभ तीन इंच का वो हथियार है जिससे कोई छः फीट के आदमी को भी मार सकता है तो कोई मरते हुए इंसान में भी प्राण फूंक सकता है ! संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को ही मिला है ;उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और दुरूपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणित हो सकता है !भारत के विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था !
मालिक गोपाल की बुद्धिमानी और चतुराई भरी बातों को सुनकर बहुत खुश हुआ कि आज उसके गुलाम ने उसे एक बहुत बड़ी सीख दी थी अतः उसने गोपाल को आजाद कर दिया !
साधकजनो मधुर वाणी एक वरदान है जो हमें लोकप्रिय बनाती है वही कर्कश या तीखी बोली हमें अपयश दिलाती है और हमारी प्रतिष्ठा को कम करती है !आपकी वाणी आपके व्यक्तित्त्व का प्रतिबिंब है अतः उसे मीठा बनाने का प्रयास कीजियेगा !
गोपाल था तो सिर्फ एक गुलाम लेकिन वह बड़ा ही चतुर और बुद्धिमान था उसकी ख्याति दूर दराज़ के इलाकों में फैलने लगी थी !एक दिन इस बात की खबर उसके मालिक को लगी ;उसने गोपाल को बुलाया और कहा-सुनते हैं कि तुम बहुत बुद्धिमान हो मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की परीक्षा लेना चाहता हूँ अगर तुम इम्तिहान में पास हो गए तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी !अच्छा जाओ एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा बढ़िया हो उसे ले आओ !
गोपाल ने आदेश का पालन किया और मरे हुए बकरे की जीभ लाकर मालिक के सामने रख दी कारण पूछने पर कि जीभ ही क्यों लाया गोपाल ने कहा -अगर शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा-ही-अच्छा होता है !
मालिक ने आदेश देते हुए कहा -अच्छा इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा बुरा हो उसे ले आओ !
गोपाल बाहर गया थोड़ी ही देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया फिर से कारण पूछने पर गोपाल ने कहा -अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं तो सब बुरा-ही-बुरा होता है !
उसने आगे कहते हुए कहा -मालिक वाणी तो सभी के पास जन्मजात होती है परन्तु बोलना किसी-2 को ही आता है कि क्या बोलें कैसे शब्द बोलें कब बोलें ?इस कला को बहुत ही कम लोग जानते हैं एक बात से प्रेम झरता है और दूसरी बात से झगड़ा होता है !
कड़वी बातों ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किए हैं !इस जीभ ने ही दुनिया में बड़े-बड़े कहर ढाए हैं !जीभ तीन इंच का वो हथियार है जिससे कोई छः फीट के आदमी को भी मार सकता है तो कोई मरते हुए इंसान में भी प्राण फूंक सकता है ! संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को ही मिला है ;उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और दुरूपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणित हो सकता है !भारत के विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था !
मालिक गोपाल की बुद्धिमानी और चतुराई भरी बातों को सुनकर बहुत खुश हुआ कि आज उसके गुलाम ने उसे एक बहुत बड़ी सीख दी थी अतः उसने गोपाल को आजाद कर दिया !
साधकजनो मधुर वाणी एक वरदान है जो हमें लोकप्रिय बनाती है वही कर्कश या तीखी बोली हमें अपयश दिलाती है और हमारी प्रतिष्ठा को कम करती है !आपकी वाणी आपके व्यक्तित्त्व का प्रतिबिंब है अतः उसे मीठा बनाने का प्रयास कीजियेगा !
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*_🕉️ममता रत सन ग्यान कहानी।अति लोभी सन विरति बखानी।_*
*_क्रोधिहि सभ कर मिहि हरि कथा।उसर बीज बए फल जथा।_*
*_अर्थ- मोह माया में फॅसे ब्यक्ति से ज्ञान की बातें, अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है।_*
*_क्रोधिहि सभ कर मिहि हरि कथा।उसर बीज बए फल जथा।_*
*_अर्थ- मोह माया में फॅसे ब्यक्ति से ज्ञान की बातें, अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है।_*
👍4
किस देवता का रंग कौन-सा जानिए रहस्य...
धरती पर पहले शुद्ध रूप से चार वर्णों के लोग रहते थे। प्राचीनकाल में श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण रंग के मनुष्यों की ही संख्या अधिक रही है और आज भी है। इन्हें ही गौर, लाल, पीला (गेहुआ) और काला कहा गया। लेकिन क्या कभी किसी ने नीले या श्याम वर्ण के लोगों को देखा है?
माना जाता है कि प्राचीनकाल में नील वर्ण की भी एक जाति रहती थी। आज भी बहुत से लोगों की आंखे नीली क्यों और किस तरह हो जाती है? क्या सचमुच ही प्राचीनकाल में नीले रंग के भी लोग रहते थे।
अनंत का प्रतीक नीला रंग👉 हिन्दू धर्म अनुसार नीला रंग आत्मा का मूल रंग माना जाता है। कहते हैं कि जब कोई जल ज्यादा गहराई लिए हुए हो तो वह नीला दिखाई देने लगता है। नीलवर्ण विशाल, व्यापकता और अनन्तता का द्योतक है। अगाध आकाश का रंग नीला है, वैसे ही अनन्त महासागर का रंग भी नीला है।
कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है।
ब्राह्मा👉 ब्रह्मा और सरस्वती का रंग श्वेत बताया गया है।
विष्णु👉 भगवान विष्णु का रंग नीला और माता लक्ष्मी का रंग स्वर्ण के समान है।
शिव👉 शिव का रंग श्याम और माता पार्वती का रंग गौरा बताया जाता है।
श्रीराम👉 कुछ ग्रंथों अनुसार भगवान श्रीराम भी नीलवर्ण के थे। इसीलिए उन्हें नीलाम्बुज, मेघवर्ण, नीलमणि, गगनसदृश आदि उपमाएं दी जाती हैं। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है?
श्रीकृष्ण👉 भगवान श्रीकृष्ण को भी नील वर्ण का माना जाता है। उनके नीले रंग को श्याम वर्ण कहते थे। श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला। दरअसल उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल था। अर्थात काला, नीला और सफेद मिश्रित रंग। श्याम वर्ण के होने के कारण कुछ कवियों ने उनको काला रंग का मान लिया।
माता दुर्गा👉 दुर्गामासुर का वध करने के कारण आद्य शक्ति को दुर्गा कहा गया। काजल के समान देह, नील कमल के समान विशाल नेत्रों से युक्त दस भुजाओं वाली देवी ने स्वयं प्रकट होकर देवताओं की रक्षा की थी।
1.शैलपुत्री : राजा दक्ष की पुत्री सती को ही शैलपुत्री कहा गया। इनका वर्ण गौर है।
2.ब्रह्मचारिणी : माता सती ने हिमालय राज के यहां जन्म लिया और शिव को पाने के लिए कठिन तप किया इसीलिए ब्रह्मचारिणी कहलाई। कठोर तप के कारण इनका रंग काला पड़ गया था लेकिन बाद में गौरा हो गया।
3.चंद्रघंटा : माता की तीसरी शक्ति का शारीरिक वर्ण स्वर्ण के समान हैं।
4.कुष्मांडा : इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है।
5.स्कंदमाता : ब्रह्मचारिणी और स्कंदमाता एक ही है। स्कन्द', शिव तथा पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय का एक और नाम हैं। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है।
6.कात्यायनी : कत नमक एक विख्यात महर्षि थे, उनके पुत्र कात्य हुए तथा तथा इन्हीं कात्य के गोत्र में प्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। कात्यायन, ऋषि ने देवी माता को पुत्री रूप में पाने हेतु बहुत वर्षों तक कठिन तपस्या की तथा ऋषि की इच्छानुसार ही मां दुर्गा ने इनके यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लिया, तथा कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई।
7.कालरात्रि : नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है।
8.महागौरी : महागौरी ही पार्वती है यही स्कंदमाता है और यही ब्रह्मचारिणी है। यही अपने पूर्व जन्म में सती थीं। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। ब्रह्मचारिणी के रूप में तपस्या करने के बाद शिव की कृपा से यह गौर वर्ण की हो गई थीं।
9.सिद्धिदात्री : भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से ये तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। देवी का स्वरूप कांति युक्त तथा मनोहर हैं।
दस महाविद्या देवी का वर्ण :
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1.माता कालीका : मां काली का रंग कहीं-कहीं काला और कहीं पर नीले का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान इन्हें श्यामरंग की मानते हैं।
2.तारा : भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं:- 1.नील सरस्वती 2.एक जटा 3.उग्र तारा। 'आद्या शक्ति महाकाली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु घोर नीला वर्ण धारण किया तथा वे उग्र तारा के नाम से जानी जाने लगी।
धरती पर पहले शुद्ध रूप से चार वर्णों के लोग रहते थे। प्राचीनकाल में श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण रंग के मनुष्यों की ही संख्या अधिक रही है और आज भी है। इन्हें ही गौर, लाल, पीला (गेहुआ) और काला कहा गया। लेकिन क्या कभी किसी ने नीले या श्याम वर्ण के लोगों को देखा है?
माना जाता है कि प्राचीनकाल में नील वर्ण की भी एक जाति रहती थी। आज भी बहुत से लोगों की आंखे नीली क्यों और किस तरह हो जाती है? क्या सचमुच ही प्राचीनकाल में नीले रंग के भी लोग रहते थे।
अनंत का प्रतीक नीला रंग👉 हिन्दू धर्म अनुसार नीला रंग आत्मा का मूल रंग माना जाता है। कहते हैं कि जब कोई जल ज्यादा गहराई लिए हुए हो तो वह नीला दिखाई देने लगता है। नीलवर्ण विशाल, व्यापकता और अनन्तता का द्योतक है। अगाध आकाश का रंग नीला है, वैसे ही अनन्त महासागर का रंग भी नीला है।
कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है।
ब्राह्मा👉 ब्रह्मा और सरस्वती का रंग श्वेत बताया गया है।
विष्णु👉 भगवान विष्णु का रंग नीला और माता लक्ष्मी का रंग स्वर्ण के समान है।
शिव👉 शिव का रंग श्याम और माता पार्वती का रंग गौरा बताया जाता है।
श्रीराम👉 कुछ ग्रंथों अनुसार भगवान श्रीराम भी नीलवर्ण के थे। इसीलिए उन्हें नीलाम्बुज, मेघवर्ण, नीलमणि, गगनसदृश आदि उपमाएं दी जाती हैं। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है?
श्रीकृष्ण👉 भगवान श्रीकृष्ण को भी नील वर्ण का माना जाता है। उनके नीले रंग को श्याम वर्ण कहते थे। श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला। दरअसल उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल था। अर्थात काला, नीला और सफेद मिश्रित रंग। श्याम वर्ण के होने के कारण कुछ कवियों ने उनको काला रंग का मान लिया।
माता दुर्गा👉 दुर्गामासुर का वध करने के कारण आद्य शक्ति को दुर्गा कहा गया। काजल के समान देह, नील कमल के समान विशाल नेत्रों से युक्त दस भुजाओं वाली देवी ने स्वयं प्रकट होकर देवताओं की रक्षा की थी।
1.शैलपुत्री : राजा दक्ष की पुत्री सती को ही शैलपुत्री कहा गया। इनका वर्ण गौर है।
2.ब्रह्मचारिणी : माता सती ने हिमालय राज के यहां जन्म लिया और शिव को पाने के लिए कठिन तप किया इसीलिए ब्रह्मचारिणी कहलाई। कठोर तप के कारण इनका रंग काला पड़ गया था लेकिन बाद में गौरा हो गया।
3.चंद्रघंटा : माता की तीसरी शक्ति का शारीरिक वर्ण स्वर्ण के समान हैं।
4.कुष्मांडा : इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है।
5.स्कंदमाता : ब्रह्मचारिणी और स्कंदमाता एक ही है। स्कन्द', शिव तथा पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय का एक और नाम हैं। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है।
6.कात्यायनी : कत नमक एक विख्यात महर्षि थे, उनके पुत्र कात्य हुए तथा तथा इन्हीं कात्य के गोत्र में प्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। कात्यायन, ऋषि ने देवी माता को पुत्री रूप में पाने हेतु बहुत वर्षों तक कठिन तपस्या की तथा ऋषि की इच्छानुसार ही मां दुर्गा ने इनके यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लिया, तथा कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई।
7.कालरात्रि : नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है।
8.महागौरी : महागौरी ही पार्वती है यही स्कंदमाता है और यही ब्रह्मचारिणी है। यही अपने पूर्व जन्म में सती थीं। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। ब्रह्मचारिणी के रूप में तपस्या करने के बाद शिव की कृपा से यह गौर वर्ण की हो गई थीं।
9.सिद्धिदात्री : भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से ये तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। देवी का स्वरूप कांति युक्त तथा मनोहर हैं।
दस महाविद्या देवी का वर्ण :
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1.माता कालीका : मां काली का रंग कहीं-कहीं काला और कहीं पर नीले का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान इन्हें श्यामरंग की मानते हैं।
2.तारा : भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं:- 1.नील सरस्वती 2.एक जटा 3.उग्र तारा। 'आद्या शक्ति महाकाली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु घोर नीला वर्ण धारण किया तथा वे उग्र तारा के नाम से जानी जाने लगी।
👍5❤4🙏1
3.त्रिपुर सुंदरी : देवी का शारीरिक वर्ण हजारों उदयमान सूर्य के कांति की भांति है।
4.भुवनेश्वरी : दस महाविद्याकों में से एक माता भुवनेश्वरी का वर्ण लाल बताया गया है। कुछ जगह पर इन्हें स्वर्ण आभा के सामान कांति वाली और देवी उगते सूर्य या सिंदूरी वर्ण से शोभिता हैं।
5.देवी छिन्नमस्तका : देवी का शारीरक वर्ण पिला या लाल-पीले मिश्रित रंग का हैं।
6.देवी महा त्रिपुरभैरवी : देवी भैरवी कि शारीरिक कांति हजारों उगते हुए सूर्य के समान है। कभी-कभी देवी का शारीरिक वर्ण गहरे काले रंग के समान प्रतीत होती है, जैसे काली या काल रात्रि देवियों का हैं।
7.धूमावती : देवी धूमावती का वास्तविक रूप धुएं जैसा है अर्थात मटमेला।
8.बगलामुखी : दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी देवी का रंग पीला है।
9.देवी मातंगी : देवी मातंगी का वर्ण गहरे नीले रंग (नील कमल के समान) या श्याम वर्ण का है।
10.कमला : देवी कमला का स्वरूप अत्यंत ही मनोहर तथा मनमोहक हैं तथा स्वर्णिम आभा लिया हुए हैं। अर्थात इनका रंग पीला है।
4.भुवनेश्वरी : दस महाविद्याकों में से एक माता भुवनेश्वरी का वर्ण लाल बताया गया है। कुछ जगह पर इन्हें स्वर्ण आभा के सामान कांति वाली और देवी उगते सूर्य या सिंदूरी वर्ण से शोभिता हैं।
5.देवी छिन्नमस्तका : देवी का शारीरक वर्ण पिला या लाल-पीले मिश्रित रंग का हैं।
6.देवी महा त्रिपुरभैरवी : देवी भैरवी कि शारीरिक कांति हजारों उगते हुए सूर्य के समान है। कभी-कभी देवी का शारीरिक वर्ण गहरे काले रंग के समान प्रतीत होती है, जैसे काली या काल रात्रि देवियों का हैं।
7.धूमावती : देवी धूमावती का वास्तविक रूप धुएं जैसा है अर्थात मटमेला।
8.बगलामुखी : दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी देवी का रंग पीला है।
9.देवी मातंगी : देवी मातंगी का वर्ण गहरे नीले रंग (नील कमल के समान) या श्याम वर्ण का है।
10.कमला : देवी कमला का स्वरूप अत्यंत ही मनोहर तथा मनमोहक हैं तथा स्वर्णिम आभा लिया हुए हैं। अर्थात इनका रंग पीला है।
👍6
यहां स्नान करके चन्द्रमा हुए थे श्राप मुक्त
श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक चंद्रिका देवी मंदिर लखनऊ के बख्शी कस्बे में स्थित है। एक मान्यता के अनुसार गोमती नदी के पास महीसागर तीर्थ के किनारे एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में नव दुर्गा के साथ उनकी वेदियां कई वर्षों से सुरक्षित रखी हुई हैं। शास्त्रों के मुताबिक पांडव वनवास काल में द्रौपदी के साथ इस पवित्र स्थान पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने यहां अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज द्वारा रोके जाने पर युधिष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा था।
इस युद्ध में उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हो गया था व दूसरा पुत्र सुधन्वा युद्ध के दौरान चन्द्रिका देवी धाम में नव दुर्गाओं की पूजा आराधना में लीन था। युद्ध में अनुपस्थिति के कारण इस महीसागर क्षेत्र में उसे खौलते तेल के कड़ाहे में डालकर उसकी परीक्षा ली गई। परंतु मां चन्द्रिका देवी की कृपा के चलते उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। तभी से इस तीर्थ को सुधन्वा कुंड भी कहा जानेलगा।
पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को भी श्राप मुक्ति के लिए चन्द्रिका धाम स्थित मही सागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए आना पड़ा था
मां चन्द्रिका के भव्य मंदिर के पास से निकली गोमती नदी की जलधारा चन्द्रिका देवी धाम की तीन दिशाओं उत्तर पश्चिम और दक्षिण में प्रवाहित होती है तथा पूर्व* *दिशा में महीसागर संगम तीर्थ स्थित है जिसमें शिव जी की विशाल मूर्ति स्थापित है।
मंदिर के समीप महीसागर तीर्थ की भी अपनी एक मान्यता है। स्कन्दपुराण के अनुसार द्वापर युग में इसका संबंध भीम के पोते व घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के साथ जुड़ा है, जिसने प्राचीन समय में यहां घोर तप किया था। लोक मान्यता के अनुसार महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता। यही कारण है कि इस मंदिर को इतनी ख्याति मिली। आज भी करोड़ों भक्त यहां महारथी वीर बर्बरीक की पूजा आराधना करते हैं और कुण्ड में स्नान करके खुद को पवित्र करते हैं व मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हैं।
मंदिर की तीन दिशाओं में गोमती नदी फैली हुई है जो मंदिर को और आकर्षित बनाती है। मंदिर की प्रसिद्धि व लोकप्रियता के चलते यहां हर माह की अमावस्या को मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होने के लिए आते हैं। सैकड़ों की संख्या में आने वाले भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में आकर मन्नत मांगते हैं और चुनरी की गांठ बांधते हैं तथा मन्नतें पूरी होने पर मां को चुनरी प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घण्टा बांधते हैं।
यहां की सबसे खास व अद्भुत बात यह है कि यहां पूजा-अर्चना अनुसूचित समुदाय के लोगों से कराई जाती है, जो आधुनिक समय में कहीं ओर मिलना मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन है। अमीर हो या गरीब अगड़ा हो अथवा पिछड़ा मां चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी भक्त मत्था टेक कर अपने मन की मुराद मांगते हैं, मां भी मंदिर में आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक चंद्रिका देवी मंदिर लखनऊ के बख्शी कस्बे में स्थित है। एक मान्यता के अनुसार गोमती नदी के पास महीसागर तीर्थ के किनारे एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में नव दुर्गा के साथ उनकी वेदियां कई वर्षों से सुरक्षित रखी हुई हैं। शास्त्रों के मुताबिक पांडव वनवास काल में द्रौपदी के साथ इस पवित्र स्थान पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने यहां अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज द्वारा रोके जाने पर युधिष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा था।
इस युद्ध में उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हो गया था व दूसरा पुत्र सुधन्वा युद्ध के दौरान चन्द्रिका देवी धाम में नव दुर्गाओं की पूजा आराधना में लीन था। युद्ध में अनुपस्थिति के कारण इस महीसागर क्षेत्र में उसे खौलते तेल के कड़ाहे में डालकर उसकी परीक्षा ली गई। परंतु मां चन्द्रिका देवी की कृपा के चलते उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। तभी से इस तीर्थ को सुधन्वा कुंड भी कहा जानेलगा।
पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को भी श्राप मुक्ति के लिए चन्द्रिका धाम स्थित मही सागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए आना पड़ा था
मां चन्द्रिका के भव्य मंदिर के पास से निकली गोमती नदी की जलधारा चन्द्रिका देवी धाम की तीन दिशाओं उत्तर पश्चिम और दक्षिण में प्रवाहित होती है तथा पूर्व* *दिशा में महीसागर संगम तीर्थ स्थित है जिसमें शिव जी की विशाल मूर्ति स्थापित है।
मंदिर के समीप महीसागर तीर्थ की भी अपनी एक मान्यता है। स्कन्दपुराण के अनुसार द्वापर युग में इसका संबंध भीम के पोते व घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के साथ जुड़ा है, जिसने प्राचीन समय में यहां घोर तप किया था। लोक मान्यता के अनुसार महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता। यही कारण है कि इस मंदिर को इतनी ख्याति मिली। आज भी करोड़ों भक्त यहां महारथी वीर बर्बरीक की पूजा आराधना करते हैं और कुण्ड में स्नान करके खुद को पवित्र करते हैं व मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हैं।
मंदिर की तीन दिशाओं में गोमती नदी फैली हुई है जो मंदिर को और आकर्षित बनाती है। मंदिर की प्रसिद्धि व लोकप्रियता के चलते यहां हर माह की अमावस्या को मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होने के लिए आते हैं। सैकड़ों की संख्या में आने वाले भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में आकर मन्नत मांगते हैं और चुनरी की गांठ बांधते हैं तथा मन्नतें पूरी होने पर मां को चुनरी प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घण्टा बांधते हैं।
यहां की सबसे खास व अद्भुत बात यह है कि यहां पूजा-अर्चना अनुसूचित समुदाय के लोगों से कराई जाती है, जो आधुनिक समय में कहीं ओर मिलना मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन है। अमीर हो या गरीब अगड़ा हो अथवा पिछड़ा मां चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी भक्त मत्था टेक कर अपने मन की मुराद मांगते हैं, मां भी मंदिर में आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
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हस्तरेखाशास्त्र
हाथ में ये एक रेखा हो तो आपको अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता!
मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता है लेकिन फिर भी कई बार सफल और अमीर बनने में किस्मत का भी साथ मिलना जरूरी होता है।
हर किसी को यह जानने की बड़ी उत्सुकता रहती है कि वह अपनी जिंदगी में कितनी धन-दौलत कमाएंगे। वह कभी अमीर बनेंगे भी या नहीं। हाथ की कई रेखाओं को पढ़कर जाना जा सकता है कि आप अमीर बनेंगे या नहीं।
हस्तरेखा शास्त्र में कई रेखाएं होती हैं। रिंग फिंगर और सबसे छोटी अंगुली के नीचे सीधी रेखा को धन की रेखा (मनी लाइन) कहा जाता है।
अगर आपके हाथ में कई ऐसी रेखाएं हैं जो स्पष्ट है और सीधी है तो इसका मतलब है कि आप पैसे के मामले में काफी स्मार्ट हैं और भविष्य में खूब पैसे कमाएंगे।
अगर आपकी सूर्य रेखा भी सीधी और स्पष्ट है तो इसका मतलब है कि आप अपनी जिंदगी में धन और प्रसिद्ध दोनों कमाएंगे।
अगर आपकी मनी लाइन सीधी नहीं बल्कि लहरनुमा है तो....
============================
तो इसका मतलब है कि आपके पास लक्ष्मी कभी स्थिर नहीं रहेगी यानी लक्ष्मी आती जाती रहेंगी। आपके बिजनेस और करियर में कई दिक्कतें भी आएंगी। फिर भी अगर आप अपनी क्षमता में सुधार कर लें तो सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आफको सफलता और धन मिलेगा लेकिन मेहनत के बाद ही।
अगर आपके हाथ में यह रेखा मुड़ी-तुड़ी और रुक-रुक कर बनी हुई है तो आप पैसे के मामले में बिल्कुल लकी नहीं हैं। करियर और बिजनेस में आपको बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। अगर आपके अंदर धैर्य का अभाव है तब तो आपके अमीर बनने की संभावनाएं नहीं के बराबर है। अगर आप अमीर बनना चाहते हैं तो धैर्य और संयम बनाए रखें। अभी से निराश मत हो जाइए क्योंकि केवल एक इस रेखा से ही अमीर बनना तय नहीं होता है। कुछ और भी रेखाएं बनाती हैं हमारी तकदीर...
सूर्य रेखा से भी हमारी आर्थिक स्थिति के बारे में काफी कुछ पता चलता है। रिंग फिंगर के नीचे स्थित सूर्य रेखा यदि असाधारण रूप से सीधी है, तो व्यक्ति अपार धन का स्वामी बनता है। उसे समाज में प्रसिद्धि और सफलता मिलती है। अगर आपकी सूर्य रेखा भी ऐसी है तो आप भी आसानी से सफलता पाएंगे।
अगर आपकी सूर्य रेखा से कोई शाखा निकल रही है और छोटी अंगुली की तरफ बढ़ी हुई है तो इसका मतलब आप बिजनेस माइंडेड हैं और आपको दूसरों से हमेशा मदद मिलेगी। आप पैसे संभालने में माहिर होंगे और इसीलिए आपके दौलत इकठ्ठा होने की संभावना ज्यादा होगी।
अगर आपके हाथ में मनी लाइन और सन लाइन को एक क्षैतिज रेखा काट रही है तो आप क्षुद्र प्रकृति के व्यक्तियों या अपने अंडर काम करने वालों से सावधान रहें क्योंकि ये आपकी प्रतिष्ठा और समृद्धि को छीन सकते हैं। इसके अलावा आपको सार्वजनिक रूप से अपनी संपन्नता को दिखाने की जरूरत नहीं है।
अगर सनलाइन से निकली हुई रेखा (शाखा) मनी लाइन और सन लाइन से एक साथ मिलती है तो आपको अचानक से धन प्राप्ति होगी। आप जिंदगी में कभी अचानक से सफलता पाएंगे।
सॉफ्ट और फैट हथेली-
================
चीनी ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, सॉफ्ट और फैट हथेली वाले शख्स को दौलत और शोहरत दोनों ही मिलेगी। इसके विपरीत कठोर और पतली हथेली वालों को पैसे के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
हथेली का रंग-
==========
अगर आपकी हथेली का रंग सफेद है तो आपकी किसी अमीर लड़के या लड़की से शादी होगी। अगर आपकी हथेली का रंग लाल है तो आप कम पैसे कमाएंगे।
हाथ में ये एक रेखा हो तो आपको अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता!
मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता है लेकिन फिर भी कई बार सफल और अमीर बनने में किस्मत का भी साथ मिलना जरूरी होता है।
हर किसी को यह जानने की बड़ी उत्सुकता रहती है कि वह अपनी जिंदगी में कितनी धन-दौलत कमाएंगे। वह कभी अमीर बनेंगे भी या नहीं। हाथ की कई रेखाओं को पढ़कर जाना जा सकता है कि आप अमीर बनेंगे या नहीं।
हस्तरेखा शास्त्र में कई रेखाएं होती हैं। रिंग फिंगर और सबसे छोटी अंगुली के नीचे सीधी रेखा को धन की रेखा (मनी लाइन) कहा जाता है।
अगर आपके हाथ में कई ऐसी रेखाएं हैं जो स्पष्ट है और सीधी है तो इसका मतलब है कि आप पैसे के मामले में काफी स्मार्ट हैं और भविष्य में खूब पैसे कमाएंगे।
अगर आपकी सूर्य रेखा भी सीधी और स्पष्ट है तो इसका मतलब है कि आप अपनी जिंदगी में धन और प्रसिद्ध दोनों कमाएंगे।
अगर आपकी मनी लाइन सीधी नहीं बल्कि लहरनुमा है तो....
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तो इसका मतलब है कि आपके पास लक्ष्मी कभी स्थिर नहीं रहेगी यानी लक्ष्मी आती जाती रहेंगी। आपके बिजनेस और करियर में कई दिक्कतें भी आएंगी। फिर भी अगर आप अपनी क्षमता में सुधार कर लें तो सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आफको सफलता और धन मिलेगा लेकिन मेहनत के बाद ही।
अगर आपके हाथ में यह रेखा मुड़ी-तुड़ी और रुक-रुक कर बनी हुई है तो आप पैसे के मामले में बिल्कुल लकी नहीं हैं। करियर और बिजनेस में आपको बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। अगर आपके अंदर धैर्य का अभाव है तब तो आपके अमीर बनने की संभावनाएं नहीं के बराबर है। अगर आप अमीर बनना चाहते हैं तो धैर्य और संयम बनाए रखें। अभी से निराश मत हो जाइए क्योंकि केवल एक इस रेखा से ही अमीर बनना तय नहीं होता है। कुछ और भी रेखाएं बनाती हैं हमारी तकदीर...
सूर्य रेखा से भी हमारी आर्थिक स्थिति के बारे में काफी कुछ पता चलता है। रिंग फिंगर के नीचे स्थित सूर्य रेखा यदि असाधारण रूप से सीधी है, तो व्यक्ति अपार धन का स्वामी बनता है। उसे समाज में प्रसिद्धि और सफलता मिलती है। अगर आपकी सूर्य रेखा भी ऐसी है तो आप भी आसानी से सफलता पाएंगे।
अगर आपकी सूर्य रेखा से कोई शाखा निकल रही है और छोटी अंगुली की तरफ बढ़ी हुई है तो इसका मतलब आप बिजनेस माइंडेड हैं और आपको दूसरों से हमेशा मदद मिलेगी। आप पैसे संभालने में माहिर होंगे और इसीलिए आपके दौलत इकठ्ठा होने की संभावना ज्यादा होगी।
अगर आपके हाथ में मनी लाइन और सन लाइन को एक क्षैतिज रेखा काट रही है तो आप क्षुद्र प्रकृति के व्यक्तियों या अपने अंडर काम करने वालों से सावधान रहें क्योंकि ये आपकी प्रतिष्ठा और समृद्धि को छीन सकते हैं। इसके अलावा आपको सार्वजनिक रूप से अपनी संपन्नता को दिखाने की जरूरत नहीं है।
अगर सनलाइन से निकली हुई रेखा (शाखा) मनी लाइन और सन लाइन से एक साथ मिलती है तो आपको अचानक से धन प्राप्ति होगी। आप जिंदगी में कभी अचानक से सफलता पाएंगे।
सॉफ्ट और फैट हथेली-
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चीनी ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, सॉफ्ट और फैट हथेली वाले शख्स को दौलत और शोहरत दोनों ही मिलेगी। इसके विपरीत कठोर और पतली हथेली वालों को पैसे के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
हथेली का रंग-
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अगर आपकी हथेली का रंग सफेद है तो आपकी किसी अमीर लड़के या लड़की से शादी होगी। अगर आपकी हथेली का रंग लाल है तो आप कम पैसे कमाएंगे।
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ध्यान
ध्यान सबसे सरल है और ध्यान सबसे कठिन भी है। ध्यान शून्य भी है और ध्यान शिखर भी है। ध्यान आदि भी है और ध्यान अंत भी है।
पर ध्यान किया नहीं जाता, ध्यान तो खुद– ब– खुद घटित जाता है। क्योंकि यहां ‘करने’ का प्रयास आ गया, तो वो ध्यान क्या हुआ?
जैसे रास्ते से कोई खूबसूरत कन्या, तेज स्पीड में हमारी आंखों के सामने से निकल जाती है और हम कुछ क्षण, यां सेकंड के चौथे भाग के बराबर ही उन्हें देखते रह जाते हैं। यानी कि 1 सेकंड के चौथे भाग के समय जितना आपने अपनी आखों से देखा और उतने समय केलिए ही आपका ध्यान घटा था। आप यकीन मानिए, इस दरिमयान आपके विचारों की गति इतने ही समय केलिए थम सी गई थी। मानो पॉज मोड में चली गई हो। यही ध्यान है।
किसी से बात करते समय उसकी आंखों में आंखे डालते हुए एक एक शब्द पर पूर्ण फोकस करते हुए बातें करें। आप जितना समय ऐसे बातें करेंगे, उतने समय केलिए ही आपका ध्यान हो जायेगा।
किसी मधुर यां मनपसंद संगीत को पूर्ण एकाग्रता के साथ सुने, एक एक शब्द पर ध्यान देकर और संगीत का आनंद लेकर। यकीन मानिए आप के ब्रेन में विचारों का प्रवाह उतने समय केलिए थम जाएगा और आप वर्तमान का आनंद उठा रहे होगे। यही ध्यान होगा।
आप लेटे हुए हैं यां बैठे हैं। अपने नाक के द्वारा आ और जा रही सांस को महसूस करें। सांस कैसे जा रही है और कैसे आ रही है, उस पर पूर्ण ध्यान दें। जितना समय आप करोगे, उतने समय केलिए आपक ध्यान घट जाएगा।
आप कहीं पार्क यां खुली हवा में टहल रहे हैं। हवा के त्वचा के साथ सपंदन को महसूस करें। एक ठंडक यां गर्मी का एहसास होगा। उस पर ध्यान लगाएं। यही तो ध्यान है। यही तो वर्तमान है।
उपरोक्त में, मैंने मनुष्य की पांचों इंद्रियां आंखे, जीभ, कान, नाक और त्वचा के साथ ध्यान करने की विधि बताई है। जिसका उद्देश्य बस इतना है, वर्तमान में रहना और विचारों के प्रवाह को थामना, कम करना यां रोकना।
यानी होश में आने का प्रयास करना।
इस कोर्स में जब कोई मास्टर बन जाता है, परिपक्कव हो जाता है। उठते, बैठते, सोते हुए वर्तमान में समभाव में जीने लगता है तो एक दिन वो पूर्ण होश में आ जाता है। तो इसी ध्यान में समाधि घटित होती है।
जिस से छठी इंद्री, जिसको थर्ड आई भी कहते हैं, जागृत हो जाती है। यही ध्यान का शिखर होता है।
ध्यान के दौरान मैं विचारों को कैसे रोक सकता हूं?
पहले तो ये बात दिमाग से निकालो की ध्यान से विचार चले जायेंगे। क्योंकि जब विचार ही नही होगा तो ध्यान कैसे करोगे?
आजकल कुछ लोग योग को तोड़ मरोड़कर पेश करते है। कुछ महीने या सालों का कोर्स करके सर्टिफिकेट पा लेते है और दूसरों को सिखाने लगते है। इन्होंने तो योग को योगा भी कहना शुरू कर दिया। मतलब ही बदल दिया। और अब ऐसे ही लोग सिखा रहे है कि विचार को कैसे रोके ताकि ध्यान कर सके?
बड़ी अजीब बात है। पहले तो यह समझो कि ध्यान तो अभी भी लग रहा है। ध्यान अभी चल रहा है। तुम ध्यान से इस उत्तर को समझ रहे हो। यह ध्यान ही तो है। बस तुम्हे अगर कुछ करना है तो उस ध्यान को केंद्रित करना है। उसे केंद्रित करना है। तुम बाहर निकलो तो तुम्हे सूर्य की किरणें मिलेगी। उस किरण में तुम कागज रखो। उस कागज को कुछ नही होगा। लेकिन जब तुम उसकी किरणों को एक जगह कांच से उस कागज पर केंद्रित कर दोगे तो वह कागज जल जाएगा। जल जाएगा वो कागज। फर्क यही है। पहले किरणे केंद्रित नही थी और अब केंद्रित है। केंद्रित होते ही ऊर्जा सक्रिय हो गयी। ऊर्जा के सक्रिय होते ही कागज जल गया। परिणाम घटित हो गया।
ऐसे ही तुम्हारा ध्यान है। यह अभी भी लग रहा है। लगना भी चाहिए। परन्तु अब इसे केंद्रित करना है। केंद्रित कर लोगे तो ऊर्जा सक्रिय हो जाएगी। ऊर्जा सक्रिय से फिर तुम कुछ भी परिणाम घटित कर लोगे। इसलिए ध्यान मत लगाओ। बल्कि ध्यान को केंद्रित करो। क्योंकि ध्यान तो लग ही रहा है।
अब प्रश्न आता है कि विचार को कैसे रोके?
क्यों रोकना है विचार को? क्या दुश्मनी है बेचारे से? उसने क्या बिगाड़ दिया?
विचार तो ध्यान का रूप है। जब तक विचार है तभी तक ध्यान है। यदि विचार ही नही होगा तो ध्यान किस पर केंद्रित करोगे?
अब तुम कहोगे की ईश्वर पर।
ईश्वर की भी तो कल्पना करनी होगी। तभी तो उनका ध्यान होगा। और तुम कहते हो कि विचार को रोकू कैसे?
मत रोको। आने दो। बिना विचार के ध्यान नही होगा। यदि विचार ही नही रहा तो भावना कैसे होगी?
अगर शांति की भावना भी चाहिए तो विचार होना आवश्यक है। बिना विचार के तो शांति भी नही मिलेगी। क्योंकि बिना विचार के कोई भावना नही होती। परन्तु याद रहे। कौरव को पांडवो ने मारा था। लेकिन इसका अर्थ यह नही था कि पांडव अमर हो गए। मरना तो पांडवो को भी पड़ा। अगर बुराई मरी है तो अच्छाई को भी खत्म होना है। नकारत्मकता खत्म हुई है तो सकारत्मकता भी खत्म होगी। निश्चित है। प्रकृति सामंजस्य में रखती है सबको। इसलिए जब तुम नकारात्मक विचार पर सकारात्मक को हावी कर लोगे
ध्यान सबसे सरल है और ध्यान सबसे कठिन भी है। ध्यान शून्य भी है और ध्यान शिखर भी है। ध्यान आदि भी है और ध्यान अंत भी है।
पर ध्यान किया नहीं जाता, ध्यान तो खुद– ब– खुद घटित जाता है। क्योंकि यहां ‘करने’ का प्रयास आ गया, तो वो ध्यान क्या हुआ?
जैसे रास्ते से कोई खूबसूरत कन्या, तेज स्पीड में हमारी आंखों के सामने से निकल जाती है और हम कुछ क्षण, यां सेकंड के चौथे भाग के बराबर ही उन्हें देखते रह जाते हैं। यानी कि 1 सेकंड के चौथे भाग के समय जितना आपने अपनी आखों से देखा और उतने समय केलिए ही आपका ध्यान घटा था। आप यकीन मानिए, इस दरिमयान आपके विचारों की गति इतने ही समय केलिए थम सी गई थी। मानो पॉज मोड में चली गई हो। यही ध्यान है।
किसी से बात करते समय उसकी आंखों में आंखे डालते हुए एक एक शब्द पर पूर्ण फोकस करते हुए बातें करें। आप जितना समय ऐसे बातें करेंगे, उतने समय केलिए ही आपका ध्यान हो जायेगा।
किसी मधुर यां मनपसंद संगीत को पूर्ण एकाग्रता के साथ सुने, एक एक शब्द पर ध्यान देकर और संगीत का आनंद लेकर। यकीन मानिए आप के ब्रेन में विचारों का प्रवाह उतने समय केलिए थम जाएगा और आप वर्तमान का आनंद उठा रहे होगे। यही ध्यान होगा।
आप लेटे हुए हैं यां बैठे हैं। अपने नाक के द्वारा आ और जा रही सांस को महसूस करें। सांस कैसे जा रही है और कैसे आ रही है, उस पर पूर्ण ध्यान दें। जितना समय आप करोगे, उतने समय केलिए आपक ध्यान घट जाएगा।
आप कहीं पार्क यां खुली हवा में टहल रहे हैं। हवा के त्वचा के साथ सपंदन को महसूस करें। एक ठंडक यां गर्मी का एहसास होगा। उस पर ध्यान लगाएं। यही तो ध्यान है। यही तो वर्तमान है।
उपरोक्त में, मैंने मनुष्य की पांचों इंद्रियां आंखे, जीभ, कान, नाक और त्वचा के साथ ध्यान करने की विधि बताई है। जिसका उद्देश्य बस इतना है, वर्तमान में रहना और विचारों के प्रवाह को थामना, कम करना यां रोकना।
यानी होश में आने का प्रयास करना।
इस कोर्स में जब कोई मास्टर बन जाता है, परिपक्कव हो जाता है। उठते, बैठते, सोते हुए वर्तमान में समभाव में जीने लगता है तो एक दिन वो पूर्ण होश में आ जाता है। तो इसी ध्यान में समाधि घटित होती है।
जिस से छठी इंद्री, जिसको थर्ड आई भी कहते हैं, जागृत हो जाती है। यही ध्यान का शिखर होता है।
ध्यान के दौरान मैं विचारों को कैसे रोक सकता हूं?
पहले तो ये बात दिमाग से निकालो की ध्यान से विचार चले जायेंगे। क्योंकि जब विचार ही नही होगा तो ध्यान कैसे करोगे?
आजकल कुछ लोग योग को तोड़ मरोड़कर पेश करते है। कुछ महीने या सालों का कोर्स करके सर्टिफिकेट पा लेते है और दूसरों को सिखाने लगते है। इन्होंने तो योग को योगा भी कहना शुरू कर दिया। मतलब ही बदल दिया। और अब ऐसे ही लोग सिखा रहे है कि विचार को कैसे रोके ताकि ध्यान कर सके?
बड़ी अजीब बात है। पहले तो यह समझो कि ध्यान तो अभी भी लग रहा है। ध्यान अभी चल रहा है। तुम ध्यान से इस उत्तर को समझ रहे हो। यह ध्यान ही तो है। बस तुम्हे अगर कुछ करना है तो उस ध्यान को केंद्रित करना है। उसे केंद्रित करना है। तुम बाहर निकलो तो तुम्हे सूर्य की किरणें मिलेगी। उस किरण में तुम कागज रखो। उस कागज को कुछ नही होगा। लेकिन जब तुम उसकी किरणों को एक जगह कांच से उस कागज पर केंद्रित कर दोगे तो वह कागज जल जाएगा। जल जाएगा वो कागज। फर्क यही है। पहले किरणे केंद्रित नही थी और अब केंद्रित है। केंद्रित होते ही ऊर्जा सक्रिय हो गयी। ऊर्जा के सक्रिय होते ही कागज जल गया। परिणाम घटित हो गया।
ऐसे ही तुम्हारा ध्यान है। यह अभी भी लग रहा है। लगना भी चाहिए। परन्तु अब इसे केंद्रित करना है। केंद्रित कर लोगे तो ऊर्जा सक्रिय हो जाएगी। ऊर्जा सक्रिय से फिर तुम कुछ भी परिणाम घटित कर लोगे। इसलिए ध्यान मत लगाओ। बल्कि ध्यान को केंद्रित करो। क्योंकि ध्यान तो लग ही रहा है।
अब प्रश्न आता है कि विचार को कैसे रोके?
क्यों रोकना है विचार को? क्या दुश्मनी है बेचारे से? उसने क्या बिगाड़ दिया?
विचार तो ध्यान का रूप है। जब तक विचार है तभी तक ध्यान है। यदि विचार ही नही होगा तो ध्यान किस पर केंद्रित करोगे?
अब तुम कहोगे की ईश्वर पर।
ईश्वर की भी तो कल्पना करनी होगी। तभी तो उनका ध्यान होगा। और तुम कहते हो कि विचार को रोकू कैसे?
मत रोको। आने दो। बिना विचार के ध्यान नही होगा। यदि विचार ही नही रहा तो भावना कैसे होगी?
अगर शांति की भावना भी चाहिए तो विचार होना आवश्यक है। बिना विचार के तो शांति भी नही मिलेगी। क्योंकि बिना विचार के कोई भावना नही होती। परन्तु याद रहे। कौरव को पांडवो ने मारा था। लेकिन इसका अर्थ यह नही था कि पांडव अमर हो गए। मरना तो पांडवो को भी पड़ा। अगर बुराई मरी है तो अच्छाई को भी खत्म होना है। नकारत्मकता खत्म हुई है तो सकारत्मकता भी खत्म होगी। निश्चित है। प्रकृति सामंजस्य में रखती है सबको। इसलिए जब तुम नकारात्मक विचार पर सकारात्मक को हावी कर लोगे
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तो ध्यान अब सकारत्मक विचार पर ही रहेगा। नकारात्मक चला जायेगा। जाना पड़ेगा। लेकिन, ये सकारात्मक विचार भी खत्म होगा। यह खुद ही खत्म होगा। तुम इसे रोकना मत। तुम रोकोगे तो गड़बड़ हो जाएगा। क्योंकि जब तक यह खत्म होगा तब तक तुम दृष्टा भाव मे रहोगे। तुम सिर्फ देखते रहोगे। करोगे कुछ नही। सब होगा। खुद ही होगा।
इसलिए विचार रोकना तुम्हारे लिए नही है। तुम्हे सिर्फ एक विचार को चुनकर उस पर केंद्रित होना है। ध्यान को केंद्रित करना है। यदि विचार नही आने दोगे तो ध्यान नही होगा और यह तभी होगा जब तुम ध्यान की अंतिम अवस्था मे आ जाओगे। इसलिए शुरुआत में ध्यान को केंद्रित करो। सकारत्मकता पर केंद्रित करो। बाकी सब खुद ही होगा। तुम्हे कुछ नही करना। बाकी तुम्हारी मर्ज़ी।
ध्यान से बाहर आओ। योगा टीचर से नही बल्कि योगी से ध्यान केंद्रित करना सीखो।
इसलिए विचार रोकना तुम्हारे लिए नही है। तुम्हे सिर्फ एक विचार को चुनकर उस पर केंद्रित होना है। ध्यान को केंद्रित करना है। यदि विचार नही आने दोगे तो ध्यान नही होगा और यह तभी होगा जब तुम ध्यान की अंतिम अवस्था मे आ जाओगे। इसलिए शुरुआत में ध्यान को केंद्रित करो। सकारत्मकता पर केंद्रित करो। बाकी सब खुद ही होगा। तुम्हे कुछ नही करना। बाकी तुम्हारी मर्ज़ी।
ध्यान से बाहर आओ। योगा टीचर से नही बल्कि योगी से ध्यान केंद्रित करना सीखो।
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*सबके साथ आत्मवत् व्यवहार करो*
याद रखो—बदला लेनेकी भावना परायेमें ही होती है; अपनेमें नहीं होती। जब तुम सारे विश्वमें आत्मभावना कर लोगे, तब तुम्हारे अंदर बदला लेनेकी भावना रहेगी ही नहीं। हाँ, जब किसी अंगमें कोई रोग होकर उसमें सड़न पैदा हो जाती है और जब उसके द्वारा सारे शरीरमें जहर फैलनेकी संभावना होती है तब जैसे उसके अंदरका दूषित मवाद निकालकर उसे शुद्ध निरोग और स्वस्थ बनानेके लिये ऑपरेशनकी जरूरत पड़ती है, वैसे ही कभी-कभी तुम्हें भी विश्वकी विशुद्ध हित-कामनासे उसके किसी अंगमें ऑपरेशन करनेकी जरूरत पड़ सकती है। परंतु इस ऑपरेशनमें तुम्हारा वही भाव हो जो अपने अंगको कटानेमें होता है।
याद रखो—बदला लेनेकी भावना परायेमें ही होती है; अपनेमें नहीं होती। जब तुम सारे विश्वमें आत्मभावना कर लोगे, तब तुम्हारे अंदर बदला लेनेकी भावना रहेगी ही नहीं। हाँ, जब किसी अंगमें कोई रोग होकर उसमें सड़न पैदा हो जाती है और जब उसके द्वारा सारे शरीरमें जहर फैलनेकी संभावना होती है तब जैसे उसके अंदरका दूषित मवाद निकालकर उसे शुद्ध निरोग और स्वस्थ बनानेके लिये ऑपरेशनकी जरूरत पड़ती है, वैसे ही कभी-कभी तुम्हें भी विश्वकी विशुद्ध हित-कामनासे उसके किसी अंगमें ऑपरेशन करनेकी जरूरत पड़ सकती है। परंतु इस ऑपरेशनमें तुम्हारा वही भाव हो जो अपने अंगको कटानेमें होता है।
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कहानी का समय
चार साधुओं की कथा
प्रिय बन्धुओं एक बार भगवान शंकर जी के पास से चार साधू गुजर रहे थे वे अपने धुन में मस्त थे जिससे उन्होंने भगवान शंकर जी को प्रणाम नहीं किया। जिससे माता पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया तो उन्होंने ने उन साधुओं को श्राप दे दिया की जाओ कोचवान बन जाओ।
जिससे श्राप के कारण वे चारों हाथी को चलाने वाले कोचवान बन गए। एक दिन चारों हाथी पर बैठ के कहीं जा रहे थे तब माता पार्वती उनके सामने पहुँच कर पूछा अच्छा बताओ जी कोचवान बनकर कैसा लग रहा है ?
तब उन चारों ने कहा बहुत अच्छा लग रहा है। फिर माता पार्वती जी बोलीं पहले तुम साधू थे चारों तरफ तुम्हारी पूजा होती थी, अब हाथी हांक रहे हो और बोलते हो अच्छा लग रहा है। तब उन साधुओं ने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है हमारा तो केवल बाहरी रूप ही बदला है, किसी नाटक में अगर कोई पहले चौकीदार और बाद में राजा बन कर आये तो उससे कोई अंतर तो नहीं पड़ता।
माता को उन पे और गुस्सा आया और श्राप दिया जाओ तुम ऊंट बन जाओ। फिर वे ऊंट बन गए एक दिन वे चारों कहीं जा रहे थे और अपने लम्बी गर्दन से पेड़ की पत्तियां तोड़ के खा रहे थे, तभी वहां माता पार्वती जी पहुंची पर बोलीं अब बताओ ऊंट बन कर कैसा लग रहा है तब वे बोले अब तो और अच्छा लग रहा है न नहाने की फिक्र न धोने की मस्त पत्ते खाते हैं और घूमते हैं।
माता पार्वती जी ने सोचा ये तो हद हो गयी इनका तो कुछ बिगड़ता ही नहीं।
तब वो भगवान शंकर जी के पास पहुंची और बोलीं प्रभु वे साधू किस मिट्टी के बने हैं उनको तो किसी बात की कोई तकलीफ ही नहीं होती,पहले कोचवान बनाया फिर ऊंट फिर भी वे कहते हैं कि वे सुखी हैं।
तब भगवान ने कहा,पार्वती वे साधू आत्मज्ञानी हैं वो खुद को आत्मा मानते हैं उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि वे किस शरीर में है क्योंकि ये शरीर आज है तो कल नहीं लेकिन आत्मा अजर अमर है।इसी प्रकार चाहे तुम बिल्ली बनो,राजा बनो या कंगाल बनो,रोगी बन जाओ या पहलवान इससे किसी का कुछ नहीं बनता बिगड़ता है लेकिन व्यवहार के बदलने से सब कुछ बिगड़ जाता है..!!
चार साधुओं की कथा
प्रिय बन्धुओं एक बार भगवान शंकर जी के पास से चार साधू गुजर रहे थे वे अपने धुन में मस्त थे जिससे उन्होंने भगवान शंकर जी को प्रणाम नहीं किया। जिससे माता पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया तो उन्होंने ने उन साधुओं को श्राप दे दिया की जाओ कोचवान बन जाओ।
जिससे श्राप के कारण वे चारों हाथी को चलाने वाले कोचवान बन गए। एक दिन चारों हाथी पर बैठ के कहीं जा रहे थे तब माता पार्वती उनके सामने पहुँच कर पूछा अच्छा बताओ जी कोचवान बनकर कैसा लग रहा है ?
तब उन चारों ने कहा बहुत अच्छा लग रहा है। फिर माता पार्वती जी बोलीं पहले तुम साधू थे चारों तरफ तुम्हारी पूजा होती थी, अब हाथी हांक रहे हो और बोलते हो अच्छा लग रहा है। तब उन साधुओं ने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है हमारा तो केवल बाहरी रूप ही बदला है, किसी नाटक में अगर कोई पहले चौकीदार और बाद में राजा बन कर आये तो उससे कोई अंतर तो नहीं पड़ता।
माता को उन पे और गुस्सा आया और श्राप दिया जाओ तुम ऊंट बन जाओ। फिर वे ऊंट बन गए एक दिन वे चारों कहीं जा रहे थे और अपने लम्बी गर्दन से पेड़ की पत्तियां तोड़ के खा रहे थे, तभी वहां माता पार्वती जी पहुंची पर बोलीं अब बताओ ऊंट बन कर कैसा लग रहा है तब वे बोले अब तो और अच्छा लग रहा है न नहाने की फिक्र न धोने की मस्त पत्ते खाते हैं और घूमते हैं।
माता पार्वती जी ने सोचा ये तो हद हो गयी इनका तो कुछ बिगड़ता ही नहीं।
तब वो भगवान शंकर जी के पास पहुंची और बोलीं प्रभु वे साधू किस मिट्टी के बने हैं उनको तो किसी बात की कोई तकलीफ ही नहीं होती,पहले कोचवान बनाया फिर ऊंट फिर भी वे कहते हैं कि वे सुखी हैं।
तब भगवान ने कहा,पार्वती वे साधू आत्मज्ञानी हैं वो खुद को आत्मा मानते हैं उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि वे किस शरीर में है क्योंकि ये शरीर आज है तो कल नहीं लेकिन आत्मा अजर अमर है।इसी प्रकार चाहे तुम बिल्ली बनो,राजा बनो या कंगाल बनो,रोगी बन जाओ या पहलवान इससे किसी का कुछ नहीं बनता बिगड़ता है लेकिन व्यवहार के बदलने से सब कुछ बिगड़ जाता है..!!
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जैसे, समुद्रमें तरंगे उठती हैं, बुद्बुद पैदा होते हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर यह सब-का-सब जल ही है | इस जलसे भाप निकलती है | भाप बादल बन जाती है | बादलोंसे फिर वर्षा होती है | कभी ओले बरसते हैं |
वर्षाका जल बह करके सरोवर,नदी-नालेमें चला जाता है | नदी समुद्र में मिल जाती है | इस प्रकार एक ही जल कभी समुद्ररूपसे, कभी भापरूपसे, कभी बादलरूपसे, कभी बूँदरूपसे, कभी ओलारूपसे, कभी नदी रूपसे और कभी आकाशमें परमाणुरूपसे हो जाता है |
समुद्र, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ, नदी आदिमें तो फर्क दीखता है, पर जल-तत्त्वमें कोई फर्क नहीं है | केवल जल-तत्त्वको ही देखें तो उसमें न समुद्र है, न भाप है, न बूँदें हैं, न ओले हैं, न नदी है, न तलाब है | ये सब जलकी अलग-अलग उपाधियाँ हैं |
तत्त्वसे एक जलके सिवाय कुछ भी नहीं है | इसी तरह सोनेके अनेक गहने होते हैं | उनका अलग-अलग उपयोग, माप-तौल, मूल्य, आकार आदि होते हैं |
परन्तु तत्त्वसे देखें तो सब सोना-ही-सोना है | पहले भी सोना था, अन्तमें भी सोना रहेगा और बीचमें अनेक रूपसे दीखनेपर भी सोना ही है |
मिट्टीसे घड़ा, हाँडी, ढक्कन, सकोरा आदि कई चीजें बनती हैं | उन चीजोंका अलग-अलग नाम, रूप, उपयोग आदि होता है |
परन्तु तत्त्वसे देखें तो उनमें एक मिट्टीके सिवाय कुछ भी नहीं है | पहले भी मिट्टी थी, अन्तमें भी मिट्टी रहेगी और बीचमें अनेकरूपसे दीखनेपर भी मिट्टी ही है |
इसी प्रकार पहले भी परमात्मा थे, बादमें भी परमात्मा रहेंगे और बीचमें संसाररूपसे अनेक दीखनेपर भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं--- ‘वासुदेवः सर्वम् |’
वर्षाका जल बह करके सरोवर,नदी-नालेमें चला जाता है | नदी समुद्र में मिल जाती है | इस प्रकार एक ही जल कभी समुद्ररूपसे, कभी भापरूपसे, कभी बादलरूपसे, कभी बूँदरूपसे, कभी ओलारूपसे, कभी नदी रूपसे और कभी आकाशमें परमाणुरूपसे हो जाता है |
समुद्र, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ, नदी आदिमें तो फर्क दीखता है, पर जल-तत्त्वमें कोई फर्क नहीं है | केवल जल-तत्त्वको ही देखें तो उसमें न समुद्र है, न भाप है, न बूँदें हैं, न ओले हैं, न नदी है, न तलाब है | ये सब जलकी अलग-अलग उपाधियाँ हैं |
तत्त्वसे एक जलके सिवाय कुछ भी नहीं है | इसी तरह सोनेके अनेक गहने होते हैं | उनका अलग-अलग उपयोग, माप-तौल, मूल्य, आकार आदि होते हैं |
परन्तु तत्त्वसे देखें तो सब सोना-ही-सोना है | पहले भी सोना था, अन्तमें भी सोना रहेगा और बीचमें अनेक रूपसे दीखनेपर भी सोना ही है |
मिट्टीसे घड़ा, हाँडी, ढक्कन, सकोरा आदि कई चीजें बनती हैं | उन चीजोंका अलग-अलग नाम, रूप, उपयोग आदि होता है |
परन्तु तत्त्वसे देखें तो उनमें एक मिट्टीके सिवाय कुछ भी नहीं है | पहले भी मिट्टी थी, अन्तमें भी मिट्टी रहेगी और बीचमें अनेकरूपसे दीखनेपर भी मिट्टी ही है |
इसी प्रकार पहले भी परमात्मा थे, बादमें भी परमात्मा रहेंगे और बीचमें संसाररूपसे अनेक दीखनेपर भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं--- ‘वासुदेवः सर्वम् |’
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यह संसार दीखता है, इसमें अलग-अलग शरीर हैं | स्थूल, सूक्ष्म और कारण---ये तीन शरीर हैं | कोई स्थिर रहनेवाला {स्थावर} शरीर है, कोई चलने-फिरनेवाला {जंगम} शरीर है |
स्थिर रहनेवालोंमें कोई पीपलका वृक्ष है, कोई नीमका वृक्ष है, कोई आमका वृक्ष है, कोई करीलका वृक्ष है | तरह-तरहके पौधे हैं, घास हैं | चलने-फिरनेवालोंमें कई तरहके पशु-पक्षी, मनुष्य आदि हैं | ये सभी पृथ्वीपर हैं |
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश---ये पञ्चमहाभूत हैं | इनसे आगे समष्टि अहंकार है | फिर महत्तत्व {समष्टि बुद्धि} है | महत्तत्वके बाद फिर मूल प्रकृति है | ये सब मिलकर संसार है |
संसारके आदिमें भी परमात्मा है, अन्तमें भी परमात्मा हैं और बीचमें अनेक रूपसे दीखते हुए भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं |
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः|
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ||
{श्रीमद्भा० ११|१३|२४|}
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ | अतः मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है---यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें |’
स्थिर रहनेवालोंमें कोई पीपलका वृक्ष है, कोई नीमका वृक्ष है, कोई आमका वृक्ष है, कोई करीलका वृक्ष है | तरह-तरहके पौधे हैं, घास हैं | चलने-फिरनेवालोंमें कई तरहके पशु-पक्षी, मनुष्य आदि हैं | ये सभी पृथ्वीपर हैं |
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश---ये पञ्चमहाभूत हैं | इनसे आगे समष्टि अहंकार है | फिर महत्तत्व {समष्टि बुद्धि} है | महत्तत्वके बाद फिर मूल प्रकृति है | ये सब मिलकर संसार है |
संसारके आदिमें भी परमात्मा है, अन्तमें भी परमात्मा हैं और बीचमें अनेक रूपसे दीखते हुए भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं |
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः|
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ||
{श्रीमद्भा० ११|१३|२४|}
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ | अतः मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है---यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें |’
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कहानी का समय
हमारी-तुम्हारी
एक धन सम्पन्न व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था।
पर कालचक्र के प्रभाव से धीरे धीरे वह कंगाल हो गया।
उस की पत्नी ने कहा कि सम्पन्नता के दिनों में तो राजा के यहाँ आपका अच्छा आना जाना था।
क्या विपन्नता में वे हमारी मदद नहीं करेंगे जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा की की थी?
पत्नी के कहने से वह भी सुदामा की तरह राजा के पास गया।
द्वारपाल ने राजा को संदेश दिया कि एक निर्धन व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है और स्वयं को
आपका मित्र बताता है।
राजा भी श्रीकृष्ण की तरह मित्र का नाम सुनते ही दौड़े चले आए और मित्र को इस हाल में
देखकर द्रवित होकर बोले कि मित्र बताओ, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?
मित्र ने सकुचाते हुए अपना हाल कह सुनाया।
चलो, मै तुम्हें अपने रत्नों के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर अपनी जेब में रत्न भर कर ले जाना।
पर तुम्हें केवल 3 घंटे का समय ही मिलेगा।
यदि उससे अधिक समय लोगे तो तुम्हें खाली हाथ बाहर आना पड़ेगा।
ठीक है, चलो।
वह व्यक्ति रत्नों का भंडार और उनसे निकलने वाले प्रकाश की चकाचौंध देखकर हैरान हो गया।
पर समय सीमा को देखते हुए उसने भरपूर रत्न अपनी जेब में भर लिए।
वह बाहर आने लगा तो उसने देखा कि दरवाजे के पास रत्नों से बने छोटे छोटे खिलौने रखे
थे जो बटन दबाने पर तरह तरह के खेल दिखाते थे।
उसने सोचा कि अभी तो समय बाकी है, क्यों न थोड़ी देर इनसे खेल लिया जाए?
पर यह क्या?
वह तो खिलौनों के साथ खेलने में इतना मग्न हो गया कि समय का भान ही नहीं रहा।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर *खाली
हाथ* ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने स्वर्ण के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर सोना अपने थैले में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी सुनहरे प्रकाश से जगमगा रहा था।
उसने शीघ्रता से अपने थैले में सोना भरना प्रारम्भ कर दिया।
तभी उसकी नजर एक घोड़े पर पड़ी जिसे सोने की काठी से सजाया गया था।
अरे! यह तो वही घोड़ा है जिस पर बैठ कर मैं राजा साहब के साथ घूमने जाया करता था।
वह उस घोड़े के निकट गया, उस पर हाथ फिराया और कुछ समय के लिए उस पर सवारी
करने की इच्छा से उस पर बैठ गया।
पर यह क्या?
समय सीमा समाप्त हो गई और वह अभी तक सवारी का आनन्द ही ले रहा था।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह घोर निराश होकर
खाली हाथ ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने रजत के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर चाँदी अपने ढोल में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान अवश्य रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी चाँदी की धवल आभा से शोभायमान था।
उसने अपने ढोल में चाँदी भरनी आरम्भ कर दी।
इस बार उसने तय किया कि वह समय सीमा से पहले कक्ष से बाहर आ जाएगा।
पर समय तो अभी बहुत बाकी था।
दरवाजे के पास चाँदी से बना एक छल्ला टंगा हुआ था।
साथ ही एक नोटिस लिखा हुआ था कि इसे छूने पर उलझने का डर है।
यदि उलझ भी जाओ तो दोनों हाथों से सुलझाने की चेष्टा बिल्कुल न करना।
उसने सोचा कि ऐसी उलझने वाली बात तो कोई दिखाई नहीं देती।
बहुत कीमती होगा तभी बचाव के लिए लिख दिया होगा।
देखते हैं कि क्या माजरा है?
बस! फिर क्या था।
हाथ लगाते ही वह तो ऐसा उलझा कि पहले तो एक हाथ से सुलझाने की कोशिश करता
रहा।
जब सफलता न मिली तो दोनों हाथों से सुलझाने लगा।
पर सुलझा न सका और उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और
वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, *कोई बात नहीं*।
निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
अभी तांबे का खजाना बाकी है।
चलो, मैं तुम्हें अपने तांबे के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर तांबा अपने बोरे में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।
मैं तो जेब में रत्न भरने आया था और बोरे में तांबा भरने की नौबत आ गई।
थोड़े तांबे से तो काम नहीं चलेगा।
उसने कई बोरे तांबे के भर लिए।
भरते भरते उसकी कमर दुखने लगी लेकिन फिर भी वह काम में लगा रहा।
विवश होकर उसने आसपास सहायता के लिए देखा।
एक पलंग बिछा हुआ दिखाई दिया।
उस पर सुस्ताने के लिए थोड़ी देर लेटा तो नींद आ गई और अंत में वहाँ से भी खाली हाथ
बाहर निकाल दिया गया।
क्या इसी प्रकार हम भी अपने जीवन में अपने साथ कुछ नहीं ले जा पाएंगे?
बचपन खिलौनों के साथ खेलने में, जवानी विवाह के आकर्षण में और गृहस्थी की उलझन में
बिता दी।
बुढ़ापे में जब कमर दुखने लगी तो पलंग के सिवा कुछ दिखा नहीं।
समय सीमा समाप्त होने की घंटी बजने वाली है।
इसी लिए संत कहते हैं- सावधान! सावधान!
हमारी-तुम्हारी
एक धन सम्पन्न व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था।
पर कालचक्र के प्रभाव से धीरे धीरे वह कंगाल हो गया।
उस की पत्नी ने कहा कि सम्पन्नता के दिनों में तो राजा के यहाँ आपका अच्छा आना जाना था।
क्या विपन्नता में वे हमारी मदद नहीं करेंगे जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा की की थी?
पत्नी के कहने से वह भी सुदामा की तरह राजा के पास गया।
द्वारपाल ने राजा को संदेश दिया कि एक निर्धन व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है और स्वयं को
आपका मित्र बताता है।
राजा भी श्रीकृष्ण की तरह मित्र का नाम सुनते ही दौड़े चले आए और मित्र को इस हाल में
देखकर द्रवित होकर बोले कि मित्र बताओ, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?
मित्र ने सकुचाते हुए अपना हाल कह सुनाया।
चलो, मै तुम्हें अपने रत्नों के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर अपनी जेब में रत्न भर कर ले जाना।
पर तुम्हें केवल 3 घंटे का समय ही मिलेगा।
यदि उससे अधिक समय लोगे तो तुम्हें खाली हाथ बाहर आना पड़ेगा।
ठीक है, चलो।
वह व्यक्ति रत्नों का भंडार और उनसे निकलने वाले प्रकाश की चकाचौंध देखकर हैरान हो गया।
पर समय सीमा को देखते हुए उसने भरपूर रत्न अपनी जेब में भर लिए।
वह बाहर आने लगा तो उसने देखा कि दरवाजे के पास रत्नों से बने छोटे छोटे खिलौने रखे
थे जो बटन दबाने पर तरह तरह के खेल दिखाते थे।
उसने सोचा कि अभी तो समय बाकी है, क्यों न थोड़ी देर इनसे खेल लिया जाए?
पर यह क्या?
वह तो खिलौनों के साथ खेलने में इतना मग्न हो गया कि समय का भान ही नहीं रहा।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर *खाली
हाथ* ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने स्वर्ण के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर सोना अपने थैले में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी सुनहरे प्रकाश से जगमगा रहा था।
उसने शीघ्रता से अपने थैले में सोना भरना प्रारम्भ कर दिया।
तभी उसकी नजर एक घोड़े पर पड़ी जिसे सोने की काठी से सजाया गया था।
अरे! यह तो वही घोड़ा है जिस पर बैठ कर मैं राजा साहब के साथ घूमने जाया करता था।
वह उस घोड़े के निकट गया, उस पर हाथ फिराया और कुछ समय के लिए उस पर सवारी
करने की इच्छा से उस पर बैठ गया।
पर यह क्या?
समय सीमा समाप्त हो गई और वह अभी तक सवारी का आनन्द ही ले रहा था।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह घोर निराश होकर
खाली हाथ ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने रजत के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर चाँदी अपने ढोल में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान अवश्य रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी चाँदी की धवल आभा से शोभायमान था।
उसने अपने ढोल में चाँदी भरनी आरम्भ कर दी।
इस बार उसने तय किया कि वह समय सीमा से पहले कक्ष से बाहर आ जाएगा।
पर समय तो अभी बहुत बाकी था।
दरवाजे के पास चाँदी से बना एक छल्ला टंगा हुआ था।
साथ ही एक नोटिस लिखा हुआ था कि इसे छूने पर उलझने का डर है।
यदि उलझ भी जाओ तो दोनों हाथों से सुलझाने की चेष्टा बिल्कुल न करना।
उसने सोचा कि ऐसी उलझने वाली बात तो कोई दिखाई नहीं देती।
बहुत कीमती होगा तभी बचाव के लिए लिख दिया होगा।
देखते हैं कि क्या माजरा है?
बस! फिर क्या था।
हाथ लगाते ही वह तो ऐसा उलझा कि पहले तो एक हाथ से सुलझाने की कोशिश करता
रहा।
जब सफलता न मिली तो दोनों हाथों से सुलझाने लगा।
पर सुलझा न सका और उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और
वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, *कोई बात नहीं*।
निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
अभी तांबे का खजाना बाकी है।
चलो, मैं तुम्हें अपने तांबे के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर तांबा अपने बोरे में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।
मैं तो जेब में रत्न भरने आया था और बोरे में तांबा भरने की नौबत आ गई।
थोड़े तांबे से तो काम नहीं चलेगा।
उसने कई बोरे तांबे के भर लिए।
भरते भरते उसकी कमर दुखने लगी लेकिन फिर भी वह काम में लगा रहा।
विवश होकर उसने आसपास सहायता के लिए देखा।
एक पलंग बिछा हुआ दिखाई दिया।
उस पर सुस्ताने के लिए थोड़ी देर लेटा तो नींद आ गई और अंत में वहाँ से भी खाली हाथ
बाहर निकाल दिया गया।
क्या इसी प्रकार हम भी अपने जीवन में अपने साथ कुछ नहीं ले जा पाएंगे?
बचपन खिलौनों के साथ खेलने में, जवानी विवाह के आकर्षण में और गृहस्थी की उलझन में
बिता दी।
बुढ़ापे में जब कमर दुखने लगी तो पलंग के सिवा कुछ दिखा नहीं।
समय सीमा समाप्त होने की घंटी बजने वाली है।
इसी लिए संत कहते हैं- सावधान! सावधान!
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कहानी का समय
*सम्मान की भूख*
कल रविवार का दिन था। घर के बाहर अखबार पढ़ने के बाद राजेश जी बरामदे में बैठे रेडियो पर गानें सुन रहे थे। एकाएक उनके कानों में इकतारे की धुन के साथ साथ लोक संगीत के बोल घुल गये।
आँखे खोलकर उन्होने आवाज की दिशा में देखा। दरवाजे पर खड़ा एक बूढ़ा याचक कुछ गाते हुए इकतारा बजा रहा था।
वह दरवाजे तक गये और उसे वहीं बाहर बने चबूतरे पर बैठने के लिए कहा
"बहुत अच्छा गाते हो आप कहाँ से हो?" उसके बैठते ही उन्होनें सवाल किया।
"बहुत दूर से हैं बाबूजी। हमारे पुरखे अपने जमाने के बहुत बड़े लोक कलाकार थे। बस उनसे ही थोड़ा बहुत सीख लिया।" बूढ़े ने इज्जत मिलते ही अपना परिचय दिया
"तो यहाँ शहर में कैसे..?" राजेश जी ने अगला प्रश्न किया
"अब इस कला की कहाँ कोई कद्र है बाबूजी ? गाँव में पेट भरना मुश्किल हो गया और कोई दूसरा काम हमें आता नही इसलिए यहाँ शहर में इसके सहारे माँगकर गुजारा कर लेते हैं।" बूढ़े ने माथे का पसीना पूछा
"तो सुना दो कुछ..." कहते हुए राजेश जी भी वहीं चबूतरे पर बैठ गये
बूढ़े ने पहले तो हैरानी से देखा फिर आश्वस्त होने पर संगीत शुरू किया। उसे गाते देख उसके आसपास और लोग भी जुड़ने लगे। अपनी आँखें मूंदकर वह लगभग आधे घंटे तक अपने इकतारे के साथ लोक धुनें बिखेरता रहा।
समाप्ति पर आँखे खोली तो आसपास तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। राजेश जी ने जेब से निकालकर उसे सौ का नोट देना चाहा।
बूढ़े ने हाथ जोड़कर मना करते हुए कहा 'बाबूजी, आया तो पैसों की आस में ही था मगर अब पैसे नही लूँगा।'
"अररे मगर...तुम पैसों के लिए ही तो यह बजाते हो"
बूढ़े की आखों में आँसू आ गये। इकतारे को माथे से लगाते हुए वह रूँधे गले से इतना ही कह पाया "ज्यादा नही तो कम..पैसे तो रोज मिल ही जाते हैं मगर आज एक कलाकार को उसका सम्मान मिला है बाबूजी.."
राजेश जी ने नोट उसके कुर्ते की जेब में रखते हुए कहा "रख लो काम आयेगें...और हाँ, अगले रविवार को भी जरूर आना.."
*बूढ़े की आँखे बता रही थी कि सम्मान का ऑक्सीजन मिलते ही उसकी मरती हुई कला उसमें दोबारा जीवित हो रही थी*
*जहाँ विदेशो में हमारी संस्कृति की नकल करते हुए ऐसी किसी कला को दिखाने पर चलते लोग रुककर इनाम स्वरूप धन तथा ताली बजाकर प्रोत्साहन देते है वहीं हम भारतीय अपने मूल संस्कारो में से कलाकार को समय,प्रोत्साहन तथा आदर देने में संकीर्णता अनुभव करने लगे है। ध्यान दीजियेगा सच्चा कलाकार सम्मान का भूखा है धन का नही
*जय श्री राम*
*सम्मान की भूख*
कल रविवार का दिन था। घर के बाहर अखबार पढ़ने के बाद राजेश जी बरामदे में बैठे रेडियो पर गानें सुन रहे थे। एकाएक उनके कानों में इकतारे की धुन के साथ साथ लोक संगीत के बोल घुल गये।
आँखे खोलकर उन्होने आवाज की दिशा में देखा। दरवाजे पर खड़ा एक बूढ़ा याचक कुछ गाते हुए इकतारा बजा रहा था।
वह दरवाजे तक गये और उसे वहीं बाहर बने चबूतरे पर बैठने के लिए कहा
"बहुत अच्छा गाते हो आप कहाँ से हो?" उसके बैठते ही उन्होनें सवाल किया।
"बहुत दूर से हैं बाबूजी। हमारे पुरखे अपने जमाने के बहुत बड़े लोक कलाकार थे। बस उनसे ही थोड़ा बहुत सीख लिया।" बूढ़े ने इज्जत मिलते ही अपना परिचय दिया
"तो यहाँ शहर में कैसे..?" राजेश जी ने अगला प्रश्न किया
"अब इस कला की कहाँ कोई कद्र है बाबूजी ? गाँव में पेट भरना मुश्किल हो गया और कोई दूसरा काम हमें आता नही इसलिए यहाँ शहर में इसके सहारे माँगकर गुजारा कर लेते हैं।" बूढ़े ने माथे का पसीना पूछा
"तो सुना दो कुछ..." कहते हुए राजेश जी भी वहीं चबूतरे पर बैठ गये
बूढ़े ने पहले तो हैरानी से देखा फिर आश्वस्त होने पर संगीत शुरू किया। उसे गाते देख उसके आसपास और लोग भी जुड़ने लगे। अपनी आँखें मूंदकर वह लगभग आधे घंटे तक अपने इकतारे के साथ लोक धुनें बिखेरता रहा।
समाप्ति पर आँखे खोली तो आसपास तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। राजेश जी ने जेब से निकालकर उसे सौ का नोट देना चाहा।
बूढ़े ने हाथ जोड़कर मना करते हुए कहा 'बाबूजी, आया तो पैसों की आस में ही था मगर अब पैसे नही लूँगा।'
"अररे मगर...तुम पैसों के लिए ही तो यह बजाते हो"
बूढ़े की आखों में आँसू आ गये। इकतारे को माथे से लगाते हुए वह रूँधे गले से इतना ही कह पाया "ज्यादा नही तो कम..पैसे तो रोज मिल ही जाते हैं मगर आज एक कलाकार को उसका सम्मान मिला है बाबूजी.."
राजेश जी ने नोट उसके कुर्ते की जेब में रखते हुए कहा "रख लो काम आयेगें...और हाँ, अगले रविवार को भी जरूर आना.."
*बूढ़े की आँखे बता रही थी कि सम्मान का ऑक्सीजन मिलते ही उसकी मरती हुई कला उसमें दोबारा जीवित हो रही थी*
*जहाँ विदेशो में हमारी संस्कृति की नकल करते हुए ऐसी किसी कला को दिखाने पर चलते लोग रुककर इनाम स्वरूप धन तथा ताली बजाकर प्रोत्साहन देते है वहीं हम भारतीय अपने मूल संस्कारो में से कलाकार को समय,प्रोत्साहन तथा आदर देने में संकीर्णता अनुभव करने लगे है। ध्यान दीजियेगा सच्चा कलाकार सम्मान का भूखा है धन का नही
*जय श्री राम*
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