✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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"सुखस्य दुःखस्य न कोSपिदाता,
परोददातीति कुबुद्धिरेषा।
अहं करोमीति वृथाSभिमानः,
स्वकर्मसूत्र ग्रथितो हि लोक:।।"
हमारे सुख-दुख दूसरों के दिये हुए हैं, ये समझना गलत है, ये भी समझना गलत है कि हम ही सब कार्य करते हैं । सत्यता ये है कि सभी लोग सुख या दुःख के रूप में अपने ही किये हुए अच्छे या बुरे कर्मों के फल भुगतते हैं, मनुष्य को उसका कर्म ही सुख या दुःख देता है---
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।
इस सृष्टि का आधार ही कर्म है, इसी कारण ज्ञानी महात्मा किसी को भी दोषी नहीं मानते हैं, जब राम वनवास के लिए वन आये हैं, तो निषाद राज के मन में इसी प्रकार का संशय मौजूद है कि राम के वनवास का मूल कारण कैकेयी है, वह सोचते हैं कि ‘कैकयराज की लड़की नीच बुद्धि कैकेयी ने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनंदन श्री रामजी और जानकी जी को सुख के समय दुःख दिया –
"कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥"
श्री राम-सीता को जमीन पर सोते हुए देखकर निषाद को बड़ा दुःख हुआ, वे सोचने लगे कि कैकेयी ‘सूर्यकुल रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी हो गई,उस कुबुद्धि ने सम्पूर्ण विश्व को दुःखी कर दिया-
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी।
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ बिषादु निषादहि भारी।
राम सीय महि सयन निहारी॥’
सच में महान सुख का अवसर था, जब राम को राज दिया जाना था, इस महान सुख के अवसर पर मंथरा की बात पर कैकेई ने अपनी मंद मती के कारण सीताराम को दुख दे दिया।
मनुष्य अक्सर दुख के अवसर पर अपना आपा खो बैठता है और यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि यह जो दुख है उसका कारण कौन है, वह अपने आप को सर्वथा इस दुःख के मूल से अलग करके किसी दूसरे पर इसे थोपना चाहता है ताकि वह अपने आप को यह समझा सके कि अगर यह ना होता, अगर वह ना होता तो यह विपत्ति नहीं आती।
हमें दूसरे पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए,इससे अपना दुख कम नहीं होता, बल्कि दूसरे के प्रति मन में वैर, घृणा इत्यादि भाव पैदा हो जाते हैं। इसी भाव को बताते हुए तब लक्ष्मण जी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस से सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले ‘हे भाई! कोई किसी को सुख-दुःख का देने वाला नहीं है। सब अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं----
बोले लखन मधुर मृदु बानी।
ग्यान बिराग भगति रस सानी॥
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥’
सुख दुःख का कारण जो अपने अन्दर ही खोजे वह सन्त है ज्ञानी पुरुष सुख दुःख का कारण बाहर नहीं खोजते हैं। मनुष्य के सुख दुःख का नाता बाहर जगत् में कोई नहीं है, यह कल्पना ही भ्रामक है कि मुझे कोई सुख दुःख दे रहा है, ऐसी कल्पना तो अन्यों के प्रति वैर भाव जगाती है।
वस्तुतः सुख या दुःख कोई दे नहीं सकता,यह मन की कल्पना मात्र है, सुख दुःख तो कर्म का ही फल है,सदा सर्वदा मन को समझाओ कि उसे जो सुख दुःखानुभव हो रहा है ,वह उसी के कर्मो का फल है, रामचन्द्र जी स्वेच्छा से ही वनवासी बने हैं सीताराम के चरणारविंद का नित्य स्मरण ही परमार्थ है----
"सखा परम परमारथु एहू।
मन क्रम वचन राम पद नेहू।।"
राम तो परमानन्द स्वरुप हैं,जो उनका स्मरण करते हैं , उन्हें दुःख नहीं होता,सुख ही होता है,सो रामको दुःख होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है, राम को कर्म का बंधन तो है नहीं, वे कर्म से परे हैं,वे अपनी इच्छा से ही प्रकट होते हैं जीव को अपने कर्म के कारण जन्म लेना पड़ता है,ईश्वर स्वेच्छा से प्रकट होते हैं, फिर भी परमात्मा लीला करने के लिए प्रकट हुए हैं , सो कर्म की मर्यादा मे रहकर जगत् के सामने एक आदर्श रखते हैं कि स्वयं परमात्मा होते हुए भी कर्म के बंधन में हैं। वे स्वेच्छा से ही अवतरित हुए हैं, जीव अपने कर्म से जन्म लेता है, सुख दुःख के हेतु कोई मनुष्य ,देवता अथवा ग्रह आदि नही हैं, केवल मन ही कारण है,वही संसार चक्र की धुरी है, उसी के आधार पर अच्छी बुरी सृष्टि होती है आत्मा तो असंग है , उसका कोई स्पर्श नहीं कर सकता --
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और सुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिर बुद्धि कहा जाता है।
मन सचेष्ट होता है - उसे अपना स्वरुप मान लेने पर आत्मा बद्ध सा हो जाता है, सब कर्म- धर्म , यम- नियम , अध्ययन- दान मनोनिग्रह के लिए हैं, इसके शान्त हो जाने पर शान्ति है जिसका मन शान्त नहीं,उसकी क्रिया का कोई उपयोग नहीं , जिसका मन शान्त है उस पर क्रिया का कोई प्रभाव नहीं, सब इन्द्रियाँ मन के वश में हैं, मन को जीत लिया तो सबको
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जीत लिया,उसको न जीतकर जगत के शत्रुओं को जीतना मूर्खता है, शत्रुओं का स्रष्टा मन है,मन ने ही शरीर को अपना माना,शरीर के रुप में मन ही है, वही भटक रहा है - भौतिक पदार्थ भौतिक शरीर को ही दुःख पहुँचा सकते हैं - पहुँचाये , अपने ही दाँत से जीभ कट जाय तो क्रोध किस पर करें, हमारे सामने सुख और दुःख दोनों आते हैं, सुख-दुःख देनेवाला दूसरा कोई नहीं है, प्रत्युत सब अपने किये हुए कर्मोंके फलको भोगते हैं, पतञ्जलि योगदर्शन में लिखा है‒
‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः’
अर्थात्‌ पहले किये हुए कर्मोंके फलसे जन्म, आयु और भोग होता है, भोग नाम किसका है ?
‘अनुकूलवेदनीयं सुखम्’,
‘प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम्’ और
‘सुखदुःख अन्यतरः साक्षात्कारो भोगः’
अर्थात् सुखदायी और दुःखदायी परिस्थिति सामने आ जाय और उस परिस्थिति.का अनुभव हो जाय, उसमें अनुकूल-प्रतिकूल.की मान्यता हो जाय, इसका नाम ‘भोग’ है।
यदि देवता ही दुःख देते हो दे लें, वे केवल अपने विकार को ही प्रभावित कर सकते है, आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं, फिर कौन किसको कैसे दुःख दे,
सम्पूर्ण आत्मा ही है।
"दुःखानि दुःखापगमाय भोगान् ,
सुखाय जानाति विमूढ़चेताः।
तान्येव दुःखानि पुनः सुखानि
जानाति विद्वानविमूढ़चेताः।।"
यद्यपि समस्त भोग दुःखरुप हैं, तथापि मूढ़चित्त मानव उन्हें दुःख दूर करने वाला तथा सुख की प्राप्ति करने वाला समझता है , किन्तु जो विद्वान हैं,जिनका चित्त मोह से आच्छन्न नही हुआ है , वे उन भोगजनित सुखो को भी दुःख ही मानते हैं, दुःख मनुष्य के लिए अभिशाप होकर त्याज्य नहीं , अपितु वरदान स्वरुप होकर ग्राह्य है। जब मनुष्य पर कष्ट पड़ता है तो उसका अहंकर गलकर नष्ट हो जाता है और विनम्रता जाग्रत होती है। उसकी अहं भावना समाप्त हो जाती है और उसकी शुद्ध आत्मा परमात्मा की ओर उन्मुख हो जाती है, फिर उसका मन भौतिक आर्कषणों से विमुख होकर परमात्मा की शरण में जाता है, उसके हृदय में ज्ञानोदय होता है और वह अमर हो जाता है।
अतः दुःख भगवान का अमृत है,जिसको पीकर मानव आत्मा अजर अमर हो जाती है ।
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*कब मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी?*
देवशयनी एकादशी हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस बार यह तिथि 06 जुलाई 2025 को पड़ रही है। तिथि की शुरुआत 05 जुलाई की शाम 06:58 बजे से होगी और समाप्ति 06 जुलाई की रात 09:14 बजे होगी। व्रत हमेशा उदया तिथि में रखा जाता है,*इसलिए देवशयनी एकादशी का व्रत 06 जुलाई को रखा जाएगा।*
*देवशयनी एकादशी का पूजन मुहूर्त*
ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04:08 से 04:49 तक
अभिजित मुहूर्त – दोपहर 11:58 से 12:54 तक
विजय मुहूर्त – दोपहर 02:45 से 03:40 तक
गोधूलि मुहूर्त – शाम 07:21 से 07:42 तक
अमृत काल – दोपहर 12:51 से 02:38 तक
त्रिपुष्कर योग – रात 09:14 से 10:42 तक
रवि योग – सुबह 05:56 से रात 10:42 तक
*देवशयनी एकादशी व्रत का पारण*
देवशयनी एकादशी व्रत का पारण 07 जुलाई 2025 को किया जाएगा। पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 05:29 से लेकर 08:16 बजे तक रहेगा। इस दिन द्वादशी तिथि रात 11:10 बजे समाप्त होगी, इसलिए व्रत का पारण सुबह करना ही शुभ माना गया है
*देवशयनी एकादशी का महत्व*
इस एकादशी को पद्मा, हरिशयनी या आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक माह की शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) को जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है। इस दौरान साधना, व्रत और भक्ति के कार्य अधिक फलदायी माने जाते हैं, जबकि विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन व्रत रखने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। साथ ही, व्यक्ति को पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दिन जगन्नाथ रथयात्रा के तुरंत बाद आता है, इसलिए इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।
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भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ा तो उनका अंतिम संस्कार किया गया, उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था, उनका हृदय आज तक सुरक्षित है जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है, ये बात बहुत कम लोगो को पता है

महाप्रभु का महा रहस्य

सोने की झाड़ू से होती है सफाई......

महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है.... पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है... मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया

हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है, उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है...उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता...

मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है...ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता...इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है...

ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है, कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है...

मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ???

कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथ में लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था...आंखों में पट्टी थी...हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए...

आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है...

भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी

आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता।

झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशा में लहराता है

दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।

भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा

इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दिखता है।

भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है।

भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।

🚩 जय श्री जगन्नाथ 🚩
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नाम महिमा

श्रीभगवान् के नाम की महिमा अनन्त है और वह बड़ी ही रहस्यमयी है। नाम की महिमा वही पुरुष जान सकता है, जिसका मन निरन्तर श्रीभगवान्नाम में संलग्न रहता है, नाम की प्रिय और मधुर स्मृति से जिसके हर क्षण में रोमाञ्च और अश्रुपात होते हैं, जो जल के वियोग में मछली की व्याकुलता के समान क्षणभर के नाम-वियोग से विकल हो उठता है, जो महापुरुष निमेषमात्र के लिए भी भगवान् के नाम को नहीं छोड़ सकता और जो निष्काम-भाव से निरन्तर प्रेमपूर्वक जप करते करते उसमें तल्लीन हो चुका है; ऐसा ही महात्मा पुरुष इस विषय के पूर्णतया वर्णन करने का अधिकारी है।

शेष, महेश, गणेश की बात ही क्या, स्वयं भगवान् भी अपने नाम की महिमा नहीं गा सकते। गोस्वामीजी कहते हैं कि-

"राम न सकहिं नाम गुन गाई।"

भवन्नाम बड़ा ही सुगम साधन है, इसके सभी अधिकारी हैं, सभी इसको समझ सकते हैं, यह सबको सुलभ है, मूर्ख से मूर्ख मनुष्य भी नाम का जप-कीर्तन कर सकते हैं। इसमें न कोई खर्च है, न परिश्रम है। किसी प्रकार की बाधा भी नहीं है। इतनी सुगमता होने के साथ ही सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें कोई शर्त भी नहीं है।

कलियुग में नाम की महिमा सर्वोपरि है। कलियुग में केवल भगवन्नाम ही कल्याण करने वाला है। इसको छोड़कर अन्य कोई उपाय नहीं है।

"कलयुग केवल नाम अधारा।"
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अन्त:करण की शुद्धि अशुद्धि

यह जो शरीर बदल रहा है, संसार बदल रहा है, हमारे से नित्य निरंतर बदल रहा है । इसका अंतःकरण की शुद्धि के साथ संबंध नहीं है । हम इसे जानना चाहते हैं तो इतनी शुद्धि तो चाहिए ही ? ये बातें समझने के लिए कि (मैं शरीर नहीं हूं, शरीर मेरा नहीं है) अन्त:करण की शुद्धि से होता है, यह नहीं है । यह तो विवेक है, विचार है, समझना चाहता है - वह समझ लेता है । यह बात ऐसी मार्मिक है । यह बात होती है कि अंतःकरण शुद्ध होने से यह बात होती है । यह बात प्रसिद्ध बहुत है, परंतु कृपा करके आप ध्यान दें । करण शुद्ध होने से क्रिया शुद्ध होती है । स्वयं शुद्ध होता है, यह बात नहीं है । क्रिया से अतीत वस्तु के लिए करण की आवश्यकता नहीं होती । आप इस बात को समझें । तो बहुत कृपा मानूंगा मैं । कारक छः हैं । कर्ता, कर्म, करण, अधिकरण, अपादान और संप्रदान । यह कारक हैं । आप ध्यान देना । समझ में नहीं आए तो पूछें । कारक होते हैं यह क्रिया में हेतु होते हैं, तत्त्व में नहीं । कारक होते हैं क्रिया जनक । क्रिया को पैदा करने वाले कारक होते हैं । कारकों में एक करण है । जैसे राम जी ने बाली को मारा । तो मारने की क्रिया बाण से सिद्ध हुई । राम जी कर्ता है । मारने की क्रिया हुई । तो तत्व क्रिया से ऊपर है । जो संसार जा रहा है, दूर हो रहा है । इस बात को कुत्ता, सूअर, गाय, भैंस भी समझते हैं । गाय से बछड़ा दूर कर दे, तो समझ जाती है । तो क्या पशु का अन्त:करण शुद्ध है । इसमें शुद्धि, अशुद्धि क्या है ? यह तो ख्याल है । पर आपकी जिज्ञासा की कमी है । अंत:करण की शुद्धि कारण नहीं है । मैं भी ऐसे ही मानता था, पर विचार करने से मालूम हुआ अंत:करण शुद्ध हो अथवा अशुद्ध हो, उसका इतना फर्क नहीं पड़ता । जिज्ञासा चाहिए ।

मैं कैसा था, अब कैसा हो गया ? इसमें अंत:करण की शुद्धि की क्या आवश्यकता है ? यह क्रिया थोड़ी है । यह तो विवेक है । कोई पक्षपात नहीं । जितने भी कारक होते हैं, क्रिया सिद्धि में सहायक होते हैं । इसमें शंका हो तो बोलो ? वहम मिट जाए कि अंत:करण शुद्ध होने से ही तत्वज्ञान होगा । आज यह वहम मिटा लो । आज निश्चित कर लो - तत्त्व प्राप्ति में अन्त:करण का शुद्ध होना कारण नहीं है । व्रत करो, तीर्थ करो, अच्छा आचरण करो, उपवास करो । यह बात ठीक है । पर संयोग - वियोग में क्या फर्क पड़ा ? संसार जा रहा है, ये यह बात अंत:करण शुद्ध होगा, तब समझ में आएगा - यह बात नहीं है । इस वास्ते वहम मत करो कि अंतःकरण शुद्ध होगा तब यह समझ में आएगा कि संसार शरीर बदल रहा है । ये किसकी समझ में नहीं आएगा बताओ ? सबके समझ में आएगा । आड़ मत लगाओ, कृपानाथ । जितनी कल्याण की जिज्ञासा होगी, वह बात पकड़ लेगा । जो कल्याण चाहता है वह पकड़ लेगा । तो नित्य निरंतर संसार का, शरीर का वियोग हो रहा है कि शरीर बदल रहा है । पर मैं नहीं बदला । शरीर के बदलाव का अनुभव सबको है । पर अपने अभाव का किसी को अनुभव हुआ है, बताओ ? इसमें क्या समझ में नहीं आया बताओ ?
शरीर बदलता है, संसार बदलता है । शरीर को जानने वाला बदलता नहीं है । आपको कल्याण करना है तो इसको काम में लगाओगे, नहीं तो सुन लिया बस । जितना अंतःकरण शुद्ध चाहिए, उतना अंत:करण शुद्ध है । नहीं तो सत्संग में आते ही नहीं लोग । आप आए हो तो अंत:करण शुद्ध है । तो समझ लो - बात । यह शरीर, संसार बदलता है और खुद रहता है । वियोग हो रहा है तो अच्छा बर्ताव करो । शरीर के साथ भी अच्छा बर्ताव करो । तंग करोगे तो बीमार हो जाएगा । तो इसकी सेवा करो । इससे काम लेना है, तो खुराक दे दो । शरीर तो साथ रह सकता नहीं, कुटुम्ब साथ रह सकता नहीं । तो पहले प्रबंध करो । आगे दु:ख न आवे इसका विचार करो । मर जाएंगे तो क्या दशा होगी ? हताश मत हो । हमारा अंत:करण शुद्ध नहीं है, ऐसा मत मानो । जितना अंत:करण शुद्ध चाहिए, उतना अंत:करण शुद्ध है ।
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कहानी का समय

*"एक लोटा पानी"*

(१)
चैत का महीना था। ग्वालियर राज्य का मशहूर डाकू परसराम अपने अरबी घोड़े पर चढ़ा हुआ, जिला दमोह के देहात में होकर कहीं जा रहा था। लकालक दोपहरी थी। प्यासके कारण परसराम का गला सूख रहा था। कोई तालाब,नदी या गाँव दिखायी न देता था। चलते-चलते एक चबूतरा मिला, जिसपर एक शिवलिंग रखा था।

छोटे और कच्चे चबूतरेपर बरसात के पानी ने छोटे-छोटे गड्ढे कर दिये थे। इसलिये महादेवजी की मूर्ति कुछ तिरछी-सी हो रही थी। यह देख परसराम घोड़े से उतरा और उसे एक पेड़ से बाँधकर अपनी तलवारसे महादेवजी की पिण्डी को ठीक बिठलाने लगा। परसराम बोला—‘महादेव गुरुजी हैं। परशुरामके गुरु थे, इसलिये मेरे भी गुरु हैं। वे भी ब्राह्मण थे, मैं भी ब्राह्मण हूँ। उन्होंने अमीरों का नाश किया था और गरीबों का पालन किया था, वही मैं भी कर रहा हूँ। मूर्ख लोग मुझे डाकू कहते हैं। धनवान् से जबरन् धन लेकर दीनों का पालन करना क्या डाकूपन है? है तो बना रहे।

ग्वालियर राज्य ने मेरे लिये पाँच हजार का इनामी वारंट जारी किया है और भारत-सरकार ने पचीस हजार का। मेरी गिरफ्तारी के लिये तीस हजार का इनाम छप चुका है। वे लोग अमीरों के पालक और गरीबों के घालक हैं। इसलिये मुझे डाकू कहते हैं। डाकू वे हैं या मैं? इसका निर्णय कौन करेगा? खैर कोई परवाह नहीं। जबतक शंकर गुरु का पंजा मेरी पीठ पर है तब तक कोई परसराम को गिरफ्तार नहीं कर सकता। लेकिन क्या मैं आज प्यास के मारे इस जंगल में मर जाऊँगा?

मेरे पंद्रह साथी—जो सब पढ़े-लिखे और बहादुर हैं—अपने-अपने अरबी घोड़ोंपर चढ़े मुझे खोज रहे होंगे। जब वे मुझे इस जंगलमें मरा हुआ पायेंगे, तब वे नेत्रहीन होकर बड़े दु:खी होंगे। बाबा! गुरुदेव! क्या एक लोटा पानी के बिना आप मेरी जान ले लेंगे?’
तब ही एक बुढ़िया वहाँ आयी। उसके हाथ में एक लोटा जल था और लोटेके ऊपर एक कटोरी थी, जिसमें मिठाई रखी थी।

परसराम—बूढ़ी माई! तुम कहाँ रहती हो?
बुढ़िया—थोड़ी दूरपर सेखूपुर गाँव है। बागों में बसा है, इसलिये दिखायी नहीं देता। वहीं मेरा घर है। जातिकी अहीर हूँ बेटा!
परसराम—यहाँ क्यों आयी हो?
चबूतरे ऊपर पानी और मिठाई रखकर बुढ़िया बैठ गयी और रोने लगी। परसराम ने जब बहुत समझाया तब वह कहने लगी—‘बेटा! मौत के दिन पूरे करती हूँ। घरमें एक लड़का था और बहू थी। मेरा बेटा बिहारी तुम्हारी ही उमर का था।

उसीने यह चबूतरा बनाया था और कहीं से लाकर उसीने महादेव यहाँ रखे थे। रोजाना पूजा करता था। परसाल इस गाँवमें कलमुही ताऊन (प्लेग) आयी। बेटा और बहू दोनों एक दस सालकी कन्या छोड़कर उड़ गये। रोनेके लिये मैं रह गयी। जबसे बेटा मरा, तबसे मैं रोज एक लोटा पानी चढ़ा जाती हूँ और रो जाती हूँ। इस साल वैशाख में नातिन चम्पा का विवाह है। घरमें कुछ नहीं है। न जानें, कैसे महादेव बाबा चम्पा का विवाह करेंगे।’

परसराम—महादेव बाबा चम्पा का विवाह खूब करेंगे। तुम यह पानी मुझे पिला दो, बड़ी प्यास लगी है।
बुढ़िया—पी लो बेटा, पी लो। मिठाई भी खा लो। यह पानी जो तुम पी लोगे तो मैं समझूँगी कि महादेवजी पर चढ़ गया। आत्मा सो परमात्मा। मैं फिर चढ़ा जाऊँगी। पी लो बेटा, पी लो, पहले यह मिठाई खा लो।

इतना कहकर बुढ़ियाने पानी का लोटा और मिठाई की कटोरी परसरामके सामने रख दिये। मिठाई खाकर और शीतल स्वच्छ जल पीकर परसराम बोले—‘चम्पाका विवाह कब होगा माई!’
बुढ़िया—वैशाख के उँजेरे पाख की पंचमी को टीका है। केसरीपुरसे बारात आयेगी।
परसराम—विवाहके लिये तुम चिन्ता कुछ मत करना। तुम्हारी चम्पा का विवाह महादेव ही करेंगे।
बुढ़िया—तुम कौन हो बेटा? तुम्हारी हजारी उमर हो। गाँवतक चलो तो तुमको कुछ खिलाऊँ। भूखे मालूम होते हो।

परसराम—भूखा तो हूँ, पर गाँव मैं नहीं जा सकता। मेरा नाम परसराम है और लोग मुझे डाकू कहते हैं। आगरे के कप्तान यंग साहब, जिन्होंने सुल्ताना डाकूको गिरफ्तार किया था, तीस सिपाहियोंके साथ मेरे पीछे लगे हुए हैं। मेरे साथी छूट गये हैं, इसलिये मैं गाँवमें नहीं जा सकता। जिस दिन चम्पा का विवाह होगा, उस दिन तुम्हारे गाँवमें पाँच मिनटके लिये आऊँगा।
बुढ़िया—तुम डाकू तो मालूम नहीं पड़ते—देवता मालूम पड़ते हो।

घोड़ेपर सवार होकर परसरामने कहा—‘अब ऐसा ही उलटा जमाना आया है माई! उदार और बहादुरको डाकू कहा जाता है और महलों में बैठकर दिनदहाड़े गरीबों को लूटनेवालोंको रईस कहा जाता है। धर्मात्मा भीख माँगते हैं, पापी लोग हुकूमत करते हैं। पतिव्रताएँ उघारी फिरती हैं, छिनालों के पास रेशमी साड़ियाँ हैं। कलियुग है न! मैं जाता हूँ। मेरा नाम याद रखना पंचमी को आऊँगा।’
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परसराम चले गये। बुढ़िया ने भी घर की राह ली। महादेवजी पर जल चढ़ाकर उसने चम्पासे परसरामके मिलनेकी सारी कहानी बयान कर दी; गाँवका मुखिया भी वहीं खड़ा था। उसने भी सारा हाल सुना। मुखियाने सोचा—मेरा भाग जग गया, इनाम का बड़ा हिस्सा मैं पाऊँगा। थानेमें जाकर रिपोर्ट लिखायी कि ‘वैशाख शुक्लपक्ष की पंचमीके दिन परसराम सेखूपुरमें चम्पा के विवाह में शामिल होने आयेगा। पुलिस के द्वारा यह समाचार यंग साहबको मालूम करा देना चाहिये। अगर उस रोज डाकू परसराम गिरफ्तार न हुआ तो फिर कभी न हो सकेगा।’

*(२)*
चौथके दिन, बिहारी अहीरके दरवाजेपर पाँच गाड़ियाँ आकर खड़ी हुईं। एकमें आटा भरा था। एकमें घी, शक्कर और तरकारियाँ भरी थीं। एक गाड़ीमें कपड़े-ही-कपड़े थे, तरह-तरहके नये थानोंसे वह गाड़ी भरी थी। चौथी गाड़ीमें नये-नये बर्तन भरे थे और पाँचवीं गाड़ी तरह-तरह की पक्की मिठाइयोंसे भरी थी। गाड़ीवानों ने सब सामान बिहारी अहीर के घर में भर दिया। लोगों ने जब यह पूछा कि ‘यह सामान किसने भेजा?’ तब गाड़ीवानों ने कहा कि ‘हम लोग भेजनेवाले का नाम-धाम कुछ नहीं जानते। हम लोग दमोह के रहनेवाले हैं।

किरायेपर गाड़ी चलाया करते हैं। हमलोगों को किराया अदा कर दिया गया। हमलोगों को केवल यही हुक्म है कि यह सामान सेखूपुर के बिहारी अहीर के घरमें जबरन् भर आवें। बस, और ज्यादा तीन-पाँच हमलोग कुछ नहीं जानते।’ इस विचित्र घटना पर गाँवभर आश्चर्य कर रहा था। केवल मुखिया को और बुढ़िया को मालूम था कि यह सब काम परसरामका है। मुखियाने थानेमें इस घटनाकी रिपोर्ट लिखायी और यह भी लिखाया कि ‘कल पंचमी के दिन सुबहको जब चम्पाके फेरे पड़ेंगे, उस समय कन्यादान देने खुद परसरामके आने की उम्मीद है; क्योंकि वह अभी तक खुद नहीं आया है।

पाँच मिनटके लिये गाँवमें आने का उसने वचन दिया है। चाहे धरती इधर-की-उधर हो जाय, पर परसराम का वचन खाली नहीं जा सकता। चौथ की रात में ही मिस्टर यंग साहब अपने तीस मरकट सिपाहियों के साथ सेखूपुरमें आ धमके। उन सबों ने घोड़ोंके सौदागरों का भेष बनाया था। मुखिया के दरवाजेपर वे लोग ठहर गये। गाँववालों ने जाना कि घोड़े के सौदागर लोग मेले को जा रहे हैं। मुखिया और चौकीदारके सिवा असली भेद कोई नहीं जानता था।

. *(३)*

पंचमी का सबेरा हुआ। परसराम ने ज्यों ही घोड़े पर चढ़ना चाहा, त्यों ही छींक हुई। एक साथीका नाम था रहीम। बी० ए० पास था। पेशावर का रहनेवाला था। घोड़े की सवारी में और निशाना लगाने में एक ही था। रहीम ने परसराम को रोकते हुए कहा—‘कहाँ जा रहे हैं आप?’
परसराम—सेखूपुर, चम्पा का कन्यादान देने। तुमको तो सब हाल मालूम करा दिया था। रोको मत। रुक नहीं सकता।
रहीम—छींक हुई!
परसराम—मुसलमान होकर भी छींकको मानते हो!
रहीम—बात यह है कि यंग साहब अपने तीस सिपाहियों के साथ इधर ही गये हैं। उन लोगोंने सौदागरों का स्वाँग बनाया है। मगर मेरी नजर को धोखा नहीं दे सकते।

परसराम—घूमने दो। क्या करेगा यंग साहब?
रहीम—मालूम होता है कि मूर्ख बुढ़ियाने आपके मिलने का हाल अपने गाँव में बयान कर दिया है। पुलिसको आपके जानेका हाल मालूम हो गया है, तभी यंग साहब ने मौका देखकर चढ़ाई की है।
परसराम—सम्भव है, तुम्हारा अनुमान सही हो। लेकिन इसी डरसे मैं अपने वचनको तोड़ नहीं सकता। एक लोटा पानी से उऋण होना है।

रहीम—अच्छा, तो मैं भी साथ चलता हूँ। जो वक्तपर साथ दे, वही साथी है।
परसराम—तुम्हारी क्या जरूरत है? तुम यहीं रहो।
रहीम—मैं आपको अकेला नहीं जाने दूँगा। नमकहरामी नहीं करूँगा। आपकी जान जायगी तो पहली मेरी जान जायगी।
दोनों घोड़ेपर सवार होकर सेखूपुरकी ओर चल दिये। वे उस समय बिहारीके दरवाजे पर पहुँचे, जब चम्पा के फेरे पड़ गये थे और कन्यादानका समय आ गया था।
अपने घोड़ेकी बागडोर रहीम को पकड़ाकर परसराम उतर पड़े और घरमें घुस गये। पाँच मुहरोंसे परसराम ने चम्पा का कन्यादान सबसे पहले दिया और वे बाहर जाने लगे।

गाँववालों ने जान लिया कि इस व्यक्तिने ही पाँच गाड़ियाँ सामान भेजा था। श्रद्धाके मारे उन लोगोंने परसरामको घेर लिया। मारे खुशीके बुढ़िया की बोलती बंद थी। एक आदमी बोला—‘वाह मालिक! बिना जलपान किये कहाँ जाते हो!’ दूसरा आदमी लोटा लिये चरण धोनेका उपाय करने लगा। तीसरा आदमी परसराम को बैठनेके लिये अपना साफा धरती पर बिछाने लगा। चौथा आदमी दौड़ा तो एक दोने में मिठाइयाँ भर लाया।

परसरामने कहा—‘कैसे पागल हो तुमलोग! जिस कन्या का कन्यादान दिया, उसीका भोजन कैसे करूँगा?’—इतना कहकर वे घर से बाहर आ गये। घोड़ेपर चढ़ते-चढ़ते परसरामने देखा कि यंग साहब ने सदल-बल उनको घेर लिया है। परसरामने उनको ललकारकर कहा—‘गाँवके बाहर आकर मरदूमी दिखलाओ।’ इसके बाद रहीम के साथ परसरामने घोड़ोंको एड़ लगायी और गाँवसे बाहर हो गये। साहबने पीछा किया। सब लोग घोड़ोंपर सवार थे। तड़ातड़ गोलियाँ छूटने लगीं। वे दोनों भी फायर करते जाते थे। परसराम और रहीमके अचूक निशानोंने पाँच सिपाही मार
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डाले।

. *(४)*
परसराम को भागने का अवसर देने के लिये रहीम ने अपना घोड़ा पीछे लौटाया और वह सिपाहियों के साथ जूझने लगा। सब लोगोंने उसे घेर लिया। दनादन गोलियाँ छूटने लगीं। तीन सिपाही रहीमने मौतके घाट उतार दिये। उसके शरीर में चार गोलियाँ घुस चुकी थीं। एक गोली घोड़ेको लगी। घोड़ा और सवार दोनों ही मरकर गिर पड़े। तबतक परसराम एक कोस आगे निकल गये थे। साहबने रहीमको वहीं छोड़ा और परसरामका पीछा किया।

तीन कोसके बाद परसराम दिखायी पड़े। साहबकी गोलीसे परसरामका घोड़ा घायल होकर गिर पड़ा। परसराम पैदल चलने लगे। आगे था एक नाला, ५-६ गज चौड़ा था और तीस हाथ गहरा था। बरसाती पानीने उस नालेको खंदकका रूप दे दिया था। परसरामने कूदकर उसे पार करना चाहा; परंतु पैर फिसल गया। वे खंदकमें गिर पड़े। किनारे यंग साहब आ खड़े हुए। नीचे अँधेरा था, साफ-साफ दिखायी न पड़ता था।

ज्यों ही साहबने नीचे झाँका त्यों ही परसरामने गोली छोड़ दी। विक्टोरियाके इकबाल साहब तो बच गये, मगर उनका टोप उड़ गया। सिपाहियोंने गोली छोड़ी। परसराम एक किनारे छिप गये। फायर खाली गया। साहबने कहा—‘तीस हाथ गहरे गड्ढेमें गिरा तो भी निशाना मार रहा है। शाबाश बहादुर, शाबाश! तबतक परसरामने आवाजके निशानेपर एक गोली छोड़ दी। साहबके पास एक सिपाही खड़ा था। उसकी खोपड़ी उड़ गयी।

साहबने कहा—‘हमारे नौ आदमी काम आ चुके हैं। मगर डाकूका एक ही आदमी मरा।’
एक सिपाही था राजपूत। उसने आगे बढ़कर कहा—‘मिट्टी गिराकर डाकूको दाब देना चाहिये।’ आवाजका निशाना साधकर परसरामने गोली छोड़ी। राजपूत बेचारा मरकर गिर गया। साहबने कहा—‘वेल परसराम! टुम बाहर आ जाओ। अम टुमपर बहोत खुश हैं। टुम एक बहादुर और बातका ढनी आडमी है। अम टुमारे निशानेपर खुश हूँ।’

परसरामने जवाब दिया—‘मैं अपना वचन पूरा कर चुका। एक लोटा पानीसे उऋण हो गया। अब मरनेका डर नहीं है।’
साहब—‘अगर टुम डाका डालना बंड करनेकी कसम खाओ तो अम टुमको वायसरायसे कहकर छुड़ा लेगा। इतमिनान करो और बाहर आओ। टुम भी बातका ढनी, अम भी बातका ढनी। आजसे टुम हमारा डोस्त हुआ।’

परसराम बाहर निकल आये और आत्मसमर्पण कर दिये। यंग साहबने उनको गिरफ्तार कर लिया और आगरा ले गये। कुछ दिनों मुकदमा चला। मगर यंग साहबने परसरामको साफ बरी करा दिया। परसरामने समझ लिया—अच्छा उद्देश्य होनेपर भी आखिर डकैती थी बहुत बुरी चीज, उसका समर्थन हो ही नहीं सकता। अतएव उस काम को छोड़ दिया।

वे साधु हो गये और अपने साथियोंको नेकीका जीवन व्यतीत करनेका उपदेश दिया। परसराम ने हरद्वार में जाकर पाँच साल तक घोर तपस्या की और सन् 1935 ई० में गंगाजी की बीच धारा में खड़े-खड़े शरीर त्याग दिया। परसराम ने यह दिखला दिया कि विपत्ति को देखकर भी वचन का पालन करना चाहिये।
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ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूं तं नमामि ।।

अर्थः
ब्रह्मानन्दं – जो ब्रह्मानन्द स्वरूप हैं,
परमसुखदं – परम सुख देने वाले हैं,
केवलं ज्ञानमूर्तिं – जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं,
द्वन्द्वातीतं – (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वंद्वों से रहित हैं,
गगनसदृशं – आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं,
तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् – तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं,
एकं – एक हैं,
नित्यं – नित्य हैं,
विमलमचलं – मलरहित हैं, अचल हैं,
सर्वधीसाक्षिभूतं – सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं,
भावातीतं – भावों या मानसिक स्थितियों के अतीत माने परे हैं,
त्रिगुणरहितं – सत्त्व, रज, और तम तीनों गुणों के रहित हैं,
सद्गुरूं तं नमामि – ऐसे श्री सद्गुरूदेव को मैं नमस्कार करता हूँ ।
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जन्म के प्रकार

रज प्रधान मैथुनिक समाज में अब मात्र रज और वीर्य के मिलन से ही संतान उत्पत्ति की व्यवस्था जीवित है पर हमारे प्राचीन जीवन शैली में पांच अन्य प्रकार से भी संतान उत्पत्ति का विधान प्रचलित था किन्तु ज्ञान के आभाव में धीरे- धीरे यह विलुप्त हो गया किन्तु इसका वर्णन शास्त्रों में अभी भी मिलता है इस प्रकार जन्म के संबंध मे भारतीय शास्त्रों में छः प्रकार के जन्म पद्धति वर्णित हैं-

1. माता पिता के मैथुन व्यवहार से जो रज-वीर्य का मिलन होता है इसे लौकिक जन्म कहा जाता है अथवा ऐसा भी कहा जा सकता है कि मन की वासना के अनुसार जो जन्म मिलता है, यह जनसाधारण का जन्म है।

2. दूसरे प्रकार का जन्म संतकृपा से होता है। जैसे, किसी संत ने आशीर्वाद दे दिया, फल दे दिया और उससे गर्भ रह गया। तप करे, जप करे, दान करे अथवा किसी साधु पुरूष के हाथ का वरदान मिल जाये, उस वरदान के फल से जो बच्चा पैदा हो, वह जनसाधारण के जन्म से कुछ श्रेष्ठ माना जाता है। उदाहरणार्थः भागवत में आता है कि धुन्धुकारी का पिता एक संन्यासी के चरणों में गिरकर संतान प्राप्ति हेतु संन्यासी से फल लाया। वह फल उसने अपनी पत्नी को दिया तो पत्नी ने प्रसूति पीड़ा से आशंकित होकर अपनी बहन से कह दिया कि, "तेरे उदर में जो बालक है वह मुझे दे देना। यह फल मैं गाय को खिला देती हूँ और पति को तेरा बच्चा दिखला दूँगी।" ऐसा कहकर उसने वह फल गाय को खिला दिया। उसकी बहन के गर्भ से धुन्धुकारी पैदा हुआ तथा संन्यासी द्वारा प्रदत्त फल गाय ने खाया तो गाय के उदर से गौकर्ण पैदा हुआ जो भागवत की कथा के एक मुख्य पात्र हैं।

3. कोई तपस्वी क्रोध में आकर शाप दे दे और गर्भ ठहर जाय यह तीसरे प्रकार का जन्म है।

एक ऋषि तप करते थे। उनके आश्रम के पास कुछ लड़कियाँ गौरव इमली खाने के लिए जाती थीं। लड़कियाँ स्वभाव से ही चंचल होती हैं, अतः उनकी चंचलता के कारण ऋषि की समाधि में विघ्न होता था। एक दिन उन ऋषि ने क्रोध में आकर कहाः "खबरदार ! इधर मेरे आश्रम के इलाके में अब यदि कोई लड़की आई तो वह गर्भवती हो जायेगी।" ऋषि का वचन तो पत्थर की लकीर होता है। वे यदि ऊपर से ही डाँट लें तो अलग बात है लेकिन भीतर से यदि क्रोध में आकर कुछ कह दें तो चंद्रमा की गति रूक सकती है लेकिन उन ऋषि का वचन नहीं रूक सकता। सच्चे संत का वचन कभी मिथ्या नहीं होता। दूसरे दिन भी रोज की भाँति लड़कियाँ आश्रम के नजदीक गई। उनमें से एक लड़की चुपचाप अन्दर चली गयी और ऋषि की नजर उस पर पड़ी। वह लड़की गर्भवती हो गई क्योंकि उस ऋषि का यही शाप था।

4. दृष्टि से भी जन्म होता है। यह चौथे प्रकार का जन्म है। जैसे वेदव्यासजी ने दृष्टि डाली और रानियाँ व दासी गर्भवती हो गई। जिस रानी ने आँखें बन्द की उससे धृतराष्ट्र पैदा हुए। जो शर्म से पीली हो गई। उसने पांडु को जन्म दिया। एक रानी ने संकोचवश दासी को भेजा। वह दासी संयमी, गुणवान व श्रद्धा-भक्ति से संपन्न थी तो उसकी कोख से विदुर जैसे महापुरूष उत्पन्न हुए।

5. पाँचवें प्रकार का जन्म है कारक पुरूष का जन्म। जब समाज को नई दिशा देने के लिए अलौकिक रीति से कोई जन्म होता है हम कारक पुरूष कहते हैं। जैसे कबीर जी। कबीर जी किसके गर्भ से पैदा हुआ यह पता नहीं। नामदेव का जन्म भी इसी तरह का था।
नामदेव की माँ शादी करते ही विधवा हो गई। पतिसुख उसे मिला ही नहीं। वह मायके आ गई। उसके पिता ने कहाः "तेरा संसारी पति तो अब इस दुनिया में है नहीं। अब तेरा पति तो वह परमात्मा ही है। तुझे जो चाहिए, वह तू उसी से माँगा कर, उसी का ध्यान-चिंतन किया कर। तेरे माता-पिता, सखा, स्वामी आदि सब कुछ वही हैं।"
उस महिला को एक रात्रि में पतिविहार की इच्छा हो गई और उसने भगवान से प्रार्थना की कि 'हे भगवान ! तुम्हीं मेरे पति हो और आज मैं पति का सुख लेना चाहती हूँ।' ऐसी प्रार्थना करते-करते वह हँसती रोती प्रगाढ़ नींद में चली गई। तब उसे एहसास हुआ कि मैं किसी दिव्य पुरूष के साथ रमण कर रही हूँ। उसके बाद समय पाकर उसने जिस बालक को जन्म दिया, वही आगे चलकर संत नामदेव हुए।

6. जन्म की अंतिम विधि है अवतार। श्रीकृष्ण का जन्म नहीं, अवतार है। अवतार व जन्म में काफी अन्तर होता है। अवतरति इति अवतारः। अर्थात् जो अवतरण करे, ऊपर से नीचे जो आवे उसका नाम अवतार है।
सच पूछो तो तुम्हारा भी कभी अवतार था किन्तु अब नहीं रहा। तुम तो विशुद्ध सच्चिदानंद परमात्मा थे सदियों पहले, और अवतरण भी कर चुके थे लेकिन इस मोहमाया में इतने रम गये कि खुद को जीव मान लिया, देह मान लिया। तुम्हें अपनी खबर नहीं इसलिए तुम अवतार होते हुए भी अवतार नहीं हो।
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श्रीकृष्ण तुम जैसे अवतार नहीं हैं, उन्हें तो अपने शुद्ध स्वरूप की पूरी खबर है और श्रीकृष्ण अवतरण कर रहे हैं।
श्रीकृष्ण का अवतार जब होता है तब पूरी गड़बड़ में होता है, पूरी मान्यताओं को छिन्न भिन्न करने के लिये होता है। जब श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ तब समाज में भौतिकवाद फैला हुआ था। चारों ओर लग जड़ शरीर को ही पालने-पोसने में लगे थे। धनवानों और सत्तावानों का बोलबाला था। ऐसी स्थिती में श्रीकृष्ण ने आकर धर्म का मार्ग दिखलाया ।
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*सूर्य आदि ग्रहों के रथ दृश्यों का वर्णन*

सूर्य के रथ में रहने वाले आदित्य, सुर, मुनि, गंधर्व, अप्सराएं, ग्रामि, सर्प और राक्षस हैं, ये सभी दो महीने तक रथ में रहते हैं, और उनके कार्य इस प्रकार हैं। सुर अपने तेज से सूर्य का तेज बढ़ाते हैं।

मुनि अपने द्वारा रचित स्तोत्रों और स्तोत्रों से भास्कर की स्तुति करते हैं। गंधर्व गायन कला के माध्यम से सूर्य की पूजा करते हैं। अप्सराएं सुंदर नृत्य कला के माध्यम से सूर्य को प्रसन्न करने का प्रयास करती हैं। सर्प सूर्य को घेर लेते हैं। ग्राम की स्त्रियां, यक्ष और भूत किरणों को एकत्रित करने का कार्य करेंगे। यातुधान सूर्य के रथ को आगे बढ़ाएंगे। वालखिल्य सूर्य के चारों ओर अपना घेरा बनाकर अस्त को करेंगे।

सूर्य जो सबके स्वामी हैं, तपस्या करेंगे। सूर्य का परिवार गंधर्व आदि होगा। सूर्य ग्रीष्म, वसंत और शीत ऋतुओं के अनुसार गर्मी, हिम, बुरे दिन, रात आदि उत्पन्न करेगा तथा वसंत आदि ऋतुओं के अनुसार किरणों में परिवर्तन करेगा। इस प्रकार वह देवताओं, पितरों और मनुष्यों को संतुष्ट करके यात्रा करेगा। इस प्रकार रवि सभी देवताओं और पितरों की रक्षा करेगा।

सुंदर घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले एक पहिये वाले, शुभ, सुंदर और दर्शनीय रथ से भास्कर एक दिन और एक रात तक तेजी से परिक्रमा करेगा। रथ के बाएं पहिये पर गायत्री के समान सात नक्षत्र हैं, जो केवल एक बार बंधे होते हैं। सूर्य का रथ एक सौ चौरासी मंडलों को घुमाता है। इस प्रकार भास्कर महान ऋषियों द्वारा रचित स्तोत्रों से स्तुति करते हुए यात्रा करता है। चंद्रमा का रथ ऐसा ही है। यह रथ तीन पहियों से सुसज्जित है, और इसमें सफेद घोड़े शोभायमान हैं। यह जल के गर्भ से निकला है।

सौ वलयों से घिरा हुआ यह रथ तीन पहियों से युक्त, सुन्दर, मनोहर तथा दिव्य है, तथा इसमें दस घोड़े शोभायमान हैं। वे दस घोड़े यजु, चन्द्रमा, वृष, वाजि, नर, हय, गविष्णु, हंस, वोम तथा मृग हैं। ये घोड़े दीक्षा सहित चन्द्रमा को प्रभावशाली ढंग से ले जा सकते हैं। कृष्ण पक्ष के अन्त में, दिन के ढलते भाग के अन्त में, अथवा शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में, यह सूर्य में विलीन हो जाएगा तथा सूर्य की किरणों के साथ अपना पूर्ण रूप ले लेगा।

सुरा इन तत्वों का उपभोग करेगी तथा शशांक, जो पन्द्रह दिनों से दुबला-पतला है, को रवि अपनी एक किरण से निरन्तर पोषण देगा। दिन-प्रतिदिन वह सूर्य की सुषुम्मा नामक किरण से प्रत्येक तत्व को बढ़ाएगा। तब चन्द्रमा में तत्वों की वृद्धि होगी। इस तत्व का सेवन करने से कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा तत्व उपजाऊ हो जाएगा और शुक्ल पक्ष के आरम्भ में अपनी किरणों से सूर्य के साथ इसे पूर्ण करने से शशांक तत्व की वृद्धि होगी।

रात्रि के समय शशांक में इस दिव्य अमृत को पीने के लिए सभी देवता, ऋषि और पितर पूर्णिमा की सीमा के बराबर पूर्ण चन्द्रमा की पूजा करेंगे। कृष्ण पक्ष के आरम्भ से सूर्य की ओर गति करने वाले चन्द्रमा की कलाएँ पितरों और देवताओं द्वारा भस्म हो जाने के कारण क्षय को प्राप्त होती हैं। इस प्रकार सूर्य से चन्द्रमा की वृद्धि और क्षय होता है।

अब चन्द्रमा के पुत्र बुध के रथ के विषय में मुझसे सुनो। बुध का रथ मेघ के समान गर्जना करने वाला, श्वेत रंग का और ध्वजाओं तथा पताकाओं से सुशोभित है। शुक्र का रथ सूर्य के समान तेज से सुशोभित है। इसमें पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले श्वेत, पिसंग, सारंग, नील, पीत और विलोहित नामक घोड़े हैं। अंगारक का रथ स्वर्ण रंग का है और उसमें आठ घोड़े हैं।

बृहस्पति का रथ जल में उत्पन्न वायु की गति वाले आठ दिव्य घोड़ों से सुशोभित है। राहु का रथ आठ काले घोड़ों से सुशोभित है। शनि का रथ धातु से बना है और आकाश से उत्पन्न घोड़ों से बना है। चंद्रमा सूर्य के दिनों में भास्कर के साथ जुड़ता है। केतु का रथ वायु की गति वाले आठ घोड़ों से बना है। इस प्रकार ग्रहों के रथ और वाहनों का वर्णन किया गया है.
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सुखस्य मूलं धर्मः
आचार्य चाणक्य कहते हैं अगर सुख चाहते हो तो धर्म के मार्ग पर चलो।

पाप छोड़ने के उपाय-

पाप वृति को वश में करने से ,दृढ संकल्प से ,यज्ञ से , सत्य संकल्प करने से, पापों में दोष दर्शन से और पापों के त्याग की कामना पाप निवारण के उपाय हैं।

वेद भगवान बड़े ही आत्मीय शब्दों में पाप निवारण के उपाय बताते है-

१. पाप वृति को वशीभूत करना

हे पाप! मुझे छोड़ दे, हमारे वशीभूत होकर , हमको सुखी कर ,कुटिलता से अलग करके हमे कल्याण और सुख के लोक में स्थापित कर। – अथर्ववेद ६/२६/१
यह सत्य हैं कि जब मनुष्य पाप करने वाली वृतियों को वश में कर लेता हैं तब मनुष्य सुखी हो जाता हैं। मनुष्य का चित शांत और संतुष्ट हो जाता हैं। ऋग्वेद १/१८९/१ में कुटिलता को, उलटे कर्म को पाप कहा गया हैं, इसलिए जब तक कुटिलता रहती हैं तब तक मनुष्य सज्जन नहीं बन सकता हैं। मनुष्य को अंतत अपने मन को स्वाभाविक सरल अवस्था में रखना भी पापों से छुटने का उपाय हैं। इसके लिखे मन को कुटिलता से पृथक करके पापवृति को वशीभूत करना होगा।

२. दृढ संकल्प से

हे पाप! जो तू हमें नहीं छोड़ता हैं तब हम ही तुझे छोड़ देते हैं। - अथर्ववेद ६/२६/२
दृढ संकल्प के द्वारा हम अपने मन को पाप कर्म से दूर करे , अगर मन को पक्का कर सत्य मार्ग पार चलेंगे तभी पाप से विमुख रहेगे।

३. यज्ञ से

मेरे जो किये हुए यज्ञ- देवपूजन, सत्संग और दान हैं, वे मुझे प्राप्त रहें , मेरे मन का संकल्प सत्य हो , मैं किसी भी पाप को न प्राप्त होऊं। इस विषय में सब देव मेरी पूर्ण रक्षा करें। - अथर्ववेद ५/३/४
वेद के इस मंत्र में स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने सत्कर्मों में सदा लगा रहे और सत्य का संकल्प कर पाप कर्मों से दूर रहे। इसका अर्थ स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने मन को श्रेष्ठ कर्मों में इतना लीन कर ले कि उसके पास पाप कर्म करने का समय ही न हो।

स्वामी दयानंद के जीवन में भी इस प्रकार का एक उदहारण हमें मिलता हैं किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा की महाराज क्या आपको काम वासना नहीं आती हैं ? स्वामी दयानंद ने उत्तर दिया की आती होगी लेकिन मुझे व्यस्त पाकर लौट जाती होगी। स्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन यज्ञमय और श्रेष्ठ कर्मों को पूर्ण करने में व्यस्त था, इसलिए वे पाप कर्म से बचते गए और अंत में सर्वश्रेष्ठ सुख मोक्ष के भागी बने।महार्षि दयानंद का प्रिय वेद मंत्र था ओ३म् विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद्भ॒द्रं तन्न॒ऽआ सु॑व ॥३०:३ ॥
भावार्थ -हे उत्तम गुण-कर्म-स्वभावों में प्रेरणा देनेवाले परमेश्वर ! आप हमारे सब दुष्ट आचरण वा दुःखों को दूर कीजिए और जो कल्याणकारी धर्मयुक्त आचरण वा सुख है, उस को हमारे लिए अच्छे प्रकार उत्पन्न कीजिए ॥३ ॥

४. पापों में दोष दर्शन से और पापों की कामना का त्याग

हे मानसिक पाप ! दूर हट जा,तू क्यूँ बुरे कामों की प्रशंसा करता हैं। दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता। - अथर्ववेद ६/४५/१

पाप तीन प्रकार के होते हैं- मानसिक, शारीरिक और वाचिक। शारीरिक और वाचिक पापों की उत्पत्ति मानसिक पापों के द्वारा ही होती हैं। यदि मन में कोई पाप नहीं हैं तो वाणी और शरीर द्वारा भी कोई पाप नहीं होगा। दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता। इस प्रकार के वाक्यों से व्यक्त रूप में या मानसिक रूप में पाप के विरुद्ध दृढ़ भावना पैदा होती हैं इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति पापों के विरुद्ध लगातार वाचिक और मानसिक अभ्यास करेगा तो वह अवश्य ही उन पर विजय पा लेगा। इस प्रकार अभ्यासी के मन में पापों के लिए घृणा पैदा होती हैं अत: प्रत्येक मनुष्य को इस प्रकार का अभ्यास कर पापों की कामना का त्याग करना चाहिए।

पाप निवारण का फल-

वेद भगवान अथर्ववेद १६/६/१ में कहते हैं- हम आज ही पापरहित हो गए हैं. हम आज ही विजय कर लेंगे और सुख, शांति और आनंद का भोग करेंगे।

आइये अंग्रेजी भाषा में एक मुहावरा हैं की Prevention is always better than cure अर्थात बचाव ईलाज से हमेशा उत्तम हैं। दुःख, अशान्ति आदि से बचने के लिए एक मात्र उपाय ईश्वर प्रदित मार्ग पर चलते हुए पाप कर्मों से दूर रहना हैं। वेद भगवान का सन्देश अपने जीवन में आत्मसात कर ही ऐसा संभव है।
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'तुलना क्यों हानिकारक है?'

तुलना सामाजिक दृष्टि से समाज की सुख-शांति के लिए हानिकारक है।
राष्ट्रीय दृष्टि से राष्ट्र की सुख-समृद्धि और विकास के लिए बाधक है।
सब लोग एक-दूसरे की ओर देखते रहते हैं बजाय राष्ट्र की ओर देखने के।
आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं के लिए हानिकारक है।
क्यों और कैसे?
उपनिषद में एक उदाहरण से बताया है।
एक वृक्ष में दो पक्षी बैठे हुए हैं।
छोटा पक्षी जीव है जो कर्ता भाव से अच्छे बुरे फल को खाकर सुखी दुखी होता है।
बडा पक्षी कुछ नहीं खाता।वह उसकी महिमा में स्थित है।
सारी इच्छाओं से मुक्त।
इच्छा दीन-हीन बना देती है।
छोटे पक्षी को यह तकलीफ़ झेलनी होती है।
इसे हम हमारे भीतर घटता देख सकते हैं।
छोटा पक्षी है-मन(मानसिक मैं,छोटा मैं)।
बडा पक्षी है हृदय में आत्मा(स्वयं)।
दोनों हैं।
मन में हम मानसिक मैं की तरह हैं,हृदय में हम स्वयं हैं।
यह जो स्वयं है इसे ईश्वर का अंश भी कहा है।
परमात्मा का अंश जीवात्मा है।
यह हृदय में रहता है।
मन का मैं,कल्पित मैं मन में है, बुद्धि में है-अहंबुद्धि की तरह, अहम्मन्यता की तरह।
हृदय का मैं बडा मैं है,स्वयं है-
बड़े पक्षी की तरह-अपनी महिमा में स्थित।
हमारे भीतर दोनों हैं।
लेकिन मानसिक मैं हमारा वास्तविक रुप नहीं है।यह कल्पित है,मान्यता है। कल्पना में उडान भरता रहता है,सुखी दुखी होता रहता है।
हृदय में जो आत्मा है स्वयं वह काल्पनिक नहीं है, वास्तविक है।
सबके आधार की तरह।
मूलतः वही हम सब हैं।
वह सबमें है इसीलिए किसीकी किसीसे तुलना करने की जरूरत नहीं है।
यह ऐसा है जैसे एक कक्ष में अनेक देशों के राष्ट्रपति इकट्ठे हो जायें -सब महामहिम।
कोई छोटा बडा नहीं।
जब आत्मा अर्थात स्वयं हर हृदय में मौजूद है फिर आदमी क्यों अपनी महिमा से वंचित है?
कारण है वह मन के मैं को जीता है,बडे अर्थात स्वयं को भूल जाता है।
इसके लिए चाहिए योग क्यों कि छोटा मैं, हृदय में जो स्वयं है उसके संबंध में है।
भेद बाहर नहीं है,भेद भीतर है।
भीतर ही छोटा मैं और बडा मैं मौजूद हैं।
बडा मैं,स्वयं है,बडा पक्षी अपनी महिमा में स्थित।
उसे साक्षी भी कहा गया हे।
वह कर्ता भोक्ता की तरह नहीं है।वह छोटा पक्षी है।
हम अपना निरीक्षण करें तो अपने को मन में छोटे पक्षी की तरह, मानसिक मैं की तरह पायेंगे कर्ता भोक्ता भाव से कडवा मीठा फल खाकर सुखी दुखी होते हुए।
हमें अपने असली स्वरूप को पहचानना चाहिए जो हृदय में स्वयं है।
किसी को यह ज्ञान मार्ग की बात लग सकती है।
आत्मा की दृष्टि से कहें तो ज्ञान मार्ग,
परमात्मा की दृष्टि से कहें तो भक्ति मार्ग।
जैसा कि गीता कहती है-हृदय में विराजमान परमात्मा की शरण में जाओ।'
उस परमात्मा की।
ज्ञान मार्ग में यह आत्मा की तरह है,स्वयं की तरह।
जिसे जिस तरह ठीक लगे वैसा कर सकता है।
सत्य के अनेक द्वार हैं और सभी खुले हुए हैं। कोई किसीभी द्वार से प्रवेश कर सकता है।गीता के अठारह अध्याय अठारह योग हैं। विषाद योग भी है। विषाद दुख झेलने के लिए नहीं अपितु उसे साधन की तरह उपयोग करने के लिए है। आदमी बुद्धिमान हो तो वह विषाद का भी सीढी की तरह उपयोग कर सकता है बजाय उससे ठोकर खाने के।
आध्यात्मिक दृष्टि से हम छोटे मैं और बडे स्वयं(आत्मा)की तरह हैं।
बड़े स्वयं को भूल गये हैं और छोटे मैं (मानसिक मैं, कल्पित मैं)को ही सब कुछ मान बैठे हैं।
एक शेर का बच्चा, भेड़-बकरी के साथ रहकर भूल गया वह कौन है?
एक शेर के आने पर भेड बकरियों के साथ वह भी भागने लगा।
शेर उसे पकड़ कर नदी किनारे ले गया,उसे उसका प्रतिबिंब दिखाया और जोर से आवाज करने के लिए कहा
तो दहाड निकली।वह आवाज ही भूल गया था। कभी ध्यान ही नहीं गया।
उस शेर की भूमिका एक गुरु की,एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक की बताई जाती है।
वह कहता है-मन में मैं मैं,मेरा मेरा मत करो,
हृदय में स्वयं को पहचानों,स्वयं से जुडो।
एक कहावत है-डरा सो मरा।
डरने का मरने से क्या संबंध?
मन में मैं मैं की तरह जीनेवाला,दिन में सौ बार मरता है लेकिन जो हृदय में स्वयं से जुड गया वह निर्भय हो जाता है।उसका आधार उसके भीतर मिल गया।
जो मन में मैं मै करता है वह तो टूटा हुआ है,उखडा हुआ है स्वयं से।
सारे दुर्भाग्य का कारण यही है।
उसे चाहिए वह खुद से जुडे हृदय में। इसमें बहुत बडा बल है।
यह आत्मबल है।
जो खुद से जुडा हुआ है उसे कौन डरा सकता है,कौन दबा सकता है?
इसीलिए तो क्रांतिकारियों पर अंग्रेज हावी न हो सके।जो मौत कि भी परवा नहीं करता उससे सब डरते हैं।
यह तो जो खुद से टूटा हुआ है उसीकी गति बिगडती है।
हमें देख लेना चाहिए कि हम मन में मैं मैं कर रहे हैं,उसी में खोये हुए हैं या हृदय में स्वयं से जुडे हुए हैं?
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ऐसे तो कोई घमंडी, अभिमानी भी 'मैं स्वयं' करके जी सकता है।
मगर यह अहंबुद्धि है जो अस्तित्व बोध,आत्मबोध का दुरुपयोग कर रही है।
ऐसा बल तमोगुणी बल है।
रावण का बल।
राम का बल अस्तित्व बोध,आत्मबोध के दुरुपयोग से नहीं है वह तो स्वयं आत्मा है बल्कि परमात्मा।
जब तक हम अहंबुद्धि की तरह हैं तब तक तुलना है और यह हर दृष्टि से हानिकारक है
लेकिन जब हम हृदय में स्वयं से जुड जाते हैं तृप्ति का,पूर्णता का, गहरे संतोष का अनुभव होता है।
यही योग है।
इसे करना पडता है।यह साधना है।
मन और हृदय के बीच में है चित्त।
जब तक चित्त,मन में है वियोग जारी रहता है।
जब चित्त,हृदय में -स्वयं में ठहरने लगता है, गहराने लगता है स्थिरता आने लगती है।
यह स्थिरता ही आत्मस्थिति में परिणमित होती है।
फिर कुछ नहीं।ऐसा योगी सदा आनंद में है तथा "बडे भारी दुख" से भी विचलित नहीं होता।
विचलित होने का अर्थ है चित्त का हृदय से टूटकर मन-बुद्धि में बने रहना। आदमी अपने आपसे बचता रहता है।
जितना ज्यादा मन में
उतना खुद से दूर भागा हुआ।
हर वक्त दूर,हर वक्त बाहर किसीके साथ तुलना में।
यह दो मानसिक प्रतिमाओं (इमेज) में संघर्ष है।
इसका कारण भी आदमी ही है।वह खुद से जुडा हुआ नहीं है,वह योगी नहीं है।कुयोगी है।
सारा खेल हमारे भीतर हो रहा है और हम बाहर एक दूसरे को देख रहे हैं तुलना करते हुए।
अच्छा हो अगर हर आदमी हृदय में स्वयं से जुड़ने की कोशिश करे
तब हर आदमी अतुलनीय है।
भारत का हर नागरिक अतुलनीय है तो राष्ट्र की सुख-समृद्धि को कौन रोक सकता है?
हानि तो अहंकार पूर्ण तुलना के कारण है जिसका अर्थ है अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना।
तुलना करने वाला स्वयं से टूटा हुआ है, दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर है यह समझ में आ जाय तो इस सारी मूर्खतापूर्ण दौड का अंत हो सकता है।
नकारात्मक प्रतिस्पर्धा का कोई अर्थ नहीं। अपनी महिमा में स्थित होने का जरुर अर्थ है।
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*जब अज्ञातवास में शनिदेव ने ली पांडवों की कठोर परीक्षा?*

महाभारत के युद्ध से पहले जब द्युत में हारने के कारण पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास (बिना किसी के पहचान में आए अपरिचित जगह पर रहना) मिला था। तब पांडवों का अज्ञातवास ख़त्म होने में कुछ ही समय बचा था तो वह सब अपने लिए एक ऐसी जगह कि तलाश कर रहे थे जहाँ कोई उन्हें पहचान ना पाए।

पांडव इस बारें में बात ही कर रहे थे कि आकाश से गुजर रहे शनिदेव की नज़र उन पर पड़ी। उन्होंने उनकी परीक्षा लेने के बारे में सोचा और पता लगाना चाहा कि आखिर इन सब में सबसे बुद्धिमान कौन हैं। यह जानने के लिए शनिदेव ने एक माया महल का निर्माण किया और इस महल के हर कोने में कुछ योजन की दूरी रखी।

*माया महल*

अचानक भीम कि नज़र उस महल पर पड़ी और उसका मन उस महल में जाने को आकर्षित हो गया। युधिष्ठिर से आज्ञा ले भीम उस महल के पास पहुँच गया जैसे ही भीम ने अंदर जाना चाहा तो शनिदेव (जो की दरबान बने महल के दरवाज़े पर पहरा दे रहे थे ) ने उसे अंदर जाने से रोका और कहाँ इस महल में जाने की कुछ शर्ते हैं

पहली शर्त – महल में चार कोने हैं जिसमे से तुम सिर्फ एक ही कोना देख सकते हो।

दूसरी शर्त – महल के अंदर जो कुछ भी देखोगें उसे उसके मतलब सहित समझाना पड़ेगा ।

तीसरी शर्त -अगर तुम नही बता पाए तो तुम्हे बंदी बना लिया जायेगा ।
भीम ने शर्त मंजूर करते हुए महल की पूर्व दिशा कि ओर चलना शुरू किया जैसे ही वह अंदर गया तो उसने बहुत ही सुंदर पशु, पक्षी ,फलों और फूलों से लदे पेड आदि देखें जो कि उसने आज से पहले कभी नही देखे थे।उन्हें देखते देखते भीम और अंदर चला गया और बहुत ही अजीब नज़ारा देख चौंक गया । भीम ने देखा के वहां तीन कुएं हैं जिसमे एक कुआँ बड़ा हैं और दो छोटे हैं जब बड़े कुएं का पानी उछलता हैं तो बराबर के दोनों छोटे कुएं भर जाते हैं लेकिन जब दोनों छोटे कुएं में पानी उछलता हैं तो बड़े कुएं का पानी आधा ही रह जाता हैं । यह नज़ारा देख भीम महल से बाहर आता हैं।

*दरबान बने शनिदेव उससे पूछते हैं बताओं तुमने अंदर क्या देखा?*

भीम – पशु ,पक्षी आदि के बारे में सब बता देता हैं लेकिन उसे कुएं वाली बात समझ नही आती जिसके बारे में वो नही बता पता इसलिए शर्त के अनुसार उसे बंदी बना लिया जाता हैं।

अर्जुन भी उस महल को देखने आता हैं और अंदर जाने के लिए पूछता हैं । उसे भी शर्त समझा दी जाती हैं। अर्जुन पश्चिम छोर की ओर जाता हैं और आगे चल कर देखता हैं कि एक खेत में एक तरफ मक्के की और दूसरी तरफ बाजरे की फसल उग रही हैं। मक्के के पौधों से बाजरे का फल निकल रहा हैं और बाजरे के पौधे से मक्के का।जब अर्जुन को कुछ समझ नही आता तो वह दरवाज़े कि तरफ आता हैं।

*दरबान ने पूछा, “बताओं” तुमने क्या देखा?*

अर्जुन बोलता हैं सब देखा लेकिन मक्के और बाजरे वाली बात कुछ समझ नही आई।

*अर्जुन को भी बंदी बना लिया जाता हैं ।*

थोड़ी देर बाद नकुल आया उसे भी शर्त समझा महल के अंदर प्रवेश करने दिया जाता हैं । नकुल उत्तर दिशा की तरफ जाता हैं और देखता हैं कि बहुत सारी सफ़ेद गायें अपनी बछियों के साथ वहां घूम रही थी लेकिन जब गायों को भूख लगती हैं तो वो अपनी बछियों का दूध पी रही थी जो की बहुत ही अजीब था। यह देख नकुल भी बाहर आता हैं। उससे भी पूछा जाता हैं कि उसने अंदर क्या देखा ।नकुल भी नही बता पाता और उसे भी बंदी बना लिया जाता हैं।

अब सहदेव आता हैं और महल देखने कि इच्छा व्यक्त करता हैं। उसे भी शर्त बता दी जाती हैं ।सहदेव देखता कि एक सोने की बड़ी शिला चांदी के एक सिक्के पर टिकी हुई हैं थी जो की डगमग हिल रही थी लेकिन फिर भी गिर नहीं रही थी। सहदेव को भी कुछ समझ नहीं आया और उसे भी बंदी बना लिया गया।

तब बहुत देर तक चारों भाई नहीं आए तो युधिष्ठिर को उनकी चिंता होने लगी और वो भी द्रोपदी के साथ महल में गए और दरबान से अपने भाइयों के बारे में पूछा तो दरबान ने उन्हें बताया की महल में जाने की कुछ शर्तें थी,जिन्हें आपके भाई पूरा नहीं कर पाए इसलिए उन्हें बंदी बना लिया गया हैं । तब युधिष्ठिर ने भीम से पूछा- बताओं तुमने अंदर क्या देखा ? भीम ने कुएं के बारे में बताया तब युधिष्ठिर ने भीम को समझाया कलयुग में एक बाप दो बेटों का पेट भर देगा लेकिन दो बेटे एक बाप का पेट नहीं भर पाएंगे । जैसे ही युधिष्ठिर ने ये बताया भीम को छोड़ दिया गया।

अब युधिष्ठिर ने अर्जुन से पूछा की उसने क्या देखा उसने भी फसल के बारे में बता दिया।

युधिष्ठिर ने कहा – यह भी कलयुग में होने वाला हैं इसका अर्थ हैं वंश परिवर्तन अर्थात ब्राह्मण के घर शुद्र कि लड़की और शुद्र के घर ब्राह्मण की लड़की कि शादी होगी।

अर्जुन के सवाल का जवाब युधिष्ठिर से सुन उसे भी छोड़ दिया गया।
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अब नकुल से पूछा उसने क्या देखा उसने भी गायें वाला सारा किस्सा युधिष्ठिर को बता डाला जिसका अर्थ था कि कलयुग में माताएं बेटी के घर रह उन्हीं का अन्न खाएँगी क्योंकि बेटे माँ बाप कि सेवा नहीं करेंगे अब नकुल भी छुट गया।

अब सहदेव से पूछा गया कि आखिर उसने क्या देखा सहदेव ने सोने कि शिला का सारा व्रतांत सुना डाला। युधिष्ठिर ने सहदेव को बताया कि कलयुग में पाप धर्म को दबाता रहेगा लेकिन फिर भी धर्म ख़त्म नही होगा । यह सुन सहदेव को भी छोड़ दिया गया।

शनिदेव ने परीक्षा के द्वारा जाना कि युधिष्ठिर सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। उन्होंने जो भी उत्तर दिए कलयुग में आज वो सब घटित हो रहा हैं।
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*जो मनुष्य दुख और पीड़ा को सहन करता है, वह बहुत बलवान होता है। जंगल में उगने वाले पौधे बहुत बलवान होते हैं, क्योंकि वे तूफान, सर्दी, गर्मी और वर्षा को झेल चुके होते हैं। गमलों में उगने वाले पौधे कमजोर होते हैं। जो जितना सहनशील होगा, वह उतना ही बलवान होगा।*

*ऐसे ही भक्त होते हैं। भक्ति करने से वे बहुत बलवान हो जाते हैं। उन पर सांसारिक माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।*

*संसार में रहने वाले लोग दुर्बल होते हैं। जो इस संसार में रहते हैं, वे दुर्बल होते हैं। वे शीघ्र ही माया के प्रभाव में आ जाते हैं और माया उनके पतन का कारण बनकर उनका नाश कर देती है।
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कहानी का समय

आखिर सुख किसको है

*बहुत ही रोचक और हृदय मै ज्ञान उत्पन्न करने वाली कहानी सभी पढ़े और अपने परिवार मै किसी एक को चर्चा करे इस कहानी का*

*एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया। किसान की स्त्री घर में थी, उसने चने की रोटी बना रखी थी।किसान जब घर आया,उसने अपने बच्चों का मुख चूमा,स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये,उसके बाद वह रोटी खाने बैठ गया।स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया,भिखारी चना लेकर चल दिया।*

*रास्ते में भिखारी सोचने लगा:- “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं। फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री हैं, बच्चे हैं, अपने आप अन्न पैदा करता है। बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है। वास्तव में सुखी तो यह किसान है।*

*इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा:-“नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है,अब वह किसी तरह काम नहीं देता, यदि कही से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाये,तो इस साल का काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा,वह ब्याज पर दे देगा।”भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया।बहुत देर चिरौरी बिनती करने पर 1रु.सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली।और गिनकर रुपये क*

*रुपये लेकर किसान अपने घर को चला,वह रास्ते में सोचने लगा-”हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु.भी नकद नहीं।कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये है।साधो कितना धनी है,उस पर सैकड़ों रुपये है“वास्तव में सुखी तो यह साधो राम ही है।साधोराम छोटी सी दुकान करता था,वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था।और उसे बेचता था।*

*दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया,वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया।वह वहाँ बैठा ही था,कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था।कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ,किसी में एक लाख का।साधो महाजन यह सब देखता रहा,कपड़ा लेकर वह चला आया।रास्ते में सोचने लगा“हम भी कोई आदमी हैं,सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं,एक दिन में लाखों का फायदा “वास्तव में सुखी तो यह है,उधर पृथ्वीचन्द बैठा ही था, कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वह बड़ी चिन्ता में था,कि नौकर ने कहा:-आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है। आपको जाना है,मोटर तैयार है।” पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर चला गया।वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी, रायबहादुर जी से* *कलक्टर-कमिश्नर हाथ मिला रहे थे। बड़े-बड़े सेठ खड़े थे।वहाँ पृथ्वी चन्द सेठ को कौन पूछता,वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया।लाट साहब आये,राय बहादुर से हाथ मिलाया,उनके साथ चाय पी और चले गये।*

*पृथ्वी चन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे,रास्ते में सोचते आते है, हम भी कोई सेठ है 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये।राय बहादुर का कैसा ठाठ है, लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं।“वास्तव में सुखी तो ये ही है।”*

*अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहदुर के सिर में दर्द हो गया,बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे।कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे।उनकी भी चिन्ता थी,कारोबार की भी बात याद आ गई। वे चिन्ता में पड़े थे,तभी खिड़की से उन्होंने झाँक कर नीचे देखा,एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था। राय बहदुर ने उसे देखा और बोले:-”वास्तव में तो सुखी यही है,इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती सुखी तो यही है।”*

*शिक्षा*

*इस कहानी से हमें यह पता चलता है, कि हम एक दूसरे को सुखी समझते हैं।पर वास्तव में सुखी कौन है, इसे तो वही जानता है।जिसे आन्तरिक शान्ति है।जिसे आन्तरिक सुकून है, आप चाहे भिखारी हो चाहे करोड़पति हो। लेकिन आप के मन में जब तक शांति नहीं है तब तक आपको सुकून नहीं मिल सकता।*
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