*सर्पमंदिर मन्नारशाला*
*आलापुज्हा केरल*
मन्नारशाला - एक अनोखा मंदिर जहा 30000 से ज्यादा नाग और सर्प मूर्तियॉ मौजूद है और सबकी पूजा होती है वह भी सिर्फ महिलाओं द्वारा
(मन्नारशाला - अलेप्पी - केरला)
वैसे तो भारत चमत्कारों का देश है ही और जितना हम इनको जानने का प्रयास करते है यह उतना ही और विशाल नज़र आता है। देश में वैसे तो बहुत सारे मंदिर नाग और सर्पो को समर्पित है पर वह पर उनकी सिर्फ एक प्रतिमा की पूजा होती है पर केरल के मन्नारशाला में में एक ऐसा मंदिर है जहा सर्र्पो की 30000 से ज्यादा प्रतिमाये है जिसमे प्रमुख पूजा नागराज और उनकी साथिन नागयक्षी की होती है और सबसे बड़ी बात है की उनकी पूजा सिर्फ महिलाये ही करती है।
इस मंदिर की गिनती भारत के सात आश्चर्यो में होती है और कहा जाता है कि श्री भगवान परशुराम जी ने इस मंदिर की स्थापना करी थी। बताया जाता है महाभारत काल के दौरान यहाँ जंगल हुआ करता था जिसे जला दिया गया था और सिर्फ इस क्षेत्र में आग नहीं लगी थी तो नागराज और अन्य सर्पो ने यही पर शरण ली थी और तबसे यह जगह मन्नारशाला बनी।
इस क्षेत्र के पास में ही नम्बूदिरी का खानदानी घर है जहा की महिलाये विवाह होने के बाद भी ब्रह्मचर्य का पालन कर मंदिर में पूजा करती है। पूजा करने वाली महिला को अम्मा के नाम सम्बोधित करते है।
क्यों होती है नागराज की पूजा ?
कहते है नम्बूदिरी खानदान की एक महिला को बच्चा नहीं हो रहा था और उसने यहाँ वासुकि नागराज से प्रार्थना करी थी और उनके दो का जन्म हुआ जिसमे एक लड़का था और एक पाँच सर लिए हुए नागराज थे, उन्हें इसी मंदिर में स्थापित किया गया और तबसे आज तक इनकी पूजा होती है। प्रबल मान्यता है की यहाँ प्रार्थना करने से महिलाओं की सूनी गोद भर जाती है | इस मंदिर में बने हुए तालाब में कपड़ो सहित जोड़े से स्नान करने के बाद गीले कपड़ो में ही प्रार्थना की होती है और वह ज़रूर पूरी होती है।
*आलापुज्हा केरल*
मन्नारशाला - एक अनोखा मंदिर जहा 30000 से ज्यादा नाग और सर्प मूर्तियॉ मौजूद है और सबकी पूजा होती है वह भी सिर्फ महिलाओं द्वारा
(मन्नारशाला - अलेप्पी - केरला)
वैसे तो भारत चमत्कारों का देश है ही और जितना हम इनको जानने का प्रयास करते है यह उतना ही और विशाल नज़र आता है। देश में वैसे तो बहुत सारे मंदिर नाग और सर्पो को समर्पित है पर वह पर उनकी सिर्फ एक प्रतिमा की पूजा होती है पर केरल के मन्नारशाला में में एक ऐसा मंदिर है जहा सर्र्पो की 30000 से ज्यादा प्रतिमाये है जिसमे प्रमुख पूजा नागराज और उनकी साथिन नागयक्षी की होती है और सबसे बड़ी बात है की उनकी पूजा सिर्फ महिलाये ही करती है।
इस मंदिर की गिनती भारत के सात आश्चर्यो में होती है और कहा जाता है कि श्री भगवान परशुराम जी ने इस मंदिर की स्थापना करी थी। बताया जाता है महाभारत काल के दौरान यहाँ जंगल हुआ करता था जिसे जला दिया गया था और सिर्फ इस क्षेत्र में आग नहीं लगी थी तो नागराज और अन्य सर्पो ने यही पर शरण ली थी और तबसे यह जगह मन्नारशाला बनी।
इस क्षेत्र के पास में ही नम्बूदिरी का खानदानी घर है जहा की महिलाये विवाह होने के बाद भी ब्रह्मचर्य का पालन कर मंदिर में पूजा करती है। पूजा करने वाली महिला को अम्मा के नाम सम्बोधित करते है।
क्यों होती है नागराज की पूजा ?
कहते है नम्बूदिरी खानदान की एक महिला को बच्चा नहीं हो रहा था और उसने यहाँ वासुकि नागराज से प्रार्थना करी थी और उनके दो का जन्म हुआ जिसमे एक लड़का था और एक पाँच सर लिए हुए नागराज थे, उन्हें इसी मंदिर में स्थापित किया गया और तबसे आज तक इनकी पूजा होती है। प्रबल मान्यता है की यहाँ प्रार्थना करने से महिलाओं की सूनी गोद भर जाती है | इस मंदिर में बने हुए तालाब में कपड़ो सहित जोड़े से स्नान करने के बाद गीले कपड़ो में ही प्रार्थना की होती है और वह ज़रूर पूरी होती है।
हमारे पूर्वज पत्थर से ऐसे चमत्कारों को ऊर्ध्वतापूर्वक बनाने में कैसे कामयाब रहे?
बस चीसेल और हथौड़ा? 🤔
मंदसौर, मध्य प्रदेश में यह अद्भुत धर्मराजेश्वर गुफा मंदिर है।
4 वीं-5 वीं शताब्दी में निर्मित !!
भारतीय रॉक-कट वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण। इस मोनोलिथिक मंदिर का निर्माण ठोस प्राकृतिक चट्टान का उपयोग करके किया गया है।🚩🚩
बस चीसेल और हथौड़ा? 🤔
मंदसौर, मध्य प्रदेश में यह अद्भुत धर्मराजेश्वर गुफा मंदिर है।
4 वीं-5 वीं शताब्दी में निर्मित !!
भारतीय रॉक-कट वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण। इस मोनोलिथिक मंदिर का निर्माण ठोस प्राकृतिक चट्टान का उपयोग करके किया गया है।🚩🚩
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹ताजमहल भी इसके सामने कुछ भी नही है, 39 साल में बना यह अद्भुत ओर नयनरम्य शिव मंदिर, यहाँ पत्थर को थपथपाने पर आती है डमरू जैसी ध्वनि..इसे एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर माना जाता है !
"जटौली शिव मंदिर"- सोलन (हिमांचल)
હર હર મહાદેવ 🧡🙏🔱
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹त
"जटौली शिव मंदिर"- सोलन (हिमांचल)
હર હર મહાદેવ 🧡🙏🔱
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
एक गौरवशाली अतीत की कहानियों के बीच अमर हम्पी, कर्नाटक के सम्मोहित खंडहरों को झूठा है।
यह है शानदार और थोपने वाली लक्ष्मी नरसिंह मूर्ति।
नरसिंह जिसका अर्थ है आधा पुरुष और आधा सिंह भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक है। इस एकाशिक संरचना, जो 6.7 मीटर ऊंचाई पर है, भगवान ने 7 सिर वाले सांप आदिशेषा के कुंडल पर क्रॉस-पैर वाली स्थिति में बैठे हैं।
मूल रूप से मूर्ति में देवी लक्ष्मी भी भगवान की गोद में विराजमान थी, लेकिन आक्रमणकारियों द्वारा इसे तोड़-फोड़ और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।
कमलापुरा म्यूजियम में अब मां लक्ष्मी की प्रतिमा देखी जा सकती है।🚩🚩
*राजकुमार हिन्दू*🙏🏻🙋🏻♂️
यह है शानदार और थोपने वाली लक्ष्मी नरसिंह मूर्ति।
नरसिंह जिसका अर्थ है आधा पुरुष और आधा सिंह भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक है। इस एकाशिक संरचना, जो 6.7 मीटर ऊंचाई पर है, भगवान ने 7 सिर वाले सांप आदिशेषा के कुंडल पर क्रॉस-पैर वाली स्थिति में बैठे हैं।
मूल रूप से मूर्ति में देवी लक्ष्मी भी भगवान की गोद में विराजमान थी, लेकिन आक्रमणकारियों द्वारा इसे तोड़-फोड़ और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।
कमलापुरा म्यूजियम में अब मां लक्ष्मी की प्रतिमा देखी जा सकती है।🚩🚩
*राजकुमार हिन्दू*🙏🏻🙋🏻♂️
#8_मार्च
#महान_विट्ठलभक्त_सन्त_तुकाराम_जन्म_दिवस
भारत के महान् सन्तों में सन्त तुकाराम का विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म 8 मार्च, 1608 को पुणे में हुआ था। उनके पिता श्री वोल्होबा तथा माता कनकाई बहुत सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति थे। अतः तुकाराम को बालपन से ही विट्ठल भक्ति संस्कारों में प्राप्त हुई।
उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। फिर भी सन्तोषी स्वभाव के तुकाराम कभी विचलित नहीं हुए। आगे चलकर उनके माता-पिता और फिर पत्नी तथा पुत्र की भी मृत्यु हो गयी; पर तुकाराम ने प्रभु भक्ति से मुँह नहीं मोड़ा।
तुकाराम स्वभाव से ही विरक्त प्रवृत्ति के थे। वे प्रायः भामगिरी तथा भण्डार की पहाडि़यों पर जाकर एकान्त में बैठ जाते थे। वे वहाँ ज्ञानेश्वरी तथा एकनाथी भागवत का अध्ययन भी करते थे। कीर्तन तथा सत्संग में उनका बहुत मन लगता था। जब वे नौ वर्ष के ही थे, तब उन्हें स्वप्न में एक तेजस्वी सन्त ने दर्शन देकर ‘रामकृष्ण हरि’ मन्त्र का उपदेश दिया। इससे उनका जीवन बदल गया और वे दिन-रात प्रभु के ध्यान में डूबे रहने लगे।
एक बार प्रसिद्ध सन्त नामदेव ने तुकाराम जी को स्वप्न में दर्शन देकर भजन लिखने को कहा। इससे पूर्व तुकाराम ने कभी कविता नहीं की थी; पर सन्त नामदेव के आशीर्वाद से उनके मन में काव्यधारा फूट पड़ी। उन्होंने जो रचनाएँ कीं, उन्हें ‘अभंग’ कहा जाता है। ऐसे लगभग 6,000 अभंगों की रचना उन्होंने की। इससे उनकी कीर्ति चारों और फैल गयी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन के लिए आने लगे। उनके आश्रम में हर दिन मेला लगने लगा।
उनकी इस प्रसिद्धि से रामेश्वर भट्ट तथा मुम्बाजी जैसे कुछ लोग जलने लगे। वे तुकाराम को शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करने लगे। एक बार तो उनके अभंग संग्रह को ही उन्होंने इन्द्रायणी नदी में डुबो दिया। तुकाराम को इससे अपार कष्ट हुआ। वे मन्दिर में भगवान् की मूर्ति के सम्मुख बैठ गये। उन्होंने निश्चय कर लिया कि जब तक उनकी बहियाँ वापस नहीं मिल जातीं, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।
लेकिन 13 दिन ऐसे ही बीत गये। इस पर तुकाराम ने भावावेश में आकर भगवान को बहुत उलाहना दिया। उन्होंने कहा कि हे नाथ, आप तो मूत्र्ति के पीछे छिपे हो और यहाँ मैं भूखा-प्यासा बैठा हूँ। अब भी यदि आपने मेरी इच्छा पूरी नहीं की, तो मैं आत्महत्या कर लूँगा और इसका पूरा दोष आपका ही होगा।
ऐसा कहते हैं कि भगवान् ने उसी समय युवक वेश में प्रकट होकर सन्त तुकाराम की सभी पुस्तकें सुरक्षित लौटा दीं। यह देखकर उन सबकी आँखें खुल गयीं, जो उन्हें परेशान कर रहे थे। अब वे भी तुकाराम जी की शरण में आ गये और उनके भक्त बन गये।
ऐसा कहते हैं कि एक बार शिवाजी महाराज सन्त तुकाराम के पास बैठे थे कि मुगलों ने उनके आश्रम को घेर लिया। तुकाराम की प्रार्थना पर वहाँ शंकर भगवान् प्रकट हुए और वे शिवाजी का छद्म रूप लेकर एक ओर भागने लगे। इस पर मुगल सैनिक उनके पीछे दौड़ पड़े और असली शिवाजी को कुछ नहीं हुआ। इससे प्रभावित होकर शिवाजी ने सन्त तुकाराम को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं; पर तुकाराम जी ने उन्हें यह कहकर लेने से मना कर दिया कि मेरे लिए सोना और मिट्टी बराबर है।
अपने अभंगों द्वारा भगवद्भक्ति का सन्देश बाँटते हुए सन्त तुकाराम 1650 ई. में सदा-सदा के लिए विट्ठल के धाम को चले गये।
#महान_विट्ठलभक्त_सन्त_तुकाराम_जन्म_दिवस
भारत के महान् सन्तों में सन्त तुकाराम का विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म 8 मार्च, 1608 को पुणे में हुआ था। उनके पिता श्री वोल्होबा तथा माता कनकाई बहुत सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति थे। अतः तुकाराम को बालपन से ही विट्ठल भक्ति संस्कारों में प्राप्त हुई।
उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। फिर भी सन्तोषी स्वभाव के तुकाराम कभी विचलित नहीं हुए। आगे चलकर उनके माता-पिता और फिर पत्नी तथा पुत्र की भी मृत्यु हो गयी; पर तुकाराम ने प्रभु भक्ति से मुँह नहीं मोड़ा।
तुकाराम स्वभाव से ही विरक्त प्रवृत्ति के थे। वे प्रायः भामगिरी तथा भण्डार की पहाडि़यों पर जाकर एकान्त में बैठ जाते थे। वे वहाँ ज्ञानेश्वरी तथा एकनाथी भागवत का अध्ययन भी करते थे। कीर्तन तथा सत्संग में उनका बहुत मन लगता था। जब वे नौ वर्ष के ही थे, तब उन्हें स्वप्न में एक तेजस्वी सन्त ने दर्शन देकर ‘रामकृष्ण हरि’ मन्त्र का उपदेश दिया। इससे उनका जीवन बदल गया और वे दिन-रात प्रभु के ध्यान में डूबे रहने लगे।
एक बार प्रसिद्ध सन्त नामदेव ने तुकाराम जी को स्वप्न में दर्शन देकर भजन लिखने को कहा। इससे पूर्व तुकाराम ने कभी कविता नहीं की थी; पर सन्त नामदेव के आशीर्वाद से उनके मन में काव्यधारा फूट पड़ी। उन्होंने जो रचनाएँ कीं, उन्हें ‘अभंग’ कहा जाता है। ऐसे लगभग 6,000 अभंगों की रचना उन्होंने की। इससे उनकी कीर्ति चारों और फैल गयी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन के लिए आने लगे। उनके आश्रम में हर दिन मेला लगने लगा।
उनकी इस प्रसिद्धि से रामेश्वर भट्ट तथा मुम्बाजी जैसे कुछ लोग जलने लगे। वे तुकाराम को शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करने लगे। एक बार तो उनके अभंग संग्रह को ही उन्होंने इन्द्रायणी नदी में डुबो दिया। तुकाराम को इससे अपार कष्ट हुआ। वे मन्दिर में भगवान् की मूर्ति के सम्मुख बैठ गये। उन्होंने निश्चय कर लिया कि जब तक उनकी बहियाँ वापस नहीं मिल जातीं, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।
लेकिन 13 दिन ऐसे ही बीत गये। इस पर तुकाराम ने भावावेश में आकर भगवान को बहुत उलाहना दिया। उन्होंने कहा कि हे नाथ, आप तो मूत्र्ति के पीछे छिपे हो और यहाँ मैं भूखा-प्यासा बैठा हूँ। अब भी यदि आपने मेरी इच्छा पूरी नहीं की, तो मैं आत्महत्या कर लूँगा और इसका पूरा दोष आपका ही होगा।
ऐसा कहते हैं कि भगवान् ने उसी समय युवक वेश में प्रकट होकर सन्त तुकाराम की सभी पुस्तकें सुरक्षित लौटा दीं। यह देखकर उन सबकी आँखें खुल गयीं, जो उन्हें परेशान कर रहे थे। अब वे भी तुकाराम जी की शरण में आ गये और उनके भक्त बन गये।
ऐसा कहते हैं कि एक बार शिवाजी महाराज सन्त तुकाराम के पास बैठे थे कि मुगलों ने उनके आश्रम को घेर लिया। तुकाराम की प्रार्थना पर वहाँ शंकर भगवान् प्रकट हुए और वे शिवाजी का छद्म रूप लेकर एक ओर भागने लगे। इस पर मुगल सैनिक उनके पीछे दौड़ पड़े और असली शिवाजी को कुछ नहीं हुआ। इससे प्रभावित होकर शिवाजी ने सन्त तुकाराम को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं; पर तुकाराम जी ने उन्हें यह कहकर लेने से मना कर दिया कि मेरे लिए सोना और मिट्टी बराबर है।
अपने अभंगों द्वारा भगवद्भक्ति का सन्देश बाँटते हुए सन्त तुकाराम 1650 ई. में सदा-सदा के लिए विट्ठल के धाम को चले गये।
37 मीटर ऊंचा विजय स्तंभ, या विक्ट्री टॉवर, राजस्थान में चित्तौड़गढ़ किले की आकाशवाणी पर हावी है। भगवान विष्णु को समर्पित, इसका निर्माण 1448 में मालवा और गुजरात के सुल्तानों पर राणा कुम्भा की जीत को याद करने के लिए किया गया था।💪🏻🚩
*राजकुमार हिन्दू🙏💐
*राजकुमार हिन्दू🙏💐
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पर्वथमलाई पहाड़ी के ऊपर यह बहुत शक्तिशाली शिव मंदिर है। अन्य लोकों के देव और आध्यात्मिक प्राणी हर रात यहां पूजा करते हैं। शिव आराधना के लिए अनेक सिद्धों द्वारा भ्रमण किया गया स्थान है। पौर्णमी पूर्णिमा के दौरान यह पहाड़ी भक्तों को बहुत आकर्षित करती है। यह एक ऐसी जगह है जिसमें बहुत सारी आध्यात्मिक शक्ति है।🌹🌹🔱🔱💐🚩
*राजकुमार हिन्दू*🙏💐🔱
पर्वथमलाई पहाड़ी के ऊपर यह बहुत शक्तिशाली शिव मंदिर है। अन्य लोकों के देव और आध्यात्मिक प्राणी हर रात यहां पूजा करते हैं। शिव आराधना के लिए अनेक सिद्धों द्वारा भ्रमण किया गया स्थान है। पौर्णमी पूर्णिमा के दौरान यह पहाड़ी भक्तों को बहुत आकर्षित करती है। यह एक ऐसी जगह है जिसमें बहुत सारी आध्यात्मिक शक्ति है।🌹🌹🔱🔱💐🚩
*राजकुमार हिन्दू*🙏💐🔱
Forwarded from ब्रजदास
जय गौर हरि
*होरी में लाज न कर गोरी ,होरी में।*
हम व्रज के रसिया तुम गोरी ,
भली बनी है यह जोरी ।।
जो हम सों सुधे नहिं खेलो,
यार करेगे बरजोरी।।
"नारायण " अब निकसो द्वार पै,
छुटौ नहिं बनि कै भोरी।
🧭 02:43
स्वर: परम् वैश्नव अंजुना जी
*होरी में लाज न कर गोरी ,होरी में।*
हम व्रज के रसिया तुम गोरी ,
भली बनी है यह जोरी ।।
जो हम सों सुधे नहिं खेलो,
यार करेगे बरजोरी।।
"नारायण " अब निकसो द्वार पै,
छुटौ नहिं बनि कै भोरी।
🧭 02:43
स्वर: परम् वैश्नव अंजुना जी
🚩शंखेश्वर जैन मंदिर भारत के पाटन जिले के शंखेश्वर शहर के केंद्र में स्थित है। मंदिर पार्श्वनाथ को समर्पित है और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए तीर्थयात्रा का एक महत्वपूर्ण स्थान है।🚩🚩