ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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*#पवनेश्वर_महादेव #काशीखण्ड

#वायु_देव_द्वारा_स्थापित

पुरा कश्यपदायादः पुतात्मेति च विश्रुतः।
धुर्जटे राजधान्यां स चचार विपुलं तपः।।
वाराणस्यां माहाभागो वर्षाणांयुतं शतं ।
स्थापयित्वा महालिङ्गं पावनं पवनेश्वरम् ।।
यस्य दर्शनमात्रेन पूतात्मा जायते नरः ।
पापकञ्चुकमूत्सृज्य स वसेत् पावने पुरे ।।
(#काशीखण्ड)

पूर्वकाल में कश्यप ऋषि के पुत्र जो कि पूतात्मा नाम से प्रसिद्द थे , उन महाभाग ने शिव की राजधानी वाराणसी पूरी में अत्यंत पावन लिंग स्थापित कर के दस लाख वर्ष कर कठिन तपस्या किया जिससे उस पवन लिंग का नाम पवनेश्वर हुआ ।
इस शिव लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य पूतात्मा हो जाता है और अंत मे पाप कुंचक को छोड़कर पवनपुर में निवास करता है ।

पूतात्मा (पवनदेव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर शिव जी उन्ही के द्वारा स्थापित लिंग से ज्योति रूप में प्रकट होकर पवन को (वायु देव) को बिना कुछ मांगे ही अनेको वरदान दिए जिसमे उन्होंने
अपनी अष्ट मूर्ति के अंतर्गत वायव्यकोण का दिगपाल का पद दिया(पुराणानुसार दसों दिशाओं के पालन करने वाले देवताओं में से एक) । और साथ ही सर्वत्र गामी , सर्वत्र तत्वों के ज्ञाता एवं सब किसी के आयुष्यरूप होने का वरदान दिया।

और कहा कि

तव लिङ्गमिदं दिव्यं ये द्रक्ष्यन्तिह मानवाः।
सर्व भोगसमृधास्ते त्वल्लोक सुखभागिनः ।।
(#काशीखण्ड)

जो लोग तुम्हारे द्वारा स्थापित इस दिव्य लिंग का दर्शन करेंगे , वे सब यहां समस्त भोगों से परिपूर्ण होकर अंत मे तुम्हारे लोक के सुखभागी होंगे ।

और साथ ही

जो मनुष्य , जन्मभर में एक बार भी पवनेश्वर लिंग का सुगंधित जल से स्नान एवं सुगंधित चंदन पुष्पादि के द्वारा यथोक्त विधि से पूजन कर लेता है , वह मेरे लोक में ससम्मान सहित निवास करता है । ज्येष्ठेश्वर के पश्चिम भाग में और वायुकुण्ड के उत्तर दिशा में पवनेश्वर लिंग की आराधना करने से तत्काल ही पवित्र होजाता है । इतना कह कर शिव जी इसी पवनेश्वर लिंग में समाहित होगये ।

पहले यहां पवन देव (वायुदेव) द्वारा बनाया गया वायु कुंड भी था जो अब लुप्त हो चुका है । यह लिंग अत्यंत ही प्राचीन और जमीन के 20 " फ़ीट नीचे है ।

#वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।

पता - भूत भैरव गली , करनघन्टा , वाराणासी ।*
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹🌸🌸🌸#कैलाश पर्वत 🌸🌸🌸

#कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया है?
हर हर महादेव .....
हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है, लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर है। यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था, क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है।

कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर शिव जी निवास करते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता। मरने के बाद या वह जिसने कभी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश फतह कर सकता है।

ऐसा भी माना जाता है कि कैलाश पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। चूंकि बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है, इसीलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया।

सन 1999 में रूस के वैज्ञानिकों की टीम एक महीने तक माउंट कैलाश के नीचे रही और इसके आकार के बारे में शोध करती रही। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पहाड़ की तिकोने आकार की चोटी प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक पिरामिड है जो बर्फ से ढका रहता है। माउंट कैलाश को "शिव पिरामिड" के नाम से भी जाना जाता है।

जो भी इस पहाड़ को चढ़ने निकला, या तो मारा गया, या बिना चढ़े वापिस लौट आया।

सन 2007 में रूसी पर्वतारोही सर्गे सिस्टिकोव ने अपनी टीम के साथ माउंट कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की। सर्गे ने अपना खुद का अनुभव बताते हुए कहा : 'कुछ दूर चढ़ने पर मेरी और पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा। फिर हमारे पैरों ने जवाब दे दिया। मेरे जबड़े की मांसपेशियाँ खिंचने लगी, और जीभ जम गयी। मुँह से आवाज़ निकलना बंद हो गयी। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं इस पर्वत पर चढ़ने लायक नहीं हूँ। मैं फ़ौरन मुड़ कर उतरने लगा, तब जाकर मुझे आराम मिला।

"कर्नल विल्सन ने भी कैलाश चढ़ने की कोशिश की थी। बताते हैं : "जैसे ही मुझे शिखर तक पहुँचने का थोड़ा-बहुत रास्ता दिखता, कि बर्फ़बारी शुरू हो जाती। और हर बार मुझे बेस कैम्प लौटना पड़ता। "चीनी सरकार ने फिर कुछ पर्वतारोहियों को कैलाश पर चढ़ने को कहा। मगर इस बार पूरी दुनिया ने चीन की इन हरकतों का इतना विरोध किया कि हार कर चीनी सरकार को इस पहाड़ पर चढ़ने से रोक लगानी पड़ी।कहते हैं जो भी इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, वो आगे नहीं चढ़ पाता, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।यहाँ की हवा में कुछ अलग बात है। आपके बाल और नाखून 2 दिन में ही इतने बढ़ जाते हैं, जितने 2 हफ्ते में बढ़ने चाहिए। शरीर मुरझाने लगता है। चेहरे पर बुढ़ापा दिखने लगता है। कैलाश पर चढ़ना कोई खेल नहीं

29,000 फ़ीट ऊँचा होने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़ना तकनीकी रूप से आसान है। मगर कैलाश पर्वत पर चढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। चारों ओर खड़ी चट्टानों और हिमखंडों से बने कैलाश पर्वत तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं है। ऐसी मुश्किल चट्टानें चढ़ने में बड़े-से-बड़ा पर्वतारोही भी घुटने टेक दे।हर साल लाखों लोग कैलाश पर्वत के चारों ओर परिक्रमा लगाने आते हैं। रास्ते में मानसरोवर झील के दर्शन भी करते हैं।लेकिन एक बात आज तक रहस्य बनी हुई है। अगर ये पहाड़ इतना जाना जाता है तो आज तक इस पर कोई चढ़ाई क्यों नहीं कर पाया।

🚩हर हर महादेव 🙏🏼

*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
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कोरंगनाथ स्वामी मंदिर, तमिलनाडु 🚩
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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🌹अकबर का छत्र, मां ज्वाला ज़ी ने तोड़ा था मुगल सम्राट अकबर का अहंकार.. 🚩

मुग़ल सम्राट अकबर ने मां ज्वाला जी की दिव्य ज्योतियों को बुझाने के लाख जतन कर लिए थे यहां तक कि पानी की नहर ज्योति के ऊपर गिरा दी थी, ज्वाला पानी की लहर को चीरती हुई प्रज्वलित हुई। अकबर अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। तत्पश्चात वो मां ज्वाला जी की अपार महिमा और शक्ति को पहचान गया। और मां को सवा मन (पचास किलो) सोने का छत्र भेंट स्वरूप देना चाहा, और घमंड में कहा संसार में तेरा सबसे बड़ा भक्त मैं हूं। मां ने वो छत्र कबूल नहीं किया और वो जमीन में गिरते ही किसी अन्य धातु में परिवर्तित हो गया, वैज्ञानिक इस छत्र की प्रयोगशाला में जांच कर चुके हैं जो किसी भी धातु से मेल नहीं खाता है जो आज़ भी मां ज्वाला जी मंदिर कांगड़ा में है।

🌹जय मां ज्वाला जी 🙏🚩

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माँ तारातारिणी शक्तिपीठ, ओडिशा 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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🌹#Our_Temple_our_pride🙏🚩
#abovethesevenwonders🚩

दुनिया सिर्फ 7 अजूबों की गिनती करती है !!

लेकिन भारत में तो हज़ारों अजूबे हैं...

क्या आप इस मंदिर को जानते थे?

स्थानीय लोग इस मंदिर को 'कोणसीमा अयोध्या' कहते हैं।

इसके ऊंचे उभरते हुए अद्वितीय गोपुरम और शिखर में संपूर्ण रामायण की नक्काशी है।
श्री कोंडांडा राम स्वामी मंदिर, गोलाला ममीदादा, पेद्दापुडी मंडल, आंध्र प्रदेश।
🙏🔱🚩जय श्रीराम 🚩🔱🙏

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🌹ये कौन से शातिर इतिहासकार थे जो ऐसे मंदिरो को हमसे छुपाए रखे और इनकी अद्भुत रचना का बखान कही नही किये हजारो साल पहले बिना किसी तकनीक के कैसे बने होंगे ये डिजाईन।

कितना उन्नत और विकसित थी हमारी सनातन की इंजीनियरिंग बाबा बडोह मंदिर,कांगड़ा,हिमाचल प्रदेश से!🙏

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Forwarded from The Narrative
स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी, भाग्यनगर

स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी का उद्घाटन, रामानुजाचार्य जी की 1000 वीं जयंती सहस्राब्दी समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 5 फरवरी 2022 को किया।

स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी 11वीं सदी के भक्ति शाखा के संत श्री रामानुजाचार्य की स्मृति में है। रामानुजाचार्य एक हिंदू धर्मशास्त्री, भारतीय दार्शनिक, समाज सुधारक और श्री वैष्णववाद परंपरा के एक महान प्रतिपादक थे।

यह मूर्ति ‘पंचलोहा’ से बनी है, जो पांच धातुओं, सोना, चांदी, तांबा, जस्ता और पीतल का एक संयोजन है। यह दुनिया भर में बैठने की स्थिति में सबसे ऊंची धातु की मूर्तियों में से एक है।

इसे ‘भद्र वेदी’ नाम के 54 फुट ऊंचे आधार भवन पर स्थापित किया गया है।

इसमें एक वैदिक डिजिटल लाइब्रेरी और अनुसंधान केंद्र है, जिसमें प्राचीन भारतीय ग्रंथ, एक थिएटर, एक शैक्षिक गैलरी और श्री रामानुज आचार्य के कई कार्यो का विवरण देने वाला बहु-भाषा ऑडियो टूर है.

मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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🌹विदेशी कहते है, की अंग्रेजो के भारत मे आने से पहले सुई भी नही बनती थी ।।

अब आप देखें, महाराष्ट्र के पुणे में स्तिथ #लेण्याद्री_गुफा ।। इस गुफा में एक भव्य गणेशजी का मंदिर भी है ।। पूरी गुफा, गुफा में पिल्लर अलग अलग मंदिर, सब कुछ एक ही चट्टान को काटकर बने है ।।। ऐसा भव्य और विराट निर्माण क्या बिना उन्नत तकनीक के हो सकता है ??

भारत मे मिलने वाली सभी प्राचीन गुफाओं की आयु 1000- 1500 वर्ष तक आंकी जाती है, जबकि इसी तर्ज पर बनी जॉर्डन पेट्रा तुर्की आदि की गुफाओं की आयु 5000 वर्ष से भी अधिक बताया जाता है । यह एक तरह की एतिहासिक धांधली ही है ।। हमारा निजी मत तो यही है, की यह सभी गुफाएं महाभारतकालीन है ।। उसी कालखंड में विश्व की सभी महान गुफाओं का निर्माण हुआ होगा, महाभारत युद्ध के पश्चात द्वापरकाल की वैज्ञानिक उन्नति का तो चूर्ण बन गया, लेकिन उस वैज्ञानिक उन्नति की निशानियां इन गुफाओं के रुप में आज भी हमारे साथ है ।।

लेण्याद्री गुफाएं ।
पुणे -
जुन्नर तालुका के निकट

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🌹मध्यप्रदेश के पद्मावती पवाया मंदिर गुप्तकालीन ( सन 300 AD) की दीवार में बनी इन सुंदर कलाकृतियों को देखिए....
कहा जाता है कि 'तबला’ हज़ारों साल पुराना 'सनातनी वाद्ययंत्र' है,
परन्तु कुछ ‘विशिष्ट श्रेणी के इतिहासकारों' ने उसे 13वीं शताब्दी के कवि “अमीर खुसरो” की खोज बता दी!

इन् कलाकृतियों में आपको तबला, वीणा, डफली आदि कई वाद्य यंत्र अंकित मिलेंगे।
सोचिये की हमारी कला, संस्कृति, हमारी खोज, हमारी पहचान को किस किस तरह से छीनने की कोशिश की गयी!!

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🌹#आपको_ताजमहल_अजूबा_लगता_है,तो यह पढ़िए बारिश की पूर्व सूचना देता है कानपुर का जगन्नाथ मंदिर ।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं किसी ऐसे भवन की जिसकी छत चिलचिलाती धूप में टपकने लगे बारिश की शुरुआत होते ही जिसकी छत से पानी टपकना बंद हो जाए

ये घटना है तो हैरान कर देने वाली लेकिन सच है उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कहे जाने वाले कानपुर जनपद के भीतरगांव विकास खंड से ठीक तीन किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है बेहटा

यहीं पर है धूप में छत से पानी की बूंदों के टपकने और बारिश में छत के रिसाव के बंद होने का रहस्य

यह घटनाक्रम किसी आम ईमारत या भवन में नहीं बल्कि यह होता है भगवान जगन्नाथ के अति प्राचीन मंदिर में
छत टपकने से हो जाती है बारिश की आहट -

ग्रामीण बताते हैं कि बारिश होने के छह-सात दिन पहले मंदिर की छत से पानी की बूंदे टपकने लगती हैं इतना ही नहीं जिस आकार की बूंदे टपकती हैं उसी आधार पर बारिश होती है

अब तो लोग मंदिर की छत टपकने के संदेश को समझकर जमीनों को जोतने के लिए निकल पड़ते हैं हैरानी में डालने वाली बात यह भी है कि जैसे ही बारिश शुरु होती है छत अंदर से पूरी तरह सूख जाती है

वैज्ञानिक भी नहीं जान पाए रहस्य -
मंदिर की प्राचीनता व छत टपकने के रहस्य के बारे में मंदिर के पुजारी बताते हैं कि पुरातत्व विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक कई दफा आए लेकिन इसके रहस्य को नहीं जान पाए हैं अभी तक बस इतना पता चल पाया है कि मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य 11वीं सदी में किया गया

मंदिर की बनावट बौद्ध मठ की तरह है। इसकी दिवारें 14 फीट मोटी हैं जिससे इसके सम्राट अशोक के शासन काल में बनाए जाने के अनुमान लगाए जा रहे हैं वहीं मंदिर के बाहर मोर का निशान व चक्र बने होने से चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के कार्यकाल में बने होने के कयास भी लगाए जाते हैं लेकिन इसके निर्माण का ठीक-ठीक अनुमान अभी नहीं लग पाया है

भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर अति प्राचीन है मंदिर में भगवान जगन्नाथ बलदाऊ व सुभद्रा की काले चिकने पत्थरों की मूर्तियां विराजमान हैं प्रांगण में सूर्यदेव और पद्मनाभम की मूर्तियां भी हैं जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी स्थानीय लोगों द्वारा भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है लोगों की आस्था मंदिर के साथ गहरे से जुड़ी है लोग दर्शन करने के लिए आते रहते हैं ।
( साभार )

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