#महाभारत_काल_के_महा_युद्ध_में_वीर_शिरोमणि_महानायक_महायोद्धा_बर्बरीक_का_साक्ष्य_आज_भी_मौजूद_हैं
हरियाणा के हिसार ( वीर बरबरान ) मे एक पीपल का पेड़ है जिसको वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर अपने वाणों से छेदन किया था ! आज भी इन पत्तो में छेद है ! सबसे बड़ी बात ये है की जब इस पेड़ में नए पत्ते निकलते है तो उनमे भी छेद होता है ! सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है !
यह पीपल का पेड़ महाभारत काल की घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण है और जो लोग रामायण और महाभारत जैसी घटनाओं को काल्पनिक करार देते है एवं यह कहते है कि इन घटनाओं को मानने वाले लोग काल्पनिक दुनिया में जीते हैं, उन लोगों के लिए यह किसी जोरदार तमाचे से कम नहीं होगा !
जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा ! उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्ध में पाण्डवों के साथ थे ! जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी !
ऐसे समय में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया कि युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा ! इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे ! परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये !
श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि वह तीन बाणों से भला क्या युद्घ लड़ेगा ? कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा ! इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि तुम एक बाण से युद्ध का परिणाम बदल सकते हो !
इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया ! जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया ! इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था !
भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्ध में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी ! इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की !
जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया ! तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया ! जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा तब श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं !
सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है तथा, महाभारत युद्ध को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है ! भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा !
ये सारी घटना आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं ! अब ये जाहिर सी बात है कि इस जगह का नाम वीर बरबरान वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है !
राधे राधे गोविन्द गोविन्द राधे 🌹
जय श्री कृष्णा जय श्री राधे 🌹
श्री राधे गोविन्दाय नमः🌹
श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे 🌹
श्रीराधे राधा नाम सदा सुख दायी🌹
💯 % भिखारी श्रीराधे नाम का🌹
चौधरी परिवार श्रीराधे श्रीराधे🌹
श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे राधा🌹
नाम सदा सुख दायी🌹🙏❤🙏🌹
हरियाणा के हिसार ( वीर बरबरान ) मे एक पीपल का पेड़ है जिसको वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर अपने वाणों से छेदन किया था ! आज भी इन पत्तो में छेद है ! सबसे बड़ी बात ये है की जब इस पेड़ में नए पत्ते निकलते है तो उनमे भी छेद होता है ! सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है !
यह पीपल का पेड़ महाभारत काल की घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण है और जो लोग रामायण और महाभारत जैसी घटनाओं को काल्पनिक करार देते है एवं यह कहते है कि इन घटनाओं को मानने वाले लोग काल्पनिक दुनिया में जीते हैं, उन लोगों के लिए यह किसी जोरदार तमाचे से कम नहीं होगा !
जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा ! उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्ध में पाण्डवों के साथ थे ! जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी !
ऐसे समय में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया कि युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा ! इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे ! परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये !
श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि वह तीन बाणों से भला क्या युद्घ लड़ेगा ? कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा ! इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि तुम एक बाण से युद्ध का परिणाम बदल सकते हो !
इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया ! जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया ! इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था !
भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्ध में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी ! इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की !
जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया ! तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया ! जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा तब श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं !
सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है तथा, महाभारत युद्ध को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है ! भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा !
ये सारी घटना आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं ! अब ये जाहिर सी बात है कि इस जगह का नाम वीर बरबरान वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है !
राधे राधे गोविन्द गोविन्द राधे 🌹
जय श्री कृष्णा जय श्री राधे 🌹
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श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे 🌹
श्रीराधे राधा नाम सदा सुख दायी🌹
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श्रीराधे श्रीराधे श्रीराधे राधा🌹
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एक पत्थर से खुदी हुई आश्चर्यजनक विशाल पत्थर की श्रृंखला है। यह पूर्णतया एक ही पाषाण से बनी एक उत्कृष्ट कृति है जिसमें छल्ले एक दूसरे में इस तरह पिरोए है जैसे मोतियों की माला हो। क्या यह संभव है बिना किसी आधुनिक मशीन के बिना? वर्ध्रजा पेरुमल मंदिर, कांचीपुरम।
एक पत्थर से खुदी हुई आश्चर्यजनक विशाल पत्थर की श्रृंखला है। यह पूर्णतया एक ही पाषाण से बनी एक उत्कृष्ट कृति है जिसमें छल्ले एक दूसरे में इस तरह पिरोए है जैसे मोतियों की माला हो। क्या यह संभव है बिना किसी आधुनिक मशीन के बिना? वर्ध्रजा पेरुमल मंदिर, कांचीपुरम।
कैसे मान लें कि #सात_अजूबे ही बेमिसाल हैं
हमारे यहाँ तो #महा_अजूबे होते हैं और वो भी दो चार या सात नहीं हजारों
क्या कोई भी #शिल्पकार इस सदी में इस तरह का निर्माण कर सकता है जो कि सबसे कठोर पत्थरों में से एक ग्रेनाइट पर किया गया है ।
ये 1800 साल से अधिक पुराना जम्बुकेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है।
(जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु)👇👇👇
हमारे यहाँ तो #महा_अजूबे होते हैं और वो भी दो चार या सात नहीं हजारों
क्या कोई भी #शिल्पकार इस सदी में इस तरह का निर्माण कर सकता है जो कि सबसे कठोर पत्थरों में से एक ग्रेनाइट पर किया गया है ।
ये 1800 साल से अधिक पुराना जम्बुकेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है।
(जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु)👇👇👇
#जलमहल, जयपुर, राजस्थान, भारत 🇮🇳
चलिए आज हम आपको इसी शानदार जलीय स्मारक के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्यों से रूबरू कराते हैं।
1. जल महल का निर्माण राजपूत वास्तुकला शैलियों को मिला कर किया गया था। यह पूरी रचना लाल बलुई पत्थर से बनी है।
2. भारत के अन्य जलीय महल की तरह जल महल किसी द्वीप पर नहीं बना है।
3. इस ईमारत के पाँच में से चार मंज़िलें झील के पानी में जल मग्न हैं। सिर्फ 1 मँज़िल ही पानी के ऊपर नज़र आता है।
4. माना जाता है कि जल महल का निर्माण सूखे के समय हुआ था। इसलिए इस महल का निर्माण सामान्य स्थिति में हुआ था। जब यह पहली बार बनकर तैयार हुआ था तब इस पूरी रचना को साफ़ देखा जा सकता था।
5. यह थोड़े अचम्भे की बात है, पर महल के अंदर किसी भी कोने से पानी का रिसाव नहीं होता। महल का निर्माण काफी मज़बूत पत्थरों से और इसकी दीवारों को काफी मोटा बनाया गया है जिससे कि इसके अंदर पानी का रिसाव न हो।
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चलिए आज हम आपको इसी शानदार जलीय स्मारक के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्यों से रूबरू कराते हैं।
1. जल महल का निर्माण राजपूत वास्तुकला शैलियों को मिला कर किया गया था। यह पूरी रचना लाल बलुई पत्थर से बनी है।
2. भारत के अन्य जलीय महल की तरह जल महल किसी द्वीप पर नहीं बना है।
3. इस ईमारत के पाँच में से चार मंज़िलें झील के पानी में जल मग्न हैं। सिर्फ 1 मँज़िल ही पानी के ऊपर नज़र आता है।
4. माना जाता है कि जल महल का निर्माण सूखे के समय हुआ था। इसलिए इस महल का निर्माण सामान्य स्थिति में हुआ था। जब यह पहली बार बनकर तैयार हुआ था तब इस पूरी रचना को साफ़ देखा जा सकता था।
5. यह थोड़े अचम्भे की बात है, पर महल के अंदर किसी भी कोने से पानी का रिसाव नहीं होता। महल का निर्माण काफी मज़बूत पत्थरों से और इसकी दीवारों को काफी मोटा बनाया गया है जिससे कि इसके अंदर पानी का रिसाव न हो।
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गोपाचल पर्वत, एक अद्धितीय ऐतिहासिक धरोहर:- गोपाचल पर्वत ग्वालियर में स्थित है। ग्वालियर का प्रसिद्ध किला भी इसी पर्वत पर स्थित है। इस पर्वत पर हजारों जैन मूर्तियां हैं जो ई. 1398-1536 के मध्य पर्वत को तराश कर बनाई गई हैं। विश्व की सबसे विशाल 42 फुट ऊंची पार्श्वनाथ भगवान की पद्मासन मूर्ति अपने अतिशय से पूर्ण है एवं जैन समाज के परम श्रद्धा का केंद्र है। पर्वत ओर 26 जिनालय और त्रिकाल चौबीसी एवं 2 जिनालय तलहटी में हैं। ऐसे गोपाचल पर्वत के दर्शन अद्धितीय हैं फिर भी इस धरोहर पर न तो जैन समाज का विशेष ध्यान गया है और न ही सरकार ने इसके मूल्य को समझा है।
*हिन्दू जागृति समिति*🚩✊🏻
*✍🏻क्रमांक संख्या०७✍🏻*
*भारत को जानो*
*भगवान शिव ने 26 चेहरे और 52 हाथ मंदिर के टॉवर सुचेन्द्रम तमिलनाडु पर*
सुचिंद्रम थानुमलयन मंदिर:
सुचिन्द्रम में कन्याकुमारी से 13 किलोमीटर की दूरी पर सुचिन्द्रम थुनामलयन मंदिर स्थित है। इसे स्टैनुमलयन मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें "स्तानू" भगवान शिव, "मल" और "अयन" भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करता है।
इस तरह के मंदिर
इसलिए शैव [भगवान शिव के अनुयायी] और वैष्णव [भगवान विष्णु के अनुयायी] दोनों के लिए इसका बहुत महत्व है। यह भारत के बहुत कम मंदिरों में से एक है जहाँ त्रिदेव [ब्रह्मा, विष्णु और शिव] की पूजा की जाती है। त्रिदेव की पूजा यहाँ एक विशाल लिंग के रूप में की जाती है। इसके 3 विभाग हैं, जिनमें सबसे ऊपर शिव, मध्य में विष्णु और क्रमशः लिंग के नीचे ब्रह्मा हैं। त्रिमूर्ति के अलावा, विग्नेश्वरी (विनायगा का एक स्त्री रूप), देवी अरम वालर्था नायक, इंद्र विनायगा, काल भैरव और साक्षी गणपति की भी यहां पूजा की जाती है।
सात मंजिला 134 फीट लंबा सफेद गोपुरम [मंदिर का टॉवर] विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं के साथ सामने की ओर नक्काशीदार है जो आगंतुकों के लिए एक वास्तुशिल्प उपचार प्रदान करता है। 17 वीं शताब्दी में निर्मित, पूरा मंदिर द्रविड़ कला का एक शानदार नमूना है। इसमें 4 एकड़ का क्षेत्र शामिल है। एक 22 फीट की हनुमान प्रतिमा कलात्मक रूप से एकल ग्रेनाइट ब्लॉक से बनी हुई है जो इसे भारत में अपने प्रकार का सबसे ऊँचा बना देती है। नंदी की एक 13 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी मूर्ति है, जो हनुमान प्रतिमा के विपरीत है, जो चूने और मोर्टार से बनी है। मंदिर की वास्तुकला की एक और खास बात यह है कि इसके 4 संगीतमय खंभे 18 फीट लंबे और मंदिर के प्रमुख आकर्षण में से एक है। इन स्तंभों की ख़ासियत यह है कि यह टैप करने पर विभिन्न संगीत नोटों की आवाज़ निकालते हैं। डांसिंग हॉल क्षेत्र में नक्काशीदार
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*✍🏻क्रमांक संख्या०७✍🏻*
*भारत को जानो*
*भगवान शिव ने 26 चेहरे और 52 हाथ मंदिर के टॉवर सुचेन्द्रम तमिलनाडु पर*
सुचिंद्रम थानुमलयन मंदिर:
सुचिन्द्रम में कन्याकुमारी से 13 किलोमीटर की दूरी पर सुचिन्द्रम थुनामलयन मंदिर स्थित है। इसे स्टैनुमलयन मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें "स्तानू" भगवान शिव, "मल" और "अयन" भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करता है।
इस तरह के मंदिर
इसलिए शैव [भगवान शिव के अनुयायी] और वैष्णव [भगवान विष्णु के अनुयायी] दोनों के लिए इसका बहुत महत्व है। यह भारत के बहुत कम मंदिरों में से एक है जहाँ त्रिदेव [ब्रह्मा, विष्णु और शिव] की पूजा की जाती है। त्रिदेव की पूजा यहाँ एक विशाल लिंग के रूप में की जाती है। इसके 3 विभाग हैं, जिनमें सबसे ऊपर शिव, मध्य में विष्णु और क्रमशः लिंग के नीचे ब्रह्मा हैं। त्रिमूर्ति के अलावा, विग्नेश्वरी (विनायगा का एक स्त्री रूप), देवी अरम वालर्था नायक, इंद्र विनायगा, काल भैरव और साक्षी गणपति की भी यहां पूजा की जाती है।
सात मंजिला 134 फीट लंबा सफेद गोपुरम [मंदिर का टॉवर] विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं के साथ सामने की ओर नक्काशीदार है जो आगंतुकों के लिए एक वास्तुशिल्प उपचार प्रदान करता है। 17 वीं शताब्दी में निर्मित, पूरा मंदिर द्रविड़ कला का एक शानदार नमूना है। इसमें 4 एकड़ का क्षेत्र शामिल है। एक 22 फीट की हनुमान प्रतिमा कलात्मक रूप से एकल ग्रेनाइट ब्लॉक से बनी हुई है जो इसे भारत में अपने प्रकार का सबसे ऊँचा बना देती है। नंदी की एक 13 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी मूर्ति है, जो हनुमान प्रतिमा के विपरीत है, जो चूने और मोर्टार से बनी है। मंदिर की वास्तुकला की एक और खास बात यह है कि इसके 4 संगीतमय खंभे 18 फीट लंबे और मंदिर के प्रमुख आकर्षण में से एक है। इन स्तंभों की ख़ासियत यह है कि यह टैप करने पर विभिन्न संगीत नोटों की आवाज़ निकालते हैं। डांसिंग हॉल क्षेत्र में नक्काशीदार
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12:00 बजने के स्थान पर आदित्य लिखा हुआ है जिसका अर्थ यह है कि सूर्य 12 प्रकार के होते हैं*
1:00 बजने के स्थान पर ब्रह्म लिखा हुआ है इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म एक ही प्रकार का होता है ।
🕉️एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति।
2:00 बजने की स्थान पर अश्विन और लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि अश्विनी कुमार दो हैं।
3:00 बजने के स्थान पर त्रिगुणः लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि गुण तीन प्रकार के हैं ---- सतोगुण रजोगुण तमोगुण।
4:00 बजने के स्थान पर चतुर्वेद लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं -- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद।
5:00 बजने के स्थान पर पंचप्राणा लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं ।
6:00 बजने के स्थान पर षड्र्स लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि रस 6 प्रकार के होते हैं ।
7:00 बजे के स्थान पर सप्तर्षि लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सप्त ऋषि 7 हुए हैं ।
8:00 बजने के स्थान पर अष्ट सिद्धियां लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सिद्धियां आठ प्रकार की होती है ।
9:00 बजने के स्थान पर नव द्रव्यणि अभियान लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि 9 प्रकार की निधियां होती हैं।
10:00 बजने के स्थान पर दश दिशः लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है।
11:00 बजने के स्थान पर रुद्रा लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि रुद्र 11 प्रकार के हुए हैं।
इति सिद्धम।
🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
1:00 बजने के स्थान पर ब्रह्म लिखा हुआ है इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म एक ही प्रकार का होता है ।
🕉️एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति।
2:00 बजने की स्थान पर अश्विन और लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि अश्विनी कुमार दो हैं।
3:00 बजने के स्थान पर त्रिगुणः लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि गुण तीन प्रकार के हैं ---- सतोगुण रजोगुण तमोगुण।
4:00 बजने के स्थान पर चतुर्वेद लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं -- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद।
5:00 बजने के स्थान पर पंचप्राणा लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं ।
6:00 बजने के स्थान पर षड्र्स लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि रस 6 प्रकार के होते हैं ।
7:00 बजे के स्थान पर सप्तर्षि लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सप्त ऋषि 7 हुए हैं ।
8:00 बजने के स्थान पर अष्ट सिद्धियां लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि सिद्धियां आठ प्रकार की होती है ।
9:00 बजने के स्थान पर नव द्रव्यणि अभियान लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि 9 प्रकार की निधियां होती हैं।
10:00 बजने के स्थान पर दश दिशः लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है।
11:00 बजने के स्थान पर रुद्रा लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि रुद्र 11 प्रकार के हुए हैं।
इति सिद्धम।
🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏