धर्मराजेश्वर मंदिर
यह गुफा मंदिर मंदसौर जिले की गरोठ तहसील में स्थित है। मध्य प्रदेश, भारत
धर्मराजेश्वर गुफा मंदिर एक अखंड मंदिर है जो आकार में 50 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और गहराई 9 मीटर की ठोस प्राकृतिक चट्टान से उकेरी गई है। यहां एक मुख्य मंदिर है मंदिर में एक बड़ा शिवलिंग है।
इसे लोग लिटिल केलासा भी बोलते हैं
क्योंकि यह देखने पर आपको एलोरा में स्थित कैलाश मंदिर की तरह ही दिखाई पड़ता है
इसी शैली के अंदर उड़ीसा के अंदर लिंगराज मंदिर है इसी शैली में महाराष्ट्र में एलोरा स्थित कैलाश मंदिर है
भारत में इसी शैली में कुछ और मंदिर है जो अलग-अलग शासनकाल में बने हुए हैं
भारत में पहाड़ों को काटकर मंदिर बनाने की कला हजारों साल पूर्व से है
मंदिर में अद्भुत शिल्प कला आपको दिखाई पड़ती है जो इसे और भी सुंदर बनाती हैं
यह गुफा मंदिर मंदसौर जिले की गरोठ तहसील में स्थित है। मध्य प्रदेश, भारत
धर्मराजेश्वर गुफा मंदिर एक अखंड मंदिर है जो आकार में 50 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और गहराई 9 मीटर की ठोस प्राकृतिक चट्टान से उकेरी गई है। यहां एक मुख्य मंदिर है मंदिर में एक बड़ा शिवलिंग है।
इसे लोग लिटिल केलासा भी बोलते हैं
क्योंकि यह देखने पर आपको एलोरा में स्थित कैलाश मंदिर की तरह ही दिखाई पड़ता है
इसी शैली के अंदर उड़ीसा के अंदर लिंगराज मंदिर है इसी शैली में महाराष्ट्र में एलोरा स्थित कैलाश मंदिर है
भारत में इसी शैली में कुछ और मंदिर है जो अलग-अलग शासनकाल में बने हुए हैं
भारत में पहाड़ों को काटकर मंदिर बनाने की कला हजारों साल पूर्व से है
मंदिर में अद्भुत शिल्प कला आपको दिखाई पड़ती है जो इसे और भी सुंदर बनाती हैं
#भारत को जानो -भारत को मानो🙏🚩🙏👉 #ओम_मंदिर,#पाली #राजस्थान
✊✊
#ऊँ की आकृति का पहला #शिवमंदिर राजस्थान के पाली से २२ किलोमीटर दूर जाडन गांव में स्थित है इस मंदिर का नींव वर्ष 1995 में रखी गई थी यह चार खंड में बना है इसमें से #एक पूरा खंड जमीन के #अंदर है और तीन जमीन के ऊपर इसमें अलग-अलग #1008शिवजी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं यह 250 एकड़ क्षेत्र में बना है भवन में #108कक्ष हैं इसका शिखर #135फीट ऊंचा है🚩🙏🚩😊😊
बीच में #गुरु_माधवानंद_महाराज की समाधि है इसके ऊपर वाले भाग में #महादेव का #शिवलिंग है #सबसे ऊपर #ब्रह्मांड की आकृति बनी हुई है #नागर श्रेणी में बने इस भवन के #पत्थर बंशी पहाड़ #धौलपुर से लाए गए हैं इसके साथ ही 9मंजिला चंद्रबिंदु बना है जिसके सबसे ऊपर भगवान #सूर्य_का_मंदिर है इस मंदिर के नीचे ही 2 लाख लीटर की टंकी बनी है यह #भूमंडल पर #ओम के आकृति की #पहली इमारत है
#ओम_मंदिर,#पाली #राजस्थान
🚩🚩 हर हर महादेव🚩🚩
✊✊
#ऊँ की आकृति का पहला #शिवमंदिर राजस्थान के पाली से २२ किलोमीटर दूर जाडन गांव में स्थित है इस मंदिर का नींव वर्ष 1995 में रखी गई थी यह चार खंड में बना है इसमें से #एक पूरा खंड जमीन के #अंदर है और तीन जमीन के ऊपर इसमें अलग-अलग #1008शिवजी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं यह 250 एकड़ क्षेत्र में बना है भवन में #108कक्ष हैं इसका शिखर #135फीट ऊंचा है🚩🙏🚩😊😊
बीच में #गुरु_माधवानंद_महाराज की समाधि है इसके ऊपर वाले भाग में #महादेव का #शिवलिंग है #सबसे ऊपर #ब्रह्मांड की आकृति बनी हुई है #नागर श्रेणी में बने इस भवन के #पत्थर बंशी पहाड़ #धौलपुर से लाए गए हैं इसके साथ ही 9मंजिला चंद्रबिंदु बना है जिसके सबसे ऊपर भगवान #सूर्य_का_मंदिर है इस मंदिर के नीचे ही 2 लाख लीटर की टंकी बनी है यह #भूमंडल पर #ओम के आकृति की #पहली इमारत है
#ओम_मंदिर,#पाली #राजस्थान
🚩🚩 हर हर महादेव🚩🚩
यह मूर्ति
*एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई है ,*
कैसे बनाई, यह भगवान जाने, या बनाने वाला...
*नाग वासुकि मन्दिर, प्रयाग🙏🏻🚩🚩*
*एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई है ,*
कैसे बनाई, यह भगवान जाने, या बनाने वाला...
*नाग वासुकि मन्दिर, प्रयाग🙏🏻🚩🚩*
कुछ तो साजिश हुई है सनातन धर्म के खिलाफ
वरना इसके सामने ताज महल की क्या औकात!♥🚩
(भुज)
Shri Swaminarayan Mandir, Bhuj 🙏🙏🦁💪🦁🚩🚩
वरना इसके सामने ताज महल की क्या औकात!♥🚩
(भुज)
Shri Swaminarayan Mandir, Bhuj 🙏🙏🦁💪🦁🚩🚩
🚩🔱
*प्रतिमा_निर्माण_में_पत्थरों_के_चयन_का_तरीका*
सनातन धर्म में
ईश्वर की मूर्ति और मन्दिरों के लिये
*किस प्रकार के पत्थर चयन होता है*
आप जानेंगे तो अचरज करेंगे
मन्दिरों में प्रतिमा निर्माण से पहले
*पत्थरों की परीक्षा* की जाती है।
*मयमतम्, अग्नि पुराण और सूत्रधार-मण्डन जैसे ग्रंथों में*
पत्थरों की जाँच के लिए नियम लिखे गए हैं
और देवता मूर्ति प्रकरण के अनुसार पाषाण को तीन प्रकार में वर्गीकृत किया जाता है –
*पुंशिला, स्त्रीशिला और नपुंसक शिला!*
जिस पत्थर से
*'गजघंटारवाघोषा' मतलब हाथी के गले में बँधी घँटी जैसी मधुर आवाज उठती है उसे पुंशिला कहते हैं।*
पुंशिला सम-चौरस होती हैं और
*देवप्रतिमा तथा शिवलिंग निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।*
*'कांस्यतालसमध्वनिः' काँसे जैसी ध्वनि उत्पन्न करने वाले पत्थरों का वर्गीकरण स्त्रीशिला के रूप में किया गया है,*
इनका आकार गोल होता है और
*सूत्रधार-मण्डन के अनुसार देवी प्रतिमा का निर्माण इससे किया जाता है।*
यह शिला मूल में स्थूल तथा अग्रभाग में कृश होती है।
*अनियमित आकार और 'स्थूलाग्रं च कृशं मध्यं' अग्र भाग में स्थूल और मध्य में कृश शिला को नपुंसक शिला कहा गया है।*
नपुंसक शिला का उपयोग
*ब्रह्मशिला या कूर्मशिला के रूप में देवप्रतिमाओं के आधार/नींव में किया जाता है।*
इन्हें पादशिला भी कहते हैं।
विविध ग्रंथों में शिला-लक्षण जाँचने के लिए इतना विस्तृत वर्णन किया गया है
इन सभी जानकारियों को समाविष्ट करना मुश्किल है।
*पत्थरों की दिशा, आकार, ध्वनि और रंग जैसे अनेक परिमाणों से शिला परीक्षा की जाती है।*
*मयमतम्, काश्यप-शिल्प और अग्नि पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार ...*
*पत्थरों को बाल, यौवना और वृद्धा जैसी श्रेणियों में भी वर्गीकृत किया गया है।*
हिन्दू मन्दिरों का अभ्यास इतना रसप्रद है
कि आप हमारे प्राचीन मंदिरों के पत्थरों से एक प्रकार का आध्यात्मिक प्रेम करने लगेंगे.
🚩🚩🚩🚩🚩
*प्रतिमा_निर्माण_में_पत्थरों_के_चयन_का_तरीका*
सनातन धर्म में
ईश्वर की मूर्ति और मन्दिरों के लिये
*किस प्रकार के पत्थर चयन होता है*
आप जानेंगे तो अचरज करेंगे
मन्दिरों में प्रतिमा निर्माण से पहले
*पत्थरों की परीक्षा* की जाती है।
*मयमतम्, अग्नि पुराण और सूत्रधार-मण्डन जैसे ग्रंथों में*
पत्थरों की जाँच के लिए नियम लिखे गए हैं
और देवता मूर्ति प्रकरण के अनुसार पाषाण को तीन प्रकार में वर्गीकृत किया जाता है –
*पुंशिला, स्त्रीशिला और नपुंसक शिला!*
जिस पत्थर से
*'गजघंटारवाघोषा' मतलब हाथी के गले में बँधी घँटी जैसी मधुर आवाज उठती है उसे पुंशिला कहते हैं।*
पुंशिला सम-चौरस होती हैं और
*देवप्रतिमा तथा शिवलिंग निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।*
*'कांस्यतालसमध्वनिः' काँसे जैसी ध्वनि उत्पन्न करने वाले पत्थरों का वर्गीकरण स्त्रीशिला के रूप में किया गया है,*
इनका आकार गोल होता है और
*सूत्रधार-मण्डन के अनुसार देवी प्रतिमा का निर्माण इससे किया जाता है।*
यह शिला मूल में स्थूल तथा अग्रभाग में कृश होती है।
*अनियमित आकार और 'स्थूलाग्रं च कृशं मध्यं' अग्र भाग में स्थूल और मध्य में कृश शिला को नपुंसक शिला कहा गया है।*
नपुंसक शिला का उपयोग
*ब्रह्मशिला या कूर्मशिला के रूप में देवप्रतिमाओं के आधार/नींव में किया जाता है।*
इन्हें पादशिला भी कहते हैं।
विविध ग्रंथों में शिला-लक्षण जाँचने के लिए इतना विस्तृत वर्णन किया गया है
इन सभी जानकारियों को समाविष्ट करना मुश्किल है।
*पत्थरों की दिशा, आकार, ध्वनि और रंग जैसे अनेक परिमाणों से शिला परीक्षा की जाती है।*
*मयमतम्, काश्यप-शिल्प और अग्नि पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार ...*
*पत्थरों को बाल, यौवना और वृद्धा जैसी श्रेणियों में भी वर्गीकृत किया गया है।*
हिन्दू मन्दिरों का अभ्यास इतना रसप्रद है
कि आप हमारे प्राचीन मंदिरों के पत्थरों से एक प्रकार का आध्यात्मिक प्रेम करने लगेंगे.
🚩🚩🚩🚩🚩