भगवान #शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ?
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
चट्टानों का सीना चीरकर उसे नया जीवन देना, ये एक ऐसा हुनर है जिसे हमने दुनिया को सिखाया।
भारत में आज लगभग 1500 ऐसे स्मारक है जो चट्टानों को तराश कर खड़े किए गए है।
ये संख्या विश्व के अन्य सभी देशों के कुल स्मारकों की संख्या से भी अधिक है, आइए आज आपको ले के चलते है हमारी ऐसी ही एक धरोहर की ओर जो पिछले 1500 सालो से हमारी संस्कृति की महानता की परिचायक है।
कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में स्थित बादामी के गुफा मन्दिर चालुक्य स्थापत्य कला का सहज ही गान करती है, चार गुफाओं का ये समूह एक ही बड़ी चट्टान को तराश कर बनाया गया है, आइए जानते है इनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य-
1 - इन मंदिरों का निर्माण उत्तर की नागर तथा दक्षिण की द्रविन शैली के मिश्रण से किया गया है।
2 - इन गुफाओं का निर्माण 6 वी शताब्दी में चालुक्य राजा कीर्ति वर्मन तथा उनके भाई मंगलेश प्रथम द्वारा कराया गया ।
3- इन सभी गुफाओं की संरचना लगभग एक सी है, सबसे अगले भाग में खम्बो पर आधारित एक बरामदा जो कि हमें एक बड़े कक्ष (महामण्डप) में ले जाता है, जो कि खूबसूरती से तराशे गए खम्बो से सजाया गया है, महामण्डप के आगे गर्भगृह है जहां देव की मूर्तियां स्थापित है।
4 - प्रत्येक गुफा का बरामदा और महामण्डप पौराणिक घटनाओं तथा देवी देवताओं की मूर्तियों से सजाया गया है।
5 गुफाओं का वर्णन
गुफा संख्या 1 - ये सबसे प्राचीन गुफा है जो भगवान शिव को समर्पित है, इस गुफा की दीवारों पर शिव के नटराज रूप के 18 हाथो वाली प्रतिमा उकेरी गई है, यही नहीं भगवान शिव की अलग अलग नृत्य मुद्रा की लगभग 81 प्रतिमाओं को इन दीवारों पर उकेरा गया है, गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
गुफा संख्या 2 - ये गुफा भगवान विष्णु को समर्पित है तथा इसका मुख्य आकर्षण भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप का चित्रण है जिसमें वह प्रथम पग से धरती, दूसरे पग से आकाश तथा उनका तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर है,
इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के वराह तथा कृष्ण अवतार से जुड़े प्रसंगों का भी सजीव चित्रण है, गुफा की छत पर गरुड़ तथा पौराणिक कथाओं का उल्लेख है।
गुफा संख्या 3 - ये सबसे बड़ी तथा सबसे आकर्षक गुफा है जिसकी गहराई लगभग 100 फीट है, आप अंदाजा लगा सकते है कि 100 फीट तक चट्टानों को तोड़ कर फिर उसे सजाना आज से 1500 वर्षों पहले कितना दुष्कर रहा होगा।
यह गुफा भी श्री विष्णु को समर
भारत में आज लगभग 1500 ऐसे स्मारक है जो चट्टानों को तराश कर खड़े किए गए है।
ये संख्या विश्व के अन्य सभी देशों के कुल स्मारकों की संख्या से भी अधिक है, आइए आज आपको ले के चलते है हमारी ऐसी ही एक धरोहर की ओर जो पिछले 1500 सालो से हमारी संस्कृति की महानता की परिचायक है।
कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में स्थित बादामी के गुफा मन्दिर चालुक्य स्थापत्य कला का सहज ही गान करती है, चार गुफाओं का ये समूह एक ही बड़ी चट्टान को तराश कर बनाया गया है, आइए जानते है इनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य-
1 - इन मंदिरों का निर्माण उत्तर की नागर तथा दक्षिण की द्रविन शैली के मिश्रण से किया गया है।
2 - इन गुफाओं का निर्माण 6 वी शताब्दी में चालुक्य राजा कीर्ति वर्मन तथा उनके भाई मंगलेश प्रथम द्वारा कराया गया ।
3- इन सभी गुफाओं की संरचना लगभग एक सी है, सबसे अगले भाग में खम्बो पर आधारित एक बरामदा जो कि हमें एक बड़े कक्ष (महामण्डप) में ले जाता है, जो कि खूबसूरती से तराशे गए खम्बो से सजाया गया है, महामण्डप के आगे गर्भगृह है जहां देव की मूर्तियां स्थापित है।
4 - प्रत्येक गुफा का बरामदा और महामण्डप पौराणिक घटनाओं तथा देवी देवताओं की मूर्तियों से सजाया गया है।
5 गुफाओं का वर्णन
गुफा संख्या 1 - ये सबसे प्राचीन गुफा है जो भगवान शिव को समर्पित है, इस गुफा की दीवारों पर शिव के नटराज रूप के 18 हाथो वाली प्रतिमा उकेरी गई है, यही नहीं भगवान शिव की अलग अलग नृत्य मुद्रा की लगभग 81 प्रतिमाओं को इन दीवारों पर उकेरा गया है, गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
गुफा संख्या 2 - ये गुफा भगवान विष्णु को समर्पित है तथा इसका मुख्य आकर्षण भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप का चित्रण है जिसमें वह प्रथम पग से धरती, दूसरे पग से आकाश तथा उनका तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर है,
इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के वराह तथा कृष्ण अवतार से जुड़े प्रसंगों का भी सजीव चित्रण है, गुफा की छत पर गरुड़ तथा पौराणिक कथाओं का उल्लेख है।
गुफा संख्या 3 - ये सबसे बड़ी तथा सबसे आकर्षक गुफा है जिसकी गहराई लगभग 100 फीट है, आप अंदाजा लगा सकते है कि 100 फीट तक चट्टानों को तोड़ कर फिर उसे सजाना आज से 1500 वर्षों पहले कितना दुष्कर रहा होगा।
यह गुफा भी श्री विष्णु को समर
*कुतुब मीनार "कुतुबउददीन ऐबक" ने बनवाया तो "बाल गणेश" और हिन्दू आकृतियां उसके अंदर कैसे आ आई ???* 🤔🤔
भगवान शिव का अद्भुत मंदिर...
सुंदरता की पराकाष्ठा....
(ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़)
सुंदरता की पराकाष्ठा....
(ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़)
*🕉️🔥🐚🔱⛳ 16 june 2020 होगी #अमेरिका के सबसे बड़े #हनुमान जी की #प्राण #प्रतिष्ठा..! डेलावेयर (अमेरिका) में हनुमान जी की, एक चट्टान से तराशी हुई 25 फुट की विशाल प्रतिमा (30,000 किलोग्राम) की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है, इस विशाल हनुमान जी की प्रतिमा को आज से 3 दिन पहले 11 जून को मंदिर के प्रांगण में स्थापित किया गया था। यह प्रतिमा काले ग्रेनाइट से बनी है इसे दक्षिण भारत के छोटे से गॉंव में 1 दर्जन शिल्पिओं ने मिलकर पुरे 1 साल में बनाई है। प्रतिमा को जनवरी 2020 में समुन्द्र के रास्ते न्यूयॉर्क और फिर आगे 1 बड़े ट्रक से डेलावेयर राज्य के सबसे बड़े हिन्दू मंदिर में लाया गया। अत्यधिक ठण्ड के बावजूद भी बहुत से सनातनी, राम भक्त हनुमान जी के दर्शन के लिए वहाँ पहुंचे, आज मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साथ साथ सहस्त्र कलश अभिषेक भी होगा* *🚩🚩श्री राम लक्ष्मण जानकी, जय बोलो हनुमान की।।🚩🚩 #सत्यसनातन_इन_अमेरिका*
*देहरादून से कुछ दुरी पर स्थित लाखामंडल शिव मंदिर एक ऐसा चमत्कारी मंदिर जहा मृत व्यक्ति भी जीवित होता है* .(नीचे चित्र देखें)👇🏼
विधि का विधान है की जो व्यक्ति धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। व्यक्ति की मृत्यु होने के तत्काल बाद ही उसकी आत्मा मनुष्य का शरिर छोड़ देती है और एक बार आत्मा छोड़ने के बाद वह उस शरिर में पुनः कभी प्रवेश नहीं करती। वह दूसरी योनी या दूसरे शरिर में ही प्रवेश करती है। इसलिए हमेशा कहा जाता है की जो चला गया वो वापस लौटकर नहीं आ सकता। लेकिन जन्म और मृत्यु तो ईश्वर का खेल है और ईश्वर की मर्जि व उनके चमत्कार के आगे कुछ भी नहीं हैं। अगर भगवान चाहे तो उनके आगे सृष्टि के नियमों में भी बदलाव हो जाता है। जन्म-मृत्यु से जुड़ी एक चौंकाने वाली बात करें की इस दुनिया में मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है, शायद आप इस बात पर यकिन ना कर पाएं। लेकिन आज आपको भोलेनाथ के एक चमत्कारी मंदिर के बारे में बताते हैं जहां अगर शव को लेकर जाया जाए तो आत्मा उस शव में पुन: प्रवेश कर जाती है। जी हां इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल हैं लेकिन यह सत्य है...
जिस चमत्कारी मंदिर की हम बात कर रहे हैं दरअसल वह मंदिर देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की राजधानी, देहरादून से कुछ दूरी पर लाखामंडल नामक स्थान पर Lakhamandal shiv mandir स्थित है। मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में यहां पांडवों को जलाकर मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह बनाया था। अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठर ने शिवलिंग की स्थापना इसी स्थान पर की थी। जो मंदिर में आज भी मौजूद है। Lakhamandal shiv mandir में मौजूद शिवलिंग को महामुंडेश्वर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के प्रांगण में मौजूद इस शिवलिंग के सामने दो द्वारपाल पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। माना जाता है कि कोई भी मृत्यु को प्राप्त किया हुआ इंसान इन द्वारपालों के सामने रख दिया जाता था तो पुजारी द्वारा अभिमंत्रित जल छिड़कने पर वह जीवित हो जाता था। इस प्रकार मृत व्यक्ति यहां लाया जाता था और कुछ पलों के फिर से जिंदा हो जाता था। जीवित होने के बाद उक्त व्यक्ति शिव नाम लेता है व गंगाजल ग्रहण करता है। गंगाजल ग्रहण करते ही उसकी आत्मा फिर से शरीर त्यागकर चली जाती है। मंदिर की पिछली दिशा में दो द्वारपाल पहरेदार के रूप में खड़े नजर आते हैं, दो द्वारपालों में से एक का हाथ कटा हुआ है जो एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।
मंदिर को लेकर कई अन्य मान्यताएं है लाखामंडल में बने इस शिवलिंग की एक अन्य खासियत यह है कि जब भी कोई व्यक्ति इस शिवलिंग का जलाभिषेक करता है तो उसे इसमें अपने चेहरे की आकृति स्पष्ट नजर आती है। भगवन भोले सबपे अपनी कृपा रखे जय भोलेनाथ 🙏
विधि का विधान है की जो व्यक्ति धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। व्यक्ति की मृत्यु होने के तत्काल बाद ही उसकी आत्मा मनुष्य का शरिर छोड़ देती है और एक बार आत्मा छोड़ने के बाद वह उस शरिर में पुनः कभी प्रवेश नहीं करती। वह दूसरी योनी या दूसरे शरिर में ही प्रवेश करती है। इसलिए हमेशा कहा जाता है की जो चला गया वो वापस लौटकर नहीं आ सकता। लेकिन जन्म और मृत्यु तो ईश्वर का खेल है और ईश्वर की मर्जि व उनके चमत्कार के आगे कुछ भी नहीं हैं। अगर भगवान चाहे तो उनके आगे सृष्टि के नियमों में भी बदलाव हो जाता है। जन्म-मृत्यु से जुड़ी एक चौंकाने वाली बात करें की इस दुनिया में मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है, शायद आप इस बात पर यकिन ना कर पाएं। लेकिन आज आपको भोलेनाथ के एक चमत्कारी मंदिर के बारे में बताते हैं जहां अगर शव को लेकर जाया जाए तो आत्मा उस शव में पुन: प्रवेश कर जाती है। जी हां इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल हैं लेकिन यह सत्य है...
जिस चमत्कारी मंदिर की हम बात कर रहे हैं दरअसल वह मंदिर देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की राजधानी, देहरादून से कुछ दूरी पर लाखामंडल नामक स्थान पर Lakhamandal shiv mandir स्थित है। मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में यहां पांडवों को जलाकर मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह बनाया था। अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठर ने शिवलिंग की स्थापना इसी स्थान पर की थी। जो मंदिर में आज भी मौजूद है। Lakhamandal shiv mandir में मौजूद शिवलिंग को महामुंडेश्वर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के प्रांगण में मौजूद इस शिवलिंग के सामने दो द्वारपाल पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। माना जाता है कि कोई भी मृत्यु को प्राप्त किया हुआ इंसान इन द्वारपालों के सामने रख दिया जाता था तो पुजारी द्वारा अभिमंत्रित जल छिड़कने पर वह जीवित हो जाता था। इस प्रकार मृत व्यक्ति यहां लाया जाता था और कुछ पलों के फिर से जिंदा हो जाता था। जीवित होने के बाद उक्त व्यक्ति शिव नाम लेता है व गंगाजल ग्रहण करता है। गंगाजल ग्रहण करते ही उसकी आत्मा फिर से शरीर त्यागकर चली जाती है। मंदिर की पिछली दिशा में दो द्वारपाल पहरेदार के रूप में खड़े नजर आते हैं, दो द्वारपालों में से एक का हाथ कटा हुआ है जो एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।
मंदिर को लेकर कई अन्य मान्यताएं है लाखामंडल में बने इस शिवलिंग की एक अन्य खासियत यह है कि जब भी कोई व्यक्ति इस शिवलिंग का जलाभिषेक करता है तो उसे इसमें अपने चेहरे की आकृति स्पष्ट नजर आती है। भगवन भोले सबपे अपनी कृपा रखे जय भोलेनाथ 🙏
केरल के #कूडलमनिक्यम मंदिर से कई प्राचीन मूर्तियां, शालीग्राम और सिक्के पाए गए है ।
इसी बुधवार 10 जून 2020 को तीर्थकुलम (पवित्र तालाब) की सफाई के दौरान पाया गया है, यह तालाब 3.5 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है ।
यह मंदिर केरल के त्रिशूर जिले के इरिंजलाक्कुडा क्षेत्र में स्थित है ।
कुडलमनिक्यम मंदिर लगभग 5,000 वर्ष पुराना है, एक शिलालेख के अनुसार जिसमें राजा स्थानु रवि वर्मा का भी उल्लेख है, और 854 ईस्वी की तारीख है । भगवान श्री राम के भाई भरत, मंदिर के पीठासीन देवता है जिन्हे "संगमेश्वर" (संगम का भगवान) भी बुलाया जाता है
कुलीपिनी महर्षि के प्राचीन यज्ञ शाला से पता चलता है कि ऋषि ने मंदिर के अंदर यज्ञ किया था । कुलीपिनी महर्षि उस क्षेत्र में रहते थे और ध्यान साधना करते थे, जो कभी घना जंगल हुआ करता था ।
इतिहासकार डॉ केसावन वेलुथत ने मूर्तियों को निम्नलिखित के रूप में पहचाना है
-- देवी और भुदेवी के साथ भगवान विष्णु,
-- नृत्य मुद्रा में कृष्ण, और
-- सोमस्कंधा
इस खोज में कई शालीग्राम, शिवलिंग, मंत्र पीठ, यंत्र पीठ और योनी पीठ, एवम पुराने सिक्के आदि शामिल हैं,
आगे के फैसले के लिए मंदिर पुजारी ने आज शुक्रवार को मीटिंग निर्धारित की है।
सनातन धर्म की सुंदरता और प्रामाणिकता प्राचीन मंदिरों और संबंधित चीजों की इन सभी खोजों से मजबूत हो रही है । जो हमारे आधुनिक इतिहासकारों द्वारा शायद जानबूझकर छुपाया गया।
आपको क्या लगता है? कमैंट्स में जरूर बताये।अगर आप इस संदर्भ में कुछ जानकारी रखते हो तो अवश्य बताये।
🙏साभार🙏
इसी बुधवार 10 जून 2020 को तीर्थकुलम (पवित्र तालाब) की सफाई के दौरान पाया गया है, यह तालाब 3.5 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है ।
यह मंदिर केरल के त्रिशूर जिले के इरिंजलाक्कुडा क्षेत्र में स्थित है ।
कुडलमनिक्यम मंदिर लगभग 5,000 वर्ष पुराना है, एक शिलालेख के अनुसार जिसमें राजा स्थानु रवि वर्मा का भी उल्लेख है, और 854 ईस्वी की तारीख है । भगवान श्री राम के भाई भरत, मंदिर के पीठासीन देवता है जिन्हे "संगमेश्वर" (संगम का भगवान) भी बुलाया जाता है
कुलीपिनी महर्षि के प्राचीन यज्ञ शाला से पता चलता है कि ऋषि ने मंदिर के अंदर यज्ञ किया था । कुलीपिनी महर्षि उस क्षेत्र में रहते थे और ध्यान साधना करते थे, जो कभी घना जंगल हुआ करता था ।
इतिहासकार डॉ केसावन वेलुथत ने मूर्तियों को निम्नलिखित के रूप में पहचाना है
-- देवी और भुदेवी के साथ भगवान विष्णु,
-- नृत्य मुद्रा में कृष्ण, और
-- सोमस्कंधा
इस खोज में कई शालीग्राम, शिवलिंग, मंत्र पीठ, यंत्र पीठ और योनी पीठ, एवम पुराने सिक्के आदि शामिल हैं,
आगे के फैसले के लिए मंदिर पुजारी ने आज शुक्रवार को मीटिंग निर्धारित की है।
सनातन धर्म की सुंदरता और प्रामाणिकता प्राचीन मंदिरों और संबंधित चीजों की इन सभी खोजों से मजबूत हो रही है । जो हमारे आधुनिक इतिहासकारों द्वारा शायद जानबूझकर छुपाया गया।
आपको क्या लगता है? कमैंट्स में जरूर बताये।अगर आप इस संदर्भ में कुछ जानकारी रखते हो तो अवश्य बताये।
🙏साभार🙏