*जटोली शिव मंदिर, हिमाचल प्रदेश*
देवभूमि हिमाचल में आदिदेव महादेव को समर्पित एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर अवस्थित है. प्रांत के सोलन क्षेत्र में स्थित यह मंदिर जटोली शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है.
आश्चर्य की बात यह है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित इस मंदिर को द्रविड़ शैली में निर्मित किया गया है.
मान्यता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर एक दिन विश्राम किया था और उनके बाद एक परम सिद्ध योगी स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने यहाँ आकर तपस्या की.
स्वामी जी के मार्गदर्शन और दिशानिर्देश के बाद इस मंदिर का निर्माण किया गया.
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
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देवभूमि हिमाचल में आदिदेव महादेव को समर्पित एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर अवस्थित है. प्रांत के सोलन क्षेत्र में स्थित यह मंदिर जटोली शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है.
आश्चर्य की बात यह है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित इस मंदिर को द्रविड़ शैली में निर्मित किया गया है.
मान्यता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर एक दिन विश्राम किया था और उनके बाद एक परम सिद्ध योगी स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने यहाँ आकर तपस्या की.
स्वामी जी के मार्गदर्शन और दिशानिर्देश के बाद इस मंदिर का निर्माण किया गया.
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*ट्यूलिप उद्यान, श्रीनगर*
60 से अधिक प्रजातियों के 15 लाख से अधिक पौधों के साथ एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप उद्यान श्रीनगर में स्थित है जो अपने मनोरम सुंदरता और अद्भुत विशालता से सभी का ध्यान आकर्षित करता है.
प्रसिद्ध डल झील के आमने स्थित यह ट्यूलिप उद्यान लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्र में जहाँ विश्वभर के पौधों की दुर्लभ प्रजातियां उपस्थित हैं.
कश्मीर का वसंत ही उसे स्वर्ग की अनुभूति कराता है और इस उद्यान उगने वाले फूल वसंत के आगमन का संकेत देते हैं. यह उद्यान वर्ष में केवल एक माह के लिए पर्यटकों के लिए खोला जाता है.
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60 से अधिक प्रजातियों के 15 लाख से अधिक पौधों के साथ एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप उद्यान श्रीनगर में स्थित है जो अपने मनोरम सुंदरता और अद्भुत विशालता से सभी का ध्यान आकर्षित करता है.
प्रसिद्ध डल झील के आमने स्थित यह ट्यूलिप उद्यान लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्र में जहाँ विश्वभर के पौधों की दुर्लभ प्रजातियां उपस्थित हैं.
कश्मीर का वसंत ही उसे स्वर्ग की अनुभूति कराता है और इस उद्यान उगने वाले फूल वसंत के आगमन का संकेत देते हैं. यह उद्यान वर्ष में केवल एक माह के लिए पर्यटकों के लिए खोला जाता है.
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Forwarded from Ishaan
महाभारत में चक्रव्यूह क्या था, इस युद्ध मे और कितने प्रकार के व्यूहों का उपयोग हुआ? आइये बताते हैं :--
चक्रव्यूह का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ
महाभारत में हुआ है। इस व्यूह की रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी। अर्जुन के अतिरिक्त और कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गयी थी। दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य में था। इस व्यूह में बाकी सात महारथी व्यूह की विभिन्न परतों में थे। व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था।
अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया पर वह भी अंतिम द्वार(यानी परत) को पार नहीं कर सका तथा बाद में सात महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।
महाभारत युद्ध में पांडवों और कौरवों द्वारा कुछ और व्यूह रचे गए थे जो निम्न हैं :-
महाभारत ग्रंथ के अनुसार व्यूह-रचना
1. गरुड़-व्यूह
2. क्रौंच व्यूह
3. श्येन व्यूह
4. सुपर्ण(गरुड़) व्यूह
5. सारंग व्यूह
6. सर्प व्यूह
7. खड्ग सर्प व्यूह
8. शेषनाग व्यूह
9. मकर व्यूह,
10. कुर्मा(कछुआ) व्यूह,
11. वराह व्यूह
12. महिष व्यूह
13. त्रिशूल व्यूह,
14. चक्र व्यूह,
15. अर्धचन्द्र व्यूह
16. कमल व्यूह,
17. उर्मि व्यूह,
18. मंडल व्यूह,
19. वज्र व्यूह,
20. चक्रशकट व्यूह
21. शकट व्यूह,
22. सर्वतोभद्र व्यूह
23. शृंगघटक व्यूह
24. चन्द्रकाल व्यूह
25. कमल व्यूह
26. देव व्यूह,
27. असुर व्यूह,
28. सूचि व्यूह,
29. श्रीन्गातका व्यूह,
30. चन्द्र कला
31. माला व्यूह
32. पद्म व्यूह ,
33. सूर्य व्यूह ,
34. दण्डव्यूह
35. गर्भव्यूह
36. शंखव्यूह
37. मंण्डलार्ध व्यूह
38. हष्ट व्यूह
39. नक्षत्र मण्डल व्यूह
40. भोग व्यूह
41. प्रणाल व्यूह
42. मण्डलार्द्ध व्यूह
43. मयूर व्यूह
44. मंगलब्यूह
45. असह्मव्यूह
46. असंहतव्यूह
47. विजय व्यूह
चक्रव्यूह का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ
महाभारत में हुआ है। इस व्यूह की रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी। अर्जुन के अतिरिक्त और कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गयी थी। दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य में था। इस व्यूह में बाकी सात महारथी व्यूह की विभिन्न परतों में थे। व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था।
अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया पर वह भी अंतिम द्वार(यानी परत) को पार नहीं कर सका तथा बाद में सात महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।
महाभारत युद्ध में पांडवों और कौरवों द्वारा कुछ और व्यूह रचे गए थे जो निम्न हैं :-
महाभारत ग्रंथ के अनुसार व्यूह-रचना
1. गरुड़-व्यूह
2. क्रौंच व्यूह
3. श्येन व्यूह
4. सुपर्ण(गरुड़) व्यूह
5. सारंग व्यूह
6. सर्प व्यूह
7. खड्ग सर्प व्यूह
8. शेषनाग व्यूह
9. मकर व्यूह,
10. कुर्मा(कछुआ) व्यूह,
11. वराह व्यूह
12. महिष व्यूह
13. त्रिशूल व्यूह,
14. चक्र व्यूह,
15. अर्धचन्द्र व्यूह
16. कमल व्यूह,
17. उर्मि व्यूह,
18. मंडल व्यूह,
19. वज्र व्यूह,
20. चक्रशकट व्यूह
21. शकट व्यूह,
22. सर्वतोभद्र व्यूह
23. शृंगघटक व्यूह
24. चन्द्रकाल व्यूह
25. कमल व्यूह
26. देव व्यूह,
27. असुर व्यूह,
28. सूचि व्यूह,
29. श्रीन्गातका व्यूह,
30. चन्द्र कला
31. माला व्यूह
32. पद्म व्यूह ,
33. सूर्य व्यूह ,
34. दण्डव्यूह
35. गर्भव्यूह
36. शंखव्यूह
37. मंण्डलार्ध व्यूह
38. हष्ट व्यूह
39. नक्षत्र मण्डल व्यूह
40. भोग व्यूह
41. प्रणाल व्यूह
42. मण्डलार्द्ध व्यूह
43. मयूर व्यूह
44. मंगलब्यूह
45. असह्मव्यूह
46. असंहतव्यूह
47. विजय व्यूह
Forwarded from हरे कृष्णा
भगवान #शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ?
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
Forwarded from वैश्नव सेवन SANJAY DHINGRA संजय ढींगरा
VID-20210111-WA0180.mp4
13 MB
Video from SANJAY DHINGRA
Forwarded from वैश्नव सेवन SANJAY DHINGRA संजय ढींगरा
चित्रासखि मंदिर (बरसाना)
*इस्कॉन मंदिर , मायापुर पश्चिम बंगाल*
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में स्थित मायापुर में विश्व के सबसे बड़े मंदिर परिसर का बड़ा भाग बनकर तैयार हो गया है। श्रद्धालुओं के लिए यह खोला भी जा चुका है । ‘द टेम्पल ऑफ वैदिक प्लैनेटेरियम’ अपने-आप में दुनिया का सबसे अनोखा मंदिर है।
1 लाख स्क्वायर फ़ीट में फैले परिसर में 2022 तक निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इस मंदिर के निर्माण का काम एक दशक पहले शुरू हुआ था।
इसका मुख्य गुम्बद विश्व के किसी भी मंदिर का सबसे बड़ा गुम्बद होगा।
वैदिक ज्ञान पर आधारित यह मंदिर दुनिया भर में वैदिक संस्कृति और ज्ञान का प्रसार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
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पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में स्थित मायापुर में विश्व के सबसे बड़े मंदिर परिसर का बड़ा भाग बनकर तैयार हो गया है। श्रद्धालुओं के लिए यह खोला भी जा चुका है । ‘द टेम्पल ऑफ वैदिक प्लैनेटेरियम’ अपने-आप में दुनिया का सबसे अनोखा मंदिर है।
1 लाख स्क्वायर फ़ीट में फैले परिसर में 2022 तक निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इस मंदिर के निर्माण का काम एक दशक पहले शुरू हुआ था।
इसका मुख्य गुम्बद विश्व के किसी भी मंदिर का सबसे बड़ा गुम्बद होगा।
वैदिक ज्ञान पर आधारित यह मंदिर दुनिया भर में वैदिक संस्कृति और ज्ञान का प्रसार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
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Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹
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🕰➡️3.03
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*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
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*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*
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*नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात*
हिन्दु धर्म के पवित्रतम चार धामों में से एक द्वारकापुरी के समीप नागों के ईश्वर अर्थात नागेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है.
मान्यता है कि इस जगह पर भगवान शिव ने अपने अनन्य भक्त की रक्षा की थी और चमकते हुए सिंहासन में ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए थे.
भगवान शिव के इस पवित्र धाम के आस पास कोई बसाहट नहीं है. यहाँ स्थित महादेव की 125 फ़ीट ऊंची और 25 फ़ीट चौड़ी प्रतिमा ना सिर्फ श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है बल्कि इस मंदिर की भव्यता को और अधिक बढ़ाती है.
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
हिन्दु धर्म के पवित्रतम चार धामों में से एक द्वारकापुरी के समीप नागों के ईश्वर अर्थात नागेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है.
मान्यता है कि इस जगह पर भगवान शिव ने अपने अनन्य भक्त की रक्षा की थी और चमकते हुए सिंहासन में ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए थे.
भगवान शिव के इस पवित्र धाम के आस पास कोई बसाहट नहीं है. यहाँ स्थित महादेव की 125 फ़ीट ऊंची और 25 फ़ीट चौड़ी प्रतिमा ना सिर्फ श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है बल्कि इस मंदिर की भव्यता को और अधिक बढ़ाती है.
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