Forwarded from Ishaan
महाभारत में चक्रव्यूह क्या था, इस युद्ध मे और कितने प्रकार के व्यूहों का उपयोग हुआ? आइये बताते हैं :--
चक्रव्यूह का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ
महाभारत में हुआ है। इस व्यूह की रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी। अर्जुन के अतिरिक्त और कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गयी थी। दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य में था। इस व्यूह में बाकी सात महारथी व्यूह की विभिन्न परतों में थे। व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था।
अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया पर वह भी अंतिम द्वार(यानी परत) को पार नहीं कर सका तथा बाद में सात महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।
महाभारत युद्ध में पांडवों और कौरवों द्वारा कुछ और व्यूह रचे गए थे जो निम्न हैं :-
महाभारत ग्रंथ के अनुसार व्यूह-रचना
1. गरुड़-व्यूह
2. क्रौंच व्यूह
3. श्येन व्यूह
4. सुपर्ण(गरुड़) व्यूह
5. सारंग व्यूह
6. सर्प व्यूह
7. खड्ग सर्प व्यूह
8. शेषनाग व्यूह
9. मकर व्यूह,
10. कुर्मा(कछुआ) व्यूह,
11. वराह व्यूह
12. महिष व्यूह
13. त्रिशूल व्यूह,
14. चक्र व्यूह,
15. अर्धचन्द्र व्यूह
16. कमल व्यूह,
17. उर्मि व्यूह,
18. मंडल व्यूह,
19. वज्र व्यूह,
20. चक्रशकट व्यूह
21. शकट व्यूह,
22. सर्वतोभद्र व्यूह
23. शृंगघटक व्यूह
24. चन्द्रकाल व्यूह
25. कमल व्यूह
26. देव व्यूह,
27. असुर व्यूह,
28. सूचि व्यूह,
29. श्रीन्गातका व्यूह,
30. चन्द्र कला
31. माला व्यूह
32. पद्म व्यूह ,
33. सूर्य व्यूह ,
34. दण्डव्यूह
35. गर्भव्यूह
36. शंखव्यूह
37. मंण्डलार्ध व्यूह
38. हष्ट व्यूह
39. नक्षत्र मण्डल व्यूह
40. भोग व्यूह
41. प्रणाल व्यूह
42. मण्डलार्द्ध व्यूह
43. मयूर व्यूह
44. मंगलब्यूह
45. असह्मव्यूह
46. असंहतव्यूह
47. विजय व्यूह
चक्रव्यूह का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ
महाभारत में हुआ है। इस व्यूह की रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी। अर्जुन के अतिरिक्त और कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गयी थी। दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य में था। इस व्यूह में बाकी सात महारथी व्यूह की विभिन्न परतों में थे। व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था।
अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया पर वह भी अंतिम द्वार(यानी परत) को पार नहीं कर सका तथा बाद में सात महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।
महाभारत युद्ध में पांडवों और कौरवों द्वारा कुछ और व्यूह रचे गए थे जो निम्न हैं :-
महाभारत ग्रंथ के अनुसार व्यूह-रचना
1. गरुड़-व्यूह
2. क्रौंच व्यूह
3. श्येन व्यूह
4. सुपर्ण(गरुड़) व्यूह
5. सारंग व्यूह
6. सर्प व्यूह
7. खड्ग सर्प व्यूह
8. शेषनाग व्यूह
9. मकर व्यूह,
10. कुर्मा(कछुआ) व्यूह,
11. वराह व्यूह
12. महिष व्यूह
13. त्रिशूल व्यूह,
14. चक्र व्यूह,
15. अर्धचन्द्र व्यूह
16. कमल व्यूह,
17. उर्मि व्यूह,
18. मंडल व्यूह,
19. वज्र व्यूह,
20. चक्रशकट व्यूह
21. शकट व्यूह,
22. सर्वतोभद्र व्यूह
23. शृंगघटक व्यूह
24. चन्द्रकाल व्यूह
25. कमल व्यूह
26. देव व्यूह,
27. असुर व्यूह,
28. सूचि व्यूह,
29. श्रीन्गातका व्यूह,
30. चन्द्र कला
31. माला व्यूह
32. पद्म व्यूह ,
33. सूर्य व्यूह ,
34. दण्डव्यूह
35. गर्भव्यूह
36. शंखव्यूह
37. मंण्डलार्ध व्यूह
38. हष्ट व्यूह
39. नक्षत्र मण्डल व्यूह
40. भोग व्यूह
41. प्रणाल व्यूह
42. मण्डलार्द्ध व्यूह
43. मयूर व्यूह
44. मंगलब्यूह
45. असह्मव्यूह
46. असंहतव्यूह
47. विजय व्यूह
Forwarded from हरे कृष्णा
भगवान #शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ?
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।
''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
!! ॐ नमः शिवाय !!
Forwarded from वैश्नव सेवन SANJAY DHINGRA संजय ढींगरा
VID-20210111-WA0180.mp4
13 MB
Video from SANJAY DHINGRA
Forwarded from वैश्नव सेवन SANJAY DHINGRA संजय ढींगरा
चित्रासखि मंदिर (बरसाना)
*इस्कॉन मंदिर , मायापुर पश्चिम बंगाल*
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में स्थित मायापुर में विश्व के सबसे बड़े मंदिर परिसर का बड़ा भाग बनकर तैयार हो गया है। श्रद्धालुओं के लिए यह खोला भी जा चुका है । ‘द टेम्पल ऑफ वैदिक प्लैनेटेरियम’ अपने-आप में दुनिया का सबसे अनोखा मंदिर है।
1 लाख स्क्वायर फ़ीट में फैले परिसर में 2022 तक निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इस मंदिर के निर्माण का काम एक दशक पहले शुरू हुआ था।
इसका मुख्य गुम्बद विश्व के किसी भी मंदिर का सबसे बड़ा गुम्बद होगा।
वैदिक ज्ञान पर आधारित यह मंदिर दुनिया भर में वैदिक संस्कृति और ज्ञान का प्रसार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
Video🕰️➡️.30.sec👆🏻👇🏻
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में स्थित मायापुर में विश्व के सबसे बड़े मंदिर परिसर का बड़ा भाग बनकर तैयार हो गया है। श्रद्धालुओं के लिए यह खोला भी जा चुका है । ‘द टेम्पल ऑफ वैदिक प्लैनेटेरियम’ अपने-आप में दुनिया का सबसे अनोखा मंदिर है।
1 लाख स्क्वायर फ़ीट में फैले परिसर में 2022 तक निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इस मंदिर के निर्माण का काम एक दशक पहले शुरू हुआ था।
इसका मुख्य गुम्बद विश्व के किसी भी मंदिर का सबसे बड़ा गुम्बद होगा।
वैदिक ज्ञान पर आधारित यह मंदिर दुनिया भर में वैदिक संस्कृति और ज्ञान का प्रसार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
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Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹
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*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान
*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*
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*नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात*
हिन्दु धर्म के पवित्रतम चार धामों में से एक द्वारकापुरी के समीप नागों के ईश्वर अर्थात नागेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है.
मान्यता है कि इस जगह पर भगवान शिव ने अपने अनन्य भक्त की रक्षा की थी और चमकते हुए सिंहासन में ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए थे.
भगवान शिव के इस पवित्र धाम के आस पास कोई बसाहट नहीं है. यहाँ स्थित महादेव की 125 फ़ीट ऊंची और 25 फ़ीट चौड़ी प्रतिमा ना सिर्फ श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है बल्कि इस मंदिर की भव्यता को और अधिक बढ़ाती है.
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
हिन्दु धर्म के पवित्रतम चार धामों में से एक द्वारकापुरी के समीप नागों के ईश्वर अर्थात नागेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है.
मान्यता है कि इस जगह पर भगवान शिव ने अपने अनन्य भक्त की रक्षा की थी और चमकते हुए सिंहासन में ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए थे.
भगवान शिव के इस पवित्र धाम के आस पास कोई बसाहट नहीं है. यहाँ स्थित महादेव की 125 फ़ीट ऊंची और 25 फ़ीट चौड़ी प्रतिमा ना सिर्फ श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है बल्कि इस मंदिर की भव्यता को और अधिक बढ़ाती है.
*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*
पीली साड़ी गले में कृष्ण भगवान की कंठमाला.. आज के युग की यशोदा मां 🙏
शायद आप लोग इन्हें नहीं जानते लेकिन बहुत शीघ्र ही पूरा भारतवर्ष इन्हे जान जाएगा... धर्म के प्रति इनकी भक्ति वह त्याग के आगे हमारी सभी पूजा अर्चना छोटी रह जाती हैं...
मथुरा में श्री बांके बिहारी मंदिर के बाहर पिछले 30 वर्षों से मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के जूते चप्पलों की रखवाली करने वाली इन माता का नाम यशोदा है.. मात्र 20 वर्ष की आयु में इनके पति की मृत्यु हो गई थी, आज माताजी 50 साल की हो चुकी हैं इस दौरान माताजी ने श्रद्धालुओं के जूते चप्पलों की रखवाली करके 51 लाख 10 हजार 25 रुपए 50 पैसे इकट्ठा करके 40 लाख रुपए की रकम से एक गौशाला मंदिर धर्मशाला का निर्माण कर डाला...
धर्म क्या है यह इन यशोदा मां से जानिए.. आप लोगों ने पैसों के पीछे भागने वाली फिल्मी सितारों नेताओं खेल सेलिब्रिटी को शेयर करके बहुत फेमस किया आइए सब मिलकर यशोदा मां को भी प्रसिद्ध करते हैं और इन्हें इनका सम्मान दिलाते हैं
🙏🙏 जय श्री राधे 🙏🙏
शायद आप लोग इन्हें नहीं जानते लेकिन बहुत शीघ्र ही पूरा भारतवर्ष इन्हे जान जाएगा... धर्म के प्रति इनकी भक्ति वह त्याग के आगे हमारी सभी पूजा अर्चना छोटी रह जाती हैं...
मथुरा में श्री बांके बिहारी मंदिर के बाहर पिछले 30 वर्षों से मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के जूते चप्पलों की रखवाली करने वाली इन माता का नाम यशोदा है.. मात्र 20 वर्ष की आयु में इनके पति की मृत्यु हो गई थी, आज माताजी 50 साल की हो चुकी हैं इस दौरान माताजी ने श्रद्धालुओं के जूते चप्पलों की रखवाली करके 51 लाख 10 हजार 25 रुपए 50 पैसे इकट्ठा करके 40 लाख रुपए की रकम से एक गौशाला मंदिर धर्मशाला का निर्माण कर डाला...
धर्म क्या है यह इन यशोदा मां से जानिए.. आप लोगों ने पैसों के पीछे भागने वाली फिल्मी सितारों नेताओं खेल सेलिब्रिटी को शेयर करके बहुत फेमस किया आइए सब मिलकर यशोदा मां को भी प्रसिद्ध करते हैं और इन्हें इनका सम्मान दिलाते हैं
🙏🙏 जय श्री राधे 🙏🙏
Forwarded from The Narrative
लुम्बिनी (महात्मा बुद्ध की जन्म स्थली)
बौद्ध मत के प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म 'सिद्धार्थ' के रूप में आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व सन 623 ईसापूर्व में हुआ था. उनकी जन्मस्थली थी लुम्बिनी, जो वर्तमान में नेपाल के कपिलवस्तु में स्थित है.
इस स्थान पर सम्राट अशोक द्वारा स्थापित अशोक स्तम्भ में ब्राह्मी लिपिकृत प्राकृत भाषा में भगवान बुद्ध का जन्म स्थान होने का वर्णन किया हुआ शिलापत्र अवस्थित है.
युनेस्को ने बुद्ध के जन्मस्थान को ऐतिहासिक महत्व की वैश्विक धरोहर घोषित कर रखा है.
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
बौद्ध मत के प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म 'सिद्धार्थ' के रूप में आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व सन 623 ईसापूर्व में हुआ था. उनकी जन्मस्थली थी लुम्बिनी, जो वर्तमान में नेपाल के कपिलवस्तु में स्थित है.
इस स्थान पर सम्राट अशोक द्वारा स्थापित अशोक स्तम्भ में ब्राह्मी लिपिकृत प्राकृत भाषा में भगवान बुद्ध का जन्म स्थान होने का वर्णन किया हुआ शिलापत्र अवस्थित है.
युनेस्को ने बुद्ध के जन्मस्थान को ऐतिहासिक महत्व की वैश्विक धरोहर घोषित कर रखा है.
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
Forwarded from The Narrative
आदि रत्नेश्वर मंदिर, तिरुवदनई
तमिलनाडु का तिरुवदनई क्षेत्र सनातन मंदिरों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध है. यहाँ महादेव को समर्पित आदि रत्नेश्वर मंदिर अवस्थित है जो अपनी अद्भुत एवं अद्वितीय वास्तुकला के लिए विश्वविख्यात है.
द्रविड शैली में निर्मित इस मंदिर में पांडवों में एक अर्जुन ने दर्शन कर सोमास्कन्द स्थापित किया था.
मुनि अगस्त्य, महर्षि मार्कण्डेय एवं दिव्य कामधेनु ने यहाँ महादेव की उपासना की थी.
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
तमिलनाडु का तिरुवदनई क्षेत्र सनातन मंदिरों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध है. यहाँ महादेव को समर्पित आदि रत्नेश्वर मंदिर अवस्थित है जो अपनी अद्भुत एवं अद्वितीय वास्तुकला के लिए विश्वविख्यात है.
द्रविड शैली में निर्मित इस मंदिर में पांडवों में एक अर्जुन ने दर्शन कर सोमास्कन्द स्थापित किया था.
मुनि अगस्त्य, महर्षि मार्कण्डेय एवं दिव्य कामधेनु ने यहाँ महादेव की उपासना की थी.
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Forwarded from The Narrative
श्री रंगनाथ मंदिर , स्वर्ण विमान , न्यूयॉर्क
एक अनोखा मंदिर 🌸
श्रीमान नारायण के लिए अमेरिका में पूजा का एक विशिष्ट स्थान होने का विचार आने पर आचार्य पूरनश्रम डॉ वेंकट कानुमल्ला को श्री रंगनायकी और भगवान श्री रंगनाथ के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में एक विशेष मंदिर बनाने की आज्ञा दी ।
श्री रंगनाथ सेवा समिति 8 अक्टूबर, 1987 को न्यूयॉर्क राज्य में पंजीकृत की गई थी ।
मंदिर के निर्माण के लिए न्यूयॉर्क के पोमोना में 5 एकड़ भूमि ली गई।
1997 में निर्माण का पहला चरण शुरू किया गया था। भारत से 10 कुशल शिल्पियों ने सुंदर प्राणवाकारा विमानम सहित सभी पारंपरिक मंदिर कला कार्यों को जनवरी 2001 तक पूर्ण किया ।
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एक अनोखा मंदिर 🌸
श्रीमान नारायण के लिए अमेरिका में पूजा का एक विशिष्ट स्थान होने का विचार आने पर आचार्य पूरनश्रम डॉ वेंकट कानुमल्ला को श्री रंगनायकी और भगवान श्री रंगनाथ के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में एक विशेष मंदिर बनाने की आज्ञा दी ।
श्री रंगनाथ सेवा समिति 8 अक्टूबर, 1987 को न्यूयॉर्क राज्य में पंजीकृत की गई थी ।
मंदिर के निर्माण के लिए न्यूयॉर्क के पोमोना में 5 एकड़ भूमि ली गई।
1997 में निर्माण का पहला चरण शुरू किया गया था। भारत से 10 कुशल शिल्पियों ने सुंदर प्राणवाकारा विमानम सहित सभी पारंपरिक मंदिर कला कार्यों को जनवरी 2001 तक पूर्ण किया ।
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Forwarded from The Narrative
रणकपुर जैन मंदिर , राजस्थान
राजस्थान में स्थित रणकपुर जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यह स्थान खूबसूरती से तराशे गए प्राचीन जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।
इन मंदिरों का निर्माण 15 वीं शताब्दी में राणा कुंभा के शासनकाल में हुआ था। इन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम रणकपुर पड़ा।
यहां के जैन मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। केवल रणकपुर में ही नहीं बल्कि उसके आस पास की जगहों में भी अनेक प्राचीन मंदिर हैं। यह परिसर लगभग 40000 वर्ग फीट में फैला है।
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
राजस्थान में स्थित रणकपुर जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यह स्थान खूबसूरती से तराशे गए प्राचीन जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।
इन मंदिरों का निर्माण 15 वीं शताब्दी में राणा कुंभा के शासनकाल में हुआ था। इन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम रणकपुर पड़ा।
यहां के जैन मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। केवल रणकपुर में ही नहीं बल्कि उसके आस पास की जगहों में भी अनेक प्राचीन मंदिर हैं। यह परिसर लगभग 40000 वर्ग फीट में फैला है।
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