ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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Forwarded from The Narrative
केदारनाथ मंदिर 🛕

हिमालय के केदार शृंग पर अवस्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक केदारनाथ बाबा का मंदिर तीन ओर से बर्फीली पहाड़ियों से घिरा है. पाँच पवित्रम नदियों के प्रयागस्थल पर स्थित इस मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण पांडवों द्वारा करवाया गया था.

पौराणिक इतिहास के अनुसार नर एवं नारायण ऋषि के तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने यहाँ लिंग का रूप धारण किया.

प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मंदिर का पट बन्द होता है जहाँ दीप प्रज्वलित कर भगवान शिव को उखीमठ लाया जाता है. 6 माह बाद जब अक्षय तृतीया तिथि के समीप पट खोला जाता है तो दीपक जलता हुआ ही रहता है.

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क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ?

यह तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर है, यह बिना नींव का मंदिर है । इसे इंटरलॉकिंग विधि का उपयोग करके बनाया गया है इसके निर्माण में पत्थरों के बीच कोई सीमेंट, प्लास्टर या किसी भी तरह के चिपकने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया गया है इसके बावजूद पिछले 1000 वर्षों में 6 बड़े भूकंपो को झेलकर भी आज अपने मूल स्वरूप में है ।

216 फीट ऊंचा यह मंदिर उस समय दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर था। इसके निर्माण के कई वर्षों बाद बनी पीसा की मीनार खराब इंजीनियरिंग की वजह से समय के साथ झुक रही है लेकिन बृहदेश्वर मंदिर पीसा की मीनार से भी प्राचीन होने के बाद भी अपने अक्ष पर एक भी अंश का झुकाव नहीं रखता ।

इस मंदिर के निर्माण के लिए 1.3 लाख टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था जिसे 60 किलोमीटर दूर से 3000 हाथियों द्वारा ले जाया गया था। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वी को खोदे बिना किया गया था यानी यह मंदिर बिना नींव का मंदिर है ।

मंदिर टॉवर के शीर्ष पर स्थित शिखर का वजन 81 टन है आज के समय में इतनी ऊंचाई पर 81 टन वजनी पत्थर को उठाने के लिए आधुनिक मशीनें फेल हो जाएंगी ।

बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण के लिए प्रयोग किए गए इंजीनियरिंग के स्तर को दुनिया के सात आश्चर्यों में से किसी भी आश्चर्य के निर्माण की तकनीक मुकाबला नहीं कर सकती और आज की तकनीकों को देखकर भविष्य में भी कई सदियों तक ऐसा निर्माण सम्भव नहीं दिखता है ।
Forwarded from The Narrative
भारत का प्राचीन विमान शास्त्र 🛸

राइट बंधुओं ने 17 दिसंबर 1903 में पहला विमान उड़ाया पर भारत में यह हजारों वर्ष पूर्व बनाया जा चुका था ।
विद्या वाचस्पति पं मधुसूदन सरस्वती 'इंद्र विजय' नामक ग्रंथ में ऋग्वेद के 36वें सूक्त के प्रथम मंत्र का अर्थ लिखते हुए कहते हैं कि ऋषियों ने तीन पहियों वाला ऐसा रथ बनाया था जो अंतरिक्ष में उड़ सकता था ।
नासा ने 1973 में भारत में महर्षि भारद्वाज रचित 'यंत्र सर्वस्व' ग्रंथ की बड़ी खोजबीन की , क्योंकि इसका एक भाग वैमानिक शास्त्र है । वैमानिक शास्त्र के पहले प्रकरण में प्राचीन विज्ञान विषय के 25 ग्रंथों की सूची है । इस ग्रंथ में भारद्वाज मुनि ने विमान की परिभाषा , विमान का पायलट , आकाश मार्ग , वैमानिक के कपड़े , विमान के कलपुर्जे , ऊर्जा , यंत्र तथा उन्हें बनाने के लिए विभिन्न धातुओं का वर्णन किया है ।
इस तरह के कई प्रमाण यह साबित करते हैं कि भारतीय विमान शास्त्र एक पूर्ण विकसित और व्यवहार में उपयोग हो रहा विज्ञान था ।

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Forwarded from The Narrative
दक्षिणेश्वर काली मन्दिर , पश्चिम बंगाल

(बांग्ला: দক্ষিণেশ্বর কালীবাড়ি; उच्चारण:दॊख्खिनॆश्शॉर कालिबाड़ी),

उत्तर कोलकाता बैरकपुर में, विवेकानन्द सेतु के कोलकाता छोर के निकट, हुगली नदी के किनारे यह ऐतिहासिक मन्दिर है। इस मंदिर की मुख्य देवी, भवतारिणी हैं , जो माँ काली का रूप हैं। इस मंदिर को वर्ष 1854 में रानी रासमणि जी ने बनवाया था।

यह मन्दिर, प्रख्यात दार्शनिक एवं धर्मगुरु, स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कर्मभूमि रही है, जो सिद्ध संत थे तथा रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानंद के गुरु थे। वर्ष 1857 - 68 के बीच, स्वामी रामकृष्ण इस मंदिर के प्रधान पुरोहित रहे।

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Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
श्री नन्द भवन,
चौरासी खम्बा मंदिर,
दर्शन🙏🏻
पुरानी गोकुल
पोस्ट महावन
मथुरा से
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
VID-20210521-WA0062.mp4
39.1 MB
Video from हरे कृष्णा
Forwarded from The Narrative
चाँद बावडी

जयपुर-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-11) पर स्थित दौसा जिले में स्थित है "चाँद बावडी"।
9वीं शताब्दी में निर्मित इस बावडी का निर्माण राजा मिहिर भोज (जिन्हें कि चाँद नाम से भी जाना जाता था) ने करवाया था, और उन्हीं के नाम पर इस बावडी का नाम चाँद बावडी पडा।

दुनिया की सबसे गहरी यह बावडी चारों ओर से लगभग 35 मीटर चौडी है तथा इस बावडी में ऊपर से नीचे तक पक्की सीढियाँ बनी हुई हैं, जिससे पानी का स्तर चाहे कितना ही हो, आसानी से भरा जा सकता है।

13 मंजिला यह बावडी 100 फ़ीट से भी ज्यादा गहरी है, जिसमें भूलभुलैया के रूप में 3500 सीढियाँ (अनुमानित) हैं।

तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है।

इनकी दीवारों पर हिंदू धर्म के सभी 33 करोड देवी-देवताओं के चित्र भी उकेरे गये हैं। बावडी की सीढियों को आकर्षक एवं कलात्मक तरीके से बनाया गया है और यही इसकी खासियत भी है कि बावडी में नीचे उतरने वाला व्यक्ति वापस उसी सीढी से ऊपर नहीं चढ सकता।

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Forwarded from The Narrative
अंकोरवाट मंदिर , कंबोडिया 🛕

यह दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्थान है जो
लगभग 2 किलोमीटर के क्षैत्रफल में फैला हुआ है।

यह मूल रूप से खमेर साम्राज्य के लिए भगवान विष्णु के एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो धीरे-धीरे 12 वीं शताब्दी के अंत में बौद्ध मंदिर में बदल गया।

यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम यशोधरपुर था। इसका निर्माण 1112 से 1153 ई सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था।
अंकोरवाट मंदिर के निर्माण का कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने शुरू किया और उनके उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में पूरा हुआ।

अंकोरवाट मंदिर बहुत विशाल है और मंदिर के शिलाचित्रों में बताई गई है रामकथा ।

वर्ष 1986 से लेकर वर्ष 1993 तक भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस मंदिर के संरक्षण का जिम्मा संभाला था।

फ्रांस से स्वतंत्रता मिलने के बाद अंकोरवाट मंदिर कंबोडिया देश का प्रतीक बन गया। राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को 1983 से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है।

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Forwarded from The Narrative
केटस राज मंदिर , पाकिस्तान🛕

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