Forwarded from The Narrative
श्री हनुमान ठाकुर मंदिर (महाबली मंदिर), मणिपुर
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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श्रीधर का सादा जीवन उच्च विचार
🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠
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🌹दिल्ली से लगभग 3700 किलोमीटर दूरी पर एक देश है, जिसका नाम है वियतनाम .....
दिल्ली से अगर वियतनाम जाना हो, तो बीच मे कम से कम 3 या 4 देश पड़ते है । जैसे बांग्लादेश, म्यांमार , लाओस, थाईलैंड ।। वियतनाम में आज हिन्दू धर्म पूरी तरह से लुप्त हो चुका है । जबकि वहां हिन्दू मंदिर प्रचुर मात्रा में आज भी है ।।
यह जो मंदिर आप चित्रों के माध्यम से देख रहे है, इस मंदिर का नाम " My Son Temple " है, जो कि भगवान शिव को समर्पित मंदिर है ।। इस मंदिर की ऑफिशियल साइट्स पर भी इसे शिव मंदिर ही कहा गया है, और तो और इस मंदिर के रखरखाव का खर्च भारत सरकार भी उठाती है ।। इस मंदिर में खंडित शिवलिंग , खंडित मूर्तियों की भरमार है , इस मंदिर का निर्माण 4th सदी में हुआ था, यानि कि आज से लगभग 1600 वर्ष पूर्व ।।
हम जो डिंग हांकते है- "हस्ती मिटती नही हमारी".... उसका मुंह तोड़ जवाब वियतनाम भी है, जहां कभी केवल हमारी हस्ती हुआ करती थी, और आज इन मंदिरों में द्वीप प्रज्वलित करने के लिए भी हिन्दू नही बचे ...."
꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂
🌹दिल्ली से लगभग 3700 किलोमीटर दूरी पर एक देश है, जिसका नाम है वियतनाम .....
दिल्ली से अगर वियतनाम जाना हो, तो बीच मे कम से कम 3 या 4 देश पड़ते है । जैसे बांग्लादेश, म्यांमार , लाओस, थाईलैंड ।। वियतनाम में आज हिन्दू धर्म पूरी तरह से लुप्त हो चुका है । जबकि वहां हिन्दू मंदिर प्रचुर मात्रा में आज भी है ।।
यह जो मंदिर आप चित्रों के माध्यम से देख रहे है, इस मंदिर का नाम " My Son Temple " है, जो कि भगवान शिव को समर्पित मंदिर है ।। इस मंदिर की ऑफिशियल साइट्स पर भी इसे शिव मंदिर ही कहा गया है, और तो और इस मंदिर के रखरखाव का खर्च भारत सरकार भी उठाती है ।। इस मंदिर में खंडित शिवलिंग , खंडित मूर्तियों की भरमार है , इस मंदिर का निर्माण 4th सदी में हुआ था, यानि कि आज से लगभग 1600 वर्ष पूर्व ।।
हम जो डिंग हांकते है- "हस्ती मिटती नही हमारी".... उसका मुंह तोड़ जवाब वियतनाम भी है, जहां कभी केवल हमारी हस्ती हुआ करती थी, और आज इन मंदिरों में द्वीप प्रज्वलित करने के लिए भी हिन्दू नही बचे ...."
꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂
Forwarded from ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद* 🌹
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श्री_विजया_मंदिर,_विजयवाड़ा_नगर_|_कृष्णा_नदी_में_नहाने_का_महत्व_
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गरुड़ पुराण में वर्णित 36 नर्क जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा ।
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते है, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते है, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
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अयुथिया (आयुध्या), स्यामदेश 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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शिव गुफा मंदिर मलेशिया
यह गुफा मंदिर कुआंतान के उत्तर में लगभग 25 किमी उत्तर में स्थित है. इस गुफा के अंदर 8 फीट ऊँचा शिवलिंग है जो जाला लिंगगेश्वर के नाम से जाना जाता है और यह शायद दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ऊँचा शिवलिंग है। इस गुफा की चट्टानों से पानी बूंद-बूंद कर शिवलिंग के ऊपर गिरता रहता है।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
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शिव गुफा मंदिर मलेशिया
यह गुफा मंदिर कुआंतान के उत्तर में लगभग 25 किमी उत्तर में स्थित है. इस गुफा के अंदर 8 फीट ऊँचा शिवलिंग है जो जाला लिंगगेश्वर के नाम से जाना जाता है और यह शायद दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ऊँचा शिवलिंग है। इस गुफा की चट्टानों से पानी बूंद-बूंद कर शिवलिंग के ऊपर गिरता रहता है।
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कालिका माता मंदिर, पावागढ़
मेरी संस्कृति ..मेरा देश .. मेरा अभिमान 🚩
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_*अमृत कलश*_
इंडोनेशिया एक मुस्लिम बाहुल्य देश है। यहां एक ऐसा मंदिर है जहां अमृत कलश होने का दावा किया जा रहा है। ये मंदिर मुख्य जावा आइलैंड के बीचों-बीच है। इस मंदिर का नाम कंडी सुकुह है। इस प्राचीन मंदिर में एक कलश है जिस में एक तरल पदार्थ पाया गया है। ये तरल पदार्थ हजारों सालों के बाद भी नहीं सूखा है। यहां लोगों का ऐसा मानना है कि ये वही कलश है जिसे समुद्र मंथन के दौरान निकाला गया था।
साल 2016 की शुरूआत में पुरातत्व विभाग की एक टीम इस मंदिर में मरम्मत का कार्य कर रही थी। काम करने के दौरान यहां इस टीम को कई सारी कलाकृतियां मिली जिन्हें संग्रहालय में भेज दिया गया क्यों कि ये सारी काफी बेशकीमती थी। एक दीवार से टीम को एक कलश मिला। तांबे के बने इस कलश में एक खास तरह का लिक्विड था और इस के साथ ही इस में एक पारदर्शी स्फटिक का बना शिवलिंग भी जुड़ा हुआ था।
इस में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये थी कि इस कलश को जिस दीवार से निकाला गया था उस पर 'अमृत मंथन' की नक्काशी की गई है। इस के साथ ही कंडी सुकुह में एक दीवार में महाभारत के आदिपर्व का वर्णन किया गया है।
पुरातत्व विभाग द्वारा उद्धार किए गए इस कलश की कार्बन डेटिंग लगभग बारहवीं सदी के आसपास बताई गई है। उस दौरान इंडोनेशिया हिंदू राष्ट्र्र था। पंद्रहवीं शताब्दी जब यहां इस्लाम का खतरा मंडराया तो यहां मंदिरों का बनना कम हो गया और शायद इसी डर की वजह से कलश को यहां इस मंदिर में छिपा दिया गया होगा। मरम्मत कार्य के दौरान टीम को कई सारे कीमती रत्न भी मिलें। इंडोनेशिया में अकसर हिंदू मंदिर के अवशेष मिलते हैं।
इंडोनेशिया एक मुस्लिम बाहुल्य देश है। यहां एक ऐसा मंदिर है जहां अमृत कलश होने का दावा किया जा रहा है। ये मंदिर मुख्य जावा आइलैंड के बीचों-बीच है। इस मंदिर का नाम कंडी सुकुह है। इस प्राचीन मंदिर में एक कलश है जिस में एक तरल पदार्थ पाया गया है। ये तरल पदार्थ हजारों सालों के बाद भी नहीं सूखा है। यहां लोगों का ऐसा मानना है कि ये वही कलश है जिसे समुद्र मंथन के दौरान निकाला गया था।
साल 2016 की शुरूआत में पुरातत्व विभाग की एक टीम इस मंदिर में मरम्मत का कार्य कर रही थी। काम करने के दौरान यहां इस टीम को कई सारी कलाकृतियां मिली जिन्हें संग्रहालय में भेज दिया गया क्यों कि ये सारी काफी बेशकीमती थी। एक दीवार से टीम को एक कलश मिला। तांबे के बने इस कलश में एक खास तरह का लिक्विड था और इस के साथ ही इस में एक पारदर्शी स्फटिक का बना शिवलिंग भी जुड़ा हुआ था।
इस में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये थी कि इस कलश को जिस दीवार से निकाला गया था उस पर 'अमृत मंथन' की नक्काशी की गई है। इस के साथ ही कंडी सुकुह में एक दीवार में महाभारत के आदिपर्व का वर्णन किया गया है।
पुरातत्व विभाग द्वारा उद्धार किए गए इस कलश की कार्बन डेटिंग लगभग बारहवीं सदी के आसपास बताई गई है। उस दौरान इंडोनेशिया हिंदू राष्ट्र्र था। पंद्रहवीं शताब्दी जब यहां इस्लाम का खतरा मंडराया तो यहां मंदिरों का बनना कम हो गया और शायद इसी डर की वजह से कलश को यहां इस मंदिर में छिपा दिया गया होगा। मरम्मत कार्य के दौरान टीम को कई सारे कीमती रत्न भी मिलें। इंडोनेशिया में अकसर हिंदू मंदिर के अवशेष मिलते हैं।
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹#मानस शक्ति पीठ
मानसरोवर तिब्बत
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मानस शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किये हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ पर शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व है। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं। देवीपुराण में ५१ शक्तिपीठों का वर्णन है।
हिंदुओं के लिए कैलास पर्वत 'भगवान शिव का सिंहासन' है। बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए #ऋषभदेव का निर्वाण स्थल है। हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही इसे तांत्रिक शक्तियों का भण्डार मानते हैं। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन है तथापि यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान है।
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव देव अमर हैं। मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। मनसा देवी मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं ७ नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं।
आदि शक्तिपीठों की संख्या ४ मानी जाती है।कालिकापुराण में शक्तिपीठों की संख्या २६ बताई गई है। शिव चरित्र के अनुसार शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं। तंत्र चूड़ामणि, मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शक्ति-पीठ ५२ हैं। भागवत में शक्तिपीठों की संख्या १०८ बताई गई है।
आदि शक्ति के एक रूप सती ने शिवजी से विवाह किया, लेकिन इस विवाह से सती के पिता दक्ष खुश नहीं थे। बाद में दक्ष ने एक यज्ञ किया तो उसमें सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। सती बिना बुलाए यज्ञ में चली गईं। दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कहीं। सती इसे सह न सकीं और सशरीर यज्ञाग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। दुख में डूबे शिव ने सती के शरीर को उठाकर विनाश नृत्य आरंभ किया। इसे रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कर सती की देह के टुकड़े किए। जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वो स्थान शक्तिपीठ बन गए।
देवी माँ का शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है, जहाँ सती की 'बायीं हथेली' का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'दाक्षायणी' तथा भैरव 'अमर' हैं। 'कैलास शक्तिपीठ' मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्मग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह ब्रह्मा के मन से निर्मित होने के कारण ही इसे 'मानसरोवर' कहा गया। यहाँ स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं। जैन धर्मग्रंथों में कैलास को 'अष्टपद' तथा मानसरोवर को 'पद्महद' कहा गया है। इसके सरोवर में अनेक तीर्थंकरों ने स्नान कर तपस्या की थी। बुद्ध के जन्म के साथ भी मानसरोवर का घनिष्ट संबंध है। तिब्बती धर्मग्रंथ 'कंगरी करछक' में मानसरोवर की देवी 'दोर्जे फांग्मो' यहाँ निवास कहा गया है। यहाँ भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विहार करते हैं। इस ग्रंथ में मानसरोवर को 'त्सोमफम' कहते हैं, जिसके पीछे मान्यता है कि भारत से एक बड़ी मछली आकर उस सरोवर में 'मफम' करते हुए प्रविष्ट हुई। इसी से इसका नाम 'त्सोमफम' पड़ गया। मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है, जिसे 'रावण हृद' भी कहते हैं। मानसरोवर का जल एक छोटी नदी द्वारा राक्षस ताल तक जाता है। तिब्बती इस नदी को 'लंगकत्सु' कहते हैं। जैन-ग्रंथों के अनुसार रावण एक बार 'अष्टपद' की यात्रा पर आया और उसने 'पद्महद' में स्नान करना चाहा, किंतु देवताओं ने उसे रोक दिया। तब उसने एक सरोवर, 'रावणहृद' का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर की धारा ले आया तथा स्नान किया।
'मानसे कुमुदा प्रोक्ता' के अनुसार यहाँ की शक्ति 'कुमुदा' हैं, जबकि तंत्र चूड़ामणि के अनुसार शक्ति 'दाक्षायणी' हैं।
'मानसे दक्षहस्तो में देवी दाक्षायणी हर।
अमरो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धि विधायकः॥
राम मनसा निर्मित परम्।
ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः॥
(वाल्मीकि रामायण)
हमारे पुराणों और ग्रंथों में ‘कैलास पर्वत’ को भगवान शंकर और मां पार्वती का निवास स्थान बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शिवजी अपने सभी गणों के साथ इस अलौकिक स्थान पर रहते हैं। शिवपुराण के अनुसार, कैलास धन के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की तपस्थली है। उन्हीं की तपस्या से प्रसन्न होकर भोले भंडारी ने कैलास पर निवास करने का वचन दिया था। इस स्थान को ही कुबेर देवता की अलकापुरी की संज्ञा दी जाती है।
🌹#मानस शक्ति पीठ
मानसरोवर तिब्बत
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मानस शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किये हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ पर शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व है। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं। देवीपुराण में ५१ शक्तिपीठों का वर्णन है।
हिंदुओं के लिए कैलास पर्वत 'भगवान शिव का सिंहासन' है। बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए #ऋषभदेव का निर्वाण स्थल है। हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही इसे तांत्रिक शक्तियों का भण्डार मानते हैं। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन है तथापि यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान है।
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव देव अमर हैं। मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। मनसा देवी मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं ७ नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं।
आदि शक्तिपीठों की संख्या ४ मानी जाती है।कालिकापुराण में शक्तिपीठों की संख्या २६ बताई गई है। शिव चरित्र के अनुसार शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं। तंत्र चूड़ामणि, मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शक्ति-पीठ ५२ हैं। भागवत में शक्तिपीठों की संख्या १०८ बताई गई है।
आदि शक्ति के एक रूप सती ने शिवजी से विवाह किया, लेकिन इस विवाह से सती के पिता दक्ष खुश नहीं थे। बाद में दक्ष ने एक यज्ञ किया तो उसमें सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। सती बिना बुलाए यज्ञ में चली गईं। दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कहीं। सती इसे सह न सकीं और सशरीर यज्ञाग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। दुख में डूबे शिव ने सती के शरीर को उठाकर विनाश नृत्य आरंभ किया। इसे रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कर सती की देह के टुकड़े किए। जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वो स्थान शक्तिपीठ बन गए।
देवी माँ का शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है, जहाँ सती की 'बायीं हथेली' का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'दाक्षायणी' तथा भैरव 'अमर' हैं। 'कैलास शक्तिपीठ' मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्मग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह ब्रह्मा के मन से निर्मित होने के कारण ही इसे 'मानसरोवर' कहा गया। यहाँ स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं। जैन धर्मग्रंथों में कैलास को 'अष्टपद' तथा मानसरोवर को 'पद्महद' कहा गया है। इसके सरोवर में अनेक तीर्थंकरों ने स्नान कर तपस्या की थी। बुद्ध के जन्म के साथ भी मानसरोवर का घनिष्ट संबंध है। तिब्बती धर्मग्रंथ 'कंगरी करछक' में मानसरोवर की देवी 'दोर्जे फांग्मो' यहाँ निवास कहा गया है। यहाँ भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विहार करते हैं। इस ग्रंथ में मानसरोवर को 'त्सोमफम' कहते हैं, जिसके पीछे मान्यता है कि भारत से एक बड़ी मछली आकर उस सरोवर में 'मफम' करते हुए प्रविष्ट हुई। इसी से इसका नाम 'त्सोमफम' पड़ गया। मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है, जिसे 'रावण हृद' भी कहते हैं। मानसरोवर का जल एक छोटी नदी द्वारा राक्षस ताल तक जाता है। तिब्बती इस नदी को 'लंगकत्सु' कहते हैं। जैन-ग्रंथों के अनुसार रावण एक बार 'अष्टपद' की यात्रा पर आया और उसने 'पद्महद' में स्नान करना चाहा, किंतु देवताओं ने उसे रोक दिया। तब उसने एक सरोवर, 'रावणहृद' का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर की धारा ले आया तथा स्नान किया।
'मानसे कुमुदा प्रोक्ता' के अनुसार यहाँ की शक्ति 'कुमुदा' हैं, जबकि तंत्र चूड़ामणि के अनुसार शक्ति 'दाक्षायणी' हैं।
'मानसे दक्षहस्तो में देवी दाक्षायणी हर।
अमरो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धि विधायकः॥
राम मनसा निर्मित परम्।
ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः॥
(वाल्मीकि रामायण)
हमारे पुराणों और ग्रंथों में ‘कैलास पर्वत’ को भगवान शंकर और मां पार्वती का निवास स्थान बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शिवजी अपने सभी गणों के साथ इस अलौकिक स्थान पर रहते हैं। शिवपुराण के अनुसार, कैलास धन के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की तपस्थली है। उन्हीं की तपस्या से प्रसन्न होकर भोले भंडारी ने कैलास पर निवास करने का वचन दिया था। इस स्थान को ही कुबेर देवता की अलकापुरी की संज्ञा दी जाती है।
कैलास पर्वत २२,०२८ फीट ऊंचा पिरामिड है। यह पूरे साल बर्फ की सफेद चादर में लिपटा रहता है। मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। साथ ही यह उतना ही पुराना है जितनी हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश और ध्वनि तरंगों का समागम होता है जो ‘ऊं’ की प्रतिध्वनि करता है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। इस पर्वत का स्वरूप अद्भुत है। यही वजह है इसके हर भाग को अलग-अलग नामों से संबोधित किया जाता है। पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण के रूप में माना जाता है। पौराणिक कथाओं में यह जिक्र मिलता है कि यह स्थान कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलास पर्वत की चोटी पर गिरती है। यहां से भोलेनाथ उन्हें अपनी जटाओं में भरकर धरती पर प्रवाहित करते हैं।
कैलास में मानसरोवर दर्शन की विशेष महिमा है। मान्यता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी। इसके अलावा उन्होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा इस जगह के बारे में बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
कैलास में मानसरोवर दर्शन की विशेष महिमा है। मान्यता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी। इसके अलावा उन्होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा इस जगह के बारे में बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*