ओजस्वी भारत
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राष्ट्र एवं भारतीय संस्कृति पर हो रहे आघातों पर भारतीयों की आवाज बुलंद करने का अचूक माध्यम !!
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🚩सीमित आंदोलन
हालांकि, बहुत कम समय में आंदोलन देश के कई हिस्सों तक पहुंच गया लेकिन देश के एक बड़े हिस्से पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। खासतौर पर दोआब क्षेत्र में इसका असर रहा। दक्षिण के प्रांतों ने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया। अहम शासकों, जैसे- सिंधिया, होल्कर, जोधपुर के राणा और अन्यों ने विद्रोह का समर्थन नहीं किया।

🚩प्रभावी नेतृत्व का अभाव

🚩विद्रोह के लिए असरदार नेतृत्व का अभाव था। नाना साहेब, तांत्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई की बहादुरी पर कोई शक नहीं है लेकिन वे आंदोलन को पूरे देश में असरदार नेतृत्व नहीं दे सके। इसके अलावा विद्रोहियों में अनुभव, संगठन क्षमता व मिलकर कार्य करने की शक्ति की कमी थी। विद्रोही क्रांतिकारियों के पास ठोस लक्ष्य एवं स्पष्ट योजना का अभाव था। उन्हें अगले क्षण क्या करना होगा और क्या नहीं- यह भी निश्चित नहीं था। वे मात्र भावावेश एवं परिस्थितिवश आगे बढ़े जा रहे थे। सैनिक दुर्बलता का विद्रोह की असफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बहादुरशाह जफर और नाना साहब एक कुशल संगठनकर्ता अवश्य थे, पर उनमें सैन्य नेतृत्व की क्षमता की कमी थी, जबकि अंग्रेजी सेना के पास लॉरेन्स ब्रदर्स, निकोलसन, हेवलॉक, आउट्रम एवं एडवर्ड जैसे कुशल सेनानायक थे।

🚩सीमित संसाधन

🚩विद्रोहियों के पास न संख्याबल था और न पैसा। उसके उलट ब्रिटिश सेना के पास बड़ी संख्या में सैनिक, पैसा और हथियार थे जिसके बल पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे।

🚩मध्य वर्ग का हिस्सा नहीं लेना

🚩1857 ई. के इस विद्रोह के प्रति ‘शिक्षित वर्ग’ पूर्ण रूप से उदासीन रहा। व्यापारियों एवं शिक्षित वर्ग ने कलकत्ता एवं बंबई में सभाएं कर अंग्रेजों की सफलता के लिए प्रार्थना भी की थी। अगर इस वर्ग ने अपने लेखों एवं भाषणों द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया होता, तो निःसंदेह ही क्रांति के इस विद्रोह का परिणाम कुछ ओर ही होता।

🚩विद्रोह के परिणाम

🚩विद्रोह के समाप्त होने के बाद 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया और अब भारत पर शासन का पूरा अधिकार महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। इंग्लैंड में 1858 ई. के अधिनियम के तहत एक ‘भारतीय राज्य सचिव’ की व्यवस्था की गयी, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ‘मंत्रणा परिषद्’ बनाई गई। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा 7 की ‘कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स’ द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई।

🚩हड़प नीति की समाप्ति

🚩ब्रिटिश सरकार की हड़प नीति को समाप्त कर दिया गया। कानूनी वारिस के तौर पर पुत्र गोद लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया।

🚩1857 का विद्रोह इसलिए भी अहम था क्योंकि भारत की आजादी की लड़ाई के लिए इसकी वजह से मार्ग प्रशस्त हुआ।

🚩इस आंदोलन से हमें समझना चाहिए कि वर्तमान में जिस तरह देश की स्थिति है उसमें भी कहीं न कहीं आज़ादी को खतरा है- ऐसा लग रहा है, इसलिए देश में रहते हुए देश के साथ गद्दारी करनेवालों की पहचान होनी चाहिए और उनके फन कुचलने चाहिए जिससे हमारा देश सुरक्षित रहे।

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मज़हबी लोगों के लिए संविधान नहीं है क्या???

11 मई 2022
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🚩शाहीन बाग वालो ने कोर्ट के फैसले की धज्जियां उड़ाई।

🚩शाहीन बाग में देश का नही,मजहबी धर्म का कानून

🚩9 मई 2022 को कोर्ट ने शाहीन बाग में अतिक्रमण हटाने के लिए जब बुलडोजर भेजा तो शाहीन बाग के मजहबी लोगों ने बुलडोजर को रोक लिया और बुलडोजर को वापस पहुँचा दिया।

🚩क्या शाहीन बाग में भारत का संविधान लागू नही होता???

🚩दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी ) ने पुलिस को शाहीन बाग में अतिक्रमण रोधी अभियान में बाधा डालने के आरोप में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ FIR दर्ज की।

🚩ईशा पांडे ने कहा, 'एसडीएमसी से प्राप्त शिकायत के आधार पर अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 186 , 353 और 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

🚩 शाहीन बाग के थाना प्रभारी को दी गई एक शिकायत में एसडीएमसी के सेंट्रल जोन लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर ने कहा है कि शाहीन बाग में मुख्य सड़क पर सोमवार को अतिक्रमण हटाने का अभियान तय किया गया था और कार्रवाई को अंजाम देने के लिए उसके कर्मचारी और पुलिस कर्मी मौके पर मौजूद थे, शिकायत में कहा गया, 'विधायक (ओखला) अमानतुल्लाह खान ने अपने समर्थकों के साथ एसडीएमसी के कर्मियों को अतिक्रमण नहीं हटाने दिया।

🚩शाहीन बाग में बुलडोजर कार्रवाई पर सेंट्रल जन के चेयरमैन राजपाल सिंह ने कहा कि हम कार्रवाई के लिए तैयार हैं।

🚩दिल्ली के कई हिन्दू संगठनों की मांग है कि शाहीन बाग मजहबी लोगों पर सख्ती बनाना अनिवार्य है,क्योंकि जो मजहबी लोग कोर्ट के आदेशों की धज्जिया उड़ा देते है ,वे इंसान कहलाने लायक नहीं है।

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भारत के महान राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को नमन

12 मई 2022
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🚩13 मई 1962 को सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन देश के दूसरे राष्ट्रपति बने थे।

🚩सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952-1962) और 1962 से 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक रहा।

🚩वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक ,देशभक्त, एवं महान हिन्दू विचारक थे।

🚩डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी ग्राम के एक तेलुगुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था।

🚩सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये।

🚩यद्यपि उन्हें 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उसका औचित्य डॉ॰ राधाकृष्णन के लिये समाप्त हो चुका था।

🚩जब वे उपराष्ट्रपति बन गये तो स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद जी ने 1954 में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।

🚩उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

🚩डॉ॰ राधाकृष्णन ने यह भली भाँति जान लिया था कि जीवन बहुत ही छोटा है परन्तु इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिये।

🚩उनका कहना है कि वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो अमीर ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी प्रकार का वर्ग भेद नहीं करती। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है।

🚩ऐसे महापुरूषों के कारण ही आज भारत की संस्कृति जीवित है,अन्यथा ईसाई मिशनरी वाले कब से खत्म कर देते!

🚩आज देश को पुनः डॉ. राधाकृष्णन जैसे महान देशभक्तों की आवश्यकता है।

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वास्कोडिगामा खोजी नहीं, बल्कि ईसाई डाकू था।

14 मई 2022
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🚩वास्कोडिगामा ने भारत को जमकर लुटा

🚩भारतवासियों को आज गलत इतिहास पढ़ाया जाता है कि वास्कोडिगामा ने भारत को खोजा और उन्नत किया।

🚩सत्य ये है कि वास्कोडिगामा ने भारत को बर्बाद किया.....

🚩वास्कोडिगामा को भारत के आधुनिक लेखक उसे भारत की खोज करने वाला लिखते हैं। भारत तो पहले से सम्रद्ध व्यापारी देश के रूप में संसार भर में प्रसिद्ध था।

🚩वास्कोडिगामा ने भारत की नहीं बल्कि यूरोप और भारत के बीच के समुद्री रास्ते की खोज की थी।

🚩उसके बाद वास्कोडिगामा और पुर्तगालियों ने भारत में हत्याएं की,अमानवीय अत्याचार किया, संपति को लूटा,केरल से गोवा तक पहुँचकर अपना शासन स्थापित किया और ईसाई धर्मान्तरण शुरू किया।

🚩भारत के जिन महापुरूषों ने,ऋषि,मुनियो ने भारत का उत्थान किया उनकी बाते इतिहास में उतनी नही पढ़ाई जाती,जितनी भारत के लुटेरों की महिमा पढ़ाई जा रही हैं।

🚩ऐसे तो भारत लुटेरों में कई नाम की लिस्ट है,पर यहाँ आपको वास्कोडिगामा लुटेरे के बारे में बताया जा रहा हैं।

🚩वास्कोडिगामा पहली बार भारत आया तो 1 जहाज में 5 लाख टन समान आता है,ऐसे 7 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।

🚩वास्कोडिगामा जब दूसरी बार भारत आया तो 11 जहाज सोना भर के यूरोप ले गया।

🚩वास्कोडिगामा जब तीसरी बार भारत आया तो 17 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।

🚩भारत से वास्कोडिगामा ऐसे तीनो बार मे टोटल मिलाकर 35 जहाज सोना भरकर यूरोप ले गया।

🚩वास्कोडिगामा 1498 में समुद्र के रास्ते पूर्वी हिस्से से भारत आया और भारत को लूटा चालू किया और करोड़ो-अरबो-खरबों रुपये के हीरे जवाहरात लूट कर यूरोप ले गया।

🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने वास्कोडिगामा को आदेश दिया कि पूर्वी भारत से भारत को लूटना चालू करो और फिर वास्कोडिगामा ने जमकर भारत को लूटा।

🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने उसी समय कोलम्बस को भी आदेश दिया था कि कोलम्बस तुम जाकर अमेरिका को लूटना चालू करो और फिर कोलम्बस ने भी जमकर अमेरिका को लूटा था।

🚩लेकिन भारतीयों के भोलेपन ने और कुछ लोगों के अंदर के अंदर टांग खिंचने की आदत ने सोने की चिड़िया कहाने वाले भारत को लुटेरों से बचा नहीं पाए।

🚩भारतीय संस्कृति कहती है कि शरीर आपका तंदुरुस्त रहे,मन आपका प्रसन्न रहे और बुद्धि में आपकी समता रहे,सब मानव मात्र का भला हो ।

🚩लेकिन विधर्मी लोग सदैव हिन्दू संस्कृति और हिन्दुस्तान को कोसते रहे है,ओर लूटते रहे हैं,इसलिए भारतीयों को एकजुट होना पड़ेगा और विधर्मी लोगों को दिन के तारे दिखाना होगा।

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भगवान बुद्ध जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं...

15 मई 2022
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🚩भगवान बुद्ध ने जवानी में राजपाट छोड़कर साधना करके परमात्मा प्राप्ति कर ली।

🚩उनका यश चहु ओर फैलने लगा,उनको देखकर दुर्जन लोग जलने लगे और उनके खिलाफ वैश्या से दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाकर खूब बदनाम किया पर आज उनकी जय जयकार हो रही है।

🚩वर्तमान समय में भी साधु-संतों पर यही सिलसिला जारी है।पर सत्य की ही जीत होगी।

🚩भगवान बुद्ध ने समाज को जगाया पर उनके खिलाफ ही रचा गया षड्यंत्र।

🚩 भगवान बुद्ध का जन्म 483 और 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्यगणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकटलुंबिनी, नेपाल में हुआ था । लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था ।

🚩 कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी को अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया । शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया ।

🚩कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन का युवराज था सिद्धार्थ! यौवन में कदम रखते ही विवेक और वैराग्य जाग उठा। युवान पत्नी यशोधरा और नवजात शिशु राहुल की मोह-ममता की रेशमी जंजीर काटकर महाभीनिष्क्रमण (गृहत्याग) किया। एकान्त अरण्य में जाकर गहन ध्यान साधना करके अपने साध्य तत्त्व को प्राप्त कर लिया।

🚩एकान्त में तपश्चर्या और ध्यान साधना से खिले हुए इस आध्यात्मिक कुसुम की मधुर सौरभ लोगों में फैलने लगी। अब सिद्धार्थ भगवान बुद्ध के नाम से जन-समूह में प्रसिद्ध हुए। हजारों हजारों लोग उनके उपदिष्ट मार्ग पर चलने लगे और अपनी अपनी योग्यता के मुताबिक आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हुए आत्मिक शांति प्राप्त करने लगे। असंख्य लोग बौद्ध भिक्षुक बनकर भगवान बुद्ध के सान्निध्य में रहने लगे। उनके पीछे चलने वाले अनुयायियों का एक संघ स्थापित हो गया।

🚩चहुँ ओर नाद गूँजने लगे :
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।

🚩श्रावस्ती नगरी में भगवान बुद्ध का बहुत यश फैला। लोगों में उनकी जय-जयकार होने लगी। लोगों की भीड़-भाड़ से विरक्त होकर बुद्ध नगर से बाहर जेतवन में आम के बगीचे में रहने लगे। नगर के पिपासु जन बड़ी तादाद में वहाँ हररोज निश्चित समय पर पहुँच जाते और उपदेश-प्रवचन सुनते। बड़े-बड़े राजा महाराजा भगवान बुद्ध के सान्निध्य में आने जाने लगे।

🚩समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं। अनादि काल से दैवी सम्पदा के लोग एवं आसुरी सम्पदा के लोग हुआ करते हैं। बुद्ध का फैलता हुआ यश देखकर उनका तेजोद्वेष करने वाले लोग जलने लगे। और जैसा कि संतों के साथ हमेशा से होता आ रहा है ऐसे उन दुष्ट तत्त्वों ने बुद्ध को बदनाम करने के लिए कुप्रचार किया। विभिन्न प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियाँ लड़ाकर बुद्ध के यश को हानि पहुँचे ऐसी बातें समाज में वे लोग फैलाने लगे। उन दुष्टों ने अपने षड्यंत्र में एक वेश्या को समझा-बुझाकर शामिल कर लिया।

🚩वेश्या बन-ठनकर जेतवन में भगवान बुद्ध के निवास-स्थान वाले बगीचे में जाने लगी। धनराशि के साथ दुष्टों का हर प्रकार से सहारा एवं प्रोत्साहन उसे मिल रहा था। रात्रि को वहीं रहकर सुबह नगर में वापिस लौट आती। अपनी सखियों में भी उसने बात फैलाई।

🚩लोग उससे पूछने लगेः “अरी! आजकल तू दिखती नहीं है?कहाँ जा रही है रोज रात को?”
“मैं तो रोज रात को जेतवन जाती हूँ। वे बुद्ध दिन में लोगों को उपदेश देते हैं और रात्रि के समय मेरे साथ रंगरलियाँ मनाते हैं। सारी रात वहाँ बिताकर सुबह लौटती हूँ।”

🚩वेश्या ने पूरा स्त्रीचरित्र आजमाकर षड्यंत्र करने वालों का साथ दिया । लोगों में पहले तो हल्की कानाफूसी हुई लेकिन ज्यों-ज्यों बात फैलती गई त्यों-त्यों लोगों में जोरदार विरोध होने लगा। लोग बुद्ध के नाम पर फटकार बरसाने लगे। बुद्ध के भिक्षुक बस्ती में भिक्षा लेने जाते तो लोग उन्हें गालियाँ देने लगे। बुद्ध के संघ के लोग सेवा-प्रवृत्ति में संलग्न थे। उन लोगों के सामने भी उँगली उठाकर लोग बकवास करने लगे।

🚩बुद्ध के शिष्य जरा असावधान रहे थे। #कुप्रचार के समय साथ ही साथ सुप्रचार होता तो कुप्रचार का इतना प्रभाव नहीं होता।

🚩शिष्य अगर निष्क्रिय रहकर सोचते रह जाएं कि ‘करेगा सो भरेगा… भगवान उनका नाश करेंगे..’ तो कुप्रचार करने वालों को खुला मैदान मिल जाता है।

🚩 संत के सान्निध्य में आने वाले लोग श्रद्धालु, सज्जन, सीधे सादे होते हैं, जबकि दुष्ट प्रवृत्ति करने वाले लोग कुटिलतापूर्वक कुप्रचार करने में कुशल होते हैं। फिर भी जिन संतों के पीछे सजग समाज होता है उन संतों के पीछे उठने वाले कुप्रचार के तूफान समय पाकर शांत हो जाते हैं और उनकी सत्प्रवृत्तियाँ प्रकाशमान हो उठती हैं।
🚩कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा कि बुद्ध के निकटवर्ती लोगों ने ‘त्राहिमाम्’ पुकार लिया। वे समझ गये कि यह व्यवस्थित आयोजन पूर्वक षड्यंत्र किया गया है। बुद्ध स्वयं तो पारमार्थिक सत्य में जागे हुए थे। वे बोलतेः “सब ठीक है, चलने दो। व्यवहारिक सत्य में वाहवाही देख ली। अब निन्दा भी देख लें। क्या फर्क पड़ता है?

🚩शिष्य कहने लगेः “भन्ते! अब सहा नहीं जाता। संघ के निकटवर्ती भक्त भी अफवाहों के शिकार हो रहे हैं। समाज के लोग अफवाहों की बातों को सत्य मानने लग गये हैं।”

🚩बुद्धः “धैर्य रखो। हम पारमार्थिक सत्य में विश्रांति पाते हैं। यह विरोध की आँधी चली है तो शांत भी हो जाएगी। समय पाकर सत्य ही बाहर आयेगा। आखिर में लोग हमें जानेंगे और मानेंगे।”

🚩कुछ लोगों ने अगवानी का झण्डा उठाया और राज्यसत्ता के समक्ष जोर-शोर से माँग की कि बुद्ध की जाँच करवाई जाये। लोग बातें कर रहे हैं और वेश्या भी कहती है कि बुद्ध रात्रि को मेरे साथ होते हैं और दिन में सत्संग करते हैं।

🚩बुद्ध के बारे में जाँच करने के लिए राजा ने अपने आदमियों को फरमान दिया। अब षड्यंत्र करनेवालों ने सोचा कि इस जाँच करने वाले पंच में अगर सच्चा आदमी आ जाएगा तो अफवाहों का सीना चीरकर सत्य बाहर आ जाएगा। अतः उन्होंने अपने षड्यंत्र को आखिरी पराकाष्ठा पर पहुँचाया। अब ऐसे ठोस सबूत खड़ा करना चाहिए कि बुद्ध की प्रतिभा का अस्त हो जाये।

🚩षडयंत्रकारियों ने वेश्या को दारु पिलाकर जेतवन भेज दिया। पीछे से गुण्डों की टोली वहाँ गई। वेश्या के साथ बलात्कार आदि सब दुष्ट कृत्य करके उसका गला घोंट दिया और लाश को बुद्ध के बगीचे में गाड़कर पलायन हो गये।

🚩लोगों ने राज्यसत्ता के द्वार खटखटाये थे लेकिन सत्तावाले भी कुछ लोग दुष्टों के साथ जुड़े हुए थे। ऐसा थोड़े ही है कि सत्ता में बैठे हुए सब लोग दूध में धोये हुए व्यक्ति होते हैं।

🚩राजा के अधिकारियों के द्वारा जाँच करने पर वेश्या की लाश हाथ लगी। अब दुष्टों ने जोर-शोर से चिल्लाना शुरु कर दिया।

🚩“देखो, हम पहले ही कह रहे थे। वेश्या भी बोल रही थी लेकिन तुम भगतड़े लोग मानते ही नहीं थे। अब देख लिया न? बुद्ध ने सही बात खुल जाने के भय से वेश्या को मरवाकर बगीचे में गड़वा दिया। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। लेकिन सत्य कहाँ तक छिप सकता है? मुद्दामाल हाथ लग गया। इस ठोस सबूत से बुद्ध की असलियत सिद्ध हो गई। सत्य बाहर आ गया।”

🚩लेकिन उन मूर्खों को पता नहीं कि तुम्हारा बनाया हुआ कल्पित सत्य बाहर आया, वास्तविक सत्य तो आज ढाई हजार वर्ष के बाद भी वैसा ही चमक रहा है। आज बुद्ध भगवान को लाखों लोग जानते हैं, आदरपूर्वक मानते हैं। उनका तेजोद्वेष करने वाले दुष्ट लोग कौन-से नरकों में जलते होंगे क्या पता!

🚩 वर्तमान में जिन संतों के ऊपर आरोप लग रहे हैं उनके भक्त अगर सच्चाई किसी को बताने जाएंगे तो दुष्ट प्रकृति के लोग तो बोलेंगे ही, लेकिन जो हिंदूवादी और राष्ट्रवादी कहलाने वाले लोग है वे भी यही बोलेंगे की कि बुद्ध तो भगवान थे।

🚩 आजकल के संत ऐसे ही है, उनको इतने पैसे की क्या जरूत है? लड़कियों से क्यों मिलते हैं..??? ऐसे कपड़े क्यों पहनते हैं..??? आदि आदि…।

🚩पर उनको पता नही है कि पहले ऋषि मुनियों के पास इतनी सम्पत्ति होती थी कि राजकोष में धन कम पड़ जाता था तो ऋषि मुनियों से लोन लिया जाता था और रही कपड़े की बात तो कई भक्तों की भावना होती है तो पहन लेते हैं और लड़कियां दुःखी होती हैं तो उनके मां-बाप लेकर आते हैं तो कोई दुःख होता है तो मिल लेते हैं,उनके घर थोड़े ही बुलाने जाते हैं और भी कई तर्क वितर्क करेगे लेकिन भक्तों को दुःखी नहीं होना चाहिए। सबके बस की बात नही है कि महापुरुषों को पहचान पाये, आप अपने गुरूदेव का प्रचार प्रसार करते रहें, एक दिन ऐसा आएगा कि निंदा करने वाले भी आपके पास आयेंगे और बोलेंगे कि मुझे भी अपने गुरु के पास ले चलो।

🚩विदेशी फंडेड मीडिया ने हिंदू साधु-संतों की झूठी कहानी बनाकर समाज को परोसी, जिससे समाज गुमराह हो गया और सच्चाई न जानकर झूठ को ही सच मान बैठे, कुछ स्वार्थी नेता राष्ट्रविरोधी ताकतों से मिलकर झूठे केस में संतो को जेल भिजवा रहे हैं पर उसका भी देर सवेर खुलासा होगा क्योंकि सत्य को परेशान किया जाता है पराजित कभी नहीं…।

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🚩🍉 तरबूज के ये फायदे जानकर आप हो जाएंगे हैरान......केवल तरबूज ही नहीं इसके छिलके के भी हैं ढेरों फायदे.......

16 मई 2022
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🚩🍉 केवल तरबूज ही नहीं इसके छिलके के भी हैं ढेरों फायदे तरबूज के छिलकों की सब्जी बनाकर सभी को खाना चाहिए और इसका प्रचार भी हो ताकि अन्य को भी इसका लाभ मिले।

🚩 सब्जी बनाने में आमचूर का उपयाेग नहीं करना है। यह त्रिदोष कारक होता है। इसकी जगह टमाटर, इमली, आमला पाउडर गुणकारी है।

🚩 तरबूज के छिलके (Watermelon Peel) में भी तरबूज की तरह ही बहुत सारे गुण होते हैं. इसके सेवन से शरीर को कई फायदे मिलते हैं।

🚩 अभी तक आपने तरबूज खाने के फायदे के बारे में पढ़ा और सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं, कि तरबूज की तरह ही इसके छिलके (Melon peel) में भी एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन सी, ए, बी6, जिंक, पोटेशियम और खनिज के साथ-साथ लाइकोपीन, सिट्रूललाइन, क्लोरोफिल और फेनोलिक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं और इतने सारे गुण (Many qualities) होने के चलते इसके सेवन से शरीर को कई तरह के फायदे (Benefits) मिलते हैं ? इसलिए अगर आप भी तरबूज खाने के बाद इसके छिलके को फेंक देते हैं, तो ऐसा करने से पहले यहां बताए जा रहे तरबूज के छिलकों के फायदों के बारे में जरूर पढ़ लें

🚩 तो आइए जानते हैं कि तरबूज का छिलका हमारे शरीर के लिए किस तरह से फायदेमंद है। अगर आप चाहें तो छिलकों की टूटी-फ्रूटी या अचार बनाकर भी इसका सेवन कर सकते हैं।

👉 इम्यूनिटी बढ़ाता है :

🚩 इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन काफी मदद करता है। इसमें काफी मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिकारक शक्ति) को मजबूत बनाने में सहायक है। साथ ही ये वाइट ब्लड सेल्स के उत्पादन को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे शरीर में इंफेक्शन नहीं होता और इम्यूनिटी बढ़ती है।


👉 ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है :
🚩 तरबूज के छिलके के सेवन से ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। अगर आप भी अपना ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना चाहते हैं तो इस सीजन में तरबूज के साथ इसके छिलकों का सेवन भी जरूर करें।

👉 कब्ज़ दूर करता है :

🚩 : कब्ज़ को दूर करने के लिए भी तरबूज के छिलके का सेवन किया जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर होता है जो कब्ज से राहत देकर मोशन को सही करने में मदद करता है।

👉 ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है:

🚩 : तरबूज का छिलका खाने से ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल सही रहे, तो आप भी इस गर्मी तरबूज के साथ ही इसके छिलके का सेवन भी ज़रूर करें।

👉 एनर्जी बढ़ाता है :

🚩 : तरबूज के छिलके का सेवन आपकी एनर्जी बढ़ाने का भी काम करता है। इसके छिलके में सिट्रूललाइन एमिनो एसिड पाया जाता है जो मांसपेशियों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। इससे शरीर को भरपूर शक्ति मिलती है और शरीर की कार्यक्षमता बढाने में मदद मिलती है।

👉 वजन कम करता है :

🚩 : जिनका वजन बहुत अधिक हो, वे भी वजन कम करने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन कर सकते हैं। इसके छिलके के सेवन से फैट को बर्न करने में मदद मिलती है। इसके लिए इसमें मौजूद सिट्रूललाइन एमिनो एसिड सहायता करता है।

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ज्ञानवापी खाली करो

17 मई 2022
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🚩मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर के बीच 10 फिट का गहरा कुआं है,जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है।

🚩मुसलमानों ने कब्जा कर , इस कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम कर दिया।

🚩स्कंद पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था।

🚩ज्ञानवापी मंदिर भगवान शिव का प्राचीन मंदिर था,जिसे मुस्लिम आक्रांत औरंगजेब ने 1669 मैं मंदिर तोड़कर वहां पर मस्जिद बनवाई, इसी अनगिनत जगह है जहां मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई हुई है। इस घटना का वर्णन इसिहास में मिलता है तथा सर्वे के दौरान मस्जिद में मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं।

🚩ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है,नंदी की प्रतिमा मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । इतिहासकारों ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है।

🚩जिसे ज्ञानवापी का तहखाना कहा जा रहा है दरअसल वो पुराने तोड़े गए विश्वनाथ मंदिर का गर्भगृह है । विश्वनाथ मंदिर के पक्षकार विजय शंकर रस्तोगी जी ने दावा किया है कि मस्जिद में एक तहखाना है और तहखाने में अत्यंत विशाल शिवलिंग आज भी विद्यमान है।

🚩काशी ज्ञानवापी मस्जिद पहले मंदिर था उसको मुसलमानों ने कब्जा कर मस्जिद का रूप दिया अभी भी उसमें देवी देवताओं के मूर्ति के चिन्ह मिलते हैं इससे साफ होता है कि ज्ञानवापी मस्जिद नहीं मंदिर है।

🚩ज्ञानवापी को लेकर चौंकाने वाले रहस्य उजागर होना लगातार जारी।

🚩ज्ञानवापी परिसर को लेकर जब से वीडियोग्राफी और सर्वे की बात की जा रही है पूरे भारत के अखबारों में तरह तरह के दावे और रहस्योद्धाटन लगातार छापे जा रहे हैं ।

🚩मुसलमानों ने कई शिवलिंग को तोड़ा था, महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने जब शिवलिंग को यहां स्थापित करवाया तो उनके मन में ये था कि आगे भी शिवलिंग पर हमला करके मुसलमान शिवलिंग तोड़ सकते हैं इसलिए शिवलिंग को जमीन के अंदर गहरे में स्थापित किया जाए ताकी इसको तोड़ पाना आसान ना हो ।

🚩ज्ञानवापी वाले पुराने विश्वनाथ मंदिर का भी जब निर्माण हुआ हो तो इसी भय की वजह से शिवलिंग जमीन की सतह के नीचे स्थापित करवाया गया हो ताकी मुस्लिम आक्रांता शिवलिंग को ना तोड़ सकें और क्योंकि वो शिवलिंग विशाल रहा होगा तो उसने जमीन के नीचे काफी जगह ली होगी जिसे संभवत: अब तहखाना कहा जा रहा है , वही गर्भगृह है।

🚩 साल 1669 में जब औरंगजेब ने इस मंदिर का विध्वंस किया था । पूरी घटना का जिक्र डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास में है । मंदिर का पुराना नक्शा देखने पर साफ पता चलता है कि प्राचीन मंदिर अष्टकोणीय था और उसके चारों तरफ भी छोटे मंदिरों की श्रृंखला थी ।

🚩डॉ मोतीचंद्र की किताब के मुताबिक इन छोटे मंदिरों को तोड़वा दिया गया और अष्टकोण मंदिर को चीरते हुए तीन तरफ से एक दीवार उठा दी गई । कुछ लोग ये भी दावा करते हैं कि औरंगजेब के सेनापतियों ने जानबूझकर मस्जिद की पश्चिमी दीवार को मंदिर की ही दीवार रहने दिया ताकी सदैव हिंदुओं को अपमानित होने का बोध सालता रहे । डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास के मुताबिक गर्भगृह और आगे के परिसर को बढाकर और मंदिरों को तोड़कर मस्जिद के दालान में बदल दिया गया ।

🚩इस संबंध में कुछ और ही चौंकाने वाले खुलासे यूट्यूब चैनल यूपी तक पर उन महिलाओं ने किए जिन्होंने मां श्रृंगार गौरी का केस दायर किया था । इन महिलाओं ने यू्ट्यूब चैनल पर कहा कि अंजुमन इंतजामिया ने जो बैरीकेड्स लगाए हैं उन बैरीकेड्स के अंदर साल में एक बार दर्शन करने के लिए ये महिलाएं गई थीं और उन महिलाओं ने दावा किया कि आज भी ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है जो कि कथित मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । महिलाओं ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है ।

🚩इस संबंध में एक और वकीर हरिशंकर जैन ने एक टीवी न्यूज चैनल पर दिए गए बयान में आशंका जताई की इस पर भी निगाह रखी जानी चाहिए कि क्या ज्ञानवापी परिसर में प्राचीन निशानों को हटाने के लिए कोई तोड़फोड़ भी की गई है ।

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प्राण दे दिए धर्म के लिए पर धर्म परिवर्तन नही किया, आइए जानते हैं बलिदान कि इस महान गाथा को....

18 मई 2022
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🚩मुगल काल में बलिदान के कई ऐसे किस्से हैं जिन्हें उंगलियों पर गिनाया जा सकता है औरंगजेब के समय में हिंदुओं पर ऐसा कहर ढाया गया कि धरती कांप उठी और आसमान थराने लगा था जिहाद के नाम पर हिंदुओं को बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया जा रहा था औरंगजेब कि सेना को सरे राह जो भी हिंदु या सिक्ख मिलता उसे हिंदुत्व छोडऩे के लिए बाध्य किया जाता, इनकार करने पर उसे यातनाएं दी जाती और फिर उसका सिर कलम कर दिया जाता धर्म परिवर्तन के लिए हिंदुओं को बकरों की तरह काटा जाता था।

🚩औरंगजेब ने इस उद्देश्य के लिए कश्मीर को चुना क्योंकि उन दिनों कश्मीर हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति का गढ़ था वहाँ के पण्डित हिन्दू धर्म के विद्धानों के रूप में विख्यात थे औरंगजेब ने सोचा कि यदि वे लोग इस्लाम में आ जाएंगे तो बाकी अनपढ़ व मूढ़, सीधे सरल जनता को इस्लाम में लाना सहज हो जायेगा और ऐसे विद्वान समय आने पर इस्लाम के प्रचार में सहायक बनेंगे और जनसाधारण को दीन के दायरे में लाने का प्रयत्न करेंगे अतः उसने इफ़तखार ख़ान को शेर अफगान का खिताब देकर कश्मीर भेज दिया और उसके स्थान पर लाहौर का राज्यपाल, गवर्नर फिदायर खान को नियुक्त किया। लेकिन गुरु तेगबहादुर के पास जब कश्मीर से हिन्दू औरंगजेब के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने कि प्रार्थना करने आये तो वे उससे मिलने दिल्ली चल दिये।

🚩दिल्ली जाते समय मार्ग में आगरा में ही उनके साथ भाई मतिदास, भाई सतिदास तथा भाई दयाला को बन्दी बना लिया गया। इनमें से पहले दो सगे भाई थे। हिन्दू का स्वाभिमान नष्ट होता जा रहा था। उनकी अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध प्रतिकार करने कि शक्ति लुप्त होती जा रही थी आगरे से हिन्दुओं पर अत्याचार कि खबर फैलते फैलते लाहौर तक पहुंच गयी हिन्दू स्वाभिमान के प्रतीक भाई मतिराम कि आत्मा यह अत्याचार सुन कर तड़प उठी उन्हें विश्वास था कि उनके प्रतिकार करने से उनके बलिदान देने से निर्बल और असंगठित हिन्दू जाति में नवचेतना का संचार होगा।

🚩भाई मतिराम तत्काल लाहौर से दिल्ली के लिए निकले लेकिन आगरे में इस्लामी मतांध तलवार के सामने सर झुकाए हुए मृत्यु के भय से अपने पूर्वजों के धर्म को छोडऩे को तैयार हिंदुओं को देखा और उन्होंने कायर हिन्दुओ को ललकार कर कहा- कायर कहीं के मौत के डर से अपने प्यारे धर्म को छोडऩे में क्या तुमको लज्जा नहीं आती ! भाई मतिराम कि बात सुनकर मतांध मुसलमान हंस पड़े और उससे कहाँ कि कौन है तू, जो मौत से नहीं डरता? भाई मतिराम ने कहाँ कि अगर तुझमें वाकई दम है तो मुझे मुसलमान बना कर दिखाओ।

🚩भाई मतिराम जी को बंदी बना लिया गया उन्हें अभियोग के लिए आगरे से दिल्ली भेज दिया गया।

🚩तब हाकिम ने बोला तो तुम्हे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा तब मतिराम ने कहा कि मुझे धर्म छोडऩे कि अपेक्षा अपना शरीर छोडऩा स्वीकार है। हाकिम ने फिर कहा कि मतिराम फिर से सोच लो। मतिराम ने फिर कहा कि मेरे पास सोचने का वक्त नहीं हैं हाकिम, तुम केवल और केवल मेरे शरीर को मार सकते हो मेरी आत्मा को नहीं क्योंकि आत्मा अजर, अमर है। न उसे कोई जला सकता हैं न कोई मार सकता है मतिराम को इस्लाम कि अवमानना के आरोप में आरे से चीर कर मार डालने का हाकिम ने दंड दे दिया। चांदनी चौक के समीप खुले मैदान में लोहे के सीखचों के घेरे में मतिराम को लाया गया।

🚩भाई मतिराम को दो जल्लाद उनके दोनों हाथों में रस्से बांधकर उन्हें दोनों ओर से खींचकर खड़े हो गए, दोनों ने उनकी ठोड़ी और पीठ थामी और उनके सर पर आरा रखा। लकड़ी के दो बड़े तख्तों में जकड़कर उनके सिर पर आरा चलाया जाने लगा। जब आरा दो तीन इंच तक सिर में धंस गया तो काजी ने उनसे कहा – मतिदास, अब भी इस्लाम स्वीकार कर ले। शाही जर्राह तेरे घाव ठीक कर देगा। तुझे दरबार में ऊँचा पद दिया जाएगा और तेरी पाँच शादियाँ कर दी जायेंगी।

🚩भाई मतिदास ने व्यंग्यपूर्वक पूछा – काजी, यदि मैं इस्लाम मान लूँ तो क्या मेरी कभी मृत्यु नहीं होगी ? काजी ने कहा कि यह कैसे सम्भव है। जो धरती पर आया है उसे मरना तो है ही। भाई जी ने हँसकर कहा – यदि तुम्हारा इस्लाम मजहब मुझे मौत से नहीं बचा सकता तो फिर मैं अपने पवित्र हिन्दू धर्म में रहकर ही मृत्यु का वरण क्यों न करूँ ?
उन्होंने जल्लाद से कहा कि अपना आरा तेज चलाओ जिससे मैं शीघ्र अपने प्रभु के धाम पहुँच सकूँ। यह कहकर वे ठहाका मार कर हँसने लगे।

🚩काजी ने कहा कि वह मृत्यु के भय से पागल हो गया है। भाई जी ने कहा – मैं डरा नहीं हूँ। मुझे प्रसन्नता है कि मैं धर्म पर स्थिर हूँ। जो धर्म पर अडिग रहता है उसके मुख पर लाली रहती है; पर जो धर्म से विमुख हो जाता है, उसका मुँह काला हो जाता है। कुछ ही देर में उनके शरीर के दो टुकड़े हो गये। भाई मतिदास गुरू हर गोबिंद सिंह के
शिष्य थे उनका जन्म पंजाब के जिला झेलम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था अन्याय के खिलाफ उन्होंने गुरू हरगोविंद के साथ मिलकर कई लड़ाइयां लड़ी थीं उन्होंने निर्भीक होकर अपने प्राण दे दिए थे लेकिन इस्लाम को कबूल नहीं किया था।

🚩औरंगजेब चाहता था कि गुरुजी भी मुसलमान बन जायें। उन्हें डराने के लिए इन तीनों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया पर गुरुजी विचलित नहीं हुए।

🚩औरंगजेब ने सबसे पहले 9 नवम्बर, 1675 को भाई मतिदास को आरे से दो भागों में चीरने को कहा।

🚩अगले दिन 10 नवम्बर को उनके छोटे भाई सतिदास को रुई में लपेटकर जला दिया गया। भाई दयाला को पानी में उबालकर मारा गया। 11 नवम्बर को चाँदनी चौक में गुरु तेगबहादुर का भी शीश काट दिया गया।

🚩ग्राम करयाला, जिला झेलम (वर्तमान पाकिस्तान) निवासी भाई मतिदास एवं सतिदास के पूर्वजों का सिख इतिहास में विशेष स्थान है। उनके परदादा भाई परागा जी छठे गुरु हरगोविन्द के सेनापति थे। उन्होंने मुगलों के विरुद्ध युद्ध में ही अपने प्राण त्यागे थे। उनके समर्पण को देखकर गुरुओं ने उनके परिवार को ‘भाई’ की उपाधि दी थी। भाई मतिदास के एकमात्र पुत्र मुकुन्द राय का भी चमकौर के युद्ध में बलिदान हुआ था।

🚩भाई मतिदास के भतीजे साहबचन्द और धर्मचन्द गुरु गोविन्दसिंह के दीवान थे। साहबचन्द ने व्यास नदी पर हुए युद्ध में तथा उनके पुत्र गुरुबख्श सिंह ने अहमदशाह अब्दाली के अमृतसर में हरिमन्दिर पर हुए हमले के समय उसकी रक्षार्थ प्राण दिये थे। इसी वंश के क्रान्तिकारी भाई बालमुकुन्द ने 8 मई, 1915 को केवल 26 वर्ष की आयु में फाँसी पायी थी। उनकी साध्वी पत्नी रामरखी ने पति की फाँसी के समय घर पर ही देह त्याग दी।

🚩लाहौर में भगतसिंह आदि सैकड़ों क्रान्तिकारियों को प्रेरणा देने वाले भाई परमानन्द भी इसी वंश के तेजस्वी नक्षत्र थे।

🚩हिन्दू धर्म छोडऩे के लिए जब बकरों कि तरह काट दिए जाते थे इन्सान।
आखिर वामपंथी इतिहासकारो कि क्या मज़बूरी थी कि उन्होंने इन बातो का जिक्र इतिहास कि किताबो में नही किया ?
और ऐसे नीच मुगलों को महान बताया।

🚩किसी ने ठीक ही कहा है –
सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत
पुरजा-पुरजा कट मरे, तऊँ न छाड़त खेत ।।
कहते हैं की प्रतिदिन सवा मन हिंदुओं के जनेऊ कि होली फूंक कर ही औरंगजेब भोजन करता था….!!

🚩आज हिंदुस्तान में मुगल काल के गुणगान हो रहे हैं इनके नाम कि सङके व इमारते हैं धिक्कार है उनको जो ऐसे क्रुर, हत्यारे मुगलों का गुणगान करते है।

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लव जिहादियों से सावधान!

19 मई 2022
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🚩 जो हिन्दू लड़की अपने जीवन को नरक जीवन बनाने से बचाना चाहती है,वो मुसलमानों, जिहादियों से बचकर रहें।

🚩आये दिन भारत में कई हिन्दू लड़कियों को लवजिहाद का शिकार होना पड़ रहा है,लवजिहाद पर पाबंदी लगना चाहिए, जो मुसलमान हिन्दू लड़कियों को फंसाकर, उनको मुस्लिम बना रहें हैं, ऐसे मुसलमानों को फाँसी की सजा होनी ही चाहिए।

🚩फर्जी पहचान से हिन्दू लड़की को फसाया,जबरन निकाह के बाद बोला , मेरे भाइयो के साथ हलाला करो।

🚩उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले से लव जिहाद का एक सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। यहाँ शाबाम नाम के युवक ने श्यामू बनकर पहले हिंदू युवती को अपने प्रेम जाल में फँसाया और फिर मंदिर में उसके साथ शादी कर ली।

🚩शादी के एक सप्ताह बाद ही उसने युवती पर निकाह कर मुस्लिम बनने और नमाज पढ़ने का दबाव डाला। युवती के ऐसा न करने पर युवक ने उसे तीन तलाक दे दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब शाबाम अपनी बीवी को भाइयों के साथ हलाला करने के लिए मजबूर कर रहा है।

🚩वहीं, पीड़िता का परिवार इंसाफ पाने के लिए दर-दर भटक रहा है। पीड़िता ने आरोप लगाते हुए कहा है कि पुलिस से शिकायत करने के बाद भी अब तक शाबाम पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। पुलिस अधीक्षक को भी इसके बारे में बताया गया, लेकिन उनकी ओर से भी कोई मदद नहीं मिली।

🚩 बताया जा रहा है कि मालीपुर थाने के सैरपुर उमरन गाँव की युवती की सम्मनपुर के हरदिलपुर में रिश्तेदारी है। आजमगढ़ के पवई थाने के मिल्कीपुर का रहने वाले शाबाम ने श्यामू बनकर युवती के ममेरे भाई सुनील के साथ उसके घर पर आने-जाने लगा। धीरे-धीरे उसने युवती को अपने प्रेम जाल में फँसा लिया और उसके पूरे परिवार को शादी के लिए मना लिया।

🚩पीड़िता के अनुसार, लॉकडाउन के कारण उनकी शादी टल गई थी, ऐसे में उन्हें 10 जुलाई, 2020 को जलालपुर कस्बे के मठिया मंदिर में जाकर विवाह करना पड़ा।

🚩शादी के एक सप्ताह बाद ही शाबाम युवती पर निकाह करने, धर्मांतरण और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगा। परिजनों के साथ आसपास की मुस्लिम महिलाएँ भी उसे नमाज और कलमा पढ़ने के लिए दबाव डालने लगीं।

🚩विरोध करने पर उसके साथ मारपीट भी की गई। इन सबसे बाद भी जब युवती नहीं मानी, तो शाबाम ने उसे तीन तलाक दे दिया, मगर घर से बाहर नहीं जाने दिया। उसने युवती का मोबाइल भी छीन लिया गया। इस बीच शाबाम ने दोबारा निकाह करने की बात कहकर उसे अपने भाई मेंहदी हसन और शरीफ के साथ हलाला करने पर विवश किया।

🚩किसी प्रकार युवती उस शख्स के घर से भागने में सफल रही और अपने पिता के पास पहुँची। उसने उन्हें अपनी आप बीती सुनाई।

🚩 इसके बाद पीड़ित परिवार मालीपुर थाने में शाबाम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, मगर उनका आरोप है कि पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही डांटकर भगा दिया।

🚩वहीं, विश्व हिंदू परिषद (VHP) को जब इस मामले का पता चला तो, उन्होंने पूरे प्रकरण को सीएम योगी तक पहुँचाने की चेतावनी दी। जिसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की है।

🚩इन मुसलमानों को हिन्दू लड़की से शादी करने और फिर उस हिन्दू लड़की को मुस्लिम बनाने के लिए पैसे मिलते है।

🚩हिन्दू लड़किया जिहादियों से बचकर रहें, अन्यथा ये मुसलमान हिन्दू लड़कियो को नरक जीवन देते है।

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