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नमस्ते मित्रों एक दुखद सूचना है कि हमारे साथ में सनातनी आर्य ( अतुल जी) जुड़े हुए थे जो बहुत ही अच्छे दिल के व्यक्ति थे। साथ में रहते थे ,उनके मन में जिज्ञासा थी वैदिक धर्म के प्रति महर्षि दयानंद के साहित्य, वैदिक साहित्य उन्होंने खरीदे हुए थे और पढ़ते भी थे अपने बच्चों को वैदिक पथ पर आगे बढ़ाना चाहते थे। अकस्मात हृदय घात के कारण उनका , देहावसान (मृत्यु )हो गई ।।
परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करें।
ओम् शांतिः शांतिः शांतिः🙏🌺🌺
नहीं तो सुरवों की तरह जिंदगी जीने से कोई लाभ नहीं है जैसा कि आज तथाकथित भोगवादी नास्तिक,कम्युनिस्ट जीते हैं ।
एक ईश्वर को जान कर ही मनुष्य दुःख से छूट सकता है। - भगवान् ऋषिवर देव दयानन्द
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परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करें।
ओम् शांतिः शांतिः शांतिः🙏🌺🌺
इससे यह तो समझ आता है कि जीवन क्षणभंगुर है, जैसा कि भगवान मनु कहते हैं कि एक धर्म ही साथ जाता है अन्य कुछ नहीं, अतः हमें यही प्रयास करना चाहिए कि जब तक हमारे शरीर में प्राण है धर्म युक्त कार्य करते रहें ताकि कल को जब जाए तो चार लोग कहें कि अच्छे व्यक्ति थे धार्मिक थे और समाज और राष्ट्र का भला करके गए जैसे हमारे ऋषि मुनि पूर्वज करके गए , चाहे राम प्रसाद बिस्मिल हो, या सुभाष चंद्र बोस जी हो । सब इसी पथ पर आगे बढ़े।
नहीं तो सुरवों की तरह जिंदगी जीने से कोई लाभ नहीं है जैसा कि आज तथाकथित भोगवादी नास्तिक,कम्युनिस्ट जीते हैं ।
एक ईश्वर को जान कर ही मनुष्य दुःख से छूट सकता है। - भगवान् ऋषिवर देव दयानन्द
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पुराण प्रवचन
नमस्ते मित्रों एक दुखद सूचना है कि हमारे साथ में सनातनी आर्य ( अतुल जी) जुड़े हुए थे जो बहुत ही अच्छे दिल के व्यक्ति थे। साथ में रहते थे ,उनके मन में जिज्ञासा थी वैदिक धर्म के प्रति महर्षि दयानंद के साहित्य, वैदिक साहित्य उन्होंने खरीदे हुए थे और पढ़ते भी…
😭😭हमारे एक भाई अब हमारे बीच नहीं रहे 🙏
क्या सत्यकाम जाबाल ने अपने पिता का गोत्र न पता होने पर माता के गोत्र बताया था ?
एक चुटिया लिख रहा कि सत्यकाम ने जब पिता का गोत्र नहीं बता पाया तो माता का बताया
ऐसा कोई वर्णन छांदोग्य में नहीं है वहां जबाला उसके माता के नाम है न कि माता के गोत्र के।
दूसरी बात माता के जबाला नाम पर सत्यकाम ने अपना नाम जोड़ के बताया था न कि गोत्र को बताया।
केवल अपने माता के नाम को बोलने पर किसी का वंशावली ब्राह्मण सिद्ध हो नहीं सकता क्यों कि उसके लिए गोत्र आवश्यक है जो सत्यकाम नहीं जानता था।
एक चुटिया लिख रहा कि सत्यकाम ने जब पिता का गोत्र नहीं बता पाया तो माता का बताया
ऐसा कोई वर्णन छांदोग्य में नहीं है वहां जबाला उसके माता के नाम है न कि माता के गोत्र के।
दूसरी बात माता के जबाला नाम पर सत्यकाम ने अपना नाम जोड़ के बताया था न कि गोत्र को बताया।
केवल अपने माता के नाम को बोलने पर किसी का वंशावली ब्राह्मण सिद्ध हो नहीं सकता क्यों कि उसके लिए गोत्र आवश्यक है जो सत्यकाम नहीं जानता था।
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क्या जन्म से ही हर ब्राह्मण का बच्चा सत्यवादी होता है?
ले भृगु भगवान ऋषि ने यह भी बोला है कि ब्राह्मण में अगर सत्य का अभाव हो तो वो शूद्र हो जाता है ब्राह्मण नहीं रहता😂😂
अर्थात् ब्राह्मण कुल के किसी व्यक्ति में भी सत्य आदि गुणों का अभाव होना प्रत्यक्ष है।
इस से सत्यकाम जाबाल भले ही गोत्र से न हो पर आचरण गुण और कर्म से ब्राह्मण वर्ण इस प्रकार सिद्ध होता है क्यों कि उसमें वैसा गुण आचरण और कर्म था।
गोत्र या वंश और जन्म का इसमें कोई भी बात नहीं सब आचरण और गुण कर्म पर निर्भर है।
ले भृगु भगवान ऋषि ने यह भी बोला है कि ब्राह्मण में अगर सत्य का अभाव हो तो वो शूद्र हो जाता है ब्राह्मण नहीं रहता😂😂
अर्थात् ब्राह्मण कुल के किसी व्यक्ति में भी सत्य आदि गुणों का अभाव होना प्रत्यक्ष है।
इस से सत्यकाम जाबाल भले ही गोत्र से न हो पर आचरण गुण और कर्म से ब्राह्मण वर्ण इस प्रकार सिद्ध होता है क्यों कि उसमें वैसा गुण आचरण और कर्म था।
गोत्र या वंश और जन्म का इसमें कोई भी बात नहीं सब आचरण और गुण कर्म पर निर्भर है।
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बृहदारण्यक उपनिषद्(३/६) और (३/८) में वर्णित ब्रह्मवादिनी ऋषिका गार्गी को योगयाज्ञवल्क्य में "सर्वज्ञ" और सारे शास्त्रों के जानने वाली बताया गया है याज्ञवल्क्य के द्वारा।
गार्गी इतने बड़े विदुषी थी उन्होंने राजा जनक के सभा में भी जाकर ब्रह्मवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया था।
जो यह सिद्ध करता है वैदिक काल में स्त्रियां घर तक सीमित नहीं थी विदुषी होने पर वो राजसभाओं में भी जाती थी शास्त्रार्थों में भाग भी लेती थी।
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गार्गी इतने बड़े विदुषी थी उन्होंने राजा जनक के सभा में भी जाकर ब्रह्मवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया था।
जो यह सिद्ध करता है वैदिक काल में स्त्रियां घर तक सीमित नहीं थी विदुषी होने पर वो राजसभाओं में भी जाती थी शास्त्रार्थों में भाग भी लेती थी।
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परंपरा प्राप्त नीति शास्त्र में कर्मणा वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट वर्णन
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
"देवी लक्ष्मी की 5वीं शताब्दी की राजगृह मुहर"
यह 5वीं शताब्दी ईस्वी का एक सील (Sealing) है, जो नालंदा क्षेत्र से प्राप्त हुआ है। इसकी लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है।
इस पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है, जिनके दोनों ओर एक पुरुष और एक स्त्री परिचर खड़े हैं तथा ऊपर से दो हाथी उनका अभिषेक कर रहे हैं।
इस सील पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है:
“राजगृहे विषयाधिकारस्य”
जिसका अर्थ है — राजगृह (राजगीर) विषय/जिले के अधिकारी का (चिन्ह/मुहर)।
यह मुहर उस समय के प्रशासनिक तंत्र और लक्ष्मी-पूजा की परंपरा दोनों को दर्शाती है।
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यह 5वीं शताब्दी ईस्वी का एक सील (Sealing) है, जो नालंदा क्षेत्र से प्राप्त हुआ है। इसकी लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है।
इस पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है, जिनके दोनों ओर एक पुरुष और एक स्त्री परिचर खड़े हैं तथा ऊपर से दो हाथी उनका अभिषेक कर रहे हैं।
इस सील पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है:
“राजगृहे विषयाधिकारस्य”
जिसका अर्थ है — राजगृह (राजगीर) विषय/जिले के अधिकारी का (चिन्ह/मुहर)।
यह मुहर उस समय के प्रशासनिक तंत्र और लक्ष्मी-पूजा की परंपरा दोनों को दर्शाती है।
Source- Indian Journal of Archaeology, Vol. 7, No 2, (2022), 1470-2385 Seals & Sealings kept at Nalanda Archaeological Museum, Nalanda District Nalanda Bihar
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
🌟नालंदा की 5वीं शताब्दी की ब्रह्मा-मुद्रा🌟
यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
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यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
Source- Indian Journal of Archaeology, Vol. 7, No 2, (2022), 1470-2385 Seals & Sealings kept at Nalanda Archaeological Museum, Nalanda District Nalanda Bihar
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चीनी यात्रियों ने वर्णन किया वैदिक परंपरा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य।
ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
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ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
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