पुराण प्रवचन
नमस्ते मित्रों एक दुखद सूचना है कि हमारे साथ में सनातनी आर्य ( अतुल जी) जुड़े हुए थे जो बहुत ही अच्छे दिल के व्यक्ति थे। साथ में रहते थे ,उनके मन में जिज्ञासा थी वैदिक धर्म के प्रति महर्षि दयानंद के साहित्य, वैदिक साहित्य उन्होंने खरीदे हुए थे और पढ़ते भी…
😭😭हमारे एक भाई अब हमारे बीच नहीं रहे 🙏
क्या सत्यकाम जाबाल ने अपने पिता का गोत्र न पता होने पर माता के गोत्र बताया था ?
एक चुटिया लिख रहा कि सत्यकाम ने जब पिता का गोत्र नहीं बता पाया तो माता का बताया
ऐसा कोई वर्णन छांदोग्य में नहीं है वहां जबाला उसके माता के नाम है न कि माता के गोत्र के।
दूसरी बात माता के जबाला नाम पर सत्यकाम ने अपना नाम जोड़ के बताया था न कि गोत्र को बताया।
केवल अपने माता के नाम को बोलने पर किसी का वंशावली ब्राह्मण सिद्ध हो नहीं सकता क्यों कि उसके लिए गोत्र आवश्यक है जो सत्यकाम नहीं जानता था।
एक चुटिया लिख रहा कि सत्यकाम ने जब पिता का गोत्र नहीं बता पाया तो माता का बताया
ऐसा कोई वर्णन छांदोग्य में नहीं है वहां जबाला उसके माता के नाम है न कि माता के गोत्र के।
दूसरी बात माता के जबाला नाम पर सत्यकाम ने अपना नाम जोड़ के बताया था न कि गोत्र को बताया।
केवल अपने माता के नाम को बोलने पर किसी का वंशावली ब्राह्मण सिद्ध हो नहीं सकता क्यों कि उसके लिए गोत्र आवश्यक है जो सत्यकाम नहीं जानता था।
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क्या जन्म से ही हर ब्राह्मण का बच्चा सत्यवादी होता है?
ले भृगु भगवान ऋषि ने यह भी बोला है कि ब्राह्मण में अगर सत्य का अभाव हो तो वो शूद्र हो जाता है ब्राह्मण नहीं रहता😂😂
अर्थात् ब्राह्मण कुल के किसी व्यक्ति में भी सत्य आदि गुणों का अभाव होना प्रत्यक्ष है।
इस से सत्यकाम जाबाल भले ही गोत्र से न हो पर आचरण गुण और कर्म से ब्राह्मण वर्ण इस प्रकार सिद्ध होता है क्यों कि उसमें वैसा गुण आचरण और कर्म था।
गोत्र या वंश और जन्म का इसमें कोई भी बात नहीं सब आचरण और गुण कर्म पर निर्भर है।
ले भृगु भगवान ऋषि ने यह भी बोला है कि ब्राह्मण में अगर सत्य का अभाव हो तो वो शूद्र हो जाता है ब्राह्मण नहीं रहता😂😂
अर्थात् ब्राह्मण कुल के किसी व्यक्ति में भी सत्य आदि गुणों का अभाव होना प्रत्यक्ष है।
इस से सत्यकाम जाबाल भले ही गोत्र से न हो पर आचरण गुण और कर्म से ब्राह्मण वर्ण इस प्रकार सिद्ध होता है क्यों कि उसमें वैसा गुण आचरण और कर्म था।
गोत्र या वंश और जन्म का इसमें कोई भी बात नहीं सब आचरण और गुण कर्म पर निर्भर है।
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बृहदारण्यक उपनिषद्(३/६) और (३/८) में वर्णित ब्रह्मवादिनी ऋषिका गार्गी को योगयाज्ञवल्क्य में "सर्वज्ञ" और सारे शास्त्रों के जानने वाली बताया गया है याज्ञवल्क्य के द्वारा।
गार्गी इतने बड़े विदुषी थी उन्होंने राजा जनक के सभा में भी जाकर ब्रह्मवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया था।
जो यह सिद्ध करता है वैदिक काल में स्त्रियां घर तक सीमित नहीं थी विदुषी होने पर वो राजसभाओं में भी जाती थी शास्त्रार्थों में भाग भी लेती थी।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
गार्गी इतने बड़े विदुषी थी उन्होंने राजा जनक के सभा में भी जाकर ब्रह्मवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया था।
जो यह सिद्ध करता है वैदिक काल में स्त्रियां घर तक सीमित नहीं थी विदुषी होने पर वो राजसभाओं में भी जाती थी शास्त्रार्थों में भाग भी लेती थी।
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परंपरा प्राप्त नीति शास्त्र में कर्मणा वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट वर्णन
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
"देवी लक्ष्मी की 5वीं शताब्दी की राजगृह मुहर"
यह 5वीं शताब्दी ईस्वी का एक सील (Sealing) है, जो नालंदा क्षेत्र से प्राप्त हुआ है। इसकी लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है।
इस पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है, जिनके दोनों ओर एक पुरुष और एक स्त्री परिचर खड़े हैं तथा ऊपर से दो हाथी उनका अभिषेक कर रहे हैं।
इस सील पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है:
“राजगृहे विषयाधिकारस्य”
जिसका अर्थ है — राजगृह (राजगीर) विषय/जिले के अधिकारी का (चिन्ह/मुहर)।
यह मुहर उस समय के प्रशासनिक तंत्र और लक्ष्मी-पूजा की परंपरा दोनों को दर्शाती है।
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यह 5वीं शताब्दी ईस्वी का एक सील (Sealing) है, जो नालंदा क्षेत्र से प्राप्त हुआ है। इसकी लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है।
इस पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है, जिनके दोनों ओर एक पुरुष और एक स्त्री परिचर खड़े हैं तथा ऊपर से दो हाथी उनका अभिषेक कर रहे हैं।
इस सील पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है:
“राजगृहे विषयाधिकारस्य”
जिसका अर्थ है — राजगृह (राजगीर) विषय/जिले के अधिकारी का (चिन्ह/मुहर)।
यह मुहर उस समय के प्रशासनिक तंत्र और लक्ष्मी-पूजा की परंपरा दोनों को दर्शाती है।
Source- Indian Journal of Archaeology, Vol. 7, No 2, (2022), 1470-2385 Seals & Sealings kept at Nalanda Archaeological Museum, Nalanda District Nalanda Bihar
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
🌟नालंदा की 5वीं शताब्दी की ब्रह्मा-मुद्रा🌟
यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
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यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
Source- Indian Journal of Archaeology, Vol. 7, No 2, (2022), 1470-2385 Seals & Sealings kept at Nalanda Archaeological Museum, Nalanda District Nalanda Bihar
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चीनी यात्रियों ने वर्णन किया वैदिक परंपरा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य।
ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
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ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
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Forwarded from ऋषि उवाच®️
शतपथब्राह्मण का सबसे प्राचीन भाष्यकार हरिस्वामी (सन ६३८ ई०) जो कि स्कन्दस्वामी का शिष्य था, शतपथ-ब्राह्मण-भाष्य के उपोद्घात के प्रारम्भ में लिखता है—
अर्थात— वेदों का अपौरुषेय होने से ही स्वतःप्रामाण्य सिद्ध है। उनकी शाखाओं का भी प्रामाण्य तदनुता से अर्थात् वेद के अनुकूल होने से बादरायणादि ने स्वीकार किया है।
हरिस्वामी के इस वचन से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती हैं, एक तो यह है कि कोई अपौरुषेय वेद अपनी पृथक सत्ता रखता है और शाखायें उनसे भिन्न हैं। हरिस्वामी वेद को शाखा से भिन्न मानता है। दूसरे उसके मत में उन शाखाओं का प्रामाण्य भी वेदानुकूल होने से स्वीकार किया जाता है।
महर्षि दयानंद ने भी शाखा को पौरुषेय माना था।
वेदस्यापौरुषेयत्वेन स्वतःप्रामाण्ये सिद्धे तच्छाखानामपि तदनुवादप्रामाण्यनिति बादरायणादिभिः प्रतिपादितम्
अर्थात— वेदों का अपौरुषेय होने से ही स्वतःप्रामाण्य सिद्ध है। उनकी शाखाओं का भी प्रामाण्य तदनुता से अर्थात् वेद के अनुकूल होने से बादरायणादि ने स्वीकार किया है।
हरिस्वामी के इस वचन से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती हैं, एक तो यह है कि कोई अपौरुषेय वेद अपनी पृथक सत्ता रखता है और शाखायें उनसे भिन्न हैं। हरिस्वामी वेद को शाखा से भिन्न मानता है। दूसरे उसके मत में उन शाखाओं का प्रामाण्य भी वेदानुकूल होने से स्वीकार किया जाता है।
महर्षि दयानंद ने भी शाखा को पौरुषेय माना था।
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महाभारत ग्रंथ की एक और प्राचीनतम उल्लेख —
(इससे पहले भी हेलियोडोरोस अभिलेख, चीनी टेक्स्ट में और नेपाल से मिले ३५०० वर्ष पुराने टेराकोटा टैबलेट पर महाभारत के ग्रंथ की प्राचीनता सिद्ध कर चुके हैं)
यहाँ हम वियतनाम से मिले ५वीं शताब्दी AD के एक इंस्क्रिप्शन को दे रहे हैं, जिसमें महाभारत ग्रंथ का एक श्लोक उद्धृत किया गया है ......!!
Credit - Right To Dharma
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
(इससे पहले भी हेलियोडोरोस अभिलेख, चीनी टेक्स्ट में और नेपाल से मिले ३५०० वर्ष पुराने टेराकोटा टैबलेट पर महाभारत के ग्रंथ की प्राचीनता सिद्ध कर चुके हैं)
यहाँ हम वियतनाम से मिले ५वीं शताब्दी AD के एक इंस्क्रिप्शन को दे रहे हैं, जिसमें महाभारत ग्रंथ का एक श्लोक उद्धृत किया गया है ......!!
संदर्भ - 1. From India’s Mahābhārata to the Name of the Kingdom of Champa in Indo-China by Võ Văn Thắng
(Vietnam Journal for Indian and Asian Studies. Vol.4, No. 1 - 2022)
2. महाभारत ग्रंथ : वन पर्व : अध्याय ८३ : श्लोक २०४ - २०५
Credit - Right To Dharma
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