Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
🌟नालंदा की 5वीं शताब्दी की ब्रह्मा-मुद्रा🌟
यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
@history_of_aryavart join for more
यह मुहर (Sealing) 5वीं शताब्दी ईस्वी की है, जो नालंदा (बिहार) से प्राप्त हुई है। इसमें ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। इस मुहर पर कमल आसन पर बैठे तीन सिर और दो हाथ वाले ब्रह्मा देव का चित्र है, जिनके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बने हैं। ब्रह्मा के उठे हुए बाएँ हाथ में कमंडल (जलपात्र) दर्शाया गया है। इस पर दो पंक्तियों का लेख अंकित है, जिसमें ‘मल्लात जातक ग्रहारे घ’ तथा ‘श्रीमत्रै विद्यस्य’ का उल्लेख मिलता है।
Source- Indian Journal of Archaeology, Vol. 7, No 2, (2022), 1470-2385 Seals & Sealings kept at Nalanda Archaeological Museum, Nalanda District Nalanda Bihar
@history_of_aryavart join for more
❤8🙏1
चीनी यात्रियों ने वर्णन किया वैदिक परंपरा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य।
ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
ह्वेनसांग ने तो भारत को ब्राह्मण देश कहा कोई मूल भूल निवासी या बौद्ध देश नहीं
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
🔥13
Forwarded from ऋषि उवाच®️
शतपथब्राह्मण का सबसे प्राचीन भाष्यकार हरिस्वामी (सन ६३८ ई०) जो कि स्कन्दस्वामी का शिष्य था, शतपथ-ब्राह्मण-भाष्य के उपोद्घात के प्रारम्भ में लिखता है—
अर्थात— वेदों का अपौरुषेय होने से ही स्वतःप्रामाण्य सिद्ध है। उनकी शाखाओं का भी प्रामाण्य तदनुता से अर्थात् वेद के अनुकूल होने से बादरायणादि ने स्वीकार किया है।
हरिस्वामी के इस वचन से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती हैं, एक तो यह है कि कोई अपौरुषेय वेद अपनी पृथक सत्ता रखता है और शाखायें उनसे भिन्न हैं। हरिस्वामी वेद को शाखा से भिन्न मानता है। दूसरे उसके मत में उन शाखाओं का प्रामाण्य भी वेदानुकूल होने से स्वीकार किया जाता है।
महर्षि दयानंद ने भी शाखा को पौरुषेय माना था।
वेदस्यापौरुषेयत्वेन स्वतःप्रामाण्ये सिद्धे तच्छाखानामपि तदनुवादप्रामाण्यनिति बादरायणादिभिः प्रतिपादितम्
अर्थात— वेदों का अपौरुषेय होने से ही स्वतःप्रामाण्य सिद्ध है। उनकी शाखाओं का भी प्रामाण्य तदनुता से अर्थात् वेद के अनुकूल होने से बादरायणादि ने स्वीकार किया है।
हरिस्वामी के इस वचन से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती हैं, एक तो यह है कि कोई अपौरुषेय वेद अपनी पृथक सत्ता रखता है और शाखायें उनसे भिन्न हैं। हरिस्वामी वेद को शाखा से भिन्न मानता है। दूसरे उसके मत में उन शाखाओं का प्रामाण्य भी वेदानुकूल होने से स्वीकार किया जाता है।
महर्षि दयानंद ने भी शाखा को पौरुषेय माना था।
❤7
महाभारत ग्रंथ की एक और प्राचीनतम उल्लेख —
(इससे पहले भी हेलियोडोरोस अभिलेख, चीनी टेक्स्ट में और नेपाल से मिले ३५०० वर्ष पुराने टेराकोटा टैबलेट पर महाभारत के ग्रंथ की प्राचीनता सिद्ध कर चुके हैं)
यहाँ हम वियतनाम से मिले ५वीं शताब्दी AD के एक इंस्क्रिप्शन को दे रहे हैं, जिसमें महाभारत ग्रंथ का एक श्लोक उद्धृत किया गया है ......!!
Credit - Right To Dharma
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
(इससे पहले भी हेलियोडोरोस अभिलेख, चीनी टेक्स्ट में और नेपाल से मिले ३५०० वर्ष पुराने टेराकोटा टैबलेट पर महाभारत के ग्रंथ की प्राचीनता सिद्ध कर चुके हैं)
यहाँ हम वियतनाम से मिले ५वीं शताब्दी AD के एक इंस्क्रिप्शन को दे रहे हैं, जिसमें महाभारत ग्रंथ का एक श्लोक उद्धृत किया गया है ......!!
संदर्भ - 1. From India’s Mahābhārata to the Name of the Kingdom of Champa in Indo-China by Võ Văn Thắng
(Vietnam Journal for Indian and Asian Studies. Vol.4, No. 1 - 2022)
2. महाभारत ग्रंथ : वन पर्व : अध्याय ८३ : श्लोक २०४ - २०५
Credit - Right To Dharma
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
🔥8
रामायण में किया गया है पुराणों से मिलावट
१४ वी शताब्दी के अपने रामायण (१/४५/३२) पर टिका "अमृतकतक टीकाकार" भी लिखते हैं कि -
इससे स्पष्ट पता चलता है कि नजाने कितने ऐसे फर्जी पुराणों के प्रकरण होंगे जिन्हें पौराणिक पंडे अपने दुकान चलाने के लिए रामायण में प्रक्षेपण किया होगा।
और यही बात प्राचीन टीकाकार भी मान रहे कि रामायण में पुराणों के प्रसंग को प्रक्षेप किया गया है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
१४ वी शताब्दी के अपने रामायण (१/४५/३२) पर टिका "अमृतकतक टीकाकार" भी लिखते हैं कि -
इत्यनन्तरं हालाहलोत्पत्त्यादिप्रतिपादकं पुराणान्तरस्थमत्र प्रक्षिप्य अन्यस्तद्व्याचकार । नास्माभिः प्राचीनसुशुद्धपुस्तकेषु ते श्लोका दृश्यन्ते
अर्थात् - जो रामायण में समुद्र मंथन में हालाहल विष की उत्पत्ति का प्रसंग आता है वह किसी अन्य पुराण से यहां किसीने प्रक्षेप किया हुआ है। हमने प्राचीन शुद्ध रामायण के पुस्तकों में इसका कोई वर्णन नहीं देखा है।
इससे स्पष्ट पता चलता है कि नजाने कितने ऐसे फर्जी पुराणों के प्रकरण होंगे जिन्हें पौराणिक पंडे अपने दुकान चलाने के लिए रामायण में प्रक्षेपण किया होगा।
और यही बात प्राचीन टीकाकार भी मान रहे कि रामायण में पुराणों के प्रसंग को प्रक्षेप किया गया है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
🔥11
आंबेडकर ने किया नवबौद्धों की गजब बेइज्जती
यह मैं नहीं खुद नव बौद्धों के पिता आंबेडकर बोल रहे अपने लिखे पुस्तकों में 💀😢
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
"नवबौद्ध पुरोहित मूर्ख तथा गरिमा हीन होते थे ब्राह्मणों के तुलना में हीन थे और ब्राह्मण विद्वान और चतुर होते थे।"
यह मैं नहीं खुद नव बौद्धों के पिता आंबेडकर बोल रहे अपने लिखे पुस्तकों में 💀😢
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
😁14❤1