क्या बुद्ध इंसान था या कुछ और?
त्रिपिटक (दीघनिकाय महापदान सुत्त) के अनुसार -
और
इसी प्रकार जब पिपरहवा में मिले बुद्ध के अस्थि कलश में से एक दांत का जीवाश्म विशेषज्ञों ने निरीक्षण किया तो
यह सब क्या एक संयोग है या हकीकत?? 😵💫
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
त्रिपिटक (दीघनिकाय महापदान सुत्त) के अनुसार -
गौतम बुद्ध जी के मुंह में कुल ४४ दांत था
और
जंगली सुअर का भी दांत होते हैं कुल 44 दांत
इसी प्रकार जब पिपरहवा में मिले बुद्ध के अस्थि कलश में से एक दांत का जीवाश्म विशेषज्ञों ने निरीक्षण किया तो
उस बुद्ध के अस्थि कलश में भी सुअर के दाढ़ का दांत ही निकला था
यह सब क्या एक संयोग है या हकीकत?? 😵💫
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
😁14
पुराण प्रवचन
क्या बुद्ध इंसान था या कुछ और? त्रिपिटक (दीघनिकाय महापदान सुत्त) के अनुसार - गौतम बुद्ध जी के मुंह में कुल ४४ दांत था और जंगली सुअर का भी दांत होते हैं कुल 44 दांत इसी प्रकार जब पिपरहवा में मिले बुद्ध के अस्थि कलश में से एक दांत का जीवाश्म विशेषज्ञों ने…
भाई बुद्ध और जंगली सुअर में इतनी शारीरिक accuracy कैसे भाई 🥹🥹
असंभव असंभव
असंभव असंभव
😁11
Forwarded from प्रणम्य मेधातिथिम्
अज्ञात व्यक्ति:-- वस्तु का स्वत: उत्पाद मानने से उत्पन्न पदार्थ की ही उत्पत्ति माननी होगी।
सत्कार्यवादी:-- यह स्वत: उत्पाद क्या है?
अज्ञात व्यक्ति:-- अपने ही उपादान से उत्पाद जैसे त्रिगुणवस्तु से त्रिगुणवस्तु
सत्कार्यवादी:-- ऐसा होने पर भी दोनों में भेद है हर प्रकार से क्यूंकि उपादान एवं उत्पाद में त्रिगुण कणों की मात्रा भिन्न होती है एवं उपादान त्रिगुणवस्तु एवं उत्पाद त्रिगुण वस्तु एवं कारण में सत त्रिगुणवस्तु इन तीनों में भेद है वह इस प्रकार है कि क्यों उत्पाद में कारणरूप से सत रहने वाला त्रिगुन वस्तु उत्पत्ति से पूर्व की स्थिति से भिन्न है एवं उपादान और उत्पाद का तो मात्रा भेद तो है ही इसलिए यह प्रश्न हमारे मत पर नहीं कर सकते
अज्ञात:-- तिल/सरसों के अंदर कारण रूप तेल और कार्य रूप तेल में भी भेद है ?
सत्कार्यवादी:-- तिल में रहना ही उसकी कारणरुपता है और यही भेद है अभिव्यक्त होने से पूर्व की है एवं इससे यह भी सिद्ध होता है कि सुक्ष्म एवं अव्यवहारिक कार्य वस्तु जो अपने कारण में निहित होती है वह सत ही है
सत्कार्यवादी:-- यह स्वत: उत्पाद क्या है?
अज्ञात व्यक्ति:-- अपने ही उपादान से उत्पाद जैसे त्रिगुणवस्तु से त्रिगुणवस्तु
सत्कार्यवादी:-- ऐसा होने पर भी दोनों में भेद है हर प्रकार से क्यूंकि उपादान एवं उत्पाद में त्रिगुण कणों की मात्रा भिन्न होती है एवं उपादान त्रिगुणवस्तु एवं उत्पाद त्रिगुण वस्तु एवं कारण में सत त्रिगुणवस्तु इन तीनों में भेद है वह इस प्रकार है कि क्यों उत्पाद में कारणरूप से सत रहने वाला त्रिगुन वस्तु उत्पत्ति से पूर्व की स्थिति से भिन्न है एवं उपादान और उत्पाद का तो मात्रा भेद तो है ही इसलिए यह प्रश्न हमारे मत पर नहीं कर सकते
अज्ञात:-- तिल/सरसों के अंदर कारण रूप तेल और कार्य रूप तेल में भी भेद है ?
सत्कार्यवादी:-- तिल में रहना ही उसकी कारणरुपता है और यही भेद है अभिव्यक्त होने से पूर्व की है एवं इससे यह भी सिद्ध होता है कि सुक्ष्म एवं अव्यवहारिक कार्य वस्तु जो अपने कारण में निहित होती है वह सत ही है
❤8😁2
क्या बुद्ध और सुअर के लक्षणों में समानता है??
त्रिपिटक (मज्झिम निकाय, १२ महासीहनादसुत्तं) के अनुसार -
और सुअर का लक्षण भी ऐसा ही कुछ होता है।
पिछले पोस्ट में हम दिखा भी चुके हैं कि-
तथा जैसे
जो यह सिद्ध करता है शारीरिक समानता से लेकर मल खाने तक का स्वभाव आदि सब बुद्ध और सुअर में संयोग से समान हो सकता है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
त्रिपिटक (मज्झिम निकाय, १२ महासीहनादसुत्तं) के अनुसार -
बुद्ध गाय जैसे पशुओं के मल और मूत्र तथा अपना खुद के भी मल और मूत्र खाते थे।
और सुअर का लक्षण भी ऐसा ही कुछ होता है।
सुअर भी मल आदि खाता है।
पिछले पोस्ट में हम दिखा भी चुके हैं कि-
बुद्ध के अस्थि कलश से सुअर के दांत निकल चुका है।
तथा जैसे
जंगली सुअर के ४४ दांत होते हैं त्रिपिटक के अनुसार बुद्ध के भी ठीक ४४ दांत ही थे।
जो यह सिद्ध करता है शारीरिक समानता से लेकर मल खाने तक का स्वभाव आदि सब बुद्ध और सुअर में संयोग से समान हो सकता है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
🔥6❤1😁1
आज ही के दिन ऐसा संविधान लागू किया गया था जिसमें अकबर जैसे हिंदू नरसंहारक के चित्र को भारतीय संविधान में आदर्श के रूप में जगह दिया गया था।
जिस अकबर ने 40,000 हिन्दुओं का कत्लेआम किया उसी को इस संविधान के भाग 14 में आदर्श बनाया गया है चित्र के द्वारा।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
जिस अकबर ने 40,000 हिन्दुओं का कत्लेआम किया उसी को इस संविधान के भाग 14 में आदर्श बनाया गया है चित्र के द्वारा।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
❤13👏1
बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक में वेदों के शाखा ब्राह्मण ग्रंथों के वर्णन
त्रिपिटक (दीघनिकाय-१३, तेविज्जसुत्त) में हमे वेदों के शाखा ब्राह्मण ग्रंथों के वर्णन स्पष्ट देखने को मिलता है इसमें जैसे कि
जो यह सिद्ध करता है कि वेदों के शाखा ब्राह्मण ग्रंथों का भी अस्तित्व बुद्ध काल से बहुत प्राचीन था।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
त्रिपिटक (दीघनिकाय-१३, तेविज्जसुत्त) में हमे वेदों के शाखा ब्राह्मण ग्रंथों के वर्णन स्पष्ट देखने को मिलता है इसमें जैसे कि
कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्मण, सामवेद के छांदोग्य ब्राह्मण, उपनिषद् आदि का उल्लेख स्पष्ट है।
जो यह सिद्ध करता है कि वेदों के शाखा ब्राह्मण ग्रंथों का भी अस्तित्व बुद्ध काल से बहुत प्राचीन था।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
❤10😁2
छांदोग्य उपनिषद् में श्री कृष्ण जी के वर्णन
जिस छांदोग्य ब्राह्मण का वर्णन बुद्ध के त्रिपिटक में आता है।
उसी छांदोग्य ब्राह्मण के भाग छांदोग्य उपनिषद् (३/१७/६) में हमे श्री कृष्ण जी के वर्णन भी मिलता है कि -
इससे सिद्ध होता है कि जब छांदोग्य में श्री कृष्ण के वर्णन है जो महाभारत के मुख्य पात्र रहे थे तो
त्रिपिटक में आए छांदोग्य के वर्णन से ही महाभारत भी बुद्ध काल के बहुत पहले का स्वतः सिद्ध हो जाता है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
जिस छांदोग्य ब्राह्मण का वर्णन बुद्ध के त्रिपिटक में आता है।
उसी छांदोग्य ब्राह्मण के भाग छांदोग्य उपनिषद् (३/१७/६) में हमे श्री कृष्ण जी के वर्णन भी मिलता है कि -
देवकीपुत्र श्री कृष्ण जी अपने गुरु घोर अंगिरस से यज्ञ दर्शन सुन कर अन्य विद्याओं के विषय में तृष्णाहीन हो गए थे अर्थात् उनका अन्य विद्याओं का ज्ञान भी इसी से पूरी हुई थी।
इसमें घोर ऋषि ने उनको अपने मृत्यु के समय दो ऋग्वेद के मंत्रों के जाप करने का ज्ञान भी दिया था।
इससे सिद्ध होता है कि जब छांदोग्य में श्री कृष्ण के वर्णन है जो महाभारत के मुख्य पात्र रहे थे तो
त्रिपिटक में आए छांदोग्य के वर्णन से ही महाभारत भी बुद्ध काल के बहुत पहले का स्वतः सिद्ध हो जाता है।
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
❤13😁2
अष्टाध्यायी (६/२/३८) महर्षि पाणिनि के काल में महाभारत ग्रंथ का वर्णन
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
❤11
अब मूर्ख वकील को कौन समझाए मूल सूत्र में ही आता है यदि उत्तर पद में भारत जैसे शब्द हो तो उसके पूर्वपद महान् शब्द को प्रकृतिस्वर होता है।
ऐसे महाभारत शब्द मूल सूत्र से ही सिद्ध है
और उसके उदाहरण में महाभारत शब्द से ही हम महाभारत ग्रंथ को पाणिनि के काल से प्राचीन बोले हैं।
क्यों कि मूल सूत्र में महाभारत शब्द में ही कैसे महान् शब्द प्रकृतिस्वर है यह बताया गया है।
ऐसे महाभारत शब्द मूल सूत्र से ही सिद्ध है
और उसके उदाहरण में महाभारत शब्द से ही हम महाभारत ग्रंथ को पाणिनि के काल से प्राचीन बोले हैं।
क्यों कि मूल सूत्र में महाभारत शब्द में ही कैसे महान् शब्द प्रकृतिस्वर है यह बताया गया है।
❤9
वैसे मूर्ख वकील बोल रहा था कि महारौरव नर्क का वर्णन जो अष्टाध्यायी में है उस से यह पुराण सिद्ध कर रहा था
लेकिन योग दर्शन के व्यास भाष्य में भी महारौरव का वर्णन है जो यह सिद्ध करता है कि संभवतः अष्टाध्यायी से पूर्व योग दर्शन के भाष्य में महारौरव का वर्णन सर्व प्रथम आया होगा।
वैसे 18 पुराण कितना नवीन है यह मुझे बताने का आवश्यकता नहीं इसपर बहुत रिसर्च किया जा चुका है।
लेकिन योग दर्शन के व्यास भाष्य में भी महारौरव का वर्णन है जो यह सिद्ध करता है कि संभवतः अष्टाध्यायी से पूर्व योग दर्शन के भाष्य में महारौरव का वर्णन सर्व प्रथम आया होगा।
वैसे 18 पुराण कितना नवीन है यह मुझे बताने का आवश्यकता नहीं इसपर बहुत रिसर्च किया जा चुका है।
🗿7❤2
अब क्या कर सकते हैं 🙂
बुद्ध के अस्थि कलश में जिसकी भी हड्डी निकली वो तो इसी कि ही थी 🙂
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
बुद्ध के अस्थि कलश में जिसकी भी हड्डी निकली वो तो इसी कि ही थी 🙂
●▬▬▬▬🌼🌸🌼▬▬▬▬●
𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
😁10