पुराण प्रवचन
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हमारे पुराण ही हमारे धर्म के धरोहर है इसके ज्ञान को हमारे साथ पढ़ें और फैलाएं 🙏❤️
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भारतीय संविधान में रामायण के चित्र।

तो संविधान को कट्टरता से मानने वाले भीमटो यह देखो

संविधान के भाग -३ में रामायण से संबंधित चित्र हैं जिसमें श्री राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी को आदर्श रूप में दर्शाया गया है।

अब संविधान को मानते हो तो राम जी को भी मानना होगा क्यों कि राम जी भी संविधान में आदर्श के रूप में है। 😂😂

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जब एक “कट्टर आस्थावान” मिक्स ब्रीड पौराणिक/अद्वैतवादी ने करना चाहा हमारा खंडन, बेचारा भावनाओं में इतना बह गया

करने लगा हमारे ही मत का मंडन
अब आप लोग देखिये, हमने कब और कहाँ कहा कि परमात्मा एक नहीं है, ये तो गरुड़ पुराण और पोप जी का मानना है, अर्थात् “कट्टर पौराणिक” मिक्स ब्रीड ने अपने ही पोप जी का खंडन कर दिया 🤣

लगता है इस मिक्स ब्रीड ने महर्षि दयानन्द का सिद्धांत पढ़ा तो दूर जाना तक नही
अब ऐसे अनपढ़ जो भयभीत हुए गुप्त चैनल से खंडन करने की इच्छा रखते है, वो मादक पदार्थों का सेवन कम करने के पश्चात् हमारा खंडन करने के प्रयास करे ।

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@Pakhand_khandan
देखिए अब थाईलैंड के बौद्ध सरकार द्वारा भगवान् विष्णु जी के मूर्तियों को तोड़ कर उसके स्थान में बुद्ध के मूर्ति लगाया जा रहा है।

और हमारे हिन्दू क्या करते हैं राम मंदिर तक में राम जी के प्रतिमा के साथ बुद्ध को स्थान दे दिया है १० में अवतार मान के

लेकिन क्यों ?

आज तक किसी भी बौद्ध स्तूप में न राम जी को स्थान मिला न कृष्ण और न शिव जी को फिर बुद्ध को अवतार मान के क्यों पूज रहे हो??

महाभारत में भी बुद्ध का १० अवतारों में कहीं दूर दूर तक नाम नहीं है। फिर अवतारों के स्थान में बुद्ध क्यों शामिल है??
मैं तो तुरंत मांग करने को बोलता हु राम मंदिर परिषद् से राम जी के मूर्ति के साथ बुद्ध के मूर्ति को हटा के वहां बलराम जी का मूर्ति होना चाहिए। वो स्थान बलराम जी का है उनको वो स्थान दीजिए।
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UGC हटाओ अन्याय होने से बचाओ

BJP पता नहीं आज कल भारतीय जनता पार्टी कम

भीमटा जनता पार्टी ज्यादा लग रहा है।
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आदि शंकराचार्य जी के वैज्ञानिक अलंकार

आदि शंकर जी ने अपने गुरु पादुका स्तोत्र के दूसरे ही श्लोक में गुरु के लिए लिखते हैं -
कवित्व वाराशि निशाकराभ्यां

अर्थात् - उमड़ते हुए ज्ञान रूपी समुद्र के लिए वह (गुरु) पूर्ण चन्द्रमा के सदृश है।
इस वाक्यांश को अगर ठीक से समझे तो यह अत्यंत ही वैज्ञानिक अलंकार है जिसमें समुद्र के जल का उमड़ने का सीधा संबंध जो है वह पूर्णिमा के चन्द्र से ही लिया गया है।

अर्थात् आदि शंकर ने तो गुरु को यहां पूर्ण चंद्र रूप मान के उनसे ज्ञान रूपी समुद्र का ऊपर उठना माना है।

कुछ लोग आर्य समाजीयो को ही अलंकार समाजी बोलते हैं जब की उन्हीं के आदि शंकराचार्य ने अपने रचित स्तोत्र में इतने सुंदर और वैज्ञानिक अलंकार का प्रयोग किया है।
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अब कुछ 2000 साल बाद यही लोग भिंडी रोना करेंगे कि रामचरित मानस को ब्राह्मण लोगों ने ही भीम चरित मानस से copy कर के लिख दिया 😂😂

जैसे इन धूर्त बौद्धों ने रामायण को copy कर के दशरथ जातक लिख दिया था

और आज कुछ भीमटे दशरथ जातक को रामायण से प्राचीन बताते हैं 😂
😂
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Forwarded from Logic God 🧠🗣️
वायु भी ब्रह्म का ही एक नाम है जिससे अद्वैतवाद के निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा खंडित होती है और जब ब्रह्म के अलावा और कुछ है नहीं तो रक्षा किसकी करेगा अद्वैतवाद का निर्गुण ब्रह्म? और उपर से अकर्ता है |

फिर आयेगी व्यवहार पारमार्थ की जलेबी परंतु व्यवहार मे भी तो जगत मिथ्या ही है नवीन अद्वैतियों के अनुसार परंतु प्राचीन अद्वैतियों के अनुसार जगत सत्य है पर क्या लाभ? जब ब्रह्म और ईश्वर को अलग अलग मानते है |

अतः अद्वैतवाद उपनिषदों के भी विरुद्ध है |

ओ३म् 🙏



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बेचारे मिक्स ब्रीड को अब तक समझ नहीं आया पोप जी का दोगलापन , बेचारे अद्वैती ब्रह्म को भ्रम हो गया की पोप जी के द्वारा प्रस्तुत प्रमाण हमने दिऐ है ।

इस जाहिल को ये तक नहीं पता कि ये खंडन मंडन करने की शैली होती है, जैसा की आर्ष ग्रंथों में प्रश्न उत्तर की शैली का प्रयोग कर ऋषियों ने सत्य सिद्धांत की स्थापना की है ।
जैसे महर्षि दयानन्द ने अपने अमर ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाश” में प्रश्न-उत्तर, पोप जी-जाट जी, सिद्धान्ती-नवीन वेदान्ती, नास्तिक-आस्तिक आदि शैली में असत्य मत खंडन और सत्य मत का मंडन किया है ।

बड़े दूःख के साथ कहना पड़ रहा है
इ तो रॉंग नंबर है, अर्थात् ये तो अज्ञानी ब्रह्म निकला, जिसको पढ़कर भी कुछ समझ नहीं आता ऐसो पर हमको दया आती है । लगता है अब उसे दवा की नहीं दुआ की ही आवश्यकता है 😭

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कुल्लूक भट्ट के भाष्य में हारित धर्मसूत्र के प्रथम सूत्र का प्रमाण

आचार्य कुल्लूक भट्ट ने मनुस्मृति (२/१) के भाष्य में हारित धर्मसूत्र के प्रथम सूत्र उद्धृत करते हैं जो कि है -
"अथातो धर्म व्याख्यास्यामः। श्रुतिप्रमाणको धर्मः। श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च"।

अर्थात् - अब इसके बाद हम धर्म की व्याख्या करेंगे। धर्म वह है जिसका प्रमाण श्रुति में है। और श्रुति दो प्रकार की होती है— वैदिकी और तान्त्रिकी (व्यवस्था संबंधित शास्त्र)।
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“कुशान सम्राट विमा कडफिसेस (कनिष्क के पिता) और शिव का उपासना-परंपरा”

जब विमा कडफिसेस कुशान सम्राट बने, उस समय धार्मिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
पहली, ग्रीक धार्मिक कला के रूपों को अपनाना और कुशान देवताओं की ग्रीक प्रतीकात्मक (iconographic) व्याख्या करना—जिसमें देवताओं को ज़ीउस, नाइके और हेराक्लीज़ जैसे ग्रीक रूपों में दर्शाया गया।
दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण विशेषता, भारतीय धर्मों की ओर झुकाव, विशेषकर शिव-पूजा। विमा कडफिसेस के शासन में शिव का पंथ और अधिक प्रमुख हुआ। उनके सिक्कों पर शिव या नंदी सहित शिव का चित्रण मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि वे शिव-पूजा को विशेष महत्व देते।

Source- History of civilizations of Central Asia, Volume II
The development of sedentary and nomadic civilizations: 700 B.C. to A.D. 250
Editor: János Harmatta Co-editors: B. N. Puri and G. F. Etemadi

UNESCO Publishing

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बौद्ध धर्म में स्त्रियां है मार डालने योग्य

त्रिपिटक ( खुद्दकनिकाय के १९३ वा जातक, चुल्लपदुम जातक )

में बुद्ध अपने पूर्व जन्म के धर्मोपदेश देते हुए एक भिक्षु को बोलते हैं कि -
स्त्रियां अकृतज्ञ, मित्रद्रोही और क्रूर हृदय वाली होती हैं।

यही बात बुद्ध ने त्रिपिटक में अंगुत्तरनिकाय (५/२२९-२३०) में भी बोला है जहां उन्होंने स्त्रियों को काले सर्प के साथ तुलना करते हैं।

और इसी बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने इस जातक में अपने पूर्व जन्म के वृत्तान्त बताने के बाद अपने धर्म उपदेश में पाली के कुछ श्लोक बोलते हैं जिसमें लिखा है-
स्त्रियां मार डालने या बध होने योग्य होती हैं क्यों कि उनमें सत्यता नहीं होती है।

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कुषाण काल के लगभग 200 AD का इन्द्र भगवान के मूर्ति जिसके नीचे भी ब्राह्मी लिपि में इंद्र लिखा हुआ है




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