Forwarded from 🔱 पाखंड खंडन 🔱
वैतरणी नदी एक कल्पना
इस पोस्ट के माध्यम से आपने जाना गरुड पुराण में वर्णित वैतरणी नदी केवल एक गप्प है उससे अधिक कुछ नहीं, क्योंकि आर्ष (वेदानुकूल परतः प्रमाण) ग्रंथों से यह सिद्ध होता है की कोई भी पदार्थ मरे हुए पितरों तक नहीं पहूंचता, किन्तु इन जैसे पोप जी के घर, उदर में अवश्य पहुंचता है 😂
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@Pakhand_khandan
इस पोस्ट के माध्यम से आपने जाना गरुड पुराण में वर्णित वैतरणी नदी केवल एक गप्प है उससे अधिक कुछ नहीं, क्योंकि आर्ष (वेदानुकूल परतः प्रमाण) ग्रंथों से यह सिद्ध होता है की कोई भी पदार्थ मरे हुए पितरों तक नहीं पहूंचता, किन्तु इन जैसे पोप जी के घर, उदर में अवश्य पहुंचता है 😂
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क्या गोधा को सम्बोधि प्राप्त हुआ था?
अक्सर जब बौद्ध ग्रंथों से दिखाया जाता है कि स्त्री का बुद्ध होना ही असंभव है तो यह लोग कालीगोधा सुत्त दिखाते हैं जिसमें गोधा को सम्बोधि परायणा कहा गया है।
लेकिन यह मूर्ख लोगों को न पाली का ज्ञान है न प्रकरण का।
पाली के विद्वान Thomas William Rhys ने अपने शब्दकोश में बताया है -
और हम बता दें सोतापन्ना का स्तर बुद्धत्व प्राप्ति के लिए सबसे पहला और निचला स्तर है जिसमें बस ४ चीजें कारण होती हैं -
अर्थात् सोतापन्ना का स्तर बुद्धत्व प्राप्ति हो गया वाला स्तर नहीं है बल्कि उस ओर अग्रसर होने के लिए सबसे निचला स्तर है।
बुद्ध तो पुरुषों के लिए बुद्धत्व प्राप्ति माना है पर स्त्री बस उस सोतापन्ना आदि स्तर में ही जा सकती है लेकिन स्त्री का बुद्ध होना असंभव है इसलिए अगले जन्म में जब स्त्री पुरुष होके जन्म लेगी तब ही बुद्ध हो सकेगी।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
अक्सर जब बौद्ध ग्रंथों से दिखाया जाता है कि स्त्री का बुद्ध होना ही असंभव है तो यह लोग कालीगोधा सुत्त दिखाते हैं जिसमें गोधा को सम्बोधि परायणा कहा गया है।
लेकिन यह मूर्ख लोगों को न पाली का ज्ञान है न प्रकरण का।
पाली के विद्वान Thomas William Rhys ने अपने शब्दकोश में बताया है -
सम्बोधि परायणा का अर्थ होता है बुद्धत्व के ओर अग्रसर होना जो सोतापन्ना के स्तर के लिए उपयोगी है।
और हम बता दें सोतापन्ना का स्तर बुद्धत्व प्राप्ति के लिए सबसे पहला और निचला स्तर है जिसमें बस ४ चीजें कारण होती हैं -
बुद्ध और उनके शिक्षा, संघ आदि पर विश्वास तथा गृहस्थ के त्याग इन्हीं ४ लक्षण ही होता है जो केवल पहला चरण ही है।
अर्थात् सोतापन्ना का स्तर बुद्धत्व प्राप्ति हो गया वाला स्तर नहीं है बल्कि उस ओर अग्रसर होने के लिए सबसे निचला स्तर है।
बुद्ध तो पुरुषों के लिए बुद्धत्व प्राप्ति माना है पर स्त्री बस उस सोतापन्ना आदि स्तर में ही जा सकती है लेकिन स्त्री का बुद्ध होना असंभव है इसलिए अगले जन्म में जब स्त्री पुरुष होके जन्म लेगी तब ही बुद्ध हो सकेगी।
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पुराण प्रवचन
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इससे पता चलता है कि बौद्ध धम्म ने स्त्रियों के लिए "सोतापन्न" जैसे सबसे निचला स्तर का फल ही घोषित किया है।
बुद्ध प्राप्ति का फल तो स्त्री के लिए तभी संभव है जब वो "सोतापन्न" के फल से पुनर्जन्म में पुरुष होके जन्म लेकर बुद्धत्व प्राप्त कर ले।
लेकिन स्त्री होते हुए वो कभी भी बुद्धत्व प्राप्त नहीं कर सकती यह बुद्ध का सर्वमान्य निषेधाज्ञा है।
बुद्ध प्राप्ति का फल तो स्त्री के लिए तभी संभव है जब वो "सोतापन्न" के फल से पुनर्जन्म में पुरुष होके जन्म लेकर बुद्धत्व प्राप्त कर ले।
लेकिन स्त्री होते हुए वो कभी भी बुद्धत्व प्राप्त नहीं कर सकती यह बुद्ध का सर्वमान्य निषेधाज्ञा है।
बुद्धघोष जैसे प्राचीन बौद्ध आचार्य भी यही मानते थे कि मनुष्यों में स्त्री को बुद्धत्व प्राप्ति का कोई अधिकार नहीं है।
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क्या बुद्ध मूलनिवासी थे या विदेशी ?
अक्सर नव बौद्ध बोलते हैं कि राम जी और कृष्ण जी या तो काल्पनिक है या तो विदेशी है मनुवादी बाहर से आए।
तो इनके जो बुद्ध है वो कौनसे वंश के थे ?
संयुत्तनिकाय (८/७) में बुद्ध को स्पष्ट
और राम जी भी सूर्यवंशी ही थे जो मनु जी के ही वंश था।
इसी सूत्त का तुर्किस्तान में पांडुलिपि भी प्राप्त हुआ है। जिसमें लिखा है -
इसी प्रकार ८ वी शताब्दी के मैत्रेयसमितिनका के पांडुलिपि में भी बुद्ध को बोला गया -
अगर मनु, राम जी आदि सूर्यवंशी राजा इनके हिसाब से विदेशी है तो बुद्ध भी सूर्यवंशी होने से विदेशी सिद्ध हो गए।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
अक्सर नव बौद्ध बोलते हैं कि राम जी और कृष्ण जी या तो काल्पनिक है या तो विदेशी है मनुवादी बाहर से आए।
तो इनके जो बुद्ध है वो कौनसे वंश के थे ?
संयुत्तनिकाय (८/७) में बुद्ध को स्पष्ट
"आदिच्चबन्धुनं" कहा गया है जिसका अर्थ होता है सूर्यवंश में उत्पन्न बुद्ध।
और राम जी भी सूर्यवंशी ही थे जो मनु जी के ही वंश था।
इसी सूत्त का तुर्किस्तान में पांडुलिपि भी प्राप्त हुआ है। जिसमें लिखा है -
वन्दे त्वादित्य बान्धवम्
अर्थात् - सूर्यवंशी (बुद्ध) को नमन
इसी प्रकार ८ वी शताब्दी के मैत्रेयसमितिनका के पांडुलिपि में भी बुद्ध को बोला गया -
चक्रवर्षि इक्ष्वाकुय्सर्कशगौतमकोत्र
अर्थात् - चक्रवर्ती इक्ष्वाकु वंशी और गौतम गोत्र में उत्पन्न।
अगर मनु, राम जी आदि सूर्यवंशी राजा इनके हिसाब से विदेशी है तो बुद्ध भी सूर्यवंशी होने से विदेशी सिद्ध हो गए।
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महाभारत में शूद्र का भी कर्म से राजा बनने का अधिकार।
महाभारत (शांतिपर्व) में युधिष्ठिर जी प्रश्न करते हैं भीष्म जी से की -
इस पर भीष्म जी उत्तर देते हैं -
आगे भीष्म जी फिर बोलते हैं -
अर्थात् राजा केवल क्षेत्रीय ही बने ऐसा नहीं है बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति को ही राजा बनाना चाहिए जो भले ही क्षेत्रीय कुलसे भिन्न हो पर वो रक्षा करने में समर्थ हो चाहे ब्राह्मण हो, वैश्य हो या शूद्र ही क्यों न हो।
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
महाभारत (शांतिपर्व) में युधिष्ठिर जी प्रश्न करते हैं भीष्म जी से की -
मानलो कि अगर क्षेत्रीय प्रजा के रक्षा न कर पाए ऐसे स्थिति में अगर कोई व्यक्ति चाहे ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र हो शस्त्र धारण कर प्रजा का रक्षा करें तो क्या वह राज्यशासन कर सकता है?
इस पर भीष्म जी उत्तर देते हैं -
विपत्ति काल में जो भी रक्षा करे चाहे वो शूद्र ही क्यों न हो सदा सम्मान का पात्र होता है।
ऐसे ब्राह्मण का क्या लाभ जो अनपढ़ है ऐसे राजा का क्या लाभ जो रक्षा न कर पाए दोनों ही निरर्थक है।
आगे भीष्म जी फिर बोलते हैं -
जो सदा सत्पुरुषोंकी रक्षा करे तथा दुष्टोंको दण्ड देकर दुष्कर्म करनेसे रोके, उसे ही राजा बनाना चाहिये; क्योंकि उसीके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित होता है।
अर्थात् राजा केवल क्षेत्रीय ही बने ऐसा नहीं है बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति को ही राजा बनाना चाहिए जो भले ही क्षेत्रीय कुलसे भिन्न हो पर वो रक्षा करने में समर्थ हो चाहे ब्राह्मण हो, वैश्य हो या शूद्र ही क्यों न हो।
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Forwarded from ࿗ HISTORY OF ARYAVART ࿗
✨वेद में सामाजिक विविधता: पिता वैद्य, पुत्र ऋषि✨
एक प्रचलित भ्रम है कि वेदों में जन्म के आधार पर जाति और कर्म निश्चित किए गए हैं। ब्राह्मण का पुत्र स्वतः ब्राह्मण होगा—ऐसी मान्यता वेदों में नहीं मिलती, बल्कि यह बाद की सामाजिक व्याख्याओं का परिणाम है।
वैदिक काल में जाति एक वंशानुगत (जन्म से तय) व्यवस्था नहीं थी। उस समय चिकित्सा जैसी “हीलिंग आर्ट्स” इतनी महत्वपूर्ण हो चुकी थीं कि परिवारों के अलग-अलग सदस्य अलग पेशे अपनाते थे। ऋग्वेद की सरल और सुंदर शैली में एक ऋषि स्वयं कहता है—
“मैं मंत्रों की रचना करता हूँ, मेरे पिता चिकित्सक हैं और मेरी माता चक्की पर अनाज पीसती हैं; हम सब अलग-अलग कार्यों में लगे हैं।
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एक प्रचलित भ्रम है कि वेदों में जन्म के आधार पर जाति और कर्म निश्चित किए गए हैं। ब्राह्मण का पुत्र स्वतः ब्राह्मण होगा—ऐसी मान्यता वेदों में नहीं मिलती, बल्कि यह बाद की सामाजिक व्याख्याओं का परिणाम है।
वैदिक काल में जाति एक वंशानुगत (जन्म से तय) व्यवस्था नहीं थी। उस समय चिकित्सा जैसी “हीलिंग आर्ट्स” इतनी महत्वपूर्ण हो चुकी थीं कि परिवारों के अलग-अलग सदस्य अलग पेशे अपनाते थे। ऋग्वेद की सरल और सुंदर शैली में एक ऋषि स्वयं कहता है—
“मैं मंत्रों की रचना करता हूँ, मेरे पिता चिकित्सक हैं और मेरी माता चक्की पर अनाज पीसती हैं; हम सब अलग-अलग कार्यों में लगे हैं।
Source- A HISTORY OF HINDU CHEMISTRY FROM THE EARLIEST TIMES TO THE MIDDLE OF THE SIXTEENTH CENTURY A.D. with SANSKRIT TEXTS, VARIANTS, TRANSLATION AND ILLUSTRATIONS BY PRAPHULLA CHANDRA RAY,
VOL. I
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गटर का ढक्कन चुरा के करते क्या होंगे यह लोग थाली बना के खाना खाते हैं क्या उसमें 🤣
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क्या अंगुत्तरनिकाय (1/279) क्या किसी प्राचीन पाठ में नहीं है?
मेरा बच्चा प्रिंस केवल sutta central देख के बोल रहा है कि की यह तो और कहीं प्राचीन ग्रंथ में नहीं मिलता😭
मेरे बेटे 5 वी शताब्दी के श्रीलंका के बौद्धाचार्य बुद्धघोष ने अंगुत्तरनिकाय पर भाष्य लिखा है उसमें यह सुत्त को उन्होंने उद्धृत कर के भाष्य किया है 😂😂 जिसमें वो उसी सुत्त को उद्धृत कर के लिखते हैं -
😂😂
इसी प्रकार मझीम निकाय पर भी श्रीलंका के बुद्धघोष ने जो टिका लिखा था उसमें भी उन्होंने
वैसे त्रिपिटक का सबसे प्राचीन लेखन ही श्रीलंका से शुरू हुआ था जहां के आचार्यों के भाष्य में ही हमे यह सब मिल जाता है 😂😂
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
मेरा बच्चा प्रिंस केवल sutta central देख के बोल रहा है कि की यह तो और कहीं प्राचीन ग्रंथ में नहीं मिलता😭
मेरे बेटे 5 वी शताब्दी के श्रीलंका के बौद्धाचार्य बुद्धघोष ने अंगुत्तरनिकाय पर भाष्य लिखा है उसमें यह सुत्त को उन्होंने उद्धृत कर के भाष्य किया है 😂😂 जिसमें वो उसी सुत्त को उद्धृत कर के लिखते हैं -
स्त्रियों का बुद्ध बनना असंभव है केवल पुरुष ही बुद्ध बन सकता है
😂😂
इसी प्रकार मझीम निकाय पर भी श्रीलंका के बुद्धघोष ने जो टिका लिखा था उसमें भी उन्होंने
स्त्री का बुद्ध होना निषेध का बुद्ध वचन उद्धृत किया है 😂😂
वैसे त्रिपिटक का सबसे प्राचीन लेखन ही श्रीलंका से शुरू हुआ था जहां के आचार्यों के भाष्य में ही हमे यह सब मिल जाता है 😂😂
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𝗝𝗢𝗜𝗡👉 @PuranPravachan
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