पुराण प्रवचन
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पुराण प्रवचन
बुद्धघोष के भाष्य और चीनी के प्राचीन अनुवाद दोनों में ही यह समानता मिल रहा है कि- न स्त्री बुद्ध बन सकती है न ही स्त्री शासिका बन सकती और न ही वह शासन कर सकती हैं। अब दोनों से समांतर सिद्ध होने से इसके स्कॉलर ने बोला था कि यह पहली बौद्ध संगति के पहले अस्तित्व…
अब यह बोलेगा मध्यम आगम के अनुवाद में नहीं है 😭🤣

बेटा मध्यम आगम के समकालीन बुद्धघोष भी था और अगर यह उसके टिका में उद्धृत बातें भी चीनी अनुवाद में मिल रहा तो यह स्पष्ट है कि बहु धातुक सूत्र में मध्यम आगम के समकालीन ही यह बातें थी


तेरे पास कोई ठोस आधार है ही नहीं इसको बाद का जोड़ा हुआ सिद्ध करने का क्यों कि जिस 4 th - 5th century का मध्यम आगम की अनुवाद है उसी समय काल के बुद्धघोष के त्रिपिटक टिका भी है।
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इसी में लिखा है कि इसी का अनुवाद जो है Faxian ने किया था
The Buddha Speaks the Four Chapters of the Dharma Gate Sutra, translated by the Tripitaka Master Faxian, Grand Master of the Mingjiao School, in the Western Paradise, under imperial decree.

और यह जो Grand Master Faxian है यह लग भाग 337-422 CE प्राचीन चीनी अनुवादक है जिसने इसका अनुवाद किया था तब।

बता दें मध्यम आगम की अनुवाद जो यह बात कर रहा वो भी इसी के थोड़ा बाद (397–398 C.E.) का है यह उस से ज्यादा प्राचीन अनुवाद है ।
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यह भी ले चीन के एक बौद्ध शास्त्र फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित Faxian Translation Of Tripitaka

इसमें भी वही बात आया है कि -
स्त्री शासिका नहीं बन सकती और स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती


इस अनुवादक Faxian का समय काल भी 337–422 CE हैं जो तेरे चीनी आगम के अनुवाद के थोड़े पहले या समकालीन ही है 🤣🤣

ले मौज काट 🤣😭
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बौद्ध मत स्त्री स्वतंत्रता की मिसाल है वहां स्त्रियां अपने भाइयों से ही विवाह कर सकती है (new refrence)

यह बात है रत्नसूत्त की जो h smith द्वारा लिप्यंतरित खुदक्क पाठ में आता है Paramatthajotikā टीका के साथ

“इदानी ‘येन यदा यत्थ यस्मा च’ एतं’ति एत्थाह — केन पन एतं सुत्तं वुत्तं, कदा, कत्थ, कस्मा च वुत्तंति। इदं हि भगवता एव वुत्तं, न सावकादीहि; तञ् च …”
टीकाकार कहता है कि ऐसा न समझा जाय कि यह सूत भंते जी ने कहा है ये बुद्ध ने ही कहा है

आगे देखते है इस सूत में आता है कि एक राजा की पत्नी गर्भवती होती है उसके गर्भ से बच्चे की जगह मांस निकलता है फिर उसे नदी में बहा दिया जाता है एक बौद्ध भंते को वह मिलता है फिर वह उसे पालता है एक अदभुत चमत्कार हमें इसमें देखने को मिलता है कि उस मांस से अमीबा की तरह दो बच्चे निकलते है एक लड़का एक लड़की कुछ दिन बाद लोग बोलते है कि ये बच्चे हमे दे दो वो भिक्षु ये बात मान जाता है पर यह शर्त रखता है कि इन दोनों भाई बहनों की शादी आपस में कर देना और वो लोग मान जाते है 😂🙌 वाह मेरे धम्म
महापुञ्ञा दारका; अप्पमादेन वड्डेथ, वड्डेत्वा च अञ्ञमञ्ञं आवाहविवाहं करोथ, पञ्चगोरसेन राजानं तोसेत्वा भूमिभागं गहेत्वा नगरं मापेथ, तत्र कुमारं अभिसिञ्चथ”ति।



संपूर्ण मूल

तापसो दारके पोसेन्तो उस्सुरे गामं पिण्डाय पविसति, अतिदिवा पटिक्कमति। तस्स तं व्यापारं ञत्वा गोपालका आहंसु — “भन्ते, पब्बजितानं दारकपोसनं पलिबोधो; अम्हाकं दारके देथ, मयं पोसिस्साम, तुम्हे अत्तनो कम्मं करोथा”ति। तापसो “साधू”ति पटिसुणि। गोपालका दुतियदिवसे मग्गं समं कत्वा पुप्फेहि ओकिरित्वा धजपताका उस्सापेत्वा तुरियेहि वज्जमानेहि अस्समं अगता। तापसो — “महापुञ्ञा दारका; अप्पमादेन वड्डेथ, वड्डेत्वा च अञ्ञमञ्ञं आवाहविवाहं करोथ, पञ्चगोरसेन राजानं तोसेत्वा भूमिभागं गहेत्वा नगरं मापेथ, तत्र कुमारं अभिसिञ्चथ”ति वत्वा दारके अदासि।
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बौद्ध स्तूपों में अद्भुत उड़ने का विज्ञान

सांची बौद्ध स्तूप के अनुसार गौतम बुद्ध तो हवा में उड़ जाते थे और उनके पिता शुद्धोधन अपने बेटे बुद्ध को हवा में उड़ते देख प्रार्थना भी करते थे 😂

जिनके खुद के हाथी उड़ता है और बुद्ध उड़ता है वह लोग हनुमान जी के उड़ने पर सवाल उठाते हैं? 🤣

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क्या प्राचीन बौद्धों में स्त्री को बुद्ध होने का अधिकार थी ?

फाहियान जो ४ थी शताब्दी में चीन से भारत आया था उसने अपने यात्रा वृत्तान्त में बुद्ध से जुड़े एक प्राचीन घटना का वर्णन किया है जिसमें वह लिखता है कि -
बुद्ध स्वर्ग से सीढ़ी लेके पृथ्वी पर आने वाले थे उस समय एक उत्पला नाम के भिक्षुणी की इच्छा थी कि वो बुद्ध का प्रथम दर्शन करे।

लेकिन स्त्री होने के कारण उसे ऐसा करने का कोई भी अधिकार नहीं थी।

अर्थात् स्त्री का बुद्ध बनना तो दूर की बात है स्त्रियों को बुद्ध के प्रथम दर्शन तक का कोई अधिकार नहीं थी। केवल पुरुषों को ही ऐसी अधिकार थी।
जब प्रथम दर्शन जैसी छोटी बात का भी बुद्ध ने स्त्रियों को अधिकार नहीं दिया तो स्त्री को बुद्ध बनना तो कल्पना है बस इन लोगों का।

अब मैं बता दूं यह स्वर्ग से सीढ़ी लेकर बुद्ध का आने वाला घटना का चित्रण तो सांची स्तूप में भी अंकित है।

अर्थात् यह वृतांत 3rd Century BCE में भी बौद्धों में थी जिसका उल्लेख फाहियान ने भी ४ थी शताब्दी में किया था।
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पहली बार अंबेडकर को देख कर खुशी हुई मन को चैन हुआ कि अंबेडकर का भविष्य सही हाथों में है
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✨प्राचीन भारत: विज्ञान और चिकित्सा का वैश्विक केंद्र✨

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, खलीफाओं के काल से भी बहुत पहले भारत चिकित्सा और विज्ञान की शिक्षा का मुख्य केंद्र था। इसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध सस्सानी(फ़ारसी) राजा नोशीरवान(खुसरो 1) {A.D. 531-572} के समय में बरज़ौये (Barzouhyeh) ने विशेष रूप से भारत की यात्रा की थी।

Source- A HISTORY OF HINDU CHEMISTRY FROM THE EARLIEST TIMES TO THE MIDDLE OF THE 16th CEN. A.D. with SANSKRIT TEXTS, VARIANTS, TRANSLATION & ILLUSTRATIONS BY P.C.RAY, VOL 1

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कुछ चिमटे मीमटे लोग बोलते हैं की मनुस्मृति में लिखा है स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं होती वह विवाह से पूर्व पिता के, विवाह के बाद पति के और वृद्ध अवस्था में पुत्र के रक्षण में रहना चाहिए। इसलिए मनुस्मृति स्त्री विरोधी है।

जब की यह नियम केवल स्त्रीयों के लिए नहीं है अपितु महाभारत (12/266/11) में पुत्रों के लिए भी आया है की-
पुत्र कभी स्वतंत्र नहीं होता वो सदैव ही माता पिता के इच्छा के अधीन होता है।

सामाजिक वास्तविकता यही है की कोई भी व्यक्ति का स्वतंत्रता कभी निरंकुश नही हो सकता चाहे स्त्री हो या पुरुष उनके स्वतंत्रता हमेशा लिमिटेड ही होता है। देश के द्वारा नागरिक को दिया हुआ मौलिक अधिकार भी निरंकुश नहीं होता।
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स्त्री स्वतंत्र क्यों नहीं है? अस्वतंत्रता का केवल इतना है कि स्त्री की रक्षा उसका पुरुष करेगा अब कोई इसे वास्तविक अस्वतंत्रता समझा ले वह मूर्ख है एवं रक्षा के लिए ही अ स्वतंत्रता का निर्देश प्राप्त होता न कि तत्वत एवं इसी महाभारत में स्त्री को स्वतंत्र भी बताया है
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क्या वैदिक धर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है?

कुछ गधे आज ऐसा आरोप लगाते हैं कि वैदिक धर्म में केवल स्त्री ही स्वतंत्र नहीं होती।

जब की यही बात महाभारत (12/266/11) में पुरुषों के लिए भी आता है कि -
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं

पुत्र कभी भी स्वतन्त्र नहीं होता।
वह सदा माता पिता के ही इच्छा के अधीन होता है।

तो स्त्री और पुरुष यह दोनों ही गृहस्थ जीवन के बंधनों में कभी स्वतंत्र नहीं होते क्योंकि परिवार के एक दूसरे सदस्यों से बंधे हुए होते हैं अतः स्वतंत्र नहीं हैं।

लेकिन स्त्री सदा ही बंधन में रहे यह भी सत्य नहीं है क्योंकि योग्य वर आदि न मिलने पर स्त्री स्वतंत्र भी हो सकती है।

इसका उदाहरण महाभारत(१२/३२०/१८६) में आता है-
सुलभा नाम के स्त्री योग्य पति न मिलने के कारण सन्यासी होकर स्वतंत्र रूप से अकेली विचरण करती है।

तो अगर सुलभा जैसे स्त्री जो स्वतन्त्र रूप से अकेली रह सकती है और अपने इच्छा से कहीं भी विचरण कर सकती है तो वैदिकधर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है यह कथन मूर्खता है इनका।
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