पुराण प्रवचन
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क्या वैदिक धर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है?

कुछ गधे आज ऐसा आरोप लगाते हैं कि वैदिक धर्म में केवल स्त्री ही स्वतंत्र नहीं होती।

जब की यही बात महाभारत (12/266/11) में पुरुषों के लिए भी आता है कि -
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं

पुत्र कभी भी स्वतन्त्र नहीं होता।
वह सदा माता पिता के ही इच्छा के अधीन होता है।

तो स्त्री और पुरुष यह दोनों ही गृहस्थ जीवन के बंधनों में कभी स्वतंत्र नहीं होते क्योंकि परिवार के एक दूसरे सदस्यों से बंधे हुए होते हैं अतः स्वतंत्र नहीं हैं।

लेकिन स्त्री सदा ही बंधन में रहे यह भी सत्य नहीं है क्योंकि योग्य वर आदि न मिलने पर स्त्री स्वतंत्र भी हो सकती है।

इसका उदाहरण महाभारत(१२/३२०/१८६) में आता है-
सुलभा नाम के स्त्री योग्य पति न मिलने के कारण सन्यासी होकर स्वतंत्र रूप से अकेली विचरण करती है।

तो अगर सुलभा जैसे स्त्री जो स्वतन्त्र रूप से अकेली रह सकती है और अपने इच्छा से कहीं भी विचरण कर सकती है तो वैदिकधर्म में स्त्री स्वतंत्र नहीं है यह कथन मूर्खता है इनका।
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अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं

तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया।

इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध हो रहा क्यों कि उसके माता और साथ में पत्नी इन दोनों का रक्षा का दायित्व के बंधन में वो है।

और पत्नी इसलिए अस्वतंत्र है क्यों कि वो पति के द्वारा रक्षा के लिए निर्भर है कि पति ही उसके विपत्ति में उसकी रक्षक होगा।
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पुराण प्रवचन
अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया। इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध…
इसीलिए ही स्त्री को अस्वतंत्र कहा है क्यों कि

कुमारी अवस्था में वो अपने Protection के लिए पिता पर निर्भर करती है।

यौवन अवस्था में Protection के लिए अपने पति पर निर्भर होती है कि पति उसका विपत्ति से रक्षा करेगा।

उसके बाद के अवस्था में पुत्र अपने माता के रक्षा के दायित्व लेता है।

इस प्रकार स्त्री पिता, पति और पुत्र इन तीनों पर खुदकी रक्षा हेतु निर्भर होती है क्यों कि इन्हीं तीनों को उस स्त्री के रक्षा का दायित्व दिया गया है ताकि स्त्री पर विपत्ति न आए।
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पुराण प्रवचन
अबे गधे अगर माता का रक्षा करना पुत्र के लिए कर्तव्य होने से पुत्र स्वतंत्र नहीं हैं तो इस दृष्टांत से ही उसी महाभारत में उसी श्लोक में जहां पति के लिए पत्नी के भी रक्षा करना कर्तव्य बोला गया। इस दृष्टांत से तो पत्नी के संदर्भ में भी पति अस्वतंत्र सिद्ध…
इन चोटियों के अनुसार पुरुष का भी पति होना चाहिए 😂 अबे स्त्री का कर्तव्य पुरुष से अधिक है इसलिए उसके लिए पति आदि का वर्णन किया जिसका जितना कर्तव्य है उसकी उतनी ही परतंत्रता बताई जाएगी
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और वैसे मनुस्मृति का यह जो श्लोक है इससे तो बाल विवाह का भी खंडन हो जा रहा।

यहां बोला जा रहा कि कुमारी अवस्था अर्थात् विवाह से पहले के या बाल्यावस्था में उसके पिता उसके रक्षक होगा।

और आगे बोला गया कि कन्या जब युवती हो जाएगी उस अवस्था में पति उसके रक्षक होगा।

अब अगर बाल्यावस्था में ही विवाह हो जाता तो यहां तो यह आना चाहिए था की बाल्य ओर यौवन दोनों अवस्था में पति रक्षक होगा

लेकिन यहां सिर्फ कन्या के युवावस्था में ही पति को रक्षक माना है बाल्य अवस्था में नहीं।
और सुश्रुत संहिता ( सूत्रस्थान ३५/५०) में लिखा है की १६ वर्ष से ३० वर्ष तक के आयु को यौवन अवस्था कहा जाता है।
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क्या बाला शब्द केवल बाल्य अवस्था के लिए ही प्रयोग होता है?

एक गधा महाभारत में "बाला" शब्द देख के उछल रहा कि देखो इसमें तो बाल विवाह है।

जबकी जरूरी नहीं को "बाला" शब्द का प्रयोग सिर्फ बाल अवस्था के लिए हुआ हो क्योंकि भावात्मक दृष्टि से अपने से बड़े गुरुजन भी नव युवती को बालिका या बच्ची ऐसा बोलते थे आज भी बोलते हैं।

अब जैसे रामायण में वन गमन काल में कई जगह सीता जी को "बाला" कहा गया है। तो क्या सीता जी वन गमन काल में बाल्यावस्था में थी?

जी नहीं क्यों कि उसी रामायण में सीता जी को वन गमन से पहले "तरुणी श्यामा" भी कहा गया है जिसका अर्थ होता है मध्य यौवनावस्था।

अब देखिए सीता जी को तरुणी भी बोला गया है साथ ही बाला भी बोला गया है।

जो यह सिद्ध करता है कि "बाला" शब्द का प्रयोग तो मध्य युवावस्था के स्त्री के लिए भी प्रयोग हो सकता है।
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क्या अभिमन्यु पत्नी उत्तरा का बाल विवाह हुआ था।

एक गधा है जो महाभारत के स्त्रीपर्व से दिखा रहा जहां अभिमन्यु के पत्नी उत्तरा को "बाला" बोला गया है और उस आधार पर वो बालविवाह बोल रहा।

जब की विराट पर्व में अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह का प्रकरण आया है वहां अर्जुन ही उत्तरा के आयु अवस्था के लिए बोलते हैं -
वयःस्थया तया राजन्

अर्थात् - है राजन ! आप के पुत्री उत्तरा युवावस्था में आ चुकी हैं।

और नीलकंठ टिकाकार ने भी अपने टिका में वयःस्थया का अर्थ बताते हैं कि -
वय:स्था युवती

अर्थात् - वयःस्था का अर्थ युवावस्था प्राप्त युवती ही है।

इस से सिद्ध हुआ कि देवी उत्तरा जी विवाह काल में भी वो वयःस्था अर्थात् यौवनावस्था को प्राप्त वयस्क स्त्री हो चुकी थी न कि छोटी थी।

और जो उत्तरा को बाला बोला गया वो भावात्मक रूप से ही गांधारी ने कहा था।
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अब तो ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे अनार्ष ग्रंथ तक में १६ वर्ष के युवती को भी बालिका बोला जा रहा है 🤣🤣

अतीव यौवनस्थां च बालां षोडशवार्षिकीम्

Source - ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/अध्यायः ६१/श्लोक ९४


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क्या अभिमन्यु और उत्तरा का बाल्यविवाह हुआ था?

इसपर हमने विस्तृत पोस्ट बना दिया है।

जिसमें हमने महाभारत काल में यौवन अवस्था में ही विवाह प्रथा सिद्ध किया है।
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