पुराण प्रवचन
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✨क्या सम्राट चन्द्रगुप्त 2 (विक्रमादित्य) का आचरण अनैतिक था? ऐतिहासिक उत्तर✨

शकों पर विजय प्राप्त करना व अपनी भाभी की मर्यादा की रक्षा करना चन्द्रगुप्त 2 (विक्रमादित्य) की प्रसिद्ध उपलब्धियों में गिना जाता है। किंतु इसके बाद उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त की हत्या कर उसकी पत्नी ध्रुवादेवी से विवाह किया—इस घटना को लेकर अनेक विद्वान चन्द्रगुप्त के आचरण पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

मुजमल-उत-तवारीख़ के अनुसार, ध्रुवस्वामिनी ने स्वयंवर में चन्द्रगुप्त को चुना था, किंतु उसके ज्येष्ठ भाई रामगुप्त ने उसे उससे छीन लिया और उससे विवाह कर लिया।
चन्द्रगुप्त पहले से ही जनता में प्रिय था, जब उसने शक-आचार्य या शकराज का वध कर ध्रुवा को अपमान से बचाया, तो उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ गई। इससे बड़ा भाई उससे ईर्ष्या करने लगा और उसके प्राणों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगा।
अतः लेखक का निष्कर्ष है कि चन्द्रगुप्त द्वारा भाई का वध कर ध्रुवा से विवाह करना केवल अनैतिक कृत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि ध्रुवा ने मूल रूप से चन्द्रगुप्त को ही चुना था, पर उसे विवश होकर उसके भाई से विवाह करना पड़ा था।
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Prince गधा- १६ और १७ साल में मध्य अवस्था ही बाल अवस्था हैं।

ले ऋषि सुश्रुत - अरे गर्धव के पुत्र!! १६ साल से नीचेवालों को बाल अवस्था बोला है ठीक से पढ़।


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क्या वैदिक काल में बाल विवाह था?(भाग-2)

महाभारत के वनपर्व में एक महान वैदिक राजा अश्वपति और उनके पुत्री का वर्णन आता है। महाराज अश्वपति का वर्णन सामवेद के छांदोग्य उपनिषद में भी एक ब्रह्मज्ञान उपदेशक के रूप में मिलता है जो उनके वैदिक धर्म में विद्वता को दर्शाता है।

महाभारत में आए वर्णन के अनुसार जब राजा अश्वपति के पुत्री सावित्री युवावस्था को प्राप्त हुई तब उनके पिता ने उनके विवाह योग्य होने पर उनके विवाह के विषय में चिन्तन किया तथा उनको अपने मन अनुकूल पति चुन लेने को कहा।

अर्थात् खुद वैदिक धर्म के ज्ञाता तथा ब्रह्मज्ञानि राजर्षी अश्वपति भी अपने पुत्री को यौवन काल में ही विवाह योग्य मानते थे न कि नग्निका होने पर विवाह कर दिए।🤣🤣

तथा सुश्रुत संहिता (सूत्रस्थान ३५/५०) में यौवन अवस्था का काल १६ वर्ष से ३० वर्ष तक बताया गया है। अर्थात् वैदिक काल में स्त्रियों का विवाह उसी वर्ष के मध्य में होता था।
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स्त्रियों के शिक्षा पूर्ण होने पर "समावर्तन संस्कार" का वर्णन।

समावर्तन संस्कार वो वैदिक संस्कार है जिसमें विद्यार्थी जब गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त कर वापस लौटने पर यह संस्कार होता था।

और आश्वलायन गृहसूत्र (३/८/१-११) के
समावर्तन संस्कार प्रकरण में ब्राह्मण, क्षेत्रीय, वैश्य के साथ स्त्रियों का भी समावर्तन संस्कार होने का विधान दिया गया है।

इससे यह पता चलता है कि उस समय स्त्रियों के भी उपनयन एवं समावर्तन आदि संस्कार किये जाते थे तथा उनको भी हर क्षेत्र में अधिकार प्राप्त था।

क्योंकि बिना उपनयन के शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकता और बिना शिक्षा पूर्ण किए समावर्तन संस्कार नहीं हो सकता।

अगर स्त्रियों के समावर्तन संस्कार का वर्णन है तो उनका उपनयन भी अवश्य सिद्ध है।
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शंकराचार्य हुए तो क्या हुआ, कानून का पालन करना ही पडेगा

- योगी आदित्यनाथ जी

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सुश्रुत संहिता(सूत्रस्थान ३५/१३) में आता है कि-

पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे

अर्थात् - २५ वर्ष में पुरुष और १६ वर्ष में स्त्री सम्पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं।

इसी पर आचार्य दल्हण ने भाष्य में कहा कि -
तत्र स्त्रीश्रोणिपुरुषोरः प्रभृतीनां यौवन एव यथोक्तप्रमाणता भवति, न त्वल्पे वयसीत्याह - पश्चविंश इत्यादि । एतेन पश्चविंशे वर्षे पुरुषं समत्वागतवीर्य जानीयात्; षोडशे तु वर्षे नारीं समत्वागतवीर्या जानीयात्
अर्थात् - वहाँ (शरीर के विकास के संदर्भ में), स्त्रियों के श्रोणि (Pelvis/हिप्स) और पुरुषों के वक्ष (Chest/छाती) आदि अंगों की शास्त्रोक्त पूर्ण विकास यौवन अवस्था में ही सिद्ध होती है, बाल्यावस्था में नहीं। इसी कारण यह कहा गया है कि— २५ वर्ष की आयु में पुरुष को पूर्ण वीर्य (शक्ति और पौरुष) से युक्त समझना चाहिए, और १६ वर्ष की आयु में स्त्री को पूर्ण वीर्य (प्रजनन क्षमता और शारीरिक परिपक्वता) से युक्त समझना चाहिए।"
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पुराण प्रवचन
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ध्यान रहे यहां संप्राप्तवीर्य अर्थात् संपूर्ण यौवन अवस्था की बात चल रहा है।

पर्याप्त यौवन मत समझ लेना पर्याप्त यौवन पुरुष और स्त्री दोनों के लिए १६ वर्ष से लिया जा सकता है जो मध्य अवस्था के प्रथम भेद वृद्धि अवस्था है।

वैसे स्त्री के लिए १६ वर्ष को ही संप्राप्तवीर्य कहा है।

लेकिन पुरुषों के लिए २५ वर्ष संपूर्ण यौवन है उससे कम १६ से २४ तक पर्याप्त यौवन है।
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महाभारत(१३/१४१/२६-२७) में भगवान शिव जी ही बोलते हैं की-
परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम्।

अर्थात् - परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिरा आदि नशीले पदार्थों को त्याग देना यही धर्मके पाँच लक्षण हैं।

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शिवलिङ्ग पूजा क्यों ?

महाशिवरात्रि के पर्व पर आप सब भविष्य पुराण से शिवलिङ्ग पूजा के सत्य इतिहास के दर्शन कीजिये ।

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दान-पुण्य करने से शूद्र भी वेदों का अध्ययन करने के योग्य हो जाता है।

केरल में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विधि ग्रंथ शंकरस्मृति का यह रोचक कथन है।

Credit= जिज्ञासु


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