पुराण प्रवचन
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शंकराचार्य हुए तो क्या हुआ, कानून का पालन करना ही पडेगा

- योगी आदित्यनाथ जी

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सुश्रुत संहिता(सूत्रस्थान ३५/१३) में आता है कि-

पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे

अर्थात् - २५ वर्ष में पुरुष और १६ वर्ष में स्त्री सम्पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं।

इसी पर आचार्य दल्हण ने भाष्य में कहा कि -
तत्र स्त्रीश्रोणिपुरुषोरः प्रभृतीनां यौवन एव यथोक्तप्रमाणता भवति, न त्वल्पे वयसीत्याह - पश्चविंश इत्यादि । एतेन पश्चविंशे वर्षे पुरुषं समत्वागतवीर्य जानीयात्; षोडशे तु वर्षे नारीं समत्वागतवीर्या जानीयात्
अर्थात् - वहाँ (शरीर के विकास के संदर्भ में), स्त्रियों के श्रोणि (Pelvis/हिप्स) और पुरुषों के वक्ष (Chest/छाती) आदि अंगों की शास्त्रोक्त पूर्ण विकास यौवन अवस्था में ही सिद्ध होती है, बाल्यावस्था में नहीं। इसी कारण यह कहा गया है कि— २५ वर्ष की आयु में पुरुष को पूर्ण वीर्य (शक्ति और पौरुष) से युक्त समझना चाहिए, और १६ वर्ष की आयु में स्त्री को पूर्ण वीर्य (प्रजनन क्षमता और शारीरिक परिपक्वता) से युक्त समझना चाहिए।"
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पुराण प्रवचन
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ध्यान रहे यहां संप्राप्तवीर्य अर्थात् संपूर्ण यौवन अवस्था की बात चल रहा है।

पर्याप्त यौवन मत समझ लेना पर्याप्त यौवन पुरुष और स्त्री दोनों के लिए १६ वर्ष से लिया जा सकता है जो मध्य अवस्था के प्रथम भेद वृद्धि अवस्था है।

वैसे स्त्री के लिए १६ वर्ष को ही संप्राप्तवीर्य कहा है।

लेकिन पुरुषों के लिए २५ वर्ष संपूर्ण यौवन है उससे कम १६ से २४ तक पर्याप्त यौवन है।
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महाभारत(१३/१४१/२६-२७) में भगवान शिव जी ही बोलते हैं की-
परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम्।

अर्थात् - परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिरा आदि नशीले पदार्थों को त्याग देना यही धर्मके पाँच लक्षण हैं।

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शिवलिङ्ग पूजा क्यों ?

महाशिवरात्रि के पर्व पर आप सब भविष्य पुराण से शिवलिङ्ग पूजा के सत्य इतिहास के दर्शन कीजिये ।

पोस्ट पसंद आए, ज्ञानवर्धक लगे तो कृपया Reaction दीजिये 🙏💐🙏


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दान-पुण्य करने से शूद्र भी वेदों का अध्ययन करने के योग्य हो जाता है।

केरल में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विधि ग्रंथ शंकरस्मृति का यह रोचक कथन है।

Credit= जिज्ञासु


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आज लोग हिन्दू क्यों नहीं बनना चाहते इसका सबसे बड़ा कारण है आज के शंकराचार्य के अंध परंपरा जो लोगों को छुआ अछूत और घरवापसी के बाद भी उन लोगों को अपवित्र बोलने पर तुले हुए हैं।

सोचिए जिनके सर्वोच्च धर्मगुरु के ही यही मनसा है कि घरवापसी न हो तो यह लोग कितने बड़े धर्म द्रोही होंगे।

इनके कथित परंपरा कितना बड़ा हानि पहुंचा सकता है हिन्दू समाज को
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वर्ण जन्म से या कर्म से ?

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