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*सेवाएं:*
- कुंडली विश्लेषण
- ज्योतिषीय भविष्यवाणी
- ग्रहों के प्रभाव का विश्लेषण
- राशियों के अनुसार भविष्य की जानकारी
*लाभ:*
- अपने भविष्य को जानने का अवसर
- जीवन के निर्णयों में मदद
- आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास
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*🌞 🚩 । l ॐ l । �*� 🌞
🕉 ।। *श्री गणेश*ाय नमः ।। 🕉
*सुप्रभातम् स्*नेह वंदनम्
🌐 *आज का पं*चांग 🌐
⛳ *ति*थि……( ११ ) एकादशी ⛳️
🙏 प्रबोधिनी भागवत एकादशी ( बिल्वपत्र ) 🙏
🌺 देवउठी एकादशी ——
मोटी अगियारस 🌺
🌿 तुलसी विवाह प्रारंभ 🌿
🌸 चातुर्मास समाप्त 🌸
🍂 गरुड़ द्वादशी 🍂
🍀 पंढरपुर यात्रा 🍀
🪻 मन्वादि 🪻
🌼 द्वादशी क्षयतिथि 🌼
🌷 शुक्र तुलामें दोपहर ०१ः१७ से 🌷
💐 पंचक 💐
🪻 भद्रा समाप्त प्रातः ०७ः३२🪻
0️⃣2️⃣-1️⃣1️⃣-2⃣0⃣2️⃣5️⃣
🔔 *वा*र……..रविवार 🔔
🦚 *नक्*षत्र…..पूर्वाभाद्रपदा 🦚
🪔 *यो*ग……..व्याघात 🪔
✳️*करण*…….बव ✳️
🌅 *सूर्*योदय :-०६ः४६ 🌅
🌌 *सूर*्यास्त :-०६ः०० 🌌
🌓 *पक*्ष....………शुक्ल 🌓
🌝 *चन्द्*र राशि….कुंभ / प्रातः ११ः२७ से मीन 🌝
⏺️ *ऋत*ु.......…..हेमंत ⏺️
🍀 *अयन*………दक्षिण 🍀
🪷 *मा*स.……….कार्तिक 🪷
🌻*कलियु*गाब्द….५१२७🌻
🌎 *विक्रम *संवत्.....२०८२ 🌎
⭐️ *शक संव*त्...... १९४७ ⭐️
🪻अभिजीत …..मध्याह्न १२ः०१ से १२ः४० तक🪻
🌚 राहुकाल …..सायं ०४ः४४ से ०६ः०० तक 🌚
🌺🌺 कल ०३-११-२५ सोमवार 🌺🌺
🙏 सोम प्रदोष 🙏
🍁 वैकुण्ठ चतुर्दशी का उपवास 🍁
🙏 🌹 *जय श्री* कृष्ण 🌹🙏
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🙏1
_*।। भीष्म पंचक ।।*_
आज 01.11.25 से 05.11.25 तक आ रहे हैं भीष्म पंचक–आइये जानते हैं इन दिनों का क्या महत्व और क्या है भीष्म पंचक की कथा
*भीष्म पंचक*
हिंदू धर्म में भीष्म पंचक का बहुत महत्त्व है। भीष्म पंचक को ‘पंच भीखू’ के नाम जानते हैं। कार्तिक महीने में स्नान करने वाले इस व्रत को जरूर करते हैं। यह व्रत बहुत कल्याणकारी होता है।
भीष्म पंचक कार्तिक महीने में देवोत्थान एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इन पाँच दिनों में पूजा कर व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।
निःसन्तान व्यक्ति पत्नी सहित इस प्रकार का व्रत कर सकता है। मान्यता इस व्रत के प्रभाव से सन्तान की प्राप्ति होती हैl इसके अलावा जो समाज में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं तथा वैकुण्ठ पाना चाहते हैं या इस लोक में सुख चाहते हैं उन्हें भी इस व्रत को करना चाहिए।
इसके अलावा जो जातक निम्न लिखे मन्त्र से पितामाह भीष्म को अर्घ्यदान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतप्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतदुद्कं भीष्म्वर्मणे॥
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च।
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥
अर्थात–जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्ररहित भीष्म्वार्मा को मैं यह जल देता हूँ। वसुओं के अवतार, शांतनु के पुत्र आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूँ।
*भीष्म पंचक से जुड़ी कथा*
प्राचीन काल में जब महाभारत का युद्ध हुआ तो पाण्डवों की जीत हुई। पाण्डवों की जीत के उपरान्त श्रीकृष्ण पाण्डवों को लेकर भीष्म पितामह के पास गए ताकि पितामह उन्हें कुछ ज्ञान दे सकें।
सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में शैय्या पर लेटे हुए श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह से पाण्डवों को ज्ञान देने का अनुरोध किया।
भीष्म ने कृष्ण की बात मान कर पाण्डवों को वर्ण धर्म, मोक्ष धर्म और राज धर्म के बारे में ज्ञान दिया। भीष्म ने यह ज्ञान पाण्डवों को पाँच दिनों तक दिया।
ऐसा माना जाता है कि ये पाँच दिन भीष्म पंचक के ही है जो एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। ज्ञान देने के पश्चात श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘भीष्म यह पाँच दिन लोगों के लिए बहुत मंगलकारी होंगे और आने वाले दिनों में इन्हें भीष्म पंचक के नाम से जाना जाएगा।’
*भीष्म पंचक में करें परहेज*
भीष्म पंचक बहुत पवित्र होता है इसलिए इस काल में अन्न ग्रहण न करें। साथ ही इस समय फल-फूल दूध और दही का सेवन करें। साथ ही पंचगव्य ( गाय का दूध, दही, घी, गोक्षरण व गोबर-रस का मिश्रण ) भी थोड़ी मात्रा में ग्रहण करें, तथा नहाने के पानी में थोड़ी मात्रा में गोक्षरण डालें फिर पवित्रता पूर्वक स्नान करें। साथ ही भीष्म पंचक के समय आप ब्रह्मचर्य का भी पालन करें।
*भीष्म पंचक में ऐसे करें पूजा*
इस व्रत का प्रथम दिन देवउठनी एकादशी को होता है। इस दिन भगवान नारायण अपने चार माह की योग निद्रा से जागते हैं। मान्याताओं के अनुसार श्री हरि को नीचे दिए मन्त्र का उच्चारण करके उठाना चाहिए।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु॥
अर्थात–हे गोविन्द उठिए, उठए, हे गरुडध्वज, उठिए, हे कमलाकांत। निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मंगल कीजिए।
भीष्म पंचक के पाँच दिनों में विशेष प्रकार की पूजा होती है। भीष्म पंचक व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है। मण्डप को गाय के गोबर से लीप कर बीच में एक वेदी बनाएं। वेदी पर ध्यान देकर तिल रख कर कलश स्थापित करें।
इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की होती है। इस व्रत के दौरान कार्तिक शुक्ल की एकादशी से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं। उन्हें पाँच दिनों तक सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। साथ ही भीष्म पंचक के समय आप ब्रह्मचर्य का भी पालन करें।
इन पाँच दिनों में निम्नः मन्त्र से भीष्म जी के लिए तर्पण करना चाहिए–
सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने।
भीष्मायैतद ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे॥
*भीष्म पंचक का महत्व*
भीष्म पितामह ने इन पाँच दिनों में पाण्डवों को ज्ञान दिया था इसलिए इस व्रत को ‘भीष्म पंचक’ नाम से जाना जाता है। कार्तिक मास में ‘भीष्म पंचक’ व्रत का खास महत्त्व है। यह व्रत न केवल पहले किए गए संचित पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है बल्कि कल्याणकारी भी होता है।
भीष्म पंचक व्रत बहुत मंगलकारी और पुण्यफलदायक माना जाता है। जो भी भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसे मृत्यु के पश्चात् मोक्ष तथा उत्तम गति की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाला व्रत सदैव स्वस्थ रहता है तथा प्रभु की कृपा उस पर बनी रहती है।
*कार्तिक पूर्णिमा*
आज 01.11.25 से 05.11.25 तक आ रहे हैं भीष्म पंचक–आइये जानते हैं इन दिनों का क्या महत्व और क्या है भीष्म पंचक की कथा
*भीष्म पंचक*
हिंदू धर्म में भीष्म पंचक का बहुत महत्त्व है। भीष्म पंचक को ‘पंच भीखू’ के नाम जानते हैं। कार्तिक महीने में स्नान करने वाले इस व्रत को जरूर करते हैं। यह व्रत बहुत कल्याणकारी होता है।
भीष्म पंचक कार्तिक महीने में देवोत्थान एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इन पाँच दिनों में पूजा कर व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।
निःसन्तान व्यक्ति पत्नी सहित इस प्रकार का व्रत कर सकता है। मान्यता इस व्रत के प्रभाव से सन्तान की प्राप्ति होती हैl इसके अलावा जो समाज में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं तथा वैकुण्ठ पाना चाहते हैं या इस लोक में सुख चाहते हैं उन्हें भी इस व्रत को करना चाहिए।
इसके अलावा जो जातक निम्न लिखे मन्त्र से पितामाह भीष्म को अर्घ्यदान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतप्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतदुद्कं भीष्म्वर्मणे॥
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च।
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥
अर्थात–जिनका व्याघ्रपद गोत्र और सांकृत प्रवर है, उन पुत्ररहित भीष्म्वार्मा को मैं यह जल देता हूँ। वसुओं के अवतार, शांतनु के पुत्र आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूँ।
*भीष्म पंचक से जुड़ी कथा*
प्राचीन काल में जब महाभारत का युद्ध हुआ तो पाण्डवों की जीत हुई। पाण्डवों की जीत के उपरान्त श्रीकृष्ण पाण्डवों को लेकर भीष्म पितामह के पास गए ताकि पितामह उन्हें कुछ ज्ञान दे सकें।
सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में शैय्या पर लेटे हुए श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह से पाण्डवों को ज्ञान देने का अनुरोध किया।
भीष्म ने कृष्ण की बात मान कर पाण्डवों को वर्ण धर्म, मोक्ष धर्म और राज धर्म के बारे में ज्ञान दिया। भीष्म ने यह ज्ञान पाण्डवों को पाँच दिनों तक दिया।
ऐसा माना जाता है कि ये पाँच दिन भीष्म पंचक के ही है जो एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। ज्ञान देने के पश्चात श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘भीष्म यह पाँच दिन लोगों के लिए बहुत मंगलकारी होंगे और आने वाले दिनों में इन्हें भीष्म पंचक के नाम से जाना जाएगा।’
*भीष्म पंचक में करें परहेज*
भीष्म पंचक बहुत पवित्र होता है इसलिए इस काल में अन्न ग्रहण न करें। साथ ही इस समय फल-फूल दूध और दही का सेवन करें। साथ ही पंचगव्य ( गाय का दूध, दही, घी, गोक्षरण व गोबर-रस का मिश्रण ) भी थोड़ी मात्रा में ग्रहण करें, तथा नहाने के पानी में थोड़ी मात्रा में गोक्षरण डालें फिर पवित्रता पूर्वक स्नान करें। साथ ही भीष्म पंचक के समय आप ब्रह्मचर्य का भी पालन करें।
*भीष्म पंचक में ऐसे करें पूजा*
इस व्रत का प्रथम दिन देवउठनी एकादशी को होता है। इस दिन भगवान नारायण अपने चार माह की योग निद्रा से जागते हैं। मान्याताओं के अनुसार श्री हरि को नीचे दिए मन्त्र का उच्चारण करके उठाना चाहिए।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु॥
अर्थात–हे गोविन्द उठिए, उठए, हे गरुडध्वज, उठिए, हे कमलाकांत। निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मंगल कीजिए।
भीष्म पंचक के पाँच दिनों में विशेष प्रकार की पूजा होती है। भीष्म पंचक व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है। मण्डप को गाय के गोबर से लीप कर बीच में एक वेदी बनाएं। वेदी पर ध्यान देकर तिल रख कर कलश स्थापित करें।
इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की होती है। इस व्रत के दौरान कार्तिक शुक्ल की एकादशी से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं। उन्हें पाँच दिनों तक सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। साथ ही भीष्म पंचक के समय आप ब्रह्मचर्य का भी पालन करें।
इन पाँच दिनों में निम्नः मन्त्र से भीष्म जी के लिए तर्पण करना चाहिए–
सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने।
भीष्मायैतद ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे॥
*भीष्म पंचक का महत्व*
भीष्म पितामह ने इन पाँच दिनों में पाण्डवों को ज्ञान दिया था इसलिए इस व्रत को ‘भीष्म पंचक’ नाम से जाना जाता है। कार्तिक मास में ‘भीष्म पंचक’ व्रत का खास महत्त्व है। यह व्रत न केवल पहले किए गए संचित पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है बल्कि कल्याणकारी भी होता है।
भीष्म पंचक व्रत बहुत मंगलकारी और पुण्यफलदायक माना जाता है। जो भी भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसे मृत्यु के पश्चात् मोक्ष तथा उत्तम गति की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाला व्रत सदैव स्वस्थ रहता है तथा प्रभु की कृपा उस पर बनी रहती है।
*कार्तिक पूर्णिमा*
कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनें। एक चौकी लें। उस पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर लक्ष्मीनारायण भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर ईश्वर का ध्यान करते हुए पूजा करें। फिर पूरा दिन सत्कर्म करते हुए व्यतीत करें।
ध्यान रहे कि हिंसात्मक गतिविधियां ना करें और ना ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करें। संभव हो तो ईश्वर का नाम या मंत्र जाप करें। भगवान् श्रीसत्यनारायण की कथा का श्रवण करें तथा शाम होने पर संध्या आरती कर फलों का भोग श्री लक्ष्मी नारायण को लगाएं। इसके बाद प्रसाद बांटें और स्वयं भी प्रसाद खाकर व्रत संपन्न करें।
*जय श्री हरि* 🙏
ध्यान रहे कि हिंसात्मक गतिविधियां ना करें और ना ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करें। संभव हो तो ईश्वर का नाम या मंत्र जाप करें। भगवान् श्रीसत्यनारायण की कथा का श्रवण करें तथा शाम होने पर संध्या आरती कर फलों का भोग श्री लक्ष्मी नारायण को लगाएं। इसके बाद प्रसाद बांटें और स्वयं भी प्रसाद खाकर व्रत संपन्न करें।
*जय श्री हरि* 🙏
_*कार्तिक शुक्ल एकादशी ( देवप्रबोधनी एकादशी )*_
आज देवप्रबोधनी एकादशी है। मानवों का एक वर्ष देवों का एक दिन होता है। मकर राशि में सूर्य के जाने पर उनका दिन तथा कर्क राशि में जाने से रात्रि होती है। देवप्रबोधनी एकादशी से उनका जागरण होता है तथा मानवों के शुभ कर्मों ( विवाहादि ) का श्रीगणेश होता है। देवप्रबोधनी पर लक्ष्मीरूपा तुलसी की आराधना अतीव शुभ मानी जाती है। विवाह के मुहूर्त में लक्ष्मीस्वरूपा तुलसी का विवाह भगवान् विष्णु से आस्तिक जन सम्पादित करते हैं।
*देवप्रबोधनी एकादशी समग्र विश्व को सत्पथ पर अग्रसर करें, सभी स्वधर्म का परिपालन स्वधर्मानुसार या स्वकीय सम्प्रदायिक परम्परा या स्वकुलमान्य परम्परा के अनुरूप करें तथा आतङ्कवादी दुर्जनों ( मानवता के विरोधियों ) का विनाश करे।*
धर्म की जय हो, अधर्म का संहार हो, प्राणियों में सद्भावना हो तथा विश्व का कल्याण हो।
जयति देवप्रबोधनी।
विशेष-मानववर्ष की गणना से जिस दिन भगवान् भुवनभास्कर मकरराशि ( प्रायः१४जनवरी ) से देवताओं के दिन का आरम्भ होता है। इसके पूर्व कार्तिक शुक्ल- एकादशी से उनका जागरण होता है।
समस्त शुभकर्मों का सम्पादन इसी दिन से प्रारम्भ होता है।
आज देवप्रबोधनी एकादशी है। मानवों का एक वर्ष देवों का एक दिन होता है। मकर राशि में सूर्य के जाने पर उनका दिन तथा कर्क राशि में जाने से रात्रि होती है। देवप्रबोधनी एकादशी से उनका जागरण होता है तथा मानवों के शुभ कर्मों ( विवाहादि ) का श्रीगणेश होता है। देवप्रबोधनी पर लक्ष्मीरूपा तुलसी की आराधना अतीव शुभ मानी जाती है। विवाह के मुहूर्त में लक्ष्मीस्वरूपा तुलसी का विवाह भगवान् विष्णु से आस्तिक जन सम्पादित करते हैं।
*देवप्रबोधनी एकादशी समग्र विश्व को सत्पथ पर अग्रसर करें, सभी स्वधर्म का परिपालन स्वधर्मानुसार या स्वकीय सम्प्रदायिक परम्परा या स्वकुलमान्य परम्परा के अनुरूप करें तथा आतङ्कवादी दुर्जनों ( मानवता के विरोधियों ) का विनाश करे।*
धर्म की जय हो, अधर्म का संहार हो, प्राणियों में सद्भावना हो तथा विश्व का कल्याण हो।
जयति देवप्रबोधनी।
विशेष-मानववर्ष की गणना से जिस दिन भगवान् भुवनभास्कर मकरराशि ( प्रायः१४जनवरी ) से देवताओं के दिन का आरम्भ होता है। इसके पूर्व कार्तिक शुक्ल- एकादशी से उनका जागरण होता है।
समस्त शुभकर्मों का सम्पादन इसी दिन से प्रारम्भ होता है।
_*तुलसी माता और भगवान शालिग्राम के मंगल विवाहोत्सव पर विशेष।*_
सर्वप्रथम आपसभी को भगवान शालिग्राम एवं माँ वृंदा देवी के मंगल विवाहोत्सव *श्री तुलसी शालिग्राम विवाह* के पावन पर्व की अनंत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाई।
आपसभी के परिवार पे भगवान विष्णु और मां तुलसी की कृपा की अनवरत वर्षा होती रहे, धन-संपदा, वैभव, सुख, समृद्धि में उत्तरोत्तर वृद्धि हो।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी देवोत्थान, तुलसी शालिग्राम विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में मनाई जाती है।
दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी, देवउठान एकादशी, देवउठनी ग्यारस अथवा प्रबोधिनी एकादशी आदि नाम से भी जाना जाता है।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन एवं तुलसी विवाह का उत्सव पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है।
कहा जाता है कि कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान से करते हैं उनके पिछलों जन्मो के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
शास्त्रों में वर्णित है कि आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं।
संसार के पालनहार श्रीहरि विष्णु को समस्त मांगलिक कार्यों में साक्षी माना जाता है परन्तु इनकी निद्रावस्था ( चातुर्मास ) में विवाह आदि शुभ कार्य बंद कर दिया जाता है इसलिए हिंदुओं के समस्त शुभ कार्य भगवान विष्णु के जागृत अवस्था में संपन्न करने का विधान धर्मशास्त्रों में वर्णित है।
भगवान विष्णु के जागने का दिन है देवोत्थान एकादशी।
इसी दिन से सभी शुभ कार्य विवाह, उपनयन आदि शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।
आषाढ़ से कार्तिक तक के समय को चातुर्मास कहते हैं, इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर की अनंत शैय्या पर शयन करते हैं इसलिए कृषि के अलावा विवाह आदि शुभ कार्य इस समय तक बंद रहते हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से ये चार मास भगवान की निद्राकाल का माना जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य के मिथुन राशि में आने पर भगवान श्री हरि विष्णु शयन करते हैं और तुला राशि में सूर्य के जाने पर भगवान शयन कर उठते हैं।
भगवान जब सोते हैं तो चारों वर्ण की विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएं संपादित नहीं होती।
यज्ञोपवीतादि संस्कार, विवाह, दीक्षा ग्रहण, यज्ञ, नूतन गृह प्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे चातुर्मास में त्याज्य माने गए हैं।
आषाढ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाने के बाद से प्रारम्भ हुए चातुर्मास का समापन तक शुक्ल एकादशी के दिन देवोत्थान-उत्सव होने पर होता है। इस दिन वैष्णव ही नहीं, स्मार्त श्रद्धालु भी बडी आस्था के साथ व्रत करते ।
*भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह* हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
पद्मपुराण के पौराणिक कथानुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए जिसके कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं।
इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी की स्थापना की जाती है और एकादशी के दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाकर उनका विवाह तुलसी जी से किया जाता है।
देवोत्थान एकादशी के दिन मनाया जाने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। दरअसल, तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। देवता जब जागते हैं तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है।
*तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान।*
कुछ लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन कर पाँचवें दिन तुलसी विवाह करते हैं।
*आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधु का विवाह किया जाता है।*
देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस मांगलिक प्रसंग के सुअवसर पर सनातन धर्मावलम्बी घर की साफ़-सफाई करते हैं और
रंगोली सजाते हैं।
शाम के समय तुलसी चौरा के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरुप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं।
मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीति-भोज, सब कुछ पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है।
इस विवाह में शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है।
सर्वप्रथम आपसभी को भगवान शालिग्राम एवं माँ वृंदा देवी के मंगल विवाहोत्सव *श्री तुलसी शालिग्राम विवाह* के पावन पर्व की अनंत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाई।
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कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी देवोत्थान, तुलसी शालिग्राम विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में मनाई जाती है।
दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी, देवउठान एकादशी, देवउठनी ग्यारस अथवा प्रबोधिनी एकादशी आदि नाम से भी जाना जाता है।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन एवं तुलसी विवाह का उत्सव पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है।
कहा जाता है कि कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान से करते हैं उनके पिछलों जन्मो के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
शास्त्रों में वर्णित है कि आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं।
संसार के पालनहार श्रीहरि विष्णु को समस्त मांगलिक कार्यों में साक्षी माना जाता है परन्तु इनकी निद्रावस्था ( चातुर्मास ) में विवाह आदि शुभ कार्य बंद कर दिया जाता है इसलिए हिंदुओं के समस्त शुभ कार्य भगवान विष्णु के जागृत अवस्था में संपन्न करने का विधान धर्मशास्त्रों में वर्णित है।
भगवान विष्णु के जागने का दिन है देवोत्थान एकादशी।
इसी दिन से सभी शुभ कार्य विवाह, उपनयन आदि शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।
आषाढ़ से कार्तिक तक के समय को चातुर्मास कहते हैं, इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर की अनंत शैय्या पर शयन करते हैं इसलिए कृषि के अलावा विवाह आदि शुभ कार्य इस समय तक बंद रहते हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से ये चार मास भगवान की निद्राकाल का माना जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य के मिथुन राशि में आने पर भगवान श्री हरि विष्णु शयन करते हैं और तुला राशि में सूर्य के जाने पर भगवान शयन कर उठते हैं।
भगवान जब सोते हैं तो चारों वर्ण की विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएं संपादित नहीं होती।
यज्ञोपवीतादि संस्कार, विवाह, दीक्षा ग्रहण, यज्ञ, नूतन गृह प्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे चातुर्मास में त्याज्य माने गए हैं।
आषाढ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाने के बाद से प्रारम्भ हुए चातुर्मास का समापन तक शुक्ल एकादशी के दिन देवोत्थान-उत्सव होने पर होता है। इस दिन वैष्णव ही नहीं, स्मार्त श्रद्धालु भी बडी आस्था के साथ व्रत करते ।
*भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह* हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
पद्मपुराण के पौराणिक कथानुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए जिसके कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं।
इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी की स्थापना की जाती है और एकादशी के दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाकर उनका विवाह तुलसी जी से किया जाता है।
देवोत्थान एकादशी के दिन मनाया जाने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। दरअसल, तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। देवता जब जागते हैं तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है।
*तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान।*
कुछ लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन कर पाँचवें दिन तुलसी विवाह करते हैं।
*आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधु का विवाह किया जाता है।*
देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस मांगलिक प्रसंग के सुअवसर पर सनातन धर्मावलम्बी घर की साफ़-सफाई करते हैं और
रंगोली सजाते हैं।
शाम के समय तुलसी चौरा के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरुप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं।
मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीति-भोज, सब कुछ पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है।
इस विवाह में शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है।
इस दिन तुलसी के पौधे को यानी वधु को लाल चुनरी-ओढ़नी ओढ़ाई जाती है। तुलसी विवाह में सोलह श्रृंगार के सभी सामान चढ़ावे के लिए रखे जाते हैं।
शालिग्राम जी को दोनों हाथों में लेकर यजमान वर के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के सात फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है।
जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती अथवा जिनके यहाँ कन्या नहीं होती उनको जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए। तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं।
हमारे सनातन संस्कार अनुसार तुलसी को देवी रुप में हर घर में पूजा जाता है। इसकी नियमित पूजा से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा पुण्य फल में वृद्धि मिलती है। तुलसी बहुत पवित्र है और सभी पूजाओं में देवी तथा देवताओं को अर्पित की जाती है। सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है। प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना गया है। तुलसी घर-आँगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाती है।
हमारे शास्त्रों में तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है, तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है, इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।
शालिग्राम जी को दोनों हाथों में लेकर यजमान वर के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के सात फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है।
जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती अथवा जिनके यहाँ कन्या नहीं होती उनको जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए। तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं।
हमारे सनातन संस्कार अनुसार तुलसी को देवी रुप में हर घर में पूजा जाता है। इसकी नियमित पूजा से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा पुण्य फल में वृद्धि मिलती है। तुलसी बहुत पवित्र है और सभी पूजाओं में देवी तथा देवताओं को अर्पित की जाती है। सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है। प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना गया है। तुलसी घर-आँगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाती है।
हमारे शास्त्रों में तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है, तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है, इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।
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दुनिया मे दो तरह के लोग है एक जिन्होंने ताज़महल देखा है दूसरे जिन्होंने नहीं देखा, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पंक्ति झुठलाई नहीं जा सकती। ताजमहल का मुद्दा हमें धर्म के परे देखने की जरूरत है।
1631 के समय शाहजहाँ बुरहानपुर मे था और इसी बीच मुमताज़ जो कि गर्भवती थी, वह प्रसव पीड़ा से 30 घंटे तड़पती रही और उसकी मौत हो गयी।
शाहजहाँ कई महीने सदमे मे रहा, उस समय बुरहानपुर और आज के महाराष्ट्र मे भयावह भुखमरी फ़ैल रही थी, यहाँ शाहजहाँ ने अपने प्रेम को प्रजा से ऊपर रखा और एक मकबरे का ऐलान किया।
शर्ते ये थी कि मकबरा ऐसी जगह बने जो शाहजहाँ आगरा किले से सीधे देख सके, ऐसे मे एक ही जगह दिखाई दी जहाँ जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह की हवेली थी। शाहजहाँ ने कई प्रलोभन दिये, जयसिंह तब माने ज़ब उन्हें चार हवेली मिल गयी।
47 एकड़ के इस प्लाट का स्वामित्व शाहजहाँ को मिल गया और 1632 से ताजमहल का निर्माण शुरु हुआ जो 1653 तक चला, सारी समस्या बस यही है क्योंकि इतिहास मे कही नहीं लिखा कि इसकी नींव 1632 मे रखी गयी जो भी लिखा गया वह 1640 के आसपास का लिखा गया कि इसे बनाया जा रहा था।
ताजमहल को तोड़ने के प्रयास भी हुए, भरतपुर के महाराज सूरजमल जाट ने 1753 मे आगरा पर अधिकार किया। खूबसूरती से प्रभावित होकर ताज़ नहीं तोड़ा मगर बाहर लगे चांदी के दरवाजे निकाल लिए।
अंग्रेजो ने इसे पर्यटन स्थल बना दिया, किले से ताज़ पहुंचने का रास्ता यमुना से था और यमुना से जो ताज़ दिखता है वही उसका असल द्वार है मगर अब हम ताज़ को पीछे से देखते है। शाहजहाँ जैसे चाहता था ताज़ अब वैसे नहीं देखा जाता।
जयसिंह के उस परिसर मे कोई मंदिर भी रहा होगा जिसके देवी देवताओं को ताजमहल के नीचे बने 22 कमरों मे सील किया गया। नेहरूजी ने इन मूर्तियों को छुपाने के लिए लकड़ी के दरवाजो की जगह इंट से चुनवा दिया था।
आगरा जाटों के कब्जे मे रहा फिर मराठाओ के हाथ भी आया मगर उस समय के हिन्दुओ ने इसे वैसे ही देखा होगा कि एक राजा ने दूसरे राजा को घर बेच दिया और दूसरे ने पुराने सामान को नीचे सुरक्षित रखवा दिया। शाहजहाँ ने मूर्तियां नष्ट नहीं की, ना ही खुद कभी दाँवा किया कि वह ताजमहल को शून्य से बनवा रहा है।
समस्या आजादी के समय ही खड़ी हो गयी ज़ब कम्युनिस्टो ने सिस्टम पर हमला किया, वामपंथी पत्रकार, दलाल अधिकारी और भ्रष्ट व्यवस्था ने यह सिद्धांत पैदा किया कि मुसलमानो के आने से पहले देश मे कुछ नहीं था।
तेजो महालय भी नहीं मगर ये जयसिंह की निजी सम्पत्ति थी जिसे उन्होंने अपनी मर्जी से बेचा, लेकिन ये भी गलत है कि इसे शाहजहाँ ने पूरा बनवाया। शाहजहाँ ने बड़े पैमाने पर निर्माण करवाया होगा मगर यह जीरो पॉइंट नहीं था, पहले कुछ था उसकी जगह कुछ बना।
वर्तमान मे ताजमहल जो है सो है, उसकी खूबसूरती आकर्षक है और यह स्वर्ग की अनुभूति भी देता है मगर इसकी कार्बन डेटिंग होनी चाहिए। यदि उन तहखानो मे कुछ नहीं है तो सरकार उन तहखानो मे मीडिया को जाने दे।
यदि तहखानो मे कुछ है तो स्कूलों मे पढ़ाए कि वह एक मंदिर था या कोई हवेली थी जिसे शाहजहाँ ने मुमताज़ की याद मे मकबरे का रूप दिया।
हिन्दू अपनी ही संस्कृति से नफ़रत करे और मुगलो को महान समझकर भारत का इस्लामिकरण खुशी खुशी होने दे इसीलिए ये सारे फसाद पैदा किये गए। जिस समय यहाँ ताजमहल बन रहा था उसी समय लंदन मे ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी बन रही थी, मुझे ताजमहल से शिकायत नहीं है मगर ज़ब बारी राम मंदिर की आयी तो हमें यूनिवर्सिटी बनाने का ज्ञान दिया जा रहा था।
ताजमहल जरूरी था क्योंकि उससे पर्यटन आता है लेकिन स्टेचू ऑफ़ यूनिटी फालतू का खर्चा है जबकि पर्यटन वो भी ला रहा है। ताजमहल से ज्यादा पर्यटन आज अयोध्या और वाराणसी दे रहे है मगर वे अंधविश्वास है और ताजमहल प्यार की निशानी, वो निशानी जिसका निर्माण भुखमरी से मरते लाखों लोगो के शव पर हुआ।
ये पहला मौका है जहाँ मुग़ल बादशाह गलत नहीं है, उसने तो हमारी मूर्तियों को तहखाने मे सुरक्षित रखा, लकड़ी के दरवाजे लगवाये और समय समय पर रखरखाव होता रहा। यहाँ हमारे दुश्मन बने सेक्युलर, वामपंथी और खुद पंडित नेहरू। ये जो शौक है कि हिन्दू होकर हिन्दुओ को नीचा कहेंगे तो कूल वेस्टर्न लगेगा।
राजनीति इनके लिए इतनी जरूरी थी कि जो धरोहर हिन्दू मुस्लिम एकता और सदभाव की निशानी हो सकती थी उसे इन लोगो ने तुष्टिकरण के लिए सांप्रदायिकता मे बाँट दिया। ताजमहल के मुद्दे पर यदि हिन्दू मुसलमान आमने सामने होते है तो ये समुदायो की मूर्खता तो है ही मगर खून का हर छींटा कांग्रेस और वामपंथ के चेहरे पर भी होगा।
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1631 के समय शाहजहाँ बुरहानपुर मे था और इसी बीच मुमताज़ जो कि गर्भवती थी, वह प्रसव पीड़ा से 30 घंटे तड़पती रही और उसकी मौत हो गयी।
शाहजहाँ कई महीने सदमे मे रहा, उस समय बुरहानपुर और आज के महाराष्ट्र मे भयावह भुखमरी फ़ैल रही थी, यहाँ शाहजहाँ ने अपने प्रेम को प्रजा से ऊपर रखा और एक मकबरे का ऐलान किया।
शर्ते ये थी कि मकबरा ऐसी जगह बने जो शाहजहाँ आगरा किले से सीधे देख सके, ऐसे मे एक ही जगह दिखाई दी जहाँ जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह की हवेली थी। शाहजहाँ ने कई प्रलोभन दिये, जयसिंह तब माने ज़ब उन्हें चार हवेली मिल गयी।
47 एकड़ के इस प्लाट का स्वामित्व शाहजहाँ को मिल गया और 1632 से ताजमहल का निर्माण शुरु हुआ जो 1653 तक चला, सारी समस्या बस यही है क्योंकि इतिहास मे कही नहीं लिखा कि इसकी नींव 1632 मे रखी गयी जो भी लिखा गया वह 1640 के आसपास का लिखा गया कि इसे बनाया जा रहा था।
ताजमहल को तोड़ने के प्रयास भी हुए, भरतपुर के महाराज सूरजमल जाट ने 1753 मे आगरा पर अधिकार किया। खूबसूरती से प्रभावित होकर ताज़ नहीं तोड़ा मगर बाहर लगे चांदी के दरवाजे निकाल लिए।
अंग्रेजो ने इसे पर्यटन स्थल बना दिया, किले से ताज़ पहुंचने का रास्ता यमुना से था और यमुना से जो ताज़ दिखता है वही उसका असल द्वार है मगर अब हम ताज़ को पीछे से देखते है। शाहजहाँ जैसे चाहता था ताज़ अब वैसे नहीं देखा जाता।
जयसिंह के उस परिसर मे कोई मंदिर भी रहा होगा जिसके देवी देवताओं को ताजमहल के नीचे बने 22 कमरों मे सील किया गया। नेहरूजी ने इन मूर्तियों को छुपाने के लिए लकड़ी के दरवाजो की जगह इंट से चुनवा दिया था।
आगरा जाटों के कब्जे मे रहा फिर मराठाओ के हाथ भी आया मगर उस समय के हिन्दुओ ने इसे वैसे ही देखा होगा कि एक राजा ने दूसरे राजा को घर बेच दिया और दूसरे ने पुराने सामान को नीचे सुरक्षित रखवा दिया। शाहजहाँ ने मूर्तियां नष्ट नहीं की, ना ही खुद कभी दाँवा किया कि वह ताजमहल को शून्य से बनवा रहा है।
समस्या आजादी के समय ही खड़ी हो गयी ज़ब कम्युनिस्टो ने सिस्टम पर हमला किया, वामपंथी पत्रकार, दलाल अधिकारी और भ्रष्ट व्यवस्था ने यह सिद्धांत पैदा किया कि मुसलमानो के आने से पहले देश मे कुछ नहीं था।
तेजो महालय भी नहीं मगर ये जयसिंह की निजी सम्पत्ति थी जिसे उन्होंने अपनी मर्जी से बेचा, लेकिन ये भी गलत है कि इसे शाहजहाँ ने पूरा बनवाया। शाहजहाँ ने बड़े पैमाने पर निर्माण करवाया होगा मगर यह जीरो पॉइंट नहीं था, पहले कुछ था उसकी जगह कुछ बना।
वर्तमान मे ताजमहल जो है सो है, उसकी खूबसूरती आकर्षक है और यह स्वर्ग की अनुभूति भी देता है मगर इसकी कार्बन डेटिंग होनी चाहिए। यदि उन तहखानो मे कुछ नहीं है तो सरकार उन तहखानो मे मीडिया को जाने दे।
यदि तहखानो मे कुछ है तो स्कूलों मे पढ़ाए कि वह एक मंदिर था या कोई हवेली थी जिसे शाहजहाँ ने मुमताज़ की याद मे मकबरे का रूप दिया।
हिन्दू अपनी ही संस्कृति से नफ़रत करे और मुगलो को महान समझकर भारत का इस्लामिकरण खुशी खुशी होने दे इसीलिए ये सारे फसाद पैदा किये गए। जिस समय यहाँ ताजमहल बन रहा था उसी समय लंदन मे ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी बन रही थी, मुझे ताजमहल से शिकायत नहीं है मगर ज़ब बारी राम मंदिर की आयी तो हमें यूनिवर्सिटी बनाने का ज्ञान दिया जा रहा था।
ताजमहल जरूरी था क्योंकि उससे पर्यटन आता है लेकिन स्टेचू ऑफ़ यूनिटी फालतू का खर्चा है जबकि पर्यटन वो भी ला रहा है। ताजमहल से ज्यादा पर्यटन आज अयोध्या और वाराणसी दे रहे है मगर वे अंधविश्वास है और ताजमहल प्यार की निशानी, वो निशानी जिसका निर्माण भुखमरी से मरते लाखों लोगो के शव पर हुआ।
ये पहला मौका है जहाँ मुग़ल बादशाह गलत नहीं है, उसने तो हमारी मूर्तियों को तहखाने मे सुरक्षित रखा, लकड़ी के दरवाजे लगवाये और समय समय पर रखरखाव होता रहा। यहाँ हमारे दुश्मन बने सेक्युलर, वामपंथी और खुद पंडित नेहरू। ये जो शौक है कि हिन्दू होकर हिन्दुओ को नीचा कहेंगे तो कूल वेस्टर्न लगेगा।
राजनीति इनके लिए इतनी जरूरी थी कि जो धरोहर हिन्दू मुस्लिम एकता और सदभाव की निशानी हो सकती थी उसे इन लोगो ने तुष्टिकरण के लिए सांप्रदायिकता मे बाँट दिया। ताजमहल के मुद्दे पर यदि हिन्दू मुसलमान आमने सामने होते है तो ये समुदायो की मूर्खता तो है ही मगर खून का हर छींटा कांग्रेस और वामपंथ के चेहरे पर भी होगा।
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जब वो दस हजार कमाकर एक दर्जन का परिवार खिला सकते हैं तो तुम जनसंख्या नियंत्रण के ठेकेदार क्यों बनते हों ?
दरसल तुम विशुद्ध रूप से ©️तिए हो।
सोच बदल लो,
तुम भी "हम दो हमारे गिन लो" पर चलकर देखो..
सारी समस्याओं का ठेका तुम्हारा ही थोड़े है।
दस हजार कमाकर दर्जन भर को खिलाकर थोड़ा बड़ा होते ही बाजार मे उतारते हैं। बाजार सिखाकर हर धंधे में घुसाकर उसमे पैर जमा देते हैं। उनका हर छोकरा चाट के ठेले से लगायत कपड़े की दुकान होटल फर्नीचर नाई हर जगह सीखने को घुसता है और सीखकर जम जाता है।
डेली के आठ छोकरे पाँच पाँच सौ लाकर घर देते हैं तो प्रतिदिन इनकम हुई 4000 , और दो सौ के मटन और सौ रुपये के आटे चावल मे पूरा परिवार खाकर लेट लेता है।
यानी शुद्ध बचत 1 लाख प्लस की होती है।
बाकी पार्ट टाइम इनकम छोड़ दो.
और तुम्हारा क्या ?
तुम्हारे लौण्डे को तुम बीटेक, एमबीबीएस, सरकारी कर्मचारी बनाने की होड़ मे पैसे समय और जीवन भर का श्रम खपा देते हो, बदले मे तुम्हारे अगर दोनो लौण्डे (यदि दो हैं तो) यदि सफल हुए तो महीने के तीस हजार बचाने मे गांव से गोला उठ जाता है।
अब सोचो नुकसान कितना हुआ ?
उनके आठ लौण्डे आठ क्षेत्रों मे पैर पसारकर धंधा जमा चुके हैं और अपने "हम चार हमारे हजार" संख्यावृद्धी करते हुए अपनें चूजों को भी धंधे मे उतार रहे हैं।
इधर तुम्हारे दोनो लौण्डों को आधुनिकता का च्योदा बनकर "हम दो हमारा एक" मे फटति फटतः फटन्ति हुई रहती है।
यहाँ गुजरात ही नहीं, भारत का कोई रेलवे स्टेशन, समुद्रतट, नेशनल हाइवे पर बने होटेल्स मॉल या छोटे से बड़ी की टपरी नही होगी जहाँ इनके बीज न फैले हों..
इनके चौदह से सोलह अट्ठारह साल के लौण्डे चाय की कप उठाते उठाते अगर अगले तीन चार सालों मे नोटों के बंडल उठा रहे हैं तो इसके जिम्मेदार तुम खुद हो..
वो नोट के बंडल भी तुम्हारे हैं,
वो धंधा भी तुम्हारा है,
खर्च करने वाले भी तुम्हारे ही लोग हैं।
गलती थोपना बंद करो...
कहना बंद करो कि जनसंख्या विस्फोट हो रहा है,
पंचरपुत्र मजबूत हो चुके हैं,
हम कमजोर हो चुके हैं,
जनसंख्या विस्फोट के ठेकेदार बनना बंद कर दो
दो को पालने हेतु मेहनत तो वैसे भी करते हो... चार छः को पालने हेतु हाड़तोड़ मेहनत कर लोगे तो घिस जाओगे ?
भाड़ मे जाए जनसंख्या विस्फोट..
हम दो हमारे गिन लो वाले नियम का आधा भी करके देखो देश के संसाधनों पर पुनः एकाधिकार व अधिपत्य तुम्हारा होगा...
वर्ना रोते रहो और थोपते रहो..
दरसल तुम विशुद्ध रूप से ©️तिए हो।
सोच बदल लो,
तुम भी "हम दो हमारे गिन लो" पर चलकर देखो..
सारी समस्याओं का ठेका तुम्हारा ही थोड़े है।
दस हजार कमाकर दर्जन भर को खिलाकर थोड़ा बड़ा होते ही बाजार मे उतारते हैं। बाजार सिखाकर हर धंधे में घुसाकर उसमे पैर जमा देते हैं। उनका हर छोकरा चाट के ठेले से लगायत कपड़े की दुकान होटल फर्नीचर नाई हर जगह सीखने को घुसता है और सीखकर जम जाता है।
डेली के आठ छोकरे पाँच पाँच सौ लाकर घर देते हैं तो प्रतिदिन इनकम हुई 4000 , और दो सौ के मटन और सौ रुपये के आटे चावल मे पूरा परिवार खाकर लेट लेता है।
यानी शुद्ध बचत 1 लाख प्लस की होती है।
बाकी पार्ट टाइम इनकम छोड़ दो.
और तुम्हारा क्या ?
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अब सोचो नुकसान कितना हुआ ?
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इधर तुम्हारे दोनो लौण्डों को आधुनिकता का च्योदा बनकर "हम दो हमारा एक" मे फटति फटतः फटन्ति हुई रहती है।
यहाँ गुजरात ही नहीं, भारत का कोई रेलवे स्टेशन, समुद्रतट, नेशनल हाइवे पर बने होटेल्स मॉल या छोटे से बड़ी की टपरी नही होगी जहाँ इनके बीज न फैले हों..
इनके चौदह से सोलह अट्ठारह साल के लौण्डे चाय की कप उठाते उठाते अगर अगले तीन चार सालों मे नोटों के बंडल उठा रहे हैं तो इसके जिम्मेदार तुम खुद हो..
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वो धंधा भी तुम्हारा है,
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पंचरपुत्र मजबूत हो चुके हैं,
हम कमजोर हो चुके हैं,
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