This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
अजीत डोभाल का कहना है कि आईएसआई ने भारत में जासूसी और विध्वंसकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए 4000 से ज़्यादा हिंदू एजेंटों को नियुक्त किया है।
जब भी कोई आईएसआई संदिग्ध पकड़ा जाता है, तो वह अक्सर हिंदू निकलता है, और कई बार ऊँची जातियों का।
जब हम इस पैटर्न की ओर इशारा करते हैं, तो हमें तुरंत देशद्रोही करार दे दिया जाता है।
जब भी कोई आईएसआई संदिग्ध पकड़ा जाता है, तो वह अक्सर हिंदू निकलता है, और कई बार ऊँची जातियों का।
जब हम इस पैटर्न की ओर इशारा करते हैं, तो हमें तुरंत देशद्रोही करार दे दिया जाता है।
एक छुपा हुआ रहस्य साझा कर रहा हूँ सांकेतिक भाषा मे, अस्तित्व मनुष्य की हर आवश्यकता पूरी कर्ता है अब यह हम पर निर्भर कर्ता है कि हमारी आवश्यकता क्या है 1k, 10k, 100k, 1cr ya 100cr, जिसकी जितनी आवश्यकता है अस्तित्व उसकी आवश्यकता पूरी करेगा ही है, आप स्वयम को देखे जीवन भर जितनी आवश्यकता थी वह उपलब्ध हो ही चुकी है, luxury नहीं आवश्यकता की बात कर रहा हूँ, यानी जितनी बड़ी आवश्यकता उतनी बड़ी संभावना, पैसा किसे नहीं चाहिए, तुम यदि इंतजार करोगे की कुछ पैसा इकट्ठे हो जाए तो कुछ बड़ा खरीद लेंगे तो आपको गलत सलाह दी गई है, आप गलत दिशा मे है, पैसा कभी पूरा नही हो पाता, पर यदि आपने उस पैसे की आवश्यकता खाड़ी कर दी तो अस्तित्व उसे भर देगा , यह जिम्मेदारी उसकी है पर शर्त एक ही है कि आप भी प्रयास जारी रखे।
आप देखें एक चींटी और हाथि दोनों की भूख पूर्ण हो जाती है, दोनों की आवश्यकता मे जमीन आसमान का फर्क़ हैं, क्यों कि वह उनकी आवश्यकता है luxury नही इसलिए आवश्यकता खड़ी करने के विकल्प खोजे, आपकी हर आवश्यकता पर अस्तित्व की नजर है, सभी आवश्यकता पूर्ण करने की जिम्मेदारी अस्तित्व की है, उसके पास अथाह समुद्र है हर उस चीज का जो आपको चाहिए बस हिम्मत होनी चाहिए य उसकी आवश्यकता खड़ी करने की, आवश्यकता यानी निकासी जिस से अस्तित्व बह सके क्यों कि अस्तित्व का स्वभाव बहना है यह आपकी जिम्मेदारी है कि उसे बहने का रास्ता दे, इसी रास्ते का नाम आवश्यकता है, यह समझ लिया तो आप जो चाहे प्राप्त कर सकते है यह विज्ञान प्रथ्वी के सिर्फ कुछ 1-2 % मनुष्य जानते होंगे जो उच्च वर्ग के है क्यों कि न ही यह किसी शिक्षा का विषय है न सामाज का, यह तो बस अनुभव से उपलब्ध होता है, सांकेतिक भाषा है समझने का प्रयास करे, फ़िलहाल इतना ही।
आप देखें एक चींटी और हाथि दोनों की भूख पूर्ण हो जाती है, दोनों की आवश्यकता मे जमीन आसमान का फर्क़ हैं, क्यों कि वह उनकी आवश्यकता है luxury नही इसलिए आवश्यकता खड़ी करने के विकल्प खोजे, आपकी हर आवश्यकता पर अस्तित्व की नजर है, सभी आवश्यकता पूर्ण करने की जिम्मेदारी अस्तित्व की है, उसके पास अथाह समुद्र है हर उस चीज का जो आपको चाहिए बस हिम्मत होनी चाहिए य उसकी आवश्यकता खड़ी करने की, आवश्यकता यानी निकासी जिस से अस्तित्व बह सके क्यों कि अस्तित्व का स्वभाव बहना है यह आपकी जिम्मेदारी है कि उसे बहने का रास्ता दे, इसी रास्ते का नाम आवश्यकता है, यह समझ लिया तो आप जो चाहे प्राप्त कर सकते है यह विज्ञान प्रथ्वी के सिर्फ कुछ 1-2 % मनुष्य जानते होंगे जो उच्च वर्ग के है क्यों कि न ही यह किसी शिक्षा का विषय है न सामाज का, यह तो बस अनुभव से उपलब्ध होता है, सांकेतिक भाषा है समझने का प्रयास करे, फ़िलहाल इतना ही।
भगवान श्रीगणेश के 8 अवतारो की कथा
=========================
1. वक्रतुंड
----------------------
वक्रतुंड का अवतार राक्षस मत्सरासुर के दमन के लिए हुआ था। मत्सरासुर शिव भक्त था और उसने शिव की उपासना करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड अवतार लिया। वक्रतुंड भगवान ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर कालांतर में गणपति का भक्त हो गया।
2. एकदंत
----------------------
महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। मद इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं, एक दांत था, पेट बड़ा था और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।
3. महोदर
---------------------
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को संस्कार देकर देवताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।
4. गजानन
-----------------------
एक बार धनराज कुबेर भगवान शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचा। वहां पार्वती को देख कुबेर के मन में काम प्रधान लोभ जागा। उसी लोभ से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिव की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे सबसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया और खुद शिव को भी उसके लिए कैलाश को त्यागना पड़ा। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेश ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
5. लंबोदर
--------------------
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर काम मोहित हो गए। उनका शुक्र स्खलित हुआ, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।
6. विकट
----------------------
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।
7. विघ्नराज
------------------------
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी मुलाकात शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया।
=========================
1. वक्रतुंड
----------------------
वक्रतुंड का अवतार राक्षस मत्सरासुर के दमन के लिए हुआ था। मत्सरासुर शिव भक्त था और उसने शिव की उपासना करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड अवतार लिया। वक्रतुंड भगवान ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर कालांतर में गणपति का भक्त हो गया।
2. एकदंत
----------------------
महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। मद इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं, एक दांत था, पेट बड़ा था और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।
3. महोदर
---------------------
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को संस्कार देकर देवताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।
4. गजानन
-----------------------
एक बार धनराज कुबेर भगवान शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचा। वहां पार्वती को देख कुबेर के मन में काम प्रधान लोभ जागा। उसी लोभ से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिव की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे सबसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया और खुद शिव को भी उसके लिए कैलाश को त्यागना पड़ा। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेश ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
5. लंबोदर
--------------------
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर काम मोहित हो गए। उनका शुक्र स्खलित हुआ, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।
6. विकट
----------------------
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।
7. विघ्नराज
------------------------
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी मुलाकात शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया।
शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।
8. धूम्रवर्ण
--------------------
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए।
उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।
8. धूम्रवर्ण
--------------------
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए।
उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।
क्यों हर और हरि, दोनों को प्रिय है हरद्वार और हरिद्वार।
===================================
हरद्वार जिसे हरिद्वार के नाम से भी जाना जाता है। इसकी महिमा अनन्त है, जिसे शास्त्रों अथवा पुराणों में बहुत गाया और बताया गया है लेकिन ये महिमा क्यों है? इसके कारण क्या हैं?
१. हरद्वार को सर्वप्रथम हर का द्वार कहा जाता है क्योंकि हरद्वार अर्थात हर (देवो के देव महादेवजी) के कैलाश से जुड़ी पर्वत श्रृंखलाओं के पर्वत हरद्वार से शुरू होते हैं, जो हर (देवाधिदेव महादेव) के द्वार कैलाश तक जाते हैं और हरद्वार महादेवजी का अत्यंत प्रिय स्थान भी है। इसी कारण से भी इसे हर का द्वार कहा जाता है द्वार हर तक जाने का।
२. हरिद्वार वह स्थान है जो संसार मे दूसरे स्थान पर बसा था अर्थात पृथ्वी पर सर्वप्रथम काशी मुक्तिक्षेत्र अर्थात आनंदवन की रचना हुई थी जिसे भगवान सदाशिव ने अपने शिवलोक में त्रिशूल से रचकर धरती पर स्थापित किया जो मुक्ति देने वाली काशी के नाम से त्रिलोक में विख्यात है। उसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष प्रजापति को राज करने के लिए धरती पर जो स्थान प्रदान किया वो हरिद्वार ही था। यहीं पर राजा दक्ष ने अपनी नगरी बसाई थी और यहीं पर वो राज करते थे। यही दक्षपुरी के नाम से पुराणों में वर्णित स्थान है। ये संसार में बसा दूसरा नगर था। पहला काशी दूसरा हरिद्वार इसलिए भी इसकी महिमा है।
३. हरिद्वार में कुम्भ से छलका अमृत गिरा था जिसे स्वर्भानु नामक दैत्य लेकर भाग रहा था जो बाद में विष्णु भगवान के द्वारा सर-विच्छेद के कारण राहु केतु के रूप में जाना गया और नवग्रहों में स्थापित हुआ। अमृत छलककर गिरने के कारण भी हरिद्वार की महिमा बढ़ी और ये कुंभनगरी बना जहां हर 12 वर्ष बाद कुम्भ होने लगा।
४. पुराणों और शोध में मिले तथ्यों से स्पष्ट हुआ है कि धरती पर सर्वप्रथम भगवान विष्णु के चरण जिस स्थान पर पड़े वो हरिद्वार ही था। बाद में हरिद्वार के मायापुरी क्षेत्र में ही भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी का विवाह संपन्न हुआ था।
इन्हीं दोनों कारणों से ये स्थान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय हुआ और इसे भगवान हरि ने अपने नाम से सम्बोधित करके हरिद्वार बनाया तबसे इसके दो नाम पड़े हर का द्वार हरद्वार और हरि का भी द्वार हरिद्वार। संसार का पहला क्षेत्र जो हर और हरि दोनों को अतिप्रिय है और दोनों के नाम से जाना जाता है।
५. राजा दक्ष ने परमेश्वरी माता आदिशक्ति की तपस्या करके उनसे पुत्री रूप में अपने घर जन्म लेने का वर मांगा था तो माँ उसके घर पैदा हुई। राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप मे आदिशक्ति स्वरूपा भगवती माता सती का जन्म इसी हरिद्वार में हुआ था।
यहीं उनका बालपन और युवावस्था गुजरी। यहीं पर उन्होंने तप करके महादेवजी को पति रूप में प्राप्त किया तब भगवान महादेवजी ब्रह्मा, विष्णुजी, इंद्र, सूर्य,चन्द्र आदि देवों व लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्राणी, गायत्री आदि देवियों और ऋषि मुनियों तथा अपने गणों सहित बारात लेकर यहां पर आए थे और माता सती से विवाह किया था। इस कारण से भी हरिद्वार की महानता बढ़ती है।
६. राजा दक्ष ने विश्व विख्यात जो यज्ञ किया था वो भी हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में ही किया था जहां राजा दक्ष का महल था।
७. गंगोत्री जहां से गंगाजी का उद्गम है उसका रास्ता भी हरिद्वार से होकर ही जाता है। गंगाजी हरिद्वार से होकर ही अन्य स्थानों पर जाती हैं, इसीलिये इसकी महिमा माँ गंगा की कृपा से और भी बढ़ गयी है।
८. चारधाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ तक जाने से पूर्व हरिद्वार में पूजन करना अनिवार्य है जो देव आज्ञा है शास्त्रों अथवा पुराणों में क्योंकि चारधाम तक जाने का मार्ग भी हरिद्वार से होकर ही जाता है।
९. महादेवजी की पुत्री माता मनसा जो वासुकि नागों के राजा की बहन थी उनका निवास स्थान भी हरिद्वार में ही है जो माँ मनसा देवी के नाम से विख्यात है जहां हजारोन भक्तगण प्रतिदिन माँ के दर्शन करने दूर दूर से आते है। मन की कामना पूरी करने के कारण माँ को मनसा देवी कहा जाता है।
१०. रामायणकाल में अहिरावण और महिरावण श्रीराम को जब पाताल में देवी के सामने बलि देने के लिए ले गए थे तो महादेवजी के अवतार हनुमानजी ने देवी से श्रीराम की बलि टालने का आग्रह किया था तब देवी ने हनुमानजी से कहा था, मैं इस पातालपुरी को त्यागकर शिवपुरी अर्थात हरिद्वार की पर्वत श्रृंखला पर जा रही हूं। तुम इन दोनों असुरों की बलि मुझे दो जिससे मुझे प्रसन्नता होगी और पाताल में धर्म स्थापना होगी तब जो देवी पाताल से उठकर हरिद्वार के पर्वतों पर विराजी वो माँ चंडीदेवी के नाम से विश्व विख्यात है।
रामायणकाल में रावण को जीतने के बाद और अयोध्या आने के बाद श्रीराम ने सीताजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमानजी महाराज सहित यहां आकर माता के दर्शन किये थे और माँ चंडीदेवी का आशीर्वाद लिया था।
===================================
हरद्वार जिसे हरिद्वार के नाम से भी जाना जाता है। इसकी महिमा अनन्त है, जिसे शास्त्रों अथवा पुराणों में बहुत गाया और बताया गया है लेकिन ये महिमा क्यों है? इसके कारण क्या हैं?
१. हरद्वार को सर्वप्रथम हर का द्वार कहा जाता है क्योंकि हरद्वार अर्थात हर (देवो के देव महादेवजी) के कैलाश से जुड़ी पर्वत श्रृंखलाओं के पर्वत हरद्वार से शुरू होते हैं, जो हर (देवाधिदेव महादेव) के द्वार कैलाश तक जाते हैं और हरद्वार महादेवजी का अत्यंत प्रिय स्थान भी है। इसी कारण से भी इसे हर का द्वार कहा जाता है द्वार हर तक जाने का।
२. हरिद्वार वह स्थान है जो संसार मे दूसरे स्थान पर बसा था अर्थात पृथ्वी पर सर्वप्रथम काशी मुक्तिक्षेत्र अर्थात आनंदवन की रचना हुई थी जिसे भगवान सदाशिव ने अपने शिवलोक में त्रिशूल से रचकर धरती पर स्थापित किया जो मुक्ति देने वाली काशी के नाम से त्रिलोक में विख्यात है। उसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष प्रजापति को राज करने के लिए धरती पर जो स्थान प्रदान किया वो हरिद्वार ही था। यहीं पर राजा दक्ष ने अपनी नगरी बसाई थी और यहीं पर वो राज करते थे। यही दक्षपुरी के नाम से पुराणों में वर्णित स्थान है। ये संसार में बसा दूसरा नगर था। पहला काशी दूसरा हरिद्वार इसलिए भी इसकी महिमा है।
३. हरिद्वार में कुम्भ से छलका अमृत गिरा था जिसे स्वर्भानु नामक दैत्य लेकर भाग रहा था जो बाद में विष्णु भगवान के द्वारा सर-विच्छेद के कारण राहु केतु के रूप में जाना गया और नवग्रहों में स्थापित हुआ। अमृत छलककर गिरने के कारण भी हरिद्वार की महिमा बढ़ी और ये कुंभनगरी बना जहां हर 12 वर्ष बाद कुम्भ होने लगा।
४. पुराणों और शोध में मिले तथ्यों से स्पष्ट हुआ है कि धरती पर सर्वप्रथम भगवान विष्णु के चरण जिस स्थान पर पड़े वो हरिद्वार ही था। बाद में हरिद्वार के मायापुरी क्षेत्र में ही भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी का विवाह संपन्न हुआ था।
इन्हीं दोनों कारणों से ये स्थान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय हुआ और इसे भगवान हरि ने अपने नाम से सम्बोधित करके हरिद्वार बनाया तबसे इसके दो नाम पड़े हर का द्वार हरद्वार और हरि का भी द्वार हरिद्वार। संसार का पहला क्षेत्र जो हर और हरि दोनों को अतिप्रिय है और दोनों के नाम से जाना जाता है।
५. राजा दक्ष ने परमेश्वरी माता आदिशक्ति की तपस्या करके उनसे पुत्री रूप में अपने घर जन्म लेने का वर मांगा था तो माँ उसके घर पैदा हुई। राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप मे आदिशक्ति स्वरूपा भगवती माता सती का जन्म इसी हरिद्वार में हुआ था।
यहीं उनका बालपन और युवावस्था गुजरी। यहीं पर उन्होंने तप करके महादेवजी को पति रूप में प्राप्त किया तब भगवान महादेवजी ब्रह्मा, विष्णुजी, इंद्र, सूर्य,चन्द्र आदि देवों व लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्राणी, गायत्री आदि देवियों और ऋषि मुनियों तथा अपने गणों सहित बारात लेकर यहां पर आए थे और माता सती से विवाह किया था। इस कारण से भी हरिद्वार की महानता बढ़ती है।
६. राजा दक्ष ने विश्व विख्यात जो यज्ञ किया था वो भी हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में ही किया था जहां राजा दक्ष का महल था।
७. गंगोत्री जहां से गंगाजी का उद्गम है उसका रास्ता भी हरिद्वार से होकर ही जाता है। गंगाजी हरिद्वार से होकर ही अन्य स्थानों पर जाती हैं, इसीलिये इसकी महिमा माँ गंगा की कृपा से और भी बढ़ गयी है।
८. चारधाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ तक जाने से पूर्व हरिद्वार में पूजन करना अनिवार्य है जो देव आज्ञा है शास्त्रों अथवा पुराणों में क्योंकि चारधाम तक जाने का मार्ग भी हरिद्वार से होकर ही जाता है।
९. महादेवजी की पुत्री माता मनसा जो वासुकि नागों के राजा की बहन थी उनका निवास स्थान भी हरिद्वार में ही है जो माँ मनसा देवी के नाम से विख्यात है जहां हजारोन भक्तगण प्रतिदिन माँ के दर्शन करने दूर दूर से आते है। मन की कामना पूरी करने के कारण माँ को मनसा देवी कहा जाता है।
१०. रामायणकाल में अहिरावण और महिरावण श्रीराम को जब पाताल में देवी के सामने बलि देने के लिए ले गए थे तो महादेवजी के अवतार हनुमानजी ने देवी से श्रीराम की बलि टालने का आग्रह किया था तब देवी ने हनुमानजी से कहा था, मैं इस पातालपुरी को त्यागकर शिवपुरी अर्थात हरिद्वार की पर्वत श्रृंखला पर जा रही हूं। तुम इन दोनों असुरों की बलि मुझे दो जिससे मुझे प्रसन्नता होगी और पाताल में धर्म स्थापना होगी तब जो देवी पाताल से उठकर हरिद्वार के पर्वतों पर विराजी वो माँ चंडीदेवी के नाम से विश्व विख्यात है।
रामायणकाल में रावण को जीतने के बाद और अयोध्या आने के बाद श्रीराम ने सीताजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमानजी महाराज सहित यहां आकर माता के दर्शन किये थे और माँ चंडीदेवी का आशीर्वाद लिया था।
११. माता सती ने जब दक्ष यज्ञ में अपनी देह को यज्ञकुंड में जला दिया था तब महादेव जब उनकी देह लेकर बहुत समय तक पृथ्वी भ्रमण करते रहे और उन्होंने संसार को भुला दिया तब विष्णुजी ने अपने चक्र से सती माता के शरीर को ५२ भागों में विच्छेद किया था, जिनमें से माता सती का हृदय हरिद्वार में गिरा था और मायादेवी के नाम से विख्यात हुआ। ये मायादेवी हरिद्वार के निवासियों की कुल देवी बनी और हरिद्वार की महिमा और बढ़ गई।
१२. ऋषि, मुनियों, अवतारों तथा देवी देवताओं की अतिप्रिय स्थली होने के कारण ही इसे देवभूमि हरिद्वार भी कहते हैं।
१३. जिस पहाड़ की चोटी पर बैठकर महादेव ने दक्ष यज्ञ विध्वंस हेतु वीरभद्र, देवी महाकाली, भैरव, क्षेत्रपाल, नंदी, नवदुर्गा आदि सेना का नेत्तृत्व किया था वो पहाड़ की चोटी भी हरिद्वार में ही है जो नीलपर्वत के नाम से जानी जाती है।
१४. हरिद्वार संसार का एक मात्र स्थान है जो महादेव, आदिशक्ति, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी इन चारों को अतिप्रिय है, इसीलिए यहां पर पूरे वर्ष हर, हरि और माँ के भक्तों का आवागमन लगा रहता है। श्रद्धालु दूर दूर से इस दिव्य स्थान पर दर्शन हेतु आते हैं।
१५. भीम ने अपने गोडे तक जल भरकर जिस स्थान पर तप किया था वो भीमगोडा कहलाया, जो हरिद्वार में ही है। हरिद्वार की महिमा अनन्त है जो सतयुग से महाभारत काल तक की अनेक कथाओं और चमत्कार से भरी हुई है।
१२. ऋषि, मुनियों, अवतारों तथा देवी देवताओं की अतिप्रिय स्थली होने के कारण ही इसे देवभूमि हरिद्वार भी कहते हैं।
१३. जिस पहाड़ की चोटी पर बैठकर महादेव ने दक्ष यज्ञ विध्वंस हेतु वीरभद्र, देवी महाकाली, भैरव, क्षेत्रपाल, नंदी, नवदुर्गा आदि सेना का नेत्तृत्व किया था वो पहाड़ की चोटी भी हरिद्वार में ही है जो नीलपर्वत के नाम से जानी जाती है।
१४. हरिद्वार संसार का एक मात्र स्थान है जो महादेव, आदिशक्ति, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी इन चारों को अतिप्रिय है, इसीलिए यहां पर पूरे वर्ष हर, हरि और माँ के भक्तों का आवागमन लगा रहता है। श्रद्धालु दूर दूर से इस दिव्य स्थान पर दर्शन हेतु आते हैं।
१५. भीम ने अपने गोडे तक जल भरकर जिस स्थान पर तप किया था वो भीमगोडा कहलाया, जो हरिद्वार में ही है। हरिद्वार की महिमा अनन्त है जो सतयुग से महाभारत काल तक की अनेक कथाओं और चमत्कार से भरी हुई है।
• 1020–1140, चालुक्य बनाम परमार: कोई जौहर नहीं
• 1100–1200, परमार बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1150–1180, चालुक्य बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1160–1180, चौहान बनाम गहड़वाल: कोई जौहर नहीं
• 1200–1500, सिसोदिया बनाम राठौड़: कोई जौहर नहीं
• 1300–1400, सिसोदिया बनाम परमार: कोई जौहर नहीं
• 1300–1500, सिसोदिया के आंतरिक उत्तराधिकार युद्ध: कोई जौहर नहीं
• 1300–1400, राठौड़ बनाम परमार: कोई जौहर नहीं
• 1350–1500, राठौड़ बनाम भाटी: कोई जौहर नहीं
• 1100–1300, कछवाहा बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1000–1200, चौहान शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं
• 1100–1300, भाटी बनाम जाडौन: कोई जौहर नहीं
• 1100–1150, तोमर बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1400–1500, राठौड़ बनाम कछवाहा: कोई जौहर नहीं
इन सभी में—दो दर्जन से भी अधिक युद्ध, जिनमें राजपूत आपस में लड़े, और कहीं भी जौहर नहीं हुआ।
एक भी नहीं।
ना भारतीय स्रोतों में, ना विदेशी लेखनों में।
अब यह देखें:
• 712, दाहिर (सिंध) बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर
• 1232, ग्वालियर बनाम इल्तुतमिश: जौहर
• 1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर
• 1299, जैसलमेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर
• 1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: पहला जौहर
• 1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर
• 1326, जैसलमेर बनाम गयास-उद-दीन तुगलक: जौहर
• 1486, कुवा बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर
• 1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर
• 1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: दूसरा जौहर
• 1543, रायसेन बनाम हुमायूं: तीन जौहर
• 1568, चित्तौड़ बनाम अकबर: तीसरा जौहर
• 1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर
• 1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर
इसी तरह जब अंग्रेज आए—प्लासी, बक्सर, कर्नाटिक युद्ध, मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, गुरखा युद्ध, सिख युद्ध, बर्मा युद्ध, अफगान युद्ध—
कहीं भी जौहर नहीं।
अब जब कोई समीक्षक “हिंदुत्व” को जौहर को “महिमामंडित करने” के लिए कोसता है, मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ—
यह एक भयावह प्रथा थी, सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं, और सौभाग्य से यह समाप्त हो चुकी है।
लेकिन क्या आपको ऊपर की सूचियों में कुछ पैटर्न दिख रहा है?
क्यों यह वीभत्स परंपरा केवल मुस्लिम आक्रमणों के प्रसंगों में ही दिखाई देती है?
अन्य किसी भी विरोधी के विरुद्ध राज्य गिरने पर महिलाओं ने ऐसा क्यों नहीं किया?
इतना तो कोई भी समझ सकता है।
कोई जौहर का महिमामंडन नहीं करता—यह कोई उत्सव नहीं था। हम इसे सम्मान देते हैं—उस अग्नि को नहीं, बल्कि उस दर्दनाक भावना को जिसने हमारे पूर्वजों को ऐसा करने पर मजबूर किया।
क्योंकि उस भावना को स्मरण रखना आवश्यक है।
पता है क्यों?
क्योंकि वे राक्षस, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ऐसी भयावह स्थिति में धकेला—
वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
और उनका स्वभाव आज भी वैसा ही है।
जब कोई मृत्यु को आपकी छाया से बेहतर विकल्प समझ ले—तो सोचिए
आप हैं ही क्या?
• 1100–1200, परमार बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1150–1180, चालुक्य बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1160–1180, चौहान बनाम गहड़वाल: कोई जौहर नहीं
• 1200–1500, सिसोदिया बनाम राठौड़: कोई जौहर नहीं
• 1300–1400, सिसोदिया बनाम परमार: कोई जौहर नहीं
• 1300–1500, सिसोदिया के आंतरिक उत्तराधिकार युद्ध: कोई जौहर नहीं
• 1300–1400, राठौड़ बनाम परमार: कोई जौहर नहीं
• 1350–1500, राठौड़ बनाम भाटी: कोई जौहर नहीं
• 1100–1300, कछवाहा बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1000–1200, चौहान शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं
• 1100–1300, भाटी बनाम जाडौन: कोई जौहर नहीं
• 1100–1150, तोमर बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं
• 1400–1500, राठौड़ बनाम कछवाहा: कोई जौहर नहीं
इन सभी में—दो दर्जन से भी अधिक युद्ध, जिनमें राजपूत आपस में लड़े, और कहीं भी जौहर नहीं हुआ।
एक भी नहीं।
ना भारतीय स्रोतों में, ना विदेशी लेखनों में।
अब यह देखें:
• 712, दाहिर (सिंध) बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर
• 1232, ग्वालियर बनाम इल्तुतमिश: जौहर
• 1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर
• 1299, जैसलमेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर
• 1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: पहला जौहर
• 1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर
• 1326, जैसलमेर बनाम गयास-उद-दीन तुगलक: जौहर
• 1486, कुवा बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर
• 1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर
• 1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: दूसरा जौहर
• 1543, रायसेन बनाम हुमायूं: तीन जौहर
• 1568, चित्तौड़ बनाम अकबर: तीसरा जौहर
• 1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर
• 1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर
इसी तरह जब अंग्रेज आए—प्लासी, बक्सर, कर्नाटिक युद्ध, मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, गुरखा युद्ध, सिख युद्ध, बर्मा युद्ध, अफगान युद्ध—
कहीं भी जौहर नहीं।
अब जब कोई समीक्षक “हिंदुत्व” को जौहर को “महिमामंडित करने” के लिए कोसता है, मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ—
यह एक भयावह प्रथा थी, सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं, और सौभाग्य से यह समाप्त हो चुकी है।
लेकिन क्या आपको ऊपर की सूचियों में कुछ पैटर्न दिख रहा है?
क्यों यह वीभत्स परंपरा केवल मुस्लिम आक्रमणों के प्रसंगों में ही दिखाई देती है?
अन्य किसी भी विरोधी के विरुद्ध राज्य गिरने पर महिलाओं ने ऐसा क्यों नहीं किया?
इतना तो कोई भी समझ सकता है।
कोई जौहर का महिमामंडन नहीं करता—यह कोई उत्सव नहीं था। हम इसे सम्मान देते हैं—उस अग्नि को नहीं, बल्कि उस दर्दनाक भावना को जिसने हमारे पूर्वजों को ऐसा करने पर मजबूर किया।
क्योंकि उस भावना को स्मरण रखना आवश्यक है।
पता है क्यों?
क्योंकि वे राक्षस, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ऐसी भयावह स्थिति में धकेला—
वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
और उनका स्वभाव आज भी वैसा ही है।
जब कोई मृत्यु को आपकी छाया से बेहतर विकल्प समझ ले—तो सोचिए
आप हैं ही क्या?
2️⃣7️⃣❗1️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
*कामदेव और भगवान शिव की कथा,,,*
*===============================*
सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है॥ उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिए तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। है तो बड़े असमंजस की बात, तब इंद्र ने कहा मेरी एक बात सुनो॥
तुम जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो, वह शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भंग करे)। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे॥
इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो (और तो कोई उपाय नहीं है) सबने कहा- यह सम्मति बहुत अच्छी है। तब विषम (पाँच) बाण धारण करने वाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा वाला कामदेव प्रकट हुआ॥ वताओं ने कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कही।
यह सब सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से यों कहा कि शिवजी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है॥ लेकिन आप चिंता मत करो मैं आपका काम करूँगा। जो दूसरे के हित के लिए अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं॥ इस प्रकार कामदेव हाथ में धनुष बाण लेकर चल दिया। कामदेव ने हृदय में ऐसा विचार किया कि शिवजी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है॥Rpd
कामदेव ने काम की ऐसी बयार चलाई की सब कुछ काममय हो गया। उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। क्षणभर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गई॥ ब्रह्मचर्य, नियम, नाना प्रकार के संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य आदि विवेक की सारी सेना डरकर भाग गई॥ सारे जगत् में खलबली मच गई (और सब कहने लगे) हे विधाता! अब क्या होने वाला है?
सबके हृदय में काम की इच्छा हो गई। जगत में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गए॥ सब लोक कामान्ध होकर व्याकुल हो गए। स्त्रियाँ सारे संसार को पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे। दो घड़ी तक सारे ब्राह्मण्ड के अंदर कामदेव का रचा हुआ यह कौतुक (तमाशा) रहा।
किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिए। श्री रघुनाथजी ने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे॥ जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥
जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा-का तैसा स्थिर हो गया। रुद्र (महाभयंकर) शिवजी को देखकर कामदेव भयभीत हो गया॥ लौट जाने में लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा।
तुरंत ही सुंदर ऋतुराज वसन्त को प्रकट किया। फूले हुए नए-नए वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गईं॥ कामरूपी अग्नि का सच्चा मित्र शीतल-मन्द-सुगंधित पवन चलने लगा। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं॥ कामदेव अपनी सेना समेत करोड़ों प्रकार की सब कलाएँ (उपाए) करके हार गया, पर शिवजी की अचल समाधि न डिगी।
तब कामदेव क्रोधित हो उठा॥ आम के वृक्ष की एक सुंदर डाली देखकर मन में क्रोध से भरा हुआ कामदेव उस पर चढ़ गया। उसने पुष्प धनुष पर अपने (पाँचों) बाण चढ़ाए और अत्यन्त क्रोध से (लक्ष्य की ओर) ताककर उन्हें कान तक तान लिया॥
कामदेव ने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजी के हृदय में लगे। तब उनकी समाधि टूट गई और वे जाग गए। ईश्वर (शिवजी) के मन में बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा॥ जब आम के पत्तों में (छिपे हुए) कामदेव को देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे।
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवन कामु भयउ जरि छारा॥ तब शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला, उनको देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया॥
जगत में बड़ा हाहाकर मच गया। कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही मूर्च्छित हो गई। रोती-चिल्लाती और भाँति-भाँति से करुणा करती हुई वह शिवजी के पास गई।
शिवजी अबला (असहाय स्त्री) को देखकर सुंदर (उसको सान्त्वना देने वाले) वचन बोले। हे रति! अब से तेरे स्वामी का नाम अनंग होगा। वह बिना शरीर के ही सबको सताएगा।
अब तू अपने पति से मिलने की बात सुन॥ जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। शिवजी के वचन सुनकर रति चली गई..!!
*🙏🏻🙏🏽🙏🏼हर हर महादेव*🙏🏾🙏🙏🏿
*कामदेव और भगवान शिव की कथा,,,*
*===============================*
सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है॥ उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिए तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। है तो बड़े असमंजस की बात, तब इंद्र ने कहा मेरी एक बात सुनो॥
तुम जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो, वह शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भंग करे)। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे॥
इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो (और तो कोई उपाय नहीं है) सबने कहा- यह सम्मति बहुत अच्छी है। तब विषम (पाँच) बाण धारण करने वाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा वाला कामदेव प्रकट हुआ॥ वताओं ने कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कही।
यह सब सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से यों कहा कि शिवजी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है॥ लेकिन आप चिंता मत करो मैं आपका काम करूँगा। जो दूसरे के हित के लिए अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं॥ इस प्रकार कामदेव हाथ में धनुष बाण लेकर चल दिया। कामदेव ने हृदय में ऐसा विचार किया कि शिवजी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है॥Rpd
कामदेव ने काम की ऐसी बयार चलाई की सब कुछ काममय हो गया। उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। क्षणभर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गई॥ ब्रह्मचर्य, नियम, नाना प्रकार के संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य आदि विवेक की सारी सेना डरकर भाग गई॥ सारे जगत् में खलबली मच गई (और सब कहने लगे) हे विधाता! अब क्या होने वाला है?
सबके हृदय में काम की इच्छा हो गई। जगत में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गए॥ सब लोक कामान्ध होकर व्याकुल हो गए। स्त्रियाँ सारे संसार को पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे। दो घड़ी तक सारे ब्राह्मण्ड के अंदर कामदेव का रचा हुआ यह कौतुक (तमाशा) रहा।
किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिए। श्री रघुनाथजी ने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे॥ जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥
जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा-का तैसा स्थिर हो गया। रुद्र (महाभयंकर) शिवजी को देखकर कामदेव भयभीत हो गया॥ लौट जाने में लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा।
तुरंत ही सुंदर ऋतुराज वसन्त को प्रकट किया। फूले हुए नए-नए वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गईं॥ कामरूपी अग्नि का सच्चा मित्र शीतल-मन्द-सुगंधित पवन चलने लगा। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं॥ कामदेव अपनी सेना समेत करोड़ों प्रकार की सब कलाएँ (उपाए) करके हार गया, पर शिवजी की अचल समाधि न डिगी।
तब कामदेव क्रोधित हो उठा॥ आम के वृक्ष की एक सुंदर डाली देखकर मन में क्रोध से भरा हुआ कामदेव उस पर चढ़ गया। उसने पुष्प धनुष पर अपने (पाँचों) बाण चढ़ाए और अत्यन्त क्रोध से (लक्ष्य की ओर) ताककर उन्हें कान तक तान लिया॥
कामदेव ने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजी के हृदय में लगे। तब उनकी समाधि टूट गई और वे जाग गए। ईश्वर (शिवजी) के मन में बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा॥ जब आम के पत्तों में (छिपे हुए) कामदेव को देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे।
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवन कामु भयउ जरि छारा॥ तब शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला, उनको देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया॥
जगत में बड़ा हाहाकर मच गया। कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही मूर्च्छित हो गई। रोती-चिल्लाती और भाँति-भाँति से करुणा करती हुई वह शिवजी के पास गई।
शिवजी अबला (असहाय स्त्री) को देखकर सुंदर (उसको सान्त्वना देने वाले) वचन बोले। हे रति! अब से तेरे स्वामी का नाम अनंग होगा। वह बिना शरीर के ही सबको सताएगा।
अब तू अपने पति से मिलने की बात सुन॥ जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। शिवजी के वचन सुनकर रति चली गई..!!
*🙏🏻🙏🏽🙏🏼हर हर महादेव*🙏🏾🙏🙏🏿
🙏1
2️⃣7️⃣❗1️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
*यह कथा द्वापरयुग की है ,जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था !*
*===============================*
बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ! यह कथा इस प्रकार है :-
मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था ! उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे ! यही कारण था ,कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे !
जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं ! उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था !
कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था ! प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उसका वध कर दिया !
दामाद की मृत्यु की सुचना सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा !
प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया ! किंतु हर बार श्री कृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे !
एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया !
लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया ! जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए !
काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्री कृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया !
वह श्री कृष्ण की शक्ति जानता था ! इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा !
भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा ! किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा !
तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले :-
वत्स ! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी ! लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना !
वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा ! यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए !
इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्री कृष्ण सभी मथुरा वासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे !
काशीराज ने श्री कृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा !
काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं ! इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई !
उल्टे श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया ! सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा ! प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत हो कर काशी की ओर भागी !
सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा ! काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया ! किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया !
कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा ! वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया !
इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ..!!
*🙏🏾🙏🏼🙏🏽जय श्री कृष्ण*🙏🏻🙏🏿🙏
*यह कथा द्वापरयुग की है ,जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था !*
*===============================*
बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ! यह कथा इस प्रकार है :-
मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था ! उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे ! यही कारण था ,कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे !
जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं ! उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था !
कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था ! प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उसका वध कर दिया !
दामाद की मृत्यु की सुचना सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा !
प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया ! किंतु हर बार श्री कृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे !
एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया !
लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया ! जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए !
काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्री कृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया !
वह श्री कृष्ण की शक्ति जानता था ! इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा !
भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा ! किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा !
तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले :-
वत्स ! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी ! लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना !
वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा ! यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए !
इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्री कृष्ण सभी मथुरा वासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे !
काशीराज ने श्री कृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा !
काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं ! इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई !
उल्टे श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया ! सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा ! प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत हो कर काशी की ओर भागी !
सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा ! काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया ! किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया !
कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा ! वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया !
इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ..!!
*🙏🏾🙏🏼🙏🏽जय श्री कृष्ण*🙏🏻🙏🏿🙏
🙏1
Forwarded from कैलाश के निवासी (Meett Meett)
Media is too big
VIEW IN TELEGRAM