हिंदी कथा-साहित्य की साठोत्तरी पीढ़ी के रचनाकार और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन का न रहना हिंदी के एक अभिभावक का खो जाना है। ‘फेन्स के इधर और उधर’, ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’, ‘अमरूद’ और ‘पिता’ जैसी कहानियां हमारे समय की नैतिक दरारों के दस्तावेज़ हैं। ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने साहित्य के ‘प्रगतिशील और वैचारिक विकास’ के लिए न सिर्फ हिंदी की नई और असुविधाजनक आवाज़ों को निर्भय मंच दिया बल्कि दुनिया भर के महान साहित्य को हिंदी में लेकर आये।
CGPSC & CgVyapam की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।🌹🙏
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सुन्दरलाल बहुगुणा सिर्फ़ पर्यावरण की बात नहीं करते थे,
वह उसे जीते थे। 1970 के दशक में उत्तराखंड के गाँवों से उठे चिपको आंदोलन को उन्होंने राष्ट्रीय चेतना बनाया<, जहाँ महिलाएँ पेड़ों से लिपटकर जंगलों को कटने से बचा रही थीं।
इस आंदोलन के बाद हिमालयी क्षेत्रों में हरित कटाई पर
सरकारी रोक लगी। बाँधों के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई भी उतनी ही ऐतिहासिक रही।
टिहरी बाँध के विरोध में उन्होंने वर्षों तक पदयात्राएँ कीं,
और 74 दिनों का अनशन तक किया, यह चेताने के लिए कि विकास अगर विस्थापन और पर्यावरण विनाश पर टिका है, तो वह विकास नहीं है।
बहुगुणा ने “इकोलॉजी स्थायी है, अर्थव्यवस्था अस्थायी”
जैसा विचार भारत की मुख्यधारा में रखा।
उन्होंने हिमालयी नीति, जल संरक्षण, वन अधिकार और
स्थानीय समुदायों की भागीदारी को पर्यावरण बहस के केंद्र में ला दिया।
उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि पेड़ सिर्फ़ खड़े तने नहीं होते, वे भविष्य की साँस होते हैं।
आज जब मिट्टी थक रही है, पानी सिमट रहा है और हवा ज़हरीली हो रही है, सुन्दरलाल बहुगुणा की ज़िंदगी और संघर्ष हमसे एक ही सवाल पूछती है- क्या हमने जंगलों के उपकार समझे भी हैं?
वह उसे जीते थे। 1970 के दशक में उत्तराखंड के गाँवों से उठे चिपको आंदोलन को उन्होंने राष्ट्रीय चेतना बनाया<, जहाँ महिलाएँ पेड़ों से लिपटकर जंगलों को कटने से बचा रही थीं।
इस आंदोलन के बाद हिमालयी क्षेत्रों में हरित कटाई पर
सरकारी रोक लगी। बाँधों के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई भी उतनी ही ऐतिहासिक रही।
टिहरी बाँध के विरोध में उन्होंने वर्षों तक पदयात्राएँ कीं,
और 74 दिनों का अनशन तक किया, यह चेताने के लिए कि विकास अगर विस्थापन और पर्यावरण विनाश पर टिका है, तो वह विकास नहीं है।
बहुगुणा ने “इकोलॉजी स्थायी है, अर्थव्यवस्था अस्थायी”
जैसा विचार भारत की मुख्यधारा में रखा।
उन्होंने हिमालयी नीति, जल संरक्षण, वन अधिकार और
स्थानीय समुदायों की भागीदारी को पर्यावरण बहस के केंद्र में ला दिया।
उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि पेड़ सिर्फ़ खड़े तने नहीं होते, वे भविष्य की साँस होते हैं।
आज जब मिट्टी थक रही है, पानी सिमट रहा है और हवा ज़हरीली हो रही है, सुन्दरलाल बहुगुणा की ज़िंदगी और संघर्ष हमसे एक ही सवाल पूछती है- क्या हमने जंगलों के उपकार समझे भी हैं?