आज से ठीक 3 साल पहले भारत ने सूर्य की तरफ एक ऐसा मिशन भेजा था, जो आज भी करीब 15 लाख किलोमीटर दूर से लगातार उसे देख रहा है।
लेकिन इसका मकसद सिर्फ सूर्य की तस्वीरें लेना नहीं, बल्कि उसकी खतरनाक हलचलों के पीछे का राज समझना है।
2 सितंबर 2023 को इसरो ने पीएसएलवी-सी57 रॉकेट से आदित्य-एल1 को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया था। लॉन्च के करीब 63 मिनट बाद इसे पृथ्वी की शुरुआती कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया गया।
इसके बाद अंतरिक्ष यान ने कई कक्षीय बदलाव किए और करीब 110 दिनों की यात्रा के बाद 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी के बीच मौजूद एल1 पॉइंट के आसपास अपनी हेलो ऑर्बिट में पहुंच गया।
एल1 पॉइंट पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर है। यहां से आदित्य-एल1 सूर्य को लगातार देख सकता है, क्योंकि उसके सामने पृथ्वी या चंद्रमा के आने से होने वाली रुकावट बहुत कम रहती है। साथ ही, सौर तूफान और सौर हवा के असर को पृथ्वी तक पहुंचने से पहले मापने का मौका मिलता है।
आदित्य-एल1 में कुल 7 वैज्ञानिक उपकरण हैं। इनमें कुछ सूर्य की बाहरी परतों और कोरोना को देखते हैं, जबकि बाकी सौर हवा, कणों और चुंबकीय क्षेत्र को मापते हैं। इनका मकसद सोलर फ्लेयर, कोरोनल मास इजेक्शन और स्पेस वेदर जैसी घटनाओं को समझना है।
और मिशन ने सिर्फ शुरुआत नहीं की है। इसके उपकरणों ने सौर विस्फोटों और कोरोनल मास इजेक्शन जैसी घटनाओं को रिकॉर्ड करके वैज्ञानिकों को सूर्य की गतिविधियों को समझने के लिए नया डेटा दिया है। 2026 तक आदित्य-एल1 का 30 टेराबाइट से ज्यादा वैज्ञानिक डेटा सार्वजनिक किया जा चुका है।
यानी भारत का यह अंतरिक्ष यान सूर्य पर गया नहीं है, बल्कि उससे बहुत दूर बैठकर उसके व्यवहार को लगातार पढ़ रहा है।
अगर सूर्य से आने वाला कोई बड़ा सौर तूफान पृथ्वी की तकनीक को प्रभावित कर सकता है, तो क्या ऐसे मिशन भविष्य में हमें पहले से चेतावनी दे पाएंगे?
ओरिजन सोर्स: इसरो की आधिकारिक वेबसाइट
#AdityaL1 #ISRO #SpaceScience #SolarMission #IndiaInSpace
लेकिन इसका मकसद सिर्फ सूर्य की तस्वीरें लेना नहीं, बल्कि उसकी खतरनाक हलचलों के पीछे का राज समझना है।
2 सितंबर 2023 को इसरो ने पीएसएलवी-सी57 रॉकेट से आदित्य-एल1 को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया था। लॉन्च के करीब 63 मिनट बाद इसे पृथ्वी की शुरुआती कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया गया।
इसके बाद अंतरिक्ष यान ने कई कक्षीय बदलाव किए और करीब 110 दिनों की यात्रा के बाद 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी के बीच मौजूद एल1 पॉइंट के आसपास अपनी हेलो ऑर्बिट में पहुंच गया।
एल1 पॉइंट पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर है। यहां से आदित्य-एल1 सूर्य को लगातार देख सकता है, क्योंकि उसके सामने पृथ्वी या चंद्रमा के आने से होने वाली रुकावट बहुत कम रहती है। साथ ही, सौर तूफान और सौर हवा के असर को पृथ्वी तक पहुंचने से पहले मापने का मौका मिलता है।
आदित्य-एल1 में कुल 7 वैज्ञानिक उपकरण हैं। इनमें कुछ सूर्य की बाहरी परतों और कोरोना को देखते हैं, जबकि बाकी सौर हवा, कणों और चुंबकीय क्षेत्र को मापते हैं। इनका मकसद सोलर फ्लेयर, कोरोनल मास इजेक्शन और स्पेस वेदर जैसी घटनाओं को समझना है।
और मिशन ने सिर्फ शुरुआत नहीं की है। इसके उपकरणों ने सौर विस्फोटों और कोरोनल मास इजेक्शन जैसी घटनाओं को रिकॉर्ड करके वैज्ञानिकों को सूर्य की गतिविधियों को समझने के लिए नया डेटा दिया है। 2026 तक आदित्य-एल1 का 30 टेराबाइट से ज्यादा वैज्ञानिक डेटा सार्वजनिक किया जा चुका है।
यानी भारत का यह अंतरिक्ष यान सूर्य पर गया नहीं है, बल्कि उससे बहुत दूर बैठकर उसके व्यवहार को लगातार पढ़ रहा है।
अगर सूर्य से आने वाला कोई बड़ा सौर तूफान पृथ्वी की तकनीक को प्रभावित कर सकता है, तो क्या ऐसे मिशन भविष्य में हमें पहले से चेतावनी दे पाएंगे?
ओरिजन सोर्स: इसरो की आधिकारिक वेबसाइट
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