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जहाँ इतिहास किताबों से आगे, दस्तावेज़ों से जुड़ता है।
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ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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1. 1893 – दक्षिण अफ्रीका आगमन
गांधी जी एक भारतीय व्यापारी दादा अब्दुल्ला के मुकदमे के लिए वकील बनकर नेटाल (Natal) पहुँचे।
यहीं उन्हें नस्लीय भेदभाव का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।

2. 1893 – पीटरमैरिट्ज़बर्ग घटना
प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया।
यही घटना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी।

3. 1894 – नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना
भारतीयों के अधिकारों की रक्षा हेतु Natal Indian Congress (NIC) बनाई।
भारतीयों को संगठित करने का पहला बड़ा प्रयास।

4. 1896–1897 – भारत यात्रा और पुनः अफ्रीका वापसी
भारत आकर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति बताई।
वापस लौटने पर डरबन में उन पर हमला हुआ, फिर भी उन्होंने क्षमा का मार्ग चुना।

5. 1899–1902 – बोअर युद्ध में सेवा
ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए इंडियन एम्बुलेंस कॉर्प्स बनाया।
यह दिखाया कि भारतीय जिम्मेदार नागरिक हैं।

6. 1903 – ‘Indian Opinion’ पत्र का प्रकाशन
भारतीयों की समस्याओं को उजागर करने के लिए अख़बार शुरू किया।
सत्य, अधिकार और जागरूकता का माध्यम बना।

7. 1904 – फीनिक्स आश्रम की स्थापना
सामूहिक जीवन, सादगी और श्रम का प्रयोग।
सत्याग्रह की वैचारिक नींव यहीं मजबूत हुई।

8. 1906 – सत्याग्रह का प्रारंभ
ट्रांसवाल सरकार के एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट (ब्लैक एक्ट) के विरोध में।
पहली बार सत्याग्रह शब्द और प्रयोग सामने आया।

9. 1908–1909 – जेल यात्राएँ
कानून तोड़ने के कारण कई बार जेल गए।
आंदोलन को नैतिक बल मिला।

10. 1910 – टॉल्सटॉय फार्म की स्थापना
सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण और आत्मनिर्भर जीवन के लिए।
नैतिक अनुशासन का केंद्र।

11. 1913 – महिला और श्रमिक सत्याग्रह
भारतीय महिलाओं की गिरफ्तारी के विरोध में आंदोलन।
खदान मजदूरों को भी आंदोलन से जोड़ा।

12. 1914 – स्मट्स–गांधी समझौता
सरकार ने कई भेदभावपूर्ण कानून वापस लिए।
सत्याग्रह की पहली बड़ी जीत।

13. 1914 – भारत वापसी
21 वर्षों के संघर्ष के बाद भारत लौटे।
दक्षिण अफ्रीका उनका राजनीतिक प्रयोगशाला बना।
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राजस्थान में अंग्रेजी प्रभुत्व!

शत्रु-मित्र की परवाह किए बिना मराठों ने कभी शासकों को तो कभी सामन्तों को सैनिक सहायता दी। मगर जब राजपूत शासक अपने वायदे के मुताबिक मराठों को धन नहीं चुका पाए, तो मराठों ने बलपूर्वक धन वसूल करने की नीति अपनाई । दिन-प्रतिदिन मराठों की धनलिप्सा बढ़ती गई, जिसे पूरा करने में राजपूत शासक असमर्थ रहे। मराठे धन प्राप्ति के लिए लूट-पाट मचाने लगे, जिससे राजस्थान में अराजकता का वातावरण बन गया। सभी राज्य मराठा नासूर से पीड़ित थे
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शिवाजी महाराज के मुख्य सलाहकार रामदास थे, जिन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को रंग दिया और अभिवादन का एक नया रूप प्रचलित किया, जिसने एक साथ आंदोलन के धार्मिक स्वरूप और उसे प्रेरित करने वाली भावना की स्वतंत्रता को प्रदर्शित किया। प्रथम बाजीराव पेशवा ने धवदशी के स्वामी से प्रेरणा प्राप्त की। विंचुरकर परिवार के संस्थापक विट्ठल शिवदेव भी अपने गुरु से इसी प्रकार प्रेरित थे। शिवाजी के चरित्र और उनके कार्यों के प्रेरक-स्रोतों का चित्रण मराठों के इतिहासकार की तुलना में कर्नल मेडोज़ टेलर ने अपने उपन्यास में अधिक सटीक रूप से किया है,शिवाजी को लगता था कि उन्हें देवी भवानी से प्रत्यक्ष प्रेरणा मिलती है,और अपने जीवन के महान संकटों में,उन्होंने हमेशा तीव्र विक्षोभ के क्षणों में इस प्रेरणा द्वारा सुझाए गए मार्ग का अनुसरण किया। ये प्रभाव विशेष अध्ययन के योग्य हैं,क्योंकि इन्होंने आज तक लोगों की आकांक्षाओं और आस्था पर अपनी छाप छोड़ी है 📖✍️
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दिल्ली में बनाए गये महलों की दीवार या छतों से सोना चांदी निकालने की कहानी बहुत आम ही है, जो दिल्ली को जीतता वो उसी को लूट लेता ।
जैसे–
1760 में मराठों सरदार सदाशिव राव ने दिल्ली के Diwan-i-Khas की चाँदी की छत को हटाया और पिघलाया ताकि धन इकट्ठा कर सकें और अपनी सेना को वेतन दे सके ।
उसी प्रकार रोहिला सरदार गुलाम कादिर ने भी दिल्ली की मस्जिद की दीवारों से सोना चांदी निकाला और दिल्ली को खूब लूटा।
ऐसे ही जाट सरदार सूरजमल ने भी किया था जब सूरजमल ने दिल्ली और आगरा के पास के क्षेत्रों को जीत लिया था तो उन्होंने भी महलों से ऐसे ही सोना चांदी को निकाल के लूटा था 📖✍️
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जिस रोहिला सरदार गुलाम कादिर ने शाह आलम II की आंखे निकाली थी उसी गुलाम कादिर को कभी शाह आलम II कैद कर के अपने महल में लाया था और उसको अपने बेटे के समान पाला और उसको बेटे का दर्जा दिया,उसके लिए यह रेखता लिखी –

वह मेरा विशेष पुत्र है, और बाकी सब तो केवल गुलाम हैं।
हे भगवान! मेरे भक्त के घर को सदा आबाद रखना।
उनकी इच्छाओं का बाग़ इसी प्रकार फलता-फूलता रहे।
ईश्वर करे कि शरद ऋतु कभी भी उसके बगीचे की सीमाओं में अतिक्रमण न करे।
ईश्वर की छत्रछाया में उनका पालन-पोषण हो।
जब तक आफताब (सूर्य) चमकता रहेगा
और आकाश में तारे जगमगाते हैं।

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ग़ुलाम क़ादिर ने कहा—
“शाह आलम ने मराठों और मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान के साथ मिलकर मेरा घर नष्ट करने की कोशिश की थी और पठारगढ़ जाकर मेरी स्त्रियों का अपमान किया था। आज भी वह सिंधिया को बुलाकर मेरा सर्वनाश करना चाहता है। मेरे पास प्रतिशोध लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।”
अज़फ़री के अनुसार, जब वह नगर और महल को लूट रहा था, तब रोहिल्ला ग़ुलाम क़ादिर दिन-रात नशे में डूबा रहता था।
धीरे-धीरे ग़ुलाम क़ादिर और अधिक क्रूर होता गया।
शाही ख़ज़ाने के गुप्त स्थान जानने के लिए सेवकों को उल्टा लटकाकर आग पर यातनाएँ दी जाती थीं।
शाह आलम के प्रिय दासियाँ, नर्तकियाँ और मनोरंजन कराने वाली स्त्रियाँ बिना घूँघट लायी गईं और दैरा शिविर में ले जाकर उन्हें शराबी लंपटों की वासना का शिकार बनाया गया।
मुख्य खोजा मंसूर अली को शौचालय से घसीटते हुए ले जाया गया और गटर में लगभग डुबो दिया गया।
जब खोजे ने कहा कि उसने शिशु अवस्था में ग़ुलाम क़ादिर की जान बचाई थी, तो उसने उत्तर दिया—
क्या तुम कहावत नहीं जानते—साँप को मारना चाहिए, उसके बच्चे को नहीं छोड़ना चाहिए।”
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यह किताब भारतीय विज्ञान जगत के उस महान नाम की कहानी प्रस्तुत करती है, जिसे दुनिया अक्सर सिर्फ एक वैज्ञानिक के रूप में जानती है — लेकिन हकीकत में Jagadish Chandra Bose एक दर्शनशास्त्री, जीववादी , खोजकर्ता, कलाकार मन और एक सच्चे भारतीय आत्मसम्मानी वैज्ञानिक भी थे। यह किताब Bose की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी आत्मा और जीवनदर्शन को भी उजागर करती है।
लेखक ने Bose को “सूफ़ी वैज्ञानिक” कहकर यह दिखाया है कि वे विज्ञान और आध्यात्म को विरोध नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक मानते थे। किताब Bose के जीवन के कठिन संघर्षों को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने लाती है — उनका प्रारम्भिक जीवन, गरीबी के दिन, ब्रिटिश शासन में भेदभाव, और वैज्ञानिक मान्यता पाने की कठिन यात्रा।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित जानकारी है। लेखक ने ऐतिहासिक तथ्यों, शोध-पत्रों, जैविक स्रोतों और बोस के मूल प्रकाशनों को आधार बनाकर सामग्री प्रस्तुत की है,इसी कारण यह पुस्तक किसी कहानी की तरह नहीं, बल्कि वास्तविक इतिहास को सटीक रूप में सामने लाती है 📖

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पंचाग संशोधन समिति 1952 📖✍️
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