Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
लॉर्ड कार्नवालिस का मकबरा, उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर शहर में है.
लॉर्ड कार्नवालिस को स्थानीय लोग लार्ड सहाब (लाड सहाब ) कहते थे।
लॉर्ड कार्नवालिस को स्थानीय लोग लार्ड सहाब (लाड सहाब ) कहते थे।
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
बोरोबुदुर स्तूप
बोरोबुदुर स्तूप को आर.सी. मजूमदार ने आठवां आश्चर्य कहा है।
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
टाइम्स के संवाददाता रसेल ने 1857 के घटनाक्रम पर भारत से रिपोर्टिंग की थी
टाइम्स समूह के संवाददाता रसेल, जिन्हें युद्ध पत्रकारिता का पितामह कहा जाता है, वो भी भारत आए थे और यूरोप के लोगों की इसमें रूचि भी थी कि भारत में क्या हो रहा है.
BBC NEWS HINDI
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
राजस्थान की रियासतों में प्रमुख दरबार एवं ब्रिटिश शासकों की यात्राएँ (1832–1903)& राजस्थान में कांग्रेस कमेटी1887।
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
Bengal tenancy act1822
बंगाल काश्तकारी अधिनियम
स्थायी बंदोबस्त की कमियों को दूर करने के लिए लाया गया।
इसमें किसानों को भूमि से बेदखली व लगान वृद्धि के विरुद्ध सुरक्षा दी गयी।
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
स्थाई बंदोबस्त का सर्वाधिक फायदा राजनीतिक क्षेत्र में
सीटनकोर -आर्थिक क्षति की पूर्ति राजनीतिक फायदों ने कर दी ।
अंग्रेजों को स्थाई बंदोबस्त का सर्वाधिक फायदा राजनीतिक क्षेत्र में हुआ।
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
महालवाड़ी व्यवस्था
महालवाड़ी व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में 'हॉल्ट मैकेंजी' द्वारा लाया गया था।
इस प्रस्ताव को 1822 ई. के रेग्यूलेशन-7 द्वारा क़ानूनी रूप प्रदान किया गया।
यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश, मध्य प्रान्त तथा पंजाब में सर्वप्रथम लागू की गई।
महालवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत ब्रिटिश भारत की भूमि का लगभग 30% भाग सम्मिलित था।
इस व्यवस्था में प्रारम्भ में लगान की दर कुल उपज का 80% निश्चित की गई थी।
कालान्तर में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने मार्टिन बर्ड, जिन्हें उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक माना जाता है, के सहयोग से 1833 ई. का रेग्यूलेशन-9 पारित करवाया।
इसके अनुसार इस दर को कम करके 66% कर दिया गया।
1855 ई. में पुन: सहारनपुर नियम के अनुसार लॉर्ड डलहौज़ी ने लगान की दर को 50% निश्चित किया।
Iske alva iske bare m koi or information ho to btana
🤣🤣🤣
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
विभाजन को पढ़ना आसान नहीं होता ✍️
एक इतिहास के विद्यार्थी के रूप में हम न जाने कितने युद्ध पढ़ते हैं, लाखों मौतों के आँकड़े याद करते हैं, लेकिन भारत के विभाजन को पढ़ते समय मन कहीं न कहीं ठहर जाता है।
सवाल उठता है कि आखिर इंसान की ज़िंदगी की कीमत इतनी कम कैसे हो गई थी?
1947 में विभाजन के दौरान लाखों लोगों की जान गई और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। हिंदू हों या मुसलमान न जाने कितनों ने अपने घर रिश्ते और पुश्तैनी ज़मीन खो दी। बच्चों, बूढ़ों और औरतों तक को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
इतिहास के आँकड़ों के पीछे न जाने कितनी कहानियाँ, कितने सपने और कितने उजड़े परिवार थे।
शायद कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता, महसूस भी करना पड़ता है। विभाजन उन्हीं में से एक है, क्योंकि देश का बँटवारा एक दिन में हो सकता है लेकिन उजड़े जीवन को सँभलने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
आज जब हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं, तो उसकी कीमत भी याद रखनी चाहिए। आज़ादी का वास्तविक सम्मान केवल जश्न मनाना नहीं, बल्कि उस इंसानियत को बचाए रखना है, जिसकी कीमत कभी लाखों लोगों ने अपना सब कुछ खोकर चुकाई थी।
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एक इतिहास के विद्यार्थी के रूप में हम न जाने कितने युद्ध पढ़ते हैं, लाखों मौतों के आँकड़े याद करते हैं, लेकिन भारत के विभाजन को पढ़ते समय मन कहीं न कहीं ठहर जाता है।
सवाल उठता है कि आखिर इंसान की ज़िंदगी की कीमत इतनी कम कैसे हो गई थी?
1947 में विभाजन के दौरान लाखों लोगों की जान गई और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। हिंदू हों या मुसलमान न जाने कितनों ने अपने घर रिश्ते और पुश्तैनी ज़मीन खो दी। बच्चों, बूढ़ों और औरतों तक को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
इतिहास के आँकड़ों के पीछे न जाने कितनी कहानियाँ, कितने सपने और कितने उजड़े परिवार थे।
शायद कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता, महसूस भी करना पड़ता है। विभाजन उन्हीं में से एक है, क्योंकि देश का बँटवारा एक दिन में हो सकता है लेकिन उजड़े जीवन को सँभलने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
आज जब हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं, तो उसकी कीमत भी याद रखनी चाहिए। आज़ादी का वास्तविक सम्मान केवल जश्न मनाना नहीं, बल्कि उस इंसानियत को बचाए रखना है, जिसकी कीमत कभी लाखों लोगों ने अपना सब कुछ खोकर चुकाई थी।
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