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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
उतर वैदिक काल:
उत्पादन की शक्तियों पर राजन् के नियंत्रण को मजबूत करने का दूसरा स्त्रोत बलि नामक कर हो गया जो शुरू में राजन् को गायों और अनाजों के रूप में भेंट किया जाता था, अब इसका स्वरूप अनिवार्यता और बाध्यता की दिशा में तैयार होने लगा। शतपथ ब्राह्मण (1.3.2.15) के अनुसार वैश्य को बलि देना इसलिए आवश्यक है कि वह क्षत्रिय के वश (नियंत्रण) में होता है। इसलिए माँगे जाने पर उसे, अपने द्वारा संग्रहित वस्तुओं को दे देना चाहिए। राजन् को कई बार विशामत्ता भी कहा गया है, जिसका अर्थ शायद यह हुआ कि वह प्रजा का उपभोग करने वाला है, किन्तु इस काल तक राजन् द्वारा बलि का उपार्जन स्पष्ट रूप से परिभाषित कर-प्रणाली के रूप में नहीं विकसित हुआ था।
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उत्पादन की शक्तियों पर राजन् के नियंत्रण को मजबूत करने का दूसरा स्त्रोत बलि नामक कर हो गया जो शुरू में राजन् को गायों और अनाजों के रूप में भेंट किया जाता था, अब इसका स्वरूप अनिवार्यता और बाध्यता की दिशा में तैयार होने लगा। शतपथ ब्राह्मण (1.3.2.15) के अनुसार वैश्य को बलि देना इसलिए आवश्यक है कि वह क्षत्रिय के वश (नियंत्रण) में होता है। इसलिए माँगे जाने पर उसे, अपने द्वारा संग्रहित वस्तुओं को दे देना चाहिए। राजन् को कई बार विशामत्ता भी कहा गया है, जिसका अर्थ शायद यह हुआ कि वह प्रजा का उपभोग करने वाला है, किन्तु इस काल तक राजन् द्वारा बलि का उपार्जन स्पष्ट रूप से परिभाषित कर-प्रणाली के रूप में नहीं विकसित हुआ था।
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अनुभव-भावनाओं के अहसास का….⭐️ आयेगा
ऐसा कहा जाता है कि “हमेशा अच्छी वाणी बोलिये “क्योकि पूरे दिन मे बोली गई कोई भी वाणी सच हो सकती है । अच्छी भावनायें रखने पर वाणी सहज रूप से अच्छी निकलेगी ।
यह क़ुदरत का नियम है कि जब भी हम कोई तीव्र भावना करते है तो प्रकृति संजोग मिलने पर उसे पूरा करने मे सहयोग देती है। जिंदगी मे ऐसे कई अनुभव है जहॉ तीव्र रूप से की गई भावनायें साकार हो गई ।आप सबसे मै उसी संदर्भ मे अपना एक अनुभव शेयर करना चाहूँगी कि हमारी जिंदगी मे तीव्र रूप से की गई भावना किस तरह से भविष्य मे क्रियान्वित होती है
मेरे सभी मित्र ऐसे है जो जो भौतिक तथा आध्यात्मिकता की दुनिया दोनो मे रूचि रखते है । सभी मित्रगण ने मिलकर एक नियम बना रखा था कि हर रोज सभी जने दिल से कोई भी एक अच्छी भावना पूरे दिन के लिये करे ।
एक दिन हम सब मित्रों ने मिलकर छुट्टी के दिन बाहर कही पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बनाया । उस दिन हमने “दुनिया मे कोई भी प्राणी” भूखा न रहे ऐसी भावना की थी ।
सब मिलकर क़रीबन 70-80 लोग थे ।गर्मी ज्यादा होने की वजह से ए.सी.वाला हॉल पूरे दिन के लिये किराये पर ले लिया गया ।
उस दिन सुबह हम सब घर से नाश्ता करके निकले थे ।साथ मे हम सब लोग लंच के लिये घर से एक एक आईटम बना कर ले आये ।खाने मे तरह तरह की वैरायटी हो गई । डिनर का बाहर से ही इंतज़ाम कर दिया गया ।हॉल काफी बड़ा था । वहॉ हम सबने खूब मजे किये ,गेम खेले,नाच गाना किया और भी बहुत सारी एक्टिविटिस की ।
दोपहर को लंच के लिये सबने अपने अपने खाने का सामान निकाला और मिलकर लंच किया । लंच करने के बाद सबका क़रीब क़रीब आधा खाना बच गया । सिक्योरिटी और वहॉ अन्य कुछ व्यक्ति को भी खाना खिलाया उसके बावजूद भी काफी मात्रा मे खाना बचा था । खाना बाहर फैंकने का किसी का भी मन नही था । अब क्या करे ? सिक्योरिटी वाले से बात करते करते बातो ही बातो मे मालूम चला कि पास मे ही एक लेबर कैंप है जहॉ पर मजदूरो को पर्याप्त मात्रा मे भोजन भी नसीब नही होता । यहॉ तक कि किसी किसी मजदूर को तो सिर्फ एक बार ही चाय नाश्ता से पूरा दिन व्यतीत करना पड़ता है ।
तभी एकाएक मन मे विचार आया कि क्यों ना सारा बचा हुआ खाना इन सभी मज़दूरों को पहुचॉ दिया जाये ।फटाफट कुछ मित्रों ने सारा खाना इकट्ठा करके डिब्बे मे पैक किया और लेबर कैंप लेकर पहुँच गये ।वहॉ बेचारे बहुत ही भूखे प्यासे मज़दूर बैठे थे ,जैसे ही खाना देखा तो बहुत ही खुश हो गये । इतना वैरायटी वाला खाना कभी भी नही खाया था । उनकी ऐसी मुस्कान देखकर ही मन प्रसन्न हो गया तथा साथ मे इस बात की भी सबसे ज्यादा खुशी हुई कि हमने जो दिन भर के लिये भावना की थी कि आज कोई भी जीव भूखा ना रहे वह भावना हमारे ही आसपास के क्षैत्र मे काम आ गई ।
ये सब बताने का कारण ये है कि हम जो भी तीव्र भावना करते है उस वाईब्रेशन के परमाणु प्रकृति मे हर जगह फैल जाते है तथा जैसे ही संजोग बनता हे उसको प्रकृति पूरा करने मे सहयोग करती है । अच्छी या बुरी कोई भी भावना जो पूरे दिल से की जाती है रिटर्न मे प्रकृति वही लौटाती है ।
इसलिये बोला जाता है कि अच्छे भाव करो ।
हम अपनी जिंदगी मे दुख का रोना ज्यादा रोते है । इसलिये हर समय यही लगता कि हमारी जिंदगी सुखो से ज्यादा दुखो से भरी है क्योकि जाने अंजाने मे हम कई बार भावो से दुखो को आमंत्रण दे देते है । यदि इसकी जगह हम ख़ुशियों वाली बाते सोचे व उसे करने का भाव करे तो देखेंगे कि हमारे आसपास चारों तरफ ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ मँडरा रही है ।
कई बार हम बच्चो या किसी भी परिचित के सामने पुराने या नये समय के दुख का पिटारा खोल देते है और कहने की कोशिश करते है कि हमने कितनी परेशानी वाली जिंदगी जी है ।
जैसे कि हम बच्चो से ये बोलते है कि शुरू के दिनो मे हमारे पास पैसे की कमी थी और बहुत कम सुख सुविधा थी इसलिये हमने बहुत परेशानी और दुख देखकर तुमको बड़ा किया ।अपनी कई इच्छाओं का त्याग किया तब जाकर तुम आज इस लायक बने । हम इस प्रकार से अपनी दुखभरी व्यथा सुनाते कि हमारे हर वाक्य मे दुख ही दुख झलकता और अंजाने मे ही सही हम अपने चारों और दुख के परमाणु इकट्ठा कर लेते है ।परिणामस्वरूप हर समय दुख का ही ख़्याल ही ज्यादा हावी रहता मन और मस्तिष्क पर । इसके विपरीत यदि इसी बात को अलग ढंग से बोले जैसे कि हमारे पास कम पैसे तथा कम सुख सुविधा होते हुये भी बहुत ख़ुशियों के पल जीये उन पलो के साथ तुम कैसे बडे हो गये और इस लायक बन गये हमे भी मालूम नही चला । दुख आये लेकिन उसको हमने अपने ऊपर कभी भी हावी होने ही नही दिया । देखना कि इस तरह बोलने से हमारे खुशी के वाईब्रेशन चारों और फैल जायेंगे और। खुशी ही खुशी का अनुभव होगा व मन आनंदित रहेगा ।
हम जो देंगे वही लौटकर हमारे पास आयेगा
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प्रिय मित्र,
श्री. गगन दीप जी (अंदमान निकोबार)
इन्होने आज डायरी और पेन गिफ्ट किया...❤️ 🍎 🤩
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मित्र..🤩 🦋 ❤️ 💜 💗 💙
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
जवाहर लाल नेहरू ने पहले ही विचार बना लिया था भारत पाकिस्तान विभाजन का 📖✍️
स्रोत– विभाजन के गुनाहगार (राम मनोहर लोहिया)
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
उत्तर वैदिक ग्रन्थों में भी सभा और समिति का उल्लेख होता रहा, जैसे (शतपथ ब्राह्मण (4.1.4.1-6). में राजन् यह प्रार्थना करता है कि समिति और सभा, प्रजापति की दोनों पुत्रियाँ, संयुक्त रूप से मेरी सहायता करें। किन्तु निश्चित रूप से जिस अनुपात में राजतंत्र की शक्ति बढ़ती गई उसी अनुपात में ऐसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्ति घटती गई होगी।
उत्तर वैदिक ग्रंथों में राजन् और पुरोहित के बीच गहरा सम्बंध दिखलाया गया है। पुराहित का शाब्दिक अर्थ होता है, 'जिसे आगे किया जाए' (राजन् के द्वारा)।
अर्थववेद वाला तो अब नार्मल है।
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उत्तर वैदिक ग्रंथों में राजन् और पुरोहित के बीच गहरा सम्बंध दिखलाया गया है। पुराहित का शाब्दिक अर्थ होता है, 'जिसे आगे किया जाए' (राजन् के द्वारा)।
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
रोमन इतिहासकार लिवी।
टाइन कहता है "रोम के इतिहासकार का इतिहास नहीं है।" (लिवी के संदर्भ में कहा है।) लिवी पाडुआ में पैदा हुआ, रोम आया, भाषण कला एवं दर्शनशास्त्र के प्रति समर्पित हुआ और जीवन के अंतिम 46 साल उसने अपना महान इतिहास लिखने में बिताए। योजना एवं क्रियान्वयन में हिस्ट्री ऑफ रोम का फलक विशाल था। लेकिन 142 किताबों में से आज सिर्फ 35 बची हैं। ये 35 भाग, छह संस्करण में हैं, इससे हम संपूर्ण की विशालता का अनुमान लगा सकते हैं। वाक़ई इसकी विशालता के कारण पुस्तकालयों के लिए भी इसे रखना असंभव था।
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टाइन कहता है "रोम के इतिहासकार का इतिहास नहीं है।" (लिवी के संदर्भ में कहा है।) लिवी पाडुआ में पैदा हुआ, रोम आया, भाषण कला एवं दर्शनशास्त्र के प्रति समर्पित हुआ और जीवन के अंतिम 46 साल उसने अपना महान इतिहास लिखने में बिताए। योजना एवं क्रियान्वयन में हिस्ट्री ऑफ रोम का फलक विशाल था। लेकिन 142 किताबों में से आज सिर्फ 35 बची हैं। ये 35 भाग, छह संस्करण में हैं, इससे हम संपूर्ण की विशालता का अनुमान लगा सकते हैं। वाक़ई इसकी विशालता के कारण पुस्तकालयों के लिए भी इसे रखना असंभव था।
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Forwarded from 𝗧𝗵𝗲 𝗚𝕐𝗮𝗻𝗱𝗮𝘆𝗻𝗶 𝗩αυLƚ••° (ȺղƚαႦყα ƚԋαƙυɾ .)
📒Fact📒
¶चंदायन ----1395
¶मृगावती ----1503
¶पद्मावत---- 1540
¶मधुमालती----- 1545
https://t.me/ugcnetjrfmcqs24
¶चंदायन ----1395
¶मृगावती ----1503
¶पद्मावत---- 1540
¶मधुमालती----- 1545
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (N D)
बंगाल विभाजन :गौण कारण,वास्तविक कारणऔर उद्देश्य
गौण कारण-
प्रशासनिक पुर्नव्यवस्थापन।
वास्तविक कारण- राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना।
उद्देश्य - बंगाल में बंगालियों को अल्पसंख्यक बनाना, धार्मिक विभाजन करना।