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जहाँ इतिहास किताबों से आगे, दस्तावेज़ों से जुड़ता है।
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जिन्ना – सिकंदर पैक्ट 1937 लखनऊ 📖✍️
दो बार यह प्रश्न अलग अलग प्रकार से पूछ लिया गया है । अब आने वाले समय में परीक्षा में 1937 के प्रांतीय चुनाव से जुड़े कैसे प्रश्न बनेंगे इसका उत्तर भविष्य में ही मिलेगा, अभी के लिए इसको पढ़ सकते है आप
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Leo Tolstoy रूस के महान साहित्यकार दार्शनिक और सामाजिक चिंतक थे उनकी रचनाएँ War and Peace तथा Anna Karenina विश्व साहित्य की महान कृतियों में गिनी जाती हैं
गांधीजी ने टॉल्स्टॉय की पुस्तक The Kingdom of God Is Within You पढ़ी गांधीजी अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इस पुस्तक ने उन्हें अत्यंत गहराई से प्रभावित किया और उनके विचारों में बड़ा परिवर्तन किया उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन पर स्थायी प्रभाव छोड़ गई
गांधीजी ने यह पुस्तक अफ्रीका में रहते हुए 1890 के दशक के मध्य में पढ़ी थी अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि उस समय वे हिंसा के प्रति कुछ हद तक सहानुभूति रखते थे लेकिन इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अहिंसा में उनका विश्वास दृढ़ हो गया
टॉल्स्टॉय के विचारों से गांधीजी का परिचय उनके मित्र हेनरी पोलॉक तथा दक्षिण अफ्रीका के बौद्धिक वातावरण के माध्यम से हुआ पोलाक गांधीजी के निकट सहयोगी थे और उन्होंने गांधीजी को कई पश्चिमी चिंतकों की रचनाओं से परिचित कराया
राज्य और अन्यायपूर्ण सत्ता के प्रति नैतिक प्रतिरोध टॉल्स्टॉय के निष्क्रिय प्रतिरोध के विचार ने गांधी के सत्याग्रह को आकार देने में योगदान दिया
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ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
मुहम्मद अली जिन्ना : 1904—कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में भाग लिया 1906—कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के सचिव के रूप में कार्य किया 1909—बंबई विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए 1910—इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने 1913—मुस्लिम लीग में शामिल…
यह पुस्तक भारत के विभाजन, हिंदू-मुस्लिम संबंधों और पाकिस्तान के निर्माण से जुड़ी एक दुखद ऐतिहासिक कहानी प्रस्तुत करती है।
इसमें एक भारतीय देशभक्त के दृष्टिकोण से विभाजन की त्रासदी को समझने का प्रयास किया गया है।
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ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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गांधी जी के आत्मीय मित्र का नाम लिया करो देवीजी😂😂

आत्मीय मित्र सबको नहीं मिलते है😂😂😂
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पाकिस्तान बनने का सफर 👇👇
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मिस्टर पंजाबी ने अपनी बुक 'कॉन्फिडिरेसी ऑफ इंडिया' मे इंडिया को पांच भागों में बांटने की वकालत की थी। इन्डस फेडरेशन से लेकर डेक्कन फेडरेशन तक यानी बिलोचिस्तान से लेकर बस्तर और मद्रास तक का विभाजन का खाका तैयार किया गया था 📖✍️
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पंजाब के प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात खान ने तैयार की थी। उन्होंने 1935 में अपनी पुस्तक ' आऊटलाइन ऑफ स्कीम ऑफ इंडियन फेडरेशन ' में भारत के सात भाग बताए और बताया कि यह योजना शासन को चलाने के लिए बनाई है, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की राह पर आगे बढ़ते हुए चौधरी रहमतअली की योजना में राजपूताना की जैसलमेर और बीकानेर रियासतों को शामिल कर लिया था।
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वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य और लन्दन में भारत के भूतपूर्व हाईकमिश्नर सर फिरोज खां नून ने तैयार की थी। इस योजना में पाकिस्तान का निर्माण और उसके बाद पाकिस्तान को पांच भागों मे बांटने की बात कही जिसमें पूरे भारत के मुस्लिम बहुल इलाके शामिल थे।
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चौधरी रहमत अली ने एक बार फिर 1942 में पाकिस्तान की नई योजना रखी और कहा कि भारत का नाम दीनिया और मुस्लिम एशिया का नाम पाकेशिया रखा जाए। उन्होने पाकिस्तान की नई योजना में अजमेर- मेवाड़ के क्षेत्र को मुईनस्तान के नाम से, लखनऊ-अवध के इलाके को हैदरस्तान, भोपाल को सिद्कीस्तान, बिहार-उड़ीसा के कुछ भागों को फर्रूकस्तान, मलाबार तट के इलाकों को मोपलास्तान, लंका के पूर्वी और पश्चिमी इलाकों को सफीस्तान और नासरस्तान के नाम से पाकिस्तान के हिस्से में सात भाग और जोड़ दिए।
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सैयद जफरुल हसन और मोहम्मद अफजल हुसैन कादरी नाम के दो प्रोफेसरों ने तैयार की थी। पाकिस्तान की इस योजना में पंजाब, सिंध, सीमा प्रांत, बिलोचिस्तान, कश्मीर, कपूरथला, चित्राल, मलेरकोटला( 60 फीसद मुस्लिम आबादी), बंगाल,पुर्णिया, सिलहट( 8फीसद मुस्लिम आबादी), हैदराबाद, बरार, कर्नाटक( 8 फीसद मुस्लिम आबादी), दिल्ली, मेरठ, अलीगढ़, रुहेलखंड(28 फीसद मुस्लिम आबादी) मलाबार दक्षिण कनारा( 27 फीसद मुस्लिम आबादी) और पूर्वोत्तर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का शेष भाग शामिल था।
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जनवरी 1936 में लाहौर की बैठक में मुस्लिम लीग ने हैदराबाद के डॉक्टर सैयद अब्दुल लतीफ को पाकिस्तान की पूरी योजना का कार्य सौंपा। उन्होंने पाकिस्तान के लिए चार मण्डल बनाए। पहले में सिंध, बिलोचिस्तान, कश्मीर, खैरपुर, भावलपुर। इन इलाकों से हिंदुओं और सिखों को राजा और प्रजा सहित हटाने की योजना थी। दूसरा दिल्ली और लखनऊ था, जिसमें संयुक्त प्रांत और बिहार के मुसलमान आकर रहेंगे। हिंदू यदि अपने तीर्थ स्थलों में चाहे तो रह सकते हैं। उत्तर-पूर्व मण्डल में बंगाल और आसाम को शामिल किया गया था। यहां से हिंदूओं को निकालकर बिहार में शिफ्ट करने की योजना थी। चौथे में हैदराबाद और मद्रास शामिल था वहां से भी हिंदूओं को हटने की बात शामिल थी। इसके अलावा हिंदूस्तान की मुस्लिम रियासतें जैसे भोपाल से लेकर जावरा और टोंक तक शामिल है वह भी पाकिस्तान का हिस्सा होंगी और वहां से भी हिंदूओं को हटना होगा।
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पाकिस्तान का विचार 1930 से फिजाओं को दूषित करने लगा था। सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र चौधरी रहमत अली ने इसकी रूपरेखा 28 जनवरी 1933 में बनाई। रहमत अली ने पाकिस्तान का विष बीज इंग्लैंड की सरजमी पर बोया और उसकी फसल हिंदुस्तान में लहलहाई। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Now or Never' में इस बात का खुलासा किया। जिसमें उन्होंने उत्तर- पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की मंशा जाहिर की। 1937 में उन्होंने अपनी सोच का दायरा बढ़ाते हुए असम और बंगाल को मिलाकर बंगस्तान और दक्षिण हैदराबाद को उस्मानिस्तान बनाने की योजना शामिल कर दी।
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Joseph Lelyveld, Great Soul: Mahatma Gandhi and His Struggle with India (2011).
इसी किताब के प्रकाशित होने के बाद गांधी–कैलनबाख संबंध को लेकर बहुत बड़ा विवाद हुआ। Lelyveld ने उनके संबंध को गांधी के जीवन का अत्यंत intimate और ambiguous relationship बताया था।

यह किताब पूरे भारत में स्थायी रूप से प्रतिबंधित नहीं हुई थी। 2011 में गुजरात सरकार ने इसकी बिक्री, वितरण, प्रकाशन और प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया था। केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई, लेकिन बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने का विचार छोड़ दिया गया।

1986 में गांधी और कैलनबाख के पत्रों का एक batch नीलामी में आया था और भारत सरकार ने लगभग £140,000 में उसे खरीदा था। बाद में ये papers National Archives of India में रखे गए और गांधी के Collected Works में प्रकाशित हुए।

बाद में कैलनबाख परिवार के पास बचे एक और बड़े collection की नीलामी की बात सामने आई थी। उस collection में 1909 से 1944 तक के 1,200 से अधिक पृष्ठों के पत्र थे।
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Forwarded from NARESH SONI
*ढोला-मारू* ❤️ राजस्थान की सबसे फेमस प्रेम कहानी है। इसे "रेगिस्तान की लैला-मजनू" भी कहते हैं।

*ढोला-मारू की पूरी कहानी:*

*1. बचपन की सगाई*
मारवाड़ के राजा नरवद के बेटे *ढोला* की सगाई बचपन में ही पूगल के राजा पिंगल की बेटी *मारू* से हो गई थी।
लेकिन किस्मत से दोनों अलग-अलग पल गए।

*2. दूसरी शादी*
ढोला बड़ा होकर नरवर का राजा बना। उसकी दूसरी शादी *मालवणी* नाम की राजकुमारी से हो गई।
ढोला मालवणी के साथ खुश रहने लगा और मारू को भूल गया।

*3. मारू का इंतजार*
इधर पूगल में मारू जवान हो गई। 12 साल बीत गए पर ढोला उसे लेने नहीं आया।
मारू हर रोज रेत के टीलों पर बैठकर ढोला का इंतजार करती और गाती:
*"संदेसो भेजूं ओ राज..."*

*4. ऊंट वाले का संदेश*
आखिर में मारू ने एक ऊंट वाले *केलिया* को सोना देकर नरवर भेजा।
केलिया ने ढोला को मारू की हालत बताई और उसके गीत सुनाए। गीत सुनकर ढोला को सब याद आ गया।

*5. मालवणी की परीक्षा*
ढोला मारू से मिलने पूगल जाना चाहता था, पर मालवणी रोक रही थी।
ढोला ने कहा "मैं सिर्फ मिलकर आऊंगा"। मालवणी ने 3 शर्तें रखीं - अगर पूरी कर दी तो जाने दूंगी।
ढोला ने तीनों शर्तें पूरी कर दीं।

*6. मिलन और वापसी*
ढोला ऊंट पर बैठकर पूगल पहुंचा। सालों बाद ढोला-मारू मिले। दोनों का प्रेम देखकर सब खुश हुए।
फिर ढोला, मारू और मालवणी तीनों साथ नरवर लौट आए और खुशी-खुशी रहने लगे।

*इस कहानी की खास बात:*
1. *त्याग* - मारू ने 12 साल इंतजार किया
2. *प्रेम* - ढोला को गीत सुनते ही पुराना प्यार याद आ गया
3. *बड़प्पन* - मालवणी ने भी मारू को अपना लिया

राजस्थान में इस पर हजारों लोकगीत, भजन और नाटक बने हैं। सीमा मिश्रा जी ने भी *"ढोला मारू"* पर बहुत गाने गाए हैं।
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