Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
चौधरी रहमत अली ने एक बार फिर 1942 में पाकिस्तान की नई योजना रखी और कहा कि भारत का नाम दीनिया और मुस्लिम एशिया का नाम पाकेशिया रखा जाए। उन्होने पाकिस्तान की नई योजना में अजमेर- मेवाड़ के क्षेत्र को मुईनस्तान के नाम से, लखनऊ-अवध के इलाके को हैदरस्तान, भोपाल को सिद्कीस्तान, बिहार-उड़ीसा के कुछ भागों को फर्रूकस्तान, मलाबार तट के इलाकों को मोपलास्तान, लंका के पूर्वी और पश्चिमी इलाकों को सफीस्तान और नासरस्तान के नाम से पाकिस्तान के हिस्से में सात भाग और जोड़ दिए।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सैयद जफरुल हसन और मोहम्मद अफजल हुसैन कादरी नाम के दो प्रोफेसरों ने तैयार की थी। पाकिस्तान की इस योजना में पंजाब, सिंध, सीमा प्रांत, बिलोचिस्तान, कश्मीर, कपूरथला, चित्राल, मलेरकोटला( 60 फीसद मुस्लिम आबादी), बंगाल,पुर्णिया, सिलहट( 8फीसद मुस्लिम आबादी), हैदराबाद, बरार, कर्नाटक( 8 फीसद मुस्लिम आबादी), दिल्ली, मेरठ, अलीगढ़, रुहेलखंड(28 फीसद मुस्लिम आबादी) मलाबार दक्षिण कनारा( 27 फीसद मुस्लिम आबादी) और पूर्वोत्तर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का शेष भाग शामिल था।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
जनवरी 1936 में लाहौर की बैठक में मुस्लिम लीग ने हैदराबाद के डॉक्टर सैयद अब्दुल लतीफ को पाकिस्तान की पूरी योजना का कार्य सौंपा। उन्होंने पाकिस्तान के लिए चार मण्डल बनाए। पहले में सिंध, बिलोचिस्तान, कश्मीर, खैरपुर, भावलपुर। इन इलाकों से हिंदुओं और सिखों को राजा और प्रजा सहित हटाने की योजना थी। दूसरा दिल्ली और लखनऊ था, जिसमें संयुक्त प्रांत और बिहार के मुसलमान आकर रहेंगे। हिंदू यदि अपने तीर्थ स्थलों में चाहे तो रह सकते हैं। उत्तर-पूर्व मण्डल में बंगाल और आसाम को शामिल किया गया था। यहां से हिंदूओं को निकालकर बिहार में शिफ्ट करने की योजना थी। चौथे में हैदराबाद और मद्रास शामिल था वहां से भी हिंदूओं को हटने की बात शामिल थी। इसके अलावा हिंदूस्तान की मुस्लिम रियासतें जैसे भोपाल से लेकर जावरा और टोंक तक शामिल है वह भी पाकिस्तान का हिस्सा होंगी और वहां से भी हिंदूओं को हटना होगा।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
पाकिस्तान का विचार 1930 से फिजाओं को दूषित करने लगा था। सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र चौधरी रहमत अली ने इसकी रूपरेखा 28 जनवरी 1933 में बनाई। रहमत अली ने पाकिस्तान का विष बीज इंग्लैंड की सरजमी पर बोया और उसकी फसल हिंदुस्तान में लहलहाई। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Now or Never' में इस बात का खुलासा किया। जिसमें उन्होंने उत्तर- पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की मंशा जाहिर की। 1937 में उन्होंने अपनी सोच का दायरा बढ़ाते हुए असम और बंगाल को मिलाकर बंगस्तान और दक्षिण हैदराबाद को उस्मानिस्तान बनाने की योजना शामिल कर दी।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
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Joseph Lelyveld, Great Soul: Mahatma Gandhi and His Struggle with India (2011).
इसी किताब के प्रकाशित होने के बाद गांधी–कैलनबाख संबंध को लेकर बहुत बड़ा विवाद हुआ। Lelyveld ने उनके संबंध को गांधी के जीवन का अत्यंत intimate और ambiguous relationship बताया था।
यह किताब पूरे भारत में स्थायी रूप से प्रतिबंधित नहीं हुई थी। 2011 में गुजरात सरकार ने इसकी बिक्री, वितरण, प्रकाशन और प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया था। केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई, लेकिन बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने का विचार छोड़ दिया गया।
1986 में गांधी और कैलनबाख के पत्रों का एक batch नीलामी में आया था और भारत सरकार ने लगभग £140,000 में उसे खरीदा था। बाद में ये papers National Archives of India में रखे गए और गांधी के Collected Works में प्रकाशित हुए।
बाद में कैलनबाख परिवार के पास बचे एक और बड़े collection की नीलामी की बात सामने आई थी। उस collection में 1909 से 1944 तक के 1,200 से अधिक पृष्ठों के पत्र थे।
https://t.me/historyfact00
इसी किताब के प्रकाशित होने के बाद गांधी–कैलनबाख संबंध को लेकर बहुत बड़ा विवाद हुआ। Lelyveld ने उनके संबंध को गांधी के जीवन का अत्यंत intimate और ambiguous relationship बताया था।
यह किताब पूरे भारत में स्थायी रूप से प्रतिबंधित नहीं हुई थी। 2011 में गुजरात सरकार ने इसकी बिक्री, वितरण, प्रकाशन और प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया था। केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई, लेकिन बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने का विचार छोड़ दिया गया।
1986 में गांधी और कैलनबाख के पत्रों का एक batch नीलामी में आया था और भारत सरकार ने लगभग £140,000 में उसे खरीदा था। बाद में ये papers National Archives of India में रखे गए और गांधी के Collected Works में प्रकाशित हुए।
बाद में कैलनबाख परिवार के पास बचे एक और बड़े collection की नीलामी की बात सामने आई थी। उस collection में 1909 से 1944 तक के 1,200 से अधिक पृष्ठों के पत्र थे।
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Forwarded from NARESH SONI
*ढोला-मारू* ❤️ राजस्थान की सबसे फेमस प्रेम कहानी है। इसे "रेगिस्तान की लैला-मजनू" भी कहते हैं।
*ढोला-मारू की पूरी कहानी:*
*1. बचपन की सगाई*
मारवाड़ के राजा नरवद के बेटे *ढोला* की सगाई बचपन में ही पूगल के राजा पिंगल की बेटी *मारू* से हो गई थी।
लेकिन किस्मत से दोनों अलग-अलग पल गए।
*2. दूसरी शादी*
ढोला बड़ा होकर नरवर का राजा बना। उसकी दूसरी शादी *मालवणी* नाम की राजकुमारी से हो गई।
ढोला मालवणी के साथ खुश रहने लगा और मारू को भूल गया।
*3. मारू का इंतजार*
इधर पूगल में मारू जवान हो गई। 12 साल बीत गए पर ढोला उसे लेने नहीं आया।
मारू हर रोज रेत के टीलों पर बैठकर ढोला का इंतजार करती और गाती:
*"संदेसो भेजूं ओ राज..."*
*4. ऊंट वाले का संदेश*
आखिर में मारू ने एक ऊंट वाले *केलिया* को सोना देकर नरवर भेजा।
केलिया ने ढोला को मारू की हालत बताई और उसके गीत सुनाए। गीत सुनकर ढोला को सब याद आ गया।
*5. मालवणी की परीक्षा*
ढोला मारू से मिलने पूगल जाना चाहता था, पर मालवणी रोक रही थी।
ढोला ने कहा "मैं सिर्फ मिलकर आऊंगा"। मालवणी ने 3 शर्तें रखीं - अगर पूरी कर दी तो जाने दूंगी।
ढोला ने तीनों शर्तें पूरी कर दीं।
*6. मिलन और वापसी*
ढोला ऊंट पर बैठकर पूगल पहुंचा। सालों बाद ढोला-मारू मिले। दोनों का प्रेम देखकर सब खुश हुए।
फिर ढोला, मारू और मालवणी तीनों साथ नरवर लौट आए और खुशी-खुशी रहने लगे।
*इस कहानी की खास बात:*
1. *त्याग* - मारू ने 12 साल इंतजार किया
2. *प्रेम* - ढोला को गीत सुनते ही पुराना प्यार याद आ गया
3. *बड़प्पन* - मालवणी ने भी मारू को अपना लिया
राजस्थान में इस पर हजारों लोकगीत, भजन और नाटक बने हैं। सीमा मिश्रा जी ने भी *"ढोला मारू"* पर बहुत गाने गाए हैं।
*ढोला-मारू की पूरी कहानी:*
*1. बचपन की सगाई*
मारवाड़ के राजा नरवद के बेटे *ढोला* की सगाई बचपन में ही पूगल के राजा पिंगल की बेटी *मारू* से हो गई थी।
लेकिन किस्मत से दोनों अलग-अलग पल गए।
*2. दूसरी शादी*
ढोला बड़ा होकर नरवर का राजा बना। उसकी दूसरी शादी *मालवणी* नाम की राजकुमारी से हो गई।
ढोला मालवणी के साथ खुश रहने लगा और मारू को भूल गया।
*3. मारू का इंतजार*
इधर पूगल में मारू जवान हो गई। 12 साल बीत गए पर ढोला उसे लेने नहीं आया।
मारू हर रोज रेत के टीलों पर बैठकर ढोला का इंतजार करती और गाती:
*"संदेसो भेजूं ओ राज..."*
*4. ऊंट वाले का संदेश*
आखिर में मारू ने एक ऊंट वाले *केलिया* को सोना देकर नरवर भेजा।
केलिया ने ढोला को मारू की हालत बताई और उसके गीत सुनाए। गीत सुनकर ढोला को सब याद आ गया।
*5. मालवणी की परीक्षा*
ढोला मारू से मिलने पूगल जाना चाहता था, पर मालवणी रोक रही थी।
ढोला ने कहा "मैं सिर्फ मिलकर आऊंगा"। मालवणी ने 3 शर्तें रखीं - अगर पूरी कर दी तो जाने दूंगी।
ढोला ने तीनों शर्तें पूरी कर दीं।
*6. मिलन और वापसी*
ढोला ऊंट पर बैठकर पूगल पहुंचा। सालों बाद ढोला-मारू मिले। दोनों का प्रेम देखकर सब खुश हुए।
फिर ढोला, मारू और मालवणी तीनों साथ नरवर लौट आए और खुशी-खुशी रहने लगे।
*इस कहानी की खास बात:*
1. *त्याग* - मारू ने 12 साल इंतजार किया
2. *प्रेम* - ढोला को गीत सुनते ही पुराना प्यार याद आ गया
3. *बड़प्पन* - मालवणी ने भी मारू को अपना लिया
राजस्थान में इस पर हजारों लोकगीत, भजन और नाटक बने हैं। सीमा मिश्रा जी ने भी *"ढोला मारू"* पर बहुत गाने गाए हैं।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
DU entrance exam question 📖✍️
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गिरमिटिया मजदूर प्रथा के प्रश्न को विशेष रूप से 1916 के लखनऊ अधिवेशन में उठाया था। इसके अतिरिक्त, 1917 में कांग्रेस नेताओं ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने इसी वर्ष इस व्यवस्था को समाप्त करने की घोषणा की।
1. Lucknow Session (1916)
इस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने गिरमिटिया मजदूर प्रथा के उन्मूलन का प्रस्ताव रखा।
कांग्रेस ने एक प्रस्ताव (Resolution No. IX) पारित करके सरकार से इस अमानवीय व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की मांग की।
भारतीयों को अनुबंधित श्रमिक के रूप में उपनिवेशों में भेजने की प्रथा राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध है और इसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए।
2. 1917 में कांग्रेस का अभियान
लखनऊ अधिवेशन के बाद गांधी, Charles Freer Andrews तथा अन्य नेताओं ने इस मुद्दे पर देशव्यापी अभियान चलाया। जनता के दबाव और कांग्रेस के विरोध के कारण भारत सरकार ने मार्च 1917 में गिरमिटिया प्रथा को समाप्त करने की घोषणा की और यह व्यवस्था औपचारिक रूप से बंद कर दी गई।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गिरमिटिया मजदूर प्रथा के प्रश्न को विशेष रूप से 1916 के लखनऊ अधिवेशन में उठाया था। इसके अतिरिक्त, 1917 में कांग्रेस नेताओं ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने इसी वर्ष इस व्यवस्था को समाप्त करने की घोषणा की।
1. Lucknow Session (1916)
इस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने गिरमिटिया मजदूर प्रथा के उन्मूलन का प्रस्ताव रखा।
कांग्रेस ने एक प्रस्ताव (Resolution No. IX) पारित करके सरकार से इस अमानवीय व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की मांग की।
भारतीयों को अनुबंधित श्रमिक के रूप में उपनिवेशों में भेजने की प्रथा राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध है और इसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए।
2. 1917 में कांग्रेस का अभियान
लखनऊ अधिवेशन के बाद गांधी, Charles Freer Andrews तथा अन्य नेताओं ने इस मुद्दे पर देशव्यापी अभियान चलाया। जनता के दबाव और कांग्रेस के विरोध के कारण भारत सरकार ने मार्च 1917 में गिरमिटिया प्रथा को समाप्त करने की घोषणा की और यह व्यवस्था औपचारिक रूप से बंद कर दी गई।
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महादेव देसाई और गांधीजी —
गांधीजी से पहली मुलाकात: नवंबर 1917, गोधरा में हुई। इसके बाद वे गांधीजी से गहराई से जुड़ गए।
वे लगभग 25 वर्षों तक गांधीजी के निजी सचिव रहे और गांधीजी के पत्र-व्यवहार, लेखन, यात्राओं तथा राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गांधीजी के भाषणों, बातचीत और दिन-प्रतिदिन की घटनाओं को डायरी में दर्ज करना उनका बहुत महत्वपूर्ण कार्य था। आज गांधीजी और स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक प्रसंगों को समझने में उनकी डायरियाँ अत्यंत उपयोगी स्रोत हैं।
वे स्वयं भी लेखक, अनुवादक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने गांधीजी के विचारों और लेखों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में मदद की।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान गांधीजी के साथ उन्हें भी आगा ख़ान पैलेस, पुणे में नजरबंद रखा गया।
वहीं 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हो गया।
वह अंतिम किताब जो महादेव देसाई ने पढ़ी – द आर्ट ऑफ लिविंग 📖
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गांधीजी से पहली मुलाकात: नवंबर 1917, गोधरा में हुई। इसके बाद वे गांधीजी से गहराई से जुड़ गए।
वे लगभग 25 वर्षों तक गांधीजी के निजी सचिव रहे और गांधीजी के पत्र-व्यवहार, लेखन, यात्राओं तथा राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गांधीजी के भाषणों, बातचीत और दिन-प्रतिदिन की घटनाओं को डायरी में दर्ज करना उनका बहुत महत्वपूर्ण कार्य था। आज गांधीजी और स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक प्रसंगों को समझने में उनकी डायरियाँ अत्यंत उपयोगी स्रोत हैं।
वे स्वयं भी लेखक, अनुवादक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने गांधीजी के विचारों और लेखों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में मदद की।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान गांधीजी के साथ उन्हें भी आगा ख़ान पैलेस, पुणे में नजरबंद रखा गया।
वहीं 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हो गया।
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गांधी जी के अंग्रेज पुत्र 📖✍️
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राष्ट्रीय_करंट_जून_अगस्त_2026.pdf
1.4 MB
राष्ट्रीय करंट अफ़ेयर्स जून से अगस्त 2026.pdf
Forwarded from History Education 🔱❤
▪️गुप्तों के उदय के समय गणतंत्र/जनपदीय तंत्र-🔱❤️
🔹यौधेय - उत्तरी राजस्थान व दक्षिण पूर्वी पंजाब।
🔹अश्वक- उत्तर पश्चिम भारत में।
🔹त्रिगर्त -
कांगड़ा क्षेत्र।
🔸मालव - टोंक, जयपुर-अजमेर (पूर्वी राजस्थान)
🔸अर्जुनायन- जयपुर, भरतपुर, अलवर, आगरा।
🔸कुणिन्द-
सतलज व व्यास नदियों के मध्य।
🔹औदुम्बर- रावी के पश्चिम में काँगड़ा तक।
🔹शिवि- माध्यमिका-नगरी (राजस्थान)
🔹मद्रक- रावी-चिनाब के मध्य।
🔹आभीर-सिन्धु घाटी के दक्षिणी भाग व पश्चिम राजपूताना।
🔸प्रार्जुन- मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में।
🔸सनकानीक- भिलसा के निकट-ग्वालियर क्षेत्र।
https://t.me/HistoryEducation08 ❤️
🔹यौधेय - उत्तरी राजस्थान व दक्षिण पूर्वी पंजाब।
🔹अश्वक- उत्तर पश्चिम भारत में।
🔹त्रिगर्त -
कांगड़ा क्षेत्र।
🔸मालव - टोंक, जयपुर-अजमेर (पूर्वी राजस्थान)
🔸अर्जुनायन- जयपुर, भरतपुर, अलवर, आगरा।
🔸कुणिन्द-
सतलज व व्यास नदियों के मध्य।
🔹औदुम्बर- रावी के पश्चिम में काँगड़ा तक।
🔹शिवि- माध्यमिका-नगरी (राजस्थान)
🔹मद्रक- रावी-चिनाब के मध्य।
🔹आभीर-सिन्धु घाटी के दक्षिणी भाग व पश्चिम राजपूताना।
🔸प्रार्जुन- मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में।
🔸सनकानीक- भिलसा के निकट-ग्वालियर क्षेत्र।
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