#upprpb द्वारा किसी भी भर्ती का अंतिम परिणाम जारी करने में, दौड़ पूर्ण होने बाद 15 दिन से ज्यादा का समय नहीं लगा जबकि हेड ऑपरेटर भर्ती की दौड़ हुए 1 महीने से अधिक का समय हो गया फिर भी रिजल्ट जारी न करना भर्ती की सुचिता एवं पारदर्शिता पर संशय तथा सवाल उठाता है
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UPPRPB द्वारा आयोजित 4543 पदों की UPSI भर्ती वर्तमान में गंभीर सवालों के घेरे में है। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद अभ्यर्थियों में असंतोष की लहर है। यह विश्लेषण न केवल कमियों को उजागर करता है, बल्कि एक पारदर्शी चयन प्रणाली की आवश्यकता पर बल देता है।
1. अकल्पनीय कट-ऑफ: एक सांख्यिकीय विसंगति ~ सामान्यतः किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में, जहाँ Negative Marking न भी हो, DV/PST के लिए कट-ऑफ 70-75% के आसपास रहती है। लेकिन इस भर्ती में पहली बार यह 90% के पार चली गई है।
तर्क: क्या पेपर का स्तर इतना सरल था कि सभी ने शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए? या फिर चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण में ही कुछ ऐसी विसंगतियां रहीं जिससे मेधावी छात्र बाहर हो गए? इतनी उच्च कट-ऑफ परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
2. नॉर्मलाइजेशन का 'ब्लैक बॉक्स' ~ नॉर्मलाइजेशन का उद्देश्य अलग-अलग शिफ्ट के कठिनाई स्तर को बराबर करना होता है, लेकिन यहाँ यह 'अंधेरे में तीर' जैसा सिद्ध हो रहा है।
समस्या: अभ्यर्थियों के अंक मनमाने ढंग से घटाए और बढ़ाए गए हैं। बोर्ड ने यह स्पष्ट नहीं किया कि 'Equi-percentile' पद्धति अपनाई गई या कोई अन्य?
प्रभाव: एक छात्र जो Raw Score में बेहतर था, वह बाहर है और कम अंक वाला अंदर? बिना फॉर्मूले और सार्वजनिक प्रकटीकरण के, इसे 'भाग्य की परीक्षा' माना जा रहा है, 'योग्यता' की नहीं।
3. 'समान अवसर' के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन ~ भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता की गारंटी देता है।
तर्क: जब परीक्षा चार शिफ्टों में हुई, तो यह सुनिश्चित करना बोर्ड की जिम्मेदारी थी कि किसी भी शिफ्ट के बच्चे को घाटा न हो। वर्तमान स्थिति में, किसी विशेष शिफ्ट को अनुचित लाभ मिलने की प्रबल संभावना दिखाई दे रही है, जो 'समान अवसर' के सिद्धांत के विरुद्ध है।
4. स्कोरकार्ड को गोपनीय रखने का रहस्य ~ परीक्षा संपन्न होने के महीनों बाद और परिणाम आने के बावजूद अभ्यर्थियों का निजी Scorecard जारी न करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
विधिक अधिकार: अभ्यर्थी को यह जानने का कानूनी हक है कि उसने कितना स्कोर किया है?
भय का वातावरण: स्कोरकार्ड न होने से सफल अभ्यर्थियों के सिर पर भी तलवार लटकी है कि कहीं वे फाइनल मेरिट में बाहर न हो जाएं, और असफल छात्र यह नहीं जान पा रहे कि वे किस मार्जिन से चूके हैं?
5. त्रुटिपूर्ण उत्तर कुंजी और न्यायिक विकल्प का अभाव ~ बोर्ड ने फाइनल आंसर की जारी की, जिसमें विशेषज्ञों के अनुसार अभी भी कई गलतियां हैं।
निरंकुशता: बोर्ड का यह कहना कि "इसे अब चुनौती नहीं दी जा सकती", छात्रों के न्यायिक उपचार के रास्ते बंद करने जैसा है। गलत प्रश्न के लिए छात्र को दंडित करना न्यायसंगत नहीं है।
6. डिलीटेड प्रश्न और अंक-भार (Weightage) का गणित ~ जिस शिफ्ट में प्रश्न डिलीट हुए, वहां शेष प्रश्नों के अंक बढ़ गए।
उदाहरण: यदि 100 प्रश्नों के स्थान पर 95 प्रश्न ही वैध माने गए, तो उन 5 प्रश्नों के अंक शेष 95 में बांट दिए गए। इससे उस शिफ्ट के छात्रों को एक 'आर्टिफिशियल जंप' मिला, जो अन्य शिफ्टों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इसका कोई ठोस समाधान बोर्ड ने पेश नहीं किया है।
सीएम @myogiadityanath जी एवं @upprpb से निर्णायक मांगें ~
हम लाखों #UPSI अभ्यर्थी निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल पारदर्शी कार्रवाई की मांग करते हैं:
सार्वजनिक डैशबोर्ड: सभी 10 लाख 77 परीक्षार देने वाले प्रत्येक अभ्यर्थी का लॉगिन आधारित विस्तृत स्कोरकार्ड जारी हो, जिसमें रॉ स्कोर, नॉर्मलाइज्ड स्कोर और शिफ्ट रैंक का विवरण हो।
नॉर्मलाइजेशन मास्टर डेटा: चारों शिफ्टों का औसत (Average) और मानक विचलन (Standard Deviation) सार्वजनिक किया जाए ताकि प्रक्रिया की गणितीय शुद्धता जांची जा सके।
पुनर्विचार समिति: विवादित प्रश्नों के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन हो, जो पारदर्शी तरीके से आपत्तियों का निपटारा करे।
श्वेत पत्र: भर्ती बोर्ड पूरी प्रक्रिया पर एक 'श्वेत पत्र' जारी करे, जिसमें शुचिता और पारदर्शिता के प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं।
पद वृद्धि और वेटिंग लिस्ट ~ 02 हजार पदवृद्धि और वेटिंग लिस्ट की मांग पे भी विचार किया जाए और छात्र हितों में सकारात्मक निर्णय लिया जाए।
उत्तर प्रदेश का युवा केवल 'रोजगार' नहीं, बल्कि 'निष्पक्ष रोजगार' मांग रहा है। यदि भर्ती बोर्ड अपनी प्रक्रिया में पूर्णतः ईमानदार है, तो डेटा साझा करने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं होना चाहिए। मा. सीएम योगी जी से करबद्ध प्रार्थना है कि लाखों युवाओं के भविष्य को अंधकार में जाने से बचाएं और #UPPRPB की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु भी कठोर निर्देश दें..🙏🚩
@CMOfficeUP @myogioffice
1. अकल्पनीय कट-ऑफ: एक सांख्यिकीय विसंगति ~ सामान्यतः किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में, जहाँ Negative Marking न भी हो, DV/PST के लिए कट-ऑफ 70-75% के आसपास रहती है। लेकिन इस भर्ती में पहली बार यह 90% के पार चली गई है।
तर्क: क्या पेपर का स्तर इतना सरल था कि सभी ने शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए? या फिर चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण में ही कुछ ऐसी विसंगतियां रहीं जिससे मेधावी छात्र बाहर हो गए? इतनी उच्च कट-ऑफ परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
2. नॉर्मलाइजेशन का 'ब्लैक बॉक्स' ~ नॉर्मलाइजेशन का उद्देश्य अलग-अलग शिफ्ट के कठिनाई स्तर को बराबर करना होता है, लेकिन यहाँ यह 'अंधेरे में तीर' जैसा सिद्ध हो रहा है।
समस्या: अभ्यर्थियों के अंक मनमाने ढंग से घटाए और बढ़ाए गए हैं। बोर्ड ने यह स्पष्ट नहीं किया कि 'Equi-percentile' पद्धति अपनाई गई या कोई अन्य?
प्रभाव: एक छात्र जो Raw Score में बेहतर था, वह बाहर है और कम अंक वाला अंदर? बिना फॉर्मूले और सार्वजनिक प्रकटीकरण के, इसे 'भाग्य की परीक्षा' माना जा रहा है, 'योग्यता' की नहीं।
3. 'समान अवसर' के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन ~ भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता की गारंटी देता है।
तर्क: जब परीक्षा चार शिफ्टों में हुई, तो यह सुनिश्चित करना बोर्ड की जिम्मेदारी थी कि किसी भी शिफ्ट के बच्चे को घाटा न हो। वर्तमान स्थिति में, किसी विशेष शिफ्ट को अनुचित लाभ मिलने की प्रबल संभावना दिखाई दे रही है, जो 'समान अवसर' के सिद्धांत के विरुद्ध है।
4. स्कोरकार्ड को गोपनीय रखने का रहस्य ~ परीक्षा संपन्न होने के महीनों बाद और परिणाम आने के बावजूद अभ्यर्थियों का निजी Scorecard जारी न करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
विधिक अधिकार: अभ्यर्थी को यह जानने का कानूनी हक है कि उसने कितना स्कोर किया है?
भय का वातावरण: स्कोरकार्ड न होने से सफल अभ्यर्थियों के सिर पर भी तलवार लटकी है कि कहीं वे फाइनल मेरिट में बाहर न हो जाएं, और असफल छात्र यह नहीं जान पा रहे कि वे किस मार्जिन से चूके हैं?
5. त्रुटिपूर्ण उत्तर कुंजी और न्यायिक विकल्प का अभाव ~ बोर्ड ने फाइनल आंसर की जारी की, जिसमें विशेषज्ञों के अनुसार अभी भी कई गलतियां हैं।
निरंकुशता: बोर्ड का यह कहना कि "इसे अब चुनौती नहीं दी जा सकती", छात्रों के न्यायिक उपचार के रास्ते बंद करने जैसा है। गलत प्रश्न के लिए छात्र को दंडित करना न्यायसंगत नहीं है।
6. डिलीटेड प्रश्न और अंक-भार (Weightage) का गणित ~ जिस शिफ्ट में प्रश्न डिलीट हुए, वहां शेष प्रश्नों के अंक बढ़ गए।
उदाहरण: यदि 100 प्रश्नों के स्थान पर 95 प्रश्न ही वैध माने गए, तो उन 5 प्रश्नों के अंक शेष 95 में बांट दिए गए। इससे उस शिफ्ट के छात्रों को एक 'आर्टिफिशियल जंप' मिला, जो अन्य शिफ्टों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इसका कोई ठोस समाधान बोर्ड ने पेश नहीं किया है।
सीएम @myogiadityanath जी एवं @upprpb से निर्णायक मांगें ~
हम लाखों #UPSI अभ्यर्थी निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल पारदर्शी कार्रवाई की मांग करते हैं:
सार्वजनिक डैशबोर्ड: सभी 10 लाख 77 परीक्षार देने वाले प्रत्येक अभ्यर्थी का लॉगिन आधारित विस्तृत स्कोरकार्ड जारी हो, जिसमें रॉ स्कोर, नॉर्मलाइज्ड स्कोर और शिफ्ट रैंक का विवरण हो।
नॉर्मलाइजेशन मास्टर डेटा: चारों शिफ्टों का औसत (Average) और मानक विचलन (Standard Deviation) सार्वजनिक किया जाए ताकि प्रक्रिया की गणितीय शुद्धता जांची जा सके।
पुनर्विचार समिति: विवादित प्रश्नों के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन हो, जो पारदर्शी तरीके से आपत्तियों का निपटारा करे।
श्वेत पत्र: भर्ती बोर्ड पूरी प्रक्रिया पर एक 'श्वेत पत्र' जारी करे, जिसमें शुचिता और पारदर्शिता के प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं।
पद वृद्धि और वेटिंग लिस्ट ~ 02 हजार पदवृद्धि और वेटिंग लिस्ट की मांग पे भी विचार किया जाए और छात्र हितों में सकारात्मक निर्णय लिया जाए।
उत्तर प्रदेश का युवा केवल 'रोजगार' नहीं, बल्कि 'निष्पक्ष रोजगार' मांग रहा है। यदि भर्ती बोर्ड अपनी प्रक्रिया में पूर्णतः ईमानदार है, तो डेटा साझा करने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं होना चाहिए। मा. सीएम योगी जी से करबद्ध प्रार्थना है कि लाखों युवाओं के भविष्य को अंधकार में जाने से बचाएं और #UPPRPB की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु भी कठोर निर्देश दें..🙏🚩
@CMOfficeUP @myogioffice
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