इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।
साभार - मनीष शेखर
@Sanatan
साभार - मनीष शेखर
@Sanatan
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घर पर ऐसे मनाएं कान्हा जी का जन्मोत्सव:
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पूरे हर्षोल्लास के साथ कान्हा के शिशु रूप में अवतरित होने का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उनके भक्त बहुत धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन अगर आप किसी मंदिर में नहीं जा पा रहे हैं, तो घर में भी आप बेहद खूबसूरत तरीके से जन्माष्टमी मना सकते हैं।
आइए इस लेख में जानते हैं कि कैसे घर में सम्पूर्ण विधि-विधान और नए तरीकों के साथ मनाएं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:
सजाएं मंदिर :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के लिए आप बाज़ार से फूल व अन्य सजावट का सामान लाकर मंदिर को सजाएं। आप मंदिर के अलावा घर में भी किसी अन्य स्थल को जन्माष्टमी का उत्सव मनाने के लिए सुंदर तरह से सजा सकते हैं।
श्री कृष्ण की बांसुरी :
भगवान को बांसुरी अत्यंत प्रिय है, इसलिए आप चाहें तो उनके जन्मोत्सव पर एक बांसुरी ला सकते हैं, और उसे मोती और सुंदर रंगों से सजाकर पूजन के समय प्रभु को अर्पित कर सकते हैं।
रंगोली बनाएं :
सनातन धर्म में रंगोली का महत्व बहुत है, घर में रंगोली बनाना अत्यंत शुभ माना गया है। तो, आप भी जन्माष्टमी के अवसर पर अपने मंदिर के सामने या घर के बाहर भगवान के स्वागत के लिए एक सुंदर रंगोली अवश्य बनाएं।
भोग-पकवान :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर पर ही प्रभु को भोग लगाने के लिए पंजीरी, पंचामृत, लड्डू एवं अन्य पकवान बना सकते हैं। आप इस दिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पसंदीदा चीज़ों का भोग बनाना न भूलें।
झांकी :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर में ही झांकी लगाकर इस पर्व को और भी खास बना सकते हैं। इसके लिए आप कृष्ण की बाल लीला से संबंधित या कोई अन्य झांकी भी लगा सकते हैं।
बच्चों को बनाएं श्री राधाकृष्ण :
ऐसा माना जाता है कि बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं। अगर आपके घर में छोटे बच्चे हैं तो आप उन्हें जन्माष्टमी पर राधारानी और श्रीकृष्ण के रूप में तैयार कर सकते हैं। जन्माष्टमी पूर्णतः बाल कृष्ण का उत्सव है, तो बच्चों को श्री राधाकृष्ण के रूप में तैयार करके, इस पर्व की सुंदरता को बढ़ाया जा सकता है।
भजन-कीर्तन :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अगर आप माहौल को थोड़ा और भक्तिमय बनाना चाहते हैं, तो घर में सुंदर श्रीकृष्ण भजन भी बजाइये। आप अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलकर पूरे उत्साह के साथ भजन-कीर्तन करिए, और इस पर्व का आनंद उठाइये।
श्रीकृष्ण को झूला झुलाएं :
प्रभु के जन्म की पूजा विधि-विधान से करने के पश्चात्, उनको झूला झुलाना बहुत अच्छा माना जाता है। आप अपने पूरे परिवार के साथ बाल-गोपाल को झूला झुलाएं और उनका स्वागत करें।
प्रसाद वितरण :
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात, वहां उपस्थित और आसपास के लोगों के बीच प्रसाद अवश्य बांटें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोई भी पूजा तब तक फलीभूत नहीं है, जब तक उसका प्रसाद आपके अतिरिक्त कुछ और लोगों तक न पहुंच जाए।
आप यहां बताए गए तरीकों के साथ घर में अपने परिवार के साथ धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मना सकते हैं। हम आशा करते हैं कि यह सुझाव आपके त्योहार को खुशियों से भर देंगे।.....जय श्री कृष्णा 🙏
साभार........
@Sanatan
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पूरे हर्षोल्लास के साथ कान्हा के शिशु रूप में अवतरित होने का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उनके भक्त बहुत धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन अगर आप किसी मंदिर में नहीं जा पा रहे हैं, तो घर में भी आप बेहद खूबसूरत तरीके से जन्माष्टमी मना सकते हैं।
आइए इस लेख में जानते हैं कि कैसे घर में सम्पूर्ण विधि-विधान और नए तरीकों के साथ मनाएं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:
सजाएं मंदिर :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के लिए आप बाज़ार से फूल व अन्य सजावट का सामान लाकर मंदिर को सजाएं। आप मंदिर के अलावा घर में भी किसी अन्य स्थल को जन्माष्टमी का उत्सव मनाने के लिए सुंदर तरह से सजा सकते हैं।
श्री कृष्ण की बांसुरी :
भगवान को बांसुरी अत्यंत प्रिय है, इसलिए आप चाहें तो उनके जन्मोत्सव पर एक बांसुरी ला सकते हैं, और उसे मोती और सुंदर रंगों से सजाकर पूजन के समय प्रभु को अर्पित कर सकते हैं।
रंगोली बनाएं :
सनातन धर्म में रंगोली का महत्व बहुत है, घर में रंगोली बनाना अत्यंत शुभ माना गया है। तो, आप भी जन्माष्टमी के अवसर पर अपने मंदिर के सामने या घर के बाहर भगवान के स्वागत के लिए एक सुंदर रंगोली अवश्य बनाएं।
भोग-पकवान :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर पर ही प्रभु को भोग लगाने के लिए पंजीरी, पंचामृत, लड्डू एवं अन्य पकवान बना सकते हैं। आप इस दिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पसंदीदा चीज़ों का भोग बनाना न भूलें।
झांकी :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर में ही झांकी लगाकर इस पर्व को और भी खास बना सकते हैं। इसके लिए आप कृष्ण की बाल लीला से संबंधित या कोई अन्य झांकी भी लगा सकते हैं।
बच्चों को बनाएं श्री राधाकृष्ण :
ऐसा माना जाता है कि बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं। अगर आपके घर में छोटे बच्चे हैं तो आप उन्हें जन्माष्टमी पर राधारानी और श्रीकृष्ण के रूप में तैयार कर सकते हैं। जन्माष्टमी पूर्णतः बाल कृष्ण का उत्सव है, तो बच्चों को श्री राधाकृष्ण के रूप में तैयार करके, इस पर्व की सुंदरता को बढ़ाया जा सकता है।
भजन-कीर्तन :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अगर आप माहौल को थोड़ा और भक्तिमय बनाना चाहते हैं, तो घर में सुंदर श्रीकृष्ण भजन भी बजाइये। आप अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलकर पूरे उत्साह के साथ भजन-कीर्तन करिए, और इस पर्व का आनंद उठाइये।
श्रीकृष्ण को झूला झुलाएं :
प्रभु के जन्म की पूजा विधि-विधान से करने के पश्चात्, उनको झूला झुलाना बहुत अच्छा माना जाता है। आप अपने पूरे परिवार के साथ बाल-गोपाल को झूला झुलाएं और उनका स्वागत करें।
प्रसाद वितरण :
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात, वहां उपस्थित और आसपास के लोगों के बीच प्रसाद अवश्य बांटें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोई भी पूजा तब तक फलीभूत नहीं है, जब तक उसका प्रसाद आपके अतिरिक्त कुछ और लोगों तक न पहुंच जाए।
आप यहां बताए गए तरीकों के साथ घर में अपने परिवार के साथ धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मना सकते हैं। हम आशा करते हैं कि यह सुझाव आपके त्योहार को खुशियों से भर देंगे।.....जय श्री कृष्णा 🙏
साभार........
@Sanatan
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श्री कृष्ण पूजन
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साधक को चाहिए कि वह स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल में स्वच्छ आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाये। पूजन के लिए आवश्यक समस्त सामग्री यथा- कुंकुम, अक्षत, मौली, जल, पुष्प, दूध, दही, घृत, वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अपने पास रख लें ताकि पूजन के मध्य बार-बार न उठना पड़े। अपने सम्मुख किसी चौकी में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर लें। धूप दीप आदि जला लें ताकि वातावरण शुद्ध हो जाये।
पवित्रीकरण
सर्वप्रथम अपने बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर छिड़कें तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥
आचमन
पवित्रीकरण के पश्चात आचमनी में जल लेकर क्रमश: निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये तीन बार जल पियें।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
आचमन के उपरांत हस्त प्रक्षालन (हाथ धोना) कर लें।
गणपति स्मरण
निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान गणपति का स्मरण करें साथ ही अन्य देवी देवताओं का भी स्मरण करें -
ॐ श्रीमन् महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः । उमा महेश्वराभ्यां नमः । शची पुरन्दराभ्यां नमः । मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः । इष्ट देवताभ्यो नमः । कुल देवताभ्यो नमः । ग्राम देवताभ्यो नमः । स्थान देवताभ्यो नमः । वास्तु देवताभ्यो नमः । वाणी हिरण्य गर्भभ्यां नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः ।
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
संकल्प
कुंकुम, अक्षत मिश्रित जल दाहिने हाथ में लेकर निन मंत्रोच्चार करते हुये संकल्प लें
ॐ विष्णु विष्णु विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्राह्मणोऽहि द्वितीय परार्धे श्वेत वाराह कल्पे जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते पुण्य क्षेत्रे, कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक मासे ( महीने का नाम लें) अमुक पक्षे (पक्ष बोलें) अमुक तिथौ (तिथि बोलें ) अमुक वासरे (दिन का नाम लें ) अमुक गोत्रोत्पन्नः ( अपना गोत्र बोलें) अमुक ( नाम बोलें ) शर्माऽहं भगवतो महापुरुषस्य कृष्णस्य विशिष्ट पूजनं अहं करिष्ये ।
उपरोक्त संकल्प मंत्र पूर्ण होने पर जल को भूमि पर छोड़ दें।
दीप पूजन
दीपक पर कुंकुम अक्षत चढ़ायें, निम्न मंत्र का उच्चारण करें भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षि हविघ्नकृतः यावत् कर्म समाप्तिः स्यात तावदत्र स्थिरो भव ।
( ॐ दीपदेवतायै नमः)
कलश पूजन
अपने सम्मुख भगवान श्रीकृष्ण के आसन की दाहिनी ओर कलश स्थापित करें और क्रमशः निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये चारों दिशाओं में कलश पर कुंकुम से तिलक करें।
पूर्वे ऋग्वेदाय नमः । उत्तरे यजुर्वेदाय नमः । पश्चिमे सामवेदाय नमः । दक्षिणे अर्थवेदाय नमः ।
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश में जल डालें
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती, नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ।
जल डालने के उपरांत "अक्षतानि समर्पयामि " का उच्चारण करते हुये कलश में अक्षत डाल दें तत्पश्चात निम्र मंत्र का उच्चारण करते हुये एक सुपारी अर्पित करें
ॐ या फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पणी, वृहस्पतिः प्रसूतास्तन्नो मुञ्चन्ति ( गूं ) हसः ।
फिर कलश के ऊपर पंच पल्लव डाल दें तथा उस पर नारियल स्थापित करें (नारियल में मौली बंधी हुयी हो) अब कलश को स्नान कराकर चन्दन, कुंकुम, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पित करें तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः, मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणः स्थिता । कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वणः । अंगैश्च सहिता सर्वे कलशं तु समाश्रितः, अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरस्तथा, आयान्तु यजमानस्थ दुरिक्षय कारकाः । ॐ कलशस्य देवता अपां पतये नमः ।
गुरु पूजन
यद्यपि योगी योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं तथापि यदि साधक ने किसी भी गुरु से दीक्षा या गुरु मंत्र लिया है अथवा नहीं भी लिया तो निम्रानुसार मंत्रोच्चार से ब्रह्माण्ड के सभी गुरुओं का पूजन हो जाता है-
क्रमशः
🙏 @Sanatan
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साधक को चाहिए कि वह स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल में स्वच्छ आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाये। पूजन के लिए आवश्यक समस्त सामग्री यथा- कुंकुम, अक्षत, मौली, जल, पुष्प, दूध, दही, घृत, वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अपने पास रख लें ताकि पूजन के मध्य बार-बार न उठना पड़े। अपने सम्मुख किसी चौकी में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर लें। धूप दीप आदि जला लें ताकि वातावरण शुद्ध हो जाये।
पवित्रीकरण
सर्वप्रथम अपने बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर छिड़कें तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥
आचमन
पवित्रीकरण के पश्चात आचमनी में जल लेकर क्रमश: निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये तीन बार जल पियें।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
आचमन के उपरांत हस्त प्रक्षालन (हाथ धोना) कर लें।
गणपति स्मरण
निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान गणपति का स्मरण करें साथ ही अन्य देवी देवताओं का भी स्मरण करें -
ॐ श्रीमन् महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः । उमा महेश्वराभ्यां नमः । शची पुरन्दराभ्यां नमः । मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः । इष्ट देवताभ्यो नमः । कुल देवताभ्यो नमः । ग्राम देवताभ्यो नमः । स्थान देवताभ्यो नमः । वास्तु देवताभ्यो नमः । वाणी हिरण्य गर्भभ्यां नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः ।
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
संकल्प
कुंकुम, अक्षत मिश्रित जल दाहिने हाथ में लेकर निन मंत्रोच्चार करते हुये संकल्प लें
ॐ विष्णु विष्णु विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्राह्मणोऽहि द्वितीय परार्धे श्वेत वाराह कल्पे जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते पुण्य क्षेत्रे, कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक मासे ( महीने का नाम लें) अमुक पक्षे (पक्ष बोलें) अमुक तिथौ (तिथि बोलें ) अमुक वासरे (दिन का नाम लें ) अमुक गोत्रोत्पन्नः ( अपना गोत्र बोलें) अमुक ( नाम बोलें ) शर्माऽहं भगवतो महापुरुषस्य कृष्णस्य विशिष्ट पूजनं अहं करिष्ये ।
उपरोक्त संकल्प मंत्र पूर्ण होने पर जल को भूमि पर छोड़ दें।
दीप पूजन
दीपक पर कुंकुम अक्षत चढ़ायें, निम्न मंत्र का उच्चारण करें भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षि हविघ्नकृतः यावत् कर्म समाप्तिः स्यात तावदत्र स्थिरो भव ।
( ॐ दीपदेवतायै नमः)
कलश पूजन
अपने सम्मुख भगवान श्रीकृष्ण के आसन की दाहिनी ओर कलश स्थापित करें और क्रमशः निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये चारों दिशाओं में कलश पर कुंकुम से तिलक करें।
पूर्वे ऋग्वेदाय नमः । उत्तरे यजुर्वेदाय नमः । पश्चिमे सामवेदाय नमः । दक्षिणे अर्थवेदाय नमः ।
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश में जल डालें
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती, नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ।
जल डालने के उपरांत "अक्षतानि समर्पयामि " का उच्चारण करते हुये कलश में अक्षत डाल दें तत्पश्चात निम्र मंत्र का उच्चारण करते हुये एक सुपारी अर्पित करें
ॐ या फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पणी, वृहस्पतिः प्रसूतास्तन्नो मुञ्चन्ति ( गूं ) हसः ।
फिर कलश के ऊपर पंच पल्लव डाल दें तथा उस पर नारियल स्थापित करें (नारियल में मौली बंधी हुयी हो) अब कलश को स्नान कराकर चन्दन, कुंकुम, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पित करें तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः, मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणः स्थिता । कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वणः । अंगैश्च सहिता सर्वे कलशं तु समाश्रितः, अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरस्तथा, आयान्तु यजमानस्थ दुरिक्षय कारकाः । ॐ कलशस्य देवता अपां पतये नमः ।
गुरु पूजन
यद्यपि योगी योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं तथापि यदि साधक ने किसी भी गुरु से दीक्षा या गुरु मंत्र लिया है अथवा नहीं भी लिया तो निम्रानुसार मंत्रोच्चार से ब्रह्माण्ड के सभी गुरुओं का पूजन हो जाता है-
क्रमशः
🙏 @Sanatan
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श्री कृष्ण पूजन (२)
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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिं ।
यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
गुरु चित्र पर पुष्प से जल छिड़ककर उसे स्वच्छ वस्त्र से पोंछ दें तत्पश्चात पुष्प, धूप, दीप, अक्षत कुंकुम आदि से गुरु का पूजन करें तथा निम्न मंत्र का मानसिक जप करते हुये अपने गुरु से प्रार्थना करें कि वे पूजन में सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहकर पूजन को पूर्णता प्रदान करें-
ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।
दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें निम्र मंत्र का उच्चारण करें
बर्हापीडं नटवर वपुः कर्णयोः कर्णिकारं, विभवासा कनक कपिशं वैजयंती च मालां ।
रुधान वेणूरधरसुदया पूरयन गोपवृन्दैः, वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्रविशद् गीतकीर्तिः ॥ (ध्यानं समर्पयामि श्रीकृष्णाय नमः)
आसन
दोनों हाथ में पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को आसन दें। निम्र मंत्र का उच्चारण करें
ॐ पुरुष एवेदं (गूं) यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (पुष्पासनं समर्पयामि)
पाद्य
आचमनी में जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में दो बार अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायंश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्व भूतानि त्रिपादस्यामृतन्दित् ।।(पाद्यं समर्पयामि)
अर्ध्य
ताम्र पात्र में जल, कुंकुम, चंदन, अक्षत व पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें
ताम्रपात्रे स्थितं तोयं गंध पुष्प फलान्वितम् ।
सहिरण्यं ददाम्यर्ध्य गृहाण परमेश्वर ॥ (अर्ध्यं समर्पयामि)
आचमन
आचमनी में जल लेकर भगवान को अर्पित करें
सर्व तीर्थ समानीतं सुगन्धिं निर्मलं जलं ।
आचमनार्थं मया दन्तं गृहाण परमेश्वर ॥
स्नान
पुष्प से जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण को स्नान करायें-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु॥
(स्त्रानंसमर्पयामि)
दुग्ध
भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के समक्ष एक पात्र रखकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए पात्र में दुग्ध अर्पित करें
कामधेनु समुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम् ।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥(दुग्ध स्नानं समर्पयामि)
दधि
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चित्र के समक्ष रखे पात्र में दही अर्पित करें
पयसस्तु समुद्भुतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।
दध्यानीतं मयादेव स्नानार्थं प्रतिगृहताम् ॥
(दधि स्नानं समर्पयामि)
घृत
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को घी अर्पित करें
नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकम् ।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
(घृत स्नानं समर्पयामि)
मधु
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को शहद (मधु) से स्नान करायें
तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु ।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।।
(मधु स्नानं समर्पयामि)
शर्करा स्नान
अब भगवान श्रीकृष्ण को शक्कर से स्नान करायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
इक्षुसार समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका, मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् । (शर्करा स्नानं समर्पयामि)
शुद्धोदक स्नान
शर्करा स्नान के पश्चात आचमनी में जल लेकर स्नान हेतु पात्र में अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
कावेरी नर्मदावेणी तुंगभद्रा सरस्वती गंगा च यमुना तोयं मया स्नानार्थमर्पितम् । (शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि)
वस्त्रोपवस्त्र
भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दो वस्त्र अर्पित करें
सर्वभूषादिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे, मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम् । (वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि)
तिलक
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चंदन कुंकुम से भगवान श्रीकृष्ण का तिलक करें
श्रीखण्ड चन्दनं दित्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपन सुरश्रेष्ठ चन्दनम् प्रतिगृह्यताम् ।
अक्षत
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को अक्षत अर्पित करें
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता सुशोभिता, मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर । (अक्षतान् समर्पयामि)
पुष्प
अब हाथ में नाना प्रकार के पुष्प लेकर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये भगवान को पुष्प अर्पित करें
पद्म शंखज पुष्पादि शत पत्रैविचित्रताम् ।
पुष्पमालां प्रयच्छामि गृहाण परमेश्वरः ॥ (पुष्पं समर्पयामि)
तुलसीदल
अब तुलसी पत्रों पर चन्दन लगाकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें निम्र मंत्रोच्चार करें
इदं सचन्दनं तुलसीदलं समर्पयामि नमः।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
--------------------
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिं ।
यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
गुरु चित्र पर पुष्प से जल छिड़ककर उसे स्वच्छ वस्त्र से पोंछ दें तत्पश्चात पुष्प, धूप, दीप, अक्षत कुंकुम आदि से गुरु का पूजन करें तथा निम्न मंत्र का मानसिक जप करते हुये अपने गुरु से प्रार्थना करें कि वे पूजन में सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहकर पूजन को पूर्णता प्रदान करें-
ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।
दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें निम्र मंत्र का उच्चारण करें
बर्हापीडं नटवर वपुः कर्णयोः कर्णिकारं, विभवासा कनक कपिशं वैजयंती च मालां ।
रुधान वेणूरधरसुदया पूरयन गोपवृन्दैः, वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्रविशद् गीतकीर्तिः ॥ (ध्यानं समर्पयामि श्रीकृष्णाय नमः)
आसन
दोनों हाथ में पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को आसन दें। निम्र मंत्र का उच्चारण करें
ॐ पुरुष एवेदं (गूं) यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (पुष्पासनं समर्पयामि)
पाद्य
आचमनी में जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में दो बार अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायंश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्व भूतानि त्रिपादस्यामृतन्दित् ।।(पाद्यं समर्पयामि)
अर्ध्य
ताम्र पात्र में जल, कुंकुम, चंदन, अक्षत व पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें
ताम्रपात्रे स्थितं तोयं गंध पुष्प फलान्वितम् ।
सहिरण्यं ददाम्यर्ध्य गृहाण परमेश्वर ॥ (अर्ध्यं समर्पयामि)
आचमन
आचमनी में जल लेकर भगवान को अर्पित करें
सर्व तीर्थ समानीतं सुगन्धिं निर्मलं जलं ।
आचमनार्थं मया दन्तं गृहाण परमेश्वर ॥
स्नान
पुष्प से जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण को स्नान करायें-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु॥
(स्त्रानंसमर्पयामि)
दुग्ध
भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के समक्ष एक पात्र रखकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए पात्र में दुग्ध अर्पित करें
कामधेनु समुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम् ।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥(दुग्ध स्नानं समर्पयामि)
दधि
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चित्र के समक्ष रखे पात्र में दही अर्पित करें
पयसस्तु समुद्भुतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।
दध्यानीतं मयादेव स्नानार्थं प्रतिगृहताम् ॥
(दधि स्नानं समर्पयामि)
घृत
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को घी अर्पित करें
नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकम् ।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
(घृत स्नानं समर्पयामि)
मधु
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को शहद (मधु) से स्नान करायें
तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु ।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।।
(मधु स्नानं समर्पयामि)
शर्करा स्नान
अब भगवान श्रीकृष्ण को शक्कर से स्नान करायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
इक्षुसार समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका, मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् । (शर्करा स्नानं समर्पयामि)
शुद्धोदक स्नान
शर्करा स्नान के पश्चात आचमनी में जल लेकर स्नान हेतु पात्र में अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
कावेरी नर्मदावेणी तुंगभद्रा सरस्वती गंगा च यमुना तोयं मया स्नानार्थमर्पितम् । (शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि)
वस्त्रोपवस्त्र
भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दो वस्त्र अर्पित करें
सर्वभूषादिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे, मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम् । (वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि)
तिलक
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चंदन कुंकुम से भगवान श्रीकृष्ण का तिलक करें
श्रीखण्ड चन्दनं दित्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपन सुरश्रेष्ठ चन्दनम् प्रतिगृह्यताम् ।
अक्षत
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को अक्षत अर्पित करें
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता सुशोभिता, मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर । (अक्षतान् समर्पयामि)
पुष्प
अब हाथ में नाना प्रकार के पुष्प लेकर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये भगवान को पुष्प अर्पित करें
पद्म शंखज पुष्पादि शत पत्रैविचित्रताम् ।
पुष्पमालां प्रयच्छामि गृहाण परमेश्वरः ॥ (पुष्पं समर्पयामि)
तुलसीदल
अब तुलसी पत्रों पर चन्दन लगाकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें निम्र मंत्रोच्चार करें
इदं सचन्दनं तुलसीदलं समर्पयामि नमः।
(क्रमशः)
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श्री कृष्ण पूजन (३)
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धूप-दीप
धूप, दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण को दिखायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
वनस्पति रसोद्भूतः गन्धाढ्य सुमनोहरः ।
आत्रेयः सर्वदेवानां धूपोभ्यं प्रतिगृह्यताम् ।।
(धूपं दीपं दर्शयामि नमः)
नैवेद्य
अब नाना प्रकार की मिठाइयाँ भोज्य पदार्थ नैवेद्य के रूप में भगवान को अर्पित करें निम्नानुसार मंत्र का उच्चारण करें
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय नैवेद्यं निवेदयामि नमः ॥
आचमन
नैवेद्य समर्पित करने के पश्चात निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये आचमनी में जल लेकर पाँच बार अर्पित करें।
ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा ।
फल
विविध प्रकार के फल भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ।
तेन मे सफलावाप्तिः भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
(फलं समर्पयामि नमः)
तत्पश्चात ताम्बूल (पान का पत्ता) में लौंग इलायची रखकर भगवान को अर्पित करें।
पुष्पांजलि
दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रोच्चार करते हुये भगवान को पुष्पांजलि अर्पित करें
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च ।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर ॥
नमस्कार
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करें
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
मंत्र जाप
निम्र मंत्र का कम से कम 15 मिनिट तक मानसिक जप करें
ॐ कृं कृष्णाय ब्रह्मण्य देवाय नमः ॥
प्रार्थना
अंत में दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये पूर्ण सौभाग्य, समृद्धि एवं सफलता के लिये भगवान से प्रार्थना करें
नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्विताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
फिर अंत में आरती करें
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धूप-दीप
धूप, दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण को दिखायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें
वनस्पति रसोद्भूतः गन्धाढ्य सुमनोहरः ।
आत्रेयः सर्वदेवानां धूपोभ्यं प्रतिगृह्यताम् ।।
(धूपं दीपं दर्शयामि नमः)
नैवेद्य
अब नाना प्रकार की मिठाइयाँ भोज्य पदार्थ नैवेद्य के रूप में भगवान को अर्पित करें निम्नानुसार मंत्र का उच्चारण करें
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय नैवेद्यं निवेदयामि नमः ॥
आचमन
नैवेद्य समर्पित करने के पश्चात निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये आचमनी में जल लेकर पाँच बार अर्पित करें।
ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा ।
फल
विविध प्रकार के फल भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ।
तेन मे सफलावाप्तिः भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
(फलं समर्पयामि नमः)
तत्पश्चात ताम्बूल (पान का पत्ता) में लौंग इलायची रखकर भगवान को अर्पित करें।
पुष्पांजलि
दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रोच्चार करते हुये भगवान को पुष्पांजलि अर्पित करें
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च ।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर ॥
नमस्कार
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करें
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
मंत्र जाप
निम्र मंत्र का कम से कम 15 मिनिट तक मानसिक जप करें
ॐ कृं कृष्णाय ब्रह्मण्य देवाय नमः ॥
प्रार्थना
अंत में दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये पूर्ण सौभाग्य, समृद्धि एवं सफलता के लिये भगवान से प्रार्थना करें
नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्विताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
फिर अंत में आरती करें
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श्री गणपति से संस्पर्शित होना ही पड़ेगा। निम्बार्क स्वामी को गणेश जी ने स्वप्न में पान खिलाया और उनके मुख से श्रीकृष्ण के अद्भुत भजन फूट पड़े। मीरा सो रही थीं अचानक उन्होंने देखा कि गणेश जी सूंड से उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं बस कृष्ण भक्ति की प्रेममयी धारा फूट पड़ी। राम कृष्ण परमहंस काली काली चिल्ला रहे थे तभी अचानक गणेश जी प्रकट हो गये और उन्हें सूंड में लपेट लिया बस फिर क्या था रामकृष्ण परमहंस साक्षात् काली के चरणों से लिपट गये। गणेश के दर्शन ही सबसे महत्वपूर्ण हैं शिवाजी सो रहे थे अचानक स्वप्न में गणेश जी ने प्रकट होकर उन्हें तलवार थमा दी बस शिवाजी भवानी की तलवार से युक्त हो गये, कभी नहीं हारे। तुलसीदास रामायण लिख रहे थे कि गणेश जी स्वप्न में प्रकट हो गये त्रिशूल लेकर और त्रिशूल से लिख दिया ॐ श्री गणेशाय नमः तुलसीदास की रामायण अमर हो गई। सर्वप्रथम गणपति ही आते हैं अगर गणपति आ गये तो अन्य शक्तियाँ भी आयेंगी। कालीदास सो रहे थे अचानक गणेश जी ने उनके कान खींच दिए बस कालीदास जागृत हो गये और उन्हें दिव्य शिवलोक में रमण करते हुए शिव शक्ति दिखाई पड़ गये एवं रच दी उन्होंने कुमार सम्भव गणेश जी कभी लड्डू खिलाते हैं, कभी हँस देते हैं, कभी दांत दिखाते हैं, कभी आशीर्वाद देते हैं, कभी प्यार से लिपटा लेते हैं, कभी मुस्कुरा देते हैं, कभी सूंड से पानी छिड़क देते हैं और साधक कृत्य कृत्य हो उठता है, धन्य धन्य हो उठता है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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शंकरं प्रेमपिण्डम्
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गणेश को लोग सामान्यतः शिव और शिवा का पुत्र समझ लेते हैं इससे आगे नहीं। यही गलती कुबेर ने की उन्हें केवल शिव पुत्र के रूप में भोजन हेतु आमंत्रित कर लिया परन्तु गणेश ने अपनी लीलाओं से यह सिद्ध कर दिया कि वे परम परमेश्वर हैं, अलख निरंजन हैं। कुबेर ने अपने दोनों कान पकड़े और गणेशजी के सामने उठक-बैठक लगाने लगे इसे कहते हैं "दोर्भि कर्ण उपासना" अर्थात न पहचानने की भूल, कम आंकने की भूल, कुछ कम समझने की भूल । गणेश के साथ हमेशा से यही हुआ है कि उन्हें कम समझा गया, कम आंका गया है और जब-जब जिस भी देवता ने ऐसा किया उसे “दोर्भि कर्ण उपासना" करनी पड़ी। यहाँ तक कि शिव को भी "दोर्भि कर्ण उपासना " करनी पड़ी, माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी को भी "दोर्भि कर्ण उपासना" करनी पड़ी, विष्णु को भी "दोर्भि कर्ण उपासना करनी पड़ी, आप सबको भी "दोर्भिकर्ण उपासना करनी पड़ेगी।
हमारे देश में तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र सबसे विकसित प्रदेशों में से आते हैं। अन्य प्रदेशों की अपेक्षा यहाँ पर जन्म लेने वाले लोग ज्यादा सुसम्पन्न, पढ़े-लिखे, संवेदनशील और समझदार हैं। इन दोनों प्रदेशों में धर्म के प्रति निष्ठा, श्रद्धा एवं समर्पण देखने को मिलता है। भारत वर्ष में बच्चों की सबसे ज्यादा देखभाल, प्रेमपूर्ण व्यवहार तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र में ही देखने को मिलता है। बच्चे ही देश का भविष्य हैं अगर बच्चों का लालन-पालन, देखभाल, शिक्षा दीक्षा में अपूर्णता रह गई तो कालान्तर अपूर्ण मनुष्य ही उत्पन्न होंगे और यही हो रहा है। उपासना में बड़े गहरे रहस्य छिपे हुए हैं। "दोर्भि कर्ण उपासना " का तात्पर्य है माफी मांगना माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र समेत सभी देवताओं ने केवल गणपति को यह अधिकार दे रखा है कि वे कर्म श्रृंखला में विघ्न डाल सकते हैं, कर्म श्रृंखला के अंतर्गत किए गये पापों, कुकर्मों, व्याभिचारों को शक्ति कदापि नहीं है। तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र में गणेश मंदिरों की भरमार है एवं यहाँ पर आपको भक्तगण दोनों कान पकड़कर श्री गणेश के विग्रह के सामने प्रतिदिन उठक-बैठक लगाकर अपने पापों की क्षमा मांगते हुए मिल जायेंगे और गणेश जी सहर्ष परम पिता के समान सभी भक्त गणों को उनके कुकर्मों के फल से मुक्त करते हुए दिखलाई पड़ेंगे।
अज्ञानता, मूर्खता, लम्पटता तो जीव का स्वभाव है अतः गणेश जी माफ कर देते हैं। जीव तो बहुत छोटी सी अपूर्ण संरचना है गलती तो बड़े-बड़े देवताओं से भी हो जाती है। माँ भगवती का भंडासुर नामक दैत्य से घोर संग्राम चल रहा था, माँ भगवती कुछ ही क्षण में भंडासुर दैत्य के तीन सौ पुत्रों का संहार कर दिया। भंडासुर दैत्य का सेनापति अत्यंत ही चालाक था उसने रात्रि के अंधेरे में महाविघ्नेश यंत्र की पूजा उपासना की, उसे प्राण-प्रतिष्ठित किया और धीरे से ले जाकर उसे भुगती महात्रिपुर सुन्दरी की दिव्य सेना के शिविर के एक कोने में स्थापित कर दिया। विघ्नेश क्रियाशील हो गये देखते ही देखते माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी की 21000 दिव्य शक्ति से सुसज्जित सेना उच्चाटित हो गई, शिथिल पड़ गई, आलस्य से ग्रसित हो गई, बलहीन हो गई। उनकी सेना में सभी को जम्हाईयाँ आने लगीं, तंद्रा सताने लगी, हाथ-पाँव ढीले पड़ने लगे।
जिस सेना में काली, महाकाली, कराली, दुर्गा, महिषमर्दिनी, चण्ड-मुण्ड नाशिनी, चामुण्डा, भैरवी, कूष्माण्डा, आग्नेया, कुब्जिका, लंगड़ी, कालरात्रि, रक्तप्रिया, मांसांशा इत्यादि जैसी नायिकाएं हों। जिस सेना में धूमा, बगला, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, बाला, महाकाली, दक्षिणकाली जैसी पराशक्तियाँ हों वह सेना आलस्य, प्रमाद, निकम्मेपन से ग्रसित हो जाय यह तो बड़ी विचित्र बात हुई। माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी की मुख्य सेनापति दंडनाथा की कुछ समझ में नहीं आया वह सीधे उनके पास पहुँची और समस्त क्रियाकलापों का वर्णन किया। दूसरे ही क्षण मुस्कुराते हुए माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने पुनः एक बार दोनों कान पकड़कर अलख निरंजन की तरफ निहारा और देखते ही देखते अलख निरंजन में से असंख्य मुख असंख्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त: हाथ लिए हुए, मुण्डमाला धारण किए हुए, घोर अट्ठाहास करते हुए, रक्त वर्ण के महागणपति प्रकट हो गये। वे सीधे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ पर भंडासुर के सेनापति ने महाविघ्नेश यंत्र स्थापित कर रखा था अपने दंत घात से उन्होंने उस यंत्र को चूर चूर कर दिया तत्पश्चात् माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी के साथ मिलकर कुछ ही क्षणों में उन्होंने भंडासुर का समस्त सेना के साथ संहार कर डाला और इस प्रकार महागणपति की उत्पत्ति हुई।
(क्रमशः)
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गणेश को लोग सामान्यतः शिव और शिवा का पुत्र समझ लेते हैं इससे आगे नहीं। यही गलती कुबेर ने की उन्हें केवल शिव पुत्र के रूप में भोजन हेतु आमंत्रित कर लिया परन्तु गणेश ने अपनी लीलाओं से यह सिद्ध कर दिया कि वे परम परमेश्वर हैं, अलख निरंजन हैं। कुबेर ने अपने दोनों कान पकड़े और गणेशजी के सामने उठक-बैठक लगाने लगे इसे कहते हैं "दोर्भि कर्ण उपासना" अर्थात न पहचानने की भूल, कम आंकने की भूल, कुछ कम समझने की भूल । गणेश के साथ हमेशा से यही हुआ है कि उन्हें कम समझा गया, कम आंका गया है और जब-जब जिस भी देवता ने ऐसा किया उसे “दोर्भि कर्ण उपासना" करनी पड़ी। यहाँ तक कि शिव को भी "दोर्भि कर्ण उपासना " करनी पड़ी, माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी को भी "दोर्भि कर्ण उपासना" करनी पड़ी, विष्णु को भी "दोर्भि कर्ण उपासना करनी पड़ी, आप सबको भी "दोर्भिकर्ण उपासना करनी पड़ेगी।
हमारे देश में तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र सबसे विकसित प्रदेशों में से आते हैं। अन्य प्रदेशों की अपेक्षा यहाँ पर जन्म लेने वाले लोग ज्यादा सुसम्पन्न, पढ़े-लिखे, संवेदनशील और समझदार हैं। इन दोनों प्रदेशों में धर्म के प्रति निष्ठा, श्रद्धा एवं समर्पण देखने को मिलता है। भारत वर्ष में बच्चों की सबसे ज्यादा देखभाल, प्रेमपूर्ण व्यवहार तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र में ही देखने को मिलता है। बच्चे ही देश का भविष्य हैं अगर बच्चों का लालन-पालन, देखभाल, शिक्षा दीक्षा में अपूर्णता रह गई तो कालान्तर अपूर्ण मनुष्य ही उत्पन्न होंगे और यही हो रहा है। उपासना में बड़े गहरे रहस्य छिपे हुए हैं। "दोर्भि कर्ण उपासना " का तात्पर्य है माफी मांगना माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र समेत सभी देवताओं ने केवल गणपति को यह अधिकार दे रखा है कि वे कर्म श्रृंखला में विघ्न डाल सकते हैं, कर्म श्रृंखला के अंतर्गत किए गये पापों, कुकर्मों, व्याभिचारों को शक्ति कदापि नहीं है। तामिलनाडू एवं महाराष्ट्र में गणेश मंदिरों की भरमार है एवं यहाँ पर आपको भक्तगण दोनों कान पकड़कर श्री गणेश के विग्रह के सामने प्रतिदिन उठक-बैठक लगाकर अपने पापों की क्षमा मांगते हुए मिल जायेंगे और गणेश जी सहर्ष परम पिता के समान सभी भक्त गणों को उनके कुकर्मों के फल से मुक्त करते हुए दिखलाई पड़ेंगे।
अज्ञानता, मूर्खता, लम्पटता तो जीव का स्वभाव है अतः गणेश जी माफ कर देते हैं। जीव तो बहुत छोटी सी अपूर्ण संरचना है गलती तो बड़े-बड़े देवताओं से भी हो जाती है। माँ भगवती का भंडासुर नामक दैत्य से घोर संग्राम चल रहा था, माँ भगवती कुछ ही क्षण में भंडासुर दैत्य के तीन सौ पुत्रों का संहार कर दिया। भंडासुर दैत्य का सेनापति अत्यंत ही चालाक था उसने रात्रि के अंधेरे में महाविघ्नेश यंत्र की पूजा उपासना की, उसे प्राण-प्रतिष्ठित किया और धीरे से ले जाकर उसे भुगती महात्रिपुर सुन्दरी की दिव्य सेना के शिविर के एक कोने में स्थापित कर दिया। विघ्नेश क्रियाशील हो गये देखते ही देखते माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी की 21000 दिव्य शक्ति से सुसज्जित सेना उच्चाटित हो गई, शिथिल पड़ गई, आलस्य से ग्रसित हो गई, बलहीन हो गई। उनकी सेना में सभी को जम्हाईयाँ आने लगीं, तंद्रा सताने लगी, हाथ-पाँव ढीले पड़ने लगे।
जिस सेना में काली, महाकाली, कराली, दुर्गा, महिषमर्दिनी, चण्ड-मुण्ड नाशिनी, चामुण्डा, भैरवी, कूष्माण्डा, आग्नेया, कुब्जिका, लंगड़ी, कालरात्रि, रक्तप्रिया, मांसांशा इत्यादि जैसी नायिकाएं हों। जिस सेना में धूमा, बगला, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, बाला, महाकाली, दक्षिणकाली जैसी पराशक्तियाँ हों वह सेना आलस्य, प्रमाद, निकम्मेपन से ग्रसित हो जाय यह तो बड़ी विचित्र बात हुई। माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी की मुख्य सेनापति दंडनाथा की कुछ समझ में नहीं आया वह सीधे उनके पास पहुँची और समस्त क्रियाकलापों का वर्णन किया। दूसरे ही क्षण मुस्कुराते हुए माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने पुनः एक बार दोनों कान पकड़कर अलख निरंजन की तरफ निहारा और देखते ही देखते अलख निरंजन में से असंख्य मुख असंख्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त: हाथ लिए हुए, मुण्डमाला धारण किए हुए, घोर अट्ठाहास करते हुए, रक्त वर्ण के महागणपति प्रकट हो गये। वे सीधे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ पर भंडासुर के सेनापति ने महाविघ्नेश यंत्र स्थापित कर रखा था अपने दंत घात से उन्होंने उस यंत्र को चूर चूर कर दिया तत्पश्चात् माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी के साथ मिलकर कुछ ही क्षणों में उन्होंने भंडासुर का समस्त सेना के साथ संहार कर डाला और इस प्रकार महागणपति की उत्पत्ति हुई।
(क्रमशः)
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शंकरं प्रेमपिण्डम् (२)
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महागणपति का पूजन भगवती त्रिपुरसुन्दरी के साथ सम्पन्न किया जाता है, भंडासुर युद्ध के समय शायद भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने भी गलती कर दी थी वे गणपति को केवल पुत्र समझ बैठी थीं जबकि वे अलख निरंजन हैं,पूर्ण हैं । त्रिपुर वध के समय शिव से भी भूल हो गई वे भी गणपति का पूजन करना भूल गये थे इसलिए उनका पाशुपतास्त्र लक्ष्य को निर्मूल नहीं कर पा रहा था एवं उनकी सेना पराजित हो रही थी,उनका दिव्य रथ भी कि समस्त देवता के अंशों से बना था,जिसमें कि समस्त देवता पशु रूप में विद्यमान थे चल ही नहीं पा रहा था। शिव का एक नाम पशुपति भी है अर्थात सभी पशुओं के पति,पशु बने देवगणों से सुसज्जित रथ की कभी कील निकल जाती थी, पहिया अलग हो जाते थे,कभी वह उनके भार को सहन नहीं कर पाता था आखिरकार शिव को अपनी गलती का एहसास हुआ उन्होंने अलख निरंजन से उत्पन्न परम पशु स्वरूप धारण किए हुए गणपति के सामने दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न की तब जाकर वे महापाशुपत अनुसंधान में सफल हुए और पशुपति के रूप में सुपूजित हुए।
कितनी रहस्यमय स्थिति है पशुओं का पति बनने के लिए पशु मुख धारण किए हुए अलख निरंजन की उपासना । पशुत्व भी सिद्ध नहीं होता गणेशोपासना के अभाव में समुद्र मंथन चल रहा था पर देवता गणपति उपासना भूल गये अतः विघ्न आ गया। मंदराचल पर्वत को उखाड़ने में ही अनेकों देवता लहूलुहान हो गये जैसे ही उसे समुद्र में रखा वह डूबने लगा एवं अनेकों देवता दब गये। वासुकी सर्प भी विष उगल रहा था, विष्णु ने पुनः कच्छप रूपी पशु बन मंदराचल पर्वत को सहारा दिया। विष्णु के कच्छप रूपी पशु स्वरूप में ही दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न हो गई। देवताओं को अपनी गलती का एहसास हुआ तब जाकर उन्होंने गणपति उपासना की तब समुद्र मंथन सम्पन्न हुआ। सबने गणपति के श्रीविग्रह के सामने उठक-बैठक लगाई। वामन स्वरूप में श्री विष्णु बलि से पराजित हो रहे थे पुनः एक बार उन्हें दोर्भिकर्ण उपासना करनी पड़ी।
गणेश आदि हैं, अनंत हैं,वे प्रम नाथ हैं, प्रथम के भी प्रथम अलख निरंजन हैं उन्हीं से प्रारम्भ और उन्हीं में अंत यही सृष्टि का सिद्धांत है। अतः प्रत्येक काल प्रारम्भ होने से पूर्व, एक नई सृष्टि होने से पूर्व, एक नया युग प्रारम्भ होने से पूर्व, एक नई कर्म श्रृंखला प्रारम्भ होने से पूर्व मूल का ध्यान आवश्यक है,मूलोपासना आवश्यक है। श्रीहरि ने मात्र सुदर्शन चक्र प्राप्ति हेतु अनेक वर्षों तक शिव की घोर उपासना की, अनेक विधियों से शिवोपासना की पर हर बार कुछ न कुछ विघ्न आ जाता था। एक बार उन्होंने शिव जी को प्रसन्न करने हेतु एक हजार कमल पुष्पों से पूजा करने का संकल्प लिया परन्तु उसमें भी विघ्न आ गया। विघ्नेश्वर ने एक कमल पुष्प गायब कर दिया,श्रीहरि ने अपने कमल नयन निकाल कर ही शिव को अर्पित कर दिए। दोनों कान पकड़कर श्रीगणेश के सामने दोर्भिकर्ण उपासना की अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी तब जाकर उन्हें सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ। मधु-कैटभ वध में असफल होने के बाद श्रीहरि को दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न करनी पड़ी तब जाकर महामाया उनके साथ क्रियाशील हुईं। चण्ड-मुण्ड वध के समय, शुम्भ-निशुम्भ वध के समय शक्तियों को भी श्रीगणेश उपासना सम्पन्न करनी पड़ी तभी उन्हें सफलता मिली।
ब्रह्मा जी अचानक स्वप्न अवस्था में आ गये स्वप्न में उन्होंने महाप्रलय होते देखा । उनकी बनाई हुई सृष्टि प्रलय को प्राप्त हो रही थी, चारों तरफ अथाह जल ही जल था परन्तु तभी उन्हें वटवृक्ष के पत्ते के ऊपर बाल्य गणेश दिखाई दिए एवं उन्होंने अपने शुण्डाग्र में समुद्र का जल भरकर ब्रह्मा जी के ऊपर उछाल दिया और ब्रह्मा जी अचानक चैतन्यवान हो उठे और मुस्कुरा दिए। वे समझ गये कि श्रीगणेश प्रलय से भी परे हैं। प्रलय के समय गणपति सूक्ष्म हो जाते हैं और प्रलय उपरांत पुनः क्रियाशील हो उठते हैं। विघ्न, गणेश के साथ चलते हैं। दिव्य कैलाश पर शिव ध्यानस्थ थे अलख निरंजन की दिव्य ज्योति में तभी सभी देवताओं ने दिव्य कैलाश पर आकर गुहार लगानी शुरु की कि हे शिव कुछ उत्पन्न कीजिए,ऐसा कुछ जो कि असुरों की गति को रोक सके,उनके बल को क्षीण कर सके,हम उनसे पीड़ित हैं, प्रताड़ित हैं।अचानक शिव के हृदय में स्फूरणा हुई और देखते ही देखते एक सुन्दर बालक उनकी गोद में आ बैठा सीधे अलख निरंजन से निकलकर तभी आद्या आ गईं।
बाला ने बालक नहीं देखा था, ये कौन तीसरा आ गया हम दोनों के बीच ? बस विघ्न उत्पन्न हो गया शिव और शिवा के बीच। शिव की गोद में तो मैं ही बैठती हूँ शिवांगी बनकर, शिव की अर्धांगिनी तो मैं ही हूँ, ये कौन उनके अंग में विराजित हो गया ? जब मैं त्रिपुर सुन्दरी होती हूँ तो उनकी नाभि से निकले कमल पर स्थापित हो जाती जब मैं महाकाली होती हूँ तो इनकी छाती पर सवार होती हूँ,जब मैं त्रिपुरा होती हूँ तो इनके
(क्रमशः)
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महागणपति का पूजन भगवती त्रिपुरसुन्दरी के साथ सम्पन्न किया जाता है, भंडासुर युद्ध के समय शायद भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने भी गलती कर दी थी वे गणपति को केवल पुत्र समझ बैठी थीं जबकि वे अलख निरंजन हैं,पूर्ण हैं । त्रिपुर वध के समय शिव से भी भूल हो गई वे भी गणपति का पूजन करना भूल गये थे इसलिए उनका पाशुपतास्त्र लक्ष्य को निर्मूल नहीं कर पा रहा था एवं उनकी सेना पराजित हो रही थी,उनका दिव्य रथ भी कि समस्त देवता के अंशों से बना था,जिसमें कि समस्त देवता पशु रूप में विद्यमान थे चल ही नहीं पा रहा था। शिव का एक नाम पशुपति भी है अर्थात सभी पशुओं के पति,पशु बने देवगणों से सुसज्जित रथ की कभी कील निकल जाती थी, पहिया अलग हो जाते थे,कभी वह उनके भार को सहन नहीं कर पाता था आखिरकार शिव को अपनी गलती का एहसास हुआ उन्होंने अलख निरंजन से उत्पन्न परम पशु स्वरूप धारण किए हुए गणपति के सामने दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न की तब जाकर वे महापाशुपत अनुसंधान में सफल हुए और पशुपति के रूप में सुपूजित हुए।
कितनी रहस्यमय स्थिति है पशुओं का पति बनने के लिए पशु मुख धारण किए हुए अलख निरंजन की उपासना । पशुत्व भी सिद्ध नहीं होता गणेशोपासना के अभाव में समुद्र मंथन चल रहा था पर देवता गणपति उपासना भूल गये अतः विघ्न आ गया। मंदराचल पर्वत को उखाड़ने में ही अनेकों देवता लहूलुहान हो गये जैसे ही उसे समुद्र में रखा वह डूबने लगा एवं अनेकों देवता दब गये। वासुकी सर्प भी विष उगल रहा था, विष्णु ने पुनः कच्छप रूपी पशु बन मंदराचल पर्वत को सहारा दिया। विष्णु के कच्छप रूपी पशु स्वरूप में ही दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न हो गई। देवताओं को अपनी गलती का एहसास हुआ तब जाकर उन्होंने गणपति उपासना की तब समुद्र मंथन सम्पन्न हुआ। सबने गणपति के श्रीविग्रह के सामने उठक-बैठक लगाई। वामन स्वरूप में श्री विष्णु बलि से पराजित हो रहे थे पुनः एक बार उन्हें दोर्भिकर्ण उपासना करनी पड़ी।
गणेश आदि हैं, अनंत हैं,वे प्रम नाथ हैं, प्रथम के भी प्रथम अलख निरंजन हैं उन्हीं से प्रारम्भ और उन्हीं में अंत यही सृष्टि का सिद्धांत है। अतः प्रत्येक काल प्रारम्भ होने से पूर्व, एक नई सृष्टि होने से पूर्व, एक नया युग प्रारम्भ होने से पूर्व, एक नई कर्म श्रृंखला प्रारम्भ होने से पूर्व मूल का ध्यान आवश्यक है,मूलोपासना आवश्यक है। श्रीहरि ने मात्र सुदर्शन चक्र प्राप्ति हेतु अनेक वर्षों तक शिव की घोर उपासना की, अनेक विधियों से शिवोपासना की पर हर बार कुछ न कुछ विघ्न आ जाता था। एक बार उन्होंने शिव जी को प्रसन्न करने हेतु एक हजार कमल पुष्पों से पूजा करने का संकल्प लिया परन्तु उसमें भी विघ्न आ गया। विघ्नेश्वर ने एक कमल पुष्प गायब कर दिया,श्रीहरि ने अपने कमल नयन निकाल कर ही शिव को अर्पित कर दिए। दोनों कान पकड़कर श्रीगणेश के सामने दोर्भिकर्ण उपासना की अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी तब जाकर उन्हें सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ। मधु-कैटभ वध में असफल होने के बाद श्रीहरि को दोर्भिकर्ण उपासना सम्पन्न करनी पड़ी तब जाकर महामाया उनके साथ क्रियाशील हुईं। चण्ड-मुण्ड वध के समय, शुम्भ-निशुम्भ वध के समय शक्तियों को भी श्रीगणेश उपासना सम्पन्न करनी पड़ी तभी उन्हें सफलता मिली।
ब्रह्मा जी अचानक स्वप्न अवस्था में आ गये स्वप्न में उन्होंने महाप्रलय होते देखा । उनकी बनाई हुई सृष्टि प्रलय को प्राप्त हो रही थी, चारों तरफ अथाह जल ही जल था परन्तु तभी उन्हें वटवृक्ष के पत्ते के ऊपर बाल्य गणेश दिखाई दिए एवं उन्होंने अपने शुण्डाग्र में समुद्र का जल भरकर ब्रह्मा जी के ऊपर उछाल दिया और ब्रह्मा जी अचानक चैतन्यवान हो उठे और मुस्कुरा दिए। वे समझ गये कि श्रीगणेश प्रलय से भी परे हैं। प्रलय के समय गणपति सूक्ष्म हो जाते हैं और प्रलय उपरांत पुनः क्रियाशील हो उठते हैं। विघ्न, गणेश के साथ चलते हैं। दिव्य कैलाश पर शिव ध्यानस्थ थे अलख निरंजन की दिव्य ज्योति में तभी सभी देवताओं ने दिव्य कैलाश पर आकर गुहार लगानी शुरु की कि हे शिव कुछ उत्पन्न कीजिए,ऐसा कुछ जो कि असुरों की गति को रोक सके,उनके बल को क्षीण कर सके,हम उनसे पीड़ित हैं, प्रताड़ित हैं।अचानक शिव के हृदय में स्फूरणा हुई और देखते ही देखते एक सुन्दर बालक उनकी गोद में आ बैठा सीधे अलख निरंजन से निकलकर तभी आद्या आ गईं।
बाला ने बालक नहीं देखा था, ये कौन तीसरा आ गया हम दोनों के बीच ? बस विघ्न उत्पन्न हो गया शिव और शिवा के बीच। शिव की गोद में तो मैं ही बैठती हूँ शिवांगी बनकर, शिव की अर्धांगिनी तो मैं ही हूँ, ये कौन उनके अंग में विराजित हो गया ? जब मैं त्रिपुर सुन्दरी होती हूँ तो उनकी नाभि से निकले कमल पर स्थापित हो जाती जब मैं महाकाली होती हूँ तो इनकी छाती पर सवार होती हूँ,जब मैं त्रिपुरा होती हूँ तो इनके
(क्रमशः)
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गणेश चतुर्थी 2022
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👉🏻 गणेश चतुर्थी का व्रत एवं पूजन 31 अगस्त 2022 को है । ‘इस दिन स्नान, दान, जप और उपवास करने से 100 गुना फल होता है ।’ (भविष्यपुराण)
👉🏻 भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (कलंकी चौथ) को चन्द्रदर्शन करने से मिथ्या दोष लगता है । इस वर्ष दिनांक 30 अगस्त और 31 अगस्त - दो दिन चन्द्रदर्शन न करें ।
🌹 भारत के विभिन्न शहरों में चन्द्रास्त का समय -
मुम्बई -
30 अगस्त - रात्रि 9-01 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-37 पर
अहमदाबाद -
30 अगस्त - रात्रि 9-00 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-34 पर
जोधपुर -
30 अगस्त - रात्रि 8-58 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-30 पर
जम्मू -
30 अगस्त - रात्रि 8-48 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-16 पर
बेंगलुरु -
30 अगस्त - रात्रि 8-43 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-22 पर
भोपाल -
30 अगस्त - रात्रि 8-41 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-15 पर
नयी दिल्ली -
30 अगस्त - रात्रि 8-40 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-11 पर
हैदराबाद -
30 अगस्त - रात्रि 8-38 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-15 पर
हरिद्वार -
30 अगस्त - रात्रि 8-35 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-06 पर
लखनऊ -
30 अगस्त - रात्रि 8-25 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-57 पर
पटना -
30 अगस्त - रात्रि 8-08 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-41 पर
भुवनेश्वर -
30 अगस्त - रात्रि 8-07 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-43 पर
कलकत्ता -
30 अगस्त - रात्रि 7-56 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-30 पर
गुवाहटी -
30 अगस्त - रात्रि 7-41 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-14 पर
🌹 भूलवश चन्द्रदर्शन हो जाये तो उसका प्रभाव कम करने के लिये -
👉🏻 इस मंत्र का 21, 51 या 108 बार जप करके पवित्र किया हुआ जल पीयें -
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ।।
अर्थ – 'सुंदर सलोने कुमार ! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान् ने उस सिंह का संहार किया है; अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमन्तक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।'
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)
👉🏻 ‘श्रीमद् भागवत’ के 10वें स्कंध के 56-57वें अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक पठन-श्रवण करना चाहिए ।
👉🏻 भाद्रपद शुक्ल तृतीया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए ।
साभार.....
@Sanatan
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👉🏻 गणेश चतुर्थी का व्रत एवं पूजन 31 अगस्त 2022 को है । ‘इस दिन स्नान, दान, जप और उपवास करने से 100 गुना फल होता है ।’ (भविष्यपुराण)
👉🏻 भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (कलंकी चौथ) को चन्द्रदर्शन करने से मिथ्या दोष लगता है । इस वर्ष दिनांक 30 अगस्त और 31 अगस्त - दो दिन चन्द्रदर्शन न करें ।
🌹 भारत के विभिन्न शहरों में चन्द्रास्त का समय -
मुम्बई -
30 अगस्त - रात्रि 9-01 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-37 पर
अहमदाबाद -
30 अगस्त - रात्रि 9-00 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-34 पर
जोधपुर -
30 अगस्त - रात्रि 8-58 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-30 पर
जम्मू -
30 अगस्त - रात्रि 8-48 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-16 पर
बेंगलुरु -
30 अगस्त - रात्रि 8-43 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-22 पर
भोपाल -
30 अगस्त - रात्रि 8-41 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-15 पर
नयी दिल्ली -
30 अगस्त - रात्रि 8-40 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-11 पर
हैदराबाद -
30 अगस्त - रात्रि 8-38 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-15 पर
हरिद्वार -
30 अगस्त - रात्रि 8-35 पर
31 अगस्त - रात्रि 9-06 पर
लखनऊ -
30 अगस्त - रात्रि 8-25 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-57 पर
पटना -
30 अगस्त - रात्रि 8-08 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-41 पर
भुवनेश्वर -
30 अगस्त - रात्रि 8-07 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-43 पर
कलकत्ता -
30 अगस्त - रात्रि 7-56 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-30 पर
गुवाहटी -
30 अगस्त - रात्रि 7-41 पर
31 अगस्त - रात्रि 8-14 पर
🌹 भूलवश चन्द्रदर्शन हो जाये तो उसका प्रभाव कम करने के लिये -
👉🏻 इस मंत्र का 21, 51 या 108 बार जप करके पवित्र किया हुआ जल पीयें -
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ।।
अर्थ – 'सुंदर सलोने कुमार ! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान् ने उस सिंह का संहार किया है; अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमन्तक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।'
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)
👉🏻 ‘श्रीमद् भागवत’ के 10वें स्कंध के 56-57वें अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक पठन-श्रवण करना चाहिए ।
👉🏻 भाद्रपद शुक्ल तृतीया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए ।
साभार.....
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वेदोक्त श्री गणपति पूजन
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श्री गणेश जी वैदिक देवता हैं और आर्यावर्त में उनका पूजन अनादि काल से चला आ रहा है कोई भी मंगलकार्य हो सर्वप्रथम श्री गणेश का ही पूजन किया जाता है ताकि अभीष्ट सिद्धि में किसी प्रकार का विघ्न उत्पन्न न हो। सनातन धर्म में कोई भी कार्य आरम्भ करने से पूर्व श्री गणेश जी का स्मरण अवश्य किया जाता है। कलियुग में भगवान गणपति का पूजन पूर्ण श्रद्धा व भक्ति पूर्वक करने से वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं और साधक की मनोकामना पूर्ण कर देते हैं। यहाँ वैदिक विधि से श्री गणेश जी के पूजन का वर्णन किया जा रहा है जिसे साधक सरलता के साथ सम्पन्न कर सकते हैं।
पूजन विधान
पूजन विधान साधक को चाहिए कि वह पूजन आरम्भ करने से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर पूजन के लिए आवश्यक समस्त सामग्री जैसे जल, अक्षत, कुंकुम, हल्दी, चन्दन, सिन्दूर यज्ञोपवीत, पुष्प, धूप, दीप, कपूर, सुपारी, मौली, दूध, दही पंचामृत आदि अपने पास रख लें ताकि पूजन के दौरान बार-बार उठना न पड़े तत्पश्चात शुद्ध आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। अपने सम्मुख श्री गणेश जी के स्थापन हेतु चौकी रखें। चौकी में आधार शक्ति की पूजा करके पायों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य की एवं चारों दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य व अनैश्वर्य की पूजा करें तत्पश्चात चौकी में आसन हेतु पुष्प रखकर उस पर श्री गणेश जी की प्रतिमा या यंत्र स्थापित करें। प्रतिमा व यंत्र के अभाव में एक पात्र में हल्दी से रंगे चावल भरकर उसमें मौली लिपटी हुयी सुपारी स्थापित कर उसी में श्री गणेश जी की भावना करें। सर्वप्रथम घी का दीपक जलाकर चौकी के दाहिनी ओर अक्षत के ऊपर रखें “ ॐ दीप ज्योतिषे नमः " इस मंत्र के साथ गंध पुष्प से उसका पूजन करें फिर दोनों हाथ जोड़कर निम्रानुसार प्रार्थना करें
भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् ।
यावत् कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
तदन्तर निम्नांकित मंत्रों को पढ़कर तीन बार आचमन करें
ॐ केशवाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः ॥
फिर 'ॐ हृषीकेशाय नमः' कहकर हाथ धो लें और दाहिने हाथ में कुश की पवित्री धारण करें। उस समय इस मंत्र का पाठ करें।
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
इस प्रकार पवित्री धारण करने के बाद तीन बार प्राणायाम करें। तत्पश्चात
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥
यह मंत्र पढ़कर अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री पर जल छिड़कें। इसके बाद निम्नलिखित मंगल मंत्रों का पाठ करें-
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः ।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्राययुवो रक्षितारो दिवे दिवे ॥
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतांदेवाना रातिरभि नो निवर्तताम् ।देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे ॥
तानन् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्त्रिधम् । अर्यमणं वरुणसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥
तन्नो वातो मयोभुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः । तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना श्रृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदधेषु जग्मयः । अग्निजिह्य मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥
शतमित्रु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ।।
द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः।
शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥ .
(क्रमशः)
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श्री गणेश जी वैदिक देवता हैं और आर्यावर्त में उनका पूजन अनादि काल से चला आ रहा है कोई भी मंगलकार्य हो सर्वप्रथम श्री गणेश का ही पूजन किया जाता है ताकि अभीष्ट सिद्धि में किसी प्रकार का विघ्न उत्पन्न न हो। सनातन धर्म में कोई भी कार्य आरम्भ करने से पूर्व श्री गणेश जी का स्मरण अवश्य किया जाता है। कलियुग में भगवान गणपति का पूजन पूर्ण श्रद्धा व भक्ति पूर्वक करने से वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं और साधक की मनोकामना पूर्ण कर देते हैं। यहाँ वैदिक विधि से श्री गणेश जी के पूजन का वर्णन किया जा रहा है जिसे साधक सरलता के साथ सम्पन्न कर सकते हैं।
पूजन विधान
पूजन विधान साधक को चाहिए कि वह पूजन आरम्भ करने से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर पूजन के लिए आवश्यक समस्त सामग्री जैसे जल, अक्षत, कुंकुम, हल्दी, चन्दन, सिन्दूर यज्ञोपवीत, पुष्प, धूप, दीप, कपूर, सुपारी, मौली, दूध, दही पंचामृत आदि अपने पास रख लें ताकि पूजन के दौरान बार-बार उठना न पड़े तत्पश्चात शुद्ध आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। अपने सम्मुख श्री गणेश जी के स्थापन हेतु चौकी रखें। चौकी में आधार शक्ति की पूजा करके पायों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य की एवं चारों दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य व अनैश्वर्य की पूजा करें तत्पश्चात चौकी में आसन हेतु पुष्प रखकर उस पर श्री गणेश जी की प्रतिमा या यंत्र स्थापित करें। प्रतिमा व यंत्र के अभाव में एक पात्र में हल्दी से रंगे चावल भरकर उसमें मौली लिपटी हुयी सुपारी स्थापित कर उसी में श्री गणेश जी की भावना करें। सर्वप्रथम घी का दीपक जलाकर चौकी के दाहिनी ओर अक्षत के ऊपर रखें “ ॐ दीप ज्योतिषे नमः " इस मंत्र के साथ गंध पुष्प से उसका पूजन करें फिर दोनों हाथ जोड़कर निम्रानुसार प्रार्थना करें
भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् ।
यावत् कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
तदन्तर निम्नांकित मंत्रों को पढ़कर तीन बार आचमन करें
ॐ केशवाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः ॥
फिर 'ॐ हृषीकेशाय नमः' कहकर हाथ धो लें और दाहिने हाथ में कुश की पवित्री धारण करें। उस समय इस मंत्र का पाठ करें।
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
इस प्रकार पवित्री धारण करने के बाद तीन बार प्राणायाम करें। तत्पश्चात
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥
यह मंत्र पढ़कर अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री पर जल छिड़कें। इसके बाद निम्नलिखित मंगल मंत्रों का पाठ करें-
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः ।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्राययुवो रक्षितारो दिवे दिवे ॥
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतांदेवाना रातिरभि नो निवर्तताम् ।देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे ॥
तानन् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्त्रिधम् । अर्यमणं वरुणसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥
तन्नो वातो मयोभुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः । तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना श्रृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदधेषु जग्मयः । अग्निजिह्य मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥
शतमित्रु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ।।
द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः।
शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥ .
(क्रमशः)
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वेदोक्त श्री गणपति पूजन (२)
सुशान्तिर्भवतु।श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातापितृभ्यां नमः।इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः।ग्राम देवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः।स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः। विश्वेशं माधवं दुण्ढि दण्डपाणिं च भैरवम् ।
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽनिङ्घ्रियुगंस्मरामि ॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नितयाभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।
पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥
सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।
देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः॥
इस प्रकार मङ्गल पाठ के अनन्तर पवित्रीयुक्त हाथ में जल, अक्षत और द्रव्य लेकर निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए संकल्प करें।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूलों के जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतेकदेशे अमुकनगरे अमुकग्रामे स्थाने वा बौद्धावतारे अमुकनामसंवत्सरे श्री सूर्ये अमुकायने अमुकर्ती महामाङ्गल्यप्रदमासोत्तमे मासे अमुकमा अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकयोगे अमुककरणे अमुकराशिस्थितेषु देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा - राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण-विशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुकगोत्र: अमुकशर्मा (अमुकवर्मा अमुकगुप्तः ) अहं ममात्मनः श्रीमहागणपतिप्रीत्यर्थं यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये ।
इस प्रकार संकल्प पढ़कर हस्तगत जलाक्षत-द्रव्य किसी भूमिगत पात्र में छोड़ दें। तत्पश्चात गणपति पूजन आरम्भ करें। सबसे पहले निम्नांकित श्लोकों के अनुसार गणेश के स्वरूप का चिन्तन करते हुए उनका आवाहन करें।
आवाहन
हे हेरम्ब त्वमेोहि ह्यम्बिकात्र्यम्बकात्मज ।
सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षलाभ पितुः पितः ॥
नागास्यं नागहारं तवां गणराजं चतुर्भुजम् ।
भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः ॥
आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थं च मम क्रतोः ।
इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे ॥
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम ॥
आहमजानि गर्भध्मा त्वमजासि गर्भधम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि स्थापयामि ।
प्रतिष्ठापन
आवाहन के पश्चात् देवता का प्रतिष्ठापन करें।
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोतवरिष्टं यज्ञसमिमं दधातु ।
विश्वेदेवास इह मादयन्तामो इह प्रतिष्ठ ।।
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
सिद्धिबुद्धिसहित गणपते सुप्रतिष्ठतो वरदो भव ।
आसन अर्पण
इसके बाद निम्नलिखित मंत्र पढ़कर दिव्य सिंहासन की भावना से पुष्प अर्पित करें
विचित्ररत्नरचितं दिव्यास्तरणसंयुतम् ।
स्वर्णसिंहासनं चारुगृह्णीष्व सुरपूजित ॥
ॐ पुरुष एवेद सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आसनं समर्पयामि ।
इसके बाद निम्नांकित मंत्र से गणेश जी के पाद प्रक्षालन के लिये पाद्य अर्पित करें
ॐ सर्वतीर्थसमुद्धतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम ।
विघ्नराज गृहाणेदं भगवन् भक्तवत्सल ॥
ॐ एतावानस्य महिमातो जयायांश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।.
(क्रमशः)
@Sanatan
सुशान्तिर्भवतु।श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातापितृभ्यां नमः।इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः।ग्राम देवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः।स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः। विश्वेशं माधवं दुण्ढि दण्डपाणिं च भैरवम् ।
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽनिङ्घ्रियुगंस्मरामि ॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नितयाभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।
पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥
सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।
देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः॥
इस प्रकार मङ्गल पाठ के अनन्तर पवित्रीयुक्त हाथ में जल, अक्षत और द्रव्य लेकर निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए संकल्प करें।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूलों के जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतेकदेशे अमुकनगरे अमुकग्रामे स्थाने वा बौद्धावतारे अमुकनामसंवत्सरे श्री सूर्ये अमुकायने अमुकर्ती महामाङ्गल्यप्रदमासोत्तमे मासे अमुकमा अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकयोगे अमुककरणे अमुकराशिस्थितेषु देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा - राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण-विशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुकगोत्र: अमुकशर्मा (अमुकवर्मा अमुकगुप्तः ) अहं ममात्मनः श्रीमहागणपतिप्रीत्यर्थं यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये ।
इस प्रकार संकल्प पढ़कर हस्तगत जलाक्षत-द्रव्य किसी भूमिगत पात्र में छोड़ दें। तत्पश्चात गणपति पूजन आरम्भ करें। सबसे पहले निम्नांकित श्लोकों के अनुसार गणेश के स्वरूप का चिन्तन करते हुए उनका आवाहन करें।
आवाहन
हे हेरम्ब त्वमेोहि ह्यम्बिकात्र्यम्बकात्मज ।
सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षलाभ पितुः पितः ॥
नागास्यं नागहारं तवां गणराजं चतुर्भुजम् ।
भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः ॥
आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थं च मम क्रतोः ।
इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे ॥
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम ॥
आहमजानि गर्भध्मा त्वमजासि गर्भधम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि स्थापयामि ।
प्रतिष्ठापन
आवाहन के पश्चात् देवता का प्रतिष्ठापन करें।
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोतवरिष्टं यज्ञसमिमं दधातु ।
विश्वेदेवास इह मादयन्तामो इह प्रतिष्ठ ।।
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
सिद्धिबुद्धिसहित गणपते सुप्रतिष्ठतो वरदो भव ।
आसन अर्पण
इसके बाद निम्नलिखित मंत्र पढ़कर दिव्य सिंहासन की भावना से पुष्प अर्पित करें
विचित्ररत्नरचितं दिव्यास्तरणसंयुतम् ।
स्वर्णसिंहासनं चारुगृह्णीष्व सुरपूजित ॥
ॐ पुरुष एवेद सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आसनं समर्पयामि ।
इसके बाद निम्नांकित मंत्र से गणेश जी के पाद प्रक्षालन के लिये पाद्य अर्पित करें
ॐ सर्वतीर्थसमुद्धतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम ।
विघ्नराज गृहाणेदं भगवन् भक्तवत्सल ॥
ॐ एतावानस्य महिमातो जयायांश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।.
(क्रमशः)
@Sanatan
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वेदोक्त श्री गणपति पूजन (३)
--------------------------------
अर्घ्यदान
तदनन्तर गन्ध आदि से युक्त अर्घ्यजल अर्पित करें और निम्नांकित मंत्र पढ़ें
ॐ गणाध्यक्ष नमस्तेऽस्तु गृहाण करुणाकर ।
अर्घ्यं च फलसंयुक्तं गन्धमाल्याक्षतैर्युतम् ॥
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि ।
आचमनीय-अर्पण
इसके अनन्तर गंगाजल से आचमन करायें और नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करें
विनायक नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दित ।
गङ्गोदकेन देवेश कुरुष्वाचमनं प्रभो ॥
ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
स्नानीय समर्पण
तदनन्तर नीचे दिये हुए मंत्र को बोलकर गंगाजल से स्नान कराने की भावना से स्नानीय जल अर्पित करें
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् ।
तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भूतं पृषदाज्यम् ।
पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, सर्वाङ्गे स्नानं समर्पयामि ।
पञ्चामृत स्नान
इसके बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर पंचामृत से गणपतिदेव को स्नान करायें
पञ्चामृतं मयाऽनीतं पयो दधि घृतं मधु ।
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपियन्ति सस्त्रोतसः ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि ।
पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।
इसके बाद दूध दही आदि से पृथक् पृथक् स्नान कराकर शुद्ध जल से भी स्नान कराना चाहिये। दूध से स्नान कराने के लिए मंत्र निम्नलिखित है
पयः स्नान
कामधेनु समुद्धतं सर्वेषां जीवनं परम् ।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥
ॐ पयः पृथिव्याम्पय औषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः । पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पयः स्नानं समर्पयामि ।
पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
दधि स्नान
पयसस्तु समुद्धतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।
दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वरय वाजिनः ।
सुरभि नो मुखा करत् प्राण आयुषि तारिषत् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दधिस्त्रानं समर्पयामि।
दधिस्त्रानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ॥
घृत-स्त्रान
नवनीतसमुत्पन्नं सर्व संतोषकारकम् ।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ घृतं मिमिखे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम। अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, घृतस्त्रानं समर्पयामि । घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।।
मधु-स्त्रान
पुष्परेणुसमुद्धतं सुस्वादु मधुरं मधु ।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।।
मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्त् पार्थिव रजः ।
मधु द्यौरस्तु नः पिता ।।
मधुमानो वनस्पतिर्मधुमाँs अस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मधुस्नानं समर्पयामि ।
मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
शर्करा - स्नान
इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिदा शुभा ।
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ अपारसमुद्वयस सूर्ये सन्त समाहितम् ।
अपाँ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः शर्करास्त्रानं समर्पयामि ।
इसके बाद सुगन्धित इत्र या अन्य द्रव्य (अल्कोहल रहित) आदि अर्पित करें
माङ्गलिक स्नान (सुवासित तैल या इत्र)
चम्पकाशोकबकु लमालतीमोगरादिभिः ।
वासितं स्त्रिग्धाहेतुतैलं चारु प्रगृह्यताम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः सुवासितं तैलं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नान
तदनन्तर गंगाजल या तीर्थ जल से शुद्ध स्नान करायें।
गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदा सिन्धुः कावेरी स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन ।
महेरणाय चक्षसे ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।
वस्त्र - समर्पण
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम् ।
देहालंकरणं वस्त्रमतः शान्तिः प्रयच्छ मे ॥
ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः ।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्योऽ मनसा देवयन्तः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, वस्त्रं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आचमनं समर्पयामि । .
(क्रमशः)
@Sanatan
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अर्घ्यदान
तदनन्तर गन्ध आदि से युक्त अर्घ्यजल अर्पित करें और निम्नांकित मंत्र पढ़ें
ॐ गणाध्यक्ष नमस्तेऽस्तु गृहाण करुणाकर ।
अर्घ्यं च फलसंयुक्तं गन्धमाल्याक्षतैर्युतम् ॥
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि ।
आचमनीय-अर्पण
इसके अनन्तर गंगाजल से आचमन करायें और नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करें
विनायक नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दित ।
गङ्गोदकेन देवेश कुरुष्वाचमनं प्रभो ॥
ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
स्नानीय समर्पण
तदनन्तर नीचे दिये हुए मंत्र को बोलकर गंगाजल से स्नान कराने की भावना से स्नानीय जल अर्पित करें
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् ।
तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भूतं पृषदाज्यम् ।
पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, सर्वाङ्गे स्नानं समर्पयामि ।
पञ्चामृत स्नान
इसके बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर पंचामृत से गणपतिदेव को स्नान करायें
पञ्चामृतं मयाऽनीतं पयो दधि घृतं मधु ।
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपियन्ति सस्त्रोतसः ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि ।
पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।
इसके बाद दूध दही आदि से पृथक् पृथक् स्नान कराकर शुद्ध जल से भी स्नान कराना चाहिये। दूध से स्नान कराने के लिए मंत्र निम्नलिखित है
पयः स्नान
कामधेनु समुद्धतं सर्वेषां जीवनं परम् ।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥
ॐ पयः पृथिव्याम्पय औषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः । पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पयः स्नानं समर्पयामि ।
पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
दधि स्नान
पयसस्तु समुद्धतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।
दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वरय वाजिनः ।
सुरभि नो मुखा करत् प्राण आयुषि तारिषत् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दधिस्त्रानं समर्पयामि।
दधिस्त्रानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ॥
घृत-स्त्रान
नवनीतसमुत्पन्नं सर्व संतोषकारकम् ।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ घृतं मिमिखे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम। अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, घृतस्त्रानं समर्पयामि । घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।।
मधु-स्त्रान
पुष्परेणुसमुद्धतं सुस्वादु मधुरं मधु ।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।।
मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्त् पार्थिव रजः ।
मधु द्यौरस्तु नः पिता ।।
मधुमानो वनस्पतिर्मधुमाँs अस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मधुस्नानं समर्पयामि ।
मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
शर्करा - स्नान
इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिदा शुभा ।
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ अपारसमुद्वयस सूर्ये सन्त समाहितम् ।
अपाँ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः शर्करास्त्रानं समर्पयामि ।
इसके बाद सुगन्धित इत्र या अन्य द्रव्य (अल्कोहल रहित) आदि अर्पित करें
माङ्गलिक स्नान (सुवासित तैल या इत्र)
चम्पकाशोकबकु लमालतीमोगरादिभिः ।
वासितं स्त्रिग्धाहेतुतैलं चारु प्रगृह्यताम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः सुवासितं तैलं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नान
तदनन्तर गंगाजल या तीर्थ जल से शुद्ध स्नान करायें।
गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदा सिन्धुः कावेरी स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन ।
महेरणाय चक्षसे ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शुद्धोदकस्त्रानं समर्पयामि ।
वस्त्र - समर्पण
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम् ।
देहालंकरणं वस्त्रमतः शान्तिः प्रयच्छ मे ॥
ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः ।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्योऽ मनसा देवयन्तः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, वस्त्रं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आचमनं समर्पयामि । .
(क्रमशः)
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वेदोक्त श्री गणपति पूजन (४)
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उपवस्त्र (उत्तरीय) समर्पण
उत्तरीयं तथा देव नानाचित्रितमुत्तमम् ।
गृहाणेदं मया भक्त्या दत्तं तत् सफलीकुरु ॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः ।
वासो अग्ने विश्वरूप संव्ययस्व विभावसो ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः उपवस्त्रं समर्पयामि तदन्ते आचमनीयं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः वस्त्रोपवस्त्रार्थे रक्तसूत्रं समर्पयामि ।
अलंकरण
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः अलंकरणार्थमक्षतान् समर्पयामि ।
यज्ञोपवीत समर्पण
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् ।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रय्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आचमनं समर्पयामि।
गन्ध
श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ त्वा गन्धर्वा अखनस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः ।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः गन्धं समर्पयामि ।
अक्षत
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत ।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, अक्षतान् समर्पयामि ।
पुष्प माला
माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो ।
मयाहृतानि पुष्पाणि गृह्यन्तां पूजनाय भोः ॥
ॐ औषधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवृतीः प्रसूवरीः ।
अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः पुष्पमालां समर्पयामि ।
मन्दारपुष्प
वन्दारु जनमन्दार मन्दारप्रिय धीपते ।
मन्दारजानि पुष्पाणि श्वेतार्कादीन्युपेहि भोः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः मन्दारपुष्पाणि समर्पयामि ।
शमी पत्र
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै ।
शमीदलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक ॥
ॐ य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी ।
शमीभिर्यज्ञमाशत ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शमीपत्राणि समर्पयामि ।
दूर्वाङ्कुर
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक ॥
ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि ।
एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि।
सिन्दूर
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम ।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वानप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दर्मिभिः पिन्वमानः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः सिन्दूरं समर्पयामि ।
नाना परिमलद्रव्य, अबीर - चूर्ण नानापरिमलैर्द्रव्यैर्निर्मितं चूर्णमुत्तमम् ।
अबीरनामकं चूर्ण गन्धढ्यं चारु गृह्यताम् ।।
ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमासं परिपातु विश्वतः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि ।
दशाङ्ग धूप
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
आर्घेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धृर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः ।
देवानामसि वह्नितम सस्त्रितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः धूपमाघ्रापयामि ।
दीप-दर्शन
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया ।
दीपं गृहाण देवेश त्रेलोक्यतिमिरापहम् ॥
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने ।
त्राहि मां निरयाद् घोराद्दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥
ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा ।
अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा । ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दीपं दर्शयामि।
नैवेद्य-निवेदन
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ।
ईप्सितं मे स्वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च ।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्ष शीष्ण द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँऽ अकल्पयन् ॥
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, आचमनीयं मध्ये पानीयं उत्तरापोशनं च समर्पयामि
करोद्वर्तन के लिये चन्दन
ॐ चन्दनं मलयोद्भूतं कस्तूर्यादिसमन्वितम् ।
करोद्वर्तनकं देव गृहाण परमेश्वर ॥
अशुना ते अंशुः पृच्यतां परुषा परुः ।
गनधस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः ॥ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः,चन्दनेन करोद्वर्तनं समर्पयामि । .
क्रमशः
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उपवस्त्र (उत्तरीय) समर्पण
उत्तरीयं तथा देव नानाचित्रितमुत्तमम् ।
गृहाणेदं मया भक्त्या दत्तं तत् सफलीकुरु ॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः ।
वासो अग्ने विश्वरूप संव्ययस्व विभावसो ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः उपवस्त्रं समर्पयामि तदन्ते आचमनीयं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः वस्त्रोपवस्त्रार्थे रक्तसूत्रं समर्पयामि ।
अलंकरण
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः अलंकरणार्थमक्षतान् समर्पयामि ।
यज्ञोपवीत समर्पण
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् ।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रय्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः आचमनं समर्पयामि।
गन्ध
श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ त्वा गन्धर्वा अखनस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः ।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः गन्धं समर्पयामि ।
अक्षत
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत ।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ।।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, अक्षतान् समर्पयामि ।
पुष्प माला
माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो ।
मयाहृतानि पुष्पाणि गृह्यन्तां पूजनाय भोः ॥
ॐ औषधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवृतीः प्रसूवरीः ।
अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः पुष्पमालां समर्पयामि ।
मन्दारपुष्प
वन्दारु जनमन्दार मन्दारप्रिय धीपते ।
मन्दारजानि पुष्पाणि श्वेतार्कादीन्युपेहि भोः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः मन्दारपुष्पाणि समर्पयामि ।
शमी पत्र
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै ।
शमीदलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक ॥
ॐ य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी ।
शमीभिर्यज्ञमाशत ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शमीपत्राणि समर्पयामि ।
दूर्वाङ्कुर
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक ॥
ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि ।
एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि।
सिन्दूर
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम ।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वानप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दर्मिभिः पिन्वमानः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः सिन्दूरं समर्पयामि ।
नाना परिमलद्रव्य, अबीर - चूर्ण नानापरिमलैर्द्रव्यैर्निर्मितं चूर्णमुत्तमम् ।
अबीरनामकं चूर्ण गन्धढ्यं चारु गृह्यताम् ।।
ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमासं परिपातु विश्वतः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि ।
दशाङ्ग धूप
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
आर्घेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धृर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः ।
देवानामसि वह्नितम सस्त्रितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः धूपमाघ्रापयामि ।
दीप-दर्शन
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया ।
दीपं गृहाण देवेश त्रेलोक्यतिमिरापहम् ॥
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने ।
त्राहि मां निरयाद् घोराद्दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥
ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा ।
अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा । ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दीपं दर्शयामि।
नैवेद्य-निवेदन
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ।
ईप्सितं मे स्वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च ।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्ष शीष्ण द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँऽ अकल्पयन् ॥
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, आचमनीयं मध्ये पानीयं उत्तरापोशनं च समर्पयामि
करोद्वर्तन के लिये चन्दन
ॐ चन्दनं मलयोद्भूतं कस्तूर्यादिसमन्वितम् ।
करोद्वर्तनकं देव गृहाण परमेश्वर ॥
अशुना ते अंशुः पृच्यतां परुषा परुः ।
गनधस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः ॥ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः,चन्दनेन करोद्वर्तनं समर्पयामि । .
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