सनातन धर्म • Sanatan Dharma
10.5K subscribers
394 photos
31 videos
19 files
501 links
🙏 Explore ❛ सनातन धर्म • Sanatana Dharma ❜

🕉️ @HinduStuff • @Geeta_HinduStuff
Download Telegram
महाकाल संहिता (२)
=============



जैविक माता (बायोलोजीकल मदर) सिर्फ आदि माता की नकल करती है एवं वह कुछ क्षण के लिए रुद्र से बुद्ध में परिवर्तित कर सकती है जीव को परन्तु आदि माता अर्थात महाकाली के स्तनों से जब जीव लिपटकर दुग्धपान करता है उसके आंचल में सिमट जाता है तभी वह बुद्ध बन पाता है, वह नाथ बन पाता है, वह महाअवधूत बनता है, वह सदैव मुस्कुराता है, सदैव प्रसन्न रहता है, सदैव बलिष्ट रहता है। काली का श्रंगार । नागनाथ उज्जयिनी में घूम रहे थे। सिर फिरे तो थे, चटके हुए तो थे लकड़ी के गट्ठे को साँप की रस्सी बनाकर बांधते थे, सांप बेचारा क्या कर लेता चुपचाप रस्सी बन जाता था। नाम ही उनका नागनाथ था जो काम लेना है सांप से लेंगे, अजगर को वृक्ष की डाली पर बांधकर झूला झूलते थे । अचानक महाकाल वन में महाकाली के मंदिर में पहुँच गये। आ गई लहर नागनाथ के मन में, माँ का सौन्दर्य देख पगला उठे, एक सांप पाँव में बांध दिया, दूसरा दूसरे पाँव में, कमर में भी एक सर्प बांध दिया गले में भी सर्प लटका दिया। एक सर्प का मुकुट बनाकर जैसे ही महाकाली के मस्तक पर रखने लगे कालिका प्रसन्न । सर्पों के श्रंगार से युक्त कालिका की विशाल प्रतिमा में कालि का प्राकट्य हो गया । नागनाथ के बाल्य भाव से महाकाली का ममत्व उमड़ पड़ा उसके विशाल उन्नत स्तनों से दुग्ध धारा बह निकली और नागनाथ का सम्पूर्ण शरीर दुग्धमय हो गया, वह सिद्ध हो गये एवं नाथ से नारायण बन गये।कालिका की जंघा पर बैठ गये पुत्र के समान।

कुछ लोग न्यास, विनियोग, तांत्रोक्त पूजन, मंत्र जप, ये माला, वो माला, ये यंत्र तो वो यंत्र के चक्कर में पड़े रहते हैं। ठीक है तकनीक होनी चाहिए, विधान होना चाहिए परन्तु सिर्फ विधानों से ही काम नहीं चलेगा। विधानों से ऊपर हैं महाकाली और महाकाल किस ग्रंथ में लिखा है कि सर्पों से कालिका का श्रंगार करो, बाणासुर की पूजा पद्धति, रावण की पूजा पद्धति, दत्तात्रेय की पूजन पद्धति किसी वेद में वर्णित नहीं है। शिव को दक्षिणामूर्ति इसलिए कहा, काली को दक्षिण की महारानी इसलिए कहा कि वे वेद वर्णित पूजन के अधीन नहीं है। उनकी कोई पूजन पद्धति नहीं है इसलिए वे महादेव कहलाते हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी धरे रह गये, बड़े-बड़े प्रवचनकर्ता बकवास करते रह गये पर एक अनाड़ी ने महाकाल और महाकाली की प्राप्त कर लिया।

कोई नहीं समझ सकता इनके खेल को विक्रमादित्य क्या थे? ग्वाले के यहाँ पले थे। थे तो क्षत्रीय पर ग्वालों के यहाँ । भर्तृहरि क्या थे? ये तो कुम्हार के घर पले बड़े थे, गधे पर बैठते थे परन्तु थे सूर्य पुत्र सूर्य उर्वशी नामक अप्सरा पर मोहित हो गये, उर्वशी सूर्य से बचकर भागी परन्तु सूर्य का वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य के एक हिस्से से भर्तृहरि का जन्म हुआ और पालन पोषण हुआ कुम्हार के घर । भर्तृहरि पशु-पक्षियों की बोली समझते थे विक्रमादित्य को बता दिया कि सियारों के इस वक्त चिल्लाने का मतलब है शत्रु आक्रमण करने वाला है। विक्रमादित्य उनकी इस अद्भुत क्षमता से प्रसन्न हो गये उन्हें अपना मित्र बना लिया। भर्तृहरि का विवाह महाकाल के सानिध्य में पिंगला से हो गया। विक्रमादित्य को पहचान दी महाकाल ने भर्तृहरि को पहचान दी महाकाल ने । पिंगला के प्रेम में भर्तृहरि पागल हो गये बोले अगर मैं मर गया तो तुम क्या करोगी? पिंगला बोली मैं सती हो जाऊंगी। महाकाल ने देखा कि भर्तृहरि भक्ष्य भक्ष्य के मार्ग पर दौड़ रहा है। उन्होंने दत्तात्रेय को आदेश दिया कि शिष्य बनाकर उसका कल्याण करो।

दत्तात्रेय ने महाकाल वन में माया रच दी। गुरु बनकर बैठ गये। शिकार खेलते-खेलते भर्तृहरि को जोर से प्यास लगी। पानी का भक्षण भर्तृहरि को व्याकुल कर बैठा, प्यासा भर्तृहरि दत्तात्रेय के आश्रम पहुँच गया और पानी मांगने लगा दत्तात्रेय बोले तू दीक्षित है मैं केवल दीक्षितों की ही पानी देता हूँ। तेरा कोई गुरु है भर्तृहरि बोला मैं क्या जानूं गुरु, मुझे प्यास लगी है अतः आप ही मेरे गुरु बन जाओ और पानी पिलाकर जान बचा लो। दत्तात्रेय बोले मैं उन्हीं को दीक्षा देता हूँ जिन्होंने 12 वर्ष का तप किया हो। भर्तृहरि चटक गया बोला दीक्षा दे दो बाद में 12 वर्ष तप कर लूंगा। 12 वर्षों बाद आऊंगा, थोड़ा भांग और कर लेने दो दत्तात्रेय भी अवधूत ठहरे मान गये। भर्तृहरि की दीक्षा हो गई उसे पानी मिल गया। पीने के बाद भर्तृहरि बोला आप अपना नाम तो बताते जाओ। महाअवधूत बोले मैं हूँ दत्तात्रेय, आदि गुरु । खैर भर्तृहरि भूल-भाल गया। शिष्य भूल जाते हैं पर गुरु नहीं भूलता। कालान्तर पिंगला सती हो गई भर्तृहरि ने उसे परखा झूठी खबर भिजवा दी किं भर्तृहरि का महाकाल वन में सिंह ने भक्षण कर लिया है।

(क्रमशः)

🙏
@Sanatan
👍11🔥4
महाकाल संहिता (३)
=============


हाय पिंगला- हाय पिंगला 12 वर्ष तक श्मशान में बैठकर चिल्लाते रहे बस हो गई 12 वर्ष की तपस्या, दत्तात्रेय पिघल गये। गोरखनाथ को भेजा कि जाओ भर्तृहरि का उद्धार करो, उसे मह तत्व प्रदान करो, उसे महान बनाओ एवं अवनति के पथ से उस मूर्ख को उठाकर उन्नति के पथ पर बढ़ाओ। गोरखनाथ ने एक मटका लिया और श्मशान में ले जाकर भर्तृहरि के सामने फोड़ दिया और चिल्लाने लगे हाथ मटका- हाय मटका भर्तृहरि बोले क्यों चिल्ला रहे हो मूर्खों के समान, क्या टूटा मटका फिर वापस आ जायेगा गोरखनाथ बोले तू क्यों चिल्ला रहा है हाय पिंगला - हाय पिंगला । भर्तृहरि की आँखें खुल गई गोरखनाथ ने एक हजार पिंगला प्रकट कर दी बोले चुन ले इसमें से एक। क्या चाहता है ? पिंगला या पिंगला के निर्माण की विधि। भर्तृहरि चरणों में लोट गये। उन्होंने पिंगलाओं के निर्माण की विधि को ही महत्व दिया और दत्तात्रेय के सानिध्य में संन्यस्थ हुए।

सिरफिरों का नायक है महाकाल। उन्हीं के अंदाज में बात करता है महाकाल, उन्हीं के अंदाज में तप करवाता है महाकाल । दक्षिणामूर्ति गुरु तोड़कर रख देता है, शिव प्रहार करता है, गुरु भी प्रहार करता है। छैनी उठाकर पत्थर पर हथोड़े से प्रहार करना ही पड़ता है तभी मूर्ति साकार होती है। जिसे प्रहार करना नहीं आया उसे मूर्ति गढ़ना नहीं आया। गुरु को ही शिष्य मिलते हैं अन्य किसी को नहीं शिष्य तभी मिलेगा जब सम्पूर्ण गुरुत्व विकसित हो जायेगा इससे पहले नहीं। इससे पूर्व तो भक्ष्य भक्ष्य वाले जीव ही मिलेंगे। ये हल कर दो, उस समस्या का निवारण कर दो, नौकरी दिला दो, विवाह करा दो इत्यादि इत्यादि । शिष्य तो दो चार ही होते हैं। जीवन में यात्रा तो करनी ही पड़ती है क्योंकि पाद मिले हुए हैं एक शहर से दूसरे शहर पेट भरने के लिए यात्रा, नौकरी ढूंढने के लिये यात्रा, कोई बीमार पड़ गया तो उसका इलाज करवाने के लिये देश-विदेश की यात्रा, पुलिस थाने की चरण वन्दना, राजा अगर कुपित हो गया तो उसके कोप से बचने के लिए जान बचाने के लिए यात्रा, बेटी का विवाह के लिए दर-दर की ठोकरें खाने वाली यात्रा, कितनी यात्राएं गिनाऊं ? शव यात्रा भी करनी पड़ती है, शव यात्रा में भी सम्मिलित होना पड़ता है और इसी से निर्मित होता है क्लेश, व्यथा । काल-चक्र की यही पहचान है।

काल चक्र की गति बड़ी निराली है। कालचक्र की गति से ही जीव को अनेकों प्रकार की दुर्गतियां प्राप्त होती हैं। गति तो चाहिए होगी, गतिमान तो होना होगा क्योंकि आप पादप हैं, आपके पैर लगाकर भेजे गये हैं। स्पष्ट आदेश, सीधी बात इन सब यात्राओं से बचने का एकमात्र उपाय है महाकाल की यात्रा, महाकाल पूजन। गुरु पूर्णिमा पर बायें हाथ से काम करने वाले इस दक्षिणामूर्ति शिव भक्त गुरु की यात्रा और परिक्रमा समझ में आ जाये तो ठीक है नहीं समझ में आये तो अनंत काल तक कष्ट क्लेश रूपी फल प्रदान करने वाली यात्राओं में उलझे रहना। ऊपर वर्णित बेमतलब की यात्राओं से बचने के लिए आदि गुरु शंकराचार्य दक्षिण से निकल पड़े, दक्षिणामूर्ति गुरु की खोज में अर्थात उस गुरु की खोज में जिसने महाकाल तत्व को आत्मसात कर लिया हो। जो कभी न सोता हो, जो पूर्ण चैतन्य हो, जिसके सिर के ऊपर सदैव सूर्य प्रकाशवान हो । रास्ते में बालक शंकराचार्य ने एक लकड़ी उठाई और दण्ड के रूप में धारण कर ली। महाकाल दण्ड धारण करते हैं, दण्ड भी देते हैं, दण्ड देने का तरीका बड़ा निराला है। जीव के लिए दण्ड आवश्यक है, शिष्य के लिए भी दण्ड आवश्यक है पर गुरु या शिव के दण्ड में कल्याण का भाव अवश्यम्भावी है।

त्रिपुरासुर का वध होना था समस्त देवता विष्णु सहित महाकाल वन में निवास कर रहे महाकालेश्वर के पास पहुँचे बोले हे दक्षिणामूर्ति त्रिशूल उठाओ और हमारी रक्षा करो। शिव ने ना कह दिया, बोले वे सब मेरे भक्त हैं अगर तुम उनका वध करवाना चाहते हो तो शिवापराध करवाओ तभी पाशुपतास्त्र चलेगा। विष्णु ने माया रच दी और असुर शिव पूजन से विमुख हो गये, शिवापराध हुआ और शिव ने त्रिशूल चलाया। तीनों पर भस्म हो गये उड़ती हुई भस्म से महाकाल आच्छादित हो गये। कोई अपराध करना नहीं चाहता, कोई जीव कत्ल करना नहीं चाहता, कोई जीव दण्डित होना नहीं चाहता परन्तु यह गूढ़ रहस्य है कि अपराध शिव और काली करवाते हैं जान बूझकर जिससे कि दण्ड दे उन्हें पशु बंधनों से मुक्त किया जा सके। गलतियाँ करवाने का, अपराध करवाने का केन्द्र बिन्दु हैं महाकाल ।

(क्रमशः)

🙏
@Sanatan
👍4❤2
महाकाल संहिता (४)
=============



महाकाली और महाकाल जब शतरंज खेलते हैं, चौसर बिछती है तो उस पर मोहरे होते हैं जीव । अट्ठाहस करते हुए महाकाल और महाकाली जीवों की सार में चौंसर सजाते हैं । अघोरेश्वर और अघोरेश्वरी ही चाल चलते हैं और इस सृष्टि के राजा महाराजा, वजीर, हाथी, घोड़े, प्यादे बनते बिगड़ते रहते हैं। यही मैथुनी सृष्टि का रहस्य है, यही शिव और काली का अट्टाहास है।
महाकाल क्षेत्र में ही शिव और काली क्रिया रत है, आलिंगन बद्ध हैं। जहाँ देखो युगल रूप में दिखाई पड़ जायेंगे। नाचते भैरव, मृदंग बजाते भूतगण, अट्टाहास करती योगिनियाँ, शिव की छाती से वक्ष स्थल टकराती महाकाली, चिंघाड़ते हाथी, गरजते सिंह के - कालजयी आध्यात्मिक दृश्य उज्जयिनी के वातावरण में साधक देख लेता है । भक्ष्य भक्ष्य की संस्कृति रही है । भक्ष्य भक्ष्य से मुक्त होने के लिए अघोरी ने नर मांस मांगा तो वह भी महाकाल ने श्मशान में उपलब्ध करा दिया। उज्जयिनी के इतिहास में जो दृश्य निर्मित हुए हैं वे कहीं नहीं हो सकते। समस्त विश्व के व्यापारी उज्जयिनी की स्वर्ण मयी इमारतें, वेश्याओं के नृत्य, तालाबों में खिले कमल, वेद मंत्रों से गूंजित वातावरण, हवन कुण्डों से उत्सर्जित सुगंधित वायु तो वहीं मांस भक्षण करते अघोरी, रक्तपान करते कापालिक, नृत्य करती हुए नगर वधुएं इत्यादि एक साथ उज्जयिनी में देखने को मिलता था। उज्जयिनी के आसपास का क्षेत्र महाकाल वन से आच्छादित था अरबों ने यहीं पर उद्यान बनाने की कला सीखी, भवनों में उद्यान कैसे लगाये जाते हैं यह समस्त विश्व ने उज्जयिनी से सीखा।

सरोवरों के निर्माण की कला सर्वप्रथम उज्जयिनी में प्रारम्भ हुई। डॉ. वाकणकर जो कि पुरातत्व वेत्ता है उन्होंने कहा कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रथम सड़क उज्जयिनी में मिली विश्व की सर्वप्रथम जल निकासी व्यवस्था उज्जयिनी में निर्मित हुई । विश्व का आदि मदिरालय उज्जयिनी में विकसित हुआ, कई मंजिला इमारतों का निर्माण उस समय हो चुका था जब ईसा को जन्म लेने में 2000 वर्ष बाकी थे। विश्व की प्राचीनतम नगरी है उज्जयिनी । महाकाल मंदिर 100 गज ऊंचा था एवं इसकी 5 मंजिलें थीं, अब का महाकाल मंदिर तो उसका लघु रूप है। जो कुछ भी विश्व में फैला है वह सर्वप्रथम उज्जयिनी से ही प्रादुर्भावित हुआ है। अनेकों सरोवरों, अनेकों घाट से सुसज्जित था उज्जैन, इसे बाग बगीचों की नगरी कहा जाता था। गोमेध रत्न की खदानें उज्जयिनी के समीप थीं। गोमेध रत्न क्या होता है ? विश्व को उज्जैन ने सिखाया । महाकाल के प्रांगण में बैठकर ही नागार्जुन ने वह षोडशी ढूंढी रानी पद्मावती के रूप में जो कि पारे का मर्दन कर सकती थी अर्थात शिव वीर्य को घोट सकती थी और तभी रस प्राप्त होता है। एवं जिसके स्पर्श से तांबा स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। महाकाल की स्वर्ण जड़ित प्रतिमा के सामने ही एक ऐसी स्त्री जिसमें पद्मनी नारी के समस्त गुण हो वो ही पारे का मर्दन कर सकती है।

खैर तंत्र क्षेत्र का यह गूढ़ रहस्य है इसे ज्यादा उद्गारित नहीं किया जा सकता। नागार्जुन ने महाकाल के प्रांगण में बैठकर कहा था कि सोने के पहाड़ बना दूंगा, स्वर्ण निर्मित कर लूंगा और कर भी लिया था। यह शिव आरक्षित क्षेत्र है यहाँ कभी कोई तथाकथित सामाजिक तंत्र नहीं चला है। उत्तर भारत ने जिन आध्यात्मिक साधकों को निष्कासित किया उन्हें शरण दी उज्जयिनी ने। भूमि के नियम हर समय बदलते रहते । भूमि के नियमों से अध्यात्म नहीं चलता, आध्यात्मिक साधक भूमि के नियमों को नकार देता है इसलिए संन्यस्थ होता है। एक संन्यस्थ का, एक अघोरी का, एक शैव मार्गीय का, एक तंत्रज्ञ का सामाजिक नियमों, व्यवस्था के नियमों, राज्य के नियमों से कोई लेना देना नहीं है। वह शिव संहिता के आचार विहार पर चलता । वह तो ब्रह्माण्डीय नियमों को भी नकार देता है। वह तो ग्रह नक्षत्रों, सूर्य अग्नि, वायु जल इत्यादि तत्वों के नियमों को भी नहीं मानता है इनसे भी परे हो जाता है। वह अपनी जन्म कुण्डली स्वयं निर्मित करता है। प्रेमत्व महाकाल का पारितोषिक है जिस पर महाकाल अति प्रसन्न उसे सदा के लिए प्रेमत्व की प्राप्ति । प्रेमत्व ही जीव को काल से विमुख करता है। प्रेम में डूबा व्यक्ति, आलिंगन बद्ध युगल को काल का भान कहाँ? इसलिए महाकाल में शिव और काली आलिंगन बद्ध हैं, सारी दुनिया से कटे हुए हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत:

🙏 @Sanatan
👍9❤2🔥1
👍8❤4
नामजप से आने वाले दुःखों का नाश!!!!!!!!


प्रारब्ध का नाश भोगने से ही होता है किन्तु भगवान के नाम में प्रारब्ध का नाश करने की अतुल शक्ति है। तुलसीदासजी ने कहा है—‘मेटत कठिन कुअंक भाल के।’
—संतजनों ने कहा है कि सादा-सात्विक भोजन व संयम के साथ इस महामन्त्र का तीन करोड़ जप करने से मनुष्य के हाथ की रेखाएं बदलने लगती हैं। जन्मपत्री के ग्रह शुद्ध होने लगते हैं। उसके शरीर में कोई भी महारोग नहीं होता है।
—इस महामन्त्र का साढ़े तीन करोड़ बार जप करने से मनुष्य ब्रह्महत्या, चोरी, पितर, देव व मनुष्यों के प्रति किए गए अपराध से मुक्त हो जाता है।
—चार करोड़ जप करने से मनुष्य का धनस्थान शुद्ध हो जाता है और वह कभी दरिद्र नहीं होता है।
—जिसने इस महामन्त्रका पांच करोड़ जप किया है उसके हृदय में ज्ञान प्रकट हो जाता है।
—छह करोड़ जप से साधक के बाह्य व आन्तरिक समस्त शत्रु नष्ट हो जाते हैं।
—सात करोड़ जप करने से आयु की वृद्धि होती है।
—आठ करोड़ जप करने से मनुष्य का मरण सुधरता है। अंत समय में भगवान उस साधक को किसी तीर्थ में बुलाते हैं और वहां वह पवित्र अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होता है।
—नौ करोड़ मन्त्रों का जप करने से साधक को स्वप्न में भगवान के दर्शन होते हैं।
—दस, ग्यारह व बारह करोड़ जप करने से संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध—तीनों कर्मों का नाश हो जाता है।
—तेरह करोड़ जप करने से भगवान का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। समर्थ गुरु रामदास ने गोदावरी के किनारे इस महामन्त्र का तेरह करोड़ जप किया और वहां भगवान राम प्रकट हो गये थे। नासिक में उस स्थान पर ‘काले रामजी का मन्दिर’ है।
‌ साभार.......
@Sanatan
👍14❤6🔥2🤔1
समस्त कामनाओं की पूर्ति का अमोघ साधन
गणेशाष्टक
-----------------

भगवान गणपति की कृपा प्राप्त करने का यह सबसे उत्तम साधन है। गणेशाष्टक का मात्र तीन दिनों तक निरंतर तीनों संध्याओं के समय पूर्ण श्रद्धा व मनोयोग से फर लेने पर साधक के समस्त कार्य सिद्ध हो जायेंगे इतना ही नहीं यदि साधक आठ दिनों तक इन आठों श्लोकों का एक बार पाठ कर लेता है और चतुर्थी तिथि को आठ बार पाठ करता है तो वह आठों सिद्धियों को अनुभूत करने की स्थिति में आ जाता है।

जो एक माह तक प्रतिदिन 10-10 बार इस स्तोत्र का पाठ करता है वह कारागृह में निरुद्ध तथा राजा के द्वारा वध दण्ड पाने वाले कैदी को भी छुड़ा सकता है। इसमें संशय नहीं है जो भी साधक पूर्ण भक्तिभाव से गजानन की आराधना करता है और गजानन के इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे गणपति की परम भक्ति प्राप्त होती है। इस स्तोत्र के पाठ से विद्यार्थी को विद्या, पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र तथा निर्धन को धन प्राप्त होता है साथ ही जिसकी जो भी मनोकामना हो शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है।

विधि: साधक प्रातः काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो जायें और स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर लें, तत्पश्चात् पूर्व या उत्तर की तरफ मुख कर लें और गणपति विग्रह या यंत्र (यंत्र के अभाव में सुपारी पर मौली बाँधकर रख लें) की पूजा सिन्दूर, दूर्वा, धूप व दीप से कर के उपरोक्त स्तोत्र का पाठ करें।

सर्वे ऊचुः

यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निगुर्णादप्रमेया गुणास्ते ।
यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतश्चविरासीज्जगत्सर्वमेतत्तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता ।
तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतो वह्निभानूद्भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः ।
यतः स्थावरा जङ्गमावृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतो दानवाः किंनरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वपदाश्च ।
यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

तो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः सम्पदो भक्तसंतोषिकाः स्युः ।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्य सिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतः पुत्रसम्पद्यतो वांछितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः ।
यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः ।
यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यन्ता गृणन्ति ।
परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

श्रीगणेश उवाच

पुनरुचं गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः ।
त्रिसंध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति ॥

यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम् ।
अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ॥

यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने ।
स मोचयेद्बन्धगतं राजवध्यं न संशयः ॥

विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् ।
वांछिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ॥

यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः ।
एवमुक्त्वा ततो देवश्चन्तर्धानं गतः प्रभुः ॥

॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

साधक प्रात:काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो जाऐ और स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर ले, तत्पश्चात् पूर्व या उत्तर की तरफ मुख कर लें और गणपति विग्रह या यंत्र (यंत्र के अभाव में सुपारी पर मौली बाँध कर रख लें) की पूजा सिन्दूर, दूर्वा, धूप व दीप से कर के उपरोक्त स्तोत्र का पाठ करें।

शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
👍13❤5
नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं,
करहु विचार सुजन मन माहीं।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा।
जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि।
संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

भावार्थ:-(तुलसीदासजी कहते हैं-) इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥


@Sanatan
❤23👍2
अमोघ शिव कवच
------------------------


शिव शक्ति श्रावण मास में अपने भक्तों पर परम कृपावान होती है। इस चमत्कारिक शिव कवच से साधक अपने सभी पाप, ताप और शापों का शमन करते हुए पुनः नित्य बुद्ध और शुद्ध हो जाता है। जहाँ पाशुपतास्त्र शस्त्र है तो वहीं शिव कवच ढाल का काम करता है। सावन के महीने में पारद शिवलिङ्ग की स्थापना कर या फिर महामृत्युंजय यंत्र या द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग यंत्र की स्थापना कर उन पर बिल्व पत्र अर्पित करते हुए इस कवच का पाठ अवश्य करें। तत्काल ही लाभ प्राप्त होगा।

अमोघ शिव कवच

ॐ नमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्वात्मकाय सर्व- मन्त्रस्वरूपाय सर्वयन्त्राधिष्ठिताय सर्वतन्त्रस्वरूपाय सर्व तत्त्वविदूराय ब्रह्मरुद्रावतारिणे नीलकण्ठाय पार्वतीमनोहर- प्रियाय सोमसूर्याग्निलोचनाय भस्मोद्धूलितविग्रहाय महामणिमुकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय सृष्टिस्थितिप्रलय कालरौद्रावताराय दक्षाऽध्वरध्वं सकाय महाकालभेदनाय मूलाधारैकनिलयाय तत्त्वातीताय गङ्गाधराय सर्वदेवाधिदेवाय षडाश्रयाय वेदान्तसाराय त्रिवर्गसाधना- याऽनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकायाऽनन्तवासुकि- तक्षक-कर्कोटक- शकुलिक- पद्ममहापद्मेत्यष्ट महानागकु लभूषणाय प्रणवस्वरूपाय चिदाकाशाया - ऽऽकाशदिक्स्वरूपाय ग्रहनक्षत्रमालिने सकलाय कलङ्क-रहिताय सकललो कै ककर्त्रे सकललो कै कभर्त्रे सकललो कैक संहर्त्रे सकललोकैक - गुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगम-गुह्याय सकलवेदान्तपारगाय सकललोकैकवरप्रदाय सकल - लोकै कशङ्कराय शशाङ्कशेखराय शाश्वतनिजावासाय निरा भासाय निरामयाय निर्मलाय निर्लोभाय निर्मदाय निश्चिन्ताय निरहङ्काराय निरङ्कुशाय निष्कलङ्काय निर्गुणाय निष्कामाय निरुपद्रवाय निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय निरन्तकाय निष्प्रपञ्चाय निःसङ्गाय : निर्द्वन्द्वाय निराधाराय निरागाय निष्क्रोधाय निर्मलाय निष्पापाय निर्भयाय निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियाय निस्तुलाय निःसंशयाय निरञ्जनाय निरुपमविभवाय नित्य-शुद्ध-बुद्ध परिपूर्ण - सच्चिदानन्दाद्वयाय परमशान्तस्वरूपाय तेजोरूपाय तेजोमयाय जय जय रुद्र महारौद्र भद्रावतार महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट् वाङ्ग - खङ्गचर्म पाशाङ्कुश- डमरु - शूल- चाप-बाण-गदा शक्ति- भिन्दिपाल तोमर- मुसल मुद्गर-पाश परिघ - भुशुण्डी - शतघ्नी- चक्राद्यायुध-भीषणकर सहस्त्रमुखदंष्ट्रा करालवदन विकटाट्टहास विस्फारित-ब्रह्माण्डमण्डल नागेन्द्रकुण्डल नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्र चर्मधर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्वरूप विरूपाक्ष विश्वेश्वर वृषभवाहन विषविभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्ष रक्ष मां ज्वल ज्वल महामृत्युमपमृत्युभय नाशय नाशय चोरभयमुत्सा- दयोत्सादय विषसर्पभयं शमय शमय चोरान् मारय मारय मम शत्रूनुच्चाटयोच्चाटय त्रिशूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खड्गेन छिन्धि छिन्धि खटवाङ्गेन विपोथय विपोथय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय वाणैः सन्ताडय सन्ताड़य रक्षांसि भीषय भीषयाऽशेष भूतानि विद्रावय विद्रावय कूष्माण्ड- वेताल मारीच- ब्रह्मराक्षस गणान् सन्त्रासय सन्त्रासय मामभयं कुरु कुरु वित्रस्तं मामाश्वासयाऽऽश्वासय नरक - महाभयान् मामुद्धरोद्धर सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृभ्यां मामा प्याययाप्यायय दुःखातुरं मामानन्दयाऽऽनन्दय शिवकवचेन मामाच्छादया ऽऽच्छादय मृत्युञ्जय त्र्यम्बक सदाशिव नमस्ते नमस्ते ।

ऋषभ उवाच

इत्येतत् कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया ।
सर्वबाधा प्रशमनं रहस्यं सर्वदेहिनाम् ॥
यः सदा धारयेन् मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते क्वाऽपि भयं शम्भोरनुग्रहात् ॥
क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारोग-हतोऽपि वा ।
सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥
सर्वदारिशमनं सौमङ्गल्य-विवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥ महापातक-सङङ्घतैर्मुच्यते चोपपातकैः ।
देहान्ते मुक्तिमाप्नोति शिववर्माऽनुभावतः ॥
त्वमपि श्रद्धया वत्स! शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥

(क्रमशः)

🙏
@Sanatan
👍5🙏5🔥2
अमोघ शिव कवच (२)
--------------------------


अर्थ

ॐ जिनका वाचक है, सम्पूर्ण तत्व जिनके स्वरूप हैं,जो सम्पूर्ण तत्वों में विचरण करने वाले समस्त लोकों के एकमात्र कर्ता और सम्पूर्ण विश्व के एकमात्र भरण-पोषण करने वाले हैं, जो अखिल विश्व के एक ही संहारकारी, सब लोकों के एकमात्र गुरु, समस्त संसार के एक ही साक्षी, सम्पूर्ण वेदों के गूढ़ तत्व, सबको वर देने वाले, समस्त पापों और पीड़ाओं का नाश करने वाले, सारे संसार को अभय देने वाले, सब लोकों के एकमात्र कल्याणकारी, - चन्द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, अपने सनातन प्रकाश से प्रकाशित होने वाले, निर्गुण, उपमारहित, निराकार, निराभाष, निरामय, निष्प्रपञ्च, निष्कलङ्क निर्द्वन्द्व, निस्सङ्ग, निर्मल, गति शून्य, नित्यरूप, नित्य-वैभव से सम्पन्न, अनुपम ऐश्वर्य से सुशोभित, आधारशून्य, नित्य-शुद्ध-बुद्ध, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दघन, अद्वितीय तथा परम शांत, प्रकाशमय, तेज: स्वरूप हैं, उन भगवान् सदाशिव को नमस्कार है। हे महारुद्र, महारौद्र, भद्रावतार, दुःख-दावाग्निविदारण, महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपालमालाधारी! हे खट्वाङ्ग, खङ्ग, ढाल, फंदा, अंकुश, डमरू, त्रिशूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर, मुसल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डी, शतघ्नी और चक्र आदि आयुधों के द्वारा भयंकर हाथों वाले ! हजार मुख और दंष्ट्रा से कराल, विकट अट्टहास से विशाल ब्रह्माण्ड-मण्डल का विस्तार करने वाले, नागेन्द्र वासुकि को कुण्डल, हार, कङ्कण तथा ढाल के रूप में धारण करने वाले, मृत्युज्जय त्रिनेत्र, त्रिपुरनाशक, भयंकर नेत्रों वाले, विश्वेश्वर, विश्वरूप में प्रकट, बैल पर सवारी करने वाले, विष को गले में भूषण रूप धारण करने वाले तथा सब ओर मुखवाले शंकर! आपकी जय हो, जय हो! आप मेरी सब ओर से रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। प्रज्वलित होइये, प्रज्वलित होइये। मेरे- महामृत्यु भय का तथा अपमृत्यु के भय का नाश कीजिए (बाहरी और भीतरी) रोग भय को जड़ से मिटा दीजिए जड़ से मिटा दीजिए। विष और सर्प के भय को शांत कीजिए, शांत कीजिए। चोर भय को मार डालिये, मार डालिये। मेरे (काम-क्रोध-लोभादि भीतरी तथा इन्द्रियों के और शरीर के द्वारा होने वाले पापकर्म रूपी बाहरी) शत्रुओं का उच्चाटन कीजिए। त्रिशूल के द्वारा विदारण कीजिए, विदारण कीजिए, कुठार के द्वारा काट डालिये, काट डालिये, खङ्ग के द्वारा छेद डालिये, छेद डालिये, खट्बाङ्ग के द्वारा नाश कीजिये, नाश कीजिये, मुसल के द्वारा पीस डालिये, पीस डालिये और बाणों के द्वारा बींध डालिये, बध डालिये। (आप मेरी हिंसा करने वाले ) राक्षसों को भय दिखाइये, भय दिखाइये। भूतों को भगा दीजिये, भगा दीजिये। कूष्माण्ड, वेताल, मारियो और ब्रह्मराक्षसों को संत्रस्त कीजिये, संत्रस्त कीजिये। मुझको अभय दीजिये, अभय दीजिये। मुझ अत्यंत डरे हुए को आश्वासन दीजिये, आश्वासन दीजिये। नरक- भय से मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये। मुझे जीवनदान दीजिये, जीवनदान दीजिये। क्षुधा तृषा का निवारण करके मुझको आप्यायित कीजिये, आप्यायित कीजिये। आपकी जय हो, जय हो। मुझ दुःखातुर को आनन्दित कीजिये, आनन्दित कीजिये। शिव कवच से मुझे आच्छादित कीजिये त्र्यम्बक सदाशिव ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।

ऋषभजी कहते हैं- इस प्रकार यह वरदायक शिवकवच मैंने कहा है। यह सम्पूर्ण बाधाओं को शांत करने वाला तथा समस्त देहधारियों के लिये गोपनीय रहस्य है। जो मनुष्य इस उत्तम शिवकवच को सदा धारण करता है, उसे भगवान शिव के अनुग्रह से कभी और कहीं भी भय नहीं होता। जिसकी आयु क्षीण हो चली है, जो मरणासन्न हो गया हैं अथवा जिसे महान रोगों ने मृतक सा कर दिया है, वह भी इस कवच के प्रभाव से तत्काल सुखी हो जाता है और दीर्घायु प्राप्त कर लेता है। शिवकवच समस्त दरिद्रता का शमन करने वाला और सौमङ्गल्य को बढ़ाने वाला है, जो इसे धारण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है। इस शिवकवच के प्रभाव से मनुष्य महापातकों के समूहों और उपपातकों से भी छुटकारा पा जाता है तथा शरीर का अंत होने पर शिव को पा लेता है।

वत्स! तुम भी मेरे दिये हुए इस उत्तम शिवकवच को श्रद्धापूर्वक धारण करो, इससे तुम शीघ्र और निश्चय ही कल्याण के भागी होओगे।

शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
🙏9👍6❤1🔥1
❤29
गणेश पूजन ध्यान देने योग्य तथ्य
------------------------------------------


सनातन धर्म में देवी देवताओं को भिन्न भिन्न नामों व स्वरूपों के अनुसार पूजा होती है। सभी देवी देवताओं के पूजन में यह बात ध्यान में रखी जाती है कि अमुक देवी देवता को कौन सी वस्तुऐं अधिक प्रिय हैं और पूजन में उन वस्तुओं को आवश्यक रूप से सम्मिलित किया जाता है जैसे देवाधिदेव महादेव की पूजा हो और विल्व पत्र न हो तो पूजन पूर्ण नहीं माना जाता (मानस पूजन को छोड़कर) इसी प्रकार शास्त्रों में यह उल्लेख भी किया गया है कि व्यक्ति विशेष में जिस तत्व की प्रधानता होती है उसे तदनुसार ही अपना ईष्ट बनाना चाहिये यही वैदिक विधान है।

कौन किसकी आराधना करे ?

अध्यात्म पथ के जिज्ञासुओं को यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं कि मानव शरीर पंच तत्वों "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर" से मिलकर बना है एवं दैवीय शक्तियाँ भी इन्हीं पंच महाभूतों के आधार पर क्रियाशील होती है। ये पाँचों तत्व प्रत्येक मनुष्य में दिव्यमान रहते हैं किन्तु इन पाँचों तत्वों में से प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी एक तत्व की प्रधानता होती है और उसी तत्व के अनुसार व्यक्ति को अपना ईष्ट बनाना चाहिये। जैसे पृथ्वी तत्व की प्रधानता वालों के लिये भगवान शंकर की जल तत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवान गणपति की, तेजतत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवती दुर्गा की, वायु तत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवान सूर्य की और आकाश तत्व की प्रधानता वालों के लिये भगवान विष्णु की उपासना हितकर होती है।

गणपति प्रतिमा त्र्य का निषेध

प्रायः आम लोग या साधक अज्ञानता के कारण एक ही देवी देवता की अनेकों प्रतिमा में घर में स्थापित कर लेते हैं किन्तु यह शास्त्र सम्मत नहीं है। कहा गया है कि

गृहे लिङ्गद्वयं नार्या गणेश त्रितयं तथा ।
शङ्कद्वयं तथा सूर्यो नार्यो शक्तित्रयं तथा ।
द्वे चक्रे द्वारकायाश्च शालग्राम शिलाद्वयम् ।
तेषां तु पूजने नैव ह्युद्वेगं प्राप्रुयाद गृही ॥


अर्थात घर में दो शिवलिङ्गों, दो शङ्गो, दो सूर्य प्रतिमाओं, दो शालग्रामों, दो गोमती चक्रों, तीन गणपति प्रतिमाओं और तीन देवी प्रतिमाओं की स्थापना नहीं करनी चाहिये।

प्रतिष्ठा का उचित समय

किसी भी देवी देवता की प्रतिमा स्थापित करने के बाद उसमें प्राण प्रतिष्ठा का विधान है। शास्त्रों में प्रत्येक देवी देवता की प्रतिष्ठा के लिए अलग-अलग महीने, तिथियां व नक्षत्र उचित माने गये हैं। भगवान गणपति की प्रतिष्ठा के लिए चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ अथवा फाल्गुन मास का शुक्ल पक्ष शुभ है। प्रतिष्ठा मयूष में स्पष्ट उल्लेख है कि

चैत्रे व फाल्गुने वापि ज्येष्ठे व माधवे तथा ।
माघे व सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा सिते ॥


इसी प्रकार भौमवार के अतिरिक्त अन्य वार ग्राह्य हैं तथा तिथियों में चतुर्थी, नवमी और चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी वर्जित है तथा प्रतिष्ठा के लिये प्रशस्त्र नक्षत्र अश्विनी, रोहणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ श्रवण, पूर्ण भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती हैं।

प्रतिमा की परिभाषा

मत्स्य पुराण के अनुसार सामान्य गृहस्थों के घर में साधक के अंगुष्ठ पर्व से लेकर वितस्ति पर्यन्त अर्थात बारह अंगुल परिमाण तक के आकार वाली प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये। कहा गया है कि -
अंगुष्ठपर्वादारभ्य वितस्ति यावदेव तु । गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः ॥
इसके अलावा यदि साधक के इष्ट भगवान गणपति हैं तो उनकी स्थापना मध्य में करके ईशान कोण में श्री विष्णु की, अग्नि कोण में भगवान शिव की, नैऋत्य कोण में श्री सूर्य की और वायुकोण में भगवती दुर्गा की स्थापना करनी चाहिए।

आवाहन मंत्र

गणेश जी के आवाहन के लिये निम्रांकित वैदिक मंत्र बहुत लोकप्रिय है

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥
गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे ।
नधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥


आसन - मंत्र

नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ।
न ऋते त्वत् क्रियते किंचनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च ॥


अर्थात हे गणपते ! आप यहाँ आनन्दपूर्वक विराजिये । सभी लोग आपको विद्या- विशारदों में सर्वोत्तम बताते हैं एवं आपकी आराधना बिना कोई कार्य प्रारम्भ नहीं किया जाता। (यजमान के प्रति आचार्य वचन) हे धनी पुरुष ! महान् और पूजनीय गणपति भगवान की चित्र विचित्र अर्थात विभिन्न द्रव्यों द्वारा पूजा करो।

(क्रमशः)

🙏
@Sanatan
👍11👏1🙏1
गणेश पूजन ध्यान देने योग्य तथ्य (२)
----------------------------------------------


अभिषेक

ताम्रपात्र रखे हुए पवित्र जल से गणपति भगवान का महाभिषेक करते समय गणेशाथर्वशीर्ष की इक्कीस आवृत्ति करने का विधान है।

दूर्वा

पाटल (लाल) वर्ण वाली और सुरभित कुसुमावली के साथ-साथ दूर्वाङ्कुर भी गणेश जी को अर्पण किये जाते हैं, किन्तु उनकी पूजा में तुलसीदल का प्रयोग नहीं किया जाता
न तुलस्या गणाधिपम् ।

नीराजन - मंत्र

विद्यारण्यहुताशं विहितानयनाशम् ।
विपदवनीधरकुलिशं विधृताङ्कुशपाशम् ॥
विजयार्क ज्वलिताशं विदलितभवपाशम् ।
विनताः स्मो वयमनिशं विद्याविभवेशम् ॥


अर्थात हम सभी आराधक नित्य निरन्तर उन गणेश जी के सम्मुख विनयावनत हैं, जो समस्त विघ्नरूपी वनों का दहन करने के लिये प्रबल अनल हैं, जो अनीति और अन्याय का तत्काल विनाश कर देते हैं, जो विपत्ति के पर्वतों को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिये वज्रोपम हैं, जिनके एक कर-कमल में अंकुश और दूसरे में पाश विराजमान हैं, जिन्होंने विघ्न विजय रूपी सूर्य के प्रकाश में दसों दिशाऐं प्रकाशित कर दी हैं, जो अपने उपासकों के भव-बन्धन को शिथिल कर देते हैं और जो समस्त विद्याओं के वैभव के अधीश्वर हैं।

प्रणाम पत्र

विवेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥

अर्थात हे गणपते ! आप विघ्नों के शासक हैं, अतएव आराधकों को उनके द्वारा उत्पीड़ित नहीं होने देते। आप अपने उपासकों को उनके अभीष्ट वर देकर कृतार्थ कर देते हैं। सारे देवता आपको प्रिय हैं और आप सब देवताओं को प्रिय हैं। आप लम्बोदर हैं, चतुष्षष्टि कलाओं के निधान हैं और जगत् का मंगल करने के लिये सदा तत्पर रहते हैं। आप गजवदन हैं और श्रुत्युक्त यज्ञों को अपने आभूषणों के समान स्वीकार कर लेते हैं। आप पार्वती नन्दन हैं हम आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करते हैं ।

गणेश गायत्री

एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।
तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नोदन्ती प्रचोदयात् ।

अर्थात हम एकदन्त परमपुरुष गणपति भगवान को जानते हैं, मानते हैं और उन वक्रतुण्डभगवान का हम ध्यान करते हैं। वे हमारे विचारों की सत्कार्य के लिये प्रेरित करें ।

परिक्रमा

बाह्य परिशिष्ट के अनुसार गणेशजी की एक परिक्रमा करनी चाहिये ।
एकां विनायके कुर्यात किन्तु ग्रन्थान्तर के तिस्रः कार्या विनायके ॥


इस वचन के अनुसार तीन परिक्रमाओं का विकल्प भी. आदरणीय है।

गणेश जी के पार्श्वक

गणपति भगवान को निवेदित किया हुआ नैवेद्य सर्वप्रथम उनके पार्श्वकों (सेवकों) को देना चाहिये । पार्श्वकों के नाम हैं गणेश, गालव, गार्ग्य, मंगल और सुधाकर ये पाँच एवं मतान्तर से गणप, गालव, मुद्रल और सुधाकर ये चार गणेशजी के सेवक हैं।

विभिन्न प्रतीकों द्वारा गणेश पूजन

सामान्य तौर पर गणेश जी का पूजन हरिद्रा (हल्दी) की मूर्ति से किया जाता है हरिद्रा में मंगलाकर्षिणी शक्ति है तथा वह लक्ष्मी का प्रतीक भी है। नारद पुराण में यद्यपि श्री गणेश जी की स्वर्ण प्रतिमा बनाने का निर्देशन दिया गया है किन्तु उसके अभाव में हरिद्रा की मूर्ति बनाने का विकल्प है। गोमय में लक्ष्मी जी का स्थान होने के कारण लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गोमय से गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन का विधान है। इसके अलावा शीघ्र श्री गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिये श्वेतार्क गणपति के पूजन का विधान है ।
शिव शासनत: शिव शासनत:
@Sanatan
👍14🔥1
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
❤1
ऋषि का क्या है महत्व- महत्वपूर्ण जानकारी.

अंगिरा ऋषि....

ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

विश्वामित्र ऋषि....

गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे।

विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

वशिष्ठ ऋषि....

ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

कश्यप ऋषि....

मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

जमदग्नि ऋषि....

भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

अत्रि ऋषि....

सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

अपाला ऋषि...

अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

नर और नारायण ऋषि....

ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

पराशर ऋषि....

ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

भारद्वाज ऋषि....

बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं।

वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है।

प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

वेदों के रचयिता ऋषि.....

ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं।

बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है।

इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं.

क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है....

१.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है....

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

*इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।*

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं।

एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं.

दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं।

कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

१. वशिष्ठ...

१/३

@Sanatan
👍8🔥1👏1
राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

२. विश्वामित्र....

ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए।

इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है।

विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी।

विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

३. कण्व......

माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

४. भारद्वाज....

वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे.

लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था।

माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं।

ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं।

'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

५. अत्रि....

ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे।

अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया।

अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था।

मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

६. वामदेव....

वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

७. शौनक...

शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

@Sanatan
👍11🔥1