सनातन धर्म • Sanatan Dharma
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🌿बेलपत्र की कहानी 🌿

स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया। चुंकि माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं,
फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।
बेल वृक्ष का महत्व-

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।

2. अगर किसी की शवयात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।

4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।

8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाएं। बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं।

साभार......
@Sanatan
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शिव अवकाश विहीन हैं, अवकाश का निर्माण सीमितता का द्योतक है, अवकाश यह दर्शित करता है कि पिण्ड ऊर्जा का अविष्कारक नहीं है, स्व उत्पादित पिण्ड नहीं है इसलिए अवकाश की अनुभूति होती है। शिव का महत्व ही अवकाश सिद्ध करता है। थक गये, अंब गये, बोर हो गये, श्वास फूल गयी अर्थात पशु हो, सीमित बल है, कहीं से प्राप्ति नहीं हो रही है। पुनः अर्जित करो, कितना दौड़ोगे ? कितनी रुद्रता है ? जितनी रुद्रता भरी गई है बस उतना ही यह सिद्ध करता है कि प्राप्ति के लिए सदैव जीव या पिण्ड को शिव की और अग्रसर होना पड़ता है इसलिए इस संसार को, इस जगत को संसार रोग कहा गया है और संसार रोग हरणम् हैं शिव । संसार तो रोगी है,, संसार की प्रत्येक घटना रोग का ही निर्माण करती है। मैं अध्यात्म के प्रवचन कभी नहीं सुनता,अखबार में धर्म और अध्यात्म पर क्या लिखा है कभी नहीं पढ़ता, पन्ना उठाकर फेंक देता हूँ, टी.वी. के चैनलों पर चौबीस घण्टे बज रही अध्यात्म की धुन कभी नहीं सुनता क्योंकि धर्म का रोग सबसे खतरनाक है अधिकांशतः धार्मिक व्यक्तित्व रोगी हैं और रोग के कीटाणु ही चारों तरफ फैलाते हैं, वे भी संसार के पात्र हैं इसीलिए गिनी चुनी, एक नजर में समझ में आ जाने वाली स्वस्थ आध्यात्मिक ग्रंथों को देखना पसंद करता हूँ। लिंग का अर्चन और रोगों का मार्जन बस यही मुझे कहना है। जितना ज्यादा शिवलिंग का अर्चन होगा, जितना ज्यादा रुद्राभिषेक उतना ही संसार रोग से ग्रसित जीव का मार्जन होगा।

रोगियों के बीच स्वस्थ जीव सबसे बड़ी मुसीबत है, रोगी ये चाहते हैं कि स्वस्थ भी शीघ्रातिशीघ्र रोग से ग्रसित हो जाये और हमारी जमात में शामिल हो जाये। रोगियों की आँख में खटकता है स्वास्थ क्योंकि स्वास्थ्य रोगियों को मुँह चिढ़ाता है, उनके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाता है, शिव भी सब की आँखों में खटकते हैं। खटकने की यह परम्परा तो दक्ष ने ही शुरु कर दी थी। दक्ष के रोग ग्रसित यज्ञ का विध्वंस करा शिव ने। वीरभद्र ने दक्ष के मुण्ड को ही काटकर यज्ञ कुण्ड में फेंक दिया, शिव निंदा के रोग से ग्रसित ब्राह्मण, ऋषि क्षत विक्षत हो गये थे। शिव के परम स्वास्थ्य को छोड़कर सृष्टि रोग से ग्रसित देवियाँ नग्न कर दी गई थीं, दक्ष यज्ञ ध्वंस में शिव गणों द्वारा रोगियों को चाहे वे ब्रह्मा हों या विष्णु, इन्द्र इत्यादि को अपने तथाकथित, परम गोपनीय संसार रोग का भान हो ही गया। पुनः पहुँचे शिव के पास आरोग्य प्राप्ति हेतु । ब्रह्मा को भी दम्भ का रोग लग गया था, विष्णु को भी बैकुण्ठ का रोग लग गया था, लक्ष्मी भी रोग ग्रसित हुई हैं, वे भी विष्णु द्वारा शापित हो अश्व रूपा बनीं और लिंगार्चन कर विष्णु शाप के रोग से मुक्त हुई हैं। विष्णु भी असुर शोक के रोग से ग्रसित थे तब लिंगार्चन कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया। विष्णु में सुदर्शनता तो लिंगार्चन की ही देन है, शिव की ही देन है। आज भी विष्णु सुदर्शन हैं, आज भी लक्ष्मी शाप मुक्त हैं तो लिंगार्चन की क्रिया के माध्यम से ही।

कितना बड़ा दण्ड है किसी के धड़ पर बकरे का सिर लगा देना । दक्ष को निरीह बनाया शिव ने बकरे की आँखों में देखो वह इस पृथ्वी का सबसे निरीह जीव है, उसकी आँखें शिव शरणम् का द्योतक हैं। हिंसक दक्ष बकरे का सिर पा निरीह बन गया और शिव शरणम् का अविष्कार हो गया, निरीहता सृष्टि में उत्पन्न हो गई दक्ष के माध्यम से, जीवित तो किया पर निरीह बनाकर शिव ने, तब से लेकर आज तक निरीह की रक्षा के लिए शिव एक पैर पर खड़े रहते हैं। जो जितना ज्यादा निरीह उस पर शिव की उतनी ज्यादा कृपा। किसी के हाथ पाँव उल्टे जोड़ दिए, किसी के टेढ़े मेढ़े जोड़ दिए, किसी के कम ज्यादा जोड़ दिए, जहाँ मन चाहा वहाँ अंग लगा दिए। यह हाल हुआ दक्ष यज्ञ में मृत, घायल, शिव निंदा रोग से ग्रसित विद्वानों का। इस पृथ्वी पर अंग-भंग, अंग- प्रत्यंगों में विकृति लिए हुए विचित्र प्रकार के अंग प्रत्यंग लिए हुए जीव आपको मिल जायेंगे। लक्षण पूर्व की घटना के द्योतक हैं, यह लक्षण बताते हैं कि कभी शिव गणों के हाथ पिटे थे, कभी शिव के कोप को झेला था, कभी शिव निंदा की थी अपनी कर्मेन्द्रियों के द्वारा। शिवालय के आस-पास, ज्योतिर्लिंगों के आस-पास इस तरह के जीव बैठे रहते हैं।

सती ने प्राण क्या त्यागा शिव गण रुद्र हो बैठे, भीषण हो बैठे। स्वयं अपने मस्तकों को काट दिया, स्वयं अपने अंग-अंग काट-काट कर फेंक दिए, स्वयं हवन कुण्ड में कूद गये, स्वयं अपनी छाती फाड़ ली, स्वयं अपना लंहू शरीर से निकालकर फेंक दिया अर्थात आत्मोत्सर्ग की शक्ति अविष्कृत हो गई, आत्मबलिदान का प्राकट्य हो गया और छिन्नमस्ता ने स्वरूप ले लिया। आत्मोत्सर्ग की देवी हैं छिन्नमस्ता । .

(क्रमशः)

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संसार रोग हरणम् (१)
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संसार रोग से ग्रसित हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का विवाह विष्णु से तय करने की ठानी। हिमालय की नजर में शिव रोगी थे, यही तो विडम्बना है, इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि रोगी रोग नहीं पहचान पाता। रोग को पहचान ले तो फिर शिव नहीं हो जायेगा। स्व उपचार,स्व आरोग्यता,स्व रोगविहीनता ही अध्यात्म है। कहीं तुम्हें आत्म प्रशंसा का रोग तो नहीं लग गया,कहीं तुम्हें सुरक्षा का रोग तो नहीं लग गया,कहीं तुम्हें पंथ या किसी महापुरुष के आकर्षण का रोग तो नहीं लग गया,लग गया हो तो बता देना । चिकित्सकों की जरूरत हर स्तर पर जीव को इस संसार में पड़ती है। आध्यात्मिक रोगों के लिए आध्यात्मिक चिकित्सक,समझने समझाने के रोग से मुक्ति के लिए समझने और समझाने वाले प्रवचनबाज चिकित्सकों की जरूरत । आध्यात्मिक धरातल पर विपन्न हुए लोगों को तथाकथित गुरुओं और वंश से चिकित्सा की जरूरत महसूस होती है। चिकित्सकों की जरूरत स्वयं अपने आपमें महारोग है इसलिए आजकल जिधर देखो उधर आध्यात्मिक चिकित्सक मिल जायेंगे। वास्तु रोग चिकित्सक मिल जायेंगे। वास्तु रोग चिकित्सक,पिरामिड चिकित्सक,हस्तरेखा चिकित्सक चलो बंद करता हूँ ज्यादा समय खराब न हों।

परन्तु मजेदार बात यह है, गूढ़ तत्व यह है कि चिकित्सक स्वयं रोगी हैं और उनके चिकित्सक हैं उनके रोगी। अर्थात रोगी चिकित्सक हैं और चिकित्सक रोगी। समझ समझ के भी जो न समझे मेरी समझ में वह ना समझ है। हाथ जोड़कर विनती है "शिव शरणम गच्छामि " शिवाय नमः शिवंलिंगाय नमः, भवाय नमः, भव लिंगाय नमः, शर्वाय नमः, शर्वलिंगाय नमः, भीमाय नमः भीमलिंगाय नमः, बलाय नमः, बलनाथाय नमः, यही मूलभूत औषधि है इसके ऊपर की परम औषधि है हराय नमः, हर नाथाय नमः और इससे भी ऊपर के सूक्ष्मातीत औषधि है ॐ नमः शम्भवाय च मयोभयाव च नमः शंकराय च मयस्कराय च, नमः शिवाय च शिवतराय च । अंत मे आरोग्यता का महामंत्र है शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

परम प्रतापी अंगिरा ऋषि के महातेजस्वी पुत्र थे अंगीरस । शिव के प्रेम में ओत- प्रोत बस पहुँच गये काशी,निर्मित किया शिवलिङ्ग और घुस गये गुफा के अंदर वृहद तपस्या हेतु पता नहीं कितने वर्ष बीत गये,आ गये शिव जी बोले अंगीरस तेरी तपस्या तो अत्यंत वृहद है अतः मैं तुझे वृहद् बना देता हूँ आज से तू वृहस्पति और तेरे शिवलिङ्ग का नाम वृहदेश्वर। आज से तू देवताओं का गुरु और जो भी तेरे शिवलिङ्ग का पूजन करेगा वह इस संसार में जगद्गुरु के नाम से विख्यात् होगा। शिव का आदेश आदि शंकर ने भी जगत्गुरु की पदवी प्राप्त करने के लिए वृहदेश्वर का अर्चन किया,कृष्ण ने भी यही किया। शिव, शिवलिङ्गों को गोपनीय कर देते है, शिव शिवलिङ्गों को दुर्गम कर देते है, शिव शिवलिङ्गों तक साधकों को पहुँचने नहीं देते क्योंकि अगर पहुँच गया तो वह प्राप्त हो जायेगा जो शायद विधाता ने उसकी किस्मत में न लिखा हो शिव विष्णु का मान रखते हैं,महामाया का सम्मान रखते हैं क्योंकि शिव व्यवस्था में पाप और पुण्यों का लेखा जोखा नहीं है।

चित्रगुप्त की किताब का महत्व शून्य है, ब्रह्मा की लेखनी की शिव को कभी परवाह नहीं रही। जीव कह उठता है। देवी लोक में देवी ने डाँट कर भगा दिया कहा जा मुझे फुर्सत नहीं है अभी मैं असुरों के विनाश में लगी हुई हूँ,नियम बड़े कड़े हैं, पृथ्वी तो सामाजिक और बेतुके नियम से शासित है मनुष्य तो मनुष्य को भगाता ही है,मनुष्य,मनुष्य को क्या शरण देगा ? पशु तो हिंसक हैं भक्षण कर जायेंगे,देवता कदापि जीव का सानिध्य पसंद नहीं करते एवं उसे हेय दृष्टि से देखते हैं,बैकुण्ठ में तो सात्विकता है विष्णु आसानी से प्रविष्ठी नहीं देते,कर्मों की बात करते हैं। कर्म आधारित गीता सुनाते हैं,यमराज तो पाप और पुण्यों का सांख्य योग लगाते हैं अतः अंत में थक हारकर सब तरफ से निष्कासित,अल्प बुद्धि,निरीह जीव को केवल शिव ही शरण देते हैं। शिव लोक का नियम ही यही है कि सब लोकों से निष्कासित,सब लोकों से तिरस्कृत,सब लोकों के अयोग्य जीव को केवल एकमात्र शिव ही शरण देते हैं, वे ही गले लगाते हैं, वे ही सानिध्य देते हैं क्योंकि शिव को ही जीव से प्रेम है। यह है शिव लोक की विहंगमता,इसी कारणवश दुर्लभ शिवलिङ्ग गोपनीय हो गये हैं।

शिव नित्य प्रतिनित्य कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करते, लोकान्तर की व्यवस्था नहीं बिगाड़ते। ब्रह्मा की लेखनी को सामान्यतः मिथ्या साबित नहीं करते परन्तु शिव शिव हैं। स्वयं कालकूट विष पिया,विष को कण्ठ से नीचे उतरने नहीं दिया क्योंकि उदरस्थ प्राणियों से प्रेम था और नील कण्ठेश्वर हो गये। जिन देवताओं को अमृत दिया उनके पद बदलते हैं, इन्द्र का पद बदलता है, ब्रह्मा का पद बदलता है, विष्णु के भी अवतार होते रहते हैं अतः शिव अमृत से ऊपर की स्थिति हैं,शिवत्व के
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(क्रमशः)

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@Sanatan
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संसार रोग हरणम् (२)
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आगे अमृत्व हीन है। शक्ति तो शिथिल होती है, रोगग्रस्त होती है अतः पुनः ऊर्जावान होने के लिए, पुनः स्वस्थ होने के लिए शिव सानिध्य में विराजती है। यही भैरवी रहस्यम् है । काली के चरणों में शिव लेट जाते हैं जिससे कि काली पवित्र बनी रहे । राजराजेश्वरी लेटे हुए सदाशिव के ऊपर विराजती हैं, राज राजेश्वरी राजाओं की अधिष्ठात्री हैं एवं शिव नीचे से देखते रहते हैं, त्रिशूल लिए हुए सतर्क रहते हैं ।

सभी देवियों के साथ धीरें से शिव जाकर विराजमान हो जाते हैं, वे शक्ति को अकेला नहीं छोड़ते। सिंह के ऊपर सदाशिव लेट गये और उनके नाभिकमल पर कामाख्या विराजमान हो गईं, आधार शिव ही देते हैं। जगत जननी पार्वती रत्न जड़ित सिंहासन पर बैठी हुई हैं अभी शिव से विवाह होने वाला था बस छः वर्ष के बालक का रूप धर शिव आ गये और पार्वती के सामने नृत्य करने लगे। पार्वती की दृष्टि शिव पर अटक गई। नाचते-नाचते पार्वती की गोद में चढ़कर बैठ गये शिव। सब देवताओं ने जोर लगा लिया पर शिव को पार्वती की गोद से नहीं उतार पाये, भैरव आ गये, यह है भैरव रहस्यम् । शक्ति के पीछे-पीछे चलते है भैरव, शक्ति की गोद में खेलते है भैरव मातृत्व की सृष्टि हो गई, माँ की गोद से बच्चे को अलग करके दिखाओ। सर्वप्रथम यह सृष्टी जीवन विहीन थी बस चारों तरफ जड़ पिण्ड घूम रहे थे अचानक विराट पुरुष ने असंख्य जीवों का निर्माण कर सब के अंदर अपने आपको स्थित कर लिया और इस प्रकार सृष्टि जीवमय हो उठी।

शिव का एक कार्य है सब जगह जाकर बैठ जाऊं चाहे किसी भी रूप में क्यों न बैठना पड़े। विष्णु के हृदय में बैठ गये, योगमाया की गोद में बैठ गये, राम के पास हनुमान के रूप में बैठ गये, कृष्ण के पास राधा के रूप में बैठ गये, अर्जुन के पास भील के रूप में जाखड़े हुए, उमा तपस्या कर रही थीं वृद्ध ब्राह्मण के रूप में पहुँच गये। संसार रोग का वर्णन करने लगे, कहने लगे शिव के पास कुछ नहीं है नग्न हैं, दरिद्र हैं, महल भी नहीं है, सिंहासन भी नहीं है, मुकुट भी नहीं है इत्यादि इत्यादि कहाँ पड़ी है चक्कर में, विष्णु से विवाह कर ले। परख रहे थे पार्वती की आरोग्यता, कहीं रोगिणी को गले न लगा लूं परन्तु पार्वती आरोग्यता का कुण्ड निकलीं। शिव भी उन्हें संसार रोग से ग्रसित नहीं कर पाये। शिव परम वैभव स्वरूपाय हैं। शिव की बारात जा रही थी लोगों ने विष्णु के वैभव को देखा सोचने बैठे यही शिव हैं विष्णु बोले नहीं भाई हम तो शिव के उपासक हैं फिर इन्द्र के वैभव को देखा तो लोग उन्हें शिव समझकर उनकी तरफ दौड़ पड़े, इन्द्र ने विनम्रता से कहा हम तो शिव के उपासकों के भी उपासक हैं। प्रजापति का वैभव देखा तो लोगों ने सोचा शायद यही शिव हैं परन्तु प्रजापति बोल उठे नहीं हम तो पृथ्वी पर शिव के सकाम लिंग के पूजक हैं, हम कैसे शिव हो सकते हैं?

राजा हिमालय की प्रजा सोचने लगी जब इतने सारे वैभवशाली शिव के उपासक हैं तो फिर शिव का वैभव तो अद्भुत ही होगा परन्तु क्या देखते हैं बूढ़े नंदी पर सवार नंग-धड़ंग शिव, भूत-प्रेतो, आढ़े तिरछे, आधे अधूरे, चित्र-विचित्र, महाविकराल सेवकों और गणों के साथ चले आ रहे हैं। ये शिव हैं, ये शिव का वैभव, ये कैसा वैभव ? किसी की कुछ समझ में नहीं आया और न कभी आयेगा । वैभव देखा हो तो वैभव को पहचाने बस इतनी सी बात है। आगे कुछ नहीं कहना है। विवाह प्रारम्भ हुआ आचार्य ने पूछा शिव के पिता कौन ? ब्रह्मा बोले मैं हूँ इनका पिता, आचार्य पुनः बोला पितामह कौन ? विष्णु बोले मैं इनका पितामह, आचार्य ने पुनः पूछा शिव के पर पितामह कौन ? बस शिव बोल उठे मैं ही सबका बाप हूँ, यही मेरा परिचय है। सभा में सन्नाटा छा गया आचार्य ने जल्दी-जल्दी फेरे लगवा दिए, यही शिव का परिचय है। स्वयं के मुख से स्वयं का परिचय, अतः जो शिव ने कहा वही शाश्वत्।

(क्रमशः)

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संसार रोग हरणम् (३)
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शिव ही सबके पिता हैं। 19 वीं सदी खत्म हो गई है एवं बीसवी सदी प्रारम्भ हो गई हैं। 19 वीं सदी की सबसे भयंकरतम भूल मानव समाज ने यह की कि अध्यात्म को गौण समझा, वेद एवं शैव साहित्य को एक तरह से नष्ट करने की कुचेष्ठा की। 15 वीं सदी से हम देखें या फिर हमें 1500 वर्ष का इतिहास देखना पड़ेगा तो मानव समाज पतोन्मुखी क्यों हुआ ? पहली बात पिछले 1500 वर्षों में मानव समाज में कृत्रिम आध्यात्मिक महापुरुषों का अभ्युदय हुआ, कृत्रिम धर्मों का निर्माण हुआ, शरीर धारियों की पूजा प्रारम्भ हुई जो कि मानव समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई। वैसे इसकी शुरुआत कृष्ण के जमाने से हो गई थी। गीता के कुछ श्लोकों को कृष्ण प्रेमियों ने अति में तोड़-मरोड़कर कृष्ण की गलत ढंग से उपासना प्रारम्भ की फिर देखा देखी विश्व के अनेक हिस्सों में इस तरह का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। नई-नई, आधी-अधूरी पुस्तकों का निर्माण हुआ। जीवन दर्शन पुरंजक आधारित एवं व्यक्ति विशेष आधारित हो गया बस इसी कारणवश आपसी टकराव एवं धर्म के नाम पर भयंकर रक्तं पात हुआ, अभी भी यह चल रहा है। इन मार्गों से किसी ने भी पूर्णत्व प्राप्त नहीं किया।

अगर आप एक पंथ या धारा विशेष में क्रियाशील होते हैं तो इसका तात्पर्य है आप असुरक्षा के रोग से ग्रसित हैं। आप अप्राकृतिक शरण के जिज्ञासु हैं। एक सम्प्रदाय विशेष के पूजा स्थलों पर निवास करना, एक सम्प्रदाय विशेष के हाथों भोजन करना, उन्हीं में अपनी ऊर्जा नष्ट कर देना अध्यात्म नहीं है। अध्यात्म के मार्ग पर चले सरलीकरण का विधान नहीं ढूंढते। एक धारा विशेष के सिद्धातों को प्रतिपादित करना, आज से 1500 या 2000 वर्ष पूर्व किसी हाड़-मांस के व्यक्ति के कथनों को दोहराना कहाँ का अध्यात्म है ? मदर टेरेसा ने अपनी निजी डायरी में लिखा ईश्वर हैं भी कि नहीं मुझे विश्वास नहीं। दलाई लामा नें कहा मुझे भी शंका है ईश्वर के अस्तित्व पर इत्यादि ऐसे ही उद्गार एक धारा विशेष में काम करने वाले लोगों को सबसे बड़ा दण्ड है। सारा जीवन धर्म का उपदेश दिया सारा जीवन धर्म की चादर ओढ़कर बिता दी, धर्म की रोटी खाई, धर्म के नाम पर माला पहनी परन्तु मरते वक्त तक भी हृदय पर हाथ रखकर ये न कह सके कि हमें ईश्वर ने दर्शन दिया। अब क्या बचा ? इससे बड़ा दण्ड क्या हो सकता है ?

शून्य से ऊपर उठने की कला आपने कभी सीखी ही नहीं है। पाशुपतास्त्र आपने कभी अंगीकार किया ही नहीं, अण्ड को फोड़कर निकलने की ताकत आपमें है ही नहीं आपने तो बस एक धारा में बहने का संकल्प जो ले लिया था, शिवत्व आपमें है ही नहीं। आत्म अवलोकन जरूरी है। आज आप सभी से यही बोल रहा हूं कि सनातन धर्म की धारा को मत छोड़ना । कभी पंथ, वंशवाद, व्यक्ति पूजन इत्यादि में मत पड़ना । शिव शाश्वत् है। शाश्वतता से ही प्राकृतिक का जन्म होता है, शाश्वतता का चिन्ह हैं प्राकृतिक । प्राकृतिक अर्थात मानव हाथों से सर्वथा अनिर्मित । वेद के रचयिता कौन हैं ? कोई मनुष्य नहीं हैं, वेदों के ऊपर किसी लेखक का नाम नहीं लिखा है अतः वेद शाश्वत् हुए। आप वृक्ष से फल प्राप्त कर अगर सेवन करते हैं तो उसकी गुणवता मानव निर्मित कारखाने में उपलब्ध अप्राकृतिक पेय से कई गुना ज्यादा होगी एवं वह शरीर को शिवत्व भी प्रदान करेगी। ठीक इसी प्रकार शाश्वत् ज्ञान संस्थागत मनुष्य बुद्धि निर्मित ज्ञान की अपेक्षा ज्यादा हितकर है। इसका एकमात्र उपाय है योगात्मक, साधनात्मक एवं तंत्रात्मक जीवन तंत्र साधनाओं के माध्यम से प्राप्त शक्ति अमृतमयी होगी।

पिछले सौ वर्षों में जन मानस नास्तिक क्यों बना ? कम्युनिष्ट क्यों बने ? धर्म से विरक्त लोग क्यों हुए? क्योंकि अप्राकृतिक, शिवत्व विहीन धर्मत्व का निर्माण हुआ। लोगों ने एक झटके से धर्म को नकार दिया, अच्छा किया। विषाक्त भोजन करने से अच्छा तो उपवास करना है। अप्राकृतिक धर्म के (साइड इफेक्ट्स) भी ऐलोपैथी दवाओं के समान हैं। मानव जगत ने इसे महसूस किया इसलिए सेवन बंद कर दिया, आप सबको सोचना पड़ेगा। शिव के सामने नंदीश्वर विराजमान हैं, नंदी धर्म का प्रतीक हैं, नंदी ब्रह्मचर्य का प्रतीक है अतः नंदी खतरनाक हुआ क्योंकि धर्म में प्रचण्ड बल है, ब्रह्मचर्य से अघोर बल की उत्पत्ति होती है इसलिए शिव नंदी के ऊपर विराजमान हैं। धर्म के ऊपर आरूढ़ हैं शिव, ब्रह्मचारियों की पीठ पर बैठे हैं शिव। धर्म को नियंत्रित करना ब्रह्मचर्य को नियंत्रित

(क्रमश:)

🙏
@Sanatan
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संसार रोग हरणम् (४)
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करना, शिव के ही बस में है। सर्पों की दो जीभ होती है। अतः धर्म की बातें करने वाले एक जीभ से कुछ स्पंदन करते हैं तो दूसरी जीभ से कुछ और इसलिए शिव इन्हें अपने पास रखते हैं। ब्रहचारी बहुत खतरनाक होते हैं उल्टी सीधी व्यवस्था कर सकते हैं, अध्यात्म को तोड़-मरोड़कर पेश कर सकते हैं, धारा को परिवर्तित कर सकते हैं, गंगा को उल्टी दिशा में बहा सकते हैं अतः इन पर नियंत्रण अत्यधिक आवश्यक हैं, इन्हें शिव को ढोना ही पड़ता है। शिव के सामने नंदी रखा ही जाता है नहीं तो शिव के तेज को जनमानस नहीं झेल सकता।

तीन बिल्व पत्र चबा लो, भीषण से भीषण नशा उतर जायेगा। शरीर कितना भी विषाक्त हो गया हो बिल्व पत्र खाना शुरु कर दो, कठिन से कठिन गुप्त रोगों का विष भी मर जायेगा। मस्तिष्क रोग से ग्रसित होने पर, बुद्धि मंद पड़ जाने पर, यौवन नष्ट होने की स्थिति में बिल्व का शर्बत पीना शुरु कर दो। 21 दिन में चमत्कार हो जायेगा और ताप नियंत्रित हो जायेंगे। रुद्राक्ष गले में धारण कर लो रक्त चाप, दुःस्वप्न, कुविचार, हिंसा इत्यादि स्वतः ही नियंत्रित हो जायेगी। दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल देंगे रुद्राक्ष ! अकाल मृत्यु, अपमृत्यु, ग्रहबाधा निवारणार्थ, उन्नति हेतु रुद्राक्ष तो धारण करना ही पड़ेगा। मुधमेह के रोगियों के लिए तो बिल्व पत्र अमृत तुल्य है, जो कुछ शिव को चढ़ता है वह सब अमृत मय होता है।

शिव शासनत: शिव शासनत:
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विष हरणम् (२)
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दस महाविद्याएं शिवलीला के कारण ही प्रादुर्भावित हुई हैं एवं इन्हीं महाविद्याओं के अंश से अनेकों उपविद्याएं, अनेकों उप संवेदनाएं और भाव सृजित हुए हैं। सबसे विहंगम भाव आत्मोत्सर्ग की देवी छिन्नमस्ता का है। सीता भूमि में समा गईं, पार्वती ने देह त्याग दी, कृष्ण की चिता में उनकी समस्त रानियाँ प्रविष्ट हो गई, युद्ध क्षेत्र में वीर आत्मोत्सर्ग कर देते हैं, काशी के कपालेश्वर में शैव मतावलम्बी कपाल मोचन करवा लेते हैं, तपस्वी स्वेच्छा से प्राणों का उत्सर्ग कर लेते हैं, स्वेच्छा से प्राणों का उत्सर्ग यही छिन्नमस्ता का लक्षण है जो कि दक्ष यज्ञ के समय सृष्टि में प्रादुर्भावित हुआ। जैन साधक सल्लेखना के द्वारा प्राण त्याग देते हैं, भीष्म ने भी इच्छा मृत्यु वरण कर ली। जाना है मतलब जाना है, यह है मृत्यु पर विजय, यह है प्रचण्ड शिव बल।

मृत्यु तू दूर हट, तेरी जरूरत नहीं है जब जाना होगा अपनी मर्जी से जायेंगे। जिस प्रकार जाना होगा उस प्रकार जायेंगे, जिस समय मृत्यु को बुलाना होगा उसी समय तू आना अन्यथा तेरे आने की जरूरत नहीं है, तेरे अधीन हम नहीं हैं, जब तक तेरा आह्वान न करें तू आना मत। मृत्यु बार-बार आये दरवाजा खटखटाकर चली जाय तो यह छोटा-मोटा तपोबल हुआ अतः इसमें साधक मृत्युभय रोग से नहीं उबरा परन्तु मृत्यु तू चुपचाप बैठ, जब तक निमंत्रण न दे दरवाजे पर मत आना, यह हुई शिव स्थापना। मृत्यु की आँख में आँख डालकर बात करने का बल, शिव योगी स्वेच्छा से शरीर इसी प्रकार त्यागते हैं। और दूसरा शरीर इस प्रकार ग्रहण करते हैं जैसे कि वस्त्रों के आवरण बदले जाते हैं एवं अपने साथ पूर्व जन्मकृत कर्मों की श्रृंखला पूरी तरह मानस में सचेत रखते हैं। इस प्रकार का बल प्राप्त कर लेने के पश्चात् ही अमृत्व की प्राप्ति होती है और जीव मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है अगर नवीन जन्म में प्राचीन जन्मों की चेतना पूर्ण रूप से चैतन्य है तो फिर मृत्यु हुई ही कहाँ ? इस प्रकार मृत्यु रूपी रोग पर जीव विजय प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मा ने सर्वप्रथम ऋषियों की संरचना की, ऋषि मनुष्यों के पूर्वज हैं फिर भी रोग ग्रस्त क्यों हैं परन्तु मनुष्यों की अपेक्षा न्यूनतम संसार रोग से ग्रसित हैं, शिव ने सोचा कि चलो परीक्षा लें। दिगम्बर शिव ऋषियों के आश्रम के पास अपना तेजोमय लिंग हाथ में लिए हुए निकल पड़े, ऋषि पत्त्रियाँ मोहित हो गईं। प्रथम लिंग और वह भी पूर्ण आरोग्य से दैदीप्यमान निश्चित ही शक्तियों को आकर्षित तो करेगा ही। काम रोग से ग्रसित, भावनाओं के अधीन, संवेदनाओं से आबद्ध, मल- मूत्र, वीर्य के उत्सर्जन के रोग से ग्रसित लिंग और सम्पूर्ण आरोग्यवान शिवलिंग में तुलना करना मूर्खता है। ऋषियों को यह अच्छा नहीं लगा, अघोर शिव बल में से ही कुछ अंजलि घोर शाप बल का उपयोग कर ऋषियों ने तेजोमय लिंग के पात का श्राप दे दिया। एक खास बात है, अविष्कारक अविष्कार की लाज रखता है अतः बल के अविष्कारक शिव ने ऋषियों के शाप बल की लाज रखी अन्यथा शिव भी रोग ग्रसित हो जाते, बल के रोग से ग्रसित हो जाते। ग्रसित होना शिव का कार्य नहीं है, यह तो शक्ति की विवेचना है। शक्ति ग्रसित करती है। हिमालय की चोटियों को बादल आच्छादित करते हैं, वे ग्रसित करते हैं, वे उसे ढकते हैं, वे उसे आवरण देते हैं। तेजोमय लिंग का पात हो गया परन्तु ऋषि घबरा उठे उसके तेज को पृथ्वी सहन नहीं कर पा रही थी, आरोग्य के तेज के सामने रोग का ताप फीका पड़ ही जाता है। ऋषि पत्त्रियाँ ग्रसित थीं मुग्धता के रोग से, ऋषि ग्रसित थे सामाजिक भावनाओं के रोग से, असुरक्षा की भावना के रोग से।

इस संसार को मैंने रोगी क्यों कहा? क्योंकि संसार महामाया की अनंत शक्तियों के अधीन है, महामाया की अनंत शक्तियाँ संसार के जीवों को हमेशा यह मिथ्या अहसास दिलाती हैं कि वे उनके समीप हैं, उनकी समीपता के रोग से ग्रसित जीव जब यह महसूस करते हैं कि शक्ति कहीं और आकर्षित हो रही है, शक्ति शिवत्व की तरफ भाग रही है तो वे व्याकुल हो उठते हैं और भरसक प्रयत्न करते हैं कि शिवत्व अर्थात आरोग्य यहाँ से हट जाये। यहीं पर बस द्वेष, कुण्ठा, युद्ध इत्यादि की शुरुआत होती है आखिरकार ऋषियों को हैमवती उमा का आह्वान करना पड़ा, परम आरोग्यवान योगमाया की स्तुति करनी पड़ी कि सम्हालो शिव के तेजोमय प्रकाश को और ऐसा ही हुआ। रोगों का हरण शिव का मुख्य कार्य है, अग्नि भी रोग से पीड़ित हुई, उसका भी पाचन बिगड़ा तो उसने भी शिवार्चन ही किया। देवताओं ने शिव से कहा अग्निदेव के माध्यम से हम भोजन ग्रहण करते हैं अतः उन्हें आरोग्य प्रदान करें। देवता भी देवासुर संग्राम के पश्चात विजय रोग से ग्रसित हो गये,

(क्रमशः)

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शास्त्रों के अनुसार शिव भस्म बनाने कि विधि


जिसे शुद्ध व पावन माना जाता है। ये हैं चीज़ें जिसे मिलाकर बनाई जाती है गृहस्थ आश्रम शिव भस्म

1- गाय के गोबर कंडे
2- बिल्व वृक्ष की लकड़ी
3- शमी की लकड़ी
4- पीपल की लकड़ी
5- पलाश की लकड़ी
6- बड़ (बरगद) की लकड़ी
7- अमलता की लकड़ी
8- बेर वृक्ष की लकड़ी
9- नीम की छाल
10- काजू
11- बदाम बड़े वाले
12- शुद्ध गाय का घी
13-त्रिफला चूर्ण आदि - जब भस्म बनकर तैयार हो जाए तो उस भस्म का सफ़ेद भाग निकालकर अलग रख लें, यही सफ़ेद भाग (भस्म) पूजा में काम आता है ।

भगवान शिव के शिवलिंग पर तीन आड़ी रेखायें इस भस्म से बनायें, इसे त्रिपुण्ड्र कहते हैं ।
मध्यमा और अनामिका दो अँगुलियों से दो रेखायें खींचें और अंगूठे से बीच की रेखा विपरीत दिशा में खींचें ।

शिवजी को लगाने के बाद स्वयं भी शिव पञ्चाक्षर मंत्र "नमः शिवाय" का 3 बार उच्चारण करते हुए पहले मस्तक पर, दोनों भुजाओं पर, ह्रदय में एवं नाभि आदि इन पांच स्थानों पर त्रिपुण्ड्र अवश्य लगायें।

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‌ साभार - मनीष शेखर
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द्वादशज्योतिर्लिंग पूजन
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द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग यंत्र या फिर शिव विग्रह के पर नीचे वर्णित श्लोकों का पाठ करते हुए उनके ऊपर एक-एक कमल या बिल्व पत्र या फिर पुष्प इत्यादि अर्पित करते जायें अगर उपरोक्त वर्णित वस्तुएं आपके पास न हों तो शिव जी के ऊपर जल का अभिषेक करते हुए इन श्लोकों का पाठ करते हुए आप भारतवर्ष में स्थित बारह ज्योतिर्लिङ्गों का अभिषेक घर बैठे ही सम्पन्न कर लेंगे।

ॐ सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकला वसन्तम । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥
॥ ॐ सोमनाथाय नमः ॥

ॐ श्रीशैलश्रृंगे विबुधातिसंगे तुलाद्रितुंगेऽपि मुदा वसन्तम्। तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसार समुद्रसेतुं ॥
॥ ॐ मल्लिकार्जुनाय नमः ॥

ॐ अवन्तिकायां विहितावतारं भक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्यो परिरक्षणार्थं वन्देमहाकाल महासुरेशम् ॥
॥ ॐ महाकालेश्वराय नमः ॥

ॐ कावेरिकानमर्दयोः पवित्रे समागमे सज्जन तारणाय ।
सदैव मान्धातृपदे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे ॥
॥ ॐ ओंकारेश्वराय नमः ॥


ॐ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिका निधाने सदा वसन्तं गिरजासमेतं । सुरासुरैराधित पादपद्मं श्रीवैद्यनाथं शरणं प्रपद्ये ॥
॥ ॐ वैद्यनाथाय नमः ॥

ॐ याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः । सदभक्तिमुक्तिं प्रदमेकमीशं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥
॥ ॐ नागनाथाय नमः ॥


ॐ महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रै । सुरासुरैयक्षमहोरगाद्यै केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥
॥ ॐ केदारनाथाय नमः ॥

ॐ सह्याद्रिशीर्षे विमलेवसन्तं गोदावरीतीर पवित्रदेशे । यद्दशनात्पावकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥
॥ ॐ त्र्यम्बकेश्वराय नमः ॥

ॐ सुताम्रपर्णी जलराशियोगे निवद्धसेतुं विशिखैरसंख्यैः । श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तत् रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥
॥ ॐ रामेश्वराय नमः ॥

ॐ यं डाकिनी शाकिनिका निसेव्यमानं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपद प्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥
॥ ॐ भीमशंकराय नमः ॥

ॐ सानन्दमानन्दवने वसन्तं आनन्दकन्दं हृतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥
॥ ॐ काशीविश्वनाथाय नमः ॥

ॐ इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसंतं च जगद्वरेण्यं । वन्दे महोदारतर स्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शिवमेकमीडे ॥
॥ ॐ घृष्णेश्वराय नमः ॥

ॐ ज्योतिर्मयं द्वादश लिङ्गकां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोति भक्तया फलं तदालोक्य निजंभवेच्च ॥
॥ द्वादशज्योतिर्लिङ्ग देवताभ्यो नमः ॥

‌ शिव शासनत: शिव शासनत:
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शिवजी को प्रसन्न करने के उपाय

शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय काले तिल मिलाएं। इस उपाय से शनि दोष और रोग दूर होते हैं।

बीमारियों के कारण परेशानियां खत्म ही नहीं हो रही हैं तो पानी में दूध और काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। ये उपाय रोज़ करें।

मनचाही गाडी चाहते हैं तो शिवलिंग पर रोज़ चमेली के फूल चढ़ाएं और शिव मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जप 108 बार रोज़ करें।

जो लोग शिवरात्रि पर किसी बिल्व वृक्ष के नीचे खड़े होकर खीर और घी का दान करते हैं, उन्हें महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसे लोग जीवनभर सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं और कार्यों में सफल होते हैं।

शिवपुराण के अनुसार बिल्व वृक्ष महादेव का रूप हैं। इसलिए इसकी पूजा करें। फूल, कुमकुम, प्रसाद आदि चीज़ें विशेष रूप से चढ़ाएं। इसकी पूजा से जल्दी शुभ फल मिलते हैं। शिवरात्रि पर बिल्व के पास दीपक जलाएं।

जल चढ़ाते समय शिवलिंग को हथेलियों से रगड़ना चाहिए। इस उपाय से किसी की भी किस्मत बदल सकती हैं।

जल में केसर मिलाएं और ये जल शिवलिंग पर चढ़ाएं। इस उपाय से विवाह और वैवाहिक जीवन से जुडी समस्याएं खत्म होती हैं।

जय श्री महाकाल
साभार.......

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महाकाल संहिता
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आज आप जो उज्जयिनी देख रहे हैं वह तो वास्तविक उज्जयिनी का एक खण्ड है। वास्तव में उज्जयिनी त्रिकोणात्मक है अर्थात महाकाली का क्षेत्र । वास्तविक उज्जयिनी आज के निमाड़ अंचल तक फैली हुई थी । उज्जयिनी की सीमा रेखा एक तरफ नर्मदा भी तय करती हैं। शिव ने घोर तपस्या की और इस तप के प्रभाव से श्वेत-स्वेद शिव के शरीर से बह निकला और इस प्रकार शिव पुत्री नर्मदा का प्राकट्य हो गया । पुत्र तो गणेश और कार्तिकेय हैं ही, ये घोषित पुत्र हैं परन्तु इनके अलावा मंगल भी शिव पुत्र हैं। शिव जब सति वियोग में दग्ध थे तब उनके पसीने की कुछ बूंदें पृथ्वी ने धारण कर ली और वह स्थान था उज्जयिनी, पृथ्वी और शिव के मिलन से शिव पुत्र मंगल का उदय हुआ। मंगल नाथ भी शिव के समान अति सुन्दर हैं और शिवलिङ्ग रूप में ही उज्जयिनी में विराजमान हैं एवं इन्हें सिन्दूर चढ़ता है। मांगलिक दोषों का निवारण इसी मंदिर में होता है।

उज्जयिनी की विशेषता यह है कि सब यहाँ पिण्डी रूप में हैं। काली भी पिण्डी रूप में, महाकाल भी पिण्ड हैं, गणेश भी पिण्ड हैं ग्रह भी पिण्ड हैं, देवी भी पिण्ड हैं, भैरव भी पिण्डी रूप में हैं और पिण्ड स्वरूपों में से आकृतियाँ निकल रही हैं। महाकाल के गर्भ ग्रह में भस्म आरती के पश्चात शिव मुख उकेरा जाता है। महादेव मुखाकृति ग्रहण करते हैं एवं इसी के पश्चात् अन्य पिण्डी रूपी देवताओं और देवियों को भी श्रंगारित किया जाता है। वे भी मुखाकृति ग्रहण करते हैं। यह सृष्टि का प्रजनन केन्द्र है जो कुछ होता है सर्वप्रथम यहाँ होता है और कालान्तर कई कल्पों से विश्व के विभिन्न हिस्सों में वह स्थानांतरित या रोपित होता है। पूजा की कोई पद्धति नहीं है। विशेषकर शिव किसी पूजन पद्धति के अधीन नहीं है ।

बाणासुर रोज एक प्राकृतिक शिवलिङ्ग नर्मदा में फेंक देता और डुबकी लगाकर उसे निकालता और फिर उसके सामने गाल बजा-बजाकर, नाच-नाच कर उसे तरह तरह से श्रंगारित कर पूजा अर्चना करता । नर्मदा भीषण उफान पर थी फिर भी बाणासुर पहुँच गया, नर्मदा में शिवलिङ्ग को फेंका और उफनती नदी में कूद गया जान की परवाह किए बिना। सारा दिन शिवलिङ्ग ढूंढता रहा पर मिल ही नहीं रहा था, आखिरी बार रात्रि में कूद पड़ा और शिवलिङ्ग निकाल ही लाया। शंकर चटक गये बाणासुर को वरदान दे बैठे। बाणासुर अजेय हो गया एवं कृष्ण भी उसे नहीं मार पाये । कृष्ण ने आखिरकार बाणासुर से पारिवारिक सम्बन्ध बनाये क्योंकि शिव ने उसे महाकाल तत्व दे दिया था, वह महत्वपूर्ण हो गया था, वह महान हो गया था । वरदान शिव देते हैं, औघड़ दानी ही देता है, दक्षिणामूर्ति गुरु ही देता है। कितनी बड़ी बात है यह उद्घोष करना कि जो चाहे वह मांग लो। बाणासुर के वरदान के कारण ही शिव परिवार समेत उसकी नगरी की रक्षा करते थे।

महाकाल को समझना है तो फिर चटकने के महत्व को समझ लें, आकाश में जब विद्युत चटकती है, कहीं कुछ घर्षण होता है तो ही हैमवती उमा के रूप में शक्ति प्रकट होती हैं। अध्यात्म तो चटके दिमाग वालों का क्षेत्र है। जीवन में महान चटके दिमाग वाले ही बनते हैं। एक कमरे में अपने आपको बंद कर लेना एवं नहाना धोना, खाना-पीना भूल जाना, दुनिया से अपने आपको काट लेना और फिर कुछ अविष्कृत कर लेना, कोई खोज कर लेना बस यही कहानी है सभी वैज्ञानिकों की, अविष्कार कर्ताओं की, लेखकों की,दार्शनिकों की, खोजियों की ये सबके सब चटके होते हैं। चटककर बात करते हैं, समाज से निष्कासित तो होते ही हैं। हिटलर क्या था ? नेपोलियन, आइंस्टाइन, कालिदास, रविन्द्रनाथ, माऊंट ऐवरेस्ट पर चढ़ने वाला, गैलिलियो, रावण इत्यादि से लेकर प्रत्येक आध्यात्मिक या किसी अन्य क्षेत्र में मह तत्व प्राप्त कर लेने वाले, महत्वपूर्ण बन जाने वाले महान व्यक्ति की जीवनी उठाकर देख लें सब आपको चटके मिलेंगे।

वर्धमान से महावीर अर्थात मह शब्द प्राप्त किया, कैसे ? क्योंकि उज्जयिनी के श्मशान में बैठकर तप किया। रुद्र से बुद्ध की यात्रा को समझना होगा, बुद्ध के अविष्कार को समझना होगा तभी मह का महत्व समझ में आयेगा रुद्र का तात्पर्य है रूंदन, अंदर कुछ रो रहा है, अंदर कुछ व्यथा चल रही है, अंदर द्वंद है, अंदर कहीं व्याकुलता है। यह सब जीवों की कहानी है। जब यह रुदन असहज कर देगा तो सिद्धार्थ घर से भागेगा, महाकाल की शरण में मह को ढूंढेगा और सीधे उज्जयिनी पहुँचेगा। नहीं तो वहीं बैठकर विलाप करेगा या तो विलाप में दम होगा, रूदन में शक्ति होगी, छाती में तड़फ होगी तो महाकाल खिंचा चला आयेगा, हाथ में त्रिशूल और डमरू लिए हुए भस्म से विभूषित भस्म करने हेतु और इस प्रकार रुद्र बुद्ध में परिवर्तित हो जायेगा हमेशा के लिए। रोता हुआ बालक माता के स्तन से पान कर बुद्ध ही बन जाता है बुद्ध द के समान ही मुस्कुरा और खिलखिला उठता है।

(क्रमशः)

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