गुरु की खोज
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एक दिन मनुष्य जब सांसारिक चक्रव्यूह में फँसकर तड़फ उठता है, उसके मानुषिक रिश्ते उसके लिए जी का जंजाल बन जाते हैं, दुनिया की चमक दमक में उसकी आँखे पथरा जाती हैं और फिर जब भीड़ में वह अपने आपको थका हारा, घिसा पिटा और गुम पाता है तब उसकी आत्मा का दम घुटने लगता है और वह गुरु की खोज प्रारम्भ करता है जो उसे इस भव सागर से मुक्त करा दे। संसार की तपिश और गर्दिश में वट वृक्ष बन उसे अमृतमयी छाया प्रदान करे एवं जीवन निरर्थक और बदरंग हो जाने से पहले उसे जीवन जीने की कला सिखा दे । इसे ईश्वर की खोज भी कहते हैं। सभी को ईश्वर की तलाश है। ईश्वर का कार्य केवल मनुष्यों को देखना नहीं है। मनुष्य ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा हिस्सा है और फिर प्रत्येक मनुष्य में इतनी ताकत भी नहीं है कि वह शिव की अनगढ़ में भाषा को समझ सके, उनसे सम्प्रेषण कर सके इसीलिए पिछले पाँच हजार वर्षों में बहुत ही कम गिने चुने ऐसे लोग हुए हैं जो सीधे शिव से बात कर सकते हैं। कुछ विलक्षण पुरुषों से दुनिया नहीं चल सकती। सभी की जरूरत पूरी नहीं हो सकती। यहीं पर गुरु का उदय होता है।
गुरु एक अत्यंत ही व्यापक शब्द है एवं अपने आपमें विराटता छिपाए हुए है। इसका ओर छोर समझ पाना बड़ा मुश्किल है। गुरु को परिभाषित भी नहीं किया जा सकता, किन्हीं नियमों में आबद्ध भी नहीं किया जा सकता। यही परम ब्रह्म का स्वरूप है। इसी कारणवश सभी शास्त्रोक्त ग्रंथों ने एक स्वर में गुरु को परम ब्रह्म कहा है। उसी में समास्त दैवीय शक्तियों को निहित माना है। वो ही मनुष्य को ब्रह्मा, विष्णु, महेश और माँ भगवती के विभिन्न स्वरूप उनकी वाणी में समझा सकता है, दिखा सकता है, उनसे आसानी के साथ सम्प्रेषण कर सकता है। गुरु ही आम जनता की समस्याओं को उन्हीं के शब्दों में, उन्हीं की समझ अनुसार उनके तार्किक एवं बौद्धिक स्तर पर आवश्यकतानुसार हल प्रदान कर सकता है अन्यथा विराट जनसमूह ईश्वरी ज्ञान से वंचित रह जायेगा।
जीवन की अंधी दौड़ ज्यादा दिन नहीं चलती। एक जैसी नियमित जिन्दगी मनुष्य को उबाऊ बना देती है। कोई भी भौतिक संसाधन मनुष्य को ज्यादा देर तक बाँधे नहीं रख सकता। जीवन के सांसारिक सम्बन्ध कब बंधन का कारण बन जायें यह, सभी मनुष्यों को झेलना पड़ता है। आज जिन सांसारिक सम्बन्धों में खुशी महसूस होती है कल वही बोझ बन जाते हैं नीरसता जीवन का प्रमुख रस बन जाती है। मनुष्य जीवन में अत्यधिक भटकाव आता है एवं भरे पूरे परिवार में भी मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस करता है। ऐसा सब क्यों होता है? मुख्य रूप से इनके पीछे दो धाराऐं छिपी हुई हैं। प्रथम धारा में 99% कर्म और सम्बन्ध आते हैं। यह सब सौदेबाजी के अंतर्गत निर्धारित कर्म और बंधन हैं। यहाँ पर मात्र देना ही देना है। देने की अपेक्षा प्राप्त करने में उत्तरोत्तर कमी ही होती जाती है। यह जीवन जीने का एक आम ढर्रा है। अनंतकाल से जन्म लेते ही मनुष्य इस ढरें के अंतर्गत जीने का आदी हो चुका है परन्तु हर चीज की हद होती हैं। एक हद के बाद मनुष्य व्याकुल हो ऐसे व्यक्तित्व की तलाश करता है जहाँ से वह पुनः शक्ति प्राप्त कर सके। शीतलता प्राप्त कर सके, असीम शांति प्राप्त कर सके। वहाँ पर उसे कोई नोंचने खसोटने और लूटने वाला न हो। हर समय कुछ न कुछ मांग की पूर्ति करने वाला वह यंत्र न हो। यंत्रवतता से मुक्ति ही गुरु की प्राप्ति है। कुछ न करने की स्थिति ही गुरु की स्थिति है।
सब कुछ भूलकर, सब सम्बन्धों को विस्मृत करके कुछ क्षण के के लिए प्रफुल्लित हो गुरु सानिध्य में बैठना ही परम ध्यान है। गुरु और शिष्य का सानिध्य ऐसा है कि जब वे आमने सामने होते हैं तब सब कुछ रुक जाता है। समय भी रुक, जाता है। जब समय रुक गया तो समय के अंतर्गत आने वाले समस्त ताम झाम भी रुक जाते हैं। बस यही पूर्णता के क्षण हैं। जीवन की अनमोल धरोहर यही क्षण हैं। यहीं गुरु की पहचान है कि उसके सानिध्य में सब कुछ रुक जाये और शिष्य समय विहीन, शब्द विहीन, बुद्धिविहीन एवं ज्ञानविहीन हो जाये। ब्रह्माण्ड में अभी तक ऐसी कोई ध्यान साधना पद्धति नहीं बनी है जो कि व्यक्ति को इस स्थिति में पहुँचा दे। यही परम ब्रह्म की स्थिति है, यही गुरु की महत्ता है, यही पुनः कई जन्मों तक स्फूर्तिवान बने रहने की कला है। इसे ही निखिलत्व कहते हैं।
जब जब मैं गुरु के सामने गया सारी समस्या भूल गया, सारे सम्बन्ध, सारे तामझाम, दिन और रात का फर्क, भूख और प्यास की दैहिक क्रियाऐं स्वतः ही मिट गई बस आँखें गुरु को देखकर भाव विभोर हो उठीं एवं मुख पर मुस्कान छा गई। बस समझ में आ गया कि जीवन में कितनी निरर्थकता है और सार्थकता केवल गुरु दर्शन में है। .
🙏 (क्रमशः)
@Sanatan
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एक दिन मनुष्य जब सांसारिक चक्रव्यूह में फँसकर तड़फ उठता है, उसके मानुषिक रिश्ते उसके लिए जी का जंजाल बन जाते हैं, दुनिया की चमक दमक में उसकी आँखे पथरा जाती हैं और फिर जब भीड़ में वह अपने आपको थका हारा, घिसा पिटा और गुम पाता है तब उसकी आत्मा का दम घुटने लगता है और वह गुरु की खोज प्रारम्भ करता है जो उसे इस भव सागर से मुक्त करा दे। संसार की तपिश और गर्दिश में वट वृक्ष बन उसे अमृतमयी छाया प्रदान करे एवं जीवन निरर्थक और बदरंग हो जाने से पहले उसे जीवन जीने की कला सिखा दे । इसे ईश्वर की खोज भी कहते हैं। सभी को ईश्वर की तलाश है। ईश्वर का कार्य केवल मनुष्यों को देखना नहीं है। मनुष्य ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा हिस्सा है और फिर प्रत्येक मनुष्य में इतनी ताकत भी नहीं है कि वह शिव की अनगढ़ में भाषा को समझ सके, उनसे सम्प्रेषण कर सके इसीलिए पिछले पाँच हजार वर्षों में बहुत ही कम गिने चुने ऐसे लोग हुए हैं जो सीधे शिव से बात कर सकते हैं। कुछ विलक्षण पुरुषों से दुनिया नहीं चल सकती। सभी की जरूरत पूरी नहीं हो सकती। यहीं पर गुरु का उदय होता है।
गुरु एक अत्यंत ही व्यापक शब्द है एवं अपने आपमें विराटता छिपाए हुए है। इसका ओर छोर समझ पाना बड़ा मुश्किल है। गुरु को परिभाषित भी नहीं किया जा सकता, किन्हीं नियमों में आबद्ध भी नहीं किया जा सकता। यही परम ब्रह्म का स्वरूप है। इसी कारणवश सभी शास्त्रोक्त ग्रंथों ने एक स्वर में गुरु को परम ब्रह्म कहा है। उसी में समास्त दैवीय शक्तियों को निहित माना है। वो ही मनुष्य को ब्रह्मा, विष्णु, महेश और माँ भगवती के विभिन्न स्वरूप उनकी वाणी में समझा सकता है, दिखा सकता है, उनसे आसानी के साथ सम्प्रेषण कर सकता है। गुरु ही आम जनता की समस्याओं को उन्हीं के शब्दों में, उन्हीं की समझ अनुसार उनके तार्किक एवं बौद्धिक स्तर पर आवश्यकतानुसार हल प्रदान कर सकता है अन्यथा विराट जनसमूह ईश्वरी ज्ञान से वंचित रह जायेगा।
जीवन की अंधी दौड़ ज्यादा दिन नहीं चलती। एक जैसी नियमित जिन्दगी मनुष्य को उबाऊ बना देती है। कोई भी भौतिक संसाधन मनुष्य को ज्यादा देर तक बाँधे नहीं रख सकता। जीवन के सांसारिक सम्बन्ध कब बंधन का कारण बन जायें यह, सभी मनुष्यों को झेलना पड़ता है। आज जिन सांसारिक सम्बन्धों में खुशी महसूस होती है कल वही बोझ बन जाते हैं नीरसता जीवन का प्रमुख रस बन जाती है। मनुष्य जीवन में अत्यधिक भटकाव आता है एवं भरे पूरे परिवार में भी मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस करता है। ऐसा सब क्यों होता है? मुख्य रूप से इनके पीछे दो धाराऐं छिपी हुई हैं। प्रथम धारा में 99% कर्म और सम्बन्ध आते हैं। यह सब सौदेबाजी के अंतर्गत निर्धारित कर्म और बंधन हैं। यहाँ पर मात्र देना ही देना है। देने की अपेक्षा प्राप्त करने में उत्तरोत्तर कमी ही होती जाती है। यह जीवन जीने का एक आम ढर्रा है। अनंतकाल से जन्म लेते ही मनुष्य इस ढरें के अंतर्गत जीने का आदी हो चुका है परन्तु हर चीज की हद होती हैं। एक हद के बाद मनुष्य व्याकुल हो ऐसे व्यक्तित्व की तलाश करता है जहाँ से वह पुनः शक्ति प्राप्त कर सके। शीतलता प्राप्त कर सके, असीम शांति प्राप्त कर सके। वहाँ पर उसे कोई नोंचने खसोटने और लूटने वाला न हो। हर समय कुछ न कुछ मांग की पूर्ति करने वाला वह यंत्र न हो। यंत्रवतता से मुक्ति ही गुरु की प्राप्ति है। कुछ न करने की स्थिति ही गुरु की स्थिति है।
सब कुछ भूलकर, सब सम्बन्धों को विस्मृत करके कुछ क्षण के के लिए प्रफुल्लित हो गुरु सानिध्य में बैठना ही परम ध्यान है। गुरु और शिष्य का सानिध्य ऐसा है कि जब वे आमने सामने होते हैं तब सब कुछ रुक जाता है। समय भी रुक, जाता है। जब समय रुक गया तो समय के अंतर्गत आने वाले समस्त ताम झाम भी रुक जाते हैं। बस यही पूर्णता के क्षण हैं। जीवन की अनमोल धरोहर यही क्षण हैं। यहीं गुरु की पहचान है कि उसके सानिध्य में सब कुछ रुक जाये और शिष्य समय विहीन, शब्द विहीन, बुद्धिविहीन एवं ज्ञानविहीन हो जाये। ब्रह्माण्ड में अभी तक ऐसी कोई ध्यान साधना पद्धति नहीं बनी है जो कि व्यक्ति को इस स्थिति में पहुँचा दे। यही परम ब्रह्म की स्थिति है, यही गुरु की महत्ता है, यही पुनः कई जन्मों तक स्फूर्तिवान बने रहने की कला है। इसे ही निखिलत्व कहते हैं।
जब जब मैं गुरु के सामने गया सारी समस्या भूल गया, सारे सम्बन्ध, सारे तामझाम, दिन और रात का फर्क, भूख और प्यास की दैहिक क्रियाऐं स्वतः ही मिट गई बस आँखें गुरु को देखकर भाव विभोर हो उठीं एवं मुख पर मुस्कान छा गई। बस समझ में आ गया कि जीवन में कितनी निरर्थकता है और सार्थकता केवल गुरु दर्शन में है। .
🙏 (क्रमशः)
@Sanatan
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गुरु की खोज (२)
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यही मंगल मूर्ति गुरु स्वरूप की पहचान है, जहाँ से उठने की इच्छा न हो, जहाँ कुछ बोलने का मन न करे, जहाँ पर समस्त भौतिक, दैहिक, बौद्धिक, मानसिक और विशेषकर तथाकथित आध्यात्मिक और धार्मिक आवश्यकताओं का महत्व नगण्य हो जाये। यही परमानंद की स्थिति है। यही गुरु हृदयस्थ धारण दीक्षा का महत्व है। यह हर पल प्रसन्न और मस्त कलंदर बने रहने की कला है।
दुनिया चलती है, चलती रहेगी। सब कुछ चलता रहेगा और हम भी चलते रहेंगे। जब तक जीना है जियेंगे, समस्याऐं आती जाती रहेंगी। रोने वाले रोते रहेंगे, हँसने वाले हँसते रहेंगे। हम भी निष्काम भाव से कर्म सम्पन्न करते रहेंगे परन्तु अंदर से हृदय में स्थापित गुरु के साथ बातें करते हुए, मस्त रहेंगे। यही शाम्भवी दीक्षा है। इतना ढीठ बन जाना, कि दुनियाँ की कोई भी ताकत, कोई भी व्यक्ति हमें रुला न सके, हमें विचलित न कर सके, हम पर हावी न हो सके और हम पर नियंत्रण न कर सके। जो गुरु हृदय में से बोलेगा वहीं हम करेंगे। देखिए सृष्टि में सबसे ज्यादा दुखी, व्यथित, परेशान मध्य मार्गीय होता है। मध्यमार्गी कायरता की निशानी है। मध्यमार्गी कहीं का नहीं रहता। न जी सकता है न मर सकता है। मध्यमार्गी ही त्रिशंकु कहलाते हैं न स्वर्ग के रहते हैं न पृथ्वी के बस बीच में लटके रहते हैं। इसका कारण उनकी गणित लगाने की प्रवृत्ति, कुछ ज्यादा दिमाग चलाने की आदत और स्वयं तर्क कुतर्क में उलझे रहने की प्रवृत्ति ही है एक मध्यम वर्गीय परिवार में विवाह जैसी सामान्य प्रक्रिया मुसीबत का कारण बन जाती है। उच्च वर्ग में विवाह कोई समस्या नहीं है और निम्न वर्ग में पाँच हजार रुपये में विवाह हो जाता है। उसी में वे आनंद उठा लेते हैं। सारा का सारा कचरा घर मध्य वर्ग है ठीक इसी प्रकार जो मध्य मार्गीय सोच से ग्रसित होते हैं, वे गुरु को प्राप्त करने के बाद भी हैरान परेशान रहते हैं।
मैंने देखा है गरीब और आदिवासियों को, खेतिहर किसानों को उनके पास पैसा नहीं होता पर वे गुरु को प्राप्त करते ही ध्यानस्थ हो जाते वे हैं। अपने खेत में बैठे-बैठे गुरु से सम्प्रेषण कर लेते हैं। उच्च वर्गीय हवाई जहाज का टिकिट कटाकर गुरु के दरवाजे इच्छा होते ही पहुँच जाते हैं और बचा मध्य वर्ग बस गुरु को गाली देता रहता है और सड़ता रहता है। निखिलेश्वरानंद जी के शिविरों में मैंने अद्भुत आध्यात्मिक दर्शन प्राप्त किए हैं। एक शिविर में एक सात वर्षीय बालक आया । उसका सिर मुंडा हुआ था, पीताम्बर ओढ़ रखा था उसने वह अपने माँ बाप से जिद कर रहा था कि मुझे गुरुजी के पास ले चलो। थक हारकर माँ बाप लेकर आये । मैंने बालक से पूछा कौन सी दीक्षा लेनी है तुम्हे, वह ब्राह्मण जाति का बालक था बोला मैं नवार्ण दीक्षा लेना चाहता हूँ। मैंने सोचा सामान्यतः बालक तो सरस्वती दीक्षा लेते हैं यह नवार्ण दीक्षा क्यों लेने आ गया। वह बोला पिछली बार यह दीक्षा छूट गई थी। मैं बोला पिछली बार का क्या मतलब तुम तो पहली बार आये हो वह बोला हाँ पहली बार आया हूँ पर पिछली बार किसी कारणवश यह दीक्षा छूट गई थी। मैं तुरंत समझ गया इसे पूर्व जन्म की स्मृति आ गई है शायद गुरुजी ने इसे खींच लिया हो । दीक्षा के बाद मैं पुनः बालक से मिला मैं क्या देखता हूँ कि बालक बिल्कुल सामान्य है एवं पूर्व जन्म की याददाश्त के चिन्ह उसके चेहरे पर कहीं नहीं है। निश्चित ही गुरुजी ने पूर्व जन्म की याददाश्त को प्रतिबंधित कर दिया होगा।
एक बात और देखने को मिली उनके शिविरों में उनके शिष्यों की संख्या एक प्रकार से निश्चित रहती थी चार से पाँच हजार के बीच परन्तु हर बार अस्सी प्रतिशत चेहरे नये होते थे। ये साधनात्मक शिविरों का रहस्य है। यह दीक्षा प्रणाली का विधान है। हर जीवन में हर व्यक्ति की सभी दीक्षाऐं नहीं होती। एक बार एक व्यक्ति को उसकें घर वाले जंजीरों से बांध कर लाये वह विक्षिप्त सा था और वह व्यक्ति गुरुजी के मंच के नीचे तीन दिन तक सोता रहा। चौथे दिन वह ठीक हो गया। हर व्यक्ति के लिए गुरु की खोज अलग-अलग है। मेरे एक जान पहचान वाले थे अपने कुकर्मों से वह विक्षिप्त हो गये थे उसके घरवाले बहुत परेशान थे। वह सब काम छोड़, पागलों के समान घूमते थे खैर उसे भी पकड़कर गुरुजी के पास ले गये। कई बार मार-मार कर भी सुधारना पड़ता है। गुरुजी ने उसे तीन चरणों में दीक्षा दी। आज वह कई सौ एकड़ जमीन का मालिक है और दवा की दुकान भी चलाता है। कल तक जो दवा खाता था जिसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान ने भी लाइलाज घोषित कर दिया था अब वह खुद दूसरों को दवा बेचता है। यह सब अनमोल एवं अत्यंत ही दिव्य अनुभव हैं मेरे जीवन के ।
( क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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यही मंगल मूर्ति गुरु स्वरूप की पहचान है, जहाँ से उठने की इच्छा न हो, जहाँ कुछ बोलने का मन न करे, जहाँ पर समस्त भौतिक, दैहिक, बौद्धिक, मानसिक और विशेषकर तथाकथित आध्यात्मिक और धार्मिक आवश्यकताओं का महत्व नगण्य हो जाये। यही परमानंद की स्थिति है। यही गुरु हृदयस्थ धारण दीक्षा का महत्व है। यह हर पल प्रसन्न और मस्त कलंदर बने रहने की कला है।
दुनिया चलती है, चलती रहेगी। सब कुछ चलता रहेगा और हम भी चलते रहेंगे। जब तक जीना है जियेंगे, समस्याऐं आती जाती रहेंगी। रोने वाले रोते रहेंगे, हँसने वाले हँसते रहेंगे। हम भी निष्काम भाव से कर्म सम्पन्न करते रहेंगे परन्तु अंदर से हृदय में स्थापित गुरु के साथ बातें करते हुए, मस्त रहेंगे। यही शाम्भवी दीक्षा है। इतना ढीठ बन जाना, कि दुनियाँ की कोई भी ताकत, कोई भी व्यक्ति हमें रुला न सके, हमें विचलित न कर सके, हम पर हावी न हो सके और हम पर नियंत्रण न कर सके। जो गुरु हृदय में से बोलेगा वहीं हम करेंगे। देखिए सृष्टि में सबसे ज्यादा दुखी, व्यथित, परेशान मध्य मार्गीय होता है। मध्यमार्गी कायरता की निशानी है। मध्यमार्गी कहीं का नहीं रहता। न जी सकता है न मर सकता है। मध्यमार्गी ही त्रिशंकु कहलाते हैं न स्वर्ग के रहते हैं न पृथ्वी के बस बीच में लटके रहते हैं। इसका कारण उनकी गणित लगाने की प्रवृत्ति, कुछ ज्यादा दिमाग चलाने की आदत और स्वयं तर्क कुतर्क में उलझे रहने की प्रवृत्ति ही है एक मध्यम वर्गीय परिवार में विवाह जैसी सामान्य प्रक्रिया मुसीबत का कारण बन जाती है। उच्च वर्ग में विवाह कोई समस्या नहीं है और निम्न वर्ग में पाँच हजार रुपये में विवाह हो जाता है। उसी में वे आनंद उठा लेते हैं। सारा का सारा कचरा घर मध्य वर्ग है ठीक इसी प्रकार जो मध्य मार्गीय सोच से ग्रसित होते हैं, वे गुरु को प्राप्त करने के बाद भी हैरान परेशान रहते हैं।
मैंने देखा है गरीब और आदिवासियों को, खेतिहर किसानों को उनके पास पैसा नहीं होता पर वे गुरु को प्राप्त करते ही ध्यानस्थ हो जाते वे हैं। अपने खेत में बैठे-बैठे गुरु से सम्प्रेषण कर लेते हैं। उच्च वर्गीय हवाई जहाज का टिकिट कटाकर गुरु के दरवाजे इच्छा होते ही पहुँच जाते हैं और बचा मध्य वर्ग बस गुरु को गाली देता रहता है और सड़ता रहता है। निखिलेश्वरानंद जी के शिविरों में मैंने अद्भुत आध्यात्मिक दर्शन प्राप्त किए हैं। एक शिविर में एक सात वर्षीय बालक आया । उसका सिर मुंडा हुआ था, पीताम्बर ओढ़ रखा था उसने वह अपने माँ बाप से जिद कर रहा था कि मुझे गुरुजी के पास ले चलो। थक हारकर माँ बाप लेकर आये । मैंने बालक से पूछा कौन सी दीक्षा लेनी है तुम्हे, वह ब्राह्मण जाति का बालक था बोला मैं नवार्ण दीक्षा लेना चाहता हूँ। मैंने सोचा सामान्यतः बालक तो सरस्वती दीक्षा लेते हैं यह नवार्ण दीक्षा क्यों लेने आ गया। वह बोला पिछली बार यह दीक्षा छूट गई थी। मैं बोला पिछली बार का क्या मतलब तुम तो पहली बार आये हो वह बोला हाँ पहली बार आया हूँ पर पिछली बार किसी कारणवश यह दीक्षा छूट गई थी। मैं तुरंत समझ गया इसे पूर्व जन्म की स्मृति आ गई है शायद गुरुजी ने इसे खींच लिया हो । दीक्षा के बाद मैं पुनः बालक से मिला मैं क्या देखता हूँ कि बालक बिल्कुल सामान्य है एवं पूर्व जन्म की याददाश्त के चिन्ह उसके चेहरे पर कहीं नहीं है। निश्चित ही गुरुजी ने पूर्व जन्म की याददाश्त को प्रतिबंधित कर दिया होगा।
एक बात और देखने को मिली उनके शिविरों में उनके शिष्यों की संख्या एक प्रकार से निश्चित रहती थी चार से पाँच हजार के बीच परन्तु हर बार अस्सी प्रतिशत चेहरे नये होते थे। ये साधनात्मक शिविरों का रहस्य है। यह दीक्षा प्रणाली का विधान है। हर जीवन में हर व्यक्ति की सभी दीक्षाऐं नहीं होती। एक बार एक व्यक्ति को उसकें घर वाले जंजीरों से बांध कर लाये वह विक्षिप्त सा था और वह व्यक्ति गुरुजी के मंच के नीचे तीन दिन तक सोता रहा। चौथे दिन वह ठीक हो गया। हर व्यक्ति के लिए गुरु की खोज अलग-अलग है। मेरे एक जान पहचान वाले थे अपने कुकर्मों से वह विक्षिप्त हो गये थे उसके घरवाले बहुत परेशान थे। वह सब काम छोड़, पागलों के समान घूमते थे खैर उसे भी पकड़कर गुरुजी के पास ले गये। कई बार मार-मार कर भी सुधारना पड़ता है। गुरुजी ने उसे तीन चरणों में दीक्षा दी। आज वह कई सौ एकड़ जमीन का मालिक है और दवा की दुकान भी चलाता है। कल तक जो दवा खाता था जिसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान ने भी लाइलाज घोषित कर दिया था अब वह खुद दूसरों को दवा बेचता है। यह सब अनमोल एवं अत्यंत ही दिव्य अनुभव हैं मेरे जीवन के ।
( क्रमशः)
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गुरु की खोज (३)
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कैसे- कैसे लोग गुरुजी के पास आये, किस-किस माध्यम से किस-किस बहाने, किन-किन समस्याओं ने उन्हें गुरुजी के नजदीक पहुँचाया और उनकी गुरु की खोज समाप्त की। खेल-खेल में भी गुरु मिलते है। गुरु शिष्यों के ऊपर सदैव आवरण डालकर रखते हैं। यही है गुरु की पहचान अगर वह अपनी विराटता, अपनी सम्पूर्णता और अपने वैभव का वास्तविक स्वरूप शिष्य को दिखा देगा तो फिर शिष्य असहज हो जायेगा। शिष्य मतिभ्रम का शिकार हो जायेगा। गुरुजी में एक खासियत थी जैसा शिष्य हों वे वैसी ही बात करते थे। इस मर्यादा का वे कड़ाई से पालन करते थे।
पहली क्लास के बच्चे को इंजिनियरिंग का गणित नहीं पढ़ाना चाहिए। नहीं तो यह पढ़ाने वाले के दिवालिएपन का परिचायक है।सहजता के साथ जितना प्राप्त किया जा सकता है उतना ढोंग के द्वारा नहीं। सहजता सफल शिष्य होने की निशानी है । प्रत्येक गुरु को सीधे-सादे, सच्चे, सहज, निष्कपट और सरल हृदय के शिष्य ही पसंद होते हैं। आडम्बरी, नाटकीय व्यक्तियों को कोई पसंद नहीं करता। जीवन में सब कुछ एक दिन अचानक होता है। अचानक ही गुरु मिलते हैं। गुरु प्लानिंग से नहीं मिलते। गुरु को प्राप्त करने के लिए उस प्रकार के निरर्थक प्रयास नहीं करने पड़ते जिस प्रकार से प्रयास शादी के लिए करने पड़ते हैं। गुरु की प्राप्ति शुभ कर्मों के उदय का प्रथम लक्षण है। जीवन के पूर्ण परिवर्तनीय होने की पहचान है गुरु की खोज।
एक शिविर का आयोजन सम्पन्न हुआ था। सारा सामान मैदान से उठाया जा रहा था तभी एक महिला किसी अन्य प्रांत से मेरे पास आयी और बोली मुझे गुरुजी से मिलना है। मैंने कहा गुरुजी तो चले गये। वो बोली अब कहाँ मिलेंगे, मैंने कहा तुम दिल्ली चली जाओ। वह रोती हुई दिल्ली चली गई। वहाँ पर भी गुरुजी उसे नहीं मिले। उसे वहाँ से जोधपुर जाना पड़ा। वहाँ उसकी गुरु दीक्षा हुई। उसने हिम्मत नहीं हारी। अकेली महिला होते हुए भी दिल्ली से जोधपुर गई और अंत में गुरु को खोजकर ही मानी। मेरी एक जान पहचान वाला है जब-जब गुरुजी आते मैं उसे बुलाता पर उसकी किस्मत ही खराब थी। वह कभी कहीं उलझ जाता तो कभी उसे अचानक बाहर जाना पड़ जाता। अंत तक उसकी दीक्षा नहीं हो पायी। अब वह नित्य प्रतिदिन गुरु मंत्र का जाप एवं गुरु पूजन करता है। ऐसा भी होता है। दीक्षा केवल शिविरों में ही नहीं होती है। गुरुजी के साथ तो यह आलम था कि देर से आये लोग रेल्वे प्लेटफार्म पर ही दीक्षा लेने लगते थे। एक बार तो ऐसा हुआ कि एक व्यक्ति दीक्षा के लिए ट्रेन में चढ़ गया। उसने ट्रेन के डिब्बे में ही दीक्षा ली और दूसरे प्लेटफार्म पर उतर गया। भगवान जाने कब कहाँ किस हाल में किस स्थिति में किसको गुरु मिल जाये। सबकी अपनी-अपनी कहानी है। खैर गुरु मिलना चाहिए।
एक शिष्य अपनी पत्नी से छिप छिपकर गुरुजी से मिलने आता था। उसकी पत्नी बहुत झगड़ा करती थी। बाद में पत्नी पति से भी ज्यादा गुरु भक्त बन गई। कब किसमें कैसे भाव फूट पड़ें। लोग दस-दस वर्ष तक दीक्षा के पश्चात घूमते रहे हैं। उनके अंदर श्रृद्धा और भक्ति का झरना फूटा ही नहीं पर मैं क्या देखता हूँ कि एक दिन अचानक वे भक्तिमय हो गये और गीत उनके मुख से झरने लगे। मानस शुद्धि, पूर्व जन्म के शाप कटने में समय लगता है पर गुरु मिल जाने के बाद देर सबेर यह तो होकर ही रहता है। गुरु अपना असर जरूर दिखाता है। लोहा भी एक तापमान पर मोम के समान मुलायम हो जाता है। लड़ाई-झगड़े, गुरु से शिकायत, गुस्सा यह सब सामान्य बातें हैं। जीवन के यह आवश्यक अंग है। गुरु इनका कभी बुरा नहीं मानता वह इन परिधियों से ऊपर रहता है। फिर से जवान बना देना, फिर बाल्यावस्था को लौटा देना यही गुरु का कार्य है। गुरु की खोज जीवन की सबसे बड़ी खोज है आप भी इस खोज में सफल हों बस इतना ही कहना है।
गुरु कृपा ही केवलम् गुरु कृपा ही केवलम्
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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कैसे- कैसे लोग गुरुजी के पास आये, किस-किस माध्यम से किस-किस बहाने, किन-किन समस्याओं ने उन्हें गुरुजी के नजदीक पहुँचाया और उनकी गुरु की खोज समाप्त की। खेल-खेल में भी गुरु मिलते है। गुरु शिष्यों के ऊपर सदैव आवरण डालकर रखते हैं। यही है गुरु की पहचान अगर वह अपनी विराटता, अपनी सम्पूर्णता और अपने वैभव का वास्तविक स्वरूप शिष्य को दिखा देगा तो फिर शिष्य असहज हो जायेगा। शिष्य मतिभ्रम का शिकार हो जायेगा। गुरुजी में एक खासियत थी जैसा शिष्य हों वे वैसी ही बात करते थे। इस मर्यादा का वे कड़ाई से पालन करते थे।
पहली क्लास के बच्चे को इंजिनियरिंग का गणित नहीं पढ़ाना चाहिए। नहीं तो यह पढ़ाने वाले के दिवालिएपन का परिचायक है।सहजता के साथ जितना प्राप्त किया जा सकता है उतना ढोंग के द्वारा नहीं। सहजता सफल शिष्य होने की निशानी है । प्रत्येक गुरु को सीधे-सादे, सच्चे, सहज, निष्कपट और सरल हृदय के शिष्य ही पसंद होते हैं। आडम्बरी, नाटकीय व्यक्तियों को कोई पसंद नहीं करता। जीवन में सब कुछ एक दिन अचानक होता है। अचानक ही गुरु मिलते हैं। गुरु प्लानिंग से नहीं मिलते। गुरु को प्राप्त करने के लिए उस प्रकार के निरर्थक प्रयास नहीं करने पड़ते जिस प्रकार से प्रयास शादी के लिए करने पड़ते हैं। गुरु की प्राप्ति शुभ कर्मों के उदय का प्रथम लक्षण है। जीवन के पूर्ण परिवर्तनीय होने की पहचान है गुरु की खोज।
एक शिविर का आयोजन सम्पन्न हुआ था। सारा सामान मैदान से उठाया जा रहा था तभी एक महिला किसी अन्य प्रांत से मेरे पास आयी और बोली मुझे गुरुजी से मिलना है। मैंने कहा गुरुजी तो चले गये। वो बोली अब कहाँ मिलेंगे, मैंने कहा तुम दिल्ली चली जाओ। वह रोती हुई दिल्ली चली गई। वहाँ पर भी गुरुजी उसे नहीं मिले। उसे वहाँ से जोधपुर जाना पड़ा। वहाँ उसकी गुरु दीक्षा हुई। उसने हिम्मत नहीं हारी। अकेली महिला होते हुए भी दिल्ली से जोधपुर गई और अंत में गुरु को खोजकर ही मानी। मेरी एक जान पहचान वाला है जब-जब गुरुजी आते मैं उसे बुलाता पर उसकी किस्मत ही खराब थी। वह कभी कहीं उलझ जाता तो कभी उसे अचानक बाहर जाना पड़ जाता। अंत तक उसकी दीक्षा नहीं हो पायी। अब वह नित्य प्रतिदिन गुरु मंत्र का जाप एवं गुरु पूजन करता है। ऐसा भी होता है। दीक्षा केवल शिविरों में ही नहीं होती है। गुरुजी के साथ तो यह आलम था कि देर से आये लोग रेल्वे प्लेटफार्म पर ही दीक्षा लेने लगते थे। एक बार तो ऐसा हुआ कि एक व्यक्ति दीक्षा के लिए ट्रेन में चढ़ गया। उसने ट्रेन के डिब्बे में ही दीक्षा ली और दूसरे प्लेटफार्म पर उतर गया। भगवान जाने कब कहाँ किस हाल में किस स्थिति में किसको गुरु मिल जाये। सबकी अपनी-अपनी कहानी है। खैर गुरु मिलना चाहिए।
एक शिष्य अपनी पत्नी से छिप छिपकर गुरुजी से मिलने आता था। उसकी पत्नी बहुत झगड़ा करती थी। बाद में पत्नी पति से भी ज्यादा गुरु भक्त बन गई। कब किसमें कैसे भाव फूट पड़ें। लोग दस-दस वर्ष तक दीक्षा के पश्चात घूमते रहे हैं। उनके अंदर श्रृद्धा और भक्ति का झरना फूटा ही नहीं पर मैं क्या देखता हूँ कि एक दिन अचानक वे भक्तिमय हो गये और गीत उनके मुख से झरने लगे। मानस शुद्धि, पूर्व जन्म के शाप कटने में समय लगता है पर गुरु मिल जाने के बाद देर सबेर यह तो होकर ही रहता है। गुरु अपना असर जरूर दिखाता है। लोहा भी एक तापमान पर मोम के समान मुलायम हो जाता है। लड़ाई-झगड़े, गुरु से शिकायत, गुस्सा यह सब सामान्य बातें हैं। जीवन के यह आवश्यक अंग है। गुरु इनका कभी बुरा नहीं मानता वह इन परिधियों से ऊपर रहता है। फिर से जवान बना देना, फिर बाल्यावस्था को लौटा देना यही गुरु का कार्य है। गुरु की खोज जीवन की सबसे बड़ी खोज है आप भी इस खोज में सफल हों बस इतना ही कहना है।
गुरु कृपा ही केवलम् गुरु कृपा ही केवलम्
शिव शासनत: शिव शासनत:
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निखिल रहस्यम्
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जिस प्रकार कृष्ण अर्जुन को निर्भय बना रहे थे उसी प्रकार गुरुजी भी अपने शिष्यों को निर्भय बना रहे थे। गुरु कार्यों के मूल में संसार एवं समाज की मिथ्या का वास्तविक स्वरूप दिखाना था। गुरु कार्यों में प्रशिक्षण छिपा हुआ होता है। जो प्रशिक्षित नहीं होगा वह आगे कार्य नहीं कर पायेगा। अप्रशिक्षित व्यक्ति के हाथ में अगर बंदूक थमा दी जाय तो वह बोझ बन जायेगी। वह बस उसे ढोता रहेगा। वक्त आने पर कायर के समान छिप जायेगा। बंदूक भी उसके लिए मूल्यहीन हो जायेगी। प्रशिक्षण का बड़ा विशेष महत्व है नहीं तो शिष्य कागजी शेर बन जायेगा और धीरे-धीरे शेर से बिल्ली में परिवर्तित हो जायेगा। उन्होंने लड़ना सिखाया। इतिहास साक्षी है कि यह संसार झूठे, मक्कार और चालबाजों से भरा पड़ा है। सब तरफ चालबाजी, नजरों की सफाई और वशीकरण करने की प्रक्रिया है। इतने बड़े-बड़े झूठ बोले जाते हैं, इतने लुभावने वायदे किये जाते हैं कि लाखों करोड़ों मस्तिष्क माया ग्रस्त हो जाते हैं। माया का निर्माण राज करने वाले चालाक मनुष्यों का मुख्य कार्य है। माया आसमान से नहीं टपकती। यह दुनिया फंतासी मनुष्यों से भरी पड़ी है।
हिटलर बहुत चालाक आदमी था। उसने समस्त जर्मनी में यह प्रचारित करवा दिया कि वह विश्व युद्ध के सभी मोर्चों पर विजयी हो रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि हर मोर्चे पर उसकी हार हो रही थी। यूरोपीय देशों को उपनिवेश बनाने थे। उन्होंने अपने यहाँ प्रचारित करवा दिया कि अमेरिकी महाद्वीप में सोने के पहाड़ है। लाखों लोग मूर्खों के समान चले गये। सोना तो नहीं मिला, हीरे तो नहीं मिले पर अमेरिका ब्रिटेन का उपनिवेश जरूर बन गया। 60 के दशक में अमेरिका ने यह घोषणा कर दी कि उसने चंद्रमा पर विजय प्राप्त कर ली है परन्तु वास्तव में अंतरिक्ष यान कई साल बाद चन्द्रमा की सतह पर उतर पाये। इस संसार की बड़ी-बड़ी योजनाऐं कपोल कल्पित झूठ हैं। यह सब भ्रम फैलाने के लिए, होता है। इन सबके पीछे महाभ्रष्ट एवं धूर्त मनुष्यों का हाथ होता है। अधिकांशतः खोजें मिथ्या हैं, शोषण का प्रतीक हैं। पाश्चात्य देशों में धन की कमी हुई तो उन्होंने अश्लील चित्रपट बनाये और सारे विश्व में प्रसारित कर कुछ ही क्षण में पुनः धनी बन बैठे। ऊपर से स्वांग कुछ और होता है और वास्तविकता कुछ और। अभी कुछ ही समय पहले उन्होंने पुनः काम शक्ति बढ़ाने की गोली बनाई। सब कुछ पूर्व नियोजित था। एक झटके में ही सारे विश्व से असंख्य मुद्रा रूपी शक्ति खींच ली। कुछ न कुछ इस तरह के ललचाने वाले महाकपट हर युग में चलते रहते हैं और लोग मूर्ख बनते रहते हैं।
मैंने बहुत से ग्रंथ पढ़े हैं। मुझे कहीं भी संतोषी माता का जिक्र नहीं मिला। यब सब निर्मित और अविष्कृत किया जाता है। जनता को चाहिए इसलिए निर्मित और अविष्कृत किया जाता है। इनसे होता जाता कुछ नहीं है। यही निखिलेश्वरानंद जी समझा रहे हैं अपने शिष्यों को। मूल में जाओ, सत्य को समझो। व्यर्थ में अपनी ऊर्जा क्षय मत करो। नित नये-नये अविष्कार और कपट होते रहेंगे। माया मनुष्य फैलाता रहेगा। इनमें मत उलझो। यह सब कैसे समझ में आयेगा ? यह तब समझ में आयेगा जब कुंऐ से बाहर निकलकर अपनी आँखों से दुनिया देखोगे। यही साधक बनने की स्थिति है। निखिल का तात्पर्य है अप्रदूषित, निर्झर । निखिल रंग ऐसा रंग है जिसके चढ़ने के बाद कोई और रंग नहीं चढ़ता। निखिल रंग में रंग जाओ बस उनका यही कहना था। गुरु के रंग में रंगना ही पूर्णता है।
पानी में शक्कर घुलती है अपना स्वरूप खो बैठती है इसीलिए पानी मीठा हो जाता है। शक्कर पानी के रंग में रंग गई। कांच के टुकड़े पानी में नहीं घुलेंगे। बार-बार मन भटकेगा इस गुरु के, उस गुरु के इस तांत्रिक के उस तांत्रिक के चक्कर में भटकोगे तो फिर कहीं के नहीं रहोगे। निखिल तत्व अर्थात परम तत्व वह तत्व जिससे कि समस्त तत्वों का प्रादुर्भाव हुआ है। सभी तत्व निखिल तत्व से निकले हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। परम तत्व ही इस ब्रह्माण्ड का सबसे क्रियाशील तत्व है। । सभी क्रियात्मकताऐं परम तत्व के द्वारा ही निहित हैं। यही वह दुर्लभ तत्व है जिसे प्राप्त कर व्यक्ति इस मायाजाल से ग्रसित दुनिया में एकाग्रचित्त हो जाता है। इसी की प्राप्ति के लिए देवता, किन्नर, मनुष्य सभी साधना रत रहते हैं। निखिलेश्वरानंद जी की अवस्था परमहंस की अवस्था है अर्थात पूर्णता की अवस्था, स्वयं में मस्त रहने की अवस्था, स्वयं में परमानंदित रहने की अवस्था यही वह अपने शिष्यों को दीक्षा के माध्यम से प्रदान करते हैं। यही उनके द्वारा प्रदत्त परम तत्व उनके शिष्यों को सबसे अलग बनात है। वे भटकाव से मुक्त हो जाते हैं। .
(क्रमशः)
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जिस प्रकार कृष्ण अर्जुन को निर्भय बना रहे थे उसी प्रकार गुरुजी भी अपने शिष्यों को निर्भय बना रहे थे। गुरु कार्यों के मूल में संसार एवं समाज की मिथ्या का वास्तविक स्वरूप दिखाना था। गुरु कार्यों में प्रशिक्षण छिपा हुआ होता है। जो प्रशिक्षित नहीं होगा वह आगे कार्य नहीं कर पायेगा। अप्रशिक्षित व्यक्ति के हाथ में अगर बंदूक थमा दी जाय तो वह बोझ बन जायेगी। वह बस उसे ढोता रहेगा। वक्त आने पर कायर के समान छिप जायेगा। बंदूक भी उसके लिए मूल्यहीन हो जायेगी। प्रशिक्षण का बड़ा विशेष महत्व है नहीं तो शिष्य कागजी शेर बन जायेगा और धीरे-धीरे शेर से बिल्ली में परिवर्तित हो जायेगा। उन्होंने लड़ना सिखाया। इतिहास साक्षी है कि यह संसार झूठे, मक्कार और चालबाजों से भरा पड़ा है। सब तरफ चालबाजी, नजरों की सफाई और वशीकरण करने की प्रक्रिया है। इतने बड़े-बड़े झूठ बोले जाते हैं, इतने लुभावने वायदे किये जाते हैं कि लाखों करोड़ों मस्तिष्क माया ग्रस्त हो जाते हैं। माया का निर्माण राज करने वाले चालाक मनुष्यों का मुख्य कार्य है। माया आसमान से नहीं टपकती। यह दुनिया फंतासी मनुष्यों से भरी पड़ी है।
हिटलर बहुत चालाक आदमी था। उसने समस्त जर्मनी में यह प्रचारित करवा दिया कि वह विश्व युद्ध के सभी मोर्चों पर विजयी हो रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि हर मोर्चे पर उसकी हार हो रही थी। यूरोपीय देशों को उपनिवेश बनाने थे। उन्होंने अपने यहाँ प्रचारित करवा दिया कि अमेरिकी महाद्वीप में सोने के पहाड़ है। लाखों लोग मूर्खों के समान चले गये। सोना तो नहीं मिला, हीरे तो नहीं मिले पर अमेरिका ब्रिटेन का उपनिवेश जरूर बन गया। 60 के दशक में अमेरिका ने यह घोषणा कर दी कि उसने चंद्रमा पर विजय प्राप्त कर ली है परन्तु वास्तव में अंतरिक्ष यान कई साल बाद चन्द्रमा की सतह पर उतर पाये। इस संसार की बड़ी-बड़ी योजनाऐं कपोल कल्पित झूठ हैं। यह सब भ्रम फैलाने के लिए, होता है। इन सबके पीछे महाभ्रष्ट एवं धूर्त मनुष्यों का हाथ होता है। अधिकांशतः खोजें मिथ्या हैं, शोषण का प्रतीक हैं। पाश्चात्य देशों में धन की कमी हुई तो उन्होंने अश्लील चित्रपट बनाये और सारे विश्व में प्रसारित कर कुछ ही क्षण में पुनः धनी बन बैठे। ऊपर से स्वांग कुछ और होता है और वास्तविकता कुछ और। अभी कुछ ही समय पहले उन्होंने पुनः काम शक्ति बढ़ाने की गोली बनाई। सब कुछ पूर्व नियोजित था। एक झटके में ही सारे विश्व से असंख्य मुद्रा रूपी शक्ति खींच ली। कुछ न कुछ इस तरह के ललचाने वाले महाकपट हर युग में चलते रहते हैं और लोग मूर्ख बनते रहते हैं।
मैंने बहुत से ग्रंथ पढ़े हैं। मुझे कहीं भी संतोषी माता का जिक्र नहीं मिला। यब सब निर्मित और अविष्कृत किया जाता है। जनता को चाहिए इसलिए निर्मित और अविष्कृत किया जाता है। इनसे होता जाता कुछ नहीं है। यही निखिलेश्वरानंद जी समझा रहे हैं अपने शिष्यों को। मूल में जाओ, सत्य को समझो। व्यर्थ में अपनी ऊर्जा क्षय मत करो। नित नये-नये अविष्कार और कपट होते रहेंगे। माया मनुष्य फैलाता रहेगा। इनमें मत उलझो। यह सब कैसे समझ में आयेगा ? यह तब समझ में आयेगा जब कुंऐ से बाहर निकलकर अपनी आँखों से दुनिया देखोगे। यही साधक बनने की स्थिति है। निखिल का तात्पर्य है अप्रदूषित, निर्झर । निखिल रंग ऐसा रंग है जिसके चढ़ने के बाद कोई और रंग नहीं चढ़ता। निखिल रंग में रंग जाओ बस उनका यही कहना था। गुरु के रंग में रंगना ही पूर्णता है।
पानी में शक्कर घुलती है अपना स्वरूप खो बैठती है इसीलिए पानी मीठा हो जाता है। शक्कर पानी के रंग में रंग गई। कांच के टुकड़े पानी में नहीं घुलेंगे। बार-बार मन भटकेगा इस गुरु के, उस गुरु के इस तांत्रिक के उस तांत्रिक के चक्कर में भटकोगे तो फिर कहीं के नहीं रहोगे। निखिल तत्व अर्थात परम तत्व वह तत्व जिससे कि समस्त तत्वों का प्रादुर्भाव हुआ है। सभी तत्व निखिल तत्व से निकले हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। परम तत्व ही इस ब्रह्माण्ड का सबसे क्रियाशील तत्व है। । सभी क्रियात्मकताऐं परम तत्व के द्वारा ही निहित हैं। यही वह दुर्लभ तत्व है जिसे प्राप्त कर व्यक्ति इस मायाजाल से ग्रसित दुनिया में एकाग्रचित्त हो जाता है। इसी की प्राप्ति के लिए देवता, किन्नर, मनुष्य सभी साधना रत रहते हैं। निखिलेश्वरानंद जी की अवस्था परमहंस की अवस्था है अर्थात पूर्णता की अवस्था, स्वयं में मस्त रहने की अवस्था, स्वयं में परमानंदित रहने की अवस्था यही वह अपने शिष्यों को दीक्षा के माध्यम से प्रदान करते हैं। यही उनके द्वारा प्रदत्त परम तत्व उनके शिष्यों को सबसे अलग बनात है। वे भटकाव से मुक्त हो जाते हैं। .
(क्रमशः)
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निखिल रहस्यम् (२)
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निखिलेश्वरानंद जी एक सर्वज्ञ आध्यात्मिक स्वरूप हैं। एक ऐसे विलक्षण आध्यात्मिक स्वरूप जो कि शारीरिक प्रपंचों से सर्वथा मुक्त हैं, वे अशरीरी हैं। जब जो शिष्य पुकारता है वे साक्षात् प्रकट हो जाते हैं। वास्तव में पूजनीय, दर्शनीय एवं हृदय में स्थापित करने योग्य तो निखिलत्व ही है अर्थात परमतत्व इस पर किसी व्यक्ति विशेष की पकड़ नहीं है। उनका यह विराट एवं गोपनीय आध्यात्मिक स्वरूप अनेकों जगह एक साथ प्रकट होता रहता है। उनके लाखों भक्तों एवं शिष्यों को वे प्रतिदिन संस्पर्शित करते हैं। कभी कुछ शिष्यों को अचानक ओंकारेश्वर में दिखते हैं तो उसी क्षण बद्रीनाथ में भी दर्शन देते हैं। अचानक वह ब्रह्म मुहूर्त में एक साथ हजारों शिष्यों के घर में पहुँच उन्हें दर्शन देते हैं, वार्तालाप करते हैं और कभी कोई शिष्य मुसीबत में फँस जाता है तो उसकी एक आवाज पर उसके कार्य चुटकियों में हल कर देते हैं। उनका प्रत्येक शिष्य उनके निखिलत्व से सराबोर है। उसके हृदय में वे नित्य नूतन भाव में स्थित रहते हैं, उनके किसी भी शिष्य को निखिलेश्वरानंद जी की कमी महसूस नहीं होती। निखिल शिष्य प्रपंचों में नहीं पड़ते हैं वे अपने गुरु की माया को भली-भांति जानते हैं। लाखों व्यक्ति एक तरफ खड़े कर लो और निखिलेश्वरानंद जी के शिष्य उनमें अलग ही दिखाई पड़ेंगे क्योंकि वे अपने गुरु की सक्षमता को जानते हैं।
जिसने निखिलत्व देख लिया, आत्मसात कर लिया, पहचान लिया वह फिर छोटे-मोटे तत्वों में नहीं उलझता है। उनके शिष्य ध्यान, धारणा, समाधि, योग आदि प्रपंचों में नहीं उलझते हैं। वे जानते हैं कि इन सबका ध्येय तो मात्र परम तत्व, परम रस की प्राप्ति है पर जब स्वयं उन्हें दीक्षा में निखिलत्व प्राप्त हो रहा है तो फिर वे क्यों मारा मांरी करें। आध्यात्मिक स्वरूप ही पूजनीय है। परम तत्व ही पूजनीय है, परम तत्व ही बिगड़े हुए कार्यों को बनायेगा । वह ही महातत्व है, वह ही परिवर्तन करेगा। उसी में से परम रस का प्रादुर्भाव होगा। इतना सक्षम कृष्ण के अलावा अभी कोई गुरु नहीं हुआ है। जब निखिलेश्वरानंद जी साक्षात संकेत दे रहे हैं, समस्याओं को हल कर रहे हैं, गधे को घोड़ा बना रहे हैं तो फिर किसी और तत्व की जरूरत ही क्या है। निखिलत्व ही महाबीज है। निखिलत्व ही परम शांति है, निखिलत्व की प्राप्ति ही व्यक्ति को लीलाओं में नहीं उलझने देती। निखिलत्व की प्राप्ति ही आध्यात्मिक सफलता का द्योतक है। बड़े-बड़े तांत्रिक बड़े-बड़े आचार्य और आध्यात्मिक पथ के जिज्ञासु निखिल तत्व की प्राप्ति हेतु निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षित होना चाहते हैं। जिसने एक बार उनका वास्तविक स्वरूप देख लिया बस उसका जीवन धन्य हो उठा। वे कहीं भी आ जा सकते हैं, मिनटों में वे कण्ठ में वाक सिद्धि और सरस्वती का स्थापन कर सकते हैं। क्षण भर में वे पंचागुली विद्या सिद्ध करा सकते हैं। उनसे संस्पर्शित होने के पश्चात समस्त पाप, समस्त दोष एवं अन्य विकार स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। परम तत्व निर्झरता और निखिलता ही लाता है।
निखिलत्व को हृदय में बिठाये शिष्य के पास भूत-प्रेतादि योनियाँ फटकती ही नहीं हैं। वंश शुद्धि निखिल दीक्षा के पश्चात ही सम्भव है और शुद्धतम वंश में ही उच्च श्रेणी की देवात्माऐं जन्म लेती हैं। निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षित परिवारों में पापात्माऐं कदापि जन्म नहीं लेती हैं। वे परम ऋषि हैं, उनकी मर्जी के खिलाफ जाने की किसी में हिम्मत नहीं है। वे परम तत्व है उनका निर्णय अंतिम निर्णय है। साधक को केवल आध्यात्मिक स्वरूप से वास्ता रखना चाहिए। निखिलेश्वरानंद जी जब अपने शिष्यों को उच्चता प्रदान करते हैं तो उसके मन मस्तिष्क और कर्मों को दूसरे ही क्षण निर्ममता के साथ सांसारिक बंधनों, सांसारिक सोच इत्यादि से काटकर रख देते हैं। वे उसे ताम-झाम में कदापि नहीं उलझाते। शीघ्रातिशीघ्र शिष्य के लिए मुसीबत बने लोगों को उसके मार्ग से हटा देते हैं और इस प्रकार शिष्य अपने गुरु के निखिल स्वरूप में खोया हुआ अलमस्त रहता है। सब कुछ स्वतः ही शिष्य के पास उपलब्ध हो जाता है क्योंकि निखिलत्व ही सृजन का बीज है। ब्रह्माण्ड का समस्त भौतिक उत्पादन निखिलत्व से ही प्रादुर्भावित होता है। यही कारण है कि निखिलेश्वरानंद जी के शिष्य सर्वश्रेष्ठ हैं।
( क्रमशः)
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निखिलेश्वरानंद जी एक सर्वज्ञ आध्यात्मिक स्वरूप हैं। एक ऐसे विलक्षण आध्यात्मिक स्वरूप जो कि शारीरिक प्रपंचों से सर्वथा मुक्त हैं, वे अशरीरी हैं। जब जो शिष्य पुकारता है वे साक्षात् प्रकट हो जाते हैं। वास्तव में पूजनीय, दर्शनीय एवं हृदय में स्थापित करने योग्य तो निखिलत्व ही है अर्थात परमतत्व इस पर किसी व्यक्ति विशेष की पकड़ नहीं है। उनका यह विराट एवं गोपनीय आध्यात्मिक स्वरूप अनेकों जगह एक साथ प्रकट होता रहता है। उनके लाखों भक्तों एवं शिष्यों को वे प्रतिदिन संस्पर्शित करते हैं। कभी कुछ शिष्यों को अचानक ओंकारेश्वर में दिखते हैं तो उसी क्षण बद्रीनाथ में भी दर्शन देते हैं। अचानक वह ब्रह्म मुहूर्त में एक साथ हजारों शिष्यों के घर में पहुँच उन्हें दर्शन देते हैं, वार्तालाप करते हैं और कभी कोई शिष्य मुसीबत में फँस जाता है तो उसकी एक आवाज पर उसके कार्य चुटकियों में हल कर देते हैं। उनका प्रत्येक शिष्य उनके निखिलत्व से सराबोर है। उसके हृदय में वे नित्य नूतन भाव में स्थित रहते हैं, उनके किसी भी शिष्य को निखिलेश्वरानंद जी की कमी महसूस नहीं होती। निखिल शिष्य प्रपंचों में नहीं पड़ते हैं वे अपने गुरु की माया को भली-भांति जानते हैं। लाखों व्यक्ति एक तरफ खड़े कर लो और निखिलेश्वरानंद जी के शिष्य उनमें अलग ही दिखाई पड़ेंगे क्योंकि वे अपने गुरु की सक्षमता को जानते हैं।
जिसने निखिलत्व देख लिया, आत्मसात कर लिया, पहचान लिया वह फिर छोटे-मोटे तत्वों में नहीं उलझता है। उनके शिष्य ध्यान, धारणा, समाधि, योग आदि प्रपंचों में नहीं उलझते हैं। वे जानते हैं कि इन सबका ध्येय तो मात्र परम तत्व, परम रस की प्राप्ति है पर जब स्वयं उन्हें दीक्षा में निखिलत्व प्राप्त हो रहा है तो फिर वे क्यों मारा मांरी करें। आध्यात्मिक स्वरूप ही पूजनीय है। परम तत्व ही पूजनीय है, परम तत्व ही बिगड़े हुए कार्यों को बनायेगा । वह ही महातत्व है, वह ही परिवर्तन करेगा। उसी में से परम रस का प्रादुर्भाव होगा। इतना सक्षम कृष्ण के अलावा अभी कोई गुरु नहीं हुआ है। जब निखिलेश्वरानंद जी साक्षात संकेत दे रहे हैं, समस्याओं को हल कर रहे हैं, गधे को घोड़ा बना रहे हैं तो फिर किसी और तत्व की जरूरत ही क्या है। निखिलत्व ही महाबीज है। निखिलत्व ही परम शांति है, निखिलत्व की प्राप्ति ही व्यक्ति को लीलाओं में नहीं उलझने देती। निखिलत्व की प्राप्ति ही आध्यात्मिक सफलता का द्योतक है। बड़े-बड़े तांत्रिक बड़े-बड़े आचार्य और आध्यात्मिक पथ के जिज्ञासु निखिल तत्व की प्राप्ति हेतु निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षित होना चाहते हैं। जिसने एक बार उनका वास्तविक स्वरूप देख लिया बस उसका जीवन धन्य हो उठा। वे कहीं भी आ जा सकते हैं, मिनटों में वे कण्ठ में वाक सिद्धि और सरस्वती का स्थापन कर सकते हैं। क्षण भर में वे पंचागुली विद्या सिद्ध करा सकते हैं। उनसे संस्पर्शित होने के पश्चात समस्त पाप, समस्त दोष एवं अन्य विकार स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। परम तत्व निर्झरता और निखिलता ही लाता है।
निखिलत्व को हृदय में बिठाये शिष्य के पास भूत-प्रेतादि योनियाँ फटकती ही नहीं हैं। वंश शुद्धि निखिल दीक्षा के पश्चात ही सम्भव है और शुद्धतम वंश में ही उच्च श्रेणी की देवात्माऐं जन्म लेती हैं। निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षित परिवारों में पापात्माऐं कदापि जन्म नहीं लेती हैं। वे परम ऋषि हैं, उनकी मर्जी के खिलाफ जाने की किसी में हिम्मत नहीं है। वे परम तत्व है उनका निर्णय अंतिम निर्णय है। साधक को केवल आध्यात्मिक स्वरूप से वास्ता रखना चाहिए। निखिलेश्वरानंद जी जब अपने शिष्यों को उच्चता प्रदान करते हैं तो उसके मन मस्तिष्क और कर्मों को दूसरे ही क्षण निर्ममता के साथ सांसारिक बंधनों, सांसारिक सोच इत्यादि से काटकर रख देते हैं। वे उसे ताम-झाम में कदापि नहीं उलझाते। शीघ्रातिशीघ्र शिष्य के लिए मुसीबत बने लोगों को उसके मार्ग से हटा देते हैं और इस प्रकार शिष्य अपने गुरु के निखिल स्वरूप में खोया हुआ अलमस्त रहता है। सब कुछ स्वतः ही शिष्य के पास उपलब्ध हो जाता है क्योंकि निखिलत्व ही सृजन का बीज है। ब्रह्माण्ड का समस्त भौतिक उत्पादन निखिलत्व से ही प्रादुर्भावित होता है। यही कारण है कि निखिलेश्वरानंद जी के शिष्य सर्वश्रेष्ठ हैं।
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निखिल रहस्यम् (३)
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श्रेष्ठता ही निखिलेश्वरानंद जी की परिभाषा है। निखिलेश्वरानंद जी के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। पूजा घर में लगे चित्र में से वे अचानक मुस्कुरा उठते हैं, हवन कुण्ड में से प्रकट हो आशीर्वाद दे देते हैं। अचानक सुगंधित अष्टगंध से युक्त हवा के झोंके से अपनी मौजूदगी का एहसास करा देते हैं। जरूरत पढ़ने पर विशेष मुहूर्त और विशेष काल में शिष्य को सोते में जगाकर दीक्षा दे देते हैं लाखों लोग प्रतिदिन उन्हें अनुभूत करते हैं। वे सर्वज्ञ और सर्व विद्यमान हैं। वे एक लोक के गुरु नहीं हैं। सांसारिक शिष्यों के अलावा सिद्धाश्रम के भी वे गुरु हैं। किसी शिष्य ने सच ही कहा है कि अर्धसत्य में मत जियो पूर्ण सत्य तो करोड़ों में केवल कुछ ही समझ पायेंगे। निखिलेश्वरानंद जी को उनके प्रवचनों, ज्ञान, सिद्धियों इत्यादियों के माध्यम से मत पहचानो। ये सब तो छोटी मोटी चीजें हैं। वे तो परम तत्व हैं बस हृदय में झांककर देखो तुम्हें साक्षात् दिखाई पड़ जायेंगे।
उनके शरीर को लेकर मत रोओ, उनके अनंत शरीर हैं, उनकी, अनंत आँखें और अनंत बाहु हैं, वे सब देखते हैं, अनेकों बार मैंने स्वयं महसूस किया है कि जो बात घर में करूं वही वह टेलीफोन पर दोहरा देते थे, वे इशारा कर रहे थे कि सिर्फ मुझे शरीर तक ही सीमित मत रखो। एक बार की बात है सन् 1994 में उनका शिविर हरियाणा में हो रहा था। ट्रेन से यात्रा के दौरान मैंने कुछ अंग्रेजी की किताबें खरीद ली थी। जैसे ही शिविर स्थल पर पहुँचा वह प्रवचन में चिल्लाकर बोले अंग्रेजी की फालतू किताबें पढ़ने से कुछ नहीं होगा। दूसरे ही क्षण से मैंने कसम खा ली कि अब अंग्रेजी की फालतू किताबें नहीं पढूंगा। वे प्रतिक्षण देखते हैं। अगर निखिलेश्वरानंद जी का शिष्य मार्ग से भटकने की कोशिश करता है तो जूते भी जबर्दस्त पड़ते हैं। गुरु हो तो ऐसा। उनसे बचना, उनसे छिपना, उनकी मर्जी के विरुद्ध जाना किसी के वश की बात नहीं है। यही निखिल रहस्य है।
गुरु कृपा ही केवलम् गुरु कृपा ही केवलम्
शिव शासनत: शिव शासनत:
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श्रेष्ठता ही निखिलेश्वरानंद जी की परिभाषा है। निखिलेश्वरानंद जी के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। पूजा घर में लगे चित्र में से वे अचानक मुस्कुरा उठते हैं, हवन कुण्ड में से प्रकट हो आशीर्वाद दे देते हैं। अचानक सुगंधित अष्टगंध से युक्त हवा के झोंके से अपनी मौजूदगी का एहसास करा देते हैं। जरूरत पढ़ने पर विशेष मुहूर्त और विशेष काल में शिष्य को सोते में जगाकर दीक्षा दे देते हैं लाखों लोग प्रतिदिन उन्हें अनुभूत करते हैं। वे सर्वज्ञ और सर्व विद्यमान हैं। वे एक लोक के गुरु नहीं हैं। सांसारिक शिष्यों के अलावा सिद्धाश्रम के भी वे गुरु हैं। किसी शिष्य ने सच ही कहा है कि अर्धसत्य में मत जियो पूर्ण सत्य तो करोड़ों में केवल कुछ ही समझ पायेंगे। निखिलेश्वरानंद जी को उनके प्रवचनों, ज्ञान, सिद्धियों इत्यादियों के माध्यम से मत पहचानो। ये सब तो छोटी मोटी चीजें हैं। वे तो परम तत्व हैं बस हृदय में झांककर देखो तुम्हें साक्षात् दिखाई पड़ जायेंगे।
उनके शरीर को लेकर मत रोओ, उनके अनंत शरीर हैं, उनकी, अनंत आँखें और अनंत बाहु हैं, वे सब देखते हैं, अनेकों बार मैंने स्वयं महसूस किया है कि जो बात घर में करूं वही वह टेलीफोन पर दोहरा देते थे, वे इशारा कर रहे थे कि सिर्फ मुझे शरीर तक ही सीमित मत रखो। एक बार की बात है सन् 1994 में उनका शिविर हरियाणा में हो रहा था। ट्रेन से यात्रा के दौरान मैंने कुछ अंग्रेजी की किताबें खरीद ली थी। जैसे ही शिविर स्थल पर पहुँचा वह प्रवचन में चिल्लाकर बोले अंग्रेजी की फालतू किताबें पढ़ने से कुछ नहीं होगा। दूसरे ही क्षण से मैंने कसम खा ली कि अब अंग्रेजी की फालतू किताबें नहीं पढूंगा। वे प्रतिक्षण देखते हैं। अगर निखिलेश्वरानंद जी का शिष्य मार्ग से भटकने की कोशिश करता है तो जूते भी जबर्दस्त पड़ते हैं। गुरु हो तो ऐसा। उनसे बचना, उनसे छिपना, उनकी मर्जी के विरुद्ध जाना किसी के वश की बात नहीं है। यही निखिल रहस्य है।
गुरु कृपा ही केवलम् गुरु कृपा ही केवलम्
शिव शासनत: शिव शासनत:
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नवनाथ और चौरासी सिद्ध, ध्यानस्थ परम शिव अर्थात अलख निरंजन के महाध्यान रूपी दिव्य कर्म के फल हैं अर्थात शिष्य हैं। विष्णु ने देखा, ब्रह्मा ने देखा, गणेश ने देखा, कार्तिकेय ने देखा, आद्या ने देखा, सूर्य ने देखा, ऋषियों ने देखा, समस्त ब्रह्माण्ड ने देखा कि नव नाथ और चौरासी सिद्ध शिव में से उदित होते हैं और शिव में ही विलीन हो जाते हैं, शिव को ही तकते हैं, शिव से ही खेलते हैं, शिव के इर्दगिर्द ही घूमते हैं, सम्पूर्ण शिवमय हैं और सिर्फ नमो नमो आदेश गुरु का ही भजते हैं। गुरु का आविष्कार शिष्य, समर्थ गुरु के समर्थ शिष्य । सब लालायित हो उठे शिष्यता के आविष्कार हेतु इसलिए शिष्य समर्थ है एवं उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि महाकाल के भी शिष्य हैं काल रूपी असंख्य क्षण, महाकाली की भी शिष्यायें हैं, नित्याएं हैं। विष्णु के भी शिष्य हैं, वे भी गुरु धर्म निभा रहे हैं ।जो शिष्य है वही गुरु भी है ।
आद्या की भी शिष्याएं हैं, सूर्य भी गुरु हैं हनुमान के, हनुमान के भी असंख्य शिष्य हैं, आदि शंकर गौणपाद के शिष्य हैं और आदि शंकर के भी अनंत शिष्य हैं। ब्रह्मा तो गुरु वाणी ही बोलते हैं अनंत ऋषि उनके शिष्य हैं। नारद गुरु भी हैं और शिष्य भी, वासुकी के भी शिष्य हैं। तक्षक के भी शिष्य हैं, नंदी के भी शिष्य हैं, गणपति तो साक्षात् गणाध्यक्ष हैं, दसों महाविद्याएं गुरु स्वरूपिणी हैं। धूमावती भी शिष्य के लिए रोती हैं, वल्गा भी शिष्य के लिए शत्रु की जिह्वा खींच लेती हैं, काली शिष्य के लिए खप्पर भर लेती हैं, विष्णु के सभी अवतार जगद्गुरु हैं, कृष्ण भी शिष्यों से घिरे बैठे हुए हैं । सबके सब दीवाने हैं शिष्यों के। सभी के शिष्य कभी भी, किसी भी वक्त, किसी भी स्थिति में, किसी भी हाल में, कितने भी नालायक क्यों न हों, कहीं पर भी गुरु से बात कर सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं, सीख सकते हैं, कह सुन सकते हैं। गुरु और शिष्य के बीच सब चलता है, कहीं कोई भेद नहीं, कहीं कोई पर्दा नहीं ।
ब्रह्माण्ड के सभी लोक, सभी गुरुओं के दरवाजे शिष्यों के लिए सदैव खुले हुए हैं। लक्ष्मी भी तो गुरु हैं, गुरु के रूप में शिष्य के सामने लक्ष्मी भी बैठी हुई है । संतान उदर से बाहर निकलती है पर शिष्य ह्दय में घुसता है। संतान कुछ नहीं प्राप्त कर सकती, समर्थ पिता का पुत्र समर्थ हो यह जरूरी नहीं है परन्तु समर्थ गुरु का शिष्य सदैव समर्थ होगा। ब्रह्माण्ड की प्रत्येक शक्ति चाहे रावण हो, विभीषण, दुर्योधन, द्रोण, अश्वत्थामा या फिर श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि सबने गुरुत्व का अनुसंधान किया है, सब गुरु बने हैं, शिष्य भी बने हैं। अतः गुरु प्रेम से बढ़कर, गुरु पूजन से बढ़कर, गुरु अनुष्ठान से बढ़कर और क्या है इस दुनिया में । नमो नमो आदेश गुरु का।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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आद्या की भी शिष्याएं हैं, सूर्य भी गुरु हैं हनुमान के, हनुमान के भी असंख्य शिष्य हैं, आदि शंकर गौणपाद के शिष्य हैं और आदि शंकर के भी अनंत शिष्य हैं। ब्रह्मा तो गुरु वाणी ही बोलते हैं अनंत ऋषि उनके शिष्य हैं। नारद गुरु भी हैं और शिष्य भी, वासुकी के भी शिष्य हैं। तक्षक के भी शिष्य हैं, नंदी के भी शिष्य हैं, गणपति तो साक्षात् गणाध्यक्ष हैं, दसों महाविद्याएं गुरु स्वरूपिणी हैं। धूमावती भी शिष्य के लिए रोती हैं, वल्गा भी शिष्य के लिए शत्रु की जिह्वा खींच लेती हैं, काली शिष्य के लिए खप्पर भर लेती हैं, विष्णु के सभी अवतार जगद्गुरु हैं, कृष्ण भी शिष्यों से घिरे बैठे हुए हैं । सबके सब दीवाने हैं शिष्यों के। सभी के शिष्य कभी भी, किसी भी वक्त, किसी भी स्थिति में, किसी भी हाल में, कितने भी नालायक क्यों न हों, कहीं पर भी गुरु से बात कर सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं, सीख सकते हैं, कह सुन सकते हैं। गुरु और शिष्य के बीच सब चलता है, कहीं कोई भेद नहीं, कहीं कोई पर्दा नहीं ।
ब्रह्माण्ड के सभी लोक, सभी गुरुओं के दरवाजे शिष्यों के लिए सदैव खुले हुए हैं। लक्ष्मी भी तो गुरु हैं, गुरु के रूप में शिष्य के सामने लक्ष्मी भी बैठी हुई है । संतान उदर से बाहर निकलती है पर शिष्य ह्दय में घुसता है। संतान कुछ नहीं प्राप्त कर सकती, समर्थ पिता का पुत्र समर्थ हो यह जरूरी नहीं है परन्तु समर्थ गुरु का शिष्य सदैव समर्थ होगा। ब्रह्माण्ड की प्रत्येक शक्ति चाहे रावण हो, विभीषण, दुर्योधन, द्रोण, अश्वत्थामा या फिर श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि सबने गुरुत्व का अनुसंधान किया है, सब गुरु बने हैं, शिष्य भी बने हैं। अतः गुरु प्रेम से बढ़कर, गुरु पूजन से बढ़कर, गुरु अनुष्ठान से बढ़कर और क्या है इस दुनिया में । नमो नमो आदेश गुरु का।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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देवरहा बाबा (19 जून पुण्यतिथि)
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देवरहा बाबा भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे...
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय- समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था।
पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।
देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के नाथ नदौली ग्राम, लार रोड, देवरिया जिले के रहने वाले थे।
मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं। कुंभ कैंपस में संगम तट पर धूनी रमाए बाबा की करीब 10 सालों तक सेवा करने वाले मार्कण्डेय महराज के मुताबिक, पूरे जीवन निर्वस्त्र रहने वाले बाबा धरती से 12 फुट उंचे लकड़ी से बने बॉक्स में रहते थे। वह नीचे केवल सुबह के समय स्नान करने के लिए आते थे। इनके भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। राजनेता, फिल्मी सितारे और बड़े-बड़े अधिकारी उनके शरण में रहते थे।
हिमालय में अनेक वर्षों तक अज्ञात रूप में रहकर उन्होंने साधना की। वहां से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया नामक स्थान पर पहुंचे। वहां वर्षों निवास करने के कारण उनका नाम देवरहा बाबा पड़ा। देवरहा बाबा ने देवरिया जनपद के सलेमपुर तहसील में मइल (एक छोटा शहर) से लगभग एक कोस की दूरी पर सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाल दिया और धर्म-कर्म करने लगे।
देवरहा बाबा परंम् रामभक्त थे, देवरहा बाबा के मुख में सदा राम नाम का वास था, वो भक्तो को राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। वो सदा सरयू के किनारे रहा करते थे।
उनका कहना था "एक लकड़ी ह्रदय को
मानो दूसर राम नाम पहिचानो
राम नाम नित उर पे मारो
ब्रह्म दिखे संशय न जानो"
देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि-धर्म मानते थे तथा प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तो को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।
"ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविन्दाय नमो-नम:"
बाबा कहते थे जीवन को पवित्र बनाए बिना, ईमानदारी, सात्विकता-सरसता के बिना भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती। अत: सबसे पहले अपने जीवन को शुद्ध-पवित्र बनाने का संकल्प लो वे प्राय: गंगा या यमुना तट पर बनी घास-फूस की मचान पर रहकर साधना किया करते थे। दर्शनार्थ आने वाले भक्तजनों को वे सद्मार्ग पर चलते हुए अपना मानव जीवन सफल करने का आशीर्वाद देते थे।
वे कहते इस भारत भूमि की दिव्यता का यह प्रमाण है कि इसमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने अवतार लिया है। यह देवभूमि है, इसकी सेवा, रक्षा तथा संवर्धन करना प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है
प्रयागराज में सन् 1989 में महाकुंभ के पावन पर्व पर विश्व हिन्दू परिषद् के मंच से बाबा ने अपना पावन संदेश देते हुए कहा था दिव्यभूमि भारत की समृद्धि गोरक्षा, गोसेवा के बिना संभव नहीं होगी। गोहत्या का कलंक मिटाना अत्यावश्यक है।
पूज्य बाबा ने योग विद्या के जिज्ञासुओं को हठयोग की दसों मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। वे ध्यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायाम, त्राटक, ध्यान, धारणा, समाधि आदि की साधन पद्धतियों का जब विवेचन करते तो बड़े-बड़े धर्माचार्य उनके योग सम्बंधी ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे।
बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि वृन्दावन में यमुना तट पर स्थित मचान पर चार वर्ष तक साधना की बहुत ही कम समय में देवरहा बाबा अपने कर्म एवं व्यक्तित्व से एक सिद्ध महापुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन विशाल जन समूह उमड़ने लगा तथा बाबा के सानिध्य में शांति और आनन्द पाने लगा। बाबा श्रद्धालुओं को योग और साधना के साथ-साथ ज्ञान की बातें बताने लगे। बाबा का जीवन सादा और एकदम संन्यासी था। बाबा भोर में ही स्नान आदि से निवृत्त होकर ईश्वर ध्यान में लीन हो जाते थे और मचान पर आसीन होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते और ज्ञान लाभ कराते थे। कुंभ मेले के दौरान बाबा अलग-अलग जगहों पर प्रवास किया करते थे। गंगा-यमुना के तट पर उनका मंच लगता था। वह 1-1 महीने दोनों के किनारे रहते थे। जमीन से कई फीट ऊंचे स्थान पर बैठकर वह लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे। बाबा सभी के मन की बातें जान लेते थे। उन्होंने पूरे जीवन कुछ नहीं खाया। सिर्फ दूध और शहद पीकर जीते थे। श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।
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@Sanatan
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देवरहा बाबा भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे...
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय- समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था।
पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।
देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के नाथ नदौली ग्राम, लार रोड, देवरिया जिले के रहने वाले थे।
मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं। कुंभ कैंपस में संगम तट पर धूनी रमाए बाबा की करीब 10 सालों तक सेवा करने वाले मार्कण्डेय महराज के मुताबिक, पूरे जीवन निर्वस्त्र रहने वाले बाबा धरती से 12 फुट उंचे लकड़ी से बने बॉक्स में रहते थे। वह नीचे केवल सुबह के समय स्नान करने के लिए आते थे। इनके भक्त पूरी दुनिया में फैले हैं। राजनेता, फिल्मी सितारे और बड़े-बड़े अधिकारी उनके शरण में रहते थे।
हिमालय में अनेक वर्षों तक अज्ञात रूप में रहकर उन्होंने साधना की। वहां से वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया नामक स्थान पर पहुंचे। वहां वर्षों निवास करने के कारण उनका नाम देवरहा बाबा पड़ा। देवरहा बाबा ने देवरिया जनपद के सलेमपुर तहसील में मइल (एक छोटा शहर) से लगभग एक कोस की दूरी पर सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाल दिया और धर्म-कर्म करने लगे।
देवरहा बाबा परंम् रामभक्त थे, देवरहा बाबा के मुख में सदा राम नाम का वास था, वो भक्तो को राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। वो सदा सरयू के किनारे रहा करते थे।
उनका कहना था "एक लकड़ी ह्रदय को
मानो दूसर राम नाम पहिचानो
राम नाम नित उर पे मारो
ब्रह्म दिखे संशय न जानो"
देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि-धर्म मानते थे तथा प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तो को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।
"ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविन्दाय नमो-नम:"
बाबा कहते थे जीवन को पवित्र बनाए बिना, ईमानदारी, सात्विकता-सरसता के बिना भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती। अत: सबसे पहले अपने जीवन को शुद्ध-पवित्र बनाने का संकल्प लो वे प्राय: गंगा या यमुना तट पर बनी घास-फूस की मचान पर रहकर साधना किया करते थे। दर्शनार्थ आने वाले भक्तजनों को वे सद्मार्ग पर चलते हुए अपना मानव जीवन सफल करने का आशीर्वाद देते थे।
वे कहते इस भारत भूमि की दिव्यता का यह प्रमाण है कि इसमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने अवतार लिया है। यह देवभूमि है, इसकी सेवा, रक्षा तथा संवर्धन करना प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है
प्रयागराज में सन् 1989 में महाकुंभ के पावन पर्व पर विश्व हिन्दू परिषद् के मंच से बाबा ने अपना पावन संदेश देते हुए कहा था दिव्यभूमि भारत की समृद्धि गोरक्षा, गोसेवा के बिना संभव नहीं होगी। गोहत्या का कलंक मिटाना अत्यावश्यक है।
पूज्य बाबा ने योग विद्या के जिज्ञासुओं को हठयोग की दसों मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। वे ध्यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायाम, त्राटक, ध्यान, धारणा, समाधि आदि की साधन पद्धतियों का जब विवेचन करते तो बड़े-बड़े धर्माचार्य उनके योग सम्बंधी ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे।
बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि वृन्दावन में यमुना तट पर स्थित मचान पर चार वर्ष तक साधना की बहुत ही कम समय में देवरहा बाबा अपने कर्म एवं व्यक्तित्व से एक सिद्ध महापुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन विशाल जन समूह उमड़ने लगा तथा बाबा के सानिध्य में शांति और आनन्द पाने लगा। बाबा श्रद्धालुओं को योग और साधना के साथ-साथ ज्ञान की बातें बताने लगे। बाबा का जीवन सादा और एकदम संन्यासी था। बाबा भोर में ही स्नान आदि से निवृत्त होकर ईश्वर ध्यान में लीन हो जाते थे और मचान पर आसीन होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते और ज्ञान लाभ कराते थे। कुंभ मेले के दौरान बाबा अलग-अलग जगहों पर प्रवास किया करते थे। गंगा-यमुना के तट पर उनका मंच लगता था। वह 1-1 महीने दोनों के किनारे रहते थे। जमीन से कई फीट ऊंचे स्थान पर बैठकर वह लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे। बाबा सभी के मन की बातें जान लेते थे। उन्होंने पूरे जीवन कुछ नहीं खाया। सिर्फ दूध और शहद पीकर जीते थे। श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।
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@Sanatan
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देवराहा बाबा के भक्तों में कई बड़े लोगों का नाम शुमार है। राजेंद्र प्रसाद, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनेता हर समस्या के समाधान के लिए बाबा की शरण में आते थे। देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गाँधी हार गईं तो वह भी देवराहा बाबा से आशीर्वाद लेने गयीं।
सन् 1990 की योगिनी एकादशी (19 जून) के पावन दिन उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।
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साभार....
@Sanatan
देवराहा बाबा के भक्तों में कई बड़े लोगों का नाम शुमार है। राजेंद्र प्रसाद, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनेता हर समस्या के समाधान के लिए बाबा की शरण में आते थे। देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गाँधी हार गईं तो वह भी देवराहा बाबा से आशीर्वाद लेने गयीं।
सन् 1990 की योगिनी एकादशी (19 जून) के पावन दिन उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।
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साभार....
@Sanatan
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आयुष्कामोऽथवा राजन् भूति कामोऽथवा नरः ।
नित्यं धार ये द्भस्म मोक्षकामी च व नरः ॥
अर्थात- जो मनुष्य आयु को चाहने वाला हो, ऐश्वर्य को चाहने वाला हो तथा मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता हो उसे भस्म अवश्य धारण करनी चाहिए ।
पंचाक्षरेण मंत्रेण विल्व पत्रैः शिवार्चनम ।
करोति श्रद्धया यस्तु सगच्छेदेश्वरं पदम् ॥
अर्थात जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पंचाछर मंत्र लिखित विल्व पत्रों से भगवान शिव की पूजा करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। .
@Sanatan
नित्यं धार ये द्भस्म मोक्षकामी च व नरः ॥
अर्थात- जो मनुष्य आयु को चाहने वाला हो, ऐश्वर्य को चाहने वाला हो तथा मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता हो उसे भस्म अवश्य धारण करनी चाहिए ।
पंचाक्षरेण मंत्रेण विल्व पत्रैः शिवार्चनम ।
करोति श्रद्धया यस्तु सगच्छेदेश्वरं पदम् ॥
अर्थात जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पंचाछर मंत्र लिखित विल्व पत्रों से भगवान शिव की पूजा करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। .
@Sanatan
❤23👍5
शिव रहस्यम्
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शिव नगरी काशी से एक विशेष शिव पंचाग प्रकाशित होता है जिसमें तिथि अनुसार शिवाभिषेक का महत्व वर्णित होता है। शिव-वास विचार नाम इस पंचांग में यह देखा जाता है कि विशेष तिथि पर शिव का वास कहाँ है? शिव श्मशान में हैं तो उस समय विशेष शैवानुष्ठान आयोजित करने पर मृत्युतुल्य कष्ट होता है, शिव अगर क्रीड़ा में हैं तो शैवानुष्ठान करने पर संतान को संताप होता है, शिव अगर सभागार में हैं तो उस समय शैवानुष्ठान करने परं शारीरिक कष्ट होता है, शिव अगर पार्वती सानिध्य में हैं तो शैवानुष्ठान सुख समृद्धि देने वाला होगा, शिव अगर वृषभ पर आरूढ़ हैं तो शैवानुष्ठान के द्वारा विजय प्राप्ति होती है, शिव अगर हिमालय पर हैं तो शैवानुष्ठान सुख की वृद्धि करता है, शिव अगर ध्यान में हैं तो शैवानुष्ठान सिद्धियों को साधक के चरणों में डाल देता है इत्यादि इत्यादि। यह उच्च स्तर का शैव चिंतन है एवं यह उनके लिए है जिन्होंने शिव ज्ञान में पारंगतता हासिल कर ली है, जिनकी संज्ञा में शिव तत्व की संवेदनशीलता रूप ले चुकी है परन्तु अगर नियमित रूप से ज्योतिर्लिङ्गों पर या विशेष शैव स्थान पर अनुष्ठान इत्यादि होता है तो उपरोक्त पंचांग को महत्व नहीं दिया जाता। नूतन शिवलिङ्ग की प्राण-प्रतिष्ठा व्यक्ति विशेष के नाम से किया जा रहा महामृत्युञ्जय अनुष्ठान इत्यादि में शिव पंचांग के दृष्टिकोण का अत्यंत ही सटीक महत्व है।
अनुष्ठान तंत्र क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं अतः त्रुटियां न हों इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए । दीक्षाएं, रुद्राक्ष धारण इत्यादि में परिणामों की तीव्रता शिव-वास विचार पर अत्यधिक निर्भर करती है। शिवरात्रि वह दिन है जब शंकर का दरबार खुला होता है, सारे नियम शिथिल होते हैं, ब्रह्माण्ड मण्डल स्थित समस्त शक्तियाँ शिवार्चन में लीन होती हैं, ब्रह्माण्ड का एक-एक अणु एवं परमाणु से भी अल्प कण शिवत्व से परिपूर्ण होता है। इस दिन की गई साधना, इस दिन मांगी गई मनोकामना, इस दिन प्राप्त की गई दीक्षा, इस दिन शिवलिङ्ग का स्पर्श, शिवलिङ्ग का स्थापन एवं शिवार्चन असंख्य गुना फल देने वाला होता है। सम्पूर्ण सृष्टि में केवल शिव ही चलते हैं, यह है शिवरात्रि महात्म्न ।
प्रभु श्रीराम लक्ष्मण के साथ जलती चिता में सीता के वियोग में दुःखी हो आहूत होने जा रहे थे। विष्णु अवतार आज पूर्ण रूप से मनुष्य हो गया था । मानुषिक प्रवृत्तियों के वेग ने श्रीराम के मस्तिष्क को कुण्ठित कर दिया था, वे स्वयं की दिव्यता को कुछ क्षण के लिए तिरोहित कर चुके थे। यह विडम्बना है, यह दोष है परम शक्तियों के पंचभूतीय जीव शरीर धारण करने का, मस्तिष्क ग्रहण करने का । जब भी अवतार होते हैं परम शक्तियों को भी मनुष्य रूपी पंचभूतीय शरीर धारण करना पड़ता है जिसके ऊपर मस्तिष्क आकार लिए हुए होता है। मानव शरीर की अपनी निश्चितताएं हैं ठीक वैसे ही जैसे कि अगर हमें वायुयान में बैठा दिया जाय तो हमारी 90 प्रतिशत शरीरिक क्रियाएं बाधित हो जायेंगी। हम दौड़ नहीं सकते, हम सीधे सो नहीं सकते, हम चल फिर भी नहीं सकते, हम बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि हम एक निश्चित, सीमित आकृति के अंदर आबद्ध हो गये हैं। हमें उस आकृति की न्यूनताओं, अल्पताओं और सीमितताओं के साथ स्वयं को अनुशासित करना होगा। लम्बे समय तक इस प्रकार की स्थिति में रहने से हमें हमारी मूलभूत शक्तियों को कुछ देर के लिए तिरोहित करना ही पड़ेगा । मनुष्य पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ है, मनुष्य पृथ्वी पर स्थानांतरित किया गया है, मनुष्य पृथ्वी पर रोपा गया है केवल कार्य विशेष के लिए। पृथ्वी मनुष्य की अंतिम और पहली भूमि भी नहीं है। आने वाले युगों में मनुष्य को पृथ्वी से स्थानांतरित भी किया जा सकता है, मनुष्य को किसी और जगह पर भी बसाया जा सकता है, यही शिव उवाच है, यही शिव का महात्न हैं।
मेरे हाथ पर एक मच्छर बैठ रहा था, मैंने मार दिया। क्यों मारा? मेरी मर्जी । मारना था, मार दिया। यही शिव भाव है। मैं शिवार्चन करता हूँ, लिंगार्चन करता हूँ- बुद्ध या महावीर की उपासना नहीं करता, कृत्रिम अहिंसा को नहीं ओढ़ता, कृत्रिमता में नहीं जीता। महाकाल मेरा ईष्ट है। प्रलय क्यों होगा? कब होगा ? क्या कारण है प्रलय के ? किसी को नहीं मालूम। प्रलय क्यों हुए हैं? किसी को नहीं मालूम। यह शिव का क्षेत्र है। एक क्षण में या क्षण के करोड़वे हिस्से में सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, ग्रह, तारे, आकाश, पाताल, देवलोक, नागलोक, समस्त ब्रह्माण्डं मण्डल को शिव रच देता है। क्यों रचा ? उसकी मर्जी । किसी की हिम्मत नहीं पूछने की, क्यों समस्त जगत को सेकेण्ड के करोड़वे हिस्से में मिटा देगा? यह भी शिव की मर्जी । .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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शिव नगरी काशी से एक विशेष शिव पंचाग प्रकाशित होता है जिसमें तिथि अनुसार शिवाभिषेक का महत्व वर्णित होता है। शिव-वास विचार नाम इस पंचांग में यह देखा जाता है कि विशेष तिथि पर शिव का वास कहाँ है? शिव श्मशान में हैं तो उस समय विशेष शैवानुष्ठान आयोजित करने पर मृत्युतुल्य कष्ट होता है, शिव अगर क्रीड़ा में हैं तो शैवानुष्ठान करने पर संतान को संताप होता है, शिव अगर सभागार में हैं तो उस समय शैवानुष्ठान करने परं शारीरिक कष्ट होता है, शिव अगर पार्वती सानिध्य में हैं तो शैवानुष्ठान सुख समृद्धि देने वाला होगा, शिव अगर वृषभ पर आरूढ़ हैं तो शैवानुष्ठान के द्वारा विजय प्राप्ति होती है, शिव अगर हिमालय पर हैं तो शैवानुष्ठान सुख की वृद्धि करता है, शिव अगर ध्यान में हैं तो शैवानुष्ठान सिद्धियों को साधक के चरणों में डाल देता है इत्यादि इत्यादि। यह उच्च स्तर का शैव चिंतन है एवं यह उनके लिए है जिन्होंने शिव ज्ञान में पारंगतता हासिल कर ली है, जिनकी संज्ञा में शिव तत्व की संवेदनशीलता रूप ले चुकी है परन्तु अगर नियमित रूप से ज्योतिर्लिङ्गों पर या विशेष शैव स्थान पर अनुष्ठान इत्यादि होता है तो उपरोक्त पंचांग को महत्व नहीं दिया जाता। नूतन शिवलिङ्ग की प्राण-प्रतिष्ठा व्यक्ति विशेष के नाम से किया जा रहा महामृत्युञ्जय अनुष्ठान इत्यादि में शिव पंचांग के दृष्टिकोण का अत्यंत ही सटीक महत्व है।
अनुष्ठान तंत्र क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं अतः त्रुटियां न हों इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए । दीक्षाएं, रुद्राक्ष धारण इत्यादि में परिणामों की तीव्रता शिव-वास विचार पर अत्यधिक निर्भर करती है। शिवरात्रि वह दिन है जब शंकर का दरबार खुला होता है, सारे नियम शिथिल होते हैं, ब्रह्माण्ड मण्डल स्थित समस्त शक्तियाँ शिवार्चन में लीन होती हैं, ब्रह्माण्ड का एक-एक अणु एवं परमाणु से भी अल्प कण शिवत्व से परिपूर्ण होता है। इस दिन की गई साधना, इस दिन मांगी गई मनोकामना, इस दिन प्राप्त की गई दीक्षा, इस दिन शिवलिङ्ग का स्पर्श, शिवलिङ्ग का स्थापन एवं शिवार्चन असंख्य गुना फल देने वाला होता है। सम्पूर्ण सृष्टि में केवल शिव ही चलते हैं, यह है शिवरात्रि महात्म्न ।
प्रभु श्रीराम लक्ष्मण के साथ जलती चिता में सीता के वियोग में दुःखी हो आहूत होने जा रहे थे। विष्णु अवतार आज पूर्ण रूप से मनुष्य हो गया था । मानुषिक प्रवृत्तियों के वेग ने श्रीराम के मस्तिष्क को कुण्ठित कर दिया था, वे स्वयं की दिव्यता को कुछ क्षण के लिए तिरोहित कर चुके थे। यह विडम्बना है, यह दोष है परम शक्तियों के पंचभूतीय जीव शरीर धारण करने का, मस्तिष्क ग्रहण करने का । जब भी अवतार होते हैं परम शक्तियों को भी मनुष्य रूपी पंचभूतीय शरीर धारण करना पड़ता है जिसके ऊपर मस्तिष्क आकार लिए हुए होता है। मानव शरीर की अपनी निश्चितताएं हैं ठीक वैसे ही जैसे कि अगर हमें वायुयान में बैठा दिया जाय तो हमारी 90 प्रतिशत शरीरिक क्रियाएं बाधित हो जायेंगी। हम दौड़ नहीं सकते, हम सीधे सो नहीं सकते, हम चल फिर भी नहीं सकते, हम बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि हम एक निश्चित, सीमित आकृति के अंदर आबद्ध हो गये हैं। हमें उस आकृति की न्यूनताओं, अल्पताओं और सीमितताओं के साथ स्वयं को अनुशासित करना होगा। लम्बे समय तक इस प्रकार की स्थिति में रहने से हमें हमारी मूलभूत शक्तियों को कुछ देर के लिए तिरोहित करना ही पड़ेगा । मनुष्य पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ है, मनुष्य पृथ्वी पर स्थानांतरित किया गया है, मनुष्य पृथ्वी पर रोपा गया है केवल कार्य विशेष के लिए। पृथ्वी मनुष्य की अंतिम और पहली भूमि भी नहीं है। आने वाले युगों में मनुष्य को पृथ्वी से स्थानांतरित भी किया जा सकता है, मनुष्य को किसी और जगह पर भी बसाया जा सकता है, यही शिव उवाच है, यही शिव का महात्न हैं।
मेरे हाथ पर एक मच्छर बैठ रहा था, मैंने मार दिया। क्यों मारा? मेरी मर्जी । मारना था, मार दिया। यही शिव भाव है। मैं शिवार्चन करता हूँ, लिंगार्चन करता हूँ- बुद्ध या महावीर की उपासना नहीं करता, कृत्रिम अहिंसा को नहीं ओढ़ता, कृत्रिमता में नहीं जीता। महाकाल मेरा ईष्ट है। प्रलय क्यों होगा? कब होगा ? क्या कारण है प्रलय के ? किसी को नहीं मालूम। प्रलय क्यों हुए हैं? किसी को नहीं मालूम। यह शिव का क्षेत्र है। एक क्षण में या क्षण के करोड़वे हिस्से में सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, ग्रह, तारे, आकाश, पाताल, देवलोक, नागलोक, समस्त ब्रह्माण्डं मण्डल को शिव रच देता है। क्यों रचा ? उसकी मर्जी । किसी की हिम्मत नहीं पूछने की, क्यों समस्त जगत को सेकेण्ड के करोड़वे हिस्से में मिटा देगा? यह भी शिव की मर्जी । .
(क्रमशः)
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शिव रहस्यम् (२)
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कोई जवाब सवाल नहीं, कोई सफाई नहीं, कोई कारण नहीं, कोई क्षोभ नहीं। मिटाना है तो मिटा दूंगा, पुनः निर्मित करना है तो निर्मित कर दूंगा। प्रलय के लिए न शिव किसी से राय लेते हैं, न कारण ढूंढते हैं क्योंकि यह उनका क्षेत्र है और न ही किसी में हिम्मत है उनसे कारण पूछने की क्योंकि वे कारणों के भी कारण हैं उनकी मर्जी चलती है। शैव चिंतन सबसे अलग है, शिव के आगे किसी की नहीं चलती, उनकी क्रियाएं विचारों, कारणों, चिंतन, बुद्धि, मन इत्यादि सबसे परे हैं। मुझे क्षमा करना हे शिव कहीं शिव गीता तो नहीं खोल दी क्योंकि शिव गीता ब्रह्माण्ड का सबसे गोपनीय तंत्र है।
जैसे ही राम चिताग्नि में चढ़ने के लिए उद्धत हुए अगत्स्य मुनि आ पहुँचे बोले आप यह क्या कर रहे हैं? एक स्त्री के लिए विष्णु अवतार को आहूत करने जा रहे हैं, नाना प्रकार से प्रभु श्रीराम को समझाया परन्तु श्रीराम बोले मुनि मेरा शोक कम नहीं हो रहा है, मेरा अशांत चित्त शांत ही नहीं हो रहा तब अगत्स्य ने श्रीराम को उसी क्षण शिव की शरण में जाने के लिए कहा एवं तुरंत उन्हें विरजा दीक्षा दी एवं शिवार्चन की विशेष विधि बता दी। श्रीराम लक्ष्मण सहित व्याघ्र चर्म धारण कर शिवार्चन में लीन हो गये तभी ब्रह्माण्ड मण्डल से तेजोमय ज्योर्तिपुंज का प्रादुर्भाव हुआ। देवाधिदेव महादेव पार्वती सहित वृषभ पर आरूढ़ राम के समीप आ पहुँचे एवं प्रभु श्रीराम को तुरंत अपनी गोद में उठाया और तेजोमय रथ पर सवार हो अंतरिक्ष में अंतरध्यान हो गये, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को रथ पर बिठाकर श्रीमद्गीता का संदेश दिया था उसी प्रकार शिव ने स्वयं प्रभु श्रीराम को शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात शिव ने अपने मुख से विष्णु के सामने आज शिव रहस्य खोले एवं शिव के विराट स्वरूप का दर्शन कराया, तत्व का बोध कराया । प्रभु श्रीराम के महामाया से ग्रसित मस्तिष्क को योग माया से काटकर शिव वैभव के दर्शन कराये, परम सत्य से परिचित करवाया उन्हें पाशुपतास्त्र, अघोरास्त्र, कालिकास्त्र, चण्डिकास्त्र, ब्रह्मास्त्र इत्यादि प्रदान कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अजेय योद्धा बनाया महामाया अलग हैं, योगमाया अलग है। शिव ने योग माया, महामाया से अलग की हैं।
शिव के पास योग है, वे योगियों के भी योगेश्वर और योगेश्वरों के भी ईष्ट हैं। योगमाया के माध्यम से ही महामाया का भेदन सम्भव है। योगमाया, शिव गीता के अंतर्गत निहित हैं। स्कन्द ने सर्वप्रथम शिव गीता सनत् कुमार को प्रदान की, सनत् कुमार ने कालान्तर यही शिव गीता सूत जी को प्रदान की परन्तु शिव ने कह दिया कि इसे परम गोपनीय रखना। इसे शिव उन्हीं को प्रदान करते हैं जिनसे उन्हें कार्य लेना होता है, जिन्होंने कि शिव की विशेष कृपा प्राप्त कर ली हो अन्यथा शिव गीता बाजार में उपलब्ध नहीं है, यह गोपनीय है, इसे महादेव ने गोपनीय किया है। महर्षि व्यास ने सोलह पुराण लिखे हैं पता नहीं कितने ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि भगवान व्यास ने रचित किये हैं। व्यास मुनि परेशान थे कि किस प्रकार ग्रंथों का निर्माण करूं, कैसे शिव वाणी को उच्चारित करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस काशी पहुँचे और व्यासेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना की एवं शिव ध्यान में डूब गये। समय बीतता गया एक दिन भगवान विश्वनाथ अन्नपूर्णा सहित आ पहुँचे। व्यास के कण्ठ को छुआ, उनके हाथों को स्पर्श किया और अचानक ज्ञान गंगा फूट पड़ी, शब्द धारायें बनकर बहने लगे। व्यास जी सीधे बद्रीनाथ की हिम गुफाओं में जाकर बैठ गये और एक-एक करके सनातन धर्म के अनेकों ग्रंथ रच डाले।
शिव ने कहा और पार्वती ने सुना, यही आगम विज्ञान है। शिव के मुख से शिव रहस्य केवल पार्वती के कानों को संतुष्ट करने के लिए ही उच्चारित होतें हैं। शिव और पार्वती के मध्य हुए संवाद से ही शिव रहस्य इस ब्रह्माण्ड में आज तक खुले हैं एवं इन दोनों की कृपा से ही व्यास मुनि ने उन दिव्य शिव आवृत्तियों को ग्रहण कर ग्रंथों के रूप में लिपिबद्ध किया जिसे शिव गीता प्राप्त होने वाली होती है उस पर ब्रह्माण्ड की सभी देव शक्तियाँ कुपित हो जाती हैं। जैसे ही साधक शिव गीता प्राप्ति हेतु प्रयत्न करता है देव शक्तियाँ, मनुष्य शक्तियाँ, असुर शक्तियां, यक्ष, किन्नर इत्यादि उसे परेशान करने लगते हैं, इन्द्र थर्रा उठता है क्योंकि शिव गीता मिल गई तो जीव मनुष्य बन जायेगा । पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता और देवता से जैसे ही वह शिव गण की परिधि में आने लगेगा महामाया से सम्बन्धित शक्तियाँ भी उसकी घोर विरोधी हो जाती है क्योंकि यह तो मनुष्य का महापरिवर्तन हो गया। उसने मानव मण्डल, जीव मण्डल, उपदेवता मण्डल, असुर मण्डल, ग्रह मण्डल, सूर्य मण्डल के साथ-साथ महामाया के चक्र का भी भेदन कर डाला।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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कोई जवाब सवाल नहीं, कोई सफाई नहीं, कोई कारण नहीं, कोई क्षोभ नहीं। मिटाना है तो मिटा दूंगा, पुनः निर्मित करना है तो निर्मित कर दूंगा। प्रलय के लिए न शिव किसी से राय लेते हैं, न कारण ढूंढते हैं क्योंकि यह उनका क्षेत्र है और न ही किसी में हिम्मत है उनसे कारण पूछने की क्योंकि वे कारणों के भी कारण हैं उनकी मर्जी चलती है। शैव चिंतन सबसे अलग है, शिव के आगे किसी की नहीं चलती, उनकी क्रियाएं विचारों, कारणों, चिंतन, बुद्धि, मन इत्यादि सबसे परे हैं। मुझे क्षमा करना हे शिव कहीं शिव गीता तो नहीं खोल दी क्योंकि शिव गीता ब्रह्माण्ड का सबसे गोपनीय तंत्र है।
जैसे ही राम चिताग्नि में चढ़ने के लिए उद्धत हुए अगत्स्य मुनि आ पहुँचे बोले आप यह क्या कर रहे हैं? एक स्त्री के लिए विष्णु अवतार को आहूत करने जा रहे हैं, नाना प्रकार से प्रभु श्रीराम को समझाया परन्तु श्रीराम बोले मुनि मेरा शोक कम नहीं हो रहा है, मेरा अशांत चित्त शांत ही नहीं हो रहा तब अगत्स्य ने श्रीराम को उसी क्षण शिव की शरण में जाने के लिए कहा एवं तुरंत उन्हें विरजा दीक्षा दी एवं शिवार्चन की विशेष विधि बता दी। श्रीराम लक्ष्मण सहित व्याघ्र चर्म धारण कर शिवार्चन में लीन हो गये तभी ब्रह्माण्ड मण्डल से तेजोमय ज्योर्तिपुंज का प्रादुर्भाव हुआ। देवाधिदेव महादेव पार्वती सहित वृषभ पर आरूढ़ राम के समीप आ पहुँचे एवं प्रभु श्रीराम को तुरंत अपनी गोद में उठाया और तेजोमय रथ पर सवार हो अंतरिक्ष में अंतरध्यान हो गये, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को रथ पर बिठाकर श्रीमद्गीता का संदेश दिया था उसी प्रकार शिव ने स्वयं प्रभु श्रीराम को शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात शिव ने अपने मुख से विष्णु के सामने आज शिव रहस्य खोले एवं शिव के विराट स्वरूप का दर्शन कराया, तत्व का बोध कराया । प्रभु श्रीराम के महामाया से ग्रसित मस्तिष्क को योग माया से काटकर शिव वैभव के दर्शन कराये, परम सत्य से परिचित करवाया उन्हें पाशुपतास्त्र, अघोरास्त्र, कालिकास्त्र, चण्डिकास्त्र, ब्रह्मास्त्र इत्यादि प्रदान कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अजेय योद्धा बनाया महामाया अलग हैं, योगमाया अलग है। शिव ने योग माया, महामाया से अलग की हैं।
शिव के पास योग है, वे योगियों के भी योगेश्वर और योगेश्वरों के भी ईष्ट हैं। योगमाया के माध्यम से ही महामाया का भेदन सम्भव है। योगमाया, शिव गीता के अंतर्गत निहित हैं। स्कन्द ने सर्वप्रथम शिव गीता सनत् कुमार को प्रदान की, सनत् कुमार ने कालान्तर यही शिव गीता सूत जी को प्रदान की परन्तु शिव ने कह दिया कि इसे परम गोपनीय रखना। इसे शिव उन्हीं को प्रदान करते हैं जिनसे उन्हें कार्य लेना होता है, जिन्होंने कि शिव की विशेष कृपा प्राप्त कर ली हो अन्यथा शिव गीता बाजार में उपलब्ध नहीं है, यह गोपनीय है, इसे महादेव ने गोपनीय किया है। महर्षि व्यास ने सोलह पुराण लिखे हैं पता नहीं कितने ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि भगवान व्यास ने रचित किये हैं। व्यास मुनि परेशान थे कि किस प्रकार ग्रंथों का निर्माण करूं, कैसे शिव वाणी को उच्चारित करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस काशी पहुँचे और व्यासेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना की एवं शिव ध्यान में डूब गये। समय बीतता गया एक दिन भगवान विश्वनाथ अन्नपूर्णा सहित आ पहुँचे। व्यास के कण्ठ को छुआ, उनके हाथों को स्पर्श किया और अचानक ज्ञान गंगा फूट पड़ी, शब्द धारायें बनकर बहने लगे। व्यास जी सीधे बद्रीनाथ की हिम गुफाओं में जाकर बैठ गये और एक-एक करके सनातन धर्म के अनेकों ग्रंथ रच डाले।
शिव ने कहा और पार्वती ने सुना, यही आगम विज्ञान है। शिव के मुख से शिव रहस्य केवल पार्वती के कानों को संतुष्ट करने के लिए ही उच्चारित होतें हैं। शिव और पार्वती के मध्य हुए संवाद से ही शिव रहस्य इस ब्रह्माण्ड में आज तक खुले हैं एवं इन दोनों की कृपा से ही व्यास मुनि ने उन दिव्य शिव आवृत्तियों को ग्रहण कर ग्रंथों के रूप में लिपिबद्ध किया जिसे शिव गीता प्राप्त होने वाली होती है उस पर ब्रह्माण्ड की सभी देव शक्तियाँ कुपित हो जाती हैं। जैसे ही साधक शिव गीता प्राप्ति हेतु प्रयत्न करता है देव शक्तियाँ, मनुष्य शक्तियाँ, असुर शक्तियां, यक्ष, किन्नर इत्यादि उसे परेशान करने लगते हैं, इन्द्र थर्रा उठता है क्योंकि शिव गीता मिल गई तो जीव मनुष्य बन जायेगा । पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता और देवता से जैसे ही वह शिव गण की परिधि में आने लगेगा महामाया से सम्बन्धित शक्तियाँ भी उसकी घोर विरोधी हो जाती है क्योंकि यह तो मनुष्य का महापरिवर्तन हो गया। उसने मानव मण्डल, जीव मण्डल, उपदेवता मण्डल, असुर मण्डल, ग्रह मण्डल, सूर्य मण्डल के साथ-साथ महामाया के चक्र का भी भेदन कर डाला।
(क्रमशः)
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शिव रहस्यम् (३)
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कौन भेदन होने देगा अपना ? कौन अपना अस्तित्व खोना चाहेगा? कौन किसको उठते देखना चाहता है ? कोई नहीं। कौन अपने भेद खोलना चाहता है ? कौन अपने आवरण इस ब्रह्माण्ड में हटने देना चाहता है ? कौन अपने गुलाम को मालिक बनने देना चाहता है ? कल तक जो तुम्हारे दरवाजे । पर नतमस्तक हो रहा था, तुम्हें प्रणाम कर रहा था, तुम्हारी आज्ञा का पालन कर रहा था, तुम्हारे सामने सिर झुकाये खड़ा था, तुम्हारे भय से थर्रा रहा था, तुम्हारे कोप को नहीं झेलना चाह रहा था आज उसी के सामने तुम थर्रा रहे हो, तुम्हारा मस्तक झुका हुआ है, तुम उसे सम्मान दे रहे हो। इस तरह की विपरीत स्थिति भला इन्द्र देखना चाहेंगे? क्या मनुष्य देखना चाहेगा? आपके मित्र देखना चाहेंगे? क्या देवी शक्तियाँ देखना चाहेंगी? भूत-प्रेत और यक्ष या ऋषि मुनि इत्यादि किसी के भी हृदय इतने विशाल नहीं हैं, देवताओं के भी हृदय इतने विशाल नहीं रहे अतः यही कारण है कि योगियों का तो विरोध होता ही है, उनके पीछे तो लोग पड़े ही रहते हैं, मेरा भी व्यक्तिगत यही तर्जुबा है। लोग पचा नहीं पा रहे हैं मुझे। कल तक जो साथ थे वे ही विरोध करते हैं। बस इशारा ही काफी है इसीलिए शिव गीता इस ब्रह्माण्ड की सब से परम गोपनीय ग्रंथ है जिसे मिल गया, जिस पर शिव कृपा हो गई हो गई। कोई नियम नहीं, महादेव नियमों से परे हैं, महादेव का अर्चन भी नियमों से परे है।
एक चोर था, चोरी उसका कर्म था। उसने देखा कि शिवलिङ्ग के ऊपर एक धातु का घण्टा बंधा हुआ है वह तुरंत ही शिवलिङ्ग के ऊपर खड़ा हो गया और घण्टा चुराने लगा बस महादेव जागृत हो उठे, साक्षात् उसके सामने प्रकट हो गये। महादेव बोले लोग मेरे ऊपर कुछ धन चढ़ाते हैं, कुछ जल अर्पित करते हैं, कुछ फल फूल वा पत्ती इत्यादि चढ़ाते हैं पर तूने तो अपना सर्वस्व ही मुझे न्योछावर कर दिया, स्वयं को मुझे अर्पित कर दिया अतः मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हुआ, तुझे शिव लोक में स्थानं देता हूँ। अब कौन सा नियम ? शिव पूजा में, यही तो शिव की गोपनीयता है। शिकारी राजा का पुत्र तिण्ण अपने मित्रों के साथ शिकार करने निर्जन वन में गया, एक सुअर का शिकार किया तभी जोरों की प्यास लगी। उसके मित्रों ने कहा थोड़ी दूरी पर एक जलाशय है वही चलते हैं। तिण्ण ने जलाशय पर जाकर प्यास बुझाई और ऊपर पहाड़ी पर जाकर देखता है कि एक शिव मंदिर बना हुआ है। उसके मित्रों ने कहा इस निर्जन स्थान पर बस एक ब्राह्मण पता नहीं कैसे उल्टे सीधे शब्द बोलता हुआ शिव की रोज पत्तों, ठण्डे जल और फूल इत्यादि से पूजा अचना करता है।
तिण्ण के पाँव अपने आप मंदिर की ओर खिंचने लगे। वह जैसे ही मंदिर में पहुँचा उसका प्रेम महादेव पर उमड़ आया, वह वशीभूत हो गया एवं बोला हाय इतने सुन्दर देवता और उनके ऊपर कोई मूर्ख जल डालता है, पत्तों से ढकता है, इन्हें भोजन भी नहीं कराता । वह लिपट गया शिव से, उसका मन रम गया शिव में तुरंत जंगली सुअर का मांस पकाया, मुख में पानी भरा, बालों में कुछ जंगली पुष्प खोंसे और चल पड़ा शिव की सेवा हेतु । पहले मांस को चखकर देखा फिर भोग लगाने के लिए उसे पत्तल में लेकर चला। उसने मूर्ती पर लगे पत्ते और फूलों को साफ किया, शिव को मांस परोसा, मुख का जल शिव पर अर्पित कर दिया। अघोरेश्वर जाग उठे, प्रसन्न हो गये। भोले नाथ भोली भक्ति के आश्रित हो गये, रात भर तिष्ण धनुष बाण लिए देवता की रक्षा करता रहा कि कोई जंगली जानवर आकर उसके शिव का अहित न कर दे। सुबह ब्राह्मण आया, उसने देखा कि मंदिर में मांस है वह कुपित हो गया, सरोवर में ढेर सारा जल लाकर शुद्धिकरण किया, यज्ञ किया, वेद मंत्रों का उच्चारण किया। तिण्ण फिर संध्या के समय शिकार किए गये पशुओं का मांस लेकर आया, पुनः मुख में जल भर लाया और अपनी ही विधि से शिवार्चन किया। ब्राह्मण दूसरे दिन फिर वही दृश्य देख आशंकित हो उठा तभी रात्रि में महादेव ने उसे स्वप्न दिया और कहा सुनो ब्राह्मण वह मेरा निर्मल, कोमल और भोला भक्त है, वह मुझे प्रिय है। क्यों प्रिय है ? यह तुम्हारा विषय नहीं है। उसका पूजन मुझे स्वीकार्य है अतः उसे परेशान मत करना, यह मेरा आदेश है। मेरी उपासना कैसे होगी ? यह मैं निश्चित करूंगा, पुजारी या ब्राह्मण नहीं करेगा। सारा जगत मेरे अधीन है, मैं किसी के अधीन नहीं हूँ।
( क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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कौन भेदन होने देगा अपना ? कौन अपना अस्तित्व खोना चाहेगा? कौन किसको उठते देखना चाहता है ? कोई नहीं। कौन अपने भेद खोलना चाहता है ? कौन अपने आवरण इस ब्रह्माण्ड में हटने देना चाहता है ? कौन अपने गुलाम को मालिक बनने देना चाहता है ? कल तक जो तुम्हारे दरवाजे । पर नतमस्तक हो रहा था, तुम्हें प्रणाम कर रहा था, तुम्हारी आज्ञा का पालन कर रहा था, तुम्हारे सामने सिर झुकाये खड़ा था, तुम्हारे भय से थर्रा रहा था, तुम्हारे कोप को नहीं झेलना चाह रहा था आज उसी के सामने तुम थर्रा रहे हो, तुम्हारा मस्तक झुका हुआ है, तुम उसे सम्मान दे रहे हो। इस तरह की विपरीत स्थिति भला इन्द्र देखना चाहेंगे? क्या मनुष्य देखना चाहेगा? आपके मित्र देखना चाहेंगे? क्या देवी शक्तियाँ देखना चाहेंगी? भूत-प्रेत और यक्ष या ऋषि मुनि इत्यादि किसी के भी हृदय इतने विशाल नहीं हैं, देवताओं के भी हृदय इतने विशाल नहीं रहे अतः यही कारण है कि योगियों का तो विरोध होता ही है, उनके पीछे तो लोग पड़े ही रहते हैं, मेरा भी व्यक्तिगत यही तर्जुबा है। लोग पचा नहीं पा रहे हैं मुझे। कल तक जो साथ थे वे ही विरोध करते हैं। बस इशारा ही काफी है इसीलिए शिव गीता इस ब्रह्माण्ड की सब से परम गोपनीय ग्रंथ है जिसे मिल गया, जिस पर शिव कृपा हो गई हो गई। कोई नियम नहीं, महादेव नियमों से परे हैं, महादेव का अर्चन भी नियमों से परे है।
एक चोर था, चोरी उसका कर्म था। उसने देखा कि शिवलिङ्ग के ऊपर एक धातु का घण्टा बंधा हुआ है वह तुरंत ही शिवलिङ्ग के ऊपर खड़ा हो गया और घण्टा चुराने लगा बस महादेव जागृत हो उठे, साक्षात् उसके सामने प्रकट हो गये। महादेव बोले लोग मेरे ऊपर कुछ धन चढ़ाते हैं, कुछ जल अर्पित करते हैं, कुछ फल फूल वा पत्ती इत्यादि चढ़ाते हैं पर तूने तो अपना सर्वस्व ही मुझे न्योछावर कर दिया, स्वयं को मुझे अर्पित कर दिया अतः मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हुआ, तुझे शिव लोक में स्थानं देता हूँ। अब कौन सा नियम ? शिव पूजा में, यही तो शिव की गोपनीयता है। शिकारी राजा का पुत्र तिण्ण अपने मित्रों के साथ शिकार करने निर्जन वन में गया, एक सुअर का शिकार किया तभी जोरों की प्यास लगी। उसके मित्रों ने कहा थोड़ी दूरी पर एक जलाशय है वही चलते हैं। तिण्ण ने जलाशय पर जाकर प्यास बुझाई और ऊपर पहाड़ी पर जाकर देखता है कि एक शिव मंदिर बना हुआ है। उसके मित्रों ने कहा इस निर्जन स्थान पर बस एक ब्राह्मण पता नहीं कैसे उल्टे सीधे शब्द बोलता हुआ शिव की रोज पत्तों, ठण्डे जल और फूल इत्यादि से पूजा अचना करता है।
तिण्ण के पाँव अपने आप मंदिर की ओर खिंचने लगे। वह जैसे ही मंदिर में पहुँचा उसका प्रेम महादेव पर उमड़ आया, वह वशीभूत हो गया एवं बोला हाय इतने सुन्दर देवता और उनके ऊपर कोई मूर्ख जल डालता है, पत्तों से ढकता है, इन्हें भोजन भी नहीं कराता । वह लिपट गया शिव से, उसका मन रम गया शिव में तुरंत जंगली सुअर का मांस पकाया, मुख में पानी भरा, बालों में कुछ जंगली पुष्प खोंसे और चल पड़ा शिव की सेवा हेतु । पहले मांस को चखकर देखा फिर भोग लगाने के लिए उसे पत्तल में लेकर चला। उसने मूर्ती पर लगे पत्ते और फूलों को साफ किया, शिव को मांस परोसा, मुख का जल शिव पर अर्पित कर दिया। अघोरेश्वर जाग उठे, प्रसन्न हो गये। भोले नाथ भोली भक्ति के आश्रित हो गये, रात भर तिष्ण धनुष बाण लिए देवता की रक्षा करता रहा कि कोई जंगली जानवर आकर उसके शिव का अहित न कर दे। सुबह ब्राह्मण आया, उसने देखा कि मंदिर में मांस है वह कुपित हो गया, सरोवर में ढेर सारा जल लाकर शुद्धिकरण किया, यज्ञ किया, वेद मंत्रों का उच्चारण किया। तिण्ण फिर संध्या के समय शिकार किए गये पशुओं का मांस लेकर आया, पुनः मुख में जल भर लाया और अपनी ही विधि से शिवार्चन किया। ब्राह्मण दूसरे दिन फिर वही दृश्य देख आशंकित हो उठा तभी रात्रि में महादेव ने उसे स्वप्न दिया और कहा सुनो ब्राह्मण वह मेरा निर्मल, कोमल और भोला भक्त है, वह मुझे प्रिय है। क्यों प्रिय है ? यह तुम्हारा विषय नहीं है। उसका पूजन मुझे स्वीकार्य है अतः उसे परेशान मत करना, यह मेरा आदेश है। मेरी उपासना कैसे होगी ? यह मैं निश्चित करूंगा, पुजारी या ब्राह्मण नहीं करेगा। सारा जगत मेरे अधीन है, मैं किसी के अधीन नहीं हूँ।
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शिव रहस्यम् (४)
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ब्राह्मण घबरा कर उठ गया एवं मूर्ति के पीछे छिपकर तिण्ण की प्रतिक्षा करने लगा। तभी तिण्ण हाथ में मांस लिए हुए आ पहुँचा, वह देखता है कि भगवान की एक आँख से रक्त की धारा बह रही है। उसने सोचा शायद मैं अपनी आँख से रक्त की धारा निकाल दूं तो भगवान की आँख ठीक हो जायेगी। उसने अपने आँख में तीर चुभोकर रक्त की धारा निकाल दी उसी क्षण भगवान की आँख से रक्त की धारा रूक गई परन्तु दूसरे क्षण दूसरी आँख से रक्त निकलने लगा। तिष्ण वनोषधियाँ ले आया, भगवान की आँखों पर लगाने लगा परन्तु रक्त की धारा नहीं रूकी, उसने सोचा क्यों न मैं अपनी आँख निकालकर भगवान को लगा दूं । एक आँख तो फूट ही गई थी अत: पाँव से उसने भगवान की दूसरी आँख पर लात रखी कि कहीं मैं गलत जगह अपनी आँख न लगा दूं। जैसे ही अपनी आँख निकालने को वह उद्धत हुआ, शिव प्रकट हो गये एवं बोले रुक जाओ कण्णप्य! मेरे कण्णप्य ! ठहर जाओ। (कण = आँख, अप्य- वत्स,कण्णय कण+अप ।) मैं तुम्हारी भक्ति पर प्रसन्न हुआ। ब्राह्मण देखता ही रहा शिव ने पुनः कण्णप्य को दृष्टिवान बना दिया, दिव्य दृष्टि से सुशोभित कर दिया, उसे शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात जहाँ तक दृष्टि भी भेदन न कर सके उसके आगे का महाभेदन भी शिव ने कण्णप्य को सिखा दिया अतः शिव पूजन का कोई नियम नहीं है कोई धर्म नहीं है कोई विधान नहीं हैं ।
तीन बार महादेव बोलोतो सीधे शिव दौड़े चले आते हैं जैसे कि रम्भाते बछड़े को देख गाय सब कुछ छोड़कर भागी चली आती है । तीन बार शिव - शिव बोलो तो महादेव एक बार में ही कार्य कर देते हैं और दो बार का शिव उच्चारण कर्ज के रूप में ओढ़ लेते हैं अर्थात कर्जवान बन जाते हैं, स्वयं को बाधित कर लेते हैं, स्वयं दो बार ऋण उतारने की जुबान दे बैठते हैं। यह है शिव का चिंतन, सभी चिंतनों से परे । लोग शिव ने ऋण का निर्माण तो लोक कल्याण के लिए किया है। ऋण का भार ही तो उपकार का मार्ग है, ऋण का भुगतान ही तो भारहीन होने का विधान है। ऋणी होने में अपना एक अलग मजा है। शिव स्वयं ऋण ओढ़ते हैं, जितने बार शिव- शिव बोलोगे उतने वार शिव ऋण ओढ़ लेंगे और बार-बार जीव के पास आकर उसका कष्ट निवारण करते रहेंगे, उसे कुछ न कुछ देकर कर्ज से मुक्त होने की चेष्टा करते रहेगें। वह भक्त के पास आने के लिए ऋणी बनते है, यह उनका दृष्टिकोण है। कभी वह विष्णु के चरणों में लेट जाता है,कभी वह ब्रह्मा को प्रणाम कर उठते है, कभी वह स्वयं अपने हाथों से विष्णु का अभिषेक करने लगते है, कभी वह हिमालय छोड़ कृष्ण की रासलीला, की तरफ भागने लगते है और वह भी रोते हुए, रूदन करते हुए कृष्ण के समीप जाना चाहते है क्योंकि वह अवधूत है, क्योंकि वह माया से ऊपर है, क्योंकि वह महामाया के अधीन नहीं है । अतः वह शाश्वत् है, निष्कलंक है, निद्वंद है, उसमें द्वंद नहीं है, वह निश्चल है, यही उसका परम वैभव है, यही उसकी रुद्रता है, यही उसकी महानता है।
पुष्पदंत ने कहा समुद्र के जल में अगर हिमालय पर्वतों की अनेकों श्रृंखलाओं जितने काजल को घोलकर स्याही बनाई जाये एवं कल्प वृक्ष की कलम से स्वयं मां सरस्वती शिव की महिमा को इस पृथ्वी के ऊपर लिखे तो भी शिव की महिमा वर्णित नहीं की जा सकती तो भला पुष्पदंत में इतनी ताकत कहाँ कि वह शिव महिम्न स्तोत्र लिखे फिर भी इस भव सागर से संतृप्त यह शिव भक्त मुक्ति हेतु शिव महिम्न कह रहा है और जैसे ही रोते हुए पुष्पदंत ने इतना कहा ही था कि शिव कारागृह के समस्त द्वारों का भेदन करते हुए पुष्पदंत के समीप आ खड़े हुए। रूंदन तो होगा ही, रूंदन तो शिव प्रदान करते ही हैं क्योंकि क्षय होने की प्रवृत्ति को केवल तरलता रोक सकती है और रूदन जीव को तरल बनाता है, रूदन जीव के अंदर तरलता का निर्माण करता है। देखो ब्रह्माण्ड कितना तरल है पता नहीं कहाँ तक फैला हुआ है। कितना वेग है उसके पास, कितनी विराटता है उसके पास, देखो वायु कितनी तरल है, कहीं भी फैल जाती है, छोटे-से-छोटे छिद्र में से भी निकल जाती है। नदियों में कितनी तरलता है तभी तो वह वेगवान हो समुद्र की तरफ भागती रहती हैं। तरलता ही वेग का निर्माण करती है क्योंकि तरलता तभी आती है जब बंधन मुक्ति होती है।
( क्रमशः)
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ब्राह्मण घबरा कर उठ गया एवं मूर्ति के पीछे छिपकर तिण्ण की प्रतिक्षा करने लगा। तभी तिण्ण हाथ में मांस लिए हुए आ पहुँचा, वह देखता है कि भगवान की एक आँख से रक्त की धारा बह रही है। उसने सोचा शायद मैं अपनी आँख से रक्त की धारा निकाल दूं तो भगवान की आँख ठीक हो जायेगी। उसने अपने आँख में तीर चुभोकर रक्त की धारा निकाल दी उसी क्षण भगवान की आँख से रक्त की धारा रूक गई परन्तु दूसरे क्षण दूसरी आँख से रक्त निकलने लगा। तिष्ण वनोषधियाँ ले आया, भगवान की आँखों पर लगाने लगा परन्तु रक्त की धारा नहीं रूकी, उसने सोचा क्यों न मैं अपनी आँख निकालकर भगवान को लगा दूं । एक आँख तो फूट ही गई थी अत: पाँव से उसने भगवान की दूसरी आँख पर लात रखी कि कहीं मैं गलत जगह अपनी आँख न लगा दूं। जैसे ही अपनी आँख निकालने को वह उद्धत हुआ, शिव प्रकट हो गये एवं बोले रुक जाओ कण्णप्य! मेरे कण्णप्य ! ठहर जाओ। (कण = आँख, अप्य- वत्स,कण्णय कण+अप ।) मैं तुम्हारी भक्ति पर प्रसन्न हुआ। ब्राह्मण देखता ही रहा शिव ने पुनः कण्णप्य को दृष्टिवान बना दिया, दिव्य दृष्टि से सुशोभित कर दिया, उसे शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात जहाँ तक दृष्टि भी भेदन न कर सके उसके आगे का महाभेदन भी शिव ने कण्णप्य को सिखा दिया अतः शिव पूजन का कोई नियम नहीं है कोई धर्म नहीं है कोई विधान नहीं हैं ।
तीन बार महादेव बोलोतो सीधे शिव दौड़े चले आते हैं जैसे कि रम्भाते बछड़े को देख गाय सब कुछ छोड़कर भागी चली आती है । तीन बार शिव - शिव बोलो तो महादेव एक बार में ही कार्य कर देते हैं और दो बार का शिव उच्चारण कर्ज के रूप में ओढ़ लेते हैं अर्थात कर्जवान बन जाते हैं, स्वयं को बाधित कर लेते हैं, स्वयं दो बार ऋण उतारने की जुबान दे बैठते हैं। यह है शिव का चिंतन, सभी चिंतनों से परे । लोग शिव ने ऋण का निर्माण तो लोक कल्याण के लिए किया है। ऋण का भार ही तो उपकार का मार्ग है, ऋण का भुगतान ही तो भारहीन होने का विधान है। ऋणी होने में अपना एक अलग मजा है। शिव स्वयं ऋण ओढ़ते हैं, जितने बार शिव- शिव बोलोगे उतने वार शिव ऋण ओढ़ लेंगे और बार-बार जीव के पास आकर उसका कष्ट निवारण करते रहेंगे, उसे कुछ न कुछ देकर कर्ज से मुक्त होने की चेष्टा करते रहेगें। वह भक्त के पास आने के लिए ऋणी बनते है, यह उनका दृष्टिकोण है। कभी वह विष्णु के चरणों में लेट जाता है,कभी वह ब्रह्मा को प्रणाम कर उठते है, कभी वह स्वयं अपने हाथों से विष्णु का अभिषेक करने लगते है, कभी वह हिमालय छोड़ कृष्ण की रासलीला, की तरफ भागने लगते है और वह भी रोते हुए, रूदन करते हुए कृष्ण के समीप जाना चाहते है क्योंकि वह अवधूत है, क्योंकि वह माया से ऊपर है, क्योंकि वह महामाया के अधीन नहीं है । अतः वह शाश्वत् है, निष्कलंक है, निद्वंद है, उसमें द्वंद नहीं है, वह निश्चल है, यही उसका परम वैभव है, यही उसकी रुद्रता है, यही उसकी महानता है।
पुष्पदंत ने कहा समुद्र के जल में अगर हिमालय पर्वतों की अनेकों श्रृंखलाओं जितने काजल को घोलकर स्याही बनाई जाये एवं कल्प वृक्ष की कलम से स्वयं मां सरस्वती शिव की महिमा को इस पृथ्वी के ऊपर लिखे तो भी शिव की महिमा वर्णित नहीं की जा सकती तो भला पुष्पदंत में इतनी ताकत कहाँ कि वह शिव महिम्न स्तोत्र लिखे फिर भी इस भव सागर से संतृप्त यह शिव भक्त मुक्ति हेतु शिव महिम्न कह रहा है और जैसे ही रोते हुए पुष्पदंत ने इतना कहा ही था कि शिव कारागृह के समस्त द्वारों का भेदन करते हुए पुष्पदंत के समीप आ खड़े हुए। रूंदन तो होगा ही, रूंदन तो शिव प्रदान करते ही हैं क्योंकि क्षय होने की प्रवृत्ति को केवल तरलता रोक सकती है और रूदन जीव को तरल बनाता है, रूदन जीव के अंदर तरलता का निर्माण करता है। देखो ब्रह्माण्ड कितना तरल है पता नहीं कहाँ तक फैला हुआ है। कितना वेग है उसके पास, कितनी विराटता है उसके पास, देखो वायु कितनी तरल है, कहीं भी फैल जाती है, छोटे-से-छोटे छिद्र में से भी निकल जाती है। नदियों में कितनी तरलता है तभी तो वह वेगवान हो समुद्र की तरफ भागती रहती हैं। तरलता ही वेग का निर्माण करती है क्योंकि तरलता तभी आती है जब बंधन मुक्ति होती है।
( क्रमशः)
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शिव रहस्यम् (५)
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सरसों का बीज तो कुछ समय में नष्ट हो जायेगा, उसका क्षय निश्चित है अतः समय रहते उसके अंदर से तरलता निकाल लो, तेल तो कई हजार वर्षों तक नष्ट नहीं होगा क्योंकि वह तरल है, शिव रुद्र भी हैं। रुद्रता से ही तरलता का जन्म होता है एवं तरलता के अंदर रुद्रता की ही शक्ति निहित है। बीज को पीसोगे तो रूदन तो होगा ही परन्तु तभी तरलता भी उत्पन्न होगी और तरल को जब गर्म करोगे अर्थात पुनः रुद्रता प्रदान करोगे तो वायु निर्मित होगी ही और परम तरलता वायु के रूप में अस्तित्व में आयेगी ही। यही सृष्टि का नियम हैं, रुद्र सूर्य की पकड़ से निकल भागने के लिए रोती चिल्लती, विकट अट्ठाहस करती हुई रुद्र किरणें कुछ ही क्षणों में समस्त ब्रह्माण्ड में आच्छादित हो जाती हैं एवं समस्त ब्रह्माण्ड प्रकाशमय हो जाता है अगर उनमें रूदन नहीं होगा, अगर वे रुद्रता से परिचित नहीं होगीं, अगर वे शिव की रुद्रता से संस्पर्शित नहीं होंगी तो यात्रा रुक जायेगी, सृष्टि रुक जायेगी।
मैंने कहा शिव मुक्त करता है, मुक्त करना ही शिव की पहचान है, वह प्रकाशत्व है क्योंकि सर्वप्रथम उसकी रुद्रता प्रकाश को भी मुक्त होना सिखाती है। सूर्य के गुरुत्व से सूर्य की पकड़ से आखिकार प्रकाश की किरणें निकल ही भागती हैं, यही सूर्य के जन्म की कहानी है, यही सबके पहचान की कहानी है, यही सृष्टि के उदय की कहानी है। रुद्र स्त्री पुरुष काम के वेग में आवेशित हो सम्भोग की पराकाष्ठा तक पहुँच जाते हैं, वीर्य स्खलित होता है रुद्रता के कारण, पुरुष के एक अंश वीर्य में 55 लाख रुद्र शुक्र कीट होते हैं जो कि पूर्ण प्रतिस्पर्धा, रुद्रता और रूदन के साथ स्त्री के डिम्ब कोश से उत्सर्जित मात्र एक अण्ड से मिलन के लिए भागते हैं सम्पूर्ण रुद्रता एवं वेग के साथ जैसे कि सौर किरणें सूर्य को छोड़कर भागती है। 55 लाख शुक्र कीट और एक अण्ड कितनी घोर, कितनी रुद्र प्रतिस्पर्धा, कितनी भीषण मारकाट, कितना उग्र भाव । लाखों शुक्र कीट आपस में लड़- कटकर मर जाते हैं, कुछ रास्ते में ही न्यून उग्रता के कारण नष्ट हो जाते हैं, कुछ अयोग्य होते हैं, कुछ बीमार होते हैं, कुछ लूले लंगड़े होते हैं, कुछ अर्ध विकसित होते हैं परन्तु इन 55 लाख शुक्र कीटों में से जो सबसे ज्यादा स्वस्थ, सबसे ज्यादा बलवान, सबसे ज्यादा रुद्र होता है वह अण्ड का भेदन करता है और इस प्रकार एक नये जीवन की गर्भ में स्थापना होती है।
कुम्भ का मेला लगा था मैं देख रहा था लाखों करोड़ों नर मुण्ड खड़े थे, कुछ गृहस्थ थे, कुछ बूढ़े थे, कुछ बालक थे, कुछ संन्यासी थे परन्तु सबसे आगे खड़े थे पूर्ण नग्न, पूर्ण स्वस्थ (शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक धरातल पर), पूर्ण रुद्र, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए नागा संन्यासी एवं जैसे ही शाही स्नान का क्षण आया सबसे पहले तेज वेग से हर हर महादेव चिल्लाते हुए ये नागा संन्यासी कूद पड़े सबको पीछे छोड़ते हुए शिव के मस्तक से उद्गमित हो बहने वाली गंगा की जल धाराओं में। शाही स्नान ही पहले होता है। कुम्भ भी शिव क्षेत्र में ही लगते हैं, सब जगह एक जैसा ही होता है चाहे वह कुम्भ स्नान हो, माता का गर्भ हो या सूर्य मण्डल। रुद्रता ही पहले चलती है, यही सृष्टि का नियम है, यही शिव क्षेत्र की विहंगमता है। रोना बुरी बात नहीं है, गुरु रूलाते भी हैं जो गुरु शिव स्वरूप होते हैं वे तो रूलाते ही हैं । वे तो रूदन अंदर उत्पन्न कर ही देते हैं। रूदन से ही तम का नाश होता है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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सरसों का बीज तो कुछ समय में नष्ट हो जायेगा, उसका क्षय निश्चित है अतः समय रहते उसके अंदर से तरलता निकाल लो, तेल तो कई हजार वर्षों तक नष्ट नहीं होगा क्योंकि वह तरल है, शिव रुद्र भी हैं। रुद्रता से ही तरलता का जन्म होता है एवं तरलता के अंदर रुद्रता की ही शक्ति निहित है। बीज को पीसोगे तो रूदन तो होगा ही परन्तु तभी तरलता भी उत्पन्न होगी और तरल को जब गर्म करोगे अर्थात पुनः रुद्रता प्रदान करोगे तो वायु निर्मित होगी ही और परम तरलता वायु के रूप में अस्तित्व में आयेगी ही। यही सृष्टि का नियम हैं, रुद्र सूर्य की पकड़ से निकल भागने के लिए रोती चिल्लती, विकट अट्ठाहस करती हुई रुद्र किरणें कुछ ही क्षणों में समस्त ब्रह्माण्ड में आच्छादित हो जाती हैं एवं समस्त ब्रह्माण्ड प्रकाशमय हो जाता है अगर उनमें रूदन नहीं होगा, अगर वे रुद्रता से परिचित नहीं होगीं, अगर वे शिव की रुद्रता से संस्पर्शित नहीं होंगी तो यात्रा रुक जायेगी, सृष्टि रुक जायेगी।
मैंने कहा शिव मुक्त करता है, मुक्त करना ही शिव की पहचान है, वह प्रकाशत्व है क्योंकि सर्वप्रथम उसकी रुद्रता प्रकाश को भी मुक्त होना सिखाती है। सूर्य के गुरुत्व से सूर्य की पकड़ से आखिकार प्रकाश की किरणें निकल ही भागती हैं, यही सूर्य के जन्म की कहानी है, यही सबके पहचान की कहानी है, यही सृष्टि के उदय की कहानी है। रुद्र स्त्री पुरुष काम के वेग में आवेशित हो सम्भोग की पराकाष्ठा तक पहुँच जाते हैं, वीर्य स्खलित होता है रुद्रता के कारण, पुरुष के एक अंश वीर्य में 55 लाख रुद्र शुक्र कीट होते हैं जो कि पूर्ण प्रतिस्पर्धा, रुद्रता और रूदन के साथ स्त्री के डिम्ब कोश से उत्सर्जित मात्र एक अण्ड से मिलन के लिए भागते हैं सम्पूर्ण रुद्रता एवं वेग के साथ जैसे कि सौर किरणें सूर्य को छोड़कर भागती है। 55 लाख शुक्र कीट और एक अण्ड कितनी घोर, कितनी रुद्र प्रतिस्पर्धा, कितनी भीषण मारकाट, कितना उग्र भाव । लाखों शुक्र कीट आपस में लड़- कटकर मर जाते हैं, कुछ रास्ते में ही न्यून उग्रता के कारण नष्ट हो जाते हैं, कुछ अयोग्य होते हैं, कुछ बीमार होते हैं, कुछ लूले लंगड़े होते हैं, कुछ अर्ध विकसित होते हैं परन्तु इन 55 लाख शुक्र कीटों में से जो सबसे ज्यादा स्वस्थ, सबसे ज्यादा बलवान, सबसे ज्यादा रुद्र होता है वह अण्ड का भेदन करता है और इस प्रकार एक नये जीवन की गर्भ में स्थापना होती है।
कुम्भ का मेला लगा था मैं देख रहा था लाखों करोड़ों नर मुण्ड खड़े थे, कुछ गृहस्थ थे, कुछ बूढ़े थे, कुछ बालक थे, कुछ संन्यासी थे परन्तु सबसे आगे खड़े थे पूर्ण नग्न, पूर्ण स्वस्थ (शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक धरातल पर), पूर्ण रुद्र, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए नागा संन्यासी एवं जैसे ही शाही स्नान का क्षण आया सबसे पहले तेज वेग से हर हर महादेव चिल्लाते हुए ये नागा संन्यासी कूद पड़े सबको पीछे छोड़ते हुए शिव के मस्तक से उद्गमित हो बहने वाली गंगा की जल धाराओं में। शाही स्नान ही पहले होता है। कुम्भ भी शिव क्षेत्र में ही लगते हैं, सब जगह एक जैसा ही होता है चाहे वह कुम्भ स्नान हो, माता का गर्भ हो या सूर्य मण्डल। रुद्रता ही पहले चलती है, यही सृष्टि का नियम है, यही शिव क्षेत्र की विहंगमता है। रोना बुरी बात नहीं है, गुरु रूलाते भी हैं जो गुरु शिव स्वरूप होते हैं वे तो रूलाते ही हैं । वे तो रूदन अंदर उत्पन्न कर ही देते हैं। रूदन से ही तम का नाश होता है।
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