सनातन धर्म • Sanatan Dharma
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आप अपनी दुनिया के स्वयं निर्माता है

सृष्टि का हर प्राणी आज के वर्तमान स्वरूप में अपूर्ण है। अपूर्ण का अर्थ है- सदोष। बेशक सब मिलाकर दोष से गुण ज्यादा हैं। अधर्म बेशक मौजूद है, पर उससे धर्म ज्यादा है, अंधेरा बहुत ज्यादा है, पर उससे प्रकाश ज्यादा है। दुनियाँ वाले बहुत खराब हैं, पर उसमें खराबी से कहीं ज्यादा अच्छाई मौजूद है। हमें उस अच्छाई पर ही अपनी दृष्टि रखनी चाहिए, अच्छाई से ही आनन्द लेना चाहिए और अच्छाई को ही आगे बढ़ाना चाहिए। दिन में हम जगते हैं, प्रकाश में काम करते हैं, उजाले में रहना पसंद करते हैं। जब रात का अंधेरा सामने आता है, तो आँखें बंद करके सो जाते हैं, जिन्हें रात में भी काम करना है, वे दीपक जला लेते हैं। हमारी यह उजाले में काम करने, अंधेरे में सो जाने की प्रवृत्ति यह सिखाती है कि संसार के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत । रात की तरह आँख बंद कर लीजिए । महर्षि दत्तात्रेय की कथा जानने वालों को विदित होगा कि जब तक वे दुनियाँ के काले और सफेद दोनों पहलुओं का समन्वय करते रहे, तब तक बड़े चिंतित और दुःखी रहे। जब उन्होंने कालेपन से दृष्टि हटा ली और सफेदी पर ध्यान दिया, तो उन्हें सभी जीव आनंदनीय, उपदेश देने वाले और पवित्र दिखाई पड़े। उन्होंने चौबीस गुरु बनाए, जिनमें कुत्ता, बिल्ली, सियार, मकड़ी, मक्खी, चील, कौए जैसे जीव भी थे। उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई भी प्राणी घृणित नहीं । सबके अंदर महान् आत्मा है और वे महानता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, जब हम अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बना लेते हैं तो दुनियाँ का सारा तख्ता पलट जाता है, दोष के स्थान पर गुण, बुराई के स्थान पर भलाई, दुःख के स्थान पर सुख आ बैठता है। बहुत बुरी दुनियाँ, बहुत अच्छी बन जाती है।

हर उन्नत आत्मा का कर्त्तव्य है कि वह आत्मविकास के लिए दूसरों की उन्नति का भी प्रयत्न करे। गिरे हुओं को उठने और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे*। समाज में तमोगुण उबलते रहेंगे, उनसे डरने या घबराने की जरूरत नहीं है, आत्मोन्नति चाहने वाली आत्मा का कर्तव्य है कि उन उत्पातों में सुधार करते हुए अपनी भुजाएँ मजबूत बनाएँ । दुष्टता को बढ़ने न देना, पाशविक तत्त्वों को मनुष्य तत्त्व में न घुलने देने का प्रयत्न करते रहना आवश्यक है । कर्म-कौशल यह कहता है कि समाज में पाप वृत्तियों को बढ़ने से रोकना चाहिए। इस विरोध-कर्म में बड़ी होशियारी की जरूरत है। यही तलवार की धार है, इस पर चलना सचमुच योग कहा जाएगा।

निष्कर्ष

सृष्टि का हर प्राणी आज के वर्तमान स्वरूप में अपूर्ण है। आप,किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत।
आप का कर्त्तव्य है कि आप दूसरों की उन्नति का भी प्रयत्न करे। गिरे हुओं को उठने और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे।


संदर्भ :
गहना कर्मणोगति: 📕
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।


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📌कर्म और भाग्य

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहिं तब फल चाखा।।


कर्म चाहे आज के हों अथवा पूर्व जन्म के उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री-सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे प्राप्त हो वही सौभाग्यशाली है और इसके लिए किसी दैवी के भरोसे नहीं बैठना पड़ता। कर्मों का संपादन मनुष्य स्वयं करता है। अतः अपने अच्छे व बुरे भाग्य का निर्णायक भी वही है। हमारा श्रेय इसमें यही है कि सत्कर्मों के द्वारा अपना भविष्य सुधार लें। जो इस बाथशत को समझ लेंगे और इस पर आचरण करेंगे उनको कभी दुर्भाग्य का रोना नहीं रोना पड़ेगा।

भ्रम इस बात से पैदा हो जाता है कि बार -बार प्रत्यक्ष रूप से कर्म करने पर भी विपरीत परिणाम प्राप्त हो जाते हैं, तो लोग उसे भाग्य-चक्र मानकर परमात्मा को दोष देने लगते हैं। किंतु यह भाग्य तो अपने पूर्व संचित कर्मों का ही परिणाम है। यहां मनुष्य जीवन के विराट् रुप की कल्पना की गई है और एक जीवन का दूसरे जीवन से संस्कार-जन्य संबंध माना गया है। इस दृष्टि से भी जिसे आज भाग्य कहकर पुकारते हैं, यह भी कर के अपने कर्म का ही परिणाम है।

प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपने किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं है, उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय के अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को संपन्न करता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है।

वास्तव में हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि कर्म-फल किसी भी दशा में नष्ट नहीं होता। किसी न किसी समय वह अवश्य सामने आता है। विवशतावश उस समय उसे भले ही भाग्य कहकर टाल दिया जाय, पर इससे कर्म-फल का सिद्धांत तो नहीं मिट सकता।

अपने कर्मों के द्वारा स्वयं हम ही अपने भाग्य-निर्माता हैं, पर हमारे द्वारा सृष्टि भाग्य हमें बांधता है, क्योंकि हमने जो कुछ बोया है, उसे इस जीवन या दुसरे जीवन में हमें अवश्य काटना होगा। फिर भी हम लोग वर्तमान में भूतकाल से प्राप्त प्राचीन भाग्य को कोसते हुए ही भविष्य के लिए अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं। यह बात हमारे लिए संकल्प और कर्म को एक अर्थ प्रदान करती है।

पुरुषार्थ की भाग्य के ऊपर विजय का सशक्त प्रतिपादन 'योगवशिष्ठ' में किया गया है। महर्षि वशिष्ठ जी इसके मुमुक्षु प्रकरण के षष्ठ सर्ग में कहते हैं -

"द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थौ परस्परम्।
य एव बलवांस्तत्रस से एव जयतिक्षणात्।।"


अर्थात पूर्वजन्म और इस जन्म के कर्मरुपी दो भेंड़े आपस में लड़ते हैं, उनमें जो बलवान होता है, वह विजयी होता है। उदार स्वभाव और सदाचार वाले, इस जगत् मोहक दैव से (भाग्य चक्र से) वैसे ही निकल जाते हैं जैसे पिंजरे से सिंह। पौरुष का फल हाथ में रखे गए आंवले के समान स्पष्ट है। प्रत्यक्ष को छोड़कर दैव के मोह में निमग्न लोग मूढ़ हैं।

अथर्ववेद में कहा गया है -

"अयं मे हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः"

अर्थात यह हाथ ही भगवान है, यह भगवान से भी बलवान है। कर्म ही भाग्य है। कर्म का कारण और फल दोनों ही हाथ में है।

'नियमितवादिता' अकर्मण्यता नहीं सिखाती। कर्म करना और फल को कृष्णार्पण कर देना, यही बात तो स्पष्ट रुप से गीता हमें सिखाती है। पूर्वजन्म एवं पूर्वजन्म का सिद्धांत यदि सत्य है, मनुष्य को अपने पूर्वजन्म के कर्मों का अच्छा-बुरा फल भोगना पड़ता है, यदि यह सत्य है तो 'भाग्यवादी' का सिद्धांत भी सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं। भाग्यवाद कभी भी अकर्मण्यता को जन्म नहीं देता। जब आलसी अपने आलस्य का समर्थन करते हैं, भाग्य का नाम लेकर उसकी आड़ में जो अपनी अकर्मण्यता का समर्थन करते हैं तो वे न केवल धूर्त हैं वरन् समाज को भारी हानि पहुंचाने वाले हैं। 'भाग्य' मनुष्य की विवशता है संचित प्रारब्ध उसका नियंत्रण करता है पर पुरुषार्थ तो उसका आज का कर्तव्य है, इस कर्त्तव्य की उपेक्षा करना एक प्रकार से ईश्वर की उपेक्षा करना है। हमारे भाग्य के अटपटेपन में भी किन पुरुषार्थियों का पुरुषार्थ काम कर रहा हो, यह कौन जानता है?

अंग्रेजी में कहावत है कि ईश्वर उसकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। अर्थात जो क्रियाशील व पुरुषार्थी हैं ईश्वर का वरदहस्त उनके साथ है। लोग तर्क देते हैं कि भगवत अनुग्रह से फल प्राप्ति बिना कर्म के ही हो जाती है। वे भूल जाते हैं कि भगवद्भक्ति, स्मरण, कीर्तन, चिंतन आदि भी तो कर्म है, कर्म नहीं बल्कि विशिष्ट कर्म हैं।


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भाग्य का अस्तित्व यदि है तो वह कर्म से जुड़ा है। यहां कर्म के सूक्ष्म भेद को जानना आवश्यक है।

कर्म तीन प्रकार के होते हैं-

१) क्रियमाण कर्म,
२) संचित कर्म, और
३) प्रारब्ध कर्म

१) संचित कर्म :- जो दबाव में बेमन से, परिस्थितिवश किया जाए ऐसे कर्मों का फल 1000 वर्ष तक भी संचित रह जाता है। इस कर्म को मन से नहीं किया जाता। इसका फल हल्का धुंधला और कभी-कभी विपरीत परिस्थितियों से टकराकर समाप्त भी हो जाता है।

२) प्रारब्ध कर्म :- तीव्र मानसिकता पूर्ण मनोयोग से योजनाबद्ध तरीके से तीव्र विचार एवं भावना पूर्वक किए जाने वाले कर्म। इसका फल अनिवार्य है, पर समय निश्चित नहीं है। इसी जीवन में भी मिलता है और अगले जन्म में भी मिलता है।

३) क्रियमाण कर्म :- शारीरिक कर्म जो तत्काल फल देने वाले होते हैं। क्रिया के बदले में तुरंत प्रतिक्रिया होती है।

इस तरह क्रियमाण ही संचित कर्म बनते हैं तथा संचित कर्म ही प्रारब्ध है। जब यह प्रारब्ध कर्म फलित होते हैं तो इनके कारण उत्पन्न अदृश्य एवं परिस्थितियों को समझना पाने के कारण इसे भाग्य रूपी अदृश्य शक्ति का नाम देते हैं व इसका अस्तित्व मानने लगते हैं, जबकि यह कर्म से जुड़ा है। मनुष्य अपनी इच्छा व पुरुषार्थ द्वारा कर्म की गति को दिशा दे सकता है।

प्रारब्ध यदि कष्ट कर हो तो भी उसे भोगना तो पड़ता है, लेकिन उसको हल्का किया जा सकता है। 'मंत्र तंत्रौषधि बलात्' से उसको हल्का किया जा सकता है। शूल की पीड़ा को सुई में बदला जा सकता है। दरिद्र व्यक्ति संचित कर्म का नाश तपस्या से कर सकता है। नि: संतान किसी तपस्वी के आशीर्वाद व अनुग्रह से पुत्र प्राप्त कर सकता है। अल्पायु तप आदि से दीर्घायु में परिवर्तित हो सकती है। अर्थात मनुष्य अपने भाग्य (अर्थात प्रारब्ध) को परिवर्तित, संशोधित एवं संवर्धित कर सकता है।

इस तरह भाग्य या प्रारब्ध कोई ऐसी शक्ति नहीं कि जिनके आगे मनुष्य घुटने टेक दे, उसके हाथों की कठपुतली बनकर दीन-हीन दरिद्र व निकृष्ट स्तर का जीवन जिए। बल्कि यह तो उसी के कर्मों की रचना है, जिसे मनुष्य अपने प्रयास-पुरुषार्थ अर्थात नवीन कर्मों द्वारा परिमार्जित कर सकता है श्रेष्ठ कर्म करता हुआ वह अपने लौकिक एवं पारलौकिक जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है, आखिर मनुष्य अपना भाग्य विधाता आप ही तो है।

संदर्भ ग्रंथ:-
१.) अखण्ड ज्योति पत्रिका
२.) गहना कर्मणोगति:
३.) मरने के बाद हमारा क्या होता है?


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🚩 शारदीय नवरात्र 15 से 23 अक्टूबर 2023

16 अक्टूबर सोमवार अश्विन शुक्ल द्वितीया
रविवार प्रातः स्वाध्याय

असामान्य सुयोग उपलब्ध कराने वाली नवरात्रियाँ

नवरात्रि को देवत्व के स्वर्ग से धरती पर उतरने का विशेष पर्व माना जाता है। उस अवसर पर सुसंस्कारी आत्माएँ अपने भीतर समुद्र मंथन जेसी हलचलें उभरती देखते हैं। जो उन्हें सुनियोजित कर सकें वे वैसी ही रत्न राशि उपलब्ध करते हैं जैसी कि पौराणिक काल में उपलब्ध हुई मानी जाती हैं। इन दिनों परिष्कृत अन्तराल में ऐसी उमंगें भी उठती हैं जिनका अनुसरण सम्भव हो सके तो दैवी अनुग्रह पाने का ही नहीं देवोपम बनने का अवसर भी मिलता है । यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सदा ही बरसता है, पर ऐसे कुछ विशेष अवसर मिल सके,इन अवसरों को पावन पर्व कहते हैं।नवरात्रियों का पर्व मुहूर्तों में विशेष स्थान है। उस अवसर पर देव प्रकृति की आत्माएँ किसी अदृश्य प्रेरणा से प्रेरित होकर आत्म कल्याण एवं लोक मंगल की क्रिया कलापों में अनायास ही रस लेने लगती हैं।


बसन्त आते ही कोयल कूकती और तितलियाँ फुदकती दृष्टिगोचर होती हैं। भौरे गूँजते हैं ।जबकि अन्य ऋतुओं में उनके दर्शन भी दुर्लभ रहते हैं। वर्षा आते ही मेंढक बोलते और मोर नाचने लगते हैं जबकि साल के अन्य महीनों में उनकी गतिविधियाँ कदाचित ही दृष्टिगोचर होती हैं। आँधी तूफान और चक्रवातों का दौर गर्मी के दिनों में रहता है। ग्रीष्म का तापमान बदलते ही उनमें से किसी का पता नहीं चलता। ठीक यही बात नवरात्रियों के समय पर भी लागू होती है। प्रातःकाल और सायंकाल की तरह इन दिनों की भी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं उनमें सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह उभरते और मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। न केवल प्रभावित करने वाली वरन् उनमूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बनती हैं। इसे समय की विशेषता कह सकते हैं। इसमें प्राणी तो कठपुतली की तरह अपना रोल पूरा करते हैं- सूत्र संचालन तो किसी ऐसे अविज्ञान मर्मस्थल से होता है जिसे सूक्ष्म जगत या अन्तर्जगत के नाम से मनीषी व्याख्या - विवेचना करते रहते हैं। नवरात्रियों में कुछ ऐसा वातावरण रहता है जिसमें आत्मिक प्रगति के लिए प्रेरणा और अनुकूलता की सहज शुभेच्छा बनते देखी जाती है।


ज्वार भाटे हर रोज नहीं अमावस्या पूर्णमासी को ही आते हैं। उमंगों के सम्बन्ध में भी ऐसी ही बात है कि वे मनुष्य की स्व उपार्जित ही नहीं होतीं वरन् कभी- कभी उनके पीछे किसी अविज्ञात उभार का ऐसा दौर काम करता पाया गया है कि चिन्तन ही नहीं कर्म भी किसी ऐसी दशा में बहने लगता है जिसकी इससे पूर्व वैसी आशा या तैयारी जैसी कोई बात नहीं थी। ऐसे अप्रत्याशित अवसर तो यदा कदा ही आते हैं पर नवरात्रि के दिनों अनायास ही अन्तराल में ऐसी हलचलें उठती हैं जिनका अनुसरण करने पर आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनने में ही नहीं सफलता मिलने में भी ऐसा कुछ बन पड़ता है मानो अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसा हो ।


ऐसे ही अनेक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शी ऋषियों, मनीषियों ने नवरात्रि में साधना का अधिक माहात्म्य बताया है इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकांश कोलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।

क्रमशः कल के स्वाध्याय मे ....

संदर्भ : नवरात्रि पर्व और गायत्री की विशेष तप साधना लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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🚩 शारदीय नवरात्र 15 से 23 अक्टूबर 2023

17 अक्टूबर मंगलवार अश्विन शुक्ल तृतीया
रविवार प्रातः स्वाध्याय


त्रिपदा गायत्री-तीन धाराओं का संगम

गायत्री को त्रिपदा कहा गया है, उसके तीन चरण हैं । उद्गम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशा धाराएँ जुड़ती हैं-

( १ ) सविता के भर्ग-तेजस् का वरण अर्थात् जीवन में ऊर्जा एवं आभा का बाहुल्य और अवांछनीयताओं में अंतः ऊर्जा का टकराव। परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य साहस इसी का नाम है । गायत्री के नैष्ठिक साधक में यह प्रखर प्रतिभा इस स्तर की होनी चाहिए कि अनीति के आगे न सिर झुकाएँ और न झुककर कायरता के दबाव में कोई समझौता करें ।

(२) दूसरा चरण है-देवत्व का वरण, शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना, लेने की अपेक्षा देने की प्रवृत्ति का परिपोषण करना । उस स्तर के व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव गरिमा की अंतराल में अवधारणा करना । यही है "देवस्य धीमहि ।"

( ३ ) तीसरा सोपान है-धियो यो नः प्रचोदयात्" । मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज, संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना ,मेधा, प्रज्ञा, दूरदर्शी विवेकशीलता, नीर-क्षीर विवेक में निरत बुद्धिमत्ता ।

यही है आध्यात्मिक त्रिवेणी संगम, जिसका अवगाहन करने पर मनुष्य असीम पुण्यफल का भागी बनता है । कौए से कोयल एवं बगुले से हंस बन जाने की उपमा जिस त्रिवेणी संगम के स्नान से दी जाती है वह वस्तुतः आदर्शवादी साहसिकता, देवत्व की पक्षधर शालीनता एवं आदर्शवादिता को प्रमुखता देने वाली महाप्रज्ञा है। गायत्री का तत्त्वज्ञान समझने और स्वीकारने वाले में यह तीनों ही विशेषताएँ न केवल पायी जानी चाहिए, वरन् उनका अनुपात निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए। इस आस्था को स्वीकारने के उपरान्त संकीर्णता, कृपणता से अनुबंधित ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई गुंजायश नहीं रह जाती कि उससे प्रभावित होकर कोई दूसरों के अधिकारों का हनन करके अपने लिए अनुचित स्तर का लाभ बटोर सके, अपराधी या आततायी कहलाने के पतन पराभव अपना सके ।

निष्कर्ष :
त्रिपदा गायत्री के तीन चरण हैं। 1) तत्सवितुर्वरेण्यं : सविता के तेजस् का वरण अर्थात् जीवन में ऊर्जा एवं आभा का बाहुल्य। परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य साहस इसी का नाम है । 2) देवस्य धीमहि : दूसरा चरण है-देवत्व का वरण, शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना। ३ ) तीसरा सोपान है-धियो यो नः प्रचोदयात्"। अर्थात् : मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज, संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना। गायत्री साधक में यह तीनों ही विशेषताएँ न केवल पायी जानी चाहिए, वरन् उनका अनुपात निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए।


संदर्भ : आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना
लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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🚩 शारदीय नवरात्र 15 से 23 अक्टूबर 2023

17 अक्टूबर मंगलवार अश्विन शुक्ल तृतीया
मंगलवार सायं कालीन स्वाध्याय📕

वर्ष का विशिष्ट शक्ति साधना पर्व नवरात्रि

परम सत्ता को माँ के रूप में देखने और उस रूप में उसकी आराधना करने का प्रचलन भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है, जिसकी मिसाल विश्व के अन्य धर्मों या आस्था-परम्पराओं में खोज पाना दुर्लभ है। नवरात्रि के रूप में इसी की आराधना का विशिष्ट पर्व मनाया जाता है। उसे शक्ति पर्व भी कहा जाता है। भारत में आदिकाल से चला आ रहा शक्ति पूजा का यह पर्व आज भी अगम्य आस्था के साथ जारी है। हमारी संस्कृति का प्रत्येक कालप्रवाह उसकी चर्चा, विवेचन एवं साधना से भरा पड़ा है।
भारतीय संस्कृति के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के दशम मंडल में एक पूरा सूक्त शक्ति उपासना पर है, जिसमें शक्ति की व्यापकता का सुन्दर विवेचन किया गया है-"मैं ही ब्रह्म के दोषियों को मारने के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही सेनाओं को मैदान में लाकर खड़ा करती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में सर्वत्र व्याप्त हूँ, मैं ही संपूर्ण जगत् की आधीश्वरी हूँ। मैं परमब्रह्म को अपने से अभिन्न रूप में जानने वाले पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। संपूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है।' इसी तरह ऋग्वेद के देवी सूक्त, ऊषा सूक्त और रात्रि सूक्त तथा सामवेद के रात्रि सूक्त सभी शक्ति साधना की परम्परा के निदेशक हैं।
कुरुक्षेत्र में महाभारत आरम्भ होने से भगवान् श्रीकृष्ण ने आदि शक्ति की ही उपासना की थी, ताकि युद्ध में अर्जुन विजयी हो। भगवान राम द्वारा इसकी उपासना का उल्लेख अनेक राम कथाओं में मिलता है। बौद्ध धर्म में मातृ शक्ति की पूजा विविध रूप में प्रचलित रही है। बौद्ध तंत्रों में तो शक्ति को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है। शाक्त पुराणों में देवी के स्वरूप, महिमा एवं उपासना विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुतः पौराणिक युग को शक्ति उपासना का यौवन काल कह सकते हैं। पुराणों के व्यापक प्रचार से शक्ति की उपासना को इतना बल मिला था कि वह घर-घर में पूजी जाने लगी।
दैवी भागवत में शक्ति के लिए अनन्य शक्ति भाव प्रदर्शित किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में शक्ति की व्यापकता का उल्लेख तीन रूपों में किया गया है-महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती । महाकाली आसुरी शक्तियों का संहारक है, अहंकार का नाश करती हैं और ज्ञान की खड्ग से अज्ञान को नष्ट करती हैं। महासरस्वती विवेक की देवी है। विद्या, साहित्य, संगीत, विवेक और ज्ञान की अधिष्ठात्री है। महालक्ष्मी ऐश्वर्य की देवी है। मार्कण्डेय पुराण में दैवी माहात्म्य की विशद् विवेचना को 'दुर्गा सप्तशती' नाम दिया गया है। स्कन्द पुराण में देवी के आविर्भाव का वर्णन है। ब्रह्मपुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी देवी के अवतरण का उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ब्रह्माजी मार्कण्डेय ऋषि को कहते हैं कि देवी का पहला रूप शैल पुत्री है। इस क्रम में अन्य रूप ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। इन रूपों को नौ दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा की उत्पत्ति के संदर्भ में शिवपुराण में रुद्र संहिता के पंचम अध्याय में सुंदर आख्यान मिलता है।
वस्तुतः शक्ति का विस्तार, वैभव एवं लीला जगत् अनन्त है। सृष्टि की तमाम व्यापकता एवं विविधता के मूल में एक ही शक्ति विद्यमान है, इसे ब्रह्म की क्रिया शक्ति के रूप में आदि शक्ति के रूप में जाना जाता है। यही विविध अवसरों पर, विविध प्रयोजनों के लिए अलग-अलग नाम, रूप एवं शक्ति धारण करके प्रकट होती है। प्रकृति की जितनी भी शक्तियाँ हैं वे सब इसी की अभिव्यक्ति हैं। इनका स्फुरण, उद्भव एवं जन्म इसी आदि शक्ति के गर्भ से होता है। सृष्टि का पोषण एवं संवर्धन इसी के बल पर होता है। यही इसकी रक्षा करती है। यही ब्रह्म, विष्णु एवं महेश की जननी है। सृष्टिकर्त्ता इस सृजनकारिणी शक्ति से हीन होने पर सृष्टिकर्ता नहीं रह जाता है। स्कंदपुराण में उल्लेख आता है कि शक्ति से विहीन शिव शव के समान है, शिव का शिवत्व महाशाँति के सान्निध्य से ही जाग्रत होता है।

क्रमशः कल के स्वाध्याय मे ....

संदर्भ: अखंड ज्योति अक्टूबर 2001
लेखक: पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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🚩 शारदीय नवरात्र 15 से 23 अक्टूबर 2023

19 अक्टूबर बृहष्पतिवार अश्विन शुक्ल पंचमी
रविवार प्रातः स्वाध्याय📕

नौ सद्गुणों की अभिवृद्धि ही गायत्री-सिद्धि

अब तक....
जिस प्रकार अंकों की श्रृंखला नौ पर समाप्त हो जाती है। और बाकी सभी संख्या इन्ही नौ अंकों को मिलाकर बनती है, इसी प्रकार अनेकानेक सद्गुणों की गणना में नौ को प्रमुखता दी गई है।वे इस प्रकार है : श्रमशीलता, शिष्टता , मितव्ययिता, सुव्यवस्था, उदार सहकारिता,समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी,बहादुरी। कल हम सभी प्रथम दो को पढ चुके है।

अब आगे....

३ ) मितव्ययिता :
सादा जीवन उच्च विचार की अवधारणा। उद्धत शृंगारिक शेखीखोरी, अमीरी का अहंकारी - प्रदर्शन, अन्य रूढ़ियों कुरीतियों से जुड़े हुए अपव्यय से बचना सादगी है, जिसमें चित्र-विचित्र फैशन बनाने और कीमती जेवर धारण करने की कोई गुंजाइश नहीं है। अधिक खर्चीले व्यक्ति प्रायः बेईमानी पर उतारू तथा ऋणी देखे जाते हैं । उसमें ओछापन, बचकानापन और अप्रामाणिकता - अदूरदर्शिता का भी आभास मिलता है ।

( ४ ) सुव्यवस्था :
हर वस्तु को सुव्यवस्थित, सुसज्जित स्थिति में रखना । फूहड़पन और अस्त-व्यस्तता, अव्यवस्था का दुर्गुण किसी भी प्रयोजन में झलकने न देना । समय का निर्धारण करते हुए, कसी हुई दिनचर्या बनाना और उसका अनुशासनपूर्वक परिपालन करना । चुस्त-दुरुस्त रहने के ये कुछ आवश्यक उपक्रम हैं । वस्तुएँ यथास्थान न रखने पर वे कूड़ा कचरा हो जाती हैं । इसी प्रकार अव्यवस्थित व्यक्ति भी असभ्य और असंस्कृत माने जाते हैं ।

५ ) उदार सहकारिता : मिलजुलकर काम करने में रस लेना । *पारस्परिक आदान-प्रदान का स्वभाव बनाना ।मिल-बाँटकर खाने और हंसने-हंसाते समय गुजारने की आदत डालना ।** इसे सामाजिकता एवं सहकारिता भी कहा जाता है । अब तक की प्रगति का यही प्रमुख आधार रहा है और भविष्य भी इसी रीति-नीति को अपनाने पर समुन्नत हो सकेगा । अकेलेपन की प्रवृत्ति तो मनुष्य को कुत्सा और कुंठाग्रस्त ही रखती हैं।

उपरोक्त पांच ,पंचशील कहलाते हैं, व्यवहार में लाए जाते हैं, स्पष्ट दीख पड़ते हैं।इसलिए इन्हें अनुशासन वर्ग में गिना जाता है । धर्म - धारणा भी इन्हीं को कहते हैं।

निष्कर्ष : नौ सद्गुणो की श्रंखला मे आज हम सभी तीसरे , चौथे और पांचवे सद्गुणो को जाने। वे है : 3) मितव्ययिता : अर्थात् : सादा जीवन उच्च विचार को जीवन मे अपनाना। 4 ) सुव्यवस्था : जिसमे हर वस्तु को सुव्यवस्थित, सुसज्जित स्थिति में रखने की सीख निहित है। 5) उदार सहकारिता अर्थात् : मिलजुलकर काम करने में रस लेना । मिल-बाँटकर खाने और हंसते-हंसाते समय गुजारने की आदत डालना।

शेष सद्गुण हम सब आगामी दिनो मे पढेंगे ....

आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना
लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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🚩 शारदीय नवरात्र 15 से 23 अक्टूबर 2023

20 अक्टूबर शुक्रवार अश्विन शुक्ल षष्ठी
रविवार प्रातः स्वाध्याय📕

नौ सद्गुणों की अभिवृद्धि ही गायत्री-सिद्धि

अब तक ...
हम सभी पांच सद्गुण जिसे पंचशील भी कहते हैं, उनके बारे में पढ़ चुके हैं।अब आगे...

इन पांच के अतिरिक्त भाव- श्रद्धा से संबंधित उत्कृष्टता के पक्षधर स्वभाव भी हैं, जिन्हें श्रद्धा-विश्वास स्तर पर अंतःकरण की गहराई में सुस्थिर रखा जाता है। इन्हें आध्यात्मिक देव-संपदा भी कह सकते हैं। आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता का विविध परिचय इन्हीं चार मान्यताओं के आधार पर मिलता है। चार वेदों का सार निष्कर्ष यही है चार दिशा धाराएँ तथा वर्णाश्रम धर्म के पीछे काम करने वाली मूल मान्यताएँ भी यही है ।

(६) समझदारी :

दूरदर्शी विवेकशीलता ,नीर-क्षीर विवेक। औचित्य का ही चयन ,परिणामों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए कुछ करने का प्रयास । जीवन की बहुमूल्य संपदा के एक-एक क्षण का श्रेष्ठतम उपयोग । दुष्प्रवृत्तियों के साथ जुड़ी हुई दुर्घटनाओं के संबंध में समुचित सतर्कता का अवगाहन ।

(७) ईमानदारी :

आर्थिक और व्यावहारिक क्षेत्र में इस प्रकार का बरताव जिसे देखने वाला सहज सज्जनता का अनुमान लगा सके। विश्वस्त समझ सके और व्यवहार करने में किसी आशंका की गुंजाइश न रहे। भीतर और बाहर को एक समझे । छल, प्रवंचना, अनैतिक आचरण से दृढ़तापूर्वक बचना ।

(८) जिम्मेदारी :

मनुष्य यो स्वतंत्र समझा जाता है, पर वह जिम्मेदारियों के इतने बंधनों से बंधा हुआ है कि अपने परायों में से किसी के भी साथ अनावरण की गुंजायश नहीं रह जाती । ईश्वर प्रदत्त शरीर मानस एवं विशेषताओं में से किसी का भी दुरुपयोग न होने पाए। परिवार के सदस्यों से लेकर देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्वों का तत्परतापूर्वक निर्वाह इसमें से किन्हीं में भी अनाचार का प्रवेश न होने देना ।

निष्कर्ष: श्रद्धा-विश्वास स्तर पर अंतःकरण की गहराई में सुस्थिर रखे जाने वाले गुण चार है- समझदारी ,ईमानदारी ,जिम्मेदारी और बहादुरी।समझदारी : अर्थात दूरदर्शी विवेकशीलता ,नीर-क्षीर विवेक का होना। ईमानदारी अर्थात खुद को ऐसा बनाएं जिससे लोग हमें विश्वस्त समझ सके और व्यवहार करने में किसी आशंका की गुंजाइश ना रहे। जिम्मेदारी अर्थात परिवार के सदस्यों से लेकर देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्वों का तत्परतापूर्वक निर्वाह करना ।

संदर्भ : आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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२१ अक्टूबर शनिवार अश्विन शुक्ल सप्तमी
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नौ सद्गुणों की अभिवृद्धि ही गायत्री-सिद्धि

अब तक.....
हम सभी आठ सद्गुणो को पढ चुके है आज अंतिम गुण बहादुरी को पढेंगे ....

९ ) बहादुरी :
साहसिकता, शौर्य और पराक्रम की अवधारणा । अनीति के सामने सिर न झुकाना । अनाचार के साथ कोई समझौता न करना। संकट देखकर घबड़ाहट उत्पन्न न होने देना। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में प्रवेश करती जाने वाली अवांछनीयता से निरंतर जूझना और उसे निरस्त करना लोभ, मोह,अहंकार, कुसंग, दुर्व्यसन आदि सभी अनौचित्यों को निरस्त कर सकने योग्य संघर्षशीलता के लिए कटिबद्ध रहना।

पांच क्रियापरक (पंचशील)और चार भावनापरक ,इन नौ गुणों के समुच्चय को ही धर्म-धारणा कहते हैं। गायत्री मंत्र के नौ शब्द इन्हीं नौ दिव्य संपदाओं को धारण किए रहने की प्रेरणा देते हैं। यज्ञोपवीत के नौ धागे भी यही हैं। उन्हें गायत्री की प्रतीक प्रतिमा माना गया है और इनके निर्वाह के लिए सदैव तत्परता बरतने के लिए, उसे कंधे पर धारण कराया जाता है, अर्थात् मानवी गरिमा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए नौ अनुशासन भरे उत्तरदायित्व कंधे पर धारण करना ही वस्तुतः यज्ञोपवीत धारण का मर्म हैं। इन्हीं को सच्चे अर्थों में गायत्री मंत्र का जीवनचर्या में समावेश कहते हैं। मंत्रदीक्षा-गुरु दीक्षा के समय भी इन नौ अनुशासनों को हृदयंगम कराया जाता है।

गायत्री मंत्र की साधना से व्यक्ति में यह नौ सद्गुण उभरते हैं । इसी बात को इन शब्दों में भी कहा जा सकता है कि जो इन नौ गुणों का अवधारण करता है, उसी के लिए यह संभव है कि गायत्री मंत्र में सन्निहित ऋद्धि-सिद्धियों को अपने में उभरता देखे । गंदगी वाले स्थान पर बैठने के लिए कोई सुरुचि सम्पन्न भला आदमी तैयार नहीं होता ,फिर यह आशा कैसे की जाए कि निकृष्ट स्तर का चिंतन, चरित्र और व्यवहार अपनाए रहने वालों पर किसी प्रकार का दैवी अनुग्रह बरसेगा और उन्हें वह गौरव मिलेगा, जो देवत्व के साथ जुड़ने वालों को मिला करता है ।

ज्ञान और कर्म का युग्म है ।दोनों की सार्थकता इसी में है कि वे दोनों साथ-साथ रहें, एक दूसरे को प्रभावित करें और देखने वालों को पता चले कि जो सीखा, समझा जाना और माना गया है, वह काल्पनिक मात्र न होकर इतना सशक्त भी है कि क्रिया को, विधि-व्यवस्था को अपने स्तर के अनुरूप बना सके ।

जीवन-साधना से जुड़ने वाले गायत्री महामंत्र के नौ अनुशासनों का ऊपर उल्लेख हो चुका है, इन्हें अपने जीवन क्रम के हर पक्ष में समन्वित किया जाना चाहिए । अथवा यह आशा रखें कि यदि श्रद्धा-विश्वासपूर्वक सच्चे मन से उपासना की गई हो, तो उसका सर्वप्रथम परिचय इन सद्गुणों की अभिवृद्धि के रूप में परिलक्षित होगा । इसके बाद वह पक्ष आरंभ होगा, जिसे अलौकिक, आध्यात्मिक, अतीन्द्रिय अथवा समृद्धियों, विभूतियों के रूप में प्रमाण-परिचय देने की आशा रखी जाती है।

निष्कर्ष : पांच क्रियापरक (पंचशील)और चार भावनापरक ,इन नौ गुणों के समुच्चय को ही धर्म-धारणा कहते हैं। गायत्री मंत्र के नौ शब्द , पांच क्रियापरक (पंचशील)और चार भावनापरक ,इन नौ गुणों को धारण किए रहने की प्रेरणा देते हैं।गायत्री मंत्र की साधना से व्यक्ति में यह नौ सद्गुण उभरते हैं ।इन्हीं को सच्चे अर्थों में गायत्री मंत्र का जीवनचर्या में समावेश कहते हैं।

संदर्भ : आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य


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आत्मशोधन, साधना का एक अनिवार्य चरण

आपरेशन करने से पूर्व औजारों को उबालना पड़ता है ।सिनेमा घर मे प्रवेश करने वालों के पास गेट पास होना चाहिए । पूजा उपासना के कर्मकांडों की विधा अपनाने से पूर्व साधक की निजी जीवनचर्या उच्चकोटि की होनी चाहिए । प्राचीनकाल में यह तथ्य अध्यात्म विज्ञान में पहला चरण बढ़ाने वालों को भी समय से पूर्व जानने होते थे अब तो लोग मात्र कर्मकांडों को ही सब कुछ मानने लगे हैं और सोचते हैं कि अमुक विधि से अमुक वस्तुओं की अमुक शब्दों के उच्चारण द्वारा मनोवांछित अभिलाषाएँ पूरी कर ली जाएंगी इस सिद्धांत विहीन प्रक्रिया का जब कोई परिणाम नहीं निकलता, समय की बर्बादी भर होती है, तो दोष जिस तिस पर लगाते हैं। लोग वर्णमाला सीखना अनावश्यक मानते और एम. ए. का प्रमाण पत्र झटकने की फिराक में फिरते हैं। समझा जाना चाहिए कि राजयोग के निर्माता महर्षि पातंजलि ने पहले यम और नियमों के परिपालन को प्रमुखता दी है, इसके बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि साधनात्मक प्रयोजनों की शिक्षा दी है। गायत्री मंत्र के साधकों को सर्वप्रथम सद्बुद्धि धारण करने, सत्कर्म अपनाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए । जब प्रथम कक्षा में उत्तीर्ण होने में सफलता मिल जाए, तब रेखागणित, बीजगणित, व्याकरण आदि का अभ्यास करना चाहिए । आज की महती विडंबना यह है कि लोग विधि विधान, कर्मकांडों, उच्चारणों को ही समग्र समझ बैठते हैं और उतने भर से ही यह अपेक्षा कर लेते कि उन पर दैवी वरदान बरसने लगेंगे और सिद्धियाँ, विभूतियाँ बटोरने में सफलता मिल जाएगी समझना चाहिए कि अध्यात्म विद्या जादूगरी-बाजीगरी नहीं है। उसके पीछे व्यक्तित्व को उभारने निखारने और उत्कृष्ट बनाने की अनिवार्य शर्त जुड़ी हुई है, जिसे प्रथम चरण में ही पूरा करना पड़ता है।


संदर्भ : आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना लेखक : पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 01 Nov 2023

🔷 अक्सर अनुकूलताओं में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी होना हमारा स्वभाव बन गया है। उन्नति के, लाभ के, फल-प्राप्ति के क्षणों में हमें बेहद खुशी होती है तो कुछ न मिलने पर, लाभ न होने पर दुःख भी कम नहीं होता। लेकिन इसका आधार तो स्वार्थ, प्रतिफल, लगाव अधिकार आदि की भावना है। इन्हें हटाकर देखा जाय तो सुख-दुःख का कोई अस्तित्व ही शेष न रहेगा। दोनों ही निःशेष हो जायेंगे।

🔶 सुख-दुःख का सम्बन्ध मनुष्य की भावात्मक स्थिति से मुख्य है। जैसा मनुष्य का भावना स्तर होगा उसी के रूप में सुख-दुःख की अनुभूति होगी। जिनमें उदार दिव्य सद्भावनाओं का समुद्र उमड़ता रहता है, वे हर समय प्रसन्न, सुखी, आनन्दित रहते हैं। स्वयं तथा संसार और इसके पदार्थों को प्रभु का मंगलमय उपवन समझने वाले महात्माओं को पद-पद पर सुख के सिवा कुछ और रहता ही नहीं। काँटों में भी वे फलों की तरह मुस्कुराते हुए सुखी रहते हैं। कठिनाइयों में भी उनका मुँह कभी नहीं कुम्हलाता।

🔷 संकीर्णमना हीन भावना वाले, रागद्वेष से प्रेरित स्वभाव वाले व्यक्तियों को यह संसार दुःखों का सागर मालूम पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति कभी नहीं कहेंगे कि “हम सुखी हैं।” वे दुःख में ही जीते हैं और दुःख में ही मरते हैं। दुर्भावनायें ही दुःखों की जनक है। इसी तरह वे हैं जिनका पूरा ध्यान अपनेपन पर ही है। उनका भी दुःखी रहना स्वाभाविक है। केवल अपने को सुखी देखने वाले, अपना हित, अपना लाभ चाहने वाले, अपना ही एकमात्र ध्यान रखने वाले संकीर्णमना व्यक्तियों को सदैव मनचाहे परिणाम तो मिलते नहीं। अतः अधिकतर दुःख और रोना-धोना ही इस तरह के लोगों के पल्ले पड़ता है।


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हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण


आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे।

तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।

एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

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दीवाली की दिव्य ज्योति आपके घर को खुशियों से भर दे, और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद आपके जीवन को सफलता से भर दे। आने वाला साल आपको सब ख़ुशी प्रदान करे| शुभ दीपावली! 💐🙏🏻


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