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सनातन धर्म • Sanatan Dharma
शंकरं प्रेमपिण्डम् (२) ------------------- महागणपति का पूजन भगवती त्रिपुरसुन्दरी के साथ सम्पन्न किया जाता है, भंडासुर युद्ध के समय शायद भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने भी गलती कर दी थी वे गणपति को केवल पुत्र समझ बैठी थीं जबकि वे अलख निरंजन हैं,पूर्ण…
शंकरं प्रेमपिण्डम् (३)
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https://t.me/Sanatan/1995
वामांग का अतिक्रमण कर लेती हूँ, जब मैं धूमा होती हूँ तो इन्हें उदरस्थ कर लेती हूँ, जब मैं कामाख्या होती हूँ तो इन्हें अपने अंदर स्थापित कर लेती हूँ, योनि स्वरूपा बन इनका आराधन कर लेती हूँ, विवाह के समय भी मैं इनके गोद में बैठी हुई थी, जब मैं तपस्विनी होती हूँ तो इनको हृदय में आत्मसात कर लेती हूँ, जब मैं छिन्नमस्ता होती हूँ तो इनके ऊपर सवार होती हूँ अतः इनके सम्पूर्ण अंगों पर केवल मेरा ही अधिकार है। इनके मानस, इनके शरीर, इनके दिव्यांग, इनके हृदय में तो सिर्फ मैं ही विराजती हूँ परन्तु अब ये कौन आ गया और मुझे मालूम ही नहीं चला, मेरी आज्ञा के विरुद्ध हे शिव आपने किसी और की सृष्टि कैसे की ? किसी और पर दृष्टि कैसे डाली ? किसी और को स्पर्श क्यों किया ? शिवा क्रोधित हो गई और जब शिव का ध्यान, शिव की मुग्धता उस बालक पर से नहीं हट रही थी तब उन्होंने उस बालक का मुख गज के समान कर दिया।
गज मुख गणेश उछलकर शिव की गोद से शिवा की तरफ बढ़ गया। शिव बोल उठा लो गजमुख को, "यह है शंकरम् प्रेम पिण्डम् " अर्थात शंकर का प्रेम पिण्ड तत्काल ही शिवा बोल उठीं नहीं नहीं यह तो "शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् " है अर्थात शिव और शिवा दोनों के प्रेम का पिण्ड श्री गणेश और इस प्रकार देवताओं को शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् के रूप में श्री गणेश प्राप्त हुए जिन्होंने कालान्तर विघ्न का निर्माण किया। हे गजगामिनी, हे गज योनि, हे गज माते, हे गज मणिधारिणी, हे गजाभिषेका कमले, हे गज मदयुक्ता, हे गजारूढ़ा, हे गजदर्शिनी, हे गज पोषिणी, हे गज सुगंधयुक्ता, हे गज वेमा देखो अपने इस गज मुखि पुत्र को देखो, देखो इसके कोमल पाँवों को इसमें गज रेखा बनी हुई है जो कि मध्य से शुरु होकर अंगुष्ठ तक जाती है। इसे कहते हैं गज केसरी योग यह गणनायक बनेगा, गणों की गिनती करेगा। देखो इसके चरण कमलों को इसमें ध्वजा, शंख, चक्र और पद्म विराजमान हैं अतः यह राज-राजेश्वर बनेगा एवं अनंत ब्रह्माण्डों के राजाओं के ऊपर शासन करेगा। सभी देव इसे पूजेंगे, बड़े-बड़े गजारूढ़ इसके चरणों
में मस्तक झुकायेंगे शिव कह उठे। हाँ जो गणपति के भक्त होते हैं, जिन पर गणपति कृपावान होते हैं उनके पैरों में गज रेखा होती है उनकी जन्मकुण्डली में गज केसरी योग होता है। देखो इसके पाँव के नाखून ये गज मुक्ता से भी ज्यादा प्रकाशवान हैं तुरंत गजगामिनी बोल उठीं हे गज चर्मधारी, हे गज पूजक, हे गजेश्वर, हे गज पिता, हे ॐ कार नाद, हे गं मंत्र रचियता देखो इस बालक के कोमल हाथों की तरफ इसके हाथ में ॐ कार बना हुआ है, इसके शुक्र पर्वत पर स्वस्तिक का चिह्न है, अरे इसके चंद्र पर्वत पर अंकुश बना हुआ है, इसके गुरु पर्वत पर पाश का शुभ चिन्ह है, यह तो आदि बृहस्पति है, हे गजासुर हंता अब समय आ गया है कि आकार नाद को छोड़ नाना प्रकार की उपासना पद्धतियों, पंचम वेद, 54 प्रकार के तंत्र ग्रंथ एवं परम गोपनीय शक्ति मंत्रों इत्यादि को अपने मुखारविंद से उच्चारित करें। मेरा यह गज मुखी पुत्र, मेरा यह मयूरेश्वर अपने दंत से, अपने पंख से उन सबको जन कल्याण के लिए लिपिबद्ध करेगा, शिव उवाच के लिपिबद्ध होने का समय आ गया है।
हे गजम्बिके जल्दी करो, इसके कोमल पाँवों में अपनी सदा झनकार करने वाली नूपुर बांध दो क्योंकि यह अब हमारे साथ नृत्य करेगा। जब मैं ताण्डव करूंगा तो यह अपनी शुण्डाग्र से मृदंग का नाद उपस्थित करेगा और जब तुम लास्य करोगी तो यह अपने पैरों में लगे घुंघरूओं को बजाते हुए तुम्हारे साथ सुर ताल मिलायेगा। देखो नारद तुम्बरु से वीणा वादन में हार रहा है। ब्रह्मा का पुत्र है परन्तु ब्रह्म शिष्य से हार रहा है। हे आदि सरस्वती स्वरूपा गजम्बिके उसे इतना नहीं मालूम कि वह गणेशोपासना भूल गया है क्योंकि तुमने अपनी विचित्र वीणा जो इस नृत्य गणपति के हाथ में थमा दी है। हे गजप्रिया देखो वह आदि वेद व्यास सिर धुन रहे हैं उन्हें इतना नहीं मालूम कि गणपति ने शिव उवाच को लिपिबद्ध करने के लिए अपना एक दंत तोड़ लिया है अतः इनकी उपासना के बिना अब कोई लेखक नहीं बन सकता, अब कोई नर्तक नहीं बन सकता, अब कोई गायक नहीं बन सकता, अब कोई कवि नहीं बन सकता, अब कोई वैज्ञानिक नहीं बन सकता, अब कोई जोड़-तोड़कर कुछ नहीं बना सकता।
@Sanatan
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वामांग का अतिक्रमण कर लेती हूँ, जब मैं धूमा होती हूँ तो इन्हें उदरस्थ कर लेती हूँ, जब मैं कामाख्या होती हूँ तो इन्हें अपने अंदर स्थापित कर लेती हूँ, योनि स्वरूपा बन इनका आराधन कर लेती हूँ, विवाह के समय भी मैं इनके गोद में बैठी हुई थी, जब मैं तपस्विनी होती हूँ तो इनको हृदय में आत्मसात कर लेती हूँ, जब मैं छिन्नमस्ता होती हूँ तो इनके ऊपर सवार होती हूँ अतः इनके सम्पूर्ण अंगों पर केवल मेरा ही अधिकार है। इनके मानस, इनके शरीर, इनके दिव्यांग, इनके हृदय में तो सिर्फ मैं ही विराजती हूँ परन्तु अब ये कौन आ गया और मुझे मालूम ही नहीं चला, मेरी आज्ञा के विरुद्ध हे शिव आपने किसी और की सृष्टि कैसे की ? किसी और पर दृष्टि कैसे डाली ? किसी और को स्पर्श क्यों किया ? शिवा क्रोधित हो गई और जब शिव का ध्यान, शिव की मुग्धता उस बालक पर से नहीं हट रही थी तब उन्होंने उस बालक का मुख गज के समान कर दिया।
गज मुख गणेश उछलकर शिव की गोद से शिवा की तरफ बढ़ गया। शिव बोल उठा लो गजमुख को, "यह है शंकरम् प्रेम पिण्डम् " अर्थात शंकर का प्रेम पिण्ड तत्काल ही शिवा बोल उठीं नहीं नहीं यह तो "शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् " है अर्थात शिव और शिवा दोनों के प्रेम का पिण्ड श्री गणेश और इस प्रकार देवताओं को शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् के रूप में श्री गणेश प्राप्त हुए जिन्होंने कालान्तर विघ्न का निर्माण किया। हे गजगामिनी, हे गज योनि, हे गज माते, हे गज मणिधारिणी, हे गजाभिषेका कमले, हे गज मदयुक्ता, हे गजारूढ़ा, हे गजदर्शिनी, हे गज पोषिणी, हे गज सुगंधयुक्ता, हे गज वेमा देखो अपने इस गज मुखि पुत्र को देखो, देखो इसके कोमल पाँवों को इसमें गज रेखा बनी हुई है जो कि मध्य से शुरु होकर अंगुष्ठ तक जाती है। इसे कहते हैं गज केसरी योग यह गणनायक बनेगा, गणों की गिनती करेगा। देखो इसके चरण कमलों को इसमें ध्वजा, शंख, चक्र और पद्म विराजमान हैं अतः यह राज-राजेश्वर बनेगा एवं अनंत ब्रह्माण्डों के राजाओं के ऊपर शासन करेगा। सभी देव इसे पूजेंगे, बड़े-बड़े गजारूढ़ इसके चरणों
में मस्तक झुकायेंगे शिव कह उठे। हाँ जो गणपति के भक्त होते हैं, जिन पर गणपति कृपावान होते हैं उनके पैरों में गज रेखा होती है उनकी जन्मकुण्डली में गज केसरी योग होता है। देखो इसके पाँव के नाखून ये गज मुक्ता से भी ज्यादा प्रकाशवान हैं तुरंत गजगामिनी बोल उठीं हे गज चर्मधारी, हे गज पूजक, हे गजेश्वर, हे गज पिता, हे ॐ कार नाद, हे गं मंत्र रचियता देखो इस बालक के कोमल हाथों की तरफ इसके हाथ में ॐ कार बना हुआ है, इसके शुक्र पर्वत पर स्वस्तिक का चिह्न है, अरे इसके चंद्र पर्वत पर अंकुश बना हुआ है, इसके गुरु पर्वत पर पाश का शुभ चिन्ह है, यह तो आदि बृहस्पति है, हे गजासुर हंता अब समय आ गया है कि आकार नाद को छोड़ नाना प्रकार की उपासना पद्धतियों, पंचम वेद, 54 प्रकार के तंत्र ग्रंथ एवं परम गोपनीय शक्ति मंत्रों इत्यादि को अपने मुखारविंद से उच्चारित करें। मेरा यह गज मुखी पुत्र, मेरा यह मयूरेश्वर अपने दंत से, अपने पंख से उन सबको जन कल्याण के लिए लिपिबद्ध करेगा, शिव उवाच के लिपिबद्ध होने का समय आ गया है।
हे गजम्बिके जल्दी करो, इसके कोमल पाँवों में अपनी सदा झनकार करने वाली नूपुर बांध दो क्योंकि यह अब हमारे साथ नृत्य करेगा। जब मैं ताण्डव करूंगा तो यह अपनी शुण्डाग्र से मृदंग का नाद उपस्थित करेगा और जब तुम लास्य करोगी तो यह अपने पैरों में लगे घुंघरूओं को बजाते हुए तुम्हारे साथ सुर ताल मिलायेगा। देखो नारद तुम्बरु से वीणा वादन में हार रहा है। ब्रह्मा का पुत्र है परन्तु ब्रह्म शिष्य से हार रहा है। हे आदि सरस्वती स्वरूपा गजम्बिके उसे इतना नहीं मालूम कि वह गणेशोपासना भूल गया है क्योंकि तुमने अपनी विचित्र वीणा जो इस नृत्य गणपति के हाथ में थमा दी है। हे गजप्रिया देखो वह आदि वेद व्यास सिर धुन रहे हैं उन्हें इतना नहीं मालूम कि गणपति ने शिव उवाच को लिपिबद्ध करने के लिए अपना एक दंत तोड़ लिया है अतः इनकी उपासना के बिना अब कोई लेखक नहीं बन सकता, अब कोई नर्तक नहीं बन सकता, अब कोई गायक नहीं बन सकता, अब कोई कवि नहीं बन सकता, अब कोई वैज्ञानिक नहीं बन सकता, अब कोई जोड़-तोड़कर कुछ नहीं बना सकता।
@Sanatan
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शंकरं प्रेमपिण्डम् (४)
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यह तो सृष्टि के प्रथम वैज्ञानिक हैं क्योंकि तुमने और मैंने मिलकर जोड़-तोड़कर इन्हें गज-मुख बनाया है, एक अद्भुत समायोजन किया। है गज की उम्र भी 120 वर्ष और मनुष्य की उम्र भी 120 वर्ष, गज का मुख और मनुष्य का शरीर इन दोनों का अद्भुत समायोजन करके ही हमने प्रथम गणेश विज्ञान का निर्माण किया है कालान्तर ब्रह्मा ऐसे ही जोड़ तोड़कर पता नहीं क्या- क्या बनायेगा पर उसे भी गज मुख अपने यहाँ स्थापित करने पड़ेंगे। समस्त लोकों में चाहे इन्द्रलोक हो, ब्रह्म लोक हो, गौ लोक हो, विष्णु लोक हो, देवी तीर्थ हो, सिद्ध लोक हो इत्यादि सब जगह सबने गणपति को विराजमान किया है, उनकी उपासना की क्योंकि संसार का प्रत्येक कर्म प्रथम बार गणपति ने ही सम्पन्न किया है। वे शिव द्वारा रचित प्रथम ज्ञान के साक्षी हैं, वे प्रथम वाणी के साक्षी हैं, वे भगवती त्रिपुर सुन्दरी के प्रथम सौन्दर्य के साक्षी हैं वे शिव की प्रचण्डता के साक्षी हैं अतः मूलरूपी गणपति की उपासना के अभाव में चारों तरफ विघ्न ही विघ्न हैं। गणपति इसलिए गंभीर हैं क्योंकि उन्होंने जो देखा, उन्होंने जो सुना वह किसी ने नहीं देखा, किसी ने नहीं सुना किसी ने अनुभूत नहीं किया।
शिव शासनत: शिव शासनत:
@Sanatan
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यह तो सृष्टि के प्रथम वैज्ञानिक हैं क्योंकि तुमने और मैंने मिलकर जोड़-तोड़कर इन्हें गज-मुख बनाया है, एक अद्भुत समायोजन किया। है गज की उम्र भी 120 वर्ष और मनुष्य की उम्र भी 120 वर्ष, गज का मुख और मनुष्य का शरीर इन दोनों का अद्भुत समायोजन करके ही हमने प्रथम गणेश विज्ञान का निर्माण किया है कालान्तर ब्रह्मा ऐसे ही जोड़ तोड़कर पता नहीं क्या- क्या बनायेगा पर उसे भी गज मुख अपने यहाँ स्थापित करने पड़ेंगे। समस्त लोकों में चाहे इन्द्रलोक हो, ब्रह्म लोक हो, गौ लोक हो, विष्णु लोक हो, देवी तीर्थ हो, सिद्ध लोक हो इत्यादि सब जगह सबने गणपति को विराजमान किया है, उनकी उपासना की क्योंकि संसार का प्रत्येक कर्म प्रथम बार गणपति ने ही सम्पन्न किया है। वे शिव द्वारा रचित प्रथम ज्ञान के साक्षी हैं, वे प्रथम वाणी के साक्षी हैं, वे भगवती त्रिपुर सुन्दरी के प्रथम सौन्दर्य के साक्षी हैं वे शिव की प्रचण्डता के साक्षी हैं अतः मूलरूपी गणपति की उपासना के अभाव में चारों तरफ विघ्न ही विघ्न हैं। गणपति इसलिए गंभीर हैं क्योंकि उन्होंने जो देखा, उन्होंने जो सुना वह किसी ने नहीं देखा, किसी ने नहीं सुना किसी ने अनुभूत नहीं किया।
शिव शासनत: शिव शासनत:
@Sanatan
👍9🙏5❤1😁1🤩1
चांद्रायण साधना आध्यात्मिक कायाकल्प की साधना🙏
अब तक.... ,
कल्प साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्धारण किया गया है जो सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं । इनमें एक बिंदुयोग दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिंदुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है।
अभी हम सभी द्वितीय योग नादयोग को समझेंगे.....
दूसरी साधना नादयोग की है। यह सूक्ष्म कर्णइन्द्रियों द्वारा संपन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि ही सुन पाते हैं किंतु सूक्ष्म कौंद्रिय में श्रवणातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने की भी क्षमता है। प्रकृति का मूल 'शब्द' है। वह अनादिकाल में 'ॐ कार' के ध्वनि गुंजन से ही विकसित हुआ है उसकी समस्त गतिविधियाँ परमाणुओं के अंतराल में चलने वाली हलचलों और तरंगों के प्रवाहों पर अवलंबित दीखती हैं। यदि उससे भी गहराई में उतरा जा सके तो प्रतीत होगा कि चरम मूल तक पहुँचते-पहुँचते मात्र शब्द गुंजन ही शेष रह जाताहै। ॐ कार एवं उसके परिकर की अन्यान्य ध्वनियाँ उस समस्त विश्व ब्रह्मांड की भूतकालीन घटनाओं वर्तमान की परिस्थितियों तथा भावी संभावनाओं का सारा ढाँचा इन्हीं चित्र-विचित्र स्तर की ध्वनि तरंगों पर खड़ा पाया जाता है। प्रकाश, ऊर्जा आदि की अन्यान्य तरंगें तो ध्वनि की परिणति एवं सहचरी मात्र हैं। नादयोग में इन्हीं को सुननेसमझने का अभ्यास किया जाता है ताकि उस आधार पर अपनी आंतरिक स्थिति का विश्लेषण पर्यवेक्षण किया जा सके एवं प्रकृति में चल रही सामयिक हलचलों का आधारभूत कारण समझकर अपनी ज्ञान परिधि को अत्यधिक, व्यापक बनाया जा सके एवं भूतकाल के स्मृति-कंपनों और भविष्य में घटित होने वाले प्रकरणों का पूर्वाभास-उपलब्ध हो सके। नादयोग की शब्द साधना को 'कालजयी' कहा जाता है। उस आधार पर हम इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले सर्वविदित प्रचलन से छलांग लगाकर दिव्य ध्वनियों के माध्यम से अपनी ज्ञान संपदा को न केवल अधिक प्रखर वरन उच्चस्तरीय भी बना सकते हैं।ऋषियों को दृष्टा, त्रिकाल दर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थीं। यह चरम परिणति की चर्चा हुई। सामान्य स्तर पर भी नादयोग की आंरभिक साधना परा प्रकृति और कायगत तत्त्व प्रपंच के साथ संगति बिठाती है और अदृश्य क्षेत्र के साथ आदान-प्रदान के नए द्वार खोलती है।
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
संदर्भ :
📕वांग्मय ७ प्रसुप्ति से जगृति की ओर
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
अब तक.... ,
कल्प साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्धारण किया गया है जो सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं । इनमें एक बिंदुयोग दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिंदुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है।
अभी हम सभी द्वितीय योग नादयोग को समझेंगे.....
दूसरी साधना नादयोग की है। यह सूक्ष्म कर्णइन्द्रियों द्वारा संपन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि ही सुन पाते हैं किंतु सूक्ष्म कौंद्रिय में श्रवणातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने की भी क्षमता है। प्रकृति का मूल 'शब्द' है। वह अनादिकाल में 'ॐ कार' के ध्वनि गुंजन से ही विकसित हुआ है उसकी समस्त गतिविधियाँ परमाणुओं के अंतराल में चलने वाली हलचलों और तरंगों के प्रवाहों पर अवलंबित दीखती हैं। यदि उससे भी गहराई में उतरा जा सके तो प्रतीत होगा कि चरम मूल तक पहुँचते-पहुँचते मात्र शब्द गुंजन ही शेष रह जाताहै। ॐ कार एवं उसके परिकर की अन्यान्य ध्वनियाँ उस समस्त विश्व ब्रह्मांड की भूतकालीन घटनाओं वर्तमान की परिस्थितियों तथा भावी संभावनाओं का सारा ढाँचा इन्हीं चित्र-विचित्र स्तर की ध्वनि तरंगों पर खड़ा पाया जाता है। प्रकाश, ऊर्जा आदि की अन्यान्य तरंगें तो ध्वनि की परिणति एवं सहचरी मात्र हैं। नादयोग में इन्हीं को सुननेसमझने का अभ्यास किया जाता है ताकि उस आधार पर अपनी आंतरिक स्थिति का विश्लेषण पर्यवेक्षण किया जा सके एवं प्रकृति में चल रही सामयिक हलचलों का आधारभूत कारण समझकर अपनी ज्ञान परिधि को अत्यधिक, व्यापक बनाया जा सके एवं भूतकाल के स्मृति-कंपनों और भविष्य में घटित होने वाले प्रकरणों का पूर्वाभास-उपलब्ध हो सके। नादयोग की शब्द साधना को 'कालजयी' कहा जाता है। उस आधार पर हम इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले सर्वविदित प्रचलन से छलांग लगाकर दिव्य ध्वनियों के माध्यम से अपनी ज्ञान संपदा को न केवल अधिक प्रखर वरन उच्चस्तरीय भी बना सकते हैं।ऋषियों को दृष्टा, त्रिकाल दर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थीं। यह चरम परिणति की चर्चा हुई। सामान्य स्तर पर भी नादयोग की आंरभिक साधना परा प्रकृति और कायगत तत्त्व प्रपंच के साथ संगति बिठाती है और अदृश्य क्षेत्र के साथ आदान-प्रदान के नए द्वार खोलती है।
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
संदर्भ :
📕वांग्मय ७ प्रसुप्ति से जगृति की ओर
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
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चांद्रायण साधना आध्यात्मिक कायाकल्प की साधना🙏
अब तक....
कल्प साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्धारण किया गया है जो सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं। इनमें एक *बिंदुयोग दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिंदुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है।
अभी हम सभी तृतीय योग लययोग को समझेंगे.....
कल्प साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग है इसमें शरीराभ्यास को आत्मसत्ता के साथ समर्पित विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा को उसके स्वरूपलक्ष्य एवं उत्तरादायित्व को तो एक प्रकार से विस्तृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भवबंधन आदि नामों से पुकारते हैं। यदि अपना स्वरूप समझा जा सके क्षमताओं का अनुमान लग सके, लक्ष्य का स्मरण आ सके और भावी संभावनाओं की सुखद कल्पना उठ सके तो मनुष्य निश्चय ही वर्तमान की मृगतृष्णा, भटकन विसंगति, दुर्गति से ऊँचा उठकर उस महान के साथ संयुक्त होता है जिसकी विवेचना आत्मबोध स्वर्ग लक्ष्य बोध ईश्वर दर्शन दिव्य जीवन आदि नाम के साथ की जाती है। पुरुष से पुरुषोत्तम नर से नारायण क्षुद्र से महान, अर्द्ध मृतक से अमर होने की बात इसी स्थिति के संबंध में कही जाती है। जिसमें शरीरभ्यास को आत्मानुभूति के रूप में परिणत किया जाता है। इस प्रयास को महान साहसपरम पुरुषार्थ एवं चरम सौभाग्य कहा जाता है।
ध्यान मुद्रा में बैठकर दर्पण को सामने रखा जाता है। अपने चेहरे पर सज्जा सौंदर्य की नहीं एक विशेष दृष्टि डाली जाती है कि इस मांसपिंड के भीतर सृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मसत्ता विद्यमान है। वही इस काया की अधिष्ठात्री है। उसी का उत्कर्ष परम लक्ष्य है। काया उसी प्रयोजन की पूर्ति का वाहन साधन उपकरण मात्र है। शरीर की सार्थकता आत्मा के प्रति वफादारजिम्मेदार और ईमानदार रहने में ही है। आत्मा काया का पोषण तो सही रूप से करे पर साथ ही यह भी ध्यान रखे कि उसे उच्छेखल बनाने वाली वासना, तृष्णा अहंता के आक्रमण से सुरक्षा का प्रबंध भी होता रहे। जीवन यज्ञ है। इसे नष्ट करने वाले सुबाहु मारीच और ताड़का से तुलना इन्हीं उपरोक्त दानवी महत्वाकांक्षाओं से की गई है जो विनाश और पतन के सरंजाम ही रचती रहती हैं।
कल्प-साधना में उपरोक्त तीनों साधनों को न केवल अनिवार्य माना गया है वरन सरल भी बनाया गया है। दीपक और सूर्य के स्थान पर नीलाभ विद्युत दीप साधकों के हर कमरे में लगाए गए हैं। नादयोग का आरंभिक अभ्यास करने के लिए टैप रिकार्डर के माध्यम से उपयोगी स्वर लहरियाँ सुनाई जाती हैं ताकि सूक्ष्म नाद को अधिक स्पष्ट होने का मार्ग खुले। उपयुक्त साइज का दर्पण हर कमरे में पहले से ही रखा मिलता है। तीनों साधनाएँ आरंभिक स्तर के साधक भी सरलतापूर्वक चला सकें इसके लिए यथा संभव अधिकाधिक सुविधा सरलता उत्पन्न की गई है। व्यवस्था ऐसी है। जिसमें उपरोक्त तीनों योगाभ्यास साधनाएँ बिना किसी कठिनाई के आरंभ की जा सकें। वे जैसे-जैसे विकसित-परिपक्व होती हैं वैसे वैसे अपने सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष करती चली जाती हैं।🙏
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
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📕वांग्मय ७ प्रसुप्ति से जगृति की ओर
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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कल्प साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्धारण किया गया है जो सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं। इनमें एक *बिंदुयोग दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिंदुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है।
अभी हम सभी तृतीय योग लययोग को समझेंगे.....
कल्प साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग है इसमें शरीराभ्यास को आत्मसत्ता के साथ समर्पित विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा को उसके स्वरूपलक्ष्य एवं उत्तरादायित्व को तो एक प्रकार से विस्तृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भवबंधन आदि नामों से पुकारते हैं। यदि अपना स्वरूप समझा जा सके क्षमताओं का अनुमान लग सके, लक्ष्य का स्मरण आ सके और भावी संभावनाओं की सुखद कल्पना उठ सके तो मनुष्य निश्चय ही वर्तमान की मृगतृष्णा, भटकन विसंगति, दुर्गति से ऊँचा उठकर उस महान के साथ संयुक्त होता है जिसकी विवेचना आत्मबोध स्वर्ग लक्ष्य बोध ईश्वर दर्शन दिव्य जीवन आदि नाम के साथ की जाती है। पुरुष से पुरुषोत्तम नर से नारायण क्षुद्र से महान, अर्द्ध मृतक से अमर होने की बात इसी स्थिति के संबंध में कही जाती है। जिसमें शरीरभ्यास को आत्मानुभूति के रूप में परिणत किया जाता है। इस प्रयास को महान साहसपरम पुरुषार्थ एवं चरम सौभाग्य कहा जाता है।
ध्यान मुद्रा में बैठकर दर्पण को सामने रखा जाता है। अपने चेहरे पर सज्जा सौंदर्य की नहीं एक विशेष दृष्टि डाली जाती है कि इस मांसपिंड के भीतर सृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मसत्ता विद्यमान है। वही इस काया की अधिष्ठात्री है। उसी का उत्कर्ष परम लक्ष्य है। काया उसी प्रयोजन की पूर्ति का वाहन साधन उपकरण मात्र है। शरीर की सार्थकता आत्मा के प्रति वफादारजिम्मेदार और ईमानदार रहने में ही है। आत्मा काया का पोषण तो सही रूप से करे पर साथ ही यह भी ध्यान रखे कि उसे उच्छेखल बनाने वाली वासना, तृष्णा अहंता के आक्रमण से सुरक्षा का प्रबंध भी होता रहे। जीवन यज्ञ है। इसे नष्ट करने वाले सुबाहु मारीच और ताड़का से तुलना इन्हीं उपरोक्त दानवी महत्वाकांक्षाओं से की गई है जो विनाश और पतन के सरंजाम ही रचती रहती हैं।
कल्प-साधना में उपरोक्त तीनों साधनों को न केवल अनिवार्य माना गया है वरन सरल भी बनाया गया है। दीपक और सूर्य के स्थान पर नीलाभ विद्युत दीप साधकों के हर कमरे में लगाए गए हैं। नादयोग का आरंभिक अभ्यास करने के लिए टैप रिकार्डर के माध्यम से उपयोगी स्वर लहरियाँ सुनाई जाती हैं ताकि सूक्ष्म नाद को अधिक स्पष्ट होने का मार्ग खुले। उपयुक्त साइज का दर्पण हर कमरे में पहले से ही रखा मिलता है। तीनों साधनाएँ आरंभिक स्तर के साधक भी सरलतापूर्वक चला सकें इसके लिए यथा संभव अधिकाधिक सुविधा सरलता उत्पन्न की गई है। व्यवस्था ऐसी है। जिसमें उपरोक्त तीनों योगाभ्यास साधनाएँ बिना किसी कठिनाई के आरंभ की जा सकें। वे जैसे-जैसे विकसित-परिपक्व होती हैं वैसे वैसे अपने सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष करती चली जाती हैं।🙏
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
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📕वांग्मय ७ प्रसुप्ति से जगृति की ओर
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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तीन दुःख और उनका कारण
🌔🌙🌔 〰〰〰〰〰〰〰〰〰
आकस्मिक सुख-दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इनसे सुर-मुनि, देव-दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म-गति से छूट न सके।
सूरदास ने ठीक कहा है-
कर्मगति टारे नाहि टरे।।
गुरु वसिष्ठ पंडित बड़ ज्ञानी रचि पचि लगन धेरै।
पिता मरण और हरण सिया को,वन में विपत्ति परै॥
वसिष्ठ जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करनी पड़ीं। यह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात टूट पड़ती हैं या ईश्वर नाराज होकर दुःख दंड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। 'पंचाध्यायी' का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुःख अपने ही बुलाने से आते हैं। रामायण का मत भी इस संबंध में यही है- -
काहु न कोउ दुःख सुखकर दाता ।
निज निज कर्म भोग सब भ्राता ।।
दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुःख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते-चिल्लाते रहते हैं, जीव की पीछे से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई हैं, जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है, उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे-पीछे एक रेखा-सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती हैं,जो काम हम करते हैं, उनके संस्कार बनते जाते हैं। बुरे कर्मों के संस्कार स्वयं बोई हुई कँटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुःखदाई बन जाते हैं।
अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के स्वभाव एवं तीन तरह के फल की चर्चा आरंभ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है, इसलिए सुख प्राप्त होना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुःख में होता है। दुःख से ही लोग डरते- घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुःखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्ध के शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख-वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुःख निवृत्ति के लिए, रोगा का निवारण करने के लिए उसका निदान और चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्त करने से दुःखों का मर्म समझ में आता है। दुःखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुःखों से निवृत्ति हो जाती है।
कल के स्वाध्याय में हम सभी दुःखों का स्वरूप जानने का प्रयत्न करें।
संदर्भ :
पुस्तक:- गहना कर्मणोगतिः
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
🌔🌙🌔 〰〰〰〰〰〰〰〰〰
आकस्मिक सुख-दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इनसे सुर-मुनि, देव-दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म-गति से छूट न सके।
सूरदास ने ठीक कहा है-
कर्मगति टारे नाहि टरे।।
गुरु वसिष्ठ पंडित बड़ ज्ञानी रचि पचि लगन धेरै।
पिता मरण और हरण सिया को,वन में विपत्ति परै॥
वसिष्ठ जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करनी पड़ीं। यह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात टूट पड़ती हैं या ईश्वर नाराज होकर दुःख दंड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। 'पंचाध्यायी' का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुःख अपने ही बुलाने से आते हैं। रामायण का मत भी इस संबंध में यही है- -
काहु न कोउ दुःख सुखकर दाता ।
निज निज कर्म भोग सब भ्राता ।।
दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुःख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते-चिल्लाते रहते हैं, जीव की पीछे से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई हैं, जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है, उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे-पीछे एक रेखा-सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती हैं,जो काम हम करते हैं, उनके संस्कार बनते जाते हैं। बुरे कर्मों के संस्कार स्वयं बोई हुई कँटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुःखदाई बन जाते हैं।
अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के स्वभाव एवं तीन तरह के फल की चर्चा आरंभ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है, इसलिए सुख प्राप्त होना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुःख में होता है। दुःख से ही लोग डरते- घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुःखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्ध के शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख-वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुःख निवृत्ति के लिए, रोगा का निवारण करने के लिए उसका निदान और चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्त करने से दुःखों का मर्म समझ में आता है। दुःखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुःखों से निवृत्ति हो जाती है।
कल के स्वाध्याय में हम सभी दुःखों का स्वरूप जानने का प्रयत्न करें।
संदर्भ :
पुस्तक:- गहना कर्मणोगतिः
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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तीन दुख और उनका कारण
कल के स्वाध्याय मे हम सब जाने कि
दुःख तीन प्रकार के होते हैं-
(१) दैविक,
(२) दैहिक,
(३) भौतिक ।
आज हम सभी दैहिक दुःख और भौतिक दुःख के बारे में पढ़ेंगे.....
दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरांत अब दैहिक- शारीरिक कष्टों का कारण समझना चाहिए। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है। इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यंत निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरूप संभव है कि वह अगले जन्म में नपुंसक हो जाए। यह नपुंसकता केवल कठोर दंड नहीं है वरन सुधार का एक उत्तम तरीका भी है। कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिए वह सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों के शारीरिक लाभ के लिए पापपूर्ण, अमर्यादित, अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म से ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिए सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिए फिर तरोताजा हो जाता है, साथ ही मानसिक दुःख मिलने से मन का पाप भार भी धुल जाता है।
मानसिक पाप भी जिस शारीरिक पाप के साथ घुला मिला होता है, वह यदि राजदंड, समाज दंड या प्रायश्चित द्वारा इस जन्म से शोधित न हुआ, तो अगले जन्म के लिए जाता है, परंतु यदि पाप केवल शारीरिक है या उनमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है, जैसे नशा पिया-उन्माद आया। विष खाया मृत्यु हुई। आहार-विहार में गड़बड़ी हुई, बीमार पड़े। इस तरह शरीर अपने साधारण दोषों की सफाई जल्दी-जल्दी कर लेता है और इस जन्म का भुगतान इस जन्म में कर जाता है, परंतु गंभीर शारीरिक दुर्गुण, जिसमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।
३) भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप हैं। संपूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बँधी हुई है । विश्वव्यापी जीव तत्व एक है। आत्मा सर्वव्यापी है जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमण्डल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गंध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है, इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिए दूसरा भी जिम्मेदार है। एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता-पिता को लज्जित करता है, अपने घर व कुटुम्ब को शर्मिंदा करता है। वे इसलिए शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्तव्य भी बँधा हुआ है। अपने पुत्र, कुटुम्बी या घर वाले को सुशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुम्बियों की भी है। कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी, परंतु कुटुम्बियों की आत्मा स्वयमेव ही शर्मिंदा होगी, क्योंकि उनकी गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं। सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक-दूसरे की हीनता के लिए जिम्मेदार है। पड़ौसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ौसी खड़ा खड़ा तमाशा देखे, तो कुछ देर बाद उसका भी घर जल सकता है। कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और सामर्थ्य होते हुए भी उसे रोकने का प्रयास न करे, तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार वह भी दण्डनीय समझा जाएगा।
निष्कर्ष :
यदि पाप केवल शारीरिक है या उनमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है। जैसेः आहार-विहार में गड़बड़ी हुई, बीमार पड़े।परंतु गंभीर शारीरिक दुर्गुण, जिसमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।और अगले जन्म मे उन पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं।
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
संदर्भ :
📕📔 गहना कर्मणोगति:
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
कल के स्वाध्याय मे हम सब जाने कि
दुःख तीन प्रकार के होते हैं-
(१) दैविक,
(२) दैहिक,
(३) भौतिक ।
आज हम सभी दैहिक दुःख और भौतिक दुःख के बारे में पढ़ेंगे.....
दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरांत अब दैहिक- शारीरिक कष्टों का कारण समझना चाहिए। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है। इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यंत निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरूप संभव है कि वह अगले जन्म में नपुंसक हो जाए। यह नपुंसकता केवल कठोर दंड नहीं है वरन सुधार का एक उत्तम तरीका भी है। कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिए वह सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों के शारीरिक लाभ के लिए पापपूर्ण, अमर्यादित, अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म से ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिए सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिए फिर तरोताजा हो जाता है, साथ ही मानसिक दुःख मिलने से मन का पाप भार भी धुल जाता है।
मानसिक पाप भी जिस शारीरिक पाप के साथ घुला मिला होता है, वह यदि राजदंड, समाज दंड या प्रायश्चित द्वारा इस जन्म से शोधित न हुआ, तो अगले जन्म के लिए जाता है, परंतु यदि पाप केवल शारीरिक है या उनमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है, जैसे नशा पिया-उन्माद आया। विष खाया मृत्यु हुई। आहार-विहार में गड़बड़ी हुई, बीमार पड़े। इस तरह शरीर अपने साधारण दोषों की सफाई जल्दी-जल्दी कर लेता है और इस जन्म का भुगतान इस जन्म में कर जाता है, परंतु गंभीर शारीरिक दुर्गुण, जिसमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।
३) भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप हैं। संपूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बँधी हुई है । विश्वव्यापी जीव तत्व एक है। आत्मा सर्वव्यापी है जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमण्डल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गंध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है, इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिए दूसरा भी जिम्मेदार है। एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता-पिता को लज्जित करता है, अपने घर व कुटुम्ब को शर्मिंदा करता है। वे इसलिए शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्तव्य भी बँधा हुआ है। अपने पुत्र, कुटुम्बी या घर वाले को सुशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुम्बियों की भी है। कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी, परंतु कुटुम्बियों की आत्मा स्वयमेव ही शर्मिंदा होगी, क्योंकि उनकी गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं। सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक-दूसरे की हीनता के लिए जिम्मेदार है। पड़ौसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ौसी खड़ा खड़ा तमाशा देखे, तो कुछ देर बाद उसका भी घर जल सकता है। कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और सामर्थ्य होते हुए भी उसे रोकने का प्रयास न करे, तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार वह भी दण्डनीय समझा जाएगा।
निष्कर्ष :
यदि पाप केवल शारीरिक है या उनमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है। जैसेः आहार-विहार में गड़बड़ी हुई, बीमार पड़े।परंतु गंभीर शारीरिक दुर्गुण, जिसमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।और अगले जन्म मे उन पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं।
क्रमशः कल के स्वाध्याय मे......
संदर्भ :
📕📔 गहना कर्मणोगति:
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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तीन दुख और उनका कारण
🌔🌙🌔 〰〰〰〰〰〰〰〰〰
कल के स्वाध्याय मे हम सब जाने कि
दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (१) दैविक, (२) दैहिक, (३) भौतिक ।
आज हम सभी भौतिक दुःख के बारे में और विस्तार से पढ़ेंगे.....
ईश्वरीय नियम है हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिए भरसक प्रयत्न करे। यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करती, तो उसे भी दूसरों का पाप लगता है। उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।
देखा जाता है कि अन्याय करने वाले अमीरों की अपेक्षा मूक पशु की तरह जीवन बिताने वाले भोले-भाले लोगों पर दैवी प्रकोप अधिक होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि का कष्ट गरीब किसानों को ही अधिक सहन करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक बड़ा पापी होता है। कहते हैं कि "बुजदिल जालिम का बाप होता है।" कायरता में यह गुण है कि वह अपने ऊपर जुल्म करने के लिए किसी न किसी को न्यौत बुलाता है। भेड़ की ऊन गड़रिया छोड़ देगा तो दूसरा कोई न कोई उसे काट लेगा। कायरता, कमजोरी, अविद्या स्वयं बड़े भारी पातक हैं। ऐसे पातकियों पर यदि भौतिक कोप अधिक आए तो कुछ आश्यर्च नहीं? संभव है उनकी कायरता को दूर करने एवं स्वाभाविक सतेजता जगाकर निष्पाप बना देने के लिए अदृश्य सत्ता द्वारा यह घटनाएँ उपस्थित होती हों। यह भौतिक दुर्घनाएँ सृष्टि के दोष नहीं हैं वरन् अपने ही दोष हैं। अग्नि में तपाकर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार कृपापूर्वक आया करते हैं और संसार को जोरदार चेतावनी देकर सामाजिक निष्पापता बढ़ाने का आदेश दिया करते हैं।
निष्कर्ष :
भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप है। और इन्ही सामाजिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।
संदर्भ :
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✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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कल के स्वाध्याय मे हम सब जाने कि
दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (१) दैविक, (२) दैहिक, (३) भौतिक ।
आज हम सभी भौतिक दुःख के बारे में और विस्तार से पढ़ेंगे.....
ईश्वरीय नियम है हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिए भरसक प्रयत्न करे। यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करती, तो उसे भी दूसरों का पाप लगता है। उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।
देखा जाता है कि अन्याय करने वाले अमीरों की अपेक्षा मूक पशु की तरह जीवन बिताने वाले भोले-भाले लोगों पर दैवी प्रकोप अधिक होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि का कष्ट गरीब किसानों को ही अधिक सहन करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक बड़ा पापी होता है। कहते हैं कि "बुजदिल जालिम का बाप होता है।" कायरता में यह गुण है कि वह अपने ऊपर जुल्म करने के लिए किसी न किसी को न्यौत बुलाता है। भेड़ की ऊन गड़रिया छोड़ देगा तो दूसरा कोई न कोई उसे काट लेगा। कायरता, कमजोरी, अविद्या स्वयं बड़े भारी पातक हैं। ऐसे पातकियों पर यदि भौतिक कोप अधिक आए तो कुछ आश्यर्च नहीं? संभव है उनकी कायरता को दूर करने एवं स्वाभाविक सतेजता जगाकर निष्पाप बना देने के लिए अदृश्य सत्ता द्वारा यह घटनाएँ उपस्थित होती हों। यह भौतिक दुर्घनाएँ सृष्टि के दोष नहीं हैं वरन् अपने ही दोष हैं। अग्नि में तपाकर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार कृपापूर्वक आया करते हैं और संसार को जोरदार चेतावनी देकर सामाजिक निष्पापता बढ़ाने का आदेश दिया करते हैं।
निष्कर्ष :
भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप है। और इन्ही सामाजिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।
संदर्भ :
📕गहना कर्मणोगति:
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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कर्मों की तीन श्रेणियाँ
(१) संचित (२) प्रारब्ध और (३) क्रियमाण , इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। मनुष्य की अंतः चेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव न करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भले-बुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।
१) संचित👉
दिन भर के कामों का यदि निरीक्षण किया जाय, तो वे तीन श्रेणियों में बाँट देने पड़ेंगे। कुछ तो ऐसे होते हैं, जो बिना जानकारी में होते हैं । जैसे बुरे लोगों के मुहल्ले में या सत्संग में रहने से उनका प्रभाव किसी न किसी अंश में गुप्त रूप से अपने ऊपर पड़ जाता है। यह प्रभाव पड़ा तो परंतु हमने उसे इच्छापूर्वक स्वीकार नहीं किया इसलिए वह हल्का, निर्बल एवं कम प्रभाव वाला होकर हमारी भीतरी चेतना के एक कोने में पड़ा रहा, ऐसे हीन वीर्य संस्कार वाले, संचित कर्म कहे जाते हैं। जो कार्य विवशता में दबाए जाने पर, असहाय अवस्था में करने तो पड़ें, पर मन की आंतरिक इच्छा यही रही कि यदि विवशता न होती, तो इस काम को मैं कदापि न करता । इस तरह लाचारी से जो काम करना पड़े और मन जिनके विरुद्ध विद्रोह करता रहा एवं उस काम को स्वभाव बनाकर अपना नहीं लिया, तो उस कार्य का संस्कार भी हल्का, अल्प वीर्य और कम प्रभाव वाला होता है।
ऐसे काम भी संचित कर्म के ही श्रेणी में आते हैं। इन संचित कर्मों के संस्कार बहुत कमजोर एवं हल्के होते हैं, इसलिए वे मनोभूमि के किसी अज्ञात कोने में सिमटे हुए हजारों वर्ष तक पड़े रहतें हैं, यदि इन्हें प्रकट होने के कोई अच्छा अवसर न मिले, तो यों ही दबे दबाए पड़े रहते हैं, किंतु यदि उसी प्रकार के बुरे कर्म कभी जानबूझ कर स्वेच्छा से, विशेष मनोयोग के साथ किए गए, तो वे सड़े-गले संचित संस्कार भी कुलबुलाने लगते हैं । जैसे अच्छे घोड़ों के झुण्ड में पड़कर लँगड़े घोड़े भी चलने लगते हैं, वैसे ही वे भी कब्र में से निकल कर जीवित हो जाते हैं। जिस प्रकार घुना हुआ बीज भी अच्छी भूमि और अच्छी वर्षा पाकर उग आता है, वैसा ही संचित संस्कार भी अपनी जाति के बलवान कर्मों की सहायता पाकर उग आते हैं। हिमायत पाकर उनकी हिम्मत दूनी हो जाती है, परंतु यदि उन संचित संस्कारों को लगातार विपरीत स्वभाव के बलवान कर्म संस्कारों के साथ रहना पड़े, तो वे नष्ट भी हो जाते हैं । गर्म जगह में रखा हुआ एक घड़ा पानी गर्मी के प्रभाव से आखिर एक-दो महीने में सूख ही जाता है, इसी प्रकार उत्तम कर्मों के संस्कार जमा हो रहे हों, तो वे बेचारे बुरे संस्कार उनकी गर्मी में जलकर नष्ट भी हो जाते हैं। धर्म ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि तीर्थयात्रा आदि अमुक शुभ कर्म करने से इतने जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं, असल में वह संकेत इन अल्पवीर्य वाले संचित संस्कारों के सम्बन्ध में ही है। भले और बुरे दोनों ही प्रकार के संचित कर्म संस्कार अनुकूल परिस्थिति पाकर फलदायक होते हैं एवं तीव्र प्रतिकूल परिस्थितियों में नष्ट भी हो जाते हैं।
कल के स्वाध्याय मे हम सब प्रारब्ध कर्म के बारे में पढेंगे...
संदर्भ : गहना कर्मणोगति: 📕
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
(१) संचित (२) प्रारब्ध और (३) क्रियमाण , इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। मनुष्य की अंतः चेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव न करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भले-बुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।
१) संचित👉
दिन भर के कामों का यदि निरीक्षण किया जाय, तो वे तीन श्रेणियों में बाँट देने पड़ेंगे। कुछ तो ऐसे होते हैं, जो बिना जानकारी में होते हैं । जैसे बुरे लोगों के मुहल्ले में या सत्संग में रहने से उनका प्रभाव किसी न किसी अंश में गुप्त रूप से अपने ऊपर पड़ जाता है। यह प्रभाव पड़ा तो परंतु हमने उसे इच्छापूर्वक स्वीकार नहीं किया इसलिए वह हल्का, निर्बल एवं कम प्रभाव वाला होकर हमारी भीतरी चेतना के एक कोने में पड़ा रहा, ऐसे हीन वीर्य संस्कार वाले, संचित कर्म कहे जाते हैं। जो कार्य विवशता में दबाए जाने पर, असहाय अवस्था में करने तो पड़ें, पर मन की आंतरिक इच्छा यही रही कि यदि विवशता न होती, तो इस काम को मैं कदापि न करता । इस तरह लाचारी से जो काम करना पड़े और मन जिनके विरुद्ध विद्रोह करता रहा एवं उस काम को स्वभाव बनाकर अपना नहीं लिया, तो उस कार्य का संस्कार भी हल्का, अल्प वीर्य और कम प्रभाव वाला होता है।
ऐसे काम भी संचित कर्म के ही श्रेणी में आते हैं। इन संचित कर्मों के संस्कार बहुत कमजोर एवं हल्के होते हैं, इसलिए वे मनोभूमि के किसी अज्ञात कोने में सिमटे हुए हजारों वर्ष तक पड़े रहतें हैं, यदि इन्हें प्रकट होने के कोई अच्छा अवसर न मिले, तो यों ही दबे दबाए पड़े रहते हैं, किंतु यदि उसी प्रकार के बुरे कर्म कभी जानबूझ कर स्वेच्छा से, विशेष मनोयोग के साथ किए गए, तो वे सड़े-गले संचित संस्कार भी कुलबुलाने लगते हैं । जैसे अच्छे घोड़ों के झुण्ड में पड़कर लँगड़े घोड़े भी चलने लगते हैं, वैसे ही वे भी कब्र में से निकल कर जीवित हो जाते हैं। जिस प्रकार घुना हुआ बीज भी अच्छी भूमि और अच्छी वर्षा पाकर उग आता है, वैसा ही संचित संस्कार भी अपनी जाति के बलवान कर्मों की सहायता पाकर उग आते हैं। हिमायत पाकर उनकी हिम्मत दूनी हो जाती है, परंतु यदि उन संचित संस्कारों को लगातार विपरीत स्वभाव के बलवान कर्म संस्कारों के साथ रहना पड़े, तो वे नष्ट भी हो जाते हैं । गर्म जगह में रखा हुआ एक घड़ा पानी गर्मी के प्रभाव से आखिर एक-दो महीने में सूख ही जाता है, इसी प्रकार उत्तम कर्मों के संस्कार जमा हो रहे हों, तो वे बेचारे बुरे संस्कार उनकी गर्मी में जलकर नष्ट भी हो जाते हैं। धर्म ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि तीर्थयात्रा आदि अमुक शुभ कर्म करने से इतने जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं, असल में वह संकेत इन अल्पवीर्य वाले संचित संस्कारों के सम्बन्ध में ही है। भले और बुरे दोनों ही प्रकार के संचित कर्म संस्कार अनुकूल परिस्थिति पाकर फलदायक होते हैं एवं तीव्र प्रतिकूल परिस्थितियों में नष्ट भी हो जाते हैं।
कल के स्वाध्याय मे हम सब प्रारब्ध कर्म के बारे में पढेंगे...
संदर्भ : गहना कर्मणोगति: 📕
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
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गुरु का मानस पूजा क्या है ? और कैसे करते हैं ?
वैसे तो गुरु को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं इसलिए पुराणों में मानस पूजा का विषेश महत्व दिया गया है | मानस पूजा में भक्त अपने इष्टदेव को मुक्त मणियों से मण्डित कर स्वर्ण सिंघासन पर विराजमान कराता है | स्वर्गलोक की मन्दाकिनी गंगा के जलसे अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौ के दूध से पंचामृत निर्माण करता है वस्त्राभूषण भी दिव्य अलौकिक होते हैं | पृथ्वी रूपी गंध का अनुलोपन करता है | अपने अराध्य के लिए कुबेर की पुष्प वाटिका से स्वर्ण कमल पुष्पों का चयन करता है | भावना से वायु रूपी धुप, अग्नि रुपी दीपक तथा अमृत रूपी नैवेद्य भगवान् को अर्पण करने की विधि है|
इसके साथ ही त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु सभी उपचार सच्चिदानंदघन परमात्मप्रभु के चरणों में भावना से भक्त अर्पण करता है | यह है मानसपूजा का स्वरुप | इसकी एक संक्षिप्त विधि भी पुराणों में वर्णित है |
जो इस प्रकार है –
१- ॐ लं पृथिव्यात्मकं गंधं परिकल्पयामी |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं पृथ्वीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ )
२-ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ )
३-ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं वायुदेव के रूप में धुप आपको प्रदान करता हूँ )
४- ॐ रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि |
(हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं अग्निदेव के रूप में दीपक आपको प्रदान करता हूँ )
५- ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि |
(हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ )
६- ॐ सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं सर्वात्माके रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ )
इन मन्त्रों से भावना पूर्वक गुरु मानसपूजा की जा सकती है | गुरु मानसपूजा से चित्त एकाग्र और सरस हो जाता है, इससे बाह्य पूजा में भी रस मिलने लगता है | वैसे तो गुरु मानसपूजा पूजा से बहूत से लोग अभी भी अपरचित हैं | इसे जरूर अपनाना चाहिए |
@Sanatan
वैसे तो गुरु को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं इसलिए पुराणों में मानस पूजा का विषेश महत्व दिया गया है | मानस पूजा में भक्त अपने इष्टदेव को मुक्त मणियों से मण्डित कर स्वर्ण सिंघासन पर विराजमान कराता है | स्वर्गलोक की मन्दाकिनी गंगा के जलसे अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौ के दूध से पंचामृत निर्माण करता है वस्त्राभूषण भी दिव्य अलौकिक होते हैं | पृथ्वी रूपी गंध का अनुलोपन करता है | अपने अराध्य के लिए कुबेर की पुष्प वाटिका से स्वर्ण कमल पुष्पों का चयन करता है | भावना से वायु रूपी धुप, अग्नि रुपी दीपक तथा अमृत रूपी नैवेद्य भगवान् को अर्पण करने की विधि है|
इसके साथ ही त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु सभी उपचार सच्चिदानंदघन परमात्मप्रभु के चरणों में भावना से भक्त अर्पण करता है | यह है मानसपूजा का स्वरुप | इसकी एक संक्षिप्त विधि भी पुराणों में वर्णित है |
जो इस प्रकार है –
१- ॐ लं पृथिव्यात्मकं गंधं परिकल्पयामी |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं पृथ्वीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ )
२-ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ )
३-ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं वायुदेव के रूप में धुप आपको प्रदान करता हूँ )
४- ॐ रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि |
(हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं अग्निदेव के रूप में दीपक आपको प्रदान करता हूँ )
५- ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि |
(हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ )
६- ॐ सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि |
( हे ,सदगुरुदेव जी ! मैं सर्वात्माके रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ )
इन मन्त्रों से भावना पूर्वक गुरु मानसपूजा की जा सकती है | गुरु मानसपूजा से चित्त एकाग्र और सरस हो जाता है, इससे बाह्य पूजा में भी रस मिलने लगता है | वैसे तो गुरु मानसपूजा पूजा से बहूत से लोग अभी भी अपरचित हैं | इसे जरूर अपनाना चाहिए |
@Sanatan
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भक्तिकाल ही पुनर्जागरण काल था जिसे वामियों ने पलायन और भी जाने क्या क्या संज्ञा दी। भारत का पुनर्जागरण राजा राम मोहन राय से नही शुरू होता है यह गोस्वामी तुलसी दास से शुरू होता है जिन्होंने हर हिंदू के मन से मुगलों का भय निकाल कर राम नाम का अभय मंत्र दे दिया। पुनर्जागरण अरबी और अंग्रेजी से नही आया बल्कि अवधी, ब्रज आदि स्थानीय बोली भाषा की सजीवता से आया।
तुलसी बाबा की जब बात होती तो उन्हें एक कवि कह दिया जाता पर उनका एक पक्ष जो आतातायी के विरुद्ध प्रतिकार के लिए जनमानस तैयार करना था वह सामने नही आने दिया गया। अयोध्या जी से राम कथा का आयोजन करना और उसे पूरे देश मे फैला देने के माध्यम से जनजागरूकता और जन जन को एक सूत्र बांध देने का काम मानस के माध्यम से जो बाबा ने किया वह एक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर शोध होना चाहिए।
पराधीनता का इतिहास 200 साल पुराना नही बल्कि हजार साल पुराना है। असली विजय संस्कृति की होती है, तुलसी बाबा यह बात जानते थे, उन्होंने पांच सौ साल पहले ही सांस्कृतिक विजय गाथा लिख दी थी।
तुलसीदास रचित "रामचरितमानस " ने ऐसा भाव जाग्रत किया था कि जब हिन्दू मजदूरों की एक टोली गुलाम रूप में मॉरीशस पहुँची तो उनके पास धार्मिक प्रतीक के रूप में बस तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस थी ।
उन लोगों ने केवल उसी के सहारे स्वयं को हिन्दू रूप में न केवल जीवित रखा बल्कि मॉरीशस में गुलाम से शासक तक का भी सफ़र तय किया ।
इसलिए कभी हम हिंदुओं से अगर कोई हमारा सब कुछ छीन भी लेगा तो भी केवल राम और रामकथा के दम पर हम पुनः अपने अस्तित्व को दुनिया के सामने पूरी प्रखरता से प्रकट कर देंगे। तुलसी का मानस वही है, जो हमें हमेशा स्वराज्य के लिए प्रेरित करता रहेगा।
आज आवश्यकता है हमारे अखाड़े जीवित हों, घर घर श्रीरामचरितमानस का पाठ हो।
मुगल अंधकार में हिन्दुत्व का सूर्य आलोकित करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी के पावन प्राकट्य दिवस की शुभकामनाएं।
जय श्रीराम 🙏
@Sanatan
तुलसी बाबा की जब बात होती तो उन्हें एक कवि कह दिया जाता पर उनका एक पक्ष जो आतातायी के विरुद्ध प्रतिकार के लिए जनमानस तैयार करना था वह सामने नही आने दिया गया। अयोध्या जी से राम कथा का आयोजन करना और उसे पूरे देश मे फैला देने के माध्यम से जनजागरूकता और जन जन को एक सूत्र बांध देने का काम मानस के माध्यम से जो बाबा ने किया वह एक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर शोध होना चाहिए।
पराधीनता का इतिहास 200 साल पुराना नही बल्कि हजार साल पुराना है। असली विजय संस्कृति की होती है, तुलसी बाबा यह बात जानते थे, उन्होंने पांच सौ साल पहले ही सांस्कृतिक विजय गाथा लिख दी थी।
तुलसीदास रचित "रामचरितमानस " ने ऐसा भाव जाग्रत किया था कि जब हिन्दू मजदूरों की एक टोली गुलाम रूप में मॉरीशस पहुँची तो उनके पास धार्मिक प्रतीक के रूप में बस तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस थी ।
उन लोगों ने केवल उसी के सहारे स्वयं को हिन्दू रूप में न केवल जीवित रखा बल्कि मॉरीशस में गुलाम से शासक तक का भी सफ़र तय किया ।
इसलिए कभी हम हिंदुओं से अगर कोई हमारा सब कुछ छीन भी लेगा तो भी केवल राम और रामकथा के दम पर हम पुनः अपने अस्तित्व को दुनिया के सामने पूरी प्रखरता से प्रकट कर देंगे। तुलसी का मानस वही है, जो हमें हमेशा स्वराज्य के लिए प्रेरित करता रहेगा।
आज आवश्यकता है हमारे अखाड़े जीवित हों, घर घर श्रीरामचरितमानस का पाठ हो।
मुगल अंधकार में हिन्दुत्व का सूर्य आलोकित करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी के पावन प्राकट्य दिवस की शुभकामनाएं।
जय श्रीराम 🙏
@Sanatan
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कर्मों की तीन श्रेणियाँ
(१) संचित (२) प्रारब्ध और (३) क्रियमाण , इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। मनुष्य की अंतः चेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव न करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भले-बुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।
आज के स्वाध्याय मे हम सब प्रारब्ध कर्म के बारे में पढेंगे...
२) प्रारब्ध👉
प्रारब्ध वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं। इन कार्यों को विशेष मनोयोग के साथ किया जाता है, इसलिए उनका संस्कार भी बहुत बलवान बनता है । हत्या, खून, डकैती, विश्वासघात, चोरी, व्याभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूरकर्मों की प्रतिक्रिया अंतःकरण में बहुत ही तीव्र होती है, उस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता निरंतर व्यग्र बनी रहती है। और एक न एक दिन उसे निकाल कर बाहर कर ही देती है ।
हम बता चुके हैं हमारी अंतःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता- अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था करती रहती है। चूँकि मानसिक दण्ड अपने आप अंदर ही अंदर पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होती है, दण्ड कार्य को पूरा करने लिए सूक्ष्म लोक में से उसी प्रकार का घटनाक्रम उपस्थित करने के लिए हमारी अंतः चेतना एक वातावरण तैयार करती है। इस तैयारी में कभी बहुत समय भी लग जाता है । जैसे छल स्वभाव के निवारण के लिए शोक रूपी दण्ड की आवश्यकता है। अब यह देखा जाएगा कि छल किस दर्जे का है, उसकी शुद्धि किस दर्जे के शोक से पूरी हो सकती है। अंतःचेतना वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा करने में भीतर ही भीतर लगी रहेगी । वह शरीर में ऐसे तत्त्व पैदा करेगी, जिससे पुत्र उत्पन्न हो, उस पुत्र शरीर में ऐसी आत्मा का मेल मिलवाएगी, जिसे अपने कर्मों के अनुसार दस वर्ष ही जीना पर्याप्त हो, दस वर्ष का पुत्र हो जाने पर वही हमारी अंतःचेतना गुप्त रूप से पुत्र पर असर डालेगी और उसे रोगी करके मार डालेगी एवं शोक का इच्छित अवसर पैदा कर देगी। ऐसे अवसर तैयार करने में केवल अपना ही कार्य अकेला नहीं होता, वरन् दूसरे पक्ष का भी कार्य होता है। दोनों ओर की चेतनाएँ अपने-अपने लिए अवसर तलाश करती फिरती हैं और फिर जब उन्हें इच्छित जोड़ मिल जाता है, तो एक घटना की ठीक भूमिका बँध जाती है। ऐसे कार्यों में कई बार एक, दो, तीन या कई जन्मों का समय लग जाता है ।
इसी प्रकार पिता को पुत्र शोक और पुत्र को अल्पायु का संयोग, जब दोनों ही विधान ठीक बैठ जाते हैं, तो वे एकत्रित हो जाते हैं। शारीरिक दण्ड एकांगी है विष खाते ही तुरंत मृत्यु हो जाती है, परंतु मानसिक दण्ड में अपवाद है। जैसे क्रूरता से प्रेरित होकर किसी की हत्या की गई, वह यदि प्रकट हो गयी तो राज्य द्वारा दण्ड मिल जाएगा, किंतु यदि हत्यारे ने अपना कार्य छिपा लिया तो उसका अंतःकरण तुरंत ही पाप दण्ड न दे बैठेगा, वरन् इस तलाश में फिरेगा कि हिंसा वृत्ति से घृणा कराने के लिए हिंसा में जो दुःख होता है, उसका अनुभव उसे कराऊँ । जब दूसरी ओर का भी कोई अंकुर मिल जाता है, तो दोनों आपस में लिपट कर एक निर्धारित घटना की भूमिका बन जाते हैं।
पाठक समझ गए होंगे कि मानसिक पापों का फल किस प्रकार मिलता है और उसमें विलम्ब हो जाने का क्या कारण है । दैनिक आपत्तियाँ क्रमपूर्वक, व्यवस्था के साथ आती हैं, पर लोग उन्हें दैव का प्रकोप, ईश्वर-इच्छा, संसार दुःखमय है आदि शब्दों के द्वारा मन में संतोष करते हैं। यथार्थ में ईश्वर किसी के लिए भी दुःख - शोक उपस्थित नहीं करता, न उसकी किसी को कष्ट में डालने की इच्छा है और न यह संसार ही दुःखमय है। मकड़ी अपने आप जाला बुनती हैं और उसमें खुद फँसती, उलझती, लटकती रहती है। मन को अशुभ, अधर्मी, पापी बनाकर अपने लिए दुःख-द्वंद्वों के काँटे खुद ही बोते हैं और जब वे चुभते हैं, तो रोते-चिल्लाते हैं तथा दूसरों को दोष देते हैं । यहाँ एक बात और भी स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि प्रारब्ध फल आकस्मिक तरीके से मिलेगा जैसे रोग से मृत्यु, मकान गिर पड़ना, धन खो जाना, गिर पड़ने से चोट लगना, अंग-भंग हो जाना आदि । जो अनायास, आकस्मिक ढंग से कष्ट आ पड़ता है, वे प्रारब्ध के भोग हैं।
संदर्भ : गहना कर्मणोगति: 📕
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
(१) संचित (२) प्रारब्ध और (३) क्रियमाण , इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। मनुष्य की अंतः चेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव न करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भले-बुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।
आज के स्वाध्याय मे हम सब प्रारब्ध कर्म के बारे में पढेंगे...
२) प्रारब्ध👉
प्रारब्ध वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं। इन कार्यों को विशेष मनोयोग के साथ किया जाता है, इसलिए उनका संस्कार भी बहुत बलवान बनता है । हत्या, खून, डकैती, विश्वासघात, चोरी, व्याभिचार जैसे प्रचण्ड क्रूरकर्मों की प्रतिक्रिया अंतःकरण में बहुत ही तीव्र होती है, उस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता निरंतर व्यग्र बनी रहती है। और एक न एक दिन उसे निकाल कर बाहर कर ही देती है ।
हम बता चुके हैं हमारी अंतःचेतना निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह हमारे हर काम को देखती रहती है और उसकी न्यूनता- अधिकता के परिणाम के अनुसार दण्ड की व्यवस्था करती रहती है। चूँकि मानसिक दण्ड अपने आप अंदर ही अंदर पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए दूसरे साधनों की भी आवश्यकता होती है, दण्ड कार्य को पूरा करने लिए सूक्ष्म लोक में से उसी प्रकार का घटनाक्रम उपस्थित करने के लिए हमारी अंतः चेतना एक वातावरण तैयार करती है। इस तैयारी में कभी बहुत समय भी लग जाता है । जैसे छल स्वभाव के निवारण के लिए शोक रूपी दण्ड की आवश्यकता है। अब यह देखा जाएगा कि छल किस दर्जे का है, उसकी शुद्धि किस दर्जे के शोक से पूरी हो सकती है। अंतःचेतना वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा करने में भीतर ही भीतर लगी रहेगी । वह शरीर में ऐसे तत्त्व पैदा करेगी, जिससे पुत्र उत्पन्न हो, उस पुत्र शरीर में ऐसी आत्मा का मेल मिलवाएगी, जिसे अपने कर्मों के अनुसार दस वर्ष ही जीना पर्याप्त हो, दस वर्ष का पुत्र हो जाने पर वही हमारी अंतःचेतना गुप्त रूप से पुत्र पर असर डालेगी और उसे रोगी करके मार डालेगी एवं शोक का इच्छित अवसर पैदा कर देगी। ऐसे अवसर तैयार करने में केवल अपना ही कार्य अकेला नहीं होता, वरन् दूसरे पक्ष का भी कार्य होता है। दोनों ओर की चेतनाएँ अपने-अपने लिए अवसर तलाश करती फिरती हैं और फिर जब उन्हें इच्छित जोड़ मिल जाता है, तो एक घटना की ठीक भूमिका बँध जाती है। ऐसे कार्यों में कई बार एक, दो, तीन या कई जन्मों का समय लग जाता है ।
इसी प्रकार पिता को पुत्र शोक और पुत्र को अल्पायु का संयोग, जब दोनों ही विधान ठीक बैठ जाते हैं, तो वे एकत्रित हो जाते हैं। शारीरिक दण्ड एकांगी है विष खाते ही तुरंत मृत्यु हो जाती है, परंतु मानसिक दण्ड में अपवाद है। जैसे क्रूरता से प्रेरित होकर किसी की हत्या की गई, वह यदि प्रकट हो गयी तो राज्य द्वारा दण्ड मिल जाएगा, किंतु यदि हत्यारे ने अपना कार्य छिपा लिया तो उसका अंतःकरण तुरंत ही पाप दण्ड न दे बैठेगा, वरन् इस तलाश में फिरेगा कि हिंसा वृत्ति से घृणा कराने के लिए हिंसा में जो दुःख होता है, उसका अनुभव उसे कराऊँ । जब दूसरी ओर का भी कोई अंकुर मिल जाता है, तो दोनों आपस में लिपट कर एक निर्धारित घटना की भूमिका बन जाते हैं।
पाठक समझ गए होंगे कि मानसिक पापों का फल किस प्रकार मिलता है और उसमें विलम्ब हो जाने का क्या कारण है । दैनिक आपत्तियाँ क्रमपूर्वक, व्यवस्था के साथ आती हैं, पर लोग उन्हें दैव का प्रकोप, ईश्वर-इच्छा, संसार दुःखमय है आदि शब्दों के द्वारा मन में संतोष करते हैं। यथार्थ में ईश्वर किसी के लिए भी दुःख - शोक उपस्थित नहीं करता, न उसकी किसी को कष्ट में डालने की इच्छा है और न यह संसार ही दुःखमय है। मकड़ी अपने आप जाला बुनती हैं और उसमें खुद फँसती, उलझती, लटकती रहती है। मन को अशुभ, अधर्मी, पापी बनाकर अपने लिए दुःख-द्वंद्वों के काँटे खुद ही बोते हैं और जब वे चुभते हैं, तो रोते-चिल्लाते हैं तथा दूसरों को दोष देते हैं । यहाँ एक बात और भी स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि प्रारब्ध फल आकस्मिक तरीके से मिलेगा जैसे रोग से मृत्यु, मकान गिर पड़ना, धन खो जाना, गिर पड़ने से चोट लगना, अंग-भंग हो जाना आदि । जो अनायास, आकस्मिक ढंग से कष्ट आ पड़ता है, वे प्रारब्ध के भोग हैं।
संदर्भ : गहना कर्मणोगति: 📕
✍️ पं श्री राम शर्मा आचार्य।
@Sanatan
👍16👏4❤3🤬3😁1