ॐ श्री परमात्मने नमः (४)
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दुर्बल लोग तो उसे फलने फूलने देते हैं, जड़ को पनपने देते हैं। आप किसी को दुःखी करके देखो आप स्वयं दुःखी हो जाओगे अगर आप किसी को सुखी कर दो तो जाने कितने रूपों में सुख गूंजने लगता है आपकी अंतरात्मा भी इससे अपने को प्रसन्न महसूस करती है। अगर आप किसी के रास्ते का एक कांटा हटा दो तो आपके रास्ते से अनेकों कांटे स्वतः हट जायेंगे, आप किसी के लिए एक फूल रख दो तो आपके लिए फूलों की सेज बन जायेगी। आप जो भी कर रहे हो उसकी गूंज अनंत ब्रह्माण्ड तक जाती है क्योंकि आप अनंत ब्रह्माण्ड के साथ संयुक्त हो अगर आपके अंदर एक छोटा सा विचार भी आया तो वह सारा संसार सुनता है। आपके हृदय के एक-एक भाव की झंकार सारे अस्तित्व पर पड़ती है यह अनंत काल से चला आ रहा है। आपका रूप खो जायेगा, शरीर गिर जायेगा लेकिन आपने जो किया, आपने जो चाहा, आपकी भावनाएं और जो भावना बनाई, जो आपने बोला, जो कहा वह सब इस ब्रह्माण्ड में गूंजता रहेगा। हम यहाँ से खो जायेंगे हमारा बीज फिर कहीं अंकुरित होगा, हमारे सारे कर्म कभी नहीं खोते।
महावीर एक चींटी भी नहीं मारते थे लोग इस बात का मजाक भी उड़ाते हैं कि हम जैनी थोड़े ही हैं जो चींटी भी न मारे । महावीर की अहिंसा और शंकराचार्य के अद्वैत भाव में कोई अंतर नहीं है। चींटी को न मारना इसका यह अर्थ नहीं है कि चींटी पर दया की जा रही है अहिंसा का मतलब सिर्फ इतना ही है कि अगर आप किसी को चोट पहुँचा रहे हो, किसी को दुःख पहुँचा रहे है, मार रहे है तो आप आत्महत्या करने के समान पाप कर रहे है। जब आप अपने आपको ब्रह्माण्डीय समझोगे आप ब्रह्माण्डीय तो हो पर आप जब यह सब जान जाओगे जब आप यह जान जाओगे कि आप सारे अस्तित्व के साथ हो तो एक अद्वैत भाव जागृत होगा जो कि सत्य है । अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है कि एक चींटी के साथ भी अद्वैत भाव है, समस्त अस्तित्व के साथ अद्वैत भाव मुझमें है और मैं सबमे हूँ।
हम सोचते हैं कि हम सब एक कैसे हो सकते हैं सागर में छोटी सी एक लहर है तो एक बहुत बड़ी लहर भी है कोई लहर अभी जन्मी है अभी-अभी उठी है, वापस पानी में गिरने वाली लहर अभी उठ रही है। इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ लहर बद्ध है हम सब लहरों से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं कहीं वृक्षों की लहर है तो कहीं पर पत्थरों की लहर है कहीं पक्षियों की लहर है तो कहीं मनुष्यों की लहर है, यह सभी पराम्बरा की लहरें हैं। यह सब लहरें पराम्बरा से निकली हैं, पीताम्बरा से निकली हैं नाम कुछ भी दे दो, वापस उन्हीं में लौट जाती हैं। मृत्यु सिवाय इसके कुछ भी नहीं है जन्म से पहले भी आप अद्वैत थे मृत्यु के बाद भी अद्वैत हो ही गये। जिसके अंदर जीते जी अद्वैत भाव आ जाता है फिर उसकी मृत्यु नहीं होती। रावण के बिना राम होने का कोई मतलब नहीं है एवं राम के बिना रावण भी अधूरा है। हम सोचते हैं राम और रावण में बड़ी दुश्मनी है पर जब कभी मैं इस विषय में सोचत हूँ यह मेरा विचार है कि इनसे ज्यादा गहन मित्रता कठिन है जिसके बिना अस्तित्व ही समझ में न आये, जो हमारा आधार है फिर तो हमें उसकी परिभाषा ही बदलना पड़ेगी। शत्रु मित्र से भी अधिक निकट हैं। राम की कथा में अगर रावण को निकाल दिया जाये तो इस कथा का रस ही समाप्त हो जायेगा, रावण की मौजूदगी में ही राम की महिमा है, अशुभ रावण शुभ राम की पृष्ठभूमि है।
आज सारी मनुष्यता को हमने उलझन में डाल दिया है, सभी धर्मों का अध्ययन जरुरी है चुनाव आपका स्वयं का होना चाहिए। आपकी आध्यात्मिक यात्रा का चुनाव आप स्वयं ही करें तो ज्यादा अच्छा होगा, धर्म के प्रति जो बगावत पैदा हो गई है वह सब नहीं होगी। किसी व्यक्ति को जबर्दस्ती अपने मार्ग में जोड़ लेना यह सबसे बड़ा महापाप है। धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए अन्यथा यह दुनिया धार्मिक नहीं हो सकती। अध्यात्म एक घटना है, भक्ति एक घटना है, प्रेम भी एक घटना है। प्रेम खतरनाक हो सकता है क्योंकि प्रेम बहुत ऊँचाई पर ले जाता है और ऐसे स्वप्न निर्मित कर देता है कि उन स्वप्नों के साथ हमेशा जीना मुश्किल है क्योंकि इतनी ऊंचाई पर सदा जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता है, नीचे उतरना ही पड़ता है । अध्यात्म सामाजिक व्यवस्था का अंग नहीं है, अध्यात्म तो आत्म क्रांति है। हर व्यक्ति को अपना गुरु चुनने का पूरा-पूरा अधिकार है। गुरु जबर्दस्ती थोपे नहीं जाते जब बुद्ध, महावीर जीवित थे जब वह अपने शिष्यों को दीक्षित करते थे तब उन शिष्यों का यह स्वयं का चुनाव होता था कि वह बुद्ध हो रहा है या वह महाव हो रहा है, शिष्य का यह अपना निजी चुनाव है, उसका समर्पण है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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दुर्बल लोग तो उसे फलने फूलने देते हैं, जड़ को पनपने देते हैं। आप किसी को दुःखी करके देखो आप स्वयं दुःखी हो जाओगे अगर आप किसी को सुखी कर दो तो जाने कितने रूपों में सुख गूंजने लगता है आपकी अंतरात्मा भी इससे अपने को प्रसन्न महसूस करती है। अगर आप किसी के रास्ते का एक कांटा हटा दो तो आपके रास्ते से अनेकों कांटे स्वतः हट जायेंगे, आप किसी के लिए एक फूल रख दो तो आपके लिए फूलों की सेज बन जायेगी। आप जो भी कर रहे हो उसकी गूंज अनंत ब्रह्माण्ड तक जाती है क्योंकि आप अनंत ब्रह्माण्ड के साथ संयुक्त हो अगर आपके अंदर एक छोटा सा विचार भी आया तो वह सारा संसार सुनता है। आपके हृदय के एक-एक भाव की झंकार सारे अस्तित्व पर पड़ती है यह अनंत काल से चला आ रहा है। आपका रूप खो जायेगा, शरीर गिर जायेगा लेकिन आपने जो किया, आपने जो चाहा, आपकी भावनाएं और जो भावना बनाई, जो आपने बोला, जो कहा वह सब इस ब्रह्माण्ड में गूंजता रहेगा। हम यहाँ से खो जायेंगे हमारा बीज फिर कहीं अंकुरित होगा, हमारे सारे कर्म कभी नहीं खोते।
महावीर एक चींटी भी नहीं मारते थे लोग इस बात का मजाक भी उड़ाते हैं कि हम जैनी थोड़े ही हैं जो चींटी भी न मारे । महावीर की अहिंसा और शंकराचार्य के अद्वैत भाव में कोई अंतर नहीं है। चींटी को न मारना इसका यह अर्थ नहीं है कि चींटी पर दया की जा रही है अहिंसा का मतलब सिर्फ इतना ही है कि अगर आप किसी को चोट पहुँचा रहे हो, किसी को दुःख पहुँचा रहे है, मार रहे है तो आप आत्महत्या करने के समान पाप कर रहे है। जब आप अपने आपको ब्रह्माण्डीय समझोगे आप ब्रह्माण्डीय तो हो पर आप जब यह सब जान जाओगे जब आप यह जान जाओगे कि आप सारे अस्तित्व के साथ हो तो एक अद्वैत भाव जागृत होगा जो कि सत्य है । अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है कि एक चींटी के साथ भी अद्वैत भाव है, समस्त अस्तित्व के साथ अद्वैत भाव मुझमें है और मैं सबमे हूँ।
हम सोचते हैं कि हम सब एक कैसे हो सकते हैं सागर में छोटी सी एक लहर है तो एक बहुत बड़ी लहर भी है कोई लहर अभी जन्मी है अभी-अभी उठी है, वापस पानी में गिरने वाली लहर अभी उठ रही है। इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ लहर बद्ध है हम सब लहरों से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं कहीं वृक्षों की लहर है तो कहीं पर पत्थरों की लहर है कहीं पक्षियों की लहर है तो कहीं मनुष्यों की लहर है, यह सभी पराम्बरा की लहरें हैं। यह सब लहरें पराम्बरा से निकली हैं, पीताम्बरा से निकली हैं नाम कुछ भी दे दो, वापस उन्हीं में लौट जाती हैं। मृत्यु सिवाय इसके कुछ भी नहीं है जन्म से पहले भी आप अद्वैत थे मृत्यु के बाद भी अद्वैत हो ही गये। जिसके अंदर जीते जी अद्वैत भाव आ जाता है फिर उसकी मृत्यु नहीं होती। रावण के बिना राम होने का कोई मतलब नहीं है एवं राम के बिना रावण भी अधूरा है। हम सोचते हैं राम और रावण में बड़ी दुश्मनी है पर जब कभी मैं इस विषय में सोचत हूँ यह मेरा विचार है कि इनसे ज्यादा गहन मित्रता कठिन है जिसके बिना अस्तित्व ही समझ में न आये, जो हमारा आधार है फिर तो हमें उसकी परिभाषा ही बदलना पड़ेगी। शत्रु मित्र से भी अधिक निकट हैं। राम की कथा में अगर रावण को निकाल दिया जाये तो इस कथा का रस ही समाप्त हो जायेगा, रावण की मौजूदगी में ही राम की महिमा है, अशुभ रावण शुभ राम की पृष्ठभूमि है।
आज सारी मनुष्यता को हमने उलझन में डाल दिया है, सभी धर्मों का अध्ययन जरुरी है चुनाव आपका स्वयं का होना चाहिए। आपकी आध्यात्मिक यात्रा का चुनाव आप स्वयं ही करें तो ज्यादा अच्छा होगा, धर्म के प्रति जो बगावत पैदा हो गई है वह सब नहीं होगी। किसी व्यक्ति को जबर्दस्ती अपने मार्ग में जोड़ लेना यह सबसे बड़ा महापाप है। धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए अन्यथा यह दुनिया धार्मिक नहीं हो सकती। अध्यात्म एक घटना है, भक्ति एक घटना है, प्रेम भी एक घटना है। प्रेम खतरनाक हो सकता है क्योंकि प्रेम बहुत ऊँचाई पर ले जाता है और ऐसे स्वप्न निर्मित कर देता है कि उन स्वप्नों के साथ हमेशा जीना मुश्किल है क्योंकि इतनी ऊंचाई पर सदा जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता है, नीचे उतरना ही पड़ता है । अध्यात्म सामाजिक व्यवस्था का अंग नहीं है, अध्यात्म तो आत्म क्रांति है। हर व्यक्ति को अपना गुरु चुनने का पूरा-पूरा अधिकार है। गुरु जबर्दस्ती थोपे नहीं जाते जब बुद्ध, महावीर जीवित थे जब वह अपने शिष्यों को दीक्षित करते थे तब उन शिष्यों का यह स्वयं का चुनाव होता था कि वह बुद्ध हो रहा है या वह महाव हो रहा है, शिष्य का यह अपना निजी चुनाव है, उसका समर्पण है।
(क्रमशः)
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ॐ श्री परमात्मने नमः (५)
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यह प्रतिबद्धता किसी ने जबर्दस्ती नहीं दी उसने खुद ली है और वह अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देते हैं क्योंकि जब आत्मक्रांति होती है वह जबर्दस्ती थोपी हुई नहीं होती है। उसे जो ठीक लगा उसने चुनाव किया और अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। थोपे हुए अध्यात्म पर जीवन दाँव पर लग ही नहीं सकता क्योंकि उसमें वह तेजस्विता नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति न तो साधक होगा न ही शिष्य होगा वह तो एक प्रकार का बंधुआ मजदूर होगा, युद्ध तो जारी रहेगा लेकिन साक्षी भाव से युद्ध में एक फर्क होगा युद्ध तो आप करोगे लेकिन वह युद्ध धर्म के लिए होगा जहाँ धर्म है वहाँ श्रीकृष्ण खड़े हैं और जहाँ पर श्रीकृष्ण खड़े हैं वहाँ सत्य है और विजय हमेशा सत्य की होती है। प्रेम का स्वरूप अनिवर्चनीय है गूंगे के स्वाद की तरह। प्रेम गुण रहित, कामना रहित प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, यह विच्छेद रहित है एवं इसका चरम रूप ही भक्ति है। राम प्रसंग में बहुत सारे प्रेम प्रसंग है इसमें से भरत का राम के प्रति प्रेम अमृत को सजाने वाला समुद्र है। मेरे पास रामकथा की एक कैसेट है जब भी मैं उस कैसेट को सुनत हूँ उससे भरत का राम के प्रति प्रेम सुनकर मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं जब तक वह कैसेट चलती रहती है उतने समय तक मेरी आँखों से आंसू बहते ही रहते हैं। जब भरत जी कैकयी की करतूत के कारण श्रीरामधाम की ओर जाते हैं रास्ते में राम के चरण चिन्हों को धरती पर अंकित देखकर उस धूल को अपने मस्तक पर लगाते हैं, अपने हृदय पर लगाते हैं उनका राम के प्रति इतना अपार प्रेम देखकर खग-मृग सतंभर प्राणी सभी प्रेममय हो जाते हैं। प्रकृति भी भरत के प्रेम की सराहना करके फूली नहीं समाती है।
जब राम वियोग से संतृप्त भरत राम के सम्मुख आते हैं वह राम को प्रणाम करके कहते हैं हे नाथ रक्षा करो। प्रेम तो लक्ष्मण भी राम से बहुत करते थे वह हर समय सुख-दुःख में राम के साथ रहते थे वियोग तो भरत को सहना पड़ा, रोते सिसकते हुए जब वह राम के सम्मुख आते हैं तब लक्ष्मण राम से कहते हैं हे रघुनाथ भरत आपको प्रणाम कर रहे हैं। राम भरत को देखते ही उन्हें अपने हृदय से लगा लेते हैं " भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान" मिलन प्रीति का यह मनमोहक वर्णन कैसे किया जाये। यह परम प्रेम बुद्धि-चित सबको बिसराकर भरत और राम परम प्रेम में पूर्ण स्थिर हो जाते हैं। "परम प्रेम पूरन दोउ भाई मन बुद्धि चित अहमिति बिसराई" भरत और राम का परस्पर स्नेह अगम्य है। भरत जी की श्री रामचंद्रजी के प्रति विशुद्ध प्रेम दिव्य स्वार्थ रहित प्रेम है और वह श्रीराम के हृदय में फलित होकर अपार स्नेह का रूप धारण करता है। विशुद्ध प्रेम में न रजोगुण होता है, न तमोगुण होता है, न सतो गुण होता है। रजो गुण के नियामक ब्रह्मा, 'तमोगुण के नियामक रुद्र और सत गुण के नियामक विष्णु भी उसमें नहीं हैं। विशुद्ध प्रेम को निरुपित नहीं किया जा सकता।
भरत राम से कहते हैं मेरे यह नयन आपके दर्शन से तृप्त नहीं हुए, भरत का निर्मल प्रेम देख-परखकर राम ने भरत को शक्तिपात किया तभी से भरत ने राम की चरण पादुका को सिंहासन पर रख कर राम राज्य चलाया । राम ने शक्तिपात करते हुए कहा "मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार लोक सुजसु परलोक सुख सुमिरत नामु तुम्हार" भरत तुम्हारा नाम याद करते ही सब पाप मिट जायेंगे, छल-कपट, दम्भ, सब प्रकार के मायाजाल नष्ट हो जायेंगे, समस्त अमंगलों के समूह नष्ट हो जायेंगे। धन, वैभव, यश, सुलभता से प्राप्त होगा और उसे परलोक में भी सुख मिलेगा। रामकथा में मुझे भरत एवं हनुमान जी में मेरा विशेष रस है। जप, तप, व्रत, नियम चाहे जितने भी हों, साधन कितने भी कर लिये जायें प्रेम नहीं है तो सारे प्रयास निष्फल चले जायेंगे। प्रेम से ही भक्ति आती है और भक्ति के लिए विश्वास आवश्यक है। बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति के श्रीराम द्रवित नहीं होते। राम के बिना मोक्ष नहीं मिलता। भरत का त्याग महान बुद्धि है, भरत का राम के प्रति प्रेम देखकर भारद्वाज जी कहते हैं भरत तुमने राज्य को स्वीकार नहीं किया यह तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना धर्म है पर श्रीराम से प्रेम एवं सभी लौकिक धर्मों का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ है। भरत तुम राम प्रेम के साक्षात अवतार हो तुम्हें राम भक्ति रस सिद्ध नहीं करना है अपितु तुम स्वयं राम भक्ति रस हो ।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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यह प्रतिबद्धता किसी ने जबर्दस्ती नहीं दी उसने खुद ली है और वह अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देते हैं क्योंकि जब आत्मक्रांति होती है वह जबर्दस्ती थोपी हुई नहीं होती है। उसे जो ठीक लगा उसने चुनाव किया और अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। थोपे हुए अध्यात्म पर जीवन दाँव पर लग ही नहीं सकता क्योंकि उसमें वह तेजस्विता नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति न तो साधक होगा न ही शिष्य होगा वह तो एक प्रकार का बंधुआ मजदूर होगा, युद्ध तो जारी रहेगा लेकिन साक्षी भाव से युद्ध में एक फर्क होगा युद्ध तो आप करोगे लेकिन वह युद्ध धर्म के लिए होगा जहाँ धर्म है वहाँ श्रीकृष्ण खड़े हैं और जहाँ पर श्रीकृष्ण खड़े हैं वहाँ सत्य है और विजय हमेशा सत्य की होती है। प्रेम का स्वरूप अनिवर्चनीय है गूंगे के स्वाद की तरह। प्रेम गुण रहित, कामना रहित प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, यह विच्छेद रहित है एवं इसका चरम रूप ही भक्ति है। राम प्रसंग में बहुत सारे प्रेम प्रसंग है इसमें से भरत का राम के प्रति प्रेम अमृत को सजाने वाला समुद्र है। मेरे पास रामकथा की एक कैसेट है जब भी मैं उस कैसेट को सुनत हूँ उससे भरत का राम के प्रति प्रेम सुनकर मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं जब तक वह कैसेट चलती रहती है उतने समय तक मेरी आँखों से आंसू बहते ही रहते हैं। जब भरत जी कैकयी की करतूत के कारण श्रीरामधाम की ओर जाते हैं रास्ते में राम के चरण चिन्हों को धरती पर अंकित देखकर उस धूल को अपने मस्तक पर लगाते हैं, अपने हृदय पर लगाते हैं उनका राम के प्रति इतना अपार प्रेम देखकर खग-मृग सतंभर प्राणी सभी प्रेममय हो जाते हैं। प्रकृति भी भरत के प्रेम की सराहना करके फूली नहीं समाती है।
जब राम वियोग से संतृप्त भरत राम के सम्मुख आते हैं वह राम को प्रणाम करके कहते हैं हे नाथ रक्षा करो। प्रेम तो लक्ष्मण भी राम से बहुत करते थे वह हर समय सुख-दुःख में राम के साथ रहते थे वियोग तो भरत को सहना पड़ा, रोते सिसकते हुए जब वह राम के सम्मुख आते हैं तब लक्ष्मण राम से कहते हैं हे रघुनाथ भरत आपको प्रणाम कर रहे हैं। राम भरत को देखते ही उन्हें अपने हृदय से लगा लेते हैं " भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान" मिलन प्रीति का यह मनमोहक वर्णन कैसे किया जाये। यह परम प्रेम बुद्धि-चित सबको बिसराकर भरत और राम परम प्रेम में पूर्ण स्थिर हो जाते हैं। "परम प्रेम पूरन दोउ भाई मन बुद्धि चित अहमिति बिसराई" भरत और राम का परस्पर स्नेह अगम्य है। भरत जी की श्री रामचंद्रजी के प्रति विशुद्ध प्रेम दिव्य स्वार्थ रहित प्रेम है और वह श्रीराम के हृदय में फलित होकर अपार स्नेह का रूप धारण करता है। विशुद्ध प्रेम में न रजोगुण होता है, न तमोगुण होता है, न सतो गुण होता है। रजो गुण के नियामक ब्रह्मा, 'तमोगुण के नियामक रुद्र और सत गुण के नियामक विष्णु भी उसमें नहीं हैं। विशुद्ध प्रेम को निरुपित नहीं किया जा सकता।
भरत राम से कहते हैं मेरे यह नयन आपके दर्शन से तृप्त नहीं हुए, भरत का निर्मल प्रेम देख-परखकर राम ने भरत को शक्तिपात किया तभी से भरत ने राम की चरण पादुका को सिंहासन पर रख कर राम राज्य चलाया । राम ने शक्तिपात करते हुए कहा "मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार लोक सुजसु परलोक सुख सुमिरत नामु तुम्हार" भरत तुम्हारा नाम याद करते ही सब पाप मिट जायेंगे, छल-कपट, दम्भ, सब प्रकार के मायाजाल नष्ट हो जायेंगे, समस्त अमंगलों के समूह नष्ट हो जायेंगे। धन, वैभव, यश, सुलभता से प्राप्त होगा और उसे परलोक में भी सुख मिलेगा। रामकथा में मुझे भरत एवं हनुमान जी में मेरा विशेष रस है। जप, तप, व्रत, नियम चाहे जितने भी हों, साधन कितने भी कर लिये जायें प्रेम नहीं है तो सारे प्रयास निष्फल चले जायेंगे। प्रेम से ही भक्ति आती है और भक्ति के लिए विश्वास आवश्यक है। बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति के श्रीराम द्रवित नहीं होते। राम के बिना मोक्ष नहीं मिलता। भरत का त्याग महान बुद्धि है, भरत का राम के प्रति प्रेम देखकर भारद्वाज जी कहते हैं भरत तुमने राज्य को स्वीकार नहीं किया यह तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना धर्म है पर श्रीराम से प्रेम एवं सभी लौकिक धर्मों का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ है। भरत तुम राम प्रेम के साक्षात अवतार हो तुम्हें राम भक्ति रस सिद्ध नहीं करना है अपितु तुम स्वयं राम भक्ति रस हो ।
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ॐ श्री परमात्मने नमः (६)
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राम भक्ति और राम एक ही रूप हैं। भरत राम से अलग रहते हुए भी उनके चरण कमलों को अपने हृदय में धारण कर उनकी सेवा में सदा संलग्न रहते हैं। प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा में हनुमान जी का स्थान उनके भक्तों में, उनके शिष्यों में सर्वोपरि है। हनुमान जी एक क्षण के लिए भी अपने हृदय से राम को अलग नहीं होने देते। ।। हनुमान सम नहिं बड़भागी नाहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥ किमि बरनऊं हनुमान की काय कांति कमनीय । रोम रोम में रमि रहा नाम नाम रमनीय ॥ हनुमान जी श्रीराम के आदेशानुसार जब सीता जी की खोज में लंका जाते हैं तब मार्ग में उन्हें अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जैसे समुद्र लांघना, लंका को जलाना, राक्षसों का वध करना, अशोक वाटिका को उजाड़ना।
हनुमान जी ने कहा यह सब कार्य आपकी शक्ति के सहारे ही किए हैं मैंने अपनी शक्ति के सहारे नहीं किए हैं। जैसे कृष्ण का राधा से प्रेम अलौकिक है, वैसे ही राम का बंधु प्रेम अलौकिक है ऐसा ब्रह्माण्ड में कहीं देखने को नहीं मिलेगा। जब दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने की सोची तब राम ने लक्ष्मण से कहा यह राज्य मेरा नहीं तेरा है तुम मेरे बाह्य प्राण हो, मेरा जीवन और मेरा राज्य तेरे लिए है।
राम जब वनवास के लिए गये तो पीछे-पीछे लक्ष्मण भी उनके साथ गए, राम के लिए वह अपने माता-पिता और पत्नी तक को राजमहल में छोड़कर राम के साथ वन में गये। राम वियोग लक्ष्मण सहन नहीं कर सकते थे राम बचपन से ही अपने भाइयों से अत्यधिक प्रेम करते थे वह जान बूझकर खेल में हार जाते थे। भरत का प्रेम राम से भी श्रेष्ठ है जब भरत को राज्य मिला और राम वनवास के लिए गये तो उन्होंने राजगद्दी पर राम की पादुका स्थापित की। एक ओर राम वन में तप किया करते थे तो वहीं दूसरी ओर भरत कुटि में तप किया करते थे। राम ने इस जगत में बंधु प्रेम का एक महान आदर्श स्थापित किया है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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राम भक्ति और राम एक ही रूप हैं। भरत राम से अलग रहते हुए भी उनके चरण कमलों को अपने हृदय में धारण कर उनकी सेवा में सदा संलग्न रहते हैं। प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा में हनुमान जी का स्थान उनके भक्तों में, उनके शिष्यों में सर्वोपरि है। हनुमान जी एक क्षण के लिए भी अपने हृदय से राम को अलग नहीं होने देते। ।। हनुमान सम नहिं बड़भागी नाहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥ किमि बरनऊं हनुमान की काय कांति कमनीय । रोम रोम में रमि रहा नाम नाम रमनीय ॥ हनुमान जी श्रीराम के आदेशानुसार जब सीता जी की खोज में लंका जाते हैं तब मार्ग में उन्हें अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जैसे समुद्र लांघना, लंका को जलाना, राक्षसों का वध करना, अशोक वाटिका को उजाड़ना।
हनुमान जी ने कहा यह सब कार्य आपकी शक्ति के सहारे ही किए हैं मैंने अपनी शक्ति के सहारे नहीं किए हैं। जैसे कृष्ण का राधा से प्रेम अलौकिक है, वैसे ही राम का बंधु प्रेम अलौकिक है ऐसा ब्रह्माण्ड में कहीं देखने को नहीं मिलेगा। जब दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने की सोची तब राम ने लक्ष्मण से कहा यह राज्य मेरा नहीं तेरा है तुम मेरे बाह्य प्राण हो, मेरा जीवन और मेरा राज्य तेरे लिए है।
राम जब वनवास के लिए गये तो पीछे-पीछे लक्ष्मण भी उनके साथ गए, राम के लिए वह अपने माता-पिता और पत्नी तक को राजमहल में छोड़कर राम के साथ वन में गये। राम वियोग लक्ष्मण सहन नहीं कर सकते थे राम बचपन से ही अपने भाइयों से अत्यधिक प्रेम करते थे वह जान बूझकर खेल में हार जाते थे। भरत का प्रेम राम से भी श्रेष्ठ है जब भरत को राज्य मिला और राम वनवास के लिए गये तो उन्होंने राजगद्दी पर राम की पादुका स्थापित की। एक ओर राम वन में तप किया करते थे तो वहीं दूसरी ओर भरत कुटि में तप किया करते थे। राम ने इस जगत में बंधु प्रेम का एक महान आदर्श स्थापित किया है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान
भक्ति से शक्ति, शक्ति के बाद भी भक्ति और भक्ति और शक्ति के समिश्रण से मुक्ति बस इन्हीं तीनों महायोगों से समस्त हनुमंत चरित्र की व्याख्या हो जाती है। हनुमंत मुक्तिदाता हैं असुरों के लिये। वे उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं उन्हें उनके तुच्छ कर्मों से मुक्त करते हैं वे भक्तों को रोग, शोक और वियोग से वे संरक्षक हैं ऋषियों, तपस्वियों और मुनियों के उन्हें वे भयमुक्त करते हैं असुरों के उत्पात से। उन्होंने ही मुक्त किया है लक्ष्मण और प्रभु श्री राम को नागपाश से। उन्होंने ही मुक्ति दिलाई है लक्ष्मण को मृत्यु से मुक्त कराने वाले हनुमंत ही हैं।माता सीता को घोर कष्टों से मुक्ति भी उन्होंने ही दिलाई है। विरह की अग्नि में व्यथित हो रहे प्रभु श्री राम के मुख पर भी पुनः मुस्कान स्थापित करने वाले श्री हनुमंत ही हैं। सुग्रीव के दुःखों की मुक्ति भी उन्होंने ही करवाई है।
मुक्तिदाता वही है जो स्वयं मुक्त हो। मुक्त हो वह शरीर से मुक्त हो वह कार्य से मुक्त हो वह पद या सत्ता की लालसा से मुक्त हो वह रोग, शोक और वियोग से ऐसी विभूति तो केवल शिव ही हैं। शिव ही तो हनुमान हैं, तभी तो वह रुद्रांश कहलाते हैं। शिव का एक स्वरूप अर्धनारीश्वर रूप में भी हैं। हनुमान के हृदय में माता सीता और प्रभु श्री राम एक साथ युगल रूप में स्थापित हैं। माता सीता के अत्यंत दुलारे हैं वह उन्हें देखते ही माता सीता सब कुछ प्रदान करने को तत्पर हो जाती हैं जैसे कि माँ अपने बच्चे को सर्वस्व प्रदान करती है। रघुकुल की मर्यादा जब संकट में पड़ी तो श्री हनुमंत ने अपने बल पराक्रम, शक्ति के द्वारा प्रभु श्री राम की मर्यादा की रक्षा की। मर्यादा की रक्षा वही कर सकता है जो स्वयं मर्यादित हो। वे सदैव प्रभु श्री राम और माता सीता के चरणों के पास विराजमान रहते हैं। राम रूपी व्यवस्था उनके सानिध्य में पूर्ण रूप से सुरक्षित है। रक्षा ही उनका मुख्य ध्येय है।
प्रभु श्री राम को प्राप्त करना है तो सर्वप्रथम हनुमंत को ही पुकारना होगा उन्हीं के बताए मार्ग पर चलना होगा।वे प्रतीक हैं उस दिव्य मार्ग के जिस पर चल कर ही विष्णु लोक में पहुँचा जा सकता है।बैकुण्ठधाम के दर्शन उनकी कृपा के बिना सम्भव ही नहीं है। लक्ष्मण तो मन ही मन अपने सखा हनुमंत को देख मुस्काते रहते हैं। राम-रावण युद्ध के हर क्षण में वे लक्ष्मण के साथ कन्धे से कन्धा मिला संघर्षरत हैं। प्रभु श्री राम ने हनुमंत को गले भी लगाया है, आशीर्वाद भी प्रदान किया है, सखा के रूप में भी लिया है, उन्हें आज्ञा भी दी है, उनकी सभी सलाहें भी मानी है, कठोर से कठोर और दुर्गम से दुर्गम कार्य भी सम्पन्न करवाए हैं। माता सीता ने अपना महाकाली स्वरूप केवल हनुमंत को ही प्रदान किया है वे ही इस योग्य हैं जिनके मस्तिष्क पर माँ भवानी आरूढ़ हो सकती है। रावण जैसा दुष्ट प्राणी जो सबको कष्ट और ताड़ना ही देता था । उसे ताड़ना दी हनुमान ने एक पिता के लिये सबसे बड़ी ताड़ना यही है कि उसका पुत्र उसके सामने ही मृत्यु को प्राप्त करे। लंका में जा कर अक्षय कुमार का वध हनुमान ने ही किया है। उसके पश्चात तो समस्त ब्रह्माण्ड में हाहाकार मचा देने वाले रावण ने प्रतिक्षण ताड़ना ही सही है।
भगवान शिव का अघोरेश्वर स्वरूप हनुमंत में ही प्रतिबिम्बित होता है। असुर सेना के एक एक असुरों को उन्होंने उतनी ही निर्ममता से मारा है जितनी निर्ममता से दुष्ट असुरों ने इस जगत के अनेकों जीवों को मृत्यु प्रदान की है। अघोरेश्वर शिव में ही इतनी शक्ति है। कि वह दण्ड दे सकें कठोर से कठोर। हनुमंत ने सिर्फ दुष्टों का वध ही नहीं किया है बल्कि इनकी पाप आत्माओं को पचास हजार साल के लिये कैद में भी डाल दिया है। यह अत्यंत ही गूढ़ विषय है। पाप आत्माऐं अगर काराग्रह में नहीं डाली गयी तो वे दूसरे ही क्षण पुनः शरीर धारण कर ताण्डव मचाना शुरू कर देती हैं। श्री हनुमंत वायु पुत्र हैं, वे सूर्य को भी निगल जाने की क्षमता से युक्त हैं अतः वे ही अपने प्रचण्ड बल के द्वारा इन पाप आत्माओं को अंतरिक्ष में कहीं सुदूर ग्रह रूपी व्यवस्था पर ले जाकर बाँध सकते हैं। इसके पश्चात यह पाप आत्माऐं पृथ्वी तक पहुँच ही नहीं सकती हैं। शरीर के रूप में हनुमंत असुरों का वध करते हैं और अपने परम दिव्य बल के द्वारा दूसरे ही क्षण पाप आत्माओं को अनंत वर्षों के लिये काराग्रह भी प्रदान करते हैं।
शिव के दण्ड उतने ही भीषण और प्रचण्ड हैं जितने कि उनके आशीर्वाद और वरदान। दिव्य रामत्व रूपी व्यवस्था तभी कायम रह सकती है जब असुर शक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था भी अत्यंत परिष्कृत हो। केवल गर्दन काट देने से काम नहीं चलता यह तो नितांत मूर्खतापूर्ण मानवीय सोच है। शरीर तो बस क्षण भंगुर है।.
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
भक्ति से शक्ति, शक्ति के बाद भी भक्ति और भक्ति और शक्ति के समिश्रण से मुक्ति बस इन्हीं तीनों महायोगों से समस्त हनुमंत चरित्र की व्याख्या हो जाती है। हनुमंत मुक्तिदाता हैं असुरों के लिये। वे उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं उन्हें उनके तुच्छ कर्मों से मुक्त करते हैं वे भक्तों को रोग, शोक और वियोग से वे संरक्षक हैं ऋषियों, तपस्वियों और मुनियों के उन्हें वे भयमुक्त करते हैं असुरों के उत्पात से। उन्होंने ही मुक्त किया है लक्ष्मण और प्रभु श्री राम को नागपाश से। उन्होंने ही मुक्ति दिलाई है लक्ष्मण को मृत्यु से मुक्त कराने वाले हनुमंत ही हैं।माता सीता को घोर कष्टों से मुक्ति भी उन्होंने ही दिलाई है। विरह की अग्नि में व्यथित हो रहे प्रभु श्री राम के मुख पर भी पुनः मुस्कान स्थापित करने वाले श्री हनुमंत ही हैं। सुग्रीव के दुःखों की मुक्ति भी उन्होंने ही करवाई है।
मुक्तिदाता वही है जो स्वयं मुक्त हो। मुक्त हो वह शरीर से मुक्त हो वह कार्य से मुक्त हो वह पद या सत्ता की लालसा से मुक्त हो वह रोग, शोक और वियोग से ऐसी विभूति तो केवल शिव ही हैं। शिव ही तो हनुमान हैं, तभी तो वह रुद्रांश कहलाते हैं। शिव का एक स्वरूप अर्धनारीश्वर रूप में भी हैं। हनुमान के हृदय में माता सीता और प्रभु श्री राम एक साथ युगल रूप में स्थापित हैं। माता सीता के अत्यंत दुलारे हैं वह उन्हें देखते ही माता सीता सब कुछ प्रदान करने को तत्पर हो जाती हैं जैसे कि माँ अपने बच्चे को सर्वस्व प्रदान करती है। रघुकुल की मर्यादा जब संकट में पड़ी तो श्री हनुमंत ने अपने बल पराक्रम, शक्ति के द्वारा प्रभु श्री राम की मर्यादा की रक्षा की। मर्यादा की रक्षा वही कर सकता है जो स्वयं मर्यादित हो। वे सदैव प्रभु श्री राम और माता सीता के चरणों के पास विराजमान रहते हैं। राम रूपी व्यवस्था उनके सानिध्य में पूर्ण रूप से सुरक्षित है। रक्षा ही उनका मुख्य ध्येय है।
प्रभु श्री राम को प्राप्त करना है तो सर्वप्रथम हनुमंत को ही पुकारना होगा उन्हीं के बताए मार्ग पर चलना होगा।वे प्रतीक हैं उस दिव्य मार्ग के जिस पर चल कर ही विष्णु लोक में पहुँचा जा सकता है।बैकुण्ठधाम के दर्शन उनकी कृपा के बिना सम्भव ही नहीं है। लक्ष्मण तो मन ही मन अपने सखा हनुमंत को देख मुस्काते रहते हैं। राम-रावण युद्ध के हर क्षण में वे लक्ष्मण के साथ कन्धे से कन्धा मिला संघर्षरत हैं। प्रभु श्री राम ने हनुमंत को गले भी लगाया है, आशीर्वाद भी प्रदान किया है, सखा के रूप में भी लिया है, उन्हें आज्ञा भी दी है, उनकी सभी सलाहें भी मानी है, कठोर से कठोर और दुर्गम से दुर्गम कार्य भी सम्पन्न करवाए हैं। माता सीता ने अपना महाकाली स्वरूप केवल हनुमंत को ही प्रदान किया है वे ही इस योग्य हैं जिनके मस्तिष्क पर माँ भवानी आरूढ़ हो सकती है। रावण जैसा दुष्ट प्राणी जो सबको कष्ट और ताड़ना ही देता था । उसे ताड़ना दी हनुमान ने एक पिता के लिये सबसे बड़ी ताड़ना यही है कि उसका पुत्र उसके सामने ही मृत्यु को प्राप्त करे। लंका में जा कर अक्षय कुमार का वध हनुमान ने ही किया है। उसके पश्चात तो समस्त ब्रह्माण्ड में हाहाकार मचा देने वाले रावण ने प्रतिक्षण ताड़ना ही सही है।
भगवान शिव का अघोरेश्वर स्वरूप हनुमंत में ही प्रतिबिम्बित होता है। असुर सेना के एक एक असुरों को उन्होंने उतनी ही निर्ममता से मारा है जितनी निर्ममता से दुष्ट असुरों ने इस जगत के अनेकों जीवों को मृत्यु प्रदान की है। अघोरेश्वर शिव में ही इतनी शक्ति है। कि वह दण्ड दे सकें कठोर से कठोर। हनुमंत ने सिर्फ दुष्टों का वध ही नहीं किया है बल्कि इनकी पाप आत्माओं को पचास हजार साल के लिये कैद में भी डाल दिया है। यह अत्यंत ही गूढ़ विषय है। पाप आत्माऐं अगर काराग्रह में नहीं डाली गयी तो वे दूसरे ही क्षण पुनः शरीर धारण कर ताण्डव मचाना शुरू कर देती हैं। श्री हनुमंत वायु पुत्र हैं, वे सूर्य को भी निगल जाने की क्षमता से युक्त हैं अतः वे ही अपने प्रचण्ड बल के द्वारा इन पाप आत्माओं को अंतरिक्ष में कहीं सुदूर ग्रह रूपी व्यवस्था पर ले जाकर बाँध सकते हैं। इसके पश्चात यह पाप आत्माऐं पृथ्वी तक पहुँच ही नहीं सकती हैं। शरीर के रूप में हनुमंत असुरों का वध करते हैं और अपने परम दिव्य बल के द्वारा दूसरे ही क्षण पाप आत्माओं को अनंत वर्षों के लिये काराग्रह भी प्रदान करते हैं।
शिव के दण्ड उतने ही भीषण और प्रचण्ड हैं जितने कि उनके आशीर्वाद और वरदान। दिव्य रामत्व रूपी व्यवस्था तभी कायम रह सकती है जब असुर शक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था भी अत्यंत परिष्कृत हो। केवल गर्दन काट देने से काम नहीं चलता यह तो नितांत मूर्खतापूर्ण मानवीय सोच है। शरीर तो बस क्षण भंगुर है।.
(क्रमशः)
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान (२)
मुख्य कार्य तो प्राण शक्ति का है। गाजर घास काट देने से वह नष्ट नहीं हो जाती है। कुछ समय पश्चात वह पुनः उग आती है। महाकाली ने जब रक्तबीज का वध किया तो वह उसके सम्पूर्ण लहु को भी पी गयी जिससे कि कोई दूसरा रक्तबीज उत्पन्न हाने न पाये। हनुमंत ने भी अनेकों बार असुरों के लहू का पान किया फिर भी वे जीवित रहे। उन्हें अमृत कला प्राप्त है। जैसे-जैसे वानर सेना घायल होती जाती वे पुनः संजीवनी विद्या के द्वारा उनके कटे हुए अंगो को पुनः उंगा देते। उनकी बुद्धि और चातुर्य की तो मिसाल ही नहीं है।
दिव्य व्यवस्था को बनाए रखने के लिये व्यवस्था अनुरूप ही बदलना पड़ता है और दुष्टों के संहार के लिये, दुष्ट व्यवस्थाओं को ध्वंस करने के लिये भी स्वरूप परिवर्तन करना पड़ता है। भगवान शिव पशुपति के रूप में भी वर्णित हैं। हनुमंत वानर रूप धारण किये हुए हैं फिर भी देवों से ज्यादा मर्यादित है। आखिरकार प्रभु श्री राम को वानर जाति में भी तो मर्यादा स्थापित करना है। वानरों को भी तो भोग कर्मों से मुक्त कर भक्ति मार्ग के पथ पर अग्रसर करना है। समस्त वानर सेना को मर्यादित, समर्पित और एकाग्रचित्त करने का कार्य प्रभु श्री राम ने हनुमंत के द्वारा ही सम्पन्न कराया है। असुरों से मनुष्य नहीं जीत सकते । हिरण्यकश्यप के वध के लिये तो विष्णु ने स्वयं नरसिंह स्वरूप धारण किया है।आधे पशु और आधे नर ।
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि प्रभु कलयुग में आप कौन सा तारक मंत्र मनुष्यों को प्रदान करेंगे जिसके सुनने पर वे समस्त पापों से मुक्त वैकुण्ठ धाम की ओर प्रशस्त होंगे। तब भूतभावन भगवान शिव बोले हे पार्वती कलयुग मैं तो बस " श्री राम जय राम जय जय राम " ही एक मात्र ऐसा तारक मंत्र होगा। इस महामंत्र का प्रभाव दिखाने के लिये उन्होंने तुरंत ही नारद जी को बुलाकर कुछ आज्ञा प्रदान की। भगवान शिव की आज्ञानुसार नारद जी तुरंत अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गये उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा कि आज तुम राज दरबार में सबको प्रणाम करना परंतु ऋषि विश्वामित्र को प्रणाम मत करना हनुमंत ने उनकी बात मानते हुए ऐसा ही किया। विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्रह्मऋषि बने हैं और प्रभु श्री राम के गुरु भी हैं। उन्हें हनुमंत के इस व्यवहार पर अत्यंत ही मलाल हुआ। नारद जी ने दूसरे ही क्षण हनुमंत के इस कार्य को विश्वामित्र के सामने अपमान के रूप में परिभाषित कर दिया फिर क्या था सुदूर कोने में दबी हुई क्रोधाग्नि पुनः प्रज्जवलित हो गयी। विश्वामित्र क्रोधावेश में सीधे श्री राम के पास पहुँचे और श्री हनुमंत को उनके अपमान जनक व्यवहार के कारण मृत्युदण्ड प्रदान करने की गुरु आज्ञा दी। प्रभु श्री राम समेत माता सीता और सभी प्रजाजन सकते में आ गये।
एक ओर गुरु आज्ञा तो दूसरी और प्राणों से प्रिय भक्त, मित्र, पुत्र इत्यादि के रूप में श्री हनुमंत । प्रभु श्री राम के सामने उनके जीवन की यह सबसे बड़ी विकट स्थिति थी। हनुमंत को जब मालूम चला कि प्रात:काल प्रभु श्री राम उनका वध कर देंगे तो वे अत्यंत ही दुखी होकर नारद जी के पास पहुँचे। नारद जी ने कहा तुम व्यथित न हो। प्रातःकाल सरयु में स्नान कर तट पर सिर्फ " श्री राम जय राम जय जय राम " का पूरे मनोयोग से जोर-जोर से जप करते रहना । भोले श्री हनुमंत ने ऐसा ही करना प्रारम्भ कर दिया। श्री राम के साथ-साथ सभी सरयु के तट पर आये और फिर विश्वामित्र ने उन्हें बाण चलाने की आज्ञा दी। व्यथित मन से एक के बाद एक श्री राम ने बाण चलाने शुरू किये परन्तु हनुमंत का बाल बाँका भी नहीं हुआ। अंत में श्री राम ने गुरु आज्ञा से अग्निबाण के साथ-साथ अनेकों दिव्य अस्त्रों का भी प्रयोग किया इन पर हनुमंत जोर-जोर से जय श्री राम, जय श्री राम जपने लगे। वे सब दिव्य अस्त्र जिनसे कि समस्त ब्रह्माण्ड काँपता था निष्फल हो गये। अंत में उन्होंने गुरु का मान रखने के लिये ब्रह्मास्त्र उठाया इस पर नारद जी तुरंत विश्वामित्र के पास पहुँचे और शिव के द्वारा दी गयी आज्ञा से उन्हें अवगत कराया। सत्य जानने के पश्चात वे भी व्यथित हुए और उन्होंने स्वयं श्री राम को शस्त्र का उपयोग न करने की आज्ञा दी। प्रभु श्री राम उनकी आज्ञा सुन अत्यंत ही द्वंदमय स्थिति से उबर गये और इस प्रकार श्री राम जय राम जय जय राम जैसे दिव्य तारक मंत्र की महिमा पृथ्वी पर प्रकट हुई।
हमारे देश में प्रात:काल, सुख दुःख की घड़ी में हम राम ही बोलते हैं और अंत में शरीर त्यागने के पश्चात अग्निदाह संस्कार के समय भी श्री राम का नाम ही भजा जाता है। मृत्यु के समय जिसके मुख पर प्रभु श्री राम का नाम होता है वही बैकुण्ठ धाम की यात्रा सम्पन्न करता है । घटनाओं का कभी भी अंत नहीं होता है। जो श्री राम के जमाने से हैं
(क्रमशः)
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मुख्य कार्य तो प्राण शक्ति का है। गाजर घास काट देने से वह नष्ट नहीं हो जाती है। कुछ समय पश्चात वह पुनः उग आती है। महाकाली ने जब रक्तबीज का वध किया तो वह उसके सम्पूर्ण लहु को भी पी गयी जिससे कि कोई दूसरा रक्तबीज उत्पन्न हाने न पाये। हनुमंत ने भी अनेकों बार असुरों के लहू का पान किया फिर भी वे जीवित रहे। उन्हें अमृत कला प्राप्त है। जैसे-जैसे वानर सेना घायल होती जाती वे पुनः संजीवनी विद्या के द्वारा उनके कटे हुए अंगो को पुनः उंगा देते। उनकी बुद्धि और चातुर्य की तो मिसाल ही नहीं है।
दिव्य व्यवस्था को बनाए रखने के लिये व्यवस्था अनुरूप ही बदलना पड़ता है और दुष्टों के संहार के लिये, दुष्ट व्यवस्थाओं को ध्वंस करने के लिये भी स्वरूप परिवर्तन करना पड़ता है। भगवान शिव पशुपति के रूप में भी वर्णित हैं। हनुमंत वानर रूप धारण किये हुए हैं फिर भी देवों से ज्यादा मर्यादित है। आखिरकार प्रभु श्री राम को वानर जाति में भी तो मर्यादा स्थापित करना है। वानरों को भी तो भोग कर्मों से मुक्त कर भक्ति मार्ग के पथ पर अग्रसर करना है। समस्त वानर सेना को मर्यादित, समर्पित और एकाग्रचित्त करने का कार्य प्रभु श्री राम ने हनुमंत के द्वारा ही सम्पन्न कराया है। असुरों से मनुष्य नहीं जीत सकते । हिरण्यकश्यप के वध के लिये तो विष्णु ने स्वयं नरसिंह स्वरूप धारण किया है।आधे पशु और आधे नर ।
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि प्रभु कलयुग में आप कौन सा तारक मंत्र मनुष्यों को प्रदान करेंगे जिसके सुनने पर वे समस्त पापों से मुक्त वैकुण्ठ धाम की ओर प्रशस्त होंगे। तब भूतभावन भगवान शिव बोले हे पार्वती कलयुग मैं तो बस " श्री राम जय राम जय जय राम " ही एक मात्र ऐसा तारक मंत्र होगा। इस महामंत्र का प्रभाव दिखाने के लिये उन्होंने तुरंत ही नारद जी को बुलाकर कुछ आज्ञा प्रदान की। भगवान शिव की आज्ञानुसार नारद जी तुरंत अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गये उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा कि आज तुम राज दरबार में सबको प्रणाम करना परंतु ऋषि विश्वामित्र को प्रणाम मत करना हनुमंत ने उनकी बात मानते हुए ऐसा ही किया। विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्रह्मऋषि बने हैं और प्रभु श्री राम के गुरु भी हैं। उन्हें हनुमंत के इस व्यवहार पर अत्यंत ही मलाल हुआ। नारद जी ने दूसरे ही क्षण हनुमंत के इस कार्य को विश्वामित्र के सामने अपमान के रूप में परिभाषित कर दिया फिर क्या था सुदूर कोने में दबी हुई क्रोधाग्नि पुनः प्रज्जवलित हो गयी। विश्वामित्र क्रोधावेश में सीधे श्री राम के पास पहुँचे और श्री हनुमंत को उनके अपमान जनक व्यवहार के कारण मृत्युदण्ड प्रदान करने की गुरु आज्ञा दी। प्रभु श्री राम समेत माता सीता और सभी प्रजाजन सकते में आ गये।
एक ओर गुरु आज्ञा तो दूसरी और प्राणों से प्रिय भक्त, मित्र, पुत्र इत्यादि के रूप में श्री हनुमंत । प्रभु श्री राम के सामने उनके जीवन की यह सबसे बड़ी विकट स्थिति थी। हनुमंत को जब मालूम चला कि प्रात:काल प्रभु श्री राम उनका वध कर देंगे तो वे अत्यंत ही दुखी होकर नारद जी के पास पहुँचे। नारद जी ने कहा तुम व्यथित न हो। प्रातःकाल सरयु में स्नान कर तट पर सिर्फ " श्री राम जय राम जय जय राम " का पूरे मनोयोग से जोर-जोर से जप करते रहना । भोले श्री हनुमंत ने ऐसा ही करना प्रारम्भ कर दिया। श्री राम के साथ-साथ सभी सरयु के तट पर आये और फिर विश्वामित्र ने उन्हें बाण चलाने की आज्ञा दी। व्यथित मन से एक के बाद एक श्री राम ने बाण चलाने शुरू किये परन्तु हनुमंत का बाल बाँका भी नहीं हुआ। अंत में श्री राम ने गुरु आज्ञा से अग्निबाण के साथ-साथ अनेकों दिव्य अस्त्रों का भी प्रयोग किया इन पर हनुमंत जोर-जोर से जय श्री राम, जय श्री राम जपने लगे। वे सब दिव्य अस्त्र जिनसे कि समस्त ब्रह्माण्ड काँपता था निष्फल हो गये। अंत में उन्होंने गुरु का मान रखने के लिये ब्रह्मास्त्र उठाया इस पर नारद जी तुरंत विश्वामित्र के पास पहुँचे और शिव के द्वारा दी गयी आज्ञा से उन्हें अवगत कराया। सत्य जानने के पश्चात वे भी व्यथित हुए और उन्होंने स्वयं श्री राम को शस्त्र का उपयोग न करने की आज्ञा दी। प्रभु श्री राम उनकी आज्ञा सुन अत्यंत ही द्वंदमय स्थिति से उबर गये और इस प्रकार श्री राम जय राम जय जय राम जैसे दिव्य तारक मंत्र की महिमा पृथ्वी पर प्रकट हुई।
हमारे देश में प्रात:काल, सुख दुःख की घड़ी में हम राम ही बोलते हैं और अंत में शरीर त्यागने के पश्चात अग्निदाह संस्कार के समय भी श्री राम का नाम ही भजा जाता है। मृत्यु के समय जिसके मुख पर प्रभु श्री राम का नाम होता है वही बैकुण्ठ धाम की यात्रा सम्पन्न करता है । घटनाओं का कभी भी अंत नहीं होता है। जो श्री राम के जमाने से हैं
(क्रमशः)
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान (३)
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वे आज भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी न किसी स्वरूप में उपस्थित होती है। जिस प्रकार त्रेता युग में साक्षात् हनुमंत ने श्री राम के कष्टों का निवारण किया उसी प्रकार आज भी हनुमंत की शक्ति को आत्मसात कर हम अपने जीवन की विसंगतियों को समग्रता के साथ दूर कर सकते हैं। हनुमंत ने राम रूपी व्यवस्था में जो परम पद प्राप्त किया है वह उन्हें पारितोषिक में नहीं मिला है। प्रभु श्री राम का सानिध्य उन्होंने अपने बल पराक्रम, आज्ञापालन एवं समर्पण और भक्ति से प्राप्त किया है। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी वे प्रभु श्री राम के साथ रहे हैं। हनुमंत अयोध्या वासी नहीं हैं। शिष्य कैसा होना चाहये यह सीखने के लिए हनुमंत के चरित्र को आत्मसात करना होगा। शिष्य को अपना धर्म निभाना चाहिये गुरु के धर्म की गुरु ही जाने जो श्रेष्ठ शिष्य है वही श्रेष्ठ गुरु है।
राम ने कहा हनुमंत ने दूसरे ही क्षण उसका पालन किया किसी भी प्रकार का संशय असंशय उनके सम्बन्धों के बीच नहीं । परिवार, समाज, राष्ट्र और अंत में विश्व रूपी व्यवस्था तभी सफल है जब उसमें हनुमंत चरित्रम् का स्थायित्व भाव हो । अध्यात्म में भक्ति मार्ग के प्रणेता श्री हनुमंत ही हैं। उन्होंने ही राम के नाम की सत्यता स्थापित की है। लंका पर चढ़ाई करते समय मात्र राम लिख देने से पाषाण समुद्र के ऊपर तैरने लगे और सेतु का निर्माण हो गया। पाषाण क्यों तैरे क्योंकि उनके ऊपर हनुमंत द्वारा लिखे गये राम शब्द में भक्ति, श्रद्धा और समर्पण की शक्ति निहित थी । आप राम लिख दीजिए पाषाण कभी नहीं तैरेंगे। मंत्रों में छिपी शक्ति आपको चैतन्य करनी होगी उसके लिए आपका चरित्र भी हनुमंत की बराबरी का होना चाहिये।
प्रभु श्री राम का पूजन सर्वप्रथम श्री हनुमान ने ही किया एवं यह पूजन अत्यंत ही तीव्र और शीघ्र परिणाम देने वाला है। हनुमंत प्रभु श्री राम का पूजन प्रतिक्षण मानसिक रूप से करते ही रहे। उनके द्वारा पूजन में लाया गया दुर्लभ स्त्रोत नीचे वर्णित कर रहा हूँ। इस स्त्रोत का पठन करने के लिए साधक के अंदर पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का होना अति आवश्यक है तभी यह स्त्रोत शक्ति युक्त हो उसे परमानंद प्राप्त करायेगा। इस स्त्रोत का पठन साधक प्रात:काल एवं संध्या के समय प्रतिदिन कर सकते हैं। स्त्रोत पाठ के लिए किसी विशेष मुहूर्त, काल इत्यादि की आवश्यकता नहीं है। स्त्रोत पाठ करने से पहले साधक को स्नान एवं अन्य शारीरिक शुद्धियाँ सम्पन्न कर लेनी चाहिये फिर अपने पूजाघर या किसी मंदिर में जहाँ श्री राम माता सीता समेत विराजमान हैं वहाँ पर पूर्ण एकाग्रचित्त मन से इस स्त्रोत का पाठ करना चाहिये। इस स्त्रोत का पाठ करते समय साधक को अपने मन में प्रभु श्री राम के दिव्य स्वरूप की इस प्रकार से कल्पना करनी चाहिए।
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ ॥
कोसल पुरी के स्वामी श्री रामचन्द्रजी के सुन्दर और कोमल दोनों चरण कमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं, श्री जानकी जी के करकमलों से दुलराये हुए हैं और चिन्तन करने वाले के मनरूपी भौरे के नित्य संगी हैं, अर्थात् चिंतन करने वालें का मन रूपी भ्रमर सदा उन चरण कमलों में बसा रहता है।
साधकों को चाहिये कि वह सावधानी के साथ अपने चित्त को श्री अवध में ले चले। बड़ा सुन्दर रमणीय श्री अवधधाम है। अखिलभुवन मण्डल के एकछत्र सम्राट चक्रवर्ती महाराज भगवान श्री राघवेन्द्रजी की पुरी बड़ी रमणीय है । राम राज्य की सारी शोभा, राम राज्य की आदर्श समाजव्यवस्था श्री अवध में विद्यमान है। सभी ओर सब कुछ सुशोभित है। कलुषनाशिनी श्री सरयूजी मन्द मन्द वेग से बह रही हैं। श्री सरयूजी के तट पर श्री राघवेन्द का विहारोद्यान है। फलों और पुष्पों से सुसज्जित बड़ा सुन्दर बगीचा है। बगीचे में चारों ओर बड़े सुन्दर और मनोहर पुष्पों से सुशोभित वृक्ष हैं। उनमें भाँति-भाँति के पुष्प खिले हुए हैं। उनके विविध प्रकार के सौरभ से सारा उद्यान सुरभित हो रहा है। पुष्पों पर भौरे मँडरा रहे हैं। पुष्पों की रंग-बिरंगी शोभा से सभी ओर सुषमा छा रही है। फलों के वृक्ष विविध फलों के भार से लदे हैं। बीच में एक बड़ा मनोहर सरोवर है। सरोवर में कमल खिले हुए हैं। सरोवर के भीतर जलपक्षी केलि कर रहे हैं। चारों ओर सुन्दर सुन्दर घाट हैं।
(क्रमश:)
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वे आज भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी न किसी स्वरूप में उपस्थित होती है। जिस प्रकार त्रेता युग में साक्षात् हनुमंत ने श्री राम के कष्टों का निवारण किया उसी प्रकार आज भी हनुमंत की शक्ति को आत्मसात कर हम अपने जीवन की विसंगतियों को समग्रता के साथ दूर कर सकते हैं। हनुमंत ने राम रूपी व्यवस्था में जो परम पद प्राप्त किया है वह उन्हें पारितोषिक में नहीं मिला है। प्रभु श्री राम का सानिध्य उन्होंने अपने बल पराक्रम, आज्ञापालन एवं समर्पण और भक्ति से प्राप्त किया है। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी वे प्रभु श्री राम के साथ रहे हैं। हनुमंत अयोध्या वासी नहीं हैं। शिष्य कैसा होना चाहये यह सीखने के लिए हनुमंत के चरित्र को आत्मसात करना होगा। शिष्य को अपना धर्म निभाना चाहिये गुरु के धर्म की गुरु ही जाने जो श्रेष्ठ शिष्य है वही श्रेष्ठ गुरु है।
राम ने कहा हनुमंत ने दूसरे ही क्षण उसका पालन किया किसी भी प्रकार का संशय असंशय उनके सम्बन्धों के बीच नहीं । परिवार, समाज, राष्ट्र और अंत में विश्व रूपी व्यवस्था तभी सफल है जब उसमें हनुमंत चरित्रम् का स्थायित्व भाव हो । अध्यात्म में भक्ति मार्ग के प्रणेता श्री हनुमंत ही हैं। उन्होंने ही राम के नाम की सत्यता स्थापित की है। लंका पर चढ़ाई करते समय मात्र राम लिख देने से पाषाण समुद्र के ऊपर तैरने लगे और सेतु का निर्माण हो गया। पाषाण क्यों तैरे क्योंकि उनके ऊपर हनुमंत द्वारा लिखे गये राम शब्द में भक्ति, श्रद्धा और समर्पण की शक्ति निहित थी । आप राम लिख दीजिए पाषाण कभी नहीं तैरेंगे। मंत्रों में छिपी शक्ति आपको चैतन्य करनी होगी उसके लिए आपका चरित्र भी हनुमंत की बराबरी का होना चाहिये।
प्रभु श्री राम का पूजन सर्वप्रथम श्री हनुमान ने ही किया एवं यह पूजन अत्यंत ही तीव्र और शीघ्र परिणाम देने वाला है। हनुमंत प्रभु श्री राम का पूजन प्रतिक्षण मानसिक रूप से करते ही रहे। उनके द्वारा पूजन में लाया गया दुर्लभ स्त्रोत नीचे वर्णित कर रहा हूँ। इस स्त्रोत का पठन करने के लिए साधक के अंदर पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का होना अति आवश्यक है तभी यह स्त्रोत शक्ति युक्त हो उसे परमानंद प्राप्त करायेगा। इस स्त्रोत का पठन साधक प्रात:काल एवं संध्या के समय प्रतिदिन कर सकते हैं। स्त्रोत पाठ के लिए किसी विशेष मुहूर्त, काल इत्यादि की आवश्यकता नहीं है। स्त्रोत पाठ करने से पहले साधक को स्नान एवं अन्य शारीरिक शुद्धियाँ सम्पन्न कर लेनी चाहिये फिर अपने पूजाघर या किसी मंदिर में जहाँ श्री राम माता सीता समेत विराजमान हैं वहाँ पर पूर्ण एकाग्रचित्त मन से इस स्त्रोत का पाठ करना चाहिये। इस स्त्रोत का पाठ करते समय साधक को अपने मन में प्रभु श्री राम के दिव्य स्वरूप की इस प्रकार से कल्पना करनी चाहिए।
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ ॥
कोसल पुरी के स्वामी श्री रामचन्द्रजी के सुन्दर और कोमल दोनों चरण कमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं, श्री जानकी जी के करकमलों से दुलराये हुए हैं और चिन्तन करने वाले के मनरूपी भौरे के नित्य संगी हैं, अर्थात् चिंतन करने वालें का मन रूपी भ्रमर सदा उन चरण कमलों में बसा रहता है।
साधकों को चाहिये कि वह सावधानी के साथ अपने चित्त को श्री अवध में ले चले। बड़ा सुन्दर रमणीय श्री अवधधाम है। अखिलभुवन मण्डल के एकछत्र सम्राट चक्रवर्ती महाराज भगवान श्री राघवेन्द्रजी की पुरी बड़ी रमणीय है । राम राज्य की सारी शोभा, राम राज्य की आदर्श समाजव्यवस्था श्री अवध में विद्यमान है। सभी ओर सब कुछ सुशोभित है। कलुषनाशिनी श्री सरयूजी मन्द मन्द वेग से बह रही हैं। श्री सरयूजी के तट पर श्री राघवेन्द का विहारोद्यान है। फलों और पुष्पों से सुसज्जित बड़ा सुन्दर बगीचा है। बगीचे में चारों ओर बड़े सुन्दर और मनोहर पुष्पों से सुशोभित वृक्ष हैं। उनमें भाँति-भाँति के पुष्प खिले हुए हैं। उनके विविध प्रकार के सौरभ से सारा उद्यान सुरभित हो रहा है। पुष्पों पर भौरे मँडरा रहे हैं। पुष्पों की रंग-बिरंगी शोभा से सभी ओर सुषमा छा रही है। फलों के वृक्ष विविध फलों के भार से लदे हैं। बीच में एक बड़ा मनोहर सरोवर है। सरोवर में कमल खिले हुए हैं। सरोवर के भीतर जलपक्षी केलि कर रहे हैं। चारों ओर सुन्दर सुन्दर घाट हैं।
(क्रमश:)
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान (४)
सरोवर के उत्तर की ओर एक बड़ा सुन्दर कल्पवृक्ष है। वह सघन और फैला हुआ है। कल्पवृक्ष के नीचे बहुत सुन्दर स्फटिकमणि का सिंहासन बना हुआ है। चारों ओर विविध पुष्पों की लताऐं बिखरी हुई हैं। संध्या का समय है। बड़ी सुन्दर और सुगन्धित मन्द मन्द समीर बह रहा है। इस मनोहर पुष्पोद्यान में श्री राघवेन्द्र भगवान श्री रामचन्द्र जी और अखिल जगत जननी श्री जानकी जी नित्य संध्या समय पधारते हैं। उस समय उनके साथ कोई सेवक नहीं रहता, केवल हनुमान जी रहते हैं।
आज भी भगवान श्री रामचन्द्र जी अपनी सारी सुषमा के साथ समस्त शोभाओं से युक्त विश्वजननी श्री जनक नन्दिनी के साथ पधारे हैं। भगवान बड़ी मन्दगति से धीरे धीरे सरोवर के निकट चले आते हैं। उनके पीछे-पीछे हनुमानजी हैं। श्री भगवान उत्तरतट की ओर पधारे हैं। शाखा प्रशाखाओं के सुन्दर वितानवाले कल्पवृक्ष के नीचे स्फटिकमणि की एक मनोहर पीठिका है। उस स्फटिक मणि के सुन्दर सिंहासन पर बहुत ही बढ़िया और सुकोमल दूर्वा के रंग का एक गलीचा बिछा हुआ है। उसके पीछे दो तकिये लगे हुए हैं। दोनों ओर दो सुन्दर मसनद हैं। चौकी के सामने नीचे की ओर चरण रखने के लिए दो पीठ (पीढ़े) सुसज्जित हैं। उन पर दो सुन्दर कोमल गद्दियाँ बिछी हुई हैं। सामने बायीं ओर थोड़ी दूर पर मरकतमणिकी नीची चौकी पर श्री हनुमान जी के लिए आसन हैं। भगवान श्री रामचन्द्र जी श्री जनकनन्दिनी जी के साथ गलीचे वाले स्फटिकमणि के सिंहासन पर विराजमान हो गये हैं।
श्री हनुमान जी सामने बैठ गये हैं और भगवान श्री राम के नेत्रों की ओर किसी आज्ञा की प्रतीक्षा में टकटकी लगाकर देख रहे हैं। भगवान श्री राम का बड़ा सुन्दर स्वरूप है। भगवान के श्री अंग का वर्ण नील हरिताभ उज्जवल है। नीला, नीले में कुछ हरी आभा उस पर उज्जवल प्रकाश । केकीकण्ठाभनीलम् जैसे मयूर के कण्ठ की नीलिमा में हरित आभा होती है, चमकता रंग होता है, उसी प्रकार श्री भगवान के अंग का रंग नीलहरिताभ उज्जवल है। बड़ी ही सुन्दर आभा है। दिव्य चमकता प्रकाश । इसके पश्चात श्री हनुमान जी द्वारा रचित स्त्रोत पाठ करना चाहिये। स्त्रोत नीचे वर्णित है और साधकों की सुविधा के लिए उसका हिन्दी भावार्थ लिखा जा रहा है। अक्सर साधक आजकल धर्म के नाम पर फैलाई जा रही ऊट-पटांग विधियों के कारण संशय में आ जाते हैं। इनकी मुख्य जिम्मेदार आज के युग की आधी-अधूरी आध्यात्मिक पुस्तकें एवं उनके रचयिताओं का आधा-अधूरा ज्ञान है। स्त्रोत पाठ में मुख्य रूप से हृदय पक्ष ही सक्रिय रहता है। स्त्रोत पाठ के लिए किसी भी प्रकार की माला, यंत्र या अन्य सामग्री की कदापि जरूरत नहीं होती है साधक का एकमात्र कार्य सच्चे हृदय से ईष्ट का आह्वान स्त्रोत के रूप में करना होता है। पूजन तकनीकी नहीं होता है। कृपया तकनीक को पूजन से न जोड़ें। पूजन गणित का विषय नहीं है यह तो हृदय की विशुद्धता की प्रक्रिया है।
यहाँ उन्हीं स्त्रोतों का वर्णन किया जाता है जो कि पूर्ण रूप से प्रामाणिक एवं वैदिक हों । कुछ धंधेबाजों ने वैदिक मंत्रों और स्त्रोतों के बारे में यह दुष्प्रचार मचा रखा है कि ये कीलित हैं। वास्तव में एक भी वैदिक स्त्रोत और वैदिक मंत्र कीलित नहीं है। कीलित तो सिर्फ आध्यात्मिक ठेकेदारों की बुद्धि है। सनातन धर्म को नष्ट करने का यह सबसे भयानक तरीका है। वेदों और वेद वर्णित स्त्रोतों को कीलित कहना मात्र सनातन धर्म को नष्ट करने की एक सोची समझी चाल है। असली माल के बारे में दुष्प्रचार कर ही दुष्ट नकली माल बेचते हैं। जिस दिन वेद मंत्र और वेदशास्त्र कीलित हो जायेंगे उस दिन प्रभु श्री राम, हनुमंत, विष्णु, ब्रह्मा, महाकाली, महालक्ष्मी, शिव इत्यादि सभी आदि शक्तियाँ कीलित हो जायेंगी। वेदों में ही समस्त शक्तियाँ निहित हैं। हिन्दू धर्म को जितना नुकसान बाहरी आक्रांताओं ने नहीं पहुँचाया है उससे ज्यादा नुकसान तथाकथित गुरुओं ने पहुँचाया है। अब तो कुछ गुरु रामायण, महाभारत और गीता जैसे पवित्र ग्रंथों को भी कीलित कहने लगे हैं। यह सब नर्कगामी व्यक्ति है। वेदान्त दर्शन ब्रह्माण्डीय दर्शन हैं। जिस दिन वेदिक मंत्र कीलित हो जायेंगे उस दिन समस्त ब्रह्माण्ड की क्रियायें भी कीलित हो जायेंगी। सभी सनातन धर्मियों से निवेदन है कि कृपया भ्रमित न हों एवं अपने। धर्म की रक्षा स्वयं करें।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
सरोवर के उत्तर की ओर एक बड़ा सुन्दर कल्पवृक्ष है। वह सघन और फैला हुआ है। कल्पवृक्ष के नीचे बहुत सुन्दर स्फटिकमणि का सिंहासन बना हुआ है। चारों ओर विविध पुष्पों की लताऐं बिखरी हुई हैं। संध्या का समय है। बड़ी सुन्दर और सुगन्धित मन्द मन्द समीर बह रहा है। इस मनोहर पुष्पोद्यान में श्री राघवेन्द्र भगवान श्री रामचन्द्र जी और अखिल जगत जननी श्री जानकी जी नित्य संध्या समय पधारते हैं। उस समय उनके साथ कोई सेवक नहीं रहता, केवल हनुमान जी रहते हैं।
आज भी भगवान श्री रामचन्द्र जी अपनी सारी सुषमा के साथ समस्त शोभाओं से युक्त विश्वजननी श्री जनक नन्दिनी के साथ पधारे हैं। भगवान बड़ी मन्दगति से धीरे धीरे सरोवर के निकट चले आते हैं। उनके पीछे-पीछे हनुमानजी हैं। श्री भगवान उत्तरतट की ओर पधारे हैं। शाखा प्रशाखाओं के सुन्दर वितानवाले कल्पवृक्ष के नीचे स्फटिकमणि की एक मनोहर पीठिका है। उस स्फटिक मणि के सुन्दर सिंहासन पर बहुत ही बढ़िया और सुकोमल दूर्वा के रंग का एक गलीचा बिछा हुआ है। उसके पीछे दो तकिये लगे हुए हैं। दोनों ओर दो सुन्दर मसनद हैं। चौकी के सामने नीचे की ओर चरण रखने के लिए दो पीठ (पीढ़े) सुसज्जित हैं। उन पर दो सुन्दर कोमल गद्दियाँ बिछी हुई हैं। सामने बायीं ओर थोड़ी दूर पर मरकतमणिकी नीची चौकी पर श्री हनुमान जी के लिए आसन हैं। भगवान श्री रामचन्द्र जी श्री जनकनन्दिनी जी के साथ गलीचे वाले स्फटिकमणि के सिंहासन पर विराजमान हो गये हैं।
श्री हनुमान जी सामने बैठ गये हैं और भगवान श्री राम के नेत्रों की ओर किसी आज्ञा की प्रतीक्षा में टकटकी लगाकर देख रहे हैं। भगवान श्री राम का बड़ा सुन्दर स्वरूप है। भगवान के श्री अंग का वर्ण नील हरिताभ उज्जवल है। नीला, नीले में कुछ हरी आभा उस पर उज्जवल प्रकाश । केकीकण्ठाभनीलम् जैसे मयूर के कण्ठ की नीलिमा में हरित आभा होती है, चमकता रंग होता है, उसी प्रकार श्री भगवान के अंग का रंग नीलहरिताभ उज्जवल है। बड़ी ही सुन्दर आभा है। दिव्य चमकता प्रकाश । इसके पश्चात श्री हनुमान जी द्वारा रचित स्त्रोत पाठ करना चाहिये। स्त्रोत नीचे वर्णित है और साधकों की सुविधा के लिए उसका हिन्दी भावार्थ लिखा जा रहा है। अक्सर साधक आजकल धर्म के नाम पर फैलाई जा रही ऊट-पटांग विधियों के कारण संशय में आ जाते हैं। इनकी मुख्य जिम्मेदार आज के युग की आधी-अधूरी आध्यात्मिक पुस्तकें एवं उनके रचयिताओं का आधा-अधूरा ज्ञान है। स्त्रोत पाठ में मुख्य रूप से हृदय पक्ष ही सक्रिय रहता है। स्त्रोत पाठ के लिए किसी भी प्रकार की माला, यंत्र या अन्य सामग्री की कदापि जरूरत नहीं होती है साधक का एकमात्र कार्य सच्चे हृदय से ईष्ट का आह्वान स्त्रोत के रूप में करना होता है। पूजन तकनीकी नहीं होता है। कृपया तकनीक को पूजन से न जोड़ें। पूजन गणित का विषय नहीं है यह तो हृदय की विशुद्धता की प्रक्रिया है।
यहाँ उन्हीं स्त्रोतों का वर्णन किया जाता है जो कि पूर्ण रूप से प्रामाणिक एवं वैदिक हों । कुछ धंधेबाजों ने वैदिक मंत्रों और स्त्रोतों के बारे में यह दुष्प्रचार मचा रखा है कि ये कीलित हैं। वास्तव में एक भी वैदिक स्त्रोत और वैदिक मंत्र कीलित नहीं है। कीलित तो सिर्फ आध्यात्मिक ठेकेदारों की बुद्धि है। सनातन धर्म को नष्ट करने का यह सबसे भयानक तरीका है। वेदों और वेद वर्णित स्त्रोतों को कीलित कहना मात्र सनातन धर्म को नष्ट करने की एक सोची समझी चाल है। असली माल के बारे में दुष्प्रचार कर ही दुष्ट नकली माल बेचते हैं। जिस दिन वेद मंत्र और वेदशास्त्र कीलित हो जायेंगे उस दिन प्रभु श्री राम, हनुमंत, विष्णु, ब्रह्मा, महाकाली, महालक्ष्मी, शिव इत्यादि सभी आदि शक्तियाँ कीलित हो जायेंगी। वेदों में ही समस्त शक्तियाँ निहित हैं। हिन्दू धर्म को जितना नुकसान बाहरी आक्रांताओं ने नहीं पहुँचाया है उससे ज्यादा नुकसान तथाकथित गुरुओं ने पहुँचाया है। अब तो कुछ गुरु रामायण, महाभारत और गीता जैसे पवित्र ग्रंथों को भी कीलित कहने लगे हैं। यह सब नर्कगामी व्यक्ति है। वेदान्त दर्शन ब्रह्माण्डीय दर्शन हैं। जिस दिन वेदिक मंत्र कीलित हो जायेंगे उस दिन समस्त ब्रह्माण्ड की क्रियायें भी कीलित हो जायेंगी। सभी सनातन धर्मियों से निवेदन है कि कृपया भ्रमित न हों एवं अपने। धर्म की रक्षा स्वयं करें।
(क्रमशः)
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प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान (५)
हनुमान जी द्वारा रचित श्री राम स्तोत्र
ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम: आर्यलक्षणशीलव्रताय नम: उपशिक्षितात्मन उपासित लोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम: इति ।
यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक्प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यानामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥
मर्त्यावतारस्तिवह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।
कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥
न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः ।
न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति।।
न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः।
तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकसश्चकार संख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः।।
सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् ।
भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं य उत्तराननयत् कोसलान् दिवमिति।।
हम ॐ कार स्वरूप, पवित्र कीर्ति भगवान श्री राम को नमस्कार करते हैं, आप में सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयमित, लोकाराधनतत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यंत ब्राह्मण भक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः पुनः प्रणाम। हे भगवान! आप विशुद्ध बोध स्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्य रूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परम शांत, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जाने योग्य नाम रूप से रहित और अहंकार शून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ। प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है। अन्यथा अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था। आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान वासुदेव हैं, त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजी का त्याग ही कर सकते हैं। आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणग्रज ! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि- इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य कोई भी हो उसे सब प्रकार से श्री राम रूप आपका ही भजन करना चाहिये, क्योंकि आप नररूप में साक्षात श्री हरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रित वत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तर कोसलवासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
हनुमान जी द्वारा रचित श्री राम स्तोत्र
ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम: आर्यलक्षणशीलव्रताय नम: उपशिक्षितात्मन उपासित लोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम: इति ।
यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक्प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यानामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥
मर्त्यावतारस्तिवह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।
कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥
न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः ।
न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति।।
न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः।
तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकसश्चकार संख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः।।
सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् ।
भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं य उत्तराननयत् कोसलान् दिवमिति।।
हम ॐ कार स्वरूप, पवित्र कीर्ति भगवान श्री राम को नमस्कार करते हैं, आप में सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयमित, लोकाराधनतत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यंत ब्राह्मण भक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः पुनः प्रणाम। हे भगवान! आप विशुद्ध बोध स्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्य रूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परम शांत, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जाने योग्य नाम रूप से रहित और अहंकार शून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ। प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है। अन्यथा अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था। आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान वासुदेव हैं, त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजी का त्याग ही कर सकते हैं। आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणग्रज ! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि- इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य कोई भी हो उसे सब प्रकार से श्री राम रूप आपका ही भजन करना चाहिये, क्योंकि आप नररूप में साक्षात श्री हरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रित वत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तर कोसलवासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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शिवकृत जयदुर्गास्तोत्रम्
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शिव के मुख से जगदम्बा की स्तुति। शांत शिव के मुख से से बहुत कम ही कुछ उत्पाद होता है। यह अमृत है एवं इस स्तोत्र का जप कर परम शांति का अनुभव होता है।
रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि ।
मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि ॥
विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि।
ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि ॥
त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके ।
त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात् ॥
मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम् ।
तयोः परं ब्रह्म परं त्वं विभर्षि सनातनि ॥
वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा ।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥
मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः ।
स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले ॥
नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता ।
सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी ॥
रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती ।
प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः ॥
गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि ।
गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने ॥
श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी ।
शतशृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च ॥
दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा ।
देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा ॥
त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती ।
त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः ॥
स्त्रीरूपं चापिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम् ।
वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कररूपिणी ॥
वह्नौ च दाहिकाशक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी ।
सूर्ये तेज: स्वरूपा च प्रभारूपा च संततम् ॥
गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी ।
शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसङ्गे च निश्चितम् ॥
सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा च पालने परिपालिका ।
महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी ॥
क्षुत्त्वं दया तवं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी ।
तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयम् ॥
शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिः कान्तिस्त्वं कीर्तिरेवच ।
लज्जा त्वं च तथा माया भुक्ति मुक्तिस्वरूपिणी ॥
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी ।
वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन ॥
सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्तः सुरेश्वरि ।
वेदा न शक्ताः को विद्वान न च शक्ता सरस्वती ॥
स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णु सनातनः ।
किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि ॥
॥ कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु ॥.
शिव शासनत: शिव शासनत:
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शिव के मुख से जगदम्बा की स्तुति। शांत शिव के मुख से से बहुत कम ही कुछ उत्पाद होता है। यह अमृत है एवं इस स्तोत्र का जप कर परम शांति का अनुभव होता है।
रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि ।
मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि ॥
विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि।
ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि ॥
त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके ।
त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात् ॥
मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम् ।
तयोः परं ब्रह्म परं त्वं विभर्षि सनातनि ॥
वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा ।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥
मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः ।
स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले ॥
नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता ।
सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी ॥
रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती ।
प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः ॥
गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि ।
गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने ॥
श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी ।
शतशृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च ॥
दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा ।
देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा ॥
त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती ।
त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः ॥
स्त्रीरूपं चापिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम् ।
वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कररूपिणी ॥
वह्नौ च दाहिकाशक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी ।
सूर्ये तेज: स्वरूपा च प्रभारूपा च संततम् ॥
गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी ।
शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसङ्गे च निश्चितम् ॥
सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा च पालने परिपालिका ।
महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी ॥
क्षुत्त्वं दया तवं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी ।
तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयम् ॥
शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिः कान्तिस्त्वं कीर्तिरेवच ।
लज्जा त्वं च तथा माया भुक्ति मुक्तिस्वरूपिणी ॥
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी ।
वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन ॥
सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्तः सुरेश्वरि ।
वेदा न शक्ताः को विद्वान न च शक्ता सरस्वती ॥
स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णु सनातनः ।
किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि ॥
॥ कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु ॥.
शिव शासनत: शिव शासनत:
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मूर्ति रहस्य
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प्रतिक्षण पंचेन्द्रिय कर्मों में लिप्त मनुष्य के लिये निराकार एवं सूक्ष्म आदि शक्ति भवानी का पूजन कर पाना कठिन हो जाता है। पंचेन्द्रिय कर्मों की संलग्न लिप्तता मनुष्य में वृद्धि और तर्क की प्रधानता बढ़ा देती है। ये ग्रंथियाँ यंत्रवत कार्य करने के लिए समस्त शरीर को निरंतर प्रेरित करती रहती हैं ऐसी स्थिति में अगर आदि शक्तियाँ मनुष्य के द्वारा इन्द्रियों के माध्यम से मस्तिष्क में प्रक्षेपित नहीं होती है तो व्यक्ति विशेष का ईष्ट में ध्यान लगाना अत्यधिक दुष्कर जाता है। वैदिक ऋषियों के साथ भी यही समस्या खड़ी हुई है। मंत्र दृष्टाओ और वैदिक ऋषियों ने तो अपनी दिव्य इन्द्रियों से आदि शक्ति माँ भवानी के सूक्ष्म से सूक्ष्म और गुप्त से गुप्त रहस्य एवं लीलाओं को समझ लिया एवं प्रज्ञा शक्ति के द्वारा माँ आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के तेज गुण और सौन्दर्य का भली भांति दृष्टांत किया परंतु इन दृष्टांतों और देवी के विहंगम स्वरूप को वे जन साधारण तक कैसे पहुँचाये उनके सामने यह समस्या विकराल रूप में खड़ी हुई।
वैदिक ऋषियों ने अपने ब्रह्म ज्ञान से यह भी जान लिया कि पृथ्वी लोक में नाना प्रकार के दुःखों का जड़मूल से निवारण माँ आदि शक्ति की शरण में ही हो सकता है अतः इस समस्या के समाधान के लिये उन्होंने पुनः माँ आदि शक्ति के मूल स्वरूप रूपी स्त्रोत से ही प्रार्थना की और अपनी समस्या के निवारण के लिये देवी को उन स्वरूपों में प्रकट होने के लिये आह्वान किया जिसके द्वारा जनमानस भी उनकी स्तुति में लीन होकर कल्याण को प्राप्त कर सके। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती में वर्णित अति गोपनीय मूर्ति रहस्य का प्रादुर्भाव हुआ। मूर्ति रहस्य में वर्णित माँ आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूप स्वयं माँ भवानी द्वारा प्रदर्शित किये गये हैं जिससे कि जनमानस अपनी सुविधानुसार देवी को रक्त के प्रत्येक कण में आत्मसात करके पृथ्वी लोक में मौजूद अनेको प्रकार के रोग, कष्टों एवं दुःखों से मुक्ति प्राप्त करता हुआ जीवन में सम्पूर्ण भौतिक सुखों की प्राप्ति के साथ साथ कल्याण को प्राप्त कर सके।
मूर्ति रहस्य में वर्णित देवी के 6 स्वरूप ही मूर्ति निर्माण कला में मुख्य रूप से प्रचलित है एवं इन्हीं रहस्यों के अनुसार निर्मित देवी की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा वैदिक रूप में सम्भव हो पाती है। देवी के ये दिव्य स्वरूप ही साधक चाहे वह स्त्री हो या पुरुष के अंदर देवी कला विकसित करते हैं। देवी कला से युक्त साधक अत्यंत ही सुदर्शन, सम्पूर्ण अंगों का विकास लिए, स्पष्ट वाणी, विचार एवं आरोग्य के साथ इस पृथ्वी पर मन मोहनी छटा बिखेरता रहता है। कुरुपता, अविकसित शरीर, असंतुलित चेहरा, चलायमान मानसिक प्रवृत्ति, हमेशा ज्वरों से ग्रसित रहना, जीवन में घोर दरिद्रता, स्त्री कष्ट, शासन के द्वारा प्रताड़ित किया जाना, बन्दी स्वरूप जीवन व्यतीत करना एवं मृत्यु के समय अथाह कष्ट झेलना इन सब विपरीत कर्मों को एक गृहस्थ व्यक्ति देवी के अद्भुत 6 स्वरूपों की स्तुति वन्दना एवं पूजा उपासना से भी दूर कर सकता है। मूर्ति रहस्य को आत्मसात करने वाला व्यक्ति न सिर्फ पृथ्वी लोक अपितु तीनों लोक में सुख भोगता है।
नंदा देवी - ऋषि कहते हैं कि नंदा देवी की उत्पत्ति नंद से हुई है यदि उनकी भक्ति पूर्वक स्तुति और पूजा की जाय तो वे साधक को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित कर देती हैं। उनके श्री अंगों की कांति स्वर्ण के समान उत्तम है। वे हमेशा सुनहरे रंग के सुन्दर वस्त्रों में दर्शन देती है। उनका आभामण्डल स्वर्ण के समान चमकीला है ! वह स्वर्ण से निर्मित उत्तम आभूषणों को ही धारण करती हैं एवं उनकी चार भुजाओं में कमल, अंकुश, पाश और शंख शुसोभित है। वे ही लक्ष्मी, श्री, इन्दिरा, कमला एवं रुक्माम्बुजासना (स्वर्णमय कमल के आसन पर विराजमान) आदि नामों से पुकारी जाती हैं।
रक्तदन्तिका रक्तदन्तिका स्वरूप में माँ आदिशक्ति हमेशा लाल रंग के वस्त्र धारण करती हैं एवं उनका शरीर भी लाल रंग का है। उनके समस्त अंगों में सुशोभित आभूषण भी लाल रंग के हैं। यहाँ तक कि उनके दिव्य स्वरूप में अस्त्र, शस्त्र, नेत्र, सिर के बाल, तीखे नख और दाँत सभी रक्त वर्ण के हैं इसीलिए वे रक्तदन्तिका कहलाती हैं। रक्तदन्तिका देवी सभी भयों को समग्र रूप में दूर करती हैं। जिस प्रकार स्त्री अपने पति के प्रति अनुराग रखती है उसी प्रकार देवी अपने भक्तों पर माता की भांति स्नेह रखते हुये उनकी सभी मनोकामनाऐं पूर्ण करती हैं। देवी रक्तदन्तिका का आकार वसुधा की भांति विशाल है। उनके दोनों स्तन सुमेरु पर्वत के समान है। वे लम्बे, चौड़े, अत्यंत स्थूल एवं बहुत ही मनोहर है। कठोर होते हुए भी अत्यंत कमनीय है तथा पूर्ण आनंद के समुद्र हैं। सम्पूर्ण मनोकामना रूपी अमृत धारा इन्हीं स्तनों के माध्यम से भक्तों को प्राप्त होती है। .
(क्रमशः)
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प्रतिक्षण पंचेन्द्रिय कर्मों में लिप्त मनुष्य के लिये निराकार एवं सूक्ष्म आदि शक्ति भवानी का पूजन कर पाना कठिन हो जाता है। पंचेन्द्रिय कर्मों की संलग्न लिप्तता मनुष्य में वृद्धि और तर्क की प्रधानता बढ़ा देती है। ये ग्रंथियाँ यंत्रवत कार्य करने के लिए समस्त शरीर को निरंतर प्रेरित करती रहती हैं ऐसी स्थिति में अगर आदि शक्तियाँ मनुष्य के द्वारा इन्द्रियों के माध्यम से मस्तिष्क में प्रक्षेपित नहीं होती है तो व्यक्ति विशेष का ईष्ट में ध्यान लगाना अत्यधिक दुष्कर जाता है। वैदिक ऋषियों के साथ भी यही समस्या खड़ी हुई है। मंत्र दृष्टाओ और वैदिक ऋषियों ने तो अपनी दिव्य इन्द्रियों से आदि शक्ति माँ भवानी के सूक्ष्म से सूक्ष्म और गुप्त से गुप्त रहस्य एवं लीलाओं को समझ लिया एवं प्रज्ञा शक्ति के द्वारा माँ आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के तेज गुण और सौन्दर्य का भली भांति दृष्टांत किया परंतु इन दृष्टांतों और देवी के विहंगम स्वरूप को वे जन साधारण तक कैसे पहुँचाये उनके सामने यह समस्या विकराल रूप में खड़ी हुई।
वैदिक ऋषियों ने अपने ब्रह्म ज्ञान से यह भी जान लिया कि पृथ्वी लोक में नाना प्रकार के दुःखों का जड़मूल से निवारण माँ आदि शक्ति की शरण में ही हो सकता है अतः इस समस्या के समाधान के लिये उन्होंने पुनः माँ आदि शक्ति के मूल स्वरूप रूपी स्त्रोत से ही प्रार्थना की और अपनी समस्या के निवारण के लिये देवी को उन स्वरूपों में प्रकट होने के लिये आह्वान किया जिसके द्वारा जनमानस भी उनकी स्तुति में लीन होकर कल्याण को प्राप्त कर सके। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती में वर्णित अति गोपनीय मूर्ति रहस्य का प्रादुर्भाव हुआ। मूर्ति रहस्य में वर्णित माँ आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूप स्वयं माँ भवानी द्वारा प्रदर्शित किये गये हैं जिससे कि जनमानस अपनी सुविधानुसार देवी को रक्त के प्रत्येक कण में आत्मसात करके पृथ्वी लोक में मौजूद अनेको प्रकार के रोग, कष्टों एवं दुःखों से मुक्ति प्राप्त करता हुआ जीवन में सम्पूर्ण भौतिक सुखों की प्राप्ति के साथ साथ कल्याण को प्राप्त कर सके।
मूर्ति रहस्य में वर्णित देवी के 6 स्वरूप ही मूर्ति निर्माण कला में मुख्य रूप से प्रचलित है एवं इन्हीं रहस्यों के अनुसार निर्मित देवी की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा वैदिक रूप में सम्भव हो पाती है। देवी के ये दिव्य स्वरूप ही साधक चाहे वह स्त्री हो या पुरुष के अंदर देवी कला विकसित करते हैं। देवी कला से युक्त साधक अत्यंत ही सुदर्शन, सम्पूर्ण अंगों का विकास लिए, स्पष्ट वाणी, विचार एवं आरोग्य के साथ इस पृथ्वी पर मन मोहनी छटा बिखेरता रहता है। कुरुपता, अविकसित शरीर, असंतुलित चेहरा, चलायमान मानसिक प्रवृत्ति, हमेशा ज्वरों से ग्रसित रहना, जीवन में घोर दरिद्रता, स्त्री कष्ट, शासन के द्वारा प्रताड़ित किया जाना, बन्दी स्वरूप जीवन व्यतीत करना एवं मृत्यु के समय अथाह कष्ट झेलना इन सब विपरीत कर्मों को एक गृहस्थ व्यक्ति देवी के अद्भुत 6 स्वरूपों की स्तुति वन्दना एवं पूजा उपासना से भी दूर कर सकता है। मूर्ति रहस्य को आत्मसात करने वाला व्यक्ति न सिर्फ पृथ्वी लोक अपितु तीनों लोक में सुख भोगता है।
नंदा देवी - ऋषि कहते हैं कि नंदा देवी की उत्पत्ति नंद से हुई है यदि उनकी भक्ति पूर्वक स्तुति और पूजा की जाय तो वे साधक को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित कर देती हैं। उनके श्री अंगों की कांति स्वर्ण के समान उत्तम है। वे हमेशा सुनहरे रंग के सुन्दर वस्त्रों में दर्शन देती है। उनका आभामण्डल स्वर्ण के समान चमकीला है ! वह स्वर्ण से निर्मित उत्तम आभूषणों को ही धारण करती हैं एवं उनकी चार भुजाओं में कमल, अंकुश, पाश और शंख शुसोभित है। वे ही लक्ष्मी, श्री, इन्दिरा, कमला एवं रुक्माम्बुजासना (स्वर्णमय कमल के आसन पर विराजमान) आदि नामों से पुकारी जाती हैं।
रक्तदन्तिका रक्तदन्तिका स्वरूप में माँ आदिशक्ति हमेशा लाल रंग के वस्त्र धारण करती हैं एवं उनका शरीर भी लाल रंग का है। उनके समस्त अंगों में सुशोभित आभूषण भी लाल रंग के हैं। यहाँ तक कि उनके दिव्य स्वरूप में अस्त्र, शस्त्र, नेत्र, सिर के बाल, तीखे नख और दाँत सभी रक्त वर्ण के हैं इसीलिए वे रक्तदन्तिका कहलाती हैं। रक्तदन्तिका देवी सभी भयों को समग्र रूप में दूर करती हैं। जिस प्रकार स्त्री अपने पति के प्रति अनुराग रखती है उसी प्रकार देवी अपने भक्तों पर माता की भांति स्नेह रखते हुये उनकी सभी मनोकामनाऐं पूर्ण करती हैं। देवी रक्तदन्तिका का आकार वसुधा की भांति विशाल है। उनके दोनों स्तन सुमेरु पर्वत के समान है। वे लम्बे, चौड़े, अत्यंत स्थूल एवं बहुत ही मनोहर है। कठोर होते हुए भी अत्यंत कमनीय है तथा पूर्ण आनंद के समुद्र हैं। सम्पूर्ण मनोकामना रूपी अमृत धारा इन्हीं स्तनों के माध्यम से भक्तों को प्राप्त होती है। .
(क्रमशः)
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मूर्ति रहस्य (२)
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वे चार भुजाओं में खड्ग, पान पत्र, मूसल और हल धारण किये हुए हैं। इन्हीं देवी के तेज से सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त है । जो साधक प्रतिदिन माँ रक्तदन्तिका का स्तवन करता है उसे वे प्रेम पूर्वक संरक्षण देती हैं एवं इस चराचर जगत में सम्पूर्ण भोगों को भोगता हुआ अंत में साधक देवी के साथ सामुज्य प्राप्त करता है । रक्तदन्तिका ही, रक्त चामुण्डा और योगेश्वरी देवी कहलाती हैं।
शाकम्भरी स्वरूप देवी शाकम्भरी देवी का शरीर नीले रंग की आकर्षक कांति लिये हुए हैं। उनके नेत्र नील कमल के समान एवं नाभि नीची है तथा त्रिवली (तीन रेखायें) से विभूषित उदर (मध्यभाग) सूक्ष्म है। उनके दोनों स्तन अत्यंत ही कठोर, सब ओर से बराबर, ऊँचे, गोल स्थूल तथा परस्पर सटे हुए हैं। वे परमेश्वरी कमल में निवास करने वाली हैं और हाथों में बाण से भरी मुट्ठी, कमल, शाक समूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह शाक समूह अनंत मनोवांछित रसों से युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्यु के भय को नष्ट करने वाला व फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलों से सम्पन्न शाकम्भरी स्वरूप ही शताक्षी तथा दुर्गा इत्यादि रूपों में वर्णित है। उमा, गौरी, सती, चण्डी, कालिका, पार्वती भी वे ही हैं। वे उपने साधकों को शोक से रहित, दुष्टों का दमन करने वाली तथा पाप और विपत्ति को शांत करने वाली देवी हैं। इनकी स्तुति, ध्यान, जप, पूजा और शीघ्र ही साधक को अमृत रूपी फल प्रदान करता है।
भीमा देवी स्वरूप - भीमा देवी का वर्ण नील है। उनकी दांढे और दांत चमकते रहते हैं। उनके नेत्र अत्यंत विशाल एवं स्वरूप स्त्री का है। स्तन गोल और स्थूल हैं। वे अपने हाथों में चंद्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पान पात्र धारण करती है। वे ही एकवीरा, काल रात्रि तथा कामदा के नामों से प्रसिद्ध होती हैं। इनकी पूजा आराधना एवं ध्यान से गुप्त से गुप्त सिद्धियाँ, महाबल, शिव रहस्य एवं वरदान प्राप्त होते हैं।
भ्रामरी देवी - भ्रामरी देवी स्वरूप की कांति विचित्र (अनेक रंग की) है। वे अपने तेजो मण्डल के कारण दुर्धर्ष दिखाई देती हैं। उनका अंग राग भी उनके रंग का है तथा वे विचित्र आभूषणों से विभूषित हैं। चित्र भ्रमण, पाणि और महामारी आदि नामों से उनकी महिमा का गान किया जाता है। इनकी पूजा अर्चना साधक को अनेकों महामारी से बचाती है एवं जीवन के सभी आयामों में सफलता प्रदान करती है। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती के मंत्रों में वर्णित मूर्ति रहस्य के पाठ से ही मनुष्य सात जन्मों में उपार्जित ब्रह्म हत्या जैसे घोर पापों से मुक्त हो जाता है। देवी सर्वरुपमयी हैं तथा सम्पूर्ण जगत देवीमय है। अतः मैं उन विश्व रूपी परमेश्वरी को नमस्कार करता हूँ।
॥ इति मूर्ति रहस्यम् सम्पूर्णम् ॥
मूर्ति रहस्य में वर्णित माँ आदि शक्ति का स्वरूप पूर्ण रूप से मातृ दर्शन के रूप में ही लेना चाहिए। साधक के मन में एक माँ के प्रति जो आदर और सात्विक भाव होता है उसी को धारण करके इसका पाठ करना चाहिए किसी भी प्रकार का स्त्री दोष मन में धारण करके माँ की पूजा अर्चना घोर पाप है। साधक के मन में जितना बाल्य स्वरूप स्थापित होगा उतना ही फल उसे मूर्ति रहस्य का प्राप्त होगा । एक बात विशेष तौर पर समझ लेनी चाहिए कि पृथ्वी लोक में शरीर धारण करने की स्थिति में मात्र बाल्य अवस्था ही वह अवस्था है जब मनुष्य अबोध होता है और अबोध अवस्था में परम चेतना एवं प्रेममयी मातृ शक्ति का साक्षात सानिध्य सहज ही प्राप्त होता रहता है।
इस दुर्लभ बाल्यावस्था को प्राप्त करने के लिए ही मंत्र दृष्टा, तंत्र दृष्टा, कर्मकाण्डी एवं अनेकों प्रकार की पद्धतियों का इस्तेमाल करने वाले साधक प्रतिक्षण लालायित रहते हैं। जिस व्यक्ति में बाल्यावस्था किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान रहती है वही प्रेम, वात्सल्य और अनुराग जीवन भर प्राप्त करता रहता है देवी, परम कृपावान है। परंतु आँखों में दृष्टिदोष एवं मन में कलुषित काम भावना और कुकर्मों के कारण ही मनुष्य देवी कृपा से दूर होता जाता है । परमहंस स्वरूप व्यक्तित्व की विशेषता यही है कि उनमें पुनः अबोध बालक के समान लिंग भेद समाप्त हो जाता है इसी परम निर्मलता के कारण स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कलकत्ता स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर में माँ काली के सानिध्य को सम्पूर्ण जीवन प्राप्त किया। निर्मल साधकों के लिये देवी कला की प्राप्ति उनके लिये मात्र खिलौना बनकर रह जाती है। दुर्लभ से दुर्लभ सिद्धियाँ उनके इर्द-गिर्द नर्तन करती हैं परंतु वह उनमें लिप्त हुये बगैर प्रतिक्षण माँ का सानिध्य पाने की ही चेष्टा करते हैं। ऐसी स्थिति में सिद्धियाँ उनके लिये खिलौने की भांति कोई महत्व नहीं रखती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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वे चार भुजाओं में खड्ग, पान पत्र, मूसल और हल धारण किये हुए हैं। इन्हीं देवी के तेज से सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त है । जो साधक प्रतिदिन माँ रक्तदन्तिका का स्तवन करता है उसे वे प्रेम पूर्वक संरक्षण देती हैं एवं इस चराचर जगत में सम्पूर्ण भोगों को भोगता हुआ अंत में साधक देवी के साथ सामुज्य प्राप्त करता है । रक्तदन्तिका ही, रक्त चामुण्डा और योगेश्वरी देवी कहलाती हैं।
शाकम्भरी स्वरूप देवी शाकम्भरी देवी का शरीर नीले रंग की आकर्षक कांति लिये हुए हैं। उनके नेत्र नील कमल के समान एवं नाभि नीची है तथा त्रिवली (तीन रेखायें) से विभूषित उदर (मध्यभाग) सूक्ष्म है। उनके दोनों स्तन अत्यंत ही कठोर, सब ओर से बराबर, ऊँचे, गोल स्थूल तथा परस्पर सटे हुए हैं। वे परमेश्वरी कमल में निवास करने वाली हैं और हाथों में बाण से भरी मुट्ठी, कमल, शाक समूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह शाक समूह अनंत मनोवांछित रसों से युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्यु के भय को नष्ट करने वाला व फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलों से सम्पन्न शाकम्भरी स्वरूप ही शताक्षी तथा दुर्गा इत्यादि रूपों में वर्णित है। उमा, गौरी, सती, चण्डी, कालिका, पार्वती भी वे ही हैं। वे उपने साधकों को शोक से रहित, दुष्टों का दमन करने वाली तथा पाप और विपत्ति को शांत करने वाली देवी हैं। इनकी स्तुति, ध्यान, जप, पूजा और शीघ्र ही साधक को अमृत रूपी फल प्रदान करता है।
भीमा देवी स्वरूप - भीमा देवी का वर्ण नील है। उनकी दांढे और दांत चमकते रहते हैं। उनके नेत्र अत्यंत विशाल एवं स्वरूप स्त्री का है। स्तन गोल और स्थूल हैं। वे अपने हाथों में चंद्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पान पात्र धारण करती है। वे ही एकवीरा, काल रात्रि तथा कामदा के नामों से प्रसिद्ध होती हैं। इनकी पूजा आराधना एवं ध्यान से गुप्त से गुप्त सिद्धियाँ, महाबल, शिव रहस्य एवं वरदान प्राप्त होते हैं।
भ्रामरी देवी - भ्रामरी देवी स्वरूप की कांति विचित्र (अनेक रंग की) है। वे अपने तेजो मण्डल के कारण दुर्धर्ष दिखाई देती हैं। उनका अंग राग भी उनके रंग का है तथा वे विचित्र आभूषणों से विभूषित हैं। चित्र भ्रमण, पाणि और महामारी आदि नामों से उनकी महिमा का गान किया जाता है। इनकी पूजा अर्चना साधक को अनेकों महामारी से बचाती है एवं जीवन के सभी आयामों में सफलता प्रदान करती है। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती के मंत्रों में वर्णित मूर्ति रहस्य के पाठ से ही मनुष्य सात जन्मों में उपार्जित ब्रह्म हत्या जैसे घोर पापों से मुक्त हो जाता है। देवी सर्वरुपमयी हैं तथा सम्पूर्ण जगत देवीमय है। अतः मैं उन विश्व रूपी परमेश्वरी को नमस्कार करता हूँ।
॥ इति मूर्ति रहस्यम् सम्पूर्णम् ॥
मूर्ति रहस्य में वर्णित माँ आदि शक्ति का स्वरूप पूर्ण रूप से मातृ दर्शन के रूप में ही लेना चाहिए। साधक के मन में एक माँ के प्रति जो आदर और सात्विक भाव होता है उसी को धारण करके इसका पाठ करना चाहिए किसी भी प्रकार का स्त्री दोष मन में धारण करके माँ की पूजा अर्चना घोर पाप है। साधक के मन में जितना बाल्य स्वरूप स्थापित होगा उतना ही फल उसे मूर्ति रहस्य का प्राप्त होगा । एक बात विशेष तौर पर समझ लेनी चाहिए कि पृथ्वी लोक में शरीर धारण करने की स्थिति में मात्र बाल्य अवस्था ही वह अवस्था है जब मनुष्य अबोध होता है और अबोध अवस्था में परम चेतना एवं प्रेममयी मातृ शक्ति का साक्षात सानिध्य सहज ही प्राप्त होता रहता है।
इस दुर्लभ बाल्यावस्था को प्राप्त करने के लिए ही मंत्र दृष्टा, तंत्र दृष्टा, कर्मकाण्डी एवं अनेकों प्रकार की पद्धतियों का इस्तेमाल करने वाले साधक प्रतिक्षण लालायित रहते हैं। जिस व्यक्ति में बाल्यावस्था किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान रहती है वही प्रेम, वात्सल्य और अनुराग जीवन भर प्राप्त करता रहता है देवी, परम कृपावान है। परंतु आँखों में दृष्टिदोष एवं मन में कलुषित काम भावना और कुकर्मों के कारण ही मनुष्य देवी कृपा से दूर होता जाता है । परमहंस स्वरूप व्यक्तित्व की विशेषता यही है कि उनमें पुनः अबोध बालक के समान लिंग भेद समाप्त हो जाता है इसी परम निर्मलता के कारण स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कलकत्ता स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर में माँ काली के सानिध्य को सम्पूर्ण जीवन प्राप्त किया। निर्मल साधकों के लिये देवी कला की प्राप्ति उनके लिये मात्र खिलौना बनकर रह जाती है। दुर्लभ से दुर्लभ सिद्धियाँ उनके इर्द-गिर्द नर्तन करती हैं परंतु वह उनमें लिप्त हुये बगैर प्रतिक्षण माँ का सानिध्य पाने की ही चेष्टा करते हैं। ऐसी स्थिति में सिद्धियाँ उनके लिये खिलौने की भांति कोई महत्व नहीं रखती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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बाल्य भाव
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विवेकानंद अमेरिका की यात्रा पर गये हुए थे। वहाँ पर उन्होंने प्रथम बार विशालकाय गुब्बारों को देखा जिसमें कि मनुष्य बैठ कर आकाश की सैर कर सकता था, अचानक उनके अंदर बाल सुलभ भाव जाग उठा। उनके साथ बहुत सारे चेले चपाटे थे जो कि स्वामियों, गुरुओं या आध्यात्मिक व्यक्तित्वों को केवल गम्भीर, मुँह बना कर बड़ी-बड़ी बाते करने वाले प्राणी समझते थे। विवेकानंद बच्चों के समान सबके सामने गुब्बारे में बैठने के लिये लालायित हो उठे तुरंत दौड़कर गुब्बारे में बैठ गये और बाल सुलभ हो बड़े-बड़े नेत्रों से ऊपर उड़ते हुए विस्मयकारी दृश्य देख कर बच्चों के समान खिलखिलाने लगे। उनके आसपास के चेले चपाटे बोले स्वामी जी आप इतना साधारण व्यवहार मत कीजिए अन्यथा आप की छवि धूमिल हो जायेगी, लोग आप को पाखण्डी कहने लगेंगे,आप सामान्य मनुष्य लगने लगेंगे।
विवेकानंद ने किसी की नहीं सुनी, बाल सुलभ थे बाल सुलभ बने रहे। बाल सुलभ मन और हृदय ही कौतुहल की दृष्टि प्रदान कर सकता है,बाल सुलभ मन ही विस्मयकारी हो सकता है।बाल सुलभता दुर्गोपासना की प्रथम आवश्यकता है,स्त्री और पुरुष बन कर कृपया कर दुर्गोपासना सम्पन्न न करें अन्यथा कुछ नहीं होने वाला है ।स्त्री और पुरुष बन कर केवल भोग होता है, स्त्री और पुरुष की योगमार्ग में क्या जरूरत? स्त्री और पुरुष एक विशेष अवस्था है। जिन युवाओं में पुरुषत्व की बहुलता है वे केवल स्त्री से आकर्षित होंगे, हर दूसरा युवक सुंदर स्त्री से विवाह मांगता है, हर दूसरी युवती बस वर को ही खोजती है एवं इन्हें अध्यात्म से क्या लेना देना अगर अध्यात्म के - बल पर कुछ स्वार्थ पूर्ति हो जाये तो ठीक है नहीं तो इन्हें एक से बढ़कर एक मार्ग आते हैं। इस सृष्टि में समस्या की जड़ स्त्री और पुरुष के भाव ही हैं।
विवेकानंद भला क्यों बाल सुलभ नहीं होते आखिरकार उनके गुरु परमहंस तो अति में बाल सुलभ थे। वे तो मिठाई की दुकान पर खड़े हो जाते थे, सभी शिष्यों के बीच मिठाई खाने लगते थे, एक बार खुले में शौच कर रहे थे तभी एक भैरवी साधिका उनकी परीक्षा लेने के लिये अचानक वहाँ पर आकर खड़ी हो गयी। वे बालकों की भांति हँसने लगे और पास पड़े पत्थरों से उसे मार कर दूर भगाने लगे, भैरवी का हृदय परिवर्तन हो गया। परमहंस के एक शिष्य ने उनकी परीक्षा लेने के लिये उन्हें कलकत्ता के वेश्यालय में छोड़ दिया वे क्रिया योग में दक्ष थे दूसरे ही क्षण उन्होंने अपने बाल्यभाव को समग्रता के साथ जाग्रत कर लिया, वेश्याओं को देख माँ-माँ चिल्लाने लगे। वेश्याओं को बहुत घमण्ड होता है क्योंकि वे पुरुषों को पराजित करती है परन्तु बालक भाव से वेश्याएँ हार गयी, घबरा गयी, उनका तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया। स्त्री भाव भी मूल प्रकृत्ति ही प्रदान करती है। प्रकृति परमेश्वरी का ही विग्रह है अतः प्रकृति भी नियंत्रिका का काम करती है इसलिए स्त्रियों में नियंत्रण की जन्मजात प्रवृत्ति कूट-कूट कर -भरी हुई होती है। पुरुष या पिण्ड पर नियंत्रण करने के लिये सदैव लालायित रहने वाली शक्ति को ही स्त्री कहते हैं।
जीवन में भले ही एक क्षण के लिये या फिर सम्पूर्ण जीवनभर स्त्री अंतत: पुरुष को सम्पूर्ण नियंत्रण में ले ही लेती है। नियंत्रण की इस रस्साकशी में वह गोपनीय तौर पर प्रतिक्षण माया का निर्माण करती ही रहती है एवं उसका एकमात्र ध्येय पुरुष पर नियंत्रण प्राप्त करना होता है परन्तु स्त्री बाल्यभाव पर नियंत्रण कभी प्राप्त नहीं कर पाती और यहीं पर वह हारती है। बालक जीतता है माता हारती है, यह निश्चित है। अंतत: माता झुकती है। बालभाव स्त्री कला पर अंकुश है। स्त्री भाव का दम्भ बाल भाव के सामने खण्डित हो ही जाता है। भारत के सभी ऋषि मुनियों ने नियंत्रिका रूपी परमेश्वरी की अंततः मातृ भाव में ही उपासना की है। विश्वामित्र जैसा पुरुष प्रधान व्यक्तित्व दुर्लभ है, उसमें पुरुषत्व बचा था तभी मेनका के हाथों पतोन्मुखी हुए, लम्बा समय लगा तब कहीं जाकर बाल्यभाव जाग्रत हुए अंतत: गायत्री कल्प प्राप्त हुआ।
दत्तात्रेय विष्णुअवतार माने गये हैं, अखण्ड ब्रह्मचारी थे एवं लक्ष्मी उनके पास में खड़ी रहती थी। एक बार असुरों के हाथ इंद्र समेत देवताओं की दुर्गति हुई। दुर्गति इसलिये हुई क्योंकि रासरंग में डूब गये थे रासरंग में तो स्त्रियाँ चलती हैं। नारद ने कहा जाओ दत्तात्रेय ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। लुटे-पिटे देवता दत्तात्रेय के पास पहुँचे। दत्तात्रेय बोले मैं बहुत परेशान हो गया हूँ इस सुंदर स्त्री को साथ मे लेकर घूमते-घूमते देवता बोले नहीं नहीं यह तो साक्षात् लक्ष्मी हैं, मातेश्वरी हैं बस दत्तात्रेय उनके मुख से मातेश्वरी ही सुनना चाह रहे थे, उन्हें पुनः बाल भाव का अनुभव कराना चाह रहे थे। एक शब्द में ही देवताओं ने मातृ भाव की स्तुति कर ली ।दत्तात्रेय बोले किसी तरह असुरों को
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(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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विवेकानंद अमेरिका की यात्रा पर गये हुए थे। वहाँ पर उन्होंने प्रथम बार विशालकाय गुब्बारों को देखा जिसमें कि मनुष्य बैठ कर आकाश की सैर कर सकता था, अचानक उनके अंदर बाल सुलभ भाव जाग उठा। उनके साथ बहुत सारे चेले चपाटे थे जो कि स्वामियों, गुरुओं या आध्यात्मिक व्यक्तित्वों को केवल गम्भीर, मुँह बना कर बड़ी-बड़ी बाते करने वाले प्राणी समझते थे। विवेकानंद बच्चों के समान सबके सामने गुब्बारे में बैठने के लिये लालायित हो उठे तुरंत दौड़कर गुब्बारे में बैठ गये और बाल सुलभ हो बड़े-बड़े नेत्रों से ऊपर उड़ते हुए विस्मयकारी दृश्य देख कर बच्चों के समान खिलखिलाने लगे। उनके आसपास के चेले चपाटे बोले स्वामी जी आप इतना साधारण व्यवहार मत कीजिए अन्यथा आप की छवि धूमिल हो जायेगी, लोग आप को पाखण्डी कहने लगेंगे,आप सामान्य मनुष्य लगने लगेंगे।
विवेकानंद ने किसी की नहीं सुनी, बाल सुलभ थे बाल सुलभ बने रहे। बाल सुलभ मन और हृदय ही कौतुहल की दृष्टि प्रदान कर सकता है,बाल सुलभ मन ही विस्मयकारी हो सकता है।बाल सुलभता दुर्गोपासना की प्रथम आवश्यकता है,स्त्री और पुरुष बन कर कृपया कर दुर्गोपासना सम्पन्न न करें अन्यथा कुछ नहीं होने वाला है ।स्त्री और पुरुष बन कर केवल भोग होता है, स्त्री और पुरुष की योगमार्ग में क्या जरूरत? स्त्री और पुरुष एक विशेष अवस्था है। जिन युवाओं में पुरुषत्व की बहुलता है वे केवल स्त्री से आकर्षित होंगे, हर दूसरा युवक सुंदर स्त्री से विवाह मांगता है, हर दूसरी युवती बस वर को ही खोजती है एवं इन्हें अध्यात्म से क्या लेना देना अगर अध्यात्म के - बल पर कुछ स्वार्थ पूर्ति हो जाये तो ठीक है नहीं तो इन्हें एक से बढ़कर एक मार्ग आते हैं। इस सृष्टि में समस्या की जड़ स्त्री और पुरुष के भाव ही हैं।
विवेकानंद भला क्यों बाल सुलभ नहीं होते आखिरकार उनके गुरु परमहंस तो अति में बाल सुलभ थे। वे तो मिठाई की दुकान पर खड़े हो जाते थे, सभी शिष्यों के बीच मिठाई खाने लगते थे, एक बार खुले में शौच कर रहे थे तभी एक भैरवी साधिका उनकी परीक्षा लेने के लिये अचानक वहाँ पर आकर खड़ी हो गयी। वे बालकों की भांति हँसने लगे और पास पड़े पत्थरों से उसे मार कर दूर भगाने लगे, भैरवी का हृदय परिवर्तन हो गया। परमहंस के एक शिष्य ने उनकी परीक्षा लेने के लिये उन्हें कलकत्ता के वेश्यालय में छोड़ दिया वे क्रिया योग में दक्ष थे दूसरे ही क्षण उन्होंने अपने बाल्यभाव को समग्रता के साथ जाग्रत कर लिया, वेश्याओं को देख माँ-माँ चिल्लाने लगे। वेश्याओं को बहुत घमण्ड होता है क्योंकि वे पुरुषों को पराजित करती है परन्तु बालक भाव से वेश्याएँ हार गयी, घबरा गयी, उनका तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया। स्त्री भाव भी मूल प्रकृत्ति ही प्रदान करती है। प्रकृति परमेश्वरी का ही विग्रह है अतः प्रकृति भी नियंत्रिका का काम करती है इसलिए स्त्रियों में नियंत्रण की जन्मजात प्रवृत्ति कूट-कूट कर -भरी हुई होती है। पुरुष या पिण्ड पर नियंत्रण करने के लिये सदैव लालायित रहने वाली शक्ति को ही स्त्री कहते हैं।
जीवन में भले ही एक क्षण के लिये या फिर सम्पूर्ण जीवनभर स्त्री अंतत: पुरुष को सम्पूर्ण नियंत्रण में ले ही लेती है। नियंत्रण की इस रस्साकशी में वह गोपनीय तौर पर प्रतिक्षण माया का निर्माण करती ही रहती है एवं उसका एकमात्र ध्येय पुरुष पर नियंत्रण प्राप्त करना होता है परन्तु स्त्री बाल्यभाव पर नियंत्रण कभी प्राप्त नहीं कर पाती और यहीं पर वह हारती है। बालक जीतता है माता हारती है, यह निश्चित है। अंतत: माता झुकती है। बालभाव स्त्री कला पर अंकुश है। स्त्री भाव का दम्भ बाल भाव के सामने खण्डित हो ही जाता है। भारत के सभी ऋषि मुनियों ने नियंत्रिका रूपी परमेश्वरी की अंततः मातृ भाव में ही उपासना की है। विश्वामित्र जैसा पुरुष प्रधान व्यक्तित्व दुर्लभ है, उसमें पुरुषत्व बचा था तभी मेनका के हाथों पतोन्मुखी हुए, लम्बा समय लगा तब कहीं जाकर बाल्यभाव जाग्रत हुए अंतत: गायत्री कल्प प्राप्त हुआ।
दत्तात्रेय विष्णुअवतार माने गये हैं, अखण्ड ब्रह्मचारी थे एवं लक्ष्मी उनके पास में खड़ी रहती थी। एक बार असुरों के हाथ इंद्र समेत देवताओं की दुर्गति हुई। दुर्गति इसलिये हुई क्योंकि रासरंग में डूब गये थे रासरंग में तो स्त्रियाँ चलती हैं। नारद ने कहा जाओ दत्तात्रेय ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। लुटे-पिटे देवता दत्तात्रेय के पास पहुँचे। दत्तात्रेय बोले मैं बहुत परेशान हो गया हूँ इस सुंदर स्त्री को साथ मे लेकर घूमते-घूमते देवता बोले नहीं नहीं यह तो साक्षात् लक्ष्मी हैं, मातेश्वरी हैं बस दत्तात्रेय उनके मुख से मातेश्वरी ही सुनना चाह रहे थे, उन्हें पुनः बाल भाव का अनुभव कराना चाह रहे थे। एक शब्द में ही देवताओं ने मातृ भाव की स्तुति कर ली ।दत्तात्रेय बोले किसी तरह असुरों को
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(क्रमशः)
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बाल्य भाव (२)
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यहाँ तक ले आओ।देवता पुनः युद्ध करने गये और दैत्य उनके पीछे-पीछे दत्तात्रेय तक आ पहुँचे। एक मुनि के पास अत्यंत परम शोभावान, रत्नों से सुसज्जित दिव्य विभूति को देख दैत्य मोहित हो गये एवं उनके अंदर पुरुषत्व जाग उठा दैत्य सम्राट बोला अरे मुनि यह तो विलक्षण स्त्री रत्न है इसका यहाँ क्या काम तुम इसे हमें सौंप दो तब दत्तात्रेय ने कहा ले जाओ दैत्य खुशी-खुशी लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर ले जाने लगे दत्तात्रेय ने तुरंत देवताओं से कहा कि अब हमला करो यह नियंत्रिका के नियंत्रण में आ गये हैं।देवता शस्त्रों के साथ असुरों पर टूट पड़े और कुछ ही क्षणों में दैत्य पराजित हो गये।
रामकृष्ण परमहंस आज से 150 वर्ष पूर्व हुए थे अतः समझ गये थे कि स्त्री-पुरुष भाब सत्यानाशी है एवं इनके चक्कर में झंझट ही झंझट है।इसलिए अपनी पत्नी को माता के रूप में स्वीकार कर लिया।परमेश्वरी को उन्हें अपना सानिध्य प्रदान करना था इसीलिये रामकृष्ण की युवा पत्नी में भी मातृत्व के भाव स्वतः प्रकट हो गये एवं रामकृष्ण परमहंस को परिवार की तरफ से कोई कष्ट नहीं हुआ अन्यथा अगर उनकी पत्नी में स्त्री भाव एकांश भी आ जाते तो लेने के देने पड़ जाते।जैसे ही एक युवक में पुरुष ग्रंथि विकसित होती है या फिर एक बालिका में रजोस्त्राव होता है उनकी ऊपर की तरफ बढ़नी वाली लम्बाई स्वत: रूक जाती है।जितने लम्बे हो गये या जितनी कद काठी मिल गयी बस मिल गयी अर्थात अब फैल सकते हैं,मोटे हो सकते हैं, बेडौल हो सकते हैं परन्तु लम्बवत उन्नति नहीं होगी। यही ब्रह्मचर्य का सिद्धांत है।जितना ज्यादा विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होगा उतनी ही आध्यात्मिक अवनति होगी, उतना ही साधक मातृत्व से दूर हटता जायेगा और जैसे-जैसे मातृत्व के हाथ से निकलकर नियंत्रण स्त्री के हाथ में जाता जायेगा व्यक्ति वृद्ध होता जायेगा इसलिए कामुक स्त्री पुरुष शीघ्र ही ढल जाते हैं, रोगग्रस्त हो जाते हैं, समस्याओं में उलझ जाते हैं, बालों में सफेदी आ जाती है और एक दूसरे का शोषण शुरू हो जाता है।
दो धाराएं है,दो प्रकार के सम्बन्ध हैं। एक सम्बन्ध में मातृत्व की बहुलता है। एवं यह पुष्टिदायक है यह उन्नति का मार्ग है,यह एक मार्गीय व्यवस्था है,इसमें लेन-देन नहीं है, पुत्र का यह जन्म सिद्ध अधिकार है कि वह माता से प्रेमपूर्वक,हठपूर्वक प्राप्त करता रहे।पुत्र कैसा भी हो, बालक कैसा भी हो फिर भी माता के लिये वह अत्यंत ही प्रिय है, यहाँ पर तुलनात्मक अध्ययन नहीं है पुत्र से माता की अपेक्षा शून्य है। दूसरा विभाग इसके सर्वथा विपरीत है एवं इस मार्ग में पुरुष अगर उपयोगी नहीं है तो फिर दिक्कत हो जायेगी, पुरुष को हर क्षेत्र में स्त्री के लिये उपयोगिता सिद्ध करनी होती है, इसमें लेन-देन है। सम्बन्ध क्या हैं? इस प्रकार अनंत काल से क्यों होता चला आ रहा है? यह सब किसी ने किसी को नहीं सिखाया। सीधी सी बात है मस्तिष्क का निर्माण जिन शक्तियों ने मिलकर किया है एवं जिन शक्तियों के सानिध्य में मस्तिष्क निर्मित हुआ है उनकी मूल प्रकृति ही ऐसी है। मस्तिष्क के अंदर क्रियाशील होने वाली मूल प्रकृति के ही लक्षण सम्बन्धों के रूप में परिलक्षित होते हैं, यह सब आदि व्यवस्था के अंतर्गत आता है।
मस्तिष्क का विकास,उसकी सक्रियता, उसकी क्रियाशीलता को जो एकमात्र भाव प्रबलता प्रदान करता है वह बालभाव है। मैं ऐसा नहीं कह रहा कि बालभाव ही सब कुछ हैं परन्तु इतना जरूर कह रहा हूँ कि बाल भाव जीवन पर्यन्त विलोप नहीं होना चाहिये एवं इसे त्यागना नहीं चाहिये।सृष्टि काल अनुसार अन्य भाव भी उत्पन्न करती है, सृष्टि भाव आधारित है अगर बाल्य भाव चलता रहा तो सृष्टि पर अतिरिक्त भार बढ़ जायेगा क्योंकि मृत्यु सम्भव नहीं हो पायेगी। बाल्यभाव में मृत्यु सबसे दारूण और कष्टप्रद होती है साथ ही बालभाव की मृत्यु मातृत्व सहन नहीं कर पाता ।मातृत्व में इस सिद्धांत की इतनी प्रबलता है कि वह सर्वप्रथम खुद को मरते हुए देख सकती हैं पर बाल्यभाव को नहीं। हर माता वही चाहती है कि उसकी आँखों के सामने उसके पुत्र सदैव बने रहे वे आँखे मूंद लें पर पुत्र जीवित हो।
यह मस्तिष्क की परम इच्छा शक्ति है एवं इस शक्ति की तरफ इशारा ही इस का व्येय है कि एक मूल मातेश्वरी शक्ति है जो कि यह कदापि बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है, किसी भी कीमत पर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसकी संतान उससे पहले काल कवलित हो जाये। इसी शक्ति की मनु ने उपासना की, इसी शक्ति को प्रत्येक मनवंतर में मनु ने दुर्गा रूपी कुलदेवी को स्थापित किया,यही वह उर्वरक शक्ति है जिसका कि मार्कण्डेय ने पान किया और चिरंजीवी, हो गये, इसी शक्ति को विभिन्न रूपों में ऋषिगण प्रतिक्षण भजते रहते। हैं। यह शक्ति अत्यंत ही कातर, दयालु और प्रेममयी है, यह भोली है,यह सीधी-साधी एवं एक मार्गीय है।
(क्रमशः)
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यहाँ तक ले आओ।देवता पुनः युद्ध करने गये और दैत्य उनके पीछे-पीछे दत्तात्रेय तक आ पहुँचे। एक मुनि के पास अत्यंत परम शोभावान, रत्नों से सुसज्जित दिव्य विभूति को देख दैत्य मोहित हो गये एवं उनके अंदर पुरुषत्व जाग उठा दैत्य सम्राट बोला अरे मुनि यह तो विलक्षण स्त्री रत्न है इसका यहाँ क्या काम तुम इसे हमें सौंप दो तब दत्तात्रेय ने कहा ले जाओ दैत्य खुशी-खुशी लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर ले जाने लगे दत्तात्रेय ने तुरंत देवताओं से कहा कि अब हमला करो यह नियंत्रिका के नियंत्रण में आ गये हैं।देवता शस्त्रों के साथ असुरों पर टूट पड़े और कुछ ही क्षणों में दैत्य पराजित हो गये।
रामकृष्ण परमहंस आज से 150 वर्ष पूर्व हुए थे अतः समझ गये थे कि स्त्री-पुरुष भाब सत्यानाशी है एवं इनके चक्कर में झंझट ही झंझट है।इसलिए अपनी पत्नी को माता के रूप में स्वीकार कर लिया।परमेश्वरी को उन्हें अपना सानिध्य प्रदान करना था इसीलिये रामकृष्ण की युवा पत्नी में भी मातृत्व के भाव स्वतः प्रकट हो गये एवं रामकृष्ण परमहंस को परिवार की तरफ से कोई कष्ट नहीं हुआ अन्यथा अगर उनकी पत्नी में स्त्री भाव एकांश भी आ जाते तो लेने के देने पड़ जाते।जैसे ही एक युवक में पुरुष ग्रंथि विकसित होती है या फिर एक बालिका में रजोस्त्राव होता है उनकी ऊपर की तरफ बढ़नी वाली लम्बाई स्वत: रूक जाती है।जितने लम्बे हो गये या जितनी कद काठी मिल गयी बस मिल गयी अर्थात अब फैल सकते हैं,मोटे हो सकते हैं, बेडौल हो सकते हैं परन्तु लम्बवत उन्नति नहीं होगी। यही ब्रह्मचर्य का सिद्धांत है।जितना ज्यादा विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होगा उतनी ही आध्यात्मिक अवनति होगी, उतना ही साधक मातृत्व से दूर हटता जायेगा और जैसे-जैसे मातृत्व के हाथ से निकलकर नियंत्रण स्त्री के हाथ में जाता जायेगा व्यक्ति वृद्ध होता जायेगा इसलिए कामुक स्त्री पुरुष शीघ्र ही ढल जाते हैं, रोगग्रस्त हो जाते हैं, समस्याओं में उलझ जाते हैं, बालों में सफेदी आ जाती है और एक दूसरे का शोषण शुरू हो जाता है।
दो धाराएं है,दो प्रकार के सम्बन्ध हैं। एक सम्बन्ध में मातृत्व की बहुलता है। एवं यह पुष्टिदायक है यह उन्नति का मार्ग है,यह एक मार्गीय व्यवस्था है,इसमें लेन-देन नहीं है, पुत्र का यह जन्म सिद्ध अधिकार है कि वह माता से प्रेमपूर्वक,हठपूर्वक प्राप्त करता रहे।पुत्र कैसा भी हो, बालक कैसा भी हो फिर भी माता के लिये वह अत्यंत ही प्रिय है, यहाँ पर तुलनात्मक अध्ययन नहीं है पुत्र से माता की अपेक्षा शून्य है। दूसरा विभाग इसके सर्वथा विपरीत है एवं इस मार्ग में पुरुष अगर उपयोगी नहीं है तो फिर दिक्कत हो जायेगी, पुरुष को हर क्षेत्र में स्त्री के लिये उपयोगिता सिद्ध करनी होती है, इसमें लेन-देन है। सम्बन्ध क्या हैं? इस प्रकार अनंत काल से क्यों होता चला आ रहा है? यह सब किसी ने किसी को नहीं सिखाया। सीधी सी बात है मस्तिष्क का निर्माण जिन शक्तियों ने मिलकर किया है एवं जिन शक्तियों के सानिध्य में मस्तिष्क निर्मित हुआ है उनकी मूल प्रकृति ही ऐसी है। मस्तिष्क के अंदर क्रियाशील होने वाली मूल प्रकृति के ही लक्षण सम्बन्धों के रूप में परिलक्षित होते हैं, यह सब आदि व्यवस्था के अंतर्गत आता है।
मस्तिष्क का विकास,उसकी सक्रियता, उसकी क्रियाशीलता को जो एकमात्र भाव प्रबलता प्रदान करता है वह बालभाव है। मैं ऐसा नहीं कह रहा कि बालभाव ही सब कुछ हैं परन्तु इतना जरूर कह रहा हूँ कि बाल भाव जीवन पर्यन्त विलोप नहीं होना चाहिये एवं इसे त्यागना नहीं चाहिये।सृष्टि काल अनुसार अन्य भाव भी उत्पन्न करती है, सृष्टि भाव आधारित है अगर बाल्य भाव चलता रहा तो सृष्टि पर अतिरिक्त भार बढ़ जायेगा क्योंकि मृत्यु सम्भव नहीं हो पायेगी। बाल्यभाव में मृत्यु सबसे दारूण और कष्टप्रद होती है साथ ही बालभाव की मृत्यु मातृत्व सहन नहीं कर पाता ।मातृत्व में इस सिद्धांत की इतनी प्रबलता है कि वह सर्वप्रथम खुद को मरते हुए देख सकती हैं पर बाल्यभाव को नहीं। हर माता वही चाहती है कि उसकी आँखों के सामने उसके पुत्र सदैव बने रहे वे आँखे मूंद लें पर पुत्र जीवित हो।
यह मस्तिष्क की परम इच्छा शक्ति है एवं इस शक्ति की तरफ इशारा ही इस का व्येय है कि एक मूल मातेश्वरी शक्ति है जो कि यह कदापि बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है, किसी भी कीमत पर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसकी संतान उससे पहले काल कवलित हो जाये। इसी शक्ति की मनु ने उपासना की, इसी शक्ति को प्रत्येक मनवंतर में मनु ने दुर्गा रूपी कुलदेवी को स्थापित किया,यही वह उर्वरक शक्ति है जिसका कि मार्कण्डेय ने पान किया और चिरंजीवी, हो गये, इसी शक्ति को विभिन्न रूपों में ऋषिगण प्रतिक्षण भजते रहते। हैं। यह शक्ति अत्यंत ही कातर, दयालु और प्रेममयी है, यह भोली है,यह सीधी-साधी एवं एक मार्गीय है।
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बाल्य भाव (३)
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अतः यही परम विशुद्ध मातृशक्ति है जो कि सर्वस्व लुटा कर पुत्रों को जीवित रखे हुए है । यही भाव ब्रह्मचारी बनाते हैं। इस कातर और दयामयी शक्ति के संस्पर्श से ही काम विकार नष्ट होते हैं एवं मातृभाव जाग्रत होते हैं।
यह है योगमयी शक्ति, इसी को ढूंढते फिरते हैं तत्व ज्ञानी एवं मुमुक्ष जन पर यह तो बिल्कुल पास खड़ी होती है, अपलक आँखों से बस पुत्र का इन्तजार कर रही होती है। पुरुषार्थ, स्त्री- आकर्षक, जग-संसार के प्रपंचों में उलझे अपने पुत्र को पुनः प्राप्त करने की लम्बी प्रतीक्षा कर रही होती है। समस्त शस्त्रों से युक्त होते हुए भी पुत्र के सामने निशस्त्र होती है, पुत्र को भटकता देख कर भी मोह में लिप्त होती है। मोह इस शक्ति की मुख्य पहचान है एवं केवल पुत्र मोह ही इसके मूल में है। यह जागृत भी पुत्र की आवाज पर ही होती है और सुप्त भी पुत्र के आचरण से ही होती है। इसका कीलन, उत्कीलन केवल पुत्र ही दूर कर सकता है। वाल्यभाव के अधीन दुर्गेश्वरी है। यह समस्त ब्रह्माण्ड की नेत्री हैं, समस्त ब्रह्माण्ड की नियंत्रिका है पर इस पर नियंत्रण बालक का है। यह किसी को कुछ नहीं समझती, सबसे परे है, कोई भी इसकी हद तक नहीं पहुँच सकता सिवा बालक के। बालक पुकारेगा तो जाग जायेगी, समस्त कार्यों को छोड़ सामने खड़ी होगी। आप दस महाविद्या सिद्ध करना चाहते हैं, महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, दुर्गा के दर्शन चाहते कुछ बनना चाहते हैं तो उसका एक मात्र विधान है "बाल्यभाव।
बाल्यभाव व्यक्ति की युवा अवस्था लम्बा करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिन लोगों में बाल्यभाव होता है वे 18 वर्ष की उम्र से लेकर 50 वर्ष की उम्र तक एक जैसे ही दिखते हैं। बुढ़ापा उन्हें - स्पर्श नहीं कर पाता, वृद्धावस्था की अवधि घट जाती है। योग क्या है? रसेश्वरी विद्या क्या है? रसोत्पादन क्या है? इनके मूल में बाल्य भाव का अनुसंधान ही छिपा हुआ है। शरीर को बच्चो के समान हर दिशा में मोड़ना, शरीर के अंदर प्राण शक्ति का प्रबल संचार होना ही बाल्यभाव का प्रमाण है। बच्चों को चोट लगती है तुरंत ठीक हो जाती है, बच्चे भीषण से भीषण दुर्व्यवहार को भी तुरंत भूल जाते हैं, बच्चे ही सीख सकते हैं। सिखायेगी माता और सीखेगे बच्चे।
सयानों को क्या सिखाना? सवाल उठता है कि सृष्टि ने सबको भौतिक रूप से एक माता प्रदान की है, उसका सानिध्य दिया है तो फिर मातृोपासना या दुर्गापासना की क्या जरूरत? जन्म देने वाली माता एक कड़ी है, जिसने हमें प्रदुर्भावित किया परंतु सर्व समर्थता एवं विभिन्न कलाएँ जरूरी नहीं है कि हमें वर्तमान की माता से प्राप्त हो गयी हो अतः दुर्गोपासना के द्वारा हम अनंत अव्यक्त संस्कारों, कलाओं एवं साधनो इत्यादि में से अपनी क्षमतानुसार प्राप्त करते रह सकते हैं। दुर्गोपासना का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जितनी बार हम इस साधना को सम्पन्न करेंगे हर बार कुछ नया प्राप्त होगा, हर बार एक नया दृष्टिकोण मिलेगा, हर बार कुछ सीखने को मिलेगा। ये लेख अटपटा, अविकसित और अर्थहीन भी हो सकते हैं क्योंकि दुर्गा पर लिखा गया है। एक बालक के रूप में जो मिल गया उसे प्राप्त कर लेना सहज रूप से आगे फिर कभी देखेंगे।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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अतः यही परम विशुद्ध मातृशक्ति है जो कि सर्वस्व लुटा कर पुत्रों को जीवित रखे हुए है । यही भाव ब्रह्मचारी बनाते हैं। इस कातर और दयामयी शक्ति के संस्पर्श से ही काम विकार नष्ट होते हैं एवं मातृभाव जाग्रत होते हैं।
यह है योगमयी शक्ति, इसी को ढूंढते फिरते हैं तत्व ज्ञानी एवं मुमुक्ष जन पर यह तो बिल्कुल पास खड़ी होती है, अपलक आँखों से बस पुत्र का इन्तजार कर रही होती है। पुरुषार्थ, स्त्री- आकर्षक, जग-संसार के प्रपंचों में उलझे अपने पुत्र को पुनः प्राप्त करने की लम्बी प्रतीक्षा कर रही होती है। समस्त शस्त्रों से युक्त होते हुए भी पुत्र के सामने निशस्त्र होती है, पुत्र को भटकता देख कर भी मोह में लिप्त होती है। मोह इस शक्ति की मुख्य पहचान है एवं केवल पुत्र मोह ही इसके मूल में है। यह जागृत भी पुत्र की आवाज पर ही होती है और सुप्त भी पुत्र के आचरण से ही होती है। इसका कीलन, उत्कीलन केवल पुत्र ही दूर कर सकता है। वाल्यभाव के अधीन दुर्गेश्वरी है। यह समस्त ब्रह्माण्ड की नेत्री हैं, समस्त ब्रह्माण्ड की नियंत्रिका है पर इस पर नियंत्रण बालक का है। यह किसी को कुछ नहीं समझती, सबसे परे है, कोई भी इसकी हद तक नहीं पहुँच सकता सिवा बालक के। बालक पुकारेगा तो जाग जायेगी, समस्त कार्यों को छोड़ सामने खड़ी होगी। आप दस महाविद्या सिद्ध करना चाहते हैं, महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, दुर्गा के दर्शन चाहते कुछ बनना चाहते हैं तो उसका एक मात्र विधान है "बाल्यभाव।
बाल्यभाव व्यक्ति की युवा अवस्था लम्बा करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिन लोगों में बाल्यभाव होता है वे 18 वर्ष की उम्र से लेकर 50 वर्ष की उम्र तक एक जैसे ही दिखते हैं। बुढ़ापा उन्हें - स्पर्श नहीं कर पाता, वृद्धावस्था की अवधि घट जाती है। योग क्या है? रसेश्वरी विद्या क्या है? रसोत्पादन क्या है? इनके मूल में बाल्य भाव का अनुसंधान ही छिपा हुआ है। शरीर को बच्चो के समान हर दिशा में मोड़ना, शरीर के अंदर प्राण शक्ति का प्रबल संचार होना ही बाल्यभाव का प्रमाण है। बच्चों को चोट लगती है तुरंत ठीक हो जाती है, बच्चे भीषण से भीषण दुर्व्यवहार को भी तुरंत भूल जाते हैं, बच्चे ही सीख सकते हैं। सिखायेगी माता और सीखेगे बच्चे।
सयानों को क्या सिखाना? सवाल उठता है कि सृष्टि ने सबको भौतिक रूप से एक माता प्रदान की है, उसका सानिध्य दिया है तो फिर मातृोपासना या दुर्गापासना की क्या जरूरत? जन्म देने वाली माता एक कड़ी है, जिसने हमें प्रदुर्भावित किया परंतु सर्व समर्थता एवं विभिन्न कलाएँ जरूरी नहीं है कि हमें वर्तमान की माता से प्राप्त हो गयी हो अतः दुर्गोपासना के द्वारा हम अनंत अव्यक्त संस्कारों, कलाओं एवं साधनो इत्यादि में से अपनी क्षमतानुसार प्राप्त करते रह सकते हैं। दुर्गोपासना का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जितनी बार हम इस साधना को सम्पन्न करेंगे हर बार कुछ नया प्राप्त होगा, हर बार एक नया दृष्टिकोण मिलेगा, हर बार कुछ सीखने को मिलेगा। ये लेख अटपटा, अविकसित और अर्थहीन भी हो सकते हैं क्योंकि दुर्गा पर लिखा गया है। एक बालक के रूप में जो मिल गया उसे प्राप्त कर लेना सहज रूप से आगे फिर कभी देखेंगे।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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भारतीय संस्कृति
समयसूचक AM और PM का उदगम
भारत ही था। पर हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :
AM : एंटी मेरिडियन (ante meridian)
PM : पोस्ट मेरिडियन (post meridian)
एंटी यानि पहले, लेकिन किसके?
पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?
यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।
अध्ययन करने से ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को अपनी आंधियों में उड़ा दिया और अब, सब कुछ साफ-साफ दृष्टिगत है।
कैसे?
देखिये...
AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya
PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya
----------------------------
सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसीको गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस 'मतलब' को नहीं इंगित करते जो कि वास्तव में है।
आरोहणम् मार्तण्डस्य Arohanam Martandasaya यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।
पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasaya यानि सूर्य का ढलाव।
दिन के बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।
पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।
साभार.....
@Sanatan
समयसूचक AM और PM का उदगम
भारत ही था। पर हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :
AM : एंटी मेरिडियन (ante meridian)
PM : पोस्ट मेरिडियन (post meridian)
एंटी यानि पहले, लेकिन किसके?
पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?
यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।
अध्ययन करने से ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को अपनी आंधियों में उड़ा दिया और अब, सब कुछ साफ-साफ दृष्टिगत है।
कैसे?
देखिये...
AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya
PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya
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सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसीको गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस 'मतलब' को नहीं इंगित करते जो कि वास्तव में है।
आरोहणम् मार्तण्डस्य Arohanam Martandasaya यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।
पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasaya यानि सूर्य का ढलाव।
दिन के बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।
पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।
साभार.....
@Sanatan
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