सनातन धर्म • Sanatan Dharma
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योग
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         पृथ्वी से लेकर सूर्य एव हमारी आकाशगंगा के ग्रह - पिण्डों का निर्माण भी उसी प्रक्रिया से हुआ है जिस प्रकार ब्रम्हाण्ड में अन्य आकाश गंगाओं एवं ग्रहपिण्डों का निर्माण होता है। महा मंथन ही सब पिण्डों के जन्म की प्रक्रिया है। महामंथन ही तत्वों को असीम शक्ति एवं ऊर्जा प्रदान कर सकता है। ब्रम्हाण्ड में असंख्य तारे, असंख्य व्यवस्थाओं में अनादिकाल से व्यवस्थित रहते है और फिर एक समय ऐसा आता है जब महामंथन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। सभी ग्रहपिण्ड टूट कर खण्ड-खण्ड हो जाते हैं। पुरातन ग्रह व्यवस्थाएँ समाप्त हो जाती हैं। बचता है तो सिर्फ केन्द्र के आसपास सूक्ष्म रूप में घूमते हुए तत्वों की आवृत्तियाँ । इस मंथन की प्रक्रिया में सर्वप्रथम तो सड़ी-गली व्यवस्थाएँ मिटती हैं, भेदात्मक प्रवृत्ति का नाश होता है. पुनः एक बार समस्त शक्तियाँ एकाग्रता धारण करती हैं और फिर इसी महा प्रचण्ड शक्ति में से ग्रह, नक्षत्र तारों, चन्द्रमाओं एवं आकाश गंगाओं की नयी एवं परिष्कृत व्यवस्था स्वरूप लेती है।

          महामंथन के समय भी जीव तत्व समाप्त नहीं हैं। वे भी अन्य तत्वों के समान सूक्ष्म आवृत्ति धारण कर धुरी के इर्द-गिर्द भ्रमण करते हैं। सभी तत्वों को एक ना एक बार शक्तिकृत तो होना ही पढ़ता है। महामंथन ही योग है। महामंथन ही वह प्रक्रिया है जिसमें सम्पूर्ण भोग की उत्कृष्टता देखने को मिलती है अर्थात भोग की वह चरम अवस्था जिसमें भेद प्रवृति का अस्तित्व ही नहीं है। बस एकात्मकता ही एकात्मकता है। योग की यह उच्च अवस्था तत्त्वों की चेतना को परम संभोग से साक्षात्कार कराती है। संभोग का तात्पर्य ही स्वीकृति है अर्थात दोनो तीनो या अन्य पक्षों को समान रूप से स्वीकार है। आपका समाज आपके बंधू बान्धव, आपकी शिक्षा, आपके गुरु यह सब एक के बाद एक आपकी बुद्धि को, आपके तर्क को, आपके अंदर इन्द्रिय ज्ञान को एवं आपके मन एवं मस्तिष्क को एक के बाद एक अवरोधित एवं खण्डित करते जाते हैं।

           जन्म लेते समय आप एक शक्ति पुंज होते हैं परंतु उम्र के साथ-साथ शक्ति क्षीण होती जाती है। इतनी क्षीण हो जाती है कि आप कभी-कभी घास के समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं जो कि थोड़ी सी ही धूप में मुरझा जाती है। पैरो तले रौंदी जाती है, कुछ इन्चों से ज्यादा ऊपर उठने की उसमें क्षमता ही नहीं होती है। इस प्रकार का जीवन अगर आप चाहते हैं तो फिर बात और है अन्यथा अगर आप नवीनता के साथ एक शक्तिपुंज बनाना चाहते है तो फिर आपको जीवन पद्धति में योग को धारण करना होगा केवल आसनों को ही नहीं बल्कि योग के उस समग्र सिद्धान्त जो कि महामंथन का प्रतिनिधित्व करता है। शरीर के स्तर पर, ज्ञान के स्तर पर, चेतना के स्तर पर एवं अन्य धरातलों पर आपको योग रूपी मंथन प्रारंभ करना होगा जिससे कि शरीर, मन, ज्ञान, चेतना एवं समाजिक और बौद्धिक स्तर पर विराजमान सभी सड़ी-गली व्यवस्थाएँ नेस्तनाबूद हो जाये एवं पुनः नवीन ऊर्जा से शक्तिकृत एक परिष्कृत व्यवस्था प्रार्दुभाव में आये ।

          आप प्रातः काल उठकर योगासनों का अभ्यास करते है। शरीर के विभिन्न अंग प्रत्यंगों को अनेको स्थितियों में घुमाते, झुकाते एवं स्थापित करते हैं। श्वासो को विभिन्न आयामों से परिचित करवाते है। सूक्ष्म व्यायाम के जरिये अंग प्रत्यंगों को भी लय प्रदान करते हैं, शीर्ष आसन करते समय रक्त संचार को एक दम उलट कर रख देते है। इस प्रकार प्रत्येक अंग प्रत्यंग, ग्रंथिया, बुद्धि केन्द्र एवं अन्य मस्तिष्कीय विभागों को भिन्न-भिन्न शारीरिक स्थितियों में कार्य करना पड़ता है। इससे सभी अवयव अति में एकाग्रचित हो जाते है। दिन भर की जमी हुई मैल एवं अशुद्धियाँ विसर्जित हो जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा समूचा अस्तित्व एक समग्र मंथन की स्थिति का निर्माण करता है जिससे कि विषमय कोष विसर्जित होते है तो वहीं अमृतमय कोषो से हमारा अस्तित्व परिचित होता है। लक्ष्मी का उद्भव भी मंथन प्रक्रिया से ही संभव हुआ है अतः लघु ब्रम्हाण्ड रूपी इस शरीर में श्री
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।
इतनी महिमा को धारे पुरुष वही तेजवन्त ।
जहाँ जहाँ गति मन वर्तते वहीं-वहीं कालवंत ।।

इतना भारी विराट् ब्रह्माण्ड उन परम पुरुष की महिमा है वे अपनी विभूति विस्तार से भी महान् हैं। उनकी एक पाद विभूति में ही पञ्चभूतात्मक विश्व ब्रह्माण्ड है,शेष जो त्रिपाद विभूमि हैं उनमें अमृत दिव्यलोक हैं।
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदेत् पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।
ततो विष्वड्. व्यक्रामत् साशनानशने अभि ।।
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(क्रमशः)

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योग (२)
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तीन पाद हैं जग से बाहर, एक पाद है जग में।
पाद एक से भुवन रचा यह, लोक चतुर्दश पल में ।।

दे प्रभु इस जगत् से परे त्रिपाद विभूति में प्रकाशमान हैं। एक पाद में ही यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड प्रकट हो जाता है, वे सम्पूर्ण विश्व को परिव्याप्त किये हुए हैं। प्राणवान अप्राणवान जड़ चैतन्य-जगत् उन्हीं से है।

की उत्पत्ति भी मंथन के द्वारा ही होगी। लक्ष्मी के साथ रत्न भी उत्पन्न होते हैं, इंद्र का वज्र भी अस्तित्व में आता है तो वहीं एरावत रूपी गज भी उत्पन्न होता है एवं इसके साथ अष्ट सिद्धियाँ एवं नौ निधियाँ भी आपके शरीर में प्रकट होती है। देवासुर संग्राम के समय समुद्र मंथन मे शेषनाग है तो वही विष्णु, शिव एवं ब्रह्मा भी समुद्र मंथन के साक्षी होने के साथ-साथ उसमें अपनी क्रियाशीलता दिखा रहे हैं। शिव विष को ग्रहण कर नीलकण्ठ हो रहे हैं तो वही विष्णु अपनी माया से असुरो को भ्रमित कर रहे हैं एवं राहु-केतु का चक्र से वध भी कर रहें हैं। ब्रह्माजी अपने अक्षय कमण्डल के पवित्र जल से समस्त शक्तियों को बीज रूप में स्थापित कर रहें हैं। योग इसीलिये सनातन पद्धति है क्योंकि वह सार्वभौमिक सिद्धांत पर आधारित है।

योग के साधक का तात्पर्य उस जातक से है जो कि अपने अंदर श्री के समग्र स्वरूपों को स्थापित करने की शक्ति रखता है एवं वह सृष्टि द्वारा प्रदान असंख्य शक्ति बीजों के समूह मानव मस्तिष्क से असंख्य शक्ति स्वरूपों का प्रकाश भी उत्सर्जित करना है। मंथन की प्रक्रिया में जिस प्रकार शेषनाग अपनी विष ग्रन्थी से सम्पूर्ण विष का त्याग करते है ठीक उसी प्रकार योग अभ्यासी अपने अंदर बैठे विषरूपी कुण्ठा, क्रोध, हिंसा, व्याभीचार, कुतर्क, कुबुद्धि, द्वैष, प्रतिस्पर्धा, घृणा इत्यादि अनेको नकारात्मक शक्तियों को विसर्जित करता है। अनेको कारणों से खण्ड-खण्ड में बटीं हुई शारीरिक, मानसिक एवं अध्यात्मिक व्यवस्था पुनः एकीकृत होती है। और मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व एक पवित्र ऊर्जामयी स्वरूप में जन साधारण के सामने उपस्थित होता है। शरीर धारण करते हुए भी परम हंस एवं मंगलमूर्ति स्वरूप में लोगों को असीम आनंद प्रदान करना ही ये का मूल उद्देश्य है।

मंथन एवं योग (योग, भोग एवं संभोग) एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। मंथन एवं योग के पीछे छिपा हुआ बीज या मूल शक्ति केंद्र का नाम है सम्पूर्ण विद्रोह ! विद्रोह एवं क्रांति में प्राकृतिक अंतर है। विद्रोह के अंदर ही असंख्य क्रांतियाँ निहित है। क्रांतियाँ उभयपक्षी हैं तो विद्रोह या मंथन आदि गुरू शंकराचार्य जी द्वारा वर्णित सृष्टि क्रम की प्रक्रिया ही है इसके विपरीत संहार क्रम है जिसमें कि लक्ष्य तो शीघ्रगामी है परंतु फल मधुर नहीं है। ब्रह्माण्ड में पिण्ड संरचना या फिर जीव संरचना इसीलिये प्रादुर्भाव में आती है कि मूल तत्व कार्बन की अति सूक्ष्म आवृत्तियों में महालक्ष्मी उस स्वरूप में विद्वान है जो कि उन्हें अन्य तत्वों की सूक्ष्म आवृत्तियों से असंख्य प्रकार से योजनाबद्ध करती है।

हमारी पृथ्वी पर या ब्रह्माण्ड में असंख्य प्रकार के जीव एवं सरंचनाएँ केवल मूल तत्वों के असंख्यों समायोजना का ही प्रतीक है। स्वस्थ शरीर स्वस्थ बुद्धि, दीर्घ जीवन, कांतिमय आभामंडल यह सब लक्ष्मी का ही स्वरूप है लक्ष्मी का तात्पर्य केवल अर्थ ही नहीं है वह तो आद्र स्वरूपा है जहाँ वे प्रतिष्ठित हो जायेगी वहां आत्म प्रकाश, सौन्दर्य, कांति, एश्वर्य, सुख, सम्मोहन, कीर्ति, यश सब कुछ स्वयं ही प्रकट होने लगेगें। मातृ स्वरूप में वे ही सिद्धिदायी है। संतों के मुख से उच्चारित अमृतवाणी उन्ही का प्रतिनिधित्व करती है। नदियों से प्राप्त मृदु जल उन्हीं का प्रतीक है। अगर एक क्षण के लिये श्री इस पृथ्वी से चलयमान हो जाये तो फिर हमारा पिण्ड ग्रह अन्य ग्रहों के समान जल विहीन, वायु विहीन एवं जीवन विहीन हो जायेगा। बस सब तरफ एक विचित्र सी नीरवता ही नीरवता दिखाई देगी।

योग आपके व्यक्तित्व को इतना शुद्ध एवं पवित्र बना देता है कि महालक्ष्मी के विभिन्न स्वरूप जैसे कि स्वास्थ, सुदर्शनता, आत्मज्ञान, अष्ट सिद्धियाँ, अमृतवाणी इत्यादि इत्यादि स्वयं आप में आ कर प्रतिष्ठित हो जाती है। जहां मंथन है वहीं शुद्धता की अतिपरिष्कृत अवस्था है और शुद्धता ही महालक्ष्मी की चलायमान प्रवृति को निरंतरता में परिवर्तित कर सकती है। योग विद्या में अखण्डता एवं निरन्तरता ही मंथन को भी निरंतरता प्रदान करती है। मंथन की निरंतरता ही आपके जीवन में श्री के निरंतर प्रवाह को बनाये रखने में सक्षम है। योग के द्वारा ही आप जीवन को अंत तक श्री युक्त बनाये रख सकते हैं।
।। इति शुभम् ।।
‌ शिव शासनत: शिव शासनत:

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आत्मसमर्पण
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नारद जी ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। वे एक बार तपस्या करने के लिए उद्धत हुए, गंगोत्री के पास एक विशेष शिव क्षेत्र है यहीं पर भगवान शिव ने घोर तपस्या की थी और कामदेव का दहन कर दिया था जिसके कारण यह सम्पूर्ण क्षेत्र काम विहीन हो चुका है एवं कामदेव यहाँ पर क्रियाशील नहीं होते हैं। कामदेव की एक भी कला यहाँ । पर प्रभावी नहीं होती यही कारण है कि अधिकांशतः मोक्षगामी ऋषि-मुनि एवं अन्य साधक इसी स्थान को तप के लिए चुनते हैं, हमारे पुराणों में इस स्थान का अत्यधिक महत्व है। आज भी कामुक से कामुक व्यक्ति बद्रीनाथ । से लेकर गंगोत्री तट के क्षेत्र में अगर निवास करे तो वह पूर्णत: सात्विक हो जाता है।

नारद जी ने उग्र तपस्या प्रारम्भ की, इन्द्र को लगा कि कहीं मेरा पद न चला जाय तुरंत ही कामदेव को आदेश दिया जाओ नारद की तपस्या भंग करो। कामदेव ने समस्त प्रपंच अपने पाँच बाणों के द्वारा रचे पर नारद की तपस्या भंग नहीं हुई। कालान्तर नारद गर्व से भर उठे सीधे ब्रह्मा के पास पहुँचे और बोले मैंने काम पर विजय पा ली है। ब्रह्मा अंतर्यामी हैं सब कुछ समझ गये बोले जाओ शिव से आशीर्वाद ले लो। नारद जी शिव लोक पहुँच गये और अपनी तपस्या का बखान करने लगे। परम परमेश्वर आदि देव बोले बेटा इस बात को गोपनीय रखना किसी के सामने अपनी सिद्धि का बख़ान मत करना विशेषकर विष्णु के सामने तो कभी नहीं। इसे गोपनीय रखना परम आवश्यक है। शिव सब कुछ समझ गये थे। खैर नारद के पेट में कहाँ बात पंचती है वे बैकुण्ठ धाम पहुँच गये और विष्णु के सामने भी बखान करने लगे। विष्णु तो लीलाधारी हैं, मायावी हैं तुरंत ही एक नगरी रच दी और वहाँ के राजा के यहाँ महालक्ष्मी को पुत्री के रूप में भेज दिया।

कमला का कमनीय सौन्दर्य, प्रत्येक अंग कमल के समान आकर्षक एवं आकर्षित, करने वाला। यहाँ पर महालक्ष्मी का नाम पड़ा श्रीमती आजकल हम श्रीमती का मतलब विवाहित स्त्री से लगाते हैं परन्तु महालक्ष्मी श्रीमती के रूप में कुंवारी ही थीं। विष्णु की लीला विष्णु ही जाने। नारद फिसल गये महालक्ष्मी का सौन्दर्य ही ऐसा है। उनके अंदर स्त्री प्राप्ति की इच्छा जाग उठी सीधे विष्णु के पास पहुँचे बोले मुझे अपना रूप दें दो स्वयंवर में जाना हैं। विष्णु मुस्कुरा दिए अपने रूप की जगह वानर का रूप दे दिया। स्त्री मोह में अंधे नारद सीधे स्वयंवर स्थल पर पहुँचे श्रीमती उन्हें देख कुपित हो उठीं। स्वयंवर में उन्होंने किसी को पसंद नहीं किया। महालीलाधारी शिव, विष्णु की इस लीला को देख रहे थे तुरंत अपने दो पार्षद भेजे नारद को समझाने के लिए पर मोहिनी का जादू सर चढ़कर बोल रहा था। नारद की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी शिव पार्षदों को भी श्राप दे दिया, विष्णु को भी श्राप दे बैठे, बहुत कुछ भला बुरा कहा। विष्णु शांत भाव से शापित होते रहे पर जब नारद पुनः चेतना में लौटे तो भारी पश्चाताप हुआ।

वास्तविकता यह थी कि वे कामशून्य नहीं हुए थे बल्कि यह तो कामशून्य दिव्य शिव तीर्थ की ही महिमा थी कि कामदेव निष्फल हो गये थे। नारद ने आत्मसमर्पण कर दिया, फूट-फूटकर श्री हरि के चरणों में गिड़गिड़ाने लगे। ब्रह्मा के पास जाकर भी भारी पश्चाताप करने लगे, शिव सानिध्य में जा प्राणोत्सर्ग करने की ठान बैठे। खैर जब आत्मसमर्पण सम्पूर्ण हुआ तब पुनः त्रिदेवों ने नारद 'को आशीर्वचन प्रदान किए। एक बार नारद की बुद्धि पुनः शुद्ध हुई, वे पवित्र मुनि । पद पर गतिमान हुए।

आत्म समर्पण तो करना ही पड़ेगा । अध्यात्म के क्षेत्र में मुँह से बोलने से काम नहीं चलेगा। नौटंकी बाजी से कुछ नहीं होगा। 90 प्रतिशत व्यक्ति बोलते हैं हम बीस साल से पूजा कर रहे हैं, घण्टे बजा रहे हैं, मंत्र जप कर रहे हैं, यज्ञानुष्ठान कर रहे हैं फिर भी मजा नहीं आ रहा है, हमारे गुरु महाराज भी हैं पर वे भी बेकार हैं हमें तो लगता है उन्हें कुछ नहीं आता है, वे ढोंगी हैं' इत्यादि इत्यादि । इस तरह के विचार, संशय-असंशय । अधिकांशत: लोगों के मन में घुमड़ते रहते हैं। पूजा, उपासना, मंत्र जप, योग क्रिया के साथ-साथ अध्यात्म के क्षेत्र में सम्पन्न किए गये प्रत्येक कर्म के पीछे व्यक्ति विशेष को आत्मसमर्पण की तरफ गतिमान होने देने का ही लक्ष्य होता है। आत्मसमर्पण में समय लगता है। यह एक प्रकार से एक विशेष परा अवस्था है जो कि परमानंद प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। जो साधक अपने ईष्ट के प्रति आत्मसमर्पित हो जाता है वही साक्षात् ईष्ट में विलीन हो पाता है अन्यथा दूरियाँ बनी रहती हैं। .

(क्रमशः)

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आत्मसमर्पण (२)
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मतभेद और मनः भेद कहीं न कहीं दिखाई पड़ते हैं। "काली" रामकृष्ण परमहंस के सामने जैसे ही बोला जाता था वे मूच्छित हो जाते थे, एक क्षण में पंचेन्द्रिय नियंत्रण शिथिल हो जाता था, सारे बदन में झटके आने लगते थे, सभी चक्र जागृत हो जाते थे, मुँह से जम्हाइयाँ और फेन निकलने लगता था। इसे कहते हैं आत्मसमर्पण । शिष्य लोग डर के मारे उनके सामने काली शब्द का उच्चारण ही नहीं करते थे। ले काली खाना खा रामकृष्ण परमहंस हाथ में कौर लेकर काली से बोलते थे और दूसरे ही क्षण काली साक्षात् प्रकट होकर भोजन कर रही होती थीं। इसे कहते हैं आत्मसमर्पण नहीं तो ढोंगियों के समान सौ अक्षर के दक्षिण काली का मंत्र जप करते रहो काली बिल्ली भी प्रकट नहीं होगी। यह है क्रिया योग । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है हमारे गुरु के भी एक से एक शिष्य हैं उनके सामने बस कह दो निखिल दूसरे ही क्षण भाव जगत का अनुभव ले लो। ईश्वर भाव जगत के अधीन है, गुरु भाव जगत के अधीन गमन करता है। ऐसे ही शिष्य उनके दर्शन करते हैं, उनसे बाते करते हैं, उनकी लीला को साक्षात् प्रकट होते देखते हैं।

समग्रता के साथ देखना है, कुछ प्राप्त करना है, अनुभवातीत मस्तिष्क का मालिक बनना है तो फिर आत्मसमर्पण की कला सीखनी पड़ेगी। आइसटाइन का नौकर उनसे ज्यादा बना ठन कर रहता था। आइसटाइन तो बस अनंत ब्रह्माण्ड में रमे रहते थे उन्हें कहाँ फुरसत थी नहाने की, दाढ़ी बनाने की या वस्त्र बदलने की। लोग उनके नौकर को आइसटाइन समझ फूलमाला पहना देते थे। वास्तविकता क्या है? सत्य क्या है? यह बिना आत्मसमर्पण किए समझ में नहीं आयेगा नहीं तो ऊपरी तल पर देखते रहोगे। आत्मसमर्पित होने का मतलब है ढलने की प्रक्रिया। आत्मसमर्पण ही व्यक्ति को अहिंसक बनाता है यही कमलात्मिका रहस्य है।


मैं उस आत्मसमर्पण की बात नहीं कर रहा हूँ जो दुनियादारी में होता है। सौ खून करके अपनी जान बचाने के लिए ढोंग करना आत्म समर्पण नहीं है। स्वार्थ के लिए या फिर दबाववश धर्म परिवर्तन कर लेना आत्मसमर्पण नहीं है। यह आत्मसमर्पण की गलत परिभाषा है। आत्मसमर्पण व्यक्तिगत विषय है, दुसरे का इससे कोई भी लेना देना नहीं है। इसे कहते हैं सोखने की कला। स्वयं के अस्तित्व को मिटाकर लीन होने की प्रक्रिया। जे कृष्णमूर्ति, आदि गुरु शंकराचार्य जी इत्यादि जितने भी ब्रह्मज्ञानी हुए उन्होंने वेदान्त के प्रति अपने आपको आत्मसमर्पित कर दिया, वे ही वेदान्त हो गये और वेदान्त ही इन विभूतियों के मुख से पुन: वाणीमय हुआ। आत्मसमर्पण दुर्लभ स्थिति । आप जीवन में आत्मसमर्पित हो जाये बस यही प्रार्थना है, आपको आत्मसमर्पित मित्र, पत्नी या कोई और मिल जाये तो आपका पृथ्वी पर आना धन्य हो जायेगा । खोज करने के लिए कुछ और नहीं है, कमल नयनों से देखने के लिए कुछ और नहीं हैं, करकमलों से किसी को छूने के लिए कुछ और नहीं बस आत्मसमर्पित पिण्ड चाहिए। चाहे वह शिष्य के रूप में हो या फिर किसी अन्य रूप में। जब तक आत्म समर्पित व्यक्ति नहीं मिलेगा, जब तक आत्म समर्पण की क्रिया सम्पन्न नहीं होगी न बाबा मिलेंगे, न राम और न ही कृष्ण । यही गीता का रहस्य है, यही कृष्ण की वेदना है।

अपने 63 साल के अवतारी एवं शारीरिक जीवन में कृष्ण ने समस्त पृथ्वी पर स्थित मानवों को संस्पर्शित किया। मात्र द्रोपदी को छोड़ कोई भी कृष्ण के प्रति आत्म समर्पित नहीं था। द्रोपदी के लिए ही कृष्ण ने युद्ध लड़ा, द्रोपदी की एक पुकार पर कृष्ण भागे चले आये, द्रोपदी के लिए ही कौरव कुल का सर्वनाश कर दिया। द्रोपदी ने पुकारा दुर्वासा सामने खड़े थे चॉवल के कुछ दाने में हीं महाअसंतुष्ट दुर्वासा संतुष्ट हो गये। द्रोपदी के लिए ही कृष्ण सारथी बनें, अर्जुन के ताप को झेला। अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया। घमण्डी क्षत्रिय को भी आत्मसमर्पण का स्वाद चखाया, द्रोपदी के साथ रासलीला नहीं की थी फिर भी वह आत्मसमर्पित थी । हृदय से कृष्ण को भगवान मानती थी। राधा, रुक्मिणी और दस बीस हजार स्त्रियाँ तो कृष्ण सानिध्य का भोग कर रही थी पर द्रोपदी वन में विचर रही थी पाँच क्षत्रियों के साथ । आत्मसमर्पण अत्यंत ही गूढ़तम रहस्य है।

(क्रमशः)

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आत्मसमर्पण (३)
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गुरु की आँखें क्या खोजती हैं? कुछ नहीं बस आत्म समर्पण और कुछ नहीं। कोई ज्ञानी कहेगा, कोई विज्ञानी कहेगा, किसी को सिद्धि चाहिए, किसी को लेन-देन करना है, किसी को कुछ और चाहिए पर आत्मसमर्पणू किसी को नहीं चाहिए। कौन किसके प्रति समर्पित होता है? साधक साध्य के प्रति या साध्य साधक के प्रति। ईश्वर आत्मसमर्पित है, ईश्वर को साधने वाला आत्मसमर्पित है या नहीं यह अलग बात है। ईश्वर सदैव आत्म समर्पित होता है वह एक क्षण के लिए भी किसी से विमुख नहीं होता है पश्चात् भी साथ होता है वह अविभाज्य है यही आपको समझना है इसलिए ईश्वर की मृत्यु नहीं होती वह नित्य है हर रूप में है। रूप उसके अधीन है वह रूपों के अधीन नहीं है। वह कहाँ नहीं है यही तो विराट स्वरूप है यही तो कृष्ण दिखा रहे हैं। मैं ही तो सब कुछ हूँ, मैं ही सारा कर्ता-धर्ता हूँ, अच्छा बुरा, पसंद, नापसंद, उत्थान, पतन, यश-अपयश इन सबके पीछे मैं ही तो छिपा हूँ। एक भी क्षण तुम मुझसे दूर नहीं हो।

जैसे ही गोताखोर समुद्र की गहराइयों में डुबकी लगाते हैं भारी दबाव के कारण शरीर के अंदर उपस्थित विभिन्न प्रकार की वायु बुलबुलों के रूप में शरीर के एक-एक रोम से विसर्जित होने लगती है और गोताखोर चकरा जाता है एवं उसे लगता है जैसे । वह तो गैस का गोला हो इसीलिए गोताखोर धीरे-धीरे ऊपर आता है अन्यथा मृत्यु हो सकती है। रक्त में बुलबुले पड़ने लगते हैं यही हाल अंतरिक्ष का है वहाँ पर अगर शरीर का एक हिस्सा विशेष कवच से बाहर निकाल दिया जाय तो ऐसा लगता है मानों किसी हवा से भरे गुब्बारे में छेद करें दिया हो इतनी तेजी के साथ शरीरस्थ वायु निष्कासित होने लगती है। क्या मतलब है? इन स्थितियों का। यह स्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसे कि शिव क्षेत्र में नारद ने अनुभूत की थीं। वे वहाँ पर कवचित थे ठीक इसी प्रकार आप भी ईश्वर के द्वारा सदैव कवचित रहते हैं अन्यथा दो मिनट लगते हैं अस्तित्व मिटने में ईश्वर आपको कवचित करके रखे हुए है यही उसकी महानता है जिस स्थिति में ईश्वर मौजूद है उस स्थिति के अनुसार जीव को ढलना होता है अर्थात आत्मसमर्पित होना होता है।

क्यों प्रत्यारोपित अंग ज्यादा दिन तक क्रियाशील नहीं रहते? क्योंकि आत्मसमर्पण नहीं होता, दोनों तरफ से अस्वीकृति होती है इसीलिए गठबंधन टूट जाता है, जितनी ज्यादा अस्वीकृति होगी, उतना ही गठबंधन कमजोर होगा, जितना ज्यादा मस्तिष्क में द्वंद होगा उतना ही शरीर कमजोर होता जायेगा। जैसे-जैसे मस्तिष्क द्वंद्वात्मकता और विरोधाभास से ग्रसित होता जायेगा मृत्यु जल्दी आयेगी। रोग और बुढ़ापा सामने खड़ा होगा। द्वंद धूमावती का क्षेत्र है, सब कुछ धुंआ । आत्मसमर्पण विष्णु और कमलात्मिका का क्षेत्र है। एक युगल स्थिति । युग्मता ही जीवन है। युग्मता से ही सृष्टि की रचना होती है युग्मता ही नवजीवन की सहायिका हैं माता पिता क्या है? कौन किसके माता पिता ? यह सब तो एक सामान्य सोच है इसका ब्रह्मज्ञानियों से क्या लेना देना । वास्तव में जन्म देने वाले तो सहायक और सहायिका हैं। सहायता देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। गुरु भी सहायक हैं रास्ता दिखाने के लिए चरण स्पर्श जीवन की सत्यता बताने के लिए शत्-शत् नमन। यही भाव होने चाहिए तभी अध्यात्म के क्षेत्र में प्रविष्ठि का कोई तात्पर्य है अन्यथा भौतिक दुनिया भी बुरी नहीं है। दोनों रास्ते खुले हुए हैं, हर प्रकार के दृश्य ईश्वर ने बनाये हैं, हर दृश्य के पीछे कमला और विष्णु हैं जो मर्जी चाहे चुन लो। पूर्ण अधिकार जीव को प्रदान किया गया है।

जया विजया के साथ माता पार्वती शिव से विवाह कर शिव लोक आती हैं अब शिव जी के साथ भूत-प्रेत, नंदी, आड़े तिरछे, एक आँख वाले, उल्टी खोपड़ी वाले जीव बैठे हुए हैं। भैरव भी हैं, चण्डी भी हैं, चामुण्डा भी हैं और भी पता नहीं कितने ऊट-पटांग, निष्कासित, बेसिर पैर के जीव जंतुं । अभी ये सब माता पार्वती के प्रति समर्पित नहीं हैं पर अब शिव ने विवाह कर लिया है तो फिर आधे-अधूरे मन से आज्ञा का पालन तो करते ही हैं, हाँ - शिव के प्रति आत्मसमर्पित हैं। एक दिन दुखी हो जया विजया माता पार्वती से बोली इस लोक में अपना कोई नहीं है, हमें तो एक भी विश्वसनीय नहीं लगते हैं आप कुछ कीजिए। जिसे देखो वह महल में घुसा चला आता है। पार्वती जी ने अपने मैल से एक अत्यंत ही रूपवान युवक का निर्माण कर दिया और नाम रख दिया गुणेश, पूर्ण रूप से माता के प्रति आत्मसमर्पित गणेश । पार्वती जी ने उनके हाथ में एक छड़ी पकड़ा दी और द्वार पर खड़ा कर दिया बोली किसी को अंदर आने मत देना।


(क्रमशः)

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@Sanatan
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ग्रहण कालोक्त तीक्ष्ण साधनाऐं
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चन्द्रमा सूर्य से 400 गुना छोटा है एवं पृथ्वी की अपेक्षा उसकी दूरी सूर्य से 400 गुना कम है। देखिए ईश्वर ने सभी ब्रह्माण्डीय संरचनाऐं कितनी सूक्ष्मता एवं सटीकता से बनाई हैं इसीलिए प्रत्येक ब्रह्माण्डीय घटना भी अत्यंत ही सटीक एवं निश्चित समय पर प्रकट होती है। सूर्य व चन्द्र हमारे जीवन के दो प्रमुख कारक हैं। पृथ्वी का जीवन मुख्यत: इन्हीं पर आधारित है इन दोनों ग्रहों को प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थूल आँखों से प्रत्येक दिन देख सकता है। अन्य ग्रहों व तारासमूहों के साथ हमारी स्पष्टता इनकी अपेक्षा काफी कम है।

अब आपको एक काल्पनिक दृष्टांत बताते हैं अगर पृथ्वी कुछ सौ किलोमीटर सूर्य के नजदीक चली जाऐगी तब सब कुछ भस्म हो जाऐगा और अगर कुछ सौ किलोमीटर पीछे की तरफ सरक जाऐगी तो सब कुछ हिमवत् हो जाऐगा। जैसे ही पूर्णिमा आती है पृथ्वी पर जलतरंगे उर्ध्वगामी होने लगती है और अमावस्या आते- आते जीवों में रक्तचाप घटने लगता है ठीक इसी प्रकार सूर्य की सतह पर उठने वाले प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान पृथ्वी पर रक्तरंजित क्रांति ला देते हैं। इन दोनों ग्रहों से निरंतरता के साथ हमारा सम्पर्क है प्रकाश के द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भारतीय उप महाद्वीप शनिप्रधान है।

सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी व सूर्य के बीच कुछ समय के लिए स्थित हो जाता है जिससे कि सूर्य का प्रकाश पूरी तरह अवरोधित हो जाता है, ध्यान रहे बादलों के कारण सूर्य का प्रकाश अवरोधित नही होता है बादल पृथ्वी से अलग नहीं है, वे पृथ्वी का ही हिस्सा है। बादल सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करते हुए पृथ्वी को सूर्य से आने वाले प्राणतत्व से जोड़े हैं, परन्तु चन्द्रमा के स्थूल स्वरूप के कारण सूर्य से आने वाले प्राणतत्व बाधित हो जाते हैं। सूर्य ग्रहण मुश्किल से पाँच मिनट का होता है परन्तु अगर यही घटना एक घण्टे की हो जाए तो सारा खेल खत्म हो जायेगा प्राणों के शक्ति संचालन की परिष्कृत व्यवस्था तहस-नहस हो जायेगी।

सूर्य प्राण का केन्द्र है। सूर्य हमारी आकाश गंगा को प्रतिक्षण प्राणवान बनाता है। जो प्रकाश ऊर्जा दे वही शिव है। सूर्य ही साक्षात् शिव है, अतः ग्रहण आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीव को कुछ क्षण के लिए शिव से वियोग का प्रतीक है। जीव को साक्षात् शिव की भी प्रतिक्षण आवश्यकता है। ग्रहण काल में इसी कारणवश आसुरी शक्तियाँ चाहे वह रोग फैलाने वाले कीटाणुओं के रूप में हों उदित हो उठती हैं इसलिए सम्पूर्ण ग्रहण क्षेत्र विषमय हो उठता है और शिव ही विष का पान करते हैं। गुरु शिष्य को वह प्रक्रिया देता है जिससे कि विषम स्थिति से निपटा जा सके। गुरु का कार्य है शिष्य को आगाह करना, उसे सुरक्षित करना एवं उसके कल्याण के लिए गुप्त क्रिया सम्पन्न करना, यही गुरु का दायित्व होता है और जो गुरु उससे बचना चाहता है वह गुरु नहीं गुरु घंटाल ही हो सकता है।

मानव मात्र का जीवन पूर्ण रूप से ग्रहों से नियंत्रित हैं। ग्रह-नक्षत्र सचेतन रूप से स्वयं उपकार या अपकार नहीं करते हैं वे तो मात्र धनात्मक या ऋणात्मक किरणें विकीर्ण किया करते हैं। प्रत्येक मानव के द्वारा अतीत में हुई कर्मों की गतिमान व क्रियाशील तुला को ग्रह व नक्षत्र बाह्य जगत में मात्र प्रकाशित करते रहते हैं और ऐसे ही किसी दिन या ऐसे ही किसी क्षण में बालक का जब जन्म होता है तो ग्रहों की किरणें उसके कर्म के साथ मेल खा जाती है। जन्मकुण्डली उसकी अविकल प्रतिलिपि होती है, वह व्यक्ति के अपरिवर्तनीय अतीत व भविष्य का सम्भावित परिणाम प्रकट करती है लेकिन केवल अंतर्ज्ञान सम्पन्न व्यक्ति ही जन्मफल का ठीक-ठीक विवेचन कर सकते हैं किन्तु ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी ही है।

सृष्टि का प्रत्येक अंश एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और एक का दूसरे पर प्रभाव डालता ही है। परस्पर आदान- प्रदान ही विश्व प्रकृति का, उसके संतुलन-छन्द का मूल है। ग्रहण उचित साधनाओं के द्वारा शक्ति प्राप्ति हेतु साधकों द्वारा प्रयोग किया जा सकता है। ऐसे में जब सर्वत्र आतंक का वातावरण ही दृश्यमान हो रहा है, मृत्यु का ताण्डव सबको निगल लेने के लिए आतुर है। तब प्रश्न ये है कि क्या हम इस स्थिति से, इस बाधा से निवारण नहीं पा सकते हैं? हाँ हम निवारण पा सकते हैं गुरु सानिध्य का लाभ उठाकर, उनके सानिध्य में साधनाऐं करके व सबसे महत्वपूर्ण उनके तपस्यांश रूपी शक्तिपात को ग्रहण करके वे अपनी शक्ति से उन दुर्योगों को काटकर पूर्ण जीवन निष्कंटक जीने की क्षमता आपको प्रदान कर देंगे। लेकिन इसके लिए अनुग्रह आप करेंगे। .

(क्रमशः)

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ग्रहण कालोक्त तीक्ष्ण साधनाऐं (२)
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व्यक्तिगत रूप से या फिर चाहे पत्रों के माध्यम से और दूसरा उपाय है कि आप इन ग्रहणावसरों पर तीव्र साधनाऐं सम्पन्न करें। ऐसी साधनाऐं जो कि तीक्ष्ण हों और तीव्र परिणामों को देने में सक्षम हो क्योंकि साधनाओं की तलवार से ही अतीत के कर्मफलों को काटा जाता है। वस्तुतः गुरु रूपी ईश्वरीय संरक्षण व गुरु से प्राप्त साधनात्मक शक्ति का उचित क्षण में सही प्रयोग करके हम संकट काल का निवारण कर सकते हैं। प्रत्येक बंधन से मुक्त करने के लिए मनुष्यों (शिष्यों) के संकल्प को जगा देना ही गुरु का उद्देश्य है। गुरु ही स्वज्ञान व स्वतपस्यांश के द्वारा शिष्यों की चेतना को अभेद दिव्य एकता प्रदान कर सृष्टि के माया रूपी कारागार से मुक्त करते रहते हैं। ऐसी ही उच्च कोटि की साधनाओं की यहाँ पर प्रस्तुति है जो कि गुरुओं के द्वारा सिर्फ शिष्यों के कण्ठ में स्थापित की जाती थी ।

विधिः-

ग्रहण काल के पहले ही स्नान से निवृत्त होकर श्वेत धोती या पीली साड़ी पहनकर साधना कक्ष में बैठें व पूर्ण गुरु या शिव पूजन करें गुरु पूजन का पूर्ण विधान यदि ज्ञात न हो तो गुरु चित्र या शिव प्रतिमा को स्नान कराकर कुंकुम, अक्षत, पुष्प, धूप दीप आदि से पूजन करने के उपरान्त गुरुमत्र की 11 माला जप करें तत्पश्चात पूर्ण ग्रहण काल में निम्न मंत्रों का जाप करते हुए विल्वपत्र शिव जी या गुरु चित्र पर चढ़ावें ।

सर्वरक्षाकरं कवचम्

विनियोग :-

ॐ अस्य प्रसादमंत्रकवचस्य वामदेव ऋषिः, पंक्तिश्छन्दां, सदाशिवो देवता, साधकाभीष्टसिद्धये विनियोग:।

मूल मंत्र

शिरो मे सर्वदा पातु प्रासादाख्यः सदाशिवः ।
षडक्षरस्वरूपो मे वदनं च महेश्वरः ।।
पंचाक्षरात्मा भगवान् भुजौ मे परिरक्षतु ।
मृत्युञ्जय स्त्रिबीजात्मा आयू रक्षतु मे सदा ॥
वट मूलसमासीनो दक्षिणमूर्तिरव्ययः ।
सदा मां सर्वतः पातु षट्त्रिंशद्वर्णरूपधृक् ॥
द्वाविंशार्णत्मको रुद्रः कुक्षौ मे परिरक्षतु ।
त्रिवर्णात्मा नीलकण्ठः कण्ठंरक्षतु मे गुह्यं सर्वसम्पठप्रदायकः ॥
एकाक्षरस्वरूपात्मा कूटरूपी महेश्वरः ।
मार्तंडर्भ-रवो नित्यं पादौ मे परिरक्षतु ।।
ओमित्याख्यो महाबीजस्वरूपस्त्रिपुरांत्कः ।
सदा मां रणभूमौ तु रक्षतु त्रिदशाधिपः ॥
ऊर्ध्वमू द्धनिमीशानो मम रक्षतु सर्वदा ।
दक्षिणस्यां तत्पुरुषो अव्यान्मे गिरिनायकः ।।
अघोराख्यो महादेव पूर्वस्यां परिरक्षतु ।
वामदेव पश्चिमस्यां सदा मे परिरक्षतु ॥
उत्तरस्यां सदा पातु सद्योजातः स्वरूपधृक् ॥

फलश्रुति

इस्थं रक्षाकरं देवि कवचं देवदुर्लभम् ।
प्रातःकाले पठेऋस्तु सोऽभीष्टफलमाप्नुयात् ॥
पूजाकाले पठेद्यस्तु साधको दक्षिणे भुजे ।
देवा मनुष्या गन्धर्वा वश्यास्तस्य न संशयः ॥
कवचं यस्तु शिरसि धारयेऋदि मानवः ।
करस्थास्तस्य देवेशि अणिमाद्यष्टसिद्धयः ॥
स्वर्णपत्रे त्विमां विद्यां शुक्लपट्टेन वेष्टिताम् ।
राजतोदरसंविष्टां कृत्वा च धारयेत्यसुधीः ॥
संप्राप्य महतों लक्ष्मीमंत्रं च शिवरूपधृक् यस्मै कस्मै न दातव्यं न प्रकाश्यं कदाचन ।
शिष्याय भक्तियुक्ताय साधकाय प्रकाशयेत् ॥
अन्यथा सिद्धिहानिः स्यात् सत्यमेतन्मनोरमे ।
तव स्नेहान्महादेवि कथितं कवचं शुभम् ॥
न देयं कस्य चिद्भद्रे यदीच्छेदात्मनो हितम् । योऽर्चयेद्गन्धपुष्पाद्यैः कवचं मन्मुखेदितम् ॥
तेनाचिंता महादेवि सर्वे देवा न संशयः ।

इस कवच जाप की समाप्ति के बाद आप भगवान शिव व गुरु जी को प्रणाम करके क्षमा याचना करें। ये रक्षात्मक विधान इतना तीक्ष्ण है कि आप इसका एहसास साधना काल में स्वयं कर सकते हैं और अपने आपको इस रक्षा कवच से आबद्ध कर चिंताओं से मुक्त कर सकते हैं। तीक्ष्णता प्राप्त कर सकते हैं जैसी तीव्रता हमारे परम आराध्य शिव जी और सद्गुरुदेव ने हम सभी को देनी चाही है।
शिव शासनत: शिव शासनत:

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त्रिगुणात्मक शक्ति का प्रतीक है महालक्ष्मी
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आदि शक्ति पुंज स्वरूप महालक्ष्मी ही असंख्य देवी स्वरूपों में प्रकट होकर इस समस्त ब्रह्माण्ड को शक्ति प्रदान करती हैं। महालक्ष्मी ही शक्ति का आदि स्वरूप है एवं इन्हीं के दिव्य प्रकाश से असंख्य स्वरूप में देवियाँ विभिन्न शक्तियों से आरूढ़ हो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण को जीवनदायी शक्ति प्रदान करती है। इन्हीं देवियों की शक्ति से इस जगत में मौजूद प्रत्येक कण और पदार्थ सकल स्वरूप में दृष्टिगत होते हैं। चाहे विष्णु हो या शिव। आदि शक्ति महालक्ष्मी किसी भी स्वरूप में उनके साथ उपस्थित है। वे कभी भी उनके वचनों को नहीं टालते हैं। उनके प्रत्येक आग्रह के सामने विष्णु और शिव मात्र आज्ञा प्रदान करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। उनके निर्मल मृद वचनों का पालन करना ब्रह्मा का भी परम कर्तव्य है। ब्रह्मा की समस्त शक्ति महालक्ष्मी ही है क्योंकि वे अवतारी तो हो नहीं सकते अतः उन्हें प्रत्येक नई संरचना के लिये महालक्ष्मी की शरण में पड़ता है। शिव और विष्णु एक पल भी महालक्ष्मी के बिना अपने कार्य करने में सक्षम नहीं है। जिस महालक्ष्मी के बिना ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों कार्य करने में असमर्थ हैं एवं जिनके बिना शिव अवतार, विष्णु अवतार का इस पृथ्वी पर जन्म लेना असम्भव है ऐसी महाशक्ति महालक्ष्मी की मनुष्य देह में विराजमान तुच्छ आत्माऐं मात्र परम कल्याणमयी मातृ स्वरूप के रूप में ही वन्दन करके जीवन को कल्याणमय बना सकते हैं।

महालक्ष्मी का ही एक स्वरूप धन ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी है। लक्ष्मी और महालक्ष्मी में यही फर्क साधकों को उनके सहस्त्र स्वरूप का स्तुतिगान करने के लिये बाध्य करता है। आज के घोर कलयुग में जब श्री यंत्र की बात की जाती है या फिर महालक्ष्मी की तो साधक से सामने मात्र अर्थ प्रदान करने वाली देवी का चित्रण ही आता है। यह चित्रण साधक की न्यून दृष्टि एवं अज्ञान का प्रतीक है। यह बात ठीक है कि इस कलयुग में अर्थ एक अति शक्तिशाली व्यवस्था को इंगित करता है परन्तु अर्थ ही सम्पूर्णता नहीं है। अर्थ के साथ यश, प्रसिद्धि, ऐश्वर्य,रूप, स्वास्थ्य, ज्ञान, पराज्ञान, सम्मोहन इत्यादि इत्यादि सहस्त्र स्वरूप महालक्ष्मी प्रदान करती है। अगर स्वास्थ्य नहीं है तो अर्थ क्या कर लेगा ? कागज के टुकड़ों से क्या आप समुद्र के बीचों बीच भोजन प्राप्त कर पायेंगे। अर्थ की अपनी सीमितता है। सहस्त्र महालक्ष्मी की कृपा दृष्टि से ही मनुष्य अमृत्व की प्राप्ति कर सकता है।

समुद्र मंथन के समय अमृत के साथ साथ लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई थी। अतः महालक्ष्मी और अमृत्व एक दूसरे के साथ ही अस्तित्व में आते हैं। जीवन में दिव्य कार्य या फिर व्यक्ति विशेष का किसी परम कार्य के लिये चयन महालक्ष्मी की कृपा से ही सम्भव है क्योंकि महालक्ष्मी ही वह शक्ति है जो मनुष्य रूपी माध्यम को दिव्य कार्य के लिये प्रेरित करती है और संचालित भी करती है। चाहे वह शैव हों या फिर वैष्णव सम्प्रदाय वाले हों या फिर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने वाले हो सभी के हृदय महालक्ष्मी के लिये परम विशेष मातृतुल्य आदर भाव सर्वश्रेष्ठ होते हैं। महालक्ष्मी के प्रति हृदय में आदर भाव धारण किये बिना न तो विष्णु प्रसन्न होंगे और न ही शिवत्व प्राप्त होगा।

भगवान श्रीकृष्ण का सम्मोहन भी महालक्ष्मी का आशीर्वाद ही है। महालक्ष्मी की मूल प्रकृति मृदु है। कोमलता ही महालक्ष्मी की महाशक्ति हैं। इसी महाशक्ति के आगे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों नतमस्तक होते हैं। पुरुष प्रकृति के पर्याय विष्णु और शिव मनुष्यों के प्रति पितृ स्वरूप धारण किये उनके कर्मों के अनुसार उन्हें दण्ड प्रदान करते रहते हैं। उनके द्वारा प्रदान किये गये कर्मानुसार दण्डों से मुक्ति मात्र महालक्ष्मी की अनुकम्पा से ही सम्भव है। एक बार उनके कोमल हृदय में साधक के प्रति शिशुतुल्य प्रेम उमड़ने पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश की दण्डात्मक प्रवृत्ति धरी की धरी रह जाती है। जिन साधकों पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती है उनके अध्यात्म मार्ग में किसी भी प्रकार की न्यूनता या अवरोध सदैव के लिये समाप्त हो जाता है यही कारण है कि गृहस्थ ही नहीं अपितु घोर से घोर दिगम्बरी भी महालक्ष्मी साधना सर्वप्रथम सम्पन्न करते हैं। महालक्ष्मी ही इन साधकों के अवरोधित मार्ग को व्यवस्थित कर इन्हें शिवत्व, विष्णुत्व एवं ब्रह्मत्व से साक्षात्कार कराती है अन्यथा कर्मों के दण्ड और जंजाल से निकलना मनुष्य के वश की बात नहीं है। अनंत योनियों में अनंत कर्मों को सम्पन्न करने के लिए जब जीवात्मा मनुष्य रूपी शरीर धारण करती है तब क्या आप समझते हैं कि मात्र 60 से 80 वर्ष की आयु में आप कर्म बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे कदापि नहीं। .

(क्रमशः)

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25 अक्टूबर दिन मंगलवार अमावस्या को लगने वाले सूर्य ग्रहण पर विशेष


इस बार 25 अक्टूबर 2022 दिन मंगलवार अमावस्या को लगभग संपूर्ण भारत में सूर्य ग्रहण दिखाई देगा जिसका समय भारतीय समय अनुसार इस प्रकार रहेगा

ग्रहण प्रारंभ दोपहर 2:28
परम ग्रास 16:30
ग्रहण का मोक्ष साम 6:32
ग्रहण का ग्रासमान 0.861रहेगा
ग्रहण की अवधि 4 घंटा 4 मिनट रहेगी।
कुरुक्षेत्र मे ग्रहण का समय साम 04:25 से साम 06:25 तक रहेगा ग्रहण का सूतक  - 25 अक्टूबर को सुबह 2 :28 बजे शुरू होगा
विभिन्न शहरों मे ग्रहण का समय अलग अलग होगा।

25 अक्टूबर को साधक लोग ग्रहण का  लाभ उठाए अपने गुरु मन्त्र के साथ साथ अपने ईष्ट देव के मन्त्र का जप सम्पन्न करें

हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण एवं सूतक लगने के समय भोजन के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिए ऋषियों ने पात्रों के कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएँ और उन्हें ग्रहण के बाद कुश को फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जाएँ। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं।

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चन्द्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की सन्तान हैं। चन्द्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं। चन्द्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमज़ोर पड़ती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य-चन्द्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की सम्भावना बढ़ जाती है। इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें। ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कुछ भी कैंची या चाकू से काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलने से रोका जाता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं।

ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई भौतिक कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किए गए हैं। कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके आश्रितो को दान देने का विधान है। कहीं-कहीं वस्त्र, बर्तन धोने का भी नियम है। पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा भरकर पिया जाता है। ग्रहण के बाद डकोत को दान देने का अधिक माहात्म्य बताया गया है, क्योंकि डकोत को शनि-राहु-केतु का स्वरूप माना गया है।

सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण में तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये। बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना और भोजन करना - ये सब कार्य वर्जित हैं।
ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमन्दों को वस्त्र व अन्न दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। 'देवी भागवत' में आता है कि भूकम्प एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये।

ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से सूर्य ग्रहण
ग्रहण प्रकृ्ति का एक अद्भुत चमत्कार है। ज्योतिष के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो यह अभूतपूर्व अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान है, जो ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियाँ एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। सूर्य ग्रहण (सूर्योपराग) तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृ्त (व्यवधान / बाधा) हो जाए। इस प्रकार के ग्रहण के लिए चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृ्थ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का भाग नहीं दिखाई देता है। .

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सूर्यग्रहण होने के लिए निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है।अमावस्या होनी चाहिये
चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए।
उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली रेखाओं को रेखांश कहा जाता है तथा भूमध्य रेखा के चारो वृ्ताकार में जाने वाली रेखाओं को अंक्षाश के नाम से जाना जाता है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हों। चन्द्र और राहु या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिए। चन्द्र का अक्षांश लगभग शून्य होना चाहिये और यह तब होगा जब चन्द्र रविमार्ग पर या रविमार्ग के निकट हों, सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य और चन्द्र के कोणीय व्यास एक समान होते हैं। इस कारण चन्द सूर्य को केवल कुछ मिनट तक ही अपनी छाया में ले पाता है। सूर्य ग्रहण के समय जो क्षेत्र ढक जाता है उसे पूर्ण छाया क्षेत्र कहते हैं।सूर्य ग्रहण ज्योतिष से
चन्द्रमा द्वारा सूर्य के बिम्ब के पूरे या कम भाग के ढ़के जाने की वजह से सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण व वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

1. पूर्ण सूर्य ग्रहण
पूर्ण सूर्य ग्रहण उस समय होता है जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी पास रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है और चन्द्रमा पूरी तरह से पृ्थ्वी को अपने छाया क्षेत्र में ले ले फलस्वरूप सूर्य का प्रकाश पृ्थ्वी तक पहुँच नहीं पाता है और पृ्थ्वी पर अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तब पृथ्वी पर पूरा सूर्य दिखाई नहीं देता। इस प्रकार बनने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है।

2. आंशिक सूर्य ग्रहण
आंशिक सूर्यग्रहण में जब चन्द्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में इस प्रकार आए कि सूर्य का कुछ ही भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है अर्थात चन्दमा, सूर्य के केवल कुछ भाग को ही अपनी छाया में ले पाता है। इससे सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है तो पृथ्वी के उस भाग विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है।

3. वलयाकार सूर्य ग्रहण
वलयाकार सूर्य ग्रहण में जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है अर्थात चन्द्र सूर्य को इस प्रकार से ढकता है, कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता है और पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह ढका दिखाई नहीं देता बल्कि सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन या वलय के रूप में चमकता दिखाई देता है। कंगन आकार में बने सूर्यग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहलाता है।

साभार- सिद्धाश्रम साधक परिवार

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नमो भगवते वासुदेवाय धन्वन्तरये, अमृत कलश हस्ताय ।
सर्वामय विनाशाय त्रैलोक्य नायाय महा विष्णवेः स्वाहा।।

।।ॐ श्री धन्वन्तरये नमः।।

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मंगल सुप्रभातम्

प्रातर्नमामि भगवन्त मनन्तवीर्य,
सौभाग्यद श्रुतिमयं भक्तार्थ चिन्त्यं ।
पापौघ शत्रुभय रोगहरं परं च,
नमामि सततं निखिलेश्वरं विभुम् ।।1।।

प्रात: स्मरामि सिद्धाश्रम प्राण मूलं,
सत्यव्रतं प्रियकरं कलिकल्मषघ्नं ।
सर्वार्थ सिद्धि सदनं प्रथित प्रभाव,
नमामि नित्यं निखिलेश्वरं गुरुम् ॥2॥

प्रातर्भजामि तं मंगल सर्व मंगलं,
सृष्टिस्थित कारणमूल रूपं ।
संसार बन्धन विमोचन हेतु भूतं,
श्रीमद् गुरु च निखिलेश्वर देव देवं ॥3॥

प्रातर्नमामि तन्त्रेश्वर भावभाजन,
आनन्द कन्द निखिलं परिपूर्ण सत्वं ।
मुक्तेश्वरं परमलक्ष्यमयं परेशं,
आवाहन मद्गुरु परिपूर्ण सिन्धुम् ॥4॥

प्रातर्भजामि ब्रह्माण्ड स्वरूप निर्मल,
वैश्वानरं प्रणत पालन तत्परं तं ।
त्रैलोक्य मोहन परं पुरुष प्रधान,
नमामि शुद्धं निखिलेश्वरं मनुम् ॥5॥

दुर्लभं मानुषं जन्म दुर्लभं गुरु चिन्तनं ।
दुर्लभं गुरु सानिध्यं सुलभं आत्म दर्शनम् ॥6॥

अतो सर्व प्रयत्नेन गुरुमाराधयेत् बुधः यस्य कृपा कटाक्षेण अहोभावो महोत्सव:॥7॥

अनन्त शौर्य सम्पन्न, शिष्यों और साधकों को सौभाग्य देने वाले सकल शास्त्रमय एवं रोगों को दूर करने वाले भगवत, पूज्यपाद गुरुदेव निखिलेश्वर के श्री चरणों में इस प्रातः वेला में नमन अर्पित हो ।

जो सिद्धाश्रम के प्राण स्वरूप है, कलि काल के समस्त कल्मष को दूर करने वाले, सम्पूर्ण मनोरथ को पूर्ण करने वाले गुरुदेव निखिलेश्वर के श्री चरणों में पुन: पुन: नमन स्वीकार हो ।

मंगल के साक्षात् विग्रह संसार बन्धन को दूर करने वाले, संसार के पालनकर्ता, देवाधिदेव, गुरुदेव मेरा प्रातः कालीन शत् शत् नमन स्वीकार करें।

आनन्द स्वरूप, तंत्रेश्वर, साधकों और शिष्यों को पूर्णता प्रदान करने वाले, परममुक्त स्वरूप गुरूदेव निखिलेश्वर का मैं प्रातः वेला में आवाहन करता हूँ।

वैश्वानर स्वरूप समस्त ब्रह्माण्ड को अपने अन्दर स्थापित किए हुए, सम्पूर्ण विश्व को सम्मोहित करने वाले पुरुष प्रधान परम पावन गुरुदेव निखिलेश्वर के श्री चरणों में इस प्रातः वेला में नमन स्वीकार हो ।

मनुष्य का जीवन दुर्लभ है, गुरु चिन्तन भी दुर्लभ है, गुरु का सानिध्य मिलना भी परम सौभाग्य है, तदनन्तर आत्म स्वरूप प्राप्ति सुलभ है।

इसलिए प्रत्येक स्थिति में गुरु को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए, जिनकी कृपा मात्र से ही यह जीवन अहोभाव युक्त महोत्सव बन जाता है।
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शुभम करोति कल्याणम
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !


आप सभी को सपरिवार प्रकाश पर्व

दीपावली,की अनन्त हार्दिक शुभकामनाएं....
दीपोत्सव सपरिवार आपके जीवन को
सुख, समृद्धि, सुख-शांति, सौहार्द
एवं अपार खुशियों की रोशनी से जग-मग करे...।
🪔🪔

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