पुनर्जन्म
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एक गाँव की स्त्री गर्भावस्था के दौरान खेत में काम कर रही थी। अचानक प्रसव पीड़ा हुई एवं उसने खेत में ही शिशु को जन्म दे दिया। कुछ देर बाद उसने स्वयं ही शिशु को उठाया और घर की तरफ चल पड़ी। दूसरी तरफ किसी बड़े शहर में एक धनी व्यक्ति के यहाँ ठीक उसी समय संतान उत्पन्न हुई। माता को बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया, सैकड़ों लोग एकत्रित थे, हर तरह की सुविधाऐं थीं। एक से एक ख्याति प्राप्त चिकित्सक प्रसव कराने में जुटे हुए थे। शिशु का जन्म होते ही उत्सव का माहौल बन गया। ऐसा हमेशा से होता आया है आगे क्या होगा यह अलग बात है परन्तु जन्म के समय दोनों शिशुओं की स्थितियाँ सर्वथा विपरीत हैं। इसे कहते हैं भाग्य ।
भाग्य है तो हैं, भाग्य की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। भाग्य का निर्माण कैसे होता है? अगर हम इस विषय का गहराई में जाकर विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि कर्मों की श्रृंखला कभी नहीं टूटती । जिस जीवन में हमने मृत्यु के समय तक जो कर्म सम्पन्न किए होंगे उसी का प्रारम्भ अगले जन्म में पुनः होगा। टूटी हुई कड़ी पुनः जुड़ेगी। अधूरे कर्म पुनः शरीर प्राप्त करके सम्पन्न करने पड़ेगें। इसी से प्रतिपादित होता है पुनर्जन्म का सिद्धांत समस्या यह है कि लोगों का दृष्टिकोण अब वैज्ञानिक नहीं रहा। वे दो स्थितियों में जीते हैं हाँ या ना या तो किसी भी सिद्धांत को हाँ कहकर प्रतिपादित कर देते हैं या फिर न कहकर नकार देते हैं। हाँ और ना से कुछ भी हासिल नहीं होगा। हाँ या न से ऊपर उठकर सोच, विचार एवं बुद्धि रूपी शक्तियों को एक अत्यंत ही लचीला, स्थित प्रज्ञ एवं समग्र भाव देना होगा। यही तरीका है परम सत्य को समझने का जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को आत्मसात करने का ।
मैं क्या हूँ? मैं, कहाँ से आया हूँ? मेरी आंतरिक खोज क्या है? मेरी पसंद और नापसंद जन्म के समय मुझे कहाँ से मिली है? क्यों जब मैं अकेला बैठता हूँ तो मेरे मन में एक अलग प्रकार के विचार आते हैं? इन सब यक्ष प्रश्नों के उत्तर में पुनर्जन्म छिपा हुआ है। मेरे माता पिता या परिवार वाले मेरे गुरु से बहुत चिढ़ते हैं फिर भी मैं उन्हें असीम प्यार करता हूँ। ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हो रहा है कि शिष्य विशेष के तो गुरु से पुनर्जन्म के सम्बन्ध हैं भले ही वह उन व्यक्तियों के बीच में रह रहा हो जिनका आध्यात्मिक तल शून्य है। एक स्त्री थी उसे एक पुरुष से प्रेम था। यह सत्य घटना है। अचानक एक वर्ष बाद लड़की ने अपने प्रेमी को छोड़कर किसी दूसरे युवक से विवाह कर लिया। उसने अपने प्रेमी को इस तरह से छोड़ा कि वह उसे कभी जानती ही नहीं थी और पूर्ण रूप से अपने पति के साथ खुशी खुशी रहने लगी। प्रेमी युवक को अथाह मानसिक वेदना और कष्ट हुआ। उसने तो जीवन का अंत करने की ही ठान ली थी परन्तु अचानक चौराहे पर उसे गुरु मिल गये उसने उसे बचा लिया।
सम्बन्धों की इतनी भयानकता किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में देखने को मिलती है। इन सबके पीछे परम ब्रह्माण्डीय लेन-देन का व्यवसाय छिपा हुआ है अर्थात लेखा-जोखा कर्मों का लेखा जोखा । ब्रह्माण्डीय लेखा जोखा । उस स्त्री का व्यक्ति के साथ कुछ लेखा जोखा बाकी रह गया था और जैसे ही हिसाब-किताब बराबर हुआ साथ खत्म यही होता है जीवन में। जैसे ही फल वृक्ष की डाली पर पक जाता है तुरंत टपक पड़ता है अर्थात साथ खत्म। जैसे ही शरीर वृद्ध होता है आत्मा उड़ जाती है अर्थात साथ खत्म। अब किसी और को पकड़ो हमारा समय पूरा हुआ । संकल्प, प्रतिज्ञा ये सब कर्म बंधन हैं। उन्हें पूरा करना ही पड़ता है। यही विधाता का विधान है, विज्ञान है । आपने विधाता से कहा मुझे पैसा रुपया चाहिए विधाता आपको देगा आपके कर्मानुसार मृत्यु होते ही आत्मा को सर्वप्रथम यमराज या देवदूत चित्रगुप्त के पास ले जाते हैं। वहाँ पर चित्रगुप्त व्यक्ति विशेष की आत्मा के पाप और पुण्य का हिसाब किताब देखते हैं। पुण्य हुए तो योग्यतानुसार स्वर्ग विशेष में भेजा जायेगा आत्मा विशेष को इच्छानुसार अमृत तुल्य भोगों को सम्पन्न करने के लिए। उसके लिए स्वर्ग के अनुरूप देह प्राप्त होगी ।
दिव्य देहों से दिव्य कर्म तो वहाँ भी सम्पादित करने पड़ेंगे। अगर खाते में पापाचार ज्यादा होगा, पग-पग पर शरीर धारण करने के पश्चात् मनमानी की होगी या सृष्टि के नियमों को भंग किया होगा तो फिर योग्यतानुसार नर्क की प्राप्ति होगी। नर्क भी अनेक प्रकार के हैं। भयंकर पापाचारियों को भयंकर से भयंकर नर्क में जाना पड़ता है। जब तक उनके नारकीय स्वरूप का क्षय नहीं हो जाता उन्हें पुनः देह धारण करने का अधिकार नहीं होता है और देह भी उन्हें योग्यतानुसार ही मिलती है। प्रेत-योनियों में एक-एक हजार वर्ष तक पेड़ों के ऊपर उल्टा लटकाकर रखा जाता है। वे लोग जो धर्म का दुरुपयोग करते हैं,
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(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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एक गाँव की स्त्री गर्भावस्था के दौरान खेत में काम कर रही थी। अचानक प्रसव पीड़ा हुई एवं उसने खेत में ही शिशु को जन्म दे दिया। कुछ देर बाद उसने स्वयं ही शिशु को उठाया और घर की तरफ चल पड़ी। दूसरी तरफ किसी बड़े शहर में एक धनी व्यक्ति के यहाँ ठीक उसी समय संतान उत्पन्न हुई। माता को बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया, सैकड़ों लोग एकत्रित थे, हर तरह की सुविधाऐं थीं। एक से एक ख्याति प्राप्त चिकित्सक प्रसव कराने में जुटे हुए थे। शिशु का जन्म होते ही उत्सव का माहौल बन गया। ऐसा हमेशा से होता आया है आगे क्या होगा यह अलग बात है परन्तु जन्म के समय दोनों शिशुओं की स्थितियाँ सर्वथा विपरीत हैं। इसे कहते हैं भाग्य ।
भाग्य है तो हैं, भाग्य की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। भाग्य का निर्माण कैसे होता है? अगर हम इस विषय का गहराई में जाकर विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि कर्मों की श्रृंखला कभी नहीं टूटती । जिस जीवन में हमने मृत्यु के समय तक जो कर्म सम्पन्न किए होंगे उसी का प्रारम्भ अगले जन्म में पुनः होगा। टूटी हुई कड़ी पुनः जुड़ेगी। अधूरे कर्म पुनः शरीर प्राप्त करके सम्पन्न करने पड़ेगें। इसी से प्रतिपादित होता है पुनर्जन्म का सिद्धांत समस्या यह है कि लोगों का दृष्टिकोण अब वैज्ञानिक नहीं रहा। वे दो स्थितियों में जीते हैं हाँ या ना या तो किसी भी सिद्धांत को हाँ कहकर प्रतिपादित कर देते हैं या फिर न कहकर नकार देते हैं। हाँ और ना से कुछ भी हासिल नहीं होगा। हाँ या न से ऊपर उठकर सोच, विचार एवं बुद्धि रूपी शक्तियों को एक अत्यंत ही लचीला, स्थित प्रज्ञ एवं समग्र भाव देना होगा। यही तरीका है परम सत्य को समझने का जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को आत्मसात करने का ।
मैं क्या हूँ? मैं, कहाँ से आया हूँ? मेरी आंतरिक खोज क्या है? मेरी पसंद और नापसंद जन्म के समय मुझे कहाँ से मिली है? क्यों जब मैं अकेला बैठता हूँ तो मेरे मन में एक अलग प्रकार के विचार आते हैं? इन सब यक्ष प्रश्नों के उत्तर में पुनर्जन्म छिपा हुआ है। मेरे माता पिता या परिवार वाले मेरे गुरु से बहुत चिढ़ते हैं फिर भी मैं उन्हें असीम प्यार करता हूँ। ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हो रहा है कि शिष्य विशेष के तो गुरु से पुनर्जन्म के सम्बन्ध हैं भले ही वह उन व्यक्तियों के बीच में रह रहा हो जिनका आध्यात्मिक तल शून्य है। एक स्त्री थी उसे एक पुरुष से प्रेम था। यह सत्य घटना है। अचानक एक वर्ष बाद लड़की ने अपने प्रेमी को छोड़कर किसी दूसरे युवक से विवाह कर लिया। उसने अपने प्रेमी को इस तरह से छोड़ा कि वह उसे कभी जानती ही नहीं थी और पूर्ण रूप से अपने पति के साथ खुशी खुशी रहने लगी। प्रेमी युवक को अथाह मानसिक वेदना और कष्ट हुआ। उसने तो जीवन का अंत करने की ही ठान ली थी परन्तु अचानक चौराहे पर उसे गुरु मिल गये उसने उसे बचा लिया।
सम्बन्धों की इतनी भयानकता किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में देखने को मिलती है। इन सबके पीछे परम ब्रह्माण्डीय लेन-देन का व्यवसाय छिपा हुआ है अर्थात लेखा-जोखा कर्मों का लेखा जोखा । ब्रह्माण्डीय लेखा जोखा । उस स्त्री का व्यक्ति के साथ कुछ लेखा जोखा बाकी रह गया था और जैसे ही हिसाब-किताब बराबर हुआ साथ खत्म यही होता है जीवन में। जैसे ही फल वृक्ष की डाली पर पक जाता है तुरंत टपक पड़ता है अर्थात साथ खत्म। जैसे ही शरीर वृद्ध होता है आत्मा उड़ जाती है अर्थात साथ खत्म। अब किसी और को पकड़ो हमारा समय पूरा हुआ । संकल्प, प्रतिज्ञा ये सब कर्म बंधन हैं। उन्हें पूरा करना ही पड़ता है। यही विधाता का विधान है, विज्ञान है । आपने विधाता से कहा मुझे पैसा रुपया चाहिए विधाता आपको देगा आपके कर्मानुसार मृत्यु होते ही आत्मा को सर्वप्रथम यमराज या देवदूत चित्रगुप्त के पास ले जाते हैं। वहाँ पर चित्रगुप्त व्यक्ति विशेष की आत्मा के पाप और पुण्य का हिसाब किताब देखते हैं। पुण्य हुए तो योग्यतानुसार स्वर्ग विशेष में भेजा जायेगा आत्मा विशेष को इच्छानुसार अमृत तुल्य भोगों को सम्पन्न करने के लिए। उसके लिए स्वर्ग के अनुरूप देह प्राप्त होगी ।
दिव्य देहों से दिव्य कर्म तो वहाँ भी सम्पादित करने पड़ेंगे। अगर खाते में पापाचार ज्यादा होगा, पग-पग पर शरीर धारण करने के पश्चात् मनमानी की होगी या सृष्टि के नियमों को भंग किया होगा तो फिर योग्यतानुसार नर्क की प्राप्ति होगी। नर्क भी अनेक प्रकार के हैं। भयंकर पापाचारियों को भयंकर से भयंकर नर्क में जाना पड़ता है। जब तक उनके नारकीय स्वरूप का क्षय नहीं हो जाता उन्हें पुनः देह धारण करने का अधिकार नहीं होता है और देह भी उन्हें योग्यतानुसार ही मिलती है। प्रेत-योनियों में एक-एक हजार वर्ष तक पेड़ों के ऊपर उल्टा लटकाकर रखा जाता है। वे लोग जो धर्म का दुरुपयोग करते हैं,
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(क्रमशः)
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दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी।
महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।
भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।।
भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।
धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।
दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला।
द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई।
अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या ? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।
युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा ?
दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके...
उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध में उतरने से ही रोक दिया।
लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ?
यदि बर्बरीक का वध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।
कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गये सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।
"स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दांव पर लगाया जाए..."
कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया।
देवकी के बाल पकड़े कंस ने, और द्रौपदी के बाल पकड़े दु:शासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो।।
🙏जय श्री कृष्णा बांके बिहारी 🙏
महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।
भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।।
भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।
धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।
दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला।
द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई।
अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या ? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।
युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा ?
दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके...
उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध में उतरने से ही रोक दिया।
लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ?
यदि बर्बरीक का वध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।
कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गये सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।
"स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दांव पर लगाया जाए..."
कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया।
देवकी के बाल पकड़े कंस ने, और द्रौपदी के बाल पकड़े दु:शासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो।।
🙏जय श्री कृष्णा बांके बिहारी 🙏
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पुनर्जन्म (२)
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लोगों को ठगते एवं चोरी करते हैं उन्हें हजारों वर्षों की प्रेत योनि प्राप्त होती है।
सांसारिक दृष्टिकोण से क्षय का तात्पर्य क्षय रोग से लगा लिया जाता है परन्तु विधाता ने क्षय के रूप में एक अद्भुत प्रक्रिया निर्मित की है। परमात्मा की परम दयालुता का परिणाम है सभी कर्मों का क्षय होना नारकीय कष्टों का भी क्षय होगा, शरीर का भी क्षय होगा, पुण्यों का भी क्षय होगा, कारावास का भी क्षय होगा और फिर से मौका मिलेगा सुधरने का क्षय नहीं हो तो पुनर्प्राप्ति कैसे होगी? शरीर का क्षय न हो तो पुनर्जन्म कैसे होगा? एक अपराधी की सजा क्षय न हो तो फिर वह जेल से कैसे छूटेगा । क्षय तो होना ही चाहिए। सभी कुछ क्षयवान है। यही सबसे बड़ा प्रमाणीकरण है पुनर्जन्म का। जेल से छूटने के बाद व्यक्ति अपराधी नहीं है। उसके अपराध का क्षय हो गया अब वह सामान्य व्यक्ति है उसने दण्ड भोग लिया। अब वह उचित कर्म सम्पन्न कर प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर सकता है। उसे पूरा अधिकार है। आज जो निर्धन है कल वह करोड़पति हो सकता है। हो सकता है कुछ समय पश्चात उसकी निर्धनता का क्षय हो जाय। आज जो अज्ञानी है कल वह महाज्ञानी हो सकता है।
कल तक जो कालीदास जिस डगाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, निपट महामूर्ख थे, कुछ ही दिनों पश्चात वे महाकवि बन गये। किसने क्षय कर दिया उनके अज्ञान का। गुरु ने कर दिया। गुरु को क्षय करना आता है। वह कुछ ही क्षणों में क्षय करं देगा। दूध में से पानी का क्षय कर दो मावा बन जायेगा। क्या किया आपने सिर्फ क्षय किया। बस यही खेल है गुरु का । यही पुनर्जन्म की कुंजी है। एक शिष्य के दिमाग में से कुछ सांसारिकता का क्षय कर दो उसे अपना पूर्वजन्म याद आ जायेगा। जन्म और पूर्वजन्म के बीच बस एक झीना सा पर्दा है और उसके क्षय होने की देर है । उसी पर्दे के कारण शिष्य भटकता रहता है। इसी पर्दे को हटाना गुरु का कार्य है फिर शिष्य कहीं नहीं जाता, कहीं नहीं भटकता, कहीं लिप्त नहीं होता। साधनाऐं एक जीवन का खेल नहीं हैं। चालीस पचास वर्ष में क्या खाक साधना सिद्ध होगी इसके लिए पूर्वजन्म देखना पड़ता है। अधिकांशतः शिष्य अपने साथ पूर्वजन्म की सिद्धियाँ लाते हैं। गुरु अपनी दृष्टि से समझ लेता है कि पूर्व जन्म में शिष्य किस साधना में पारंगत था बस उसी का पुरश्चरण करा के उस शक्ति को जागृत कर देता है।
बायें हाथ से काम करने वाला व्यक्ति वाममार्गी ही होगा। वाममार्ग की साधना उसे कुछ ही क्षणों में परिणाम दे देगी। वह जन्मजात वाममार्गी है अनेकों जन्म में उसने वाम मार्ग की ही साधनाऐं सम्पन्न की हैं। अब उसे भला कहाँ दूसरे मार्ग की साधना सम्पन्न करायें। उसे शिव ही अच्छे लगेंगे। उससे विष्णु पूजन सम्पन्न कराना अत्यधिक दुष्कर है। यह पहचान है पूर्व जन्म की कुछ बच्चे उल्टे पैदा होते हैं अर्थात जन्म के समय पैर बाहर निकलता है। इनमें जन्मजात गुण होता है पूर्वाभास का। इनकी कुण्डलिनी शक्ति गर्भ में ही आज्ञा चक्र तक आकर स्वतः ही रुक जाती है अन्य बच्चों में वह मूलाधार में ही सुप्त रहती है। इस प्रकार के बच्चों को पायला कहा जाता है। दस वर्ष से कम उम्र के अगर शुद्धतम, उच्च कोटि के बच्चे मिल जायें तो ये आँखें बंद करने के पश्चात भी कमरे में रखी सब बस्तुओं को देख सकते हैं। पूर्व जन्म को जाने बिना सम्पूर्ण विकास तय नहीं किया जा सकता एवं पुनर्जन्म को भी संशोधित नहीं किया जा सकता।
जीवन को इस प्रकार से समझ सकते हैं प्रथम पूर्वजन्म अर्थात भूतकाल द्वितीय वर्तमान जन्म तृतीय अर्थात पुनर्जन्म । सर्वप्रथम पूर्व जन्म को समझना है एवं उस जन्म में किए गये कार्यों की व्याख्या करनी है, गलतियों को सुधारना है। यह कार्य वर्तमान युग होगा और इसी के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त होगा। एक शिष्य आलू के अलावा कुछ नहीं खाता, उसे गर्मी अत्यधिक लगती है और ठण्ड से अत्यधिक प्रेम है। एकांतवास उसकी प्रकृति है अर्थात उस शिष्य ने पूर्व जन्म में हिमालय के ठण्डे प्रदेश में साधनाऐं सम्पन्न की हैं इसीलिए गर्मी के प्रति वह संवेदनशील है। एकांत स्थान पर साधनाओं के कारण उसे एकांतवास पसंद है। उच्च शिखरों पर साधना करने वाले अपने साथ आलू या अन्य प्रकार के कंद मूल बोरे में भरकर ले जाते हैं। उसी पर उनका जीवन निर्भर रहता है। एकांतवासी मायावी नहीं होते तथा छलप्रपंच और फरेब से सर्वथा पुरे रहते हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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लोगों को ठगते एवं चोरी करते हैं उन्हें हजारों वर्षों की प्रेत योनि प्राप्त होती है।
सांसारिक दृष्टिकोण से क्षय का तात्पर्य क्षय रोग से लगा लिया जाता है परन्तु विधाता ने क्षय के रूप में एक अद्भुत प्रक्रिया निर्मित की है। परमात्मा की परम दयालुता का परिणाम है सभी कर्मों का क्षय होना नारकीय कष्टों का भी क्षय होगा, शरीर का भी क्षय होगा, पुण्यों का भी क्षय होगा, कारावास का भी क्षय होगा और फिर से मौका मिलेगा सुधरने का क्षय नहीं हो तो पुनर्प्राप्ति कैसे होगी? शरीर का क्षय न हो तो पुनर्जन्म कैसे होगा? एक अपराधी की सजा क्षय न हो तो फिर वह जेल से कैसे छूटेगा । क्षय तो होना ही चाहिए। सभी कुछ क्षयवान है। यही सबसे बड़ा प्रमाणीकरण है पुनर्जन्म का। जेल से छूटने के बाद व्यक्ति अपराधी नहीं है। उसके अपराध का क्षय हो गया अब वह सामान्य व्यक्ति है उसने दण्ड भोग लिया। अब वह उचित कर्म सम्पन्न कर प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर सकता है। उसे पूरा अधिकार है। आज जो निर्धन है कल वह करोड़पति हो सकता है। हो सकता है कुछ समय पश्चात उसकी निर्धनता का क्षय हो जाय। आज जो अज्ञानी है कल वह महाज्ञानी हो सकता है।
कल तक जो कालीदास जिस डगाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, निपट महामूर्ख थे, कुछ ही दिनों पश्चात वे महाकवि बन गये। किसने क्षय कर दिया उनके अज्ञान का। गुरु ने कर दिया। गुरु को क्षय करना आता है। वह कुछ ही क्षणों में क्षय करं देगा। दूध में से पानी का क्षय कर दो मावा बन जायेगा। क्या किया आपने सिर्फ क्षय किया। बस यही खेल है गुरु का । यही पुनर्जन्म की कुंजी है। एक शिष्य के दिमाग में से कुछ सांसारिकता का क्षय कर दो उसे अपना पूर्वजन्म याद आ जायेगा। जन्म और पूर्वजन्म के बीच बस एक झीना सा पर्दा है और उसके क्षय होने की देर है । उसी पर्दे के कारण शिष्य भटकता रहता है। इसी पर्दे को हटाना गुरु का कार्य है फिर शिष्य कहीं नहीं जाता, कहीं नहीं भटकता, कहीं लिप्त नहीं होता। साधनाऐं एक जीवन का खेल नहीं हैं। चालीस पचास वर्ष में क्या खाक साधना सिद्ध होगी इसके लिए पूर्वजन्म देखना पड़ता है। अधिकांशतः शिष्य अपने साथ पूर्वजन्म की सिद्धियाँ लाते हैं। गुरु अपनी दृष्टि से समझ लेता है कि पूर्व जन्म में शिष्य किस साधना में पारंगत था बस उसी का पुरश्चरण करा के उस शक्ति को जागृत कर देता है।
बायें हाथ से काम करने वाला व्यक्ति वाममार्गी ही होगा। वाममार्ग की साधना उसे कुछ ही क्षणों में परिणाम दे देगी। वह जन्मजात वाममार्गी है अनेकों जन्म में उसने वाम मार्ग की ही साधनाऐं सम्पन्न की हैं। अब उसे भला कहाँ दूसरे मार्ग की साधना सम्पन्न करायें। उसे शिव ही अच्छे लगेंगे। उससे विष्णु पूजन सम्पन्न कराना अत्यधिक दुष्कर है। यह पहचान है पूर्व जन्म की कुछ बच्चे उल्टे पैदा होते हैं अर्थात जन्म के समय पैर बाहर निकलता है। इनमें जन्मजात गुण होता है पूर्वाभास का। इनकी कुण्डलिनी शक्ति गर्भ में ही आज्ञा चक्र तक आकर स्वतः ही रुक जाती है अन्य बच्चों में वह मूलाधार में ही सुप्त रहती है। इस प्रकार के बच्चों को पायला कहा जाता है। दस वर्ष से कम उम्र के अगर शुद्धतम, उच्च कोटि के बच्चे मिल जायें तो ये आँखें बंद करने के पश्चात भी कमरे में रखी सब बस्तुओं को देख सकते हैं। पूर्व जन्म को जाने बिना सम्पूर्ण विकास तय नहीं किया जा सकता एवं पुनर्जन्म को भी संशोधित नहीं किया जा सकता।
जीवन को इस प्रकार से समझ सकते हैं प्रथम पूर्वजन्म अर्थात भूतकाल द्वितीय वर्तमान जन्म तृतीय अर्थात पुनर्जन्म । सर्वप्रथम पूर्व जन्म को समझना है एवं उस जन्म में किए गये कार्यों की व्याख्या करनी है, गलतियों को सुधारना है। यह कार्य वर्तमान युग होगा और इसी के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त होगा। एक शिष्य आलू के अलावा कुछ नहीं खाता, उसे गर्मी अत्यधिक लगती है और ठण्ड से अत्यधिक प्रेम है। एकांतवास उसकी प्रकृति है अर्थात उस शिष्य ने पूर्व जन्म में हिमालय के ठण्डे प्रदेश में साधनाऐं सम्पन्न की हैं इसीलिए गर्मी के प्रति वह संवेदनशील है। एकांत स्थान पर साधनाओं के कारण उसे एकांतवास पसंद है। उच्च शिखरों पर साधना करने वाले अपने साथ आलू या अन्य प्रकार के कंद मूल बोरे में भरकर ले जाते हैं। उसी पर उनका जीवन निर्भर रहता है। एकांतवासी मायावी नहीं होते तथा छलप्रपंच और फरेब से सर्वथा पुरे रहते हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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छठ पूजा भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व
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भारत त्यौहारों का देश है यहाँ पर सभी धर्मों के विभिन्न प्रकार के त्यौहार और उत्सव मनाये जाते हैं, उन्हीं में से एक छठ पूजा है जो कि हिंदू धर्म के लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है। छठ पूजा का त्यौहार दीपावली के बाद आने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है।
छठ पूजा के दिन सूर्य भगवान की पूजन सम्पन्न कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। चार दिवस तक मनाये जाने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है। इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिये इस पर्व को 'हठयोग' भी माना जाता है।
छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता है, जिन्हें साक्षी रूप में देखा जा सकता है। छठ पर्व छठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। इस वर्ष 30 अक्टूबर 2022 को यह पर्व मनाया जायेगा। भारत में सूर्योपासना के लिये प्रसिद्ध यह पर्व मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' कहा गया है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिये यह पर्व मनाया जाता है। सूर्यदेव की पूजा का यह त्योहार मुख्य रूप से पूर्व भारत के बिहार, झारखंड, पूर्व उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है।
छठ पूजा के विधि-विधान क्या है? छठ पूजा एक ऐसा पर्व है, जो पूरी तरह से साधक को अपनी इंद्रिय जनित कमजोरियों पर विजय दिलाता है। इससे साधक इसकी कठोरता से जरा भी विचलित हुये बिना पूरे श्रद्धा और समर्पण भाव से इस व्रत को करते है। त्योहार के अनुष्ठान चार दिनों तक मनाये जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। इसमें मुख्य उपासक आमतौर पर महिलाये होती है। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष भी अभूतपूर्व श्रद्धा के चलते इस उत्सव का पालन करते है।
यह पर्व चार दिवसीय हैं। भाई दूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। छठ पूजा पूरे विधि-विधान के साथ किया जाता है,व्रति दिन भर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब 7 बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते है। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं।पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। लहसुन, प्याज का सेवन वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ का संपूर्ण वातावरण बहुत ही भक्तिमय व सात्विक होता है। भक्तिगीत गाये जाते है। अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं और व्रत को संपूर्ण माना जाता है।
छठ का पर्यावरणीय महत्व क्या है? छठ पूजा का महत्व पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी है क्योंकि इसका स्वरूप व मनाने का ढंग पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है। यह है ही प्रकृति की पूजा इसके पूजन के केंद्र में सूर्य हैं और पूजन सामग्री मौसमी फल सब्जियाँ, जो कि प्रकृति का आभार स्वरूप है।
छठ पूजा की ऐतिहासिक शुरूआत, संस्कार और पुराणिक उल्लेख छठ पर्व छठ षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाये जाने व मान्यता के अनुसार सूर्य भगवान की बहन छठी मइया को समर्पित होने के कारण ही इसका नाम छठ पड़ा। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूपी आदित्य भगवान ने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना से षष्ठी देवी के नाम पर हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया। रामायण में भी उल्लेखित एक मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
उत्सव का संपूर्ण स्वरूप क्या है? छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
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@Sanatan
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भारत त्यौहारों का देश है यहाँ पर सभी धर्मों के विभिन्न प्रकार के त्यौहार और उत्सव मनाये जाते हैं, उन्हीं में से एक छठ पूजा है जो कि हिंदू धर्म के लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है। छठ पूजा का त्यौहार दीपावली के बाद आने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है।
छठ पूजा के दिन सूर्य भगवान की पूजन सम्पन्न कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। चार दिवस तक मनाये जाने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है। इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिये इस पर्व को 'हठयोग' भी माना जाता है।
छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता है, जिन्हें साक्षी रूप में देखा जा सकता है। छठ पर्व छठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। इस वर्ष 30 अक्टूबर 2022 को यह पर्व मनाया जायेगा। भारत में सूर्योपासना के लिये प्रसिद्ध यह पर्व मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' कहा गया है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिये यह पर्व मनाया जाता है। सूर्यदेव की पूजा का यह त्योहार मुख्य रूप से पूर्व भारत के बिहार, झारखंड, पूर्व उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है।
छठ पूजा के विधि-विधान क्या है? छठ पूजा एक ऐसा पर्व है, जो पूरी तरह से साधक को अपनी इंद्रिय जनित कमजोरियों पर विजय दिलाता है। इससे साधक इसकी कठोरता से जरा भी विचलित हुये बिना पूरे श्रद्धा और समर्पण भाव से इस व्रत को करते है। त्योहार के अनुष्ठान चार दिनों तक मनाये जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। इसमें मुख्य उपासक आमतौर पर महिलाये होती है। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष भी अभूतपूर्व श्रद्धा के चलते इस उत्सव का पालन करते है।
यह पर्व चार दिवसीय हैं। भाई दूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। छठ पूजा पूरे विधि-विधान के साथ किया जाता है,व्रति दिन भर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब 7 बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते है। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं।पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। लहसुन, प्याज का सेवन वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ का संपूर्ण वातावरण बहुत ही भक्तिमय व सात्विक होता है। भक्तिगीत गाये जाते है। अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं और व्रत को संपूर्ण माना जाता है।
छठ का पर्यावरणीय महत्व क्या है? छठ पूजा का महत्व पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी है क्योंकि इसका स्वरूप व मनाने का ढंग पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है। यह है ही प्रकृति की पूजा इसके पूजन के केंद्र में सूर्य हैं और पूजन सामग्री मौसमी फल सब्जियाँ, जो कि प्रकृति का आभार स्वरूप है।
छठ पूजा की ऐतिहासिक शुरूआत, संस्कार और पुराणिक उल्लेख छठ पर्व छठ षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाये जाने व मान्यता के अनुसार सूर्य भगवान की बहन छठी मइया को समर्पित होने के कारण ही इसका नाम छठ पड़ा। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूपी आदित्य भगवान ने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना से षष्ठी देवी के नाम पर हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया। रामायण में भी उल्लेखित एक मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
उत्सव का संपूर्ण स्वरूप क्या है? छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
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@Sanatan
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नहाय खाय पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी 'नहाय-खाय' के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की साफ-सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बना शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते है। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।
लोहंडा और खरना दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिये आस-पास के सभी लोगों को नियंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुये चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
संध्या अर्घ्य तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू जिसे लडुआ भी कहते है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की और चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।
उषा अर्घ्यं चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं, जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं। व्रती घर वापस आकर पीपल के पेड़, जिसे 'ब्रह्म बाबा' कहते हैं, की पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं, जिसे पारण या परना कहते हैं।
व्रत छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है, जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है, कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गई होती है। व्रती को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलायें साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। 'छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालो साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित महिला इसके लिये तैयार न हो जाये। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।
छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता हैं, जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रातः काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा ) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है।
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@Sanatan
लोहंडा और खरना दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिये आस-पास के सभी लोगों को नियंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुये चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
संध्या अर्घ्य तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू जिसे लडुआ भी कहते है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की और चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।
उषा अर्घ्यं चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं, जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं। व्रती घर वापस आकर पीपल के पेड़, जिसे 'ब्रह्म बाबा' कहते हैं, की पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं, जिसे पारण या परना कहते हैं।
व्रत छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है, जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है, कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गई होती है। व्रती को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलायें साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। 'छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालो साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित महिला इसके लिये तैयार न हो जाये। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।
छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता हैं, जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रातः काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा ) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है।
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@Sanatan
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छठ पूजा के 6 चरण योग में छठ पूजा के प्रक्रम को 6 चरण में बांटा गया है। छठ पूजा शुद्धिकरण 6 चरणों में पूरी होती है। पहला शरीर और आत्मा का निराविषीकरण, ऐसा व्रत अनुशासन और आत्मसंयम से संभव से किया जाता है। अपने शरीर और ध्यान को सूर्य की प्राण ऊर्जा पाने के लिये तैयार करते हैं। दूसरा नदी में आधा शरीर डूब जाने तक खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना, ऐसा करने से सूर्य से मिलने वाली प्राण ऊर्जा से सुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है। तीसरा इस चरण में सूर्य की ऊर्जा आपकी आँखो से पीनियल ग्रंथियों तक पहुँचती है। चौथे चरण में आपके अंदर ग्रंथियां एक्टिवेटेड हो जाती हैं। पांचवे जैसे ही पीनियल ग्रंथि जागृत होती है, आपकी रीढ़ तरंगित होकर आपके अंदर की कुंडिलिनी शक्ति को जागृत करती है और आपकी इंदुइशन, यानी अंतर्दृष्टि को मजबूत करती है। छठे व्रत धारण करने वाला स्वयं ऊर्जा का एक स्रोत बन जाता है और जगत को अपने व्यक्तित्व की सकारात्मक ऊर्जा से पोषित करने लायक बन जाता है। सच्चे मन और श्रद्धा के साथ छठ पूजा व्रत करने वालो की सभी मनोकामनाये पूरी होती है इसलिये अपनी मनोकामनाये पूरी करने के लिए स्त्री और पुरुषों दोनों के द्वारा छठ पूजा व्रत किया जाता हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति में त्योहार कुछ ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित होते हैं और वे हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। हम विभिन्न देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं और अपनी श्रेष्ठता की कामना करते हैं और प्रत्येक अवसर को मनाते हैं।
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@Sanatan
हमारी भारतीय संस्कृति में त्योहार कुछ ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित होते हैं और वे हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। हम विभिन्न देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं और अपनी श्रेष्ठता की कामना करते हैं और प्रत्येक अवसर को मनाते हैं।
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नवग्रहों की साधना
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सनातन धर्मे में प्राचीन काल से जो अनेकों प्रकार की धारणाऐं या प्रथाएं प्रचलित हैं उनमें नवग्रहों की उपासना भी है। यह केवल रूढ़िमात्र अथवा प्रथा मात्र नहीं है, इसके मूल में हम लोगों के शरीर से नवग्रहों का सम्बन्ध और ज्योतिष की दृष्टि से सुपुष्ट विचार भी है। यह उक्ति प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' अर्थात् जो कुछ एक शरीर में है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है, वह एक शरीर में भी है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि केव देखा या सुना जाता है वह तो बहुत ही स्थूल है। यंत्रों का तत्वविश्लेषण केवल जड़तत्वों तक ही सीमित है, वह कभी चेतना का साक्षात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वे यंत्र स्वयं जड़ हैं।
प्रत्येक स्थूल वस्तु के एक-एक अधिष्ठातृ देवता हैं, यह बात युक्ति, अनुभव और शास्त्र से सिद्ध है। जैसे स्थूल नेत्रगोलक, जिन्हें हम देखते हैं, नेत्र के अधिभूत रूप हैं। नेत्र इन्द्रिय अध्यात्म है, जो कि इस स्थूल गोलक के द्वारा देखती है। इस दर्शन क्रिया का सहायक जो सूर्य हैं, वह नेत्र का अधिदैव रूप है। नेत्र इन्द्रिय नेत्रगोलक के द्वारा स्थूल रूप को देखे, यह सूर्य की शक्ति की सहायता लिये बिना असम्भव है। इसलिए नेत्र के अधिष्ठातृ देवता सूर्य हैं। सूर्य के भी तीन रूप हैं। जिस सूर्य को हमलोग देखते हैं, वह सूर्य का स्थूल अथवा अधिभूत रूप है। दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का नाम सूर्य देवता है। उन्हीं का रथ सात घोड़ों का है और अरुण सारथी हैं। शनेश्वर, यमराज आदि उनकी सन्तान हैं और भी देवता के रूप में सूर्य का जितना वर्णन आता है, वह सब इस दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का ही है।
सूर्य का अध्यात्म रूप है, समष्टिका नेत्र होना। इन तीन रूपों को ध्यान में रखने से ही शास्त्रों में जो सूर्य का वर्णन हुआ है वह समझ में आ सकता है। यह बात सभी देवताओं के सम्बन्ध में समझ लेनी चाहिये। अब यह बात सिद्धांत रूप से मान ली गयी है कि यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् सूक्ष्म जगत् का ही प्रकाशमात्र है। समष्टि के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वही सूर्य के रूप में प्रकट हुई है। जीव के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वह नेत्र इन्द्रिय के रूप में प्रकट हुई है। इन दोनों के अभिमानी देवता हैं सूर्य, इसलिए नेत्र इन्द्रिय का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सूर्य की प्रत्येक स्थिति का प्रभाव इस पृथ्वी पर और इस पर रहने वाले प्राणियों पर पड़ता है। जैसे यह स्थूल शरीर ही जीव नहीं है, उससे भिन्न है, वैसे ही यह दृश्यमान पृथ्वी ही पृथ्वी देवता नहीं है, यह तो पृथ्वी देवता का शरीर है। इन सब स्थूलताओं का निर्माण सूक्ष्म जगत की दृष्टि से ही हुआ है।
सूक्ष्म ही स्थूल बना है इसलिए जो लोग सूक्ष्म जगत पर विचार नहीं करते, केवल स्थूल जगत में ही अपनी दृष्टि को आबद्ध रखते हैं, वे ठीक ठाक इसका मर्म नहीं समझ पाते। जैसे पृथ्वी, समुद्र, चन्द्रमण्डल, विद्युत, उष्णता आदि से सूर्य का साक्षात सम्बन्ध है, वैसे ही उन पदार्थों से बने हुए मानव शरीर के साथ भी है। प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति के समय, चाहे वह गर्भाधान का हो या भूमिष्ठ होने का हो, सूर्य और इतर ग्रहों का पृथ्वी के साथ जैसा सम्बन्ध होता है और ग्रहचार पद्धति के अनुसार उस प्रदेश में, उस प्रकृति के शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है, वह जीवनभर किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है। ग्रहमण्डल की स्थिति,देशविशेष पर उनका विशेष प्रभाव और देहगत उपादानों की विभिन्नता के कारण प्रत्येक शरीर का ग्रहों के साथ भिन्न सम्बन्ध होता है और उसी के अनुसार फल भी होता है।
प्रत्येक ग्रह के साथ पृथ्वी का और उस पर रहने वाली वस्तुओं का जो महान् आकर्षण विकर्षण चल रहा है, उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता और जगत के परिवर्तनों में, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में, सुख दुःख के निमित्तों में यह महान शक्ति भी एक कारण है इस सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी से योग सम्पन्न महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से इस तत्व का साक्षात्कार करके जीवों के हितार्थ इस ज्योतिर्विद्या को प्रकट किया है। संसार में जो घटनाएं घटती हैं उनके अनेकों कारण बतलाये जाते हैं जीव का प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ, समष्टिकर्ता ईश्वर की इच्छा अथवा प्रकृति का नियमित प्रवाह । इन घटनाओं के साथ ग्रहों के आकर्षण - विकर्षण का क्या सम्बन्ध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते हुए जगत के कार्यों में वे क्या नवीनता ला सकते हैं? यह प्रश्न उठाने के पहले उन सबके एकत्व का विचार कर लेना चाहिये।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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सनातन धर्मे में प्राचीन काल से जो अनेकों प्रकार की धारणाऐं या प्रथाएं प्रचलित हैं उनमें नवग्रहों की उपासना भी है। यह केवल रूढ़िमात्र अथवा प्रथा मात्र नहीं है, इसके मूल में हम लोगों के शरीर से नवग्रहों का सम्बन्ध और ज्योतिष की दृष्टि से सुपुष्ट विचार भी है। यह उक्ति प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' अर्थात् जो कुछ एक शरीर में है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है, वह एक शरीर में भी है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि केव देखा या सुना जाता है वह तो बहुत ही स्थूल है। यंत्रों का तत्वविश्लेषण केवल जड़तत्वों तक ही सीमित है, वह कभी चेतना का साक्षात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वे यंत्र स्वयं जड़ हैं।
प्रत्येक स्थूल वस्तु के एक-एक अधिष्ठातृ देवता हैं, यह बात युक्ति, अनुभव और शास्त्र से सिद्ध है। जैसे स्थूल नेत्रगोलक, जिन्हें हम देखते हैं, नेत्र के अधिभूत रूप हैं। नेत्र इन्द्रिय अध्यात्म है, जो कि इस स्थूल गोलक के द्वारा देखती है। इस दर्शन क्रिया का सहायक जो सूर्य हैं, वह नेत्र का अधिदैव रूप है। नेत्र इन्द्रिय नेत्रगोलक के द्वारा स्थूल रूप को देखे, यह सूर्य की शक्ति की सहायता लिये बिना असम्भव है। इसलिए नेत्र के अधिष्ठातृ देवता सूर्य हैं। सूर्य के भी तीन रूप हैं। जिस सूर्य को हमलोग देखते हैं, वह सूर्य का स्थूल अथवा अधिभूत रूप है। दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का नाम सूर्य देवता है। उन्हीं का रथ सात घोड़ों का है और अरुण सारथी हैं। शनेश्वर, यमराज आदि उनकी सन्तान हैं और भी देवता के रूप में सूर्य का जितना वर्णन आता है, वह सब इस दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का ही है।
सूर्य का अध्यात्म रूप है, समष्टिका नेत्र होना। इन तीन रूपों को ध्यान में रखने से ही शास्त्रों में जो सूर्य का वर्णन हुआ है वह समझ में आ सकता है। यह बात सभी देवताओं के सम्बन्ध में समझ लेनी चाहिये। अब यह बात सिद्धांत रूप से मान ली गयी है कि यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् सूक्ष्म जगत् का ही प्रकाशमात्र है। समष्टि के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वही सूर्य के रूप में प्रकट हुई है। जीव के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वह नेत्र इन्द्रिय के रूप में प्रकट हुई है। इन दोनों के अभिमानी देवता हैं सूर्य, इसलिए नेत्र इन्द्रिय का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सूर्य की प्रत्येक स्थिति का प्रभाव इस पृथ्वी पर और इस पर रहने वाले प्राणियों पर पड़ता है। जैसे यह स्थूल शरीर ही जीव नहीं है, उससे भिन्न है, वैसे ही यह दृश्यमान पृथ्वी ही पृथ्वी देवता नहीं है, यह तो पृथ्वी देवता का शरीर है। इन सब स्थूलताओं का निर्माण सूक्ष्म जगत की दृष्टि से ही हुआ है।
सूक्ष्म ही स्थूल बना है इसलिए जो लोग सूक्ष्म जगत पर विचार नहीं करते, केवल स्थूल जगत में ही अपनी दृष्टि को आबद्ध रखते हैं, वे ठीक ठाक इसका मर्म नहीं समझ पाते। जैसे पृथ्वी, समुद्र, चन्द्रमण्डल, विद्युत, उष्णता आदि से सूर्य का साक्षात सम्बन्ध है, वैसे ही उन पदार्थों से बने हुए मानव शरीर के साथ भी है। प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति के समय, चाहे वह गर्भाधान का हो या भूमिष्ठ होने का हो, सूर्य और इतर ग्रहों का पृथ्वी के साथ जैसा सम्बन्ध होता है और ग्रहचार पद्धति के अनुसार उस प्रदेश में, उस प्रकृति के शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है, वह जीवनभर किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है। ग्रहमण्डल की स्थिति,देशविशेष पर उनका विशेष प्रभाव और देहगत उपादानों की विभिन्नता के कारण प्रत्येक शरीर का ग्रहों के साथ भिन्न सम्बन्ध होता है और उसी के अनुसार फल भी होता है।
प्रत्येक ग्रह के साथ पृथ्वी का और उस पर रहने वाली वस्तुओं का जो महान् आकर्षण विकर्षण चल रहा है, उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता और जगत के परिवर्तनों में, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में, सुख दुःख के निमित्तों में यह महान शक्ति भी एक कारण है इस सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी से योग सम्पन्न महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से इस तत्व का साक्षात्कार करके जीवों के हितार्थ इस ज्योतिर्विद्या को प्रकट किया है। संसार में जो घटनाएं घटती हैं उनके अनेकों कारण बतलाये जाते हैं जीव का प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ, समष्टिकर्ता ईश्वर की इच्छा अथवा प्रकृति का नियमित प्रवाह । इन घटनाओं के साथ ग्रहों के आकर्षण - विकर्षण का क्या सम्बन्ध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते हुए जगत के कार्यों में वे क्या नवीनता ला सकते हैं? यह प्रश्न उठाने के पहले उन सबके एकत्व का विचार कर लेना चाहिये।
(क्रमशः)
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सनातन धर्म • Sanatan Dharma
@Sanatan
आज आंवला नवमी का त्यौहार हैं। आज के युवा शायद ही इसके बारे में अधिक जानते हो क्योंकि ये उत्सव भी व्यस्तता और आधुनिकता की भेंट चढ़ता जा रहा हैं।
आँवला नवमी को अक्षय नवमी भी कहा जाता हैं। क्योंकि आंवले को आयुर्वेद में फलो का राजा कहा गया हैं। ये उत्सव सनातन के पर्यावरण प्रेमी होने का एक और प्रमाण हैं क्योंकि आज आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती हैं। मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने का उत्सव हैं आंवला नवमी।
ये उत्सव आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। इस दिन हम परिवार सहित और आसपास के परिचित परिवार सभी साथ मिलकर किसी परिचित की बाड़ी (जहाँ आंवला, अमरूद, बेर, इमली जैसे वृक्ष हो) में जाते थे। वहां पूजा के साथ पिकनिक भी हो जाया करती थी।
सभी परिवार घर से भोजन बनाकर साथ ले जाते थे। सुबह से ही तैयारियां शुरू हो जाती। दिनभर पिकनिक चलती। अंताक्षरी जैसे खेल सब मिलकर खेलते। आँवला, अमरूद या जो भी फल बाड़ी में मिलते खूब खाते बहुत आनंद आता। बचपन मे दीपावली के बाद आंवला नवमी की ही सबसे अधिक प्रतीक्षा रहती थी। ये उत्सव एक माध्यम था बच्चों को पर्यावरण, प्रकृति से सीधे जोड़ने का।
भले ही आधुनिक समाज ने साथ मिलकर पिकनिक बनाना "हम आपके हैं कौन" या सूरज बड़जात्या की पारिवारिक फिल्मों से सीखा हो किन्तु सनातन में पिकनिक का उत्सव अनादिकाल से प्रारंभ है। आज प्रत्येक नई सोच की जड़े सनातन पर ही जाकर मिलती हैं। सब कुछ सनातन में था लेकिन समय के साथ इन पर परत जमती चली गई।
प्रथाएं और परम्परायें यूँ ही सदियों तक निरन्तर नही चलती उन्हें सहेजकर रखना पड़ता हैं। इस मामले में हमारे माता-पिता और पूर्वज हमसे कहीं आगे थे।
आँवला नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं...
@Sanatan
आँवला नवमी को अक्षय नवमी भी कहा जाता हैं। क्योंकि आंवले को आयुर्वेद में फलो का राजा कहा गया हैं। ये उत्सव सनातन के पर्यावरण प्रेमी होने का एक और प्रमाण हैं क्योंकि आज आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती हैं। मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने का उत्सव हैं आंवला नवमी।
ये उत्सव आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। इस दिन हम परिवार सहित और आसपास के परिचित परिवार सभी साथ मिलकर किसी परिचित की बाड़ी (जहाँ आंवला, अमरूद, बेर, इमली जैसे वृक्ष हो) में जाते थे। वहां पूजा के साथ पिकनिक भी हो जाया करती थी।
सभी परिवार घर से भोजन बनाकर साथ ले जाते थे। सुबह से ही तैयारियां शुरू हो जाती। दिनभर पिकनिक चलती। अंताक्षरी जैसे खेल सब मिलकर खेलते। आँवला, अमरूद या जो भी फल बाड़ी में मिलते खूब खाते बहुत आनंद आता। बचपन मे दीपावली के बाद आंवला नवमी की ही सबसे अधिक प्रतीक्षा रहती थी। ये उत्सव एक माध्यम था बच्चों को पर्यावरण, प्रकृति से सीधे जोड़ने का।
भले ही आधुनिक समाज ने साथ मिलकर पिकनिक बनाना "हम आपके हैं कौन" या सूरज बड़जात्या की पारिवारिक फिल्मों से सीखा हो किन्तु सनातन में पिकनिक का उत्सव अनादिकाल से प्रारंभ है। आज प्रत्येक नई सोच की जड़े सनातन पर ही जाकर मिलती हैं। सब कुछ सनातन में था लेकिन समय के साथ इन पर परत जमती चली गई।
प्रथाएं और परम्परायें यूँ ही सदियों तक निरन्तर नही चलती उन्हें सहेजकर रखना पड़ता हैं। इस मामले में हमारे माता-पिता और पूर्वज हमसे कहीं आगे थे।
आँवला नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं...
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सनातन धर्म • Sanatan Dharma
नवग्रहों की साधना ------------------------ सनातन धर्मे में प्राचीन काल से जो अनेकों प्रकार की धारणाऐं या प्रथाएं प्रचलित हैं उनमें नवग्रहों की उपासना भी है। यह केवल रूढ़िमात्र अथवा प्रथा मात्र नहीं है, इसके मूल में हम लोगों के शरीर से नवग्रहों…
नवग्रहों की साधना (२)
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समष्टिकर्ता की इच्छा ही प्रकृति का प्रवाह है। प्रकृति के सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवाहों के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और जीवों का प्रारब्ध है। इन गति और प्रारब्धों के अनुसार ही पुरुषार्थ और फल होते हैं। शरीर की उत्पत्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है जिसका जैसा कर्म, उसका वैसा शरीर जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्मवासनाऐं रहती हैं, उस जीवन में जैसी घटनाऐं घटनेवाली होती हैं, उसी के अनुसार उस शरीर के जन्म के समय वैसी ही ग्रहस्थिति रहती है। यों भी कह सकते हैं कि वैसी ग्रहस्थिति में ही उसका जन्म होता है अथवा ग्रहों की एक स्थिति में रहने पर भी भिन्न-भिन्न देश और शरीर के भेद से उनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है इसी से ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह किसी नवीन फल का विधान नहीं करते, बल्कि प्रारब्ध के अनुसार घटनेवाली घटना को पहले ही सूचित कर देते हैं ग्रहा वे कर्मसूचकाः । ग्रहों की स्थिति, गति, वक्रता, अतिचार आदि को जाननेवाला ज्योतिषी किसी भी व्यक्ति के जन्म समय को ठीक-ठीक जानकर बतला सकता है कि इसके भविष्य जीवन में कौन कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं।
स्थूल कर्मचक्र के अनुसार केवल इतनी ही बात है, गणित की सत्यता को इस रूप में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। पाश्चात्य देशों में ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करके गणित के आधार पर फलित ज्योतिष उसी प्रकार प्रतिष्ठित किया गया है, जैसे कि वैदिक शास्त्रों मे परन्तु यह बात इतने से ही समाप्त नहीं होती, इसके आगे और भी कुछ है। वेदान्ती का देवता- विज्ञान इन स्थूल कार्यकारण परम्परा और सम्बन्धों से और भी ऊपर जाता है। मानस शास्त्र के वेत्ताओं ने एक स्वर से यह बात स्वीकार की है कि शुद्ध, परिपुष्ट एवं बलिष्ठ मन के द्वारा स्थूल जगत में अघटित घटना भी घटित की जा सकती है। यदि हम उन सूक्ष्मताओं के भी अन्तःस्थल में स्थित हो जायें, जो स्थूल घटनाओं की कारण हैं, तो हम न केवल स्थूल जगत में, बल्कि सूक्ष्म जगत में भी परिवर्तन कर सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि ग्रहों के द्वारा भावी घटनाओं का ज्ञान हो जाने पर मानसिक साधना के द्वारा उन्हें रोका भी जा सकता है।
प्राचीन ऋषियों, योगियों और सिद्ध पुरुषों के द्वारा ऐसा किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि मन ऐसी स्थिति में भी जा सकता है, जहाँ से वह घटनाओं का विधान और अवरोध कर सकता है परन्तु सर्वसाधारण पक्ष में यह बात दुःसाध्य है। इसलिए उन्हें ग्रहमण्डलाधिष्ठातृ देवता की शरण लेनी पड़ती है। जिसके शरीर पर सूर्य ग्रह का दुष्प्रभाव पड़ रहा है या पड़ने वाला है, वह यदि सूर्य मण्डल के अभिमानी देवता का आश्रय ले और पूजा-पाठ, आदि के द्वारा यह अनुभव कर सके कि सूर्यदेवता मुझ पर प्रसन्न हैं, मेरा कल्याण कर रहे हैं और मुझे जीवनदान दे रहे हैं, तो बहुत अंश में उसका अरिष्ट शांत हो जायेगा और वह अपने को सूर्यग्रहजन्य पीड़ा से बचा सकेगा ।
ग्रहशांति की ये दोनों प्रणालियाँ शास्त्रीय हैं पहली का नाम अहंग्रह उपासना और दूसरी का प्रतीक उपासना है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह सूर्यदेवता केवल उपासना के लिये ही हैं। वास्तव में समस्त देवताओं का अलग-अलग अस्तित्व है और सबके लोक, शक्ति, वाहन, क्रिया आदि अलग-अलग बँटे हुए हैं। जब तक विभिन्न शरीर, वस्तु, लोक और नक्षत्रमण्डल आदि पृथक-पृथक प्रतीत हो रहे हैं, इनके द्वारा पृथ्वीमण्डल प्रभावित हो रहा है, तब तक इनमें रहने वाले देवताओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान काल में सम्पूर्ण संसार राष्ट्रविप्लव, पारस्परिक द्रोह, पारिवारिक वैमनस्य, ईर्ष्या-द्वेष, रोग-शोक और उद्वेग अशांति से सर्वथा उपद्रुत हो रहा है। इसके अनेक कारणों में देवताओं की उपेक्षा और उनसे प्राप्त होने वाली सहायता को अस्वीकार कर देना भी है। अन्तर्जगत के नियमानुसार देवताओं को जागतिक पदार्थों के उत्पादन, विनिमय और वितरण का अधिकार प्राप्त है। मनुष्य देवताओं को सन्तुष्ट करें और देवता मनुष्यों को समृद्धि एवं अभिवृद्धि से सम्पन्न करें परन्तु मनुष्यों ने अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ का मिथ्या आश्रय लेकर स्वयं ही आत्मवञ्चना कर ली है, जिसका यह सब, जो दुःख दारिद्रय के रूप दिख रहा है, फल है।
वेदों ने और तदनुयायी शास्त्रों ने एक स्वर से ग्रहशांति की आवश्यकता स्वीकार की है। अर्थवेद में सब देवताओं की पूजा के साथ-साथ ग्रह शांति का भी वर्णन आता है। शन्नो ग्रहाश्चानद्रमसाः शमादिस्याश्च राहुणा इत्यादि प्राचीन आर्यों में इस वैदिक मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन होता था, इसी से वे सुखी थे। आज भी जहाँ प्राचीन प्रथाओं का पालन होता है, वहाँ प्रत्येक शांतिक और पौष्टिक कर्मों में पहले नवग्रह की पूजा होती है।
(क्रमशः)
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समष्टिकर्ता की इच्छा ही प्रकृति का प्रवाह है। प्रकृति के सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवाहों के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और जीवों का प्रारब्ध है। इन गति और प्रारब्धों के अनुसार ही पुरुषार्थ और फल होते हैं। शरीर की उत्पत्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है जिसका जैसा कर्म, उसका वैसा शरीर जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्मवासनाऐं रहती हैं, उस जीवन में जैसी घटनाऐं घटनेवाली होती हैं, उसी के अनुसार उस शरीर के जन्म के समय वैसी ही ग्रहस्थिति रहती है। यों भी कह सकते हैं कि वैसी ग्रहस्थिति में ही उसका जन्म होता है अथवा ग्रहों की एक स्थिति में रहने पर भी भिन्न-भिन्न देश और शरीर के भेद से उनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है इसी से ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह किसी नवीन फल का विधान नहीं करते, बल्कि प्रारब्ध के अनुसार घटनेवाली घटना को पहले ही सूचित कर देते हैं ग्रहा वे कर्मसूचकाः । ग्रहों की स्थिति, गति, वक्रता, अतिचार आदि को जाननेवाला ज्योतिषी किसी भी व्यक्ति के जन्म समय को ठीक-ठीक जानकर बतला सकता है कि इसके भविष्य जीवन में कौन कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं।
स्थूल कर्मचक्र के अनुसार केवल इतनी ही बात है, गणित की सत्यता को इस रूप में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। पाश्चात्य देशों में ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करके गणित के आधार पर फलित ज्योतिष उसी प्रकार प्रतिष्ठित किया गया है, जैसे कि वैदिक शास्त्रों मे परन्तु यह बात इतने से ही समाप्त नहीं होती, इसके आगे और भी कुछ है। वेदान्ती का देवता- विज्ञान इन स्थूल कार्यकारण परम्परा और सम्बन्धों से और भी ऊपर जाता है। मानस शास्त्र के वेत्ताओं ने एक स्वर से यह बात स्वीकार की है कि शुद्ध, परिपुष्ट एवं बलिष्ठ मन के द्वारा स्थूल जगत में अघटित घटना भी घटित की जा सकती है। यदि हम उन सूक्ष्मताओं के भी अन्तःस्थल में स्थित हो जायें, जो स्थूल घटनाओं की कारण हैं, तो हम न केवल स्थूल जगत में, बल्कि सूक्ष्म जगत में भी परिवर्तन कर सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि ग्रहों के द्वारा भावी घटनाओं का ज्ञान हो जाने पर मानसिक साधना के द्वारा उन्हें रोका भी जा सकता है।
प्राचीन ऋषियों, योगियों और सिद्ध पुरुषों के द्वारा ऐसा किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि मन ऐसी स्थिति में भी जा सकता है, जहाँ से वह घटनाओं का विधान और अवरोध कर सकता है परन्तु सर्वसाधारण पक्ष में यह बात दुःसाध्य है। इसलिए उन्हें ग्रहमण्डलाधिष्ठातृ देवता की शरण लेनी पड़ती है। जिसके शरीर पर सूर्य ग्रह का दुष्प्रभाव पड़ रहा है या पड़ने वाला है, वह यदि सूर्य मण्डल के अभिमानी देवता का आश्रय ले और पूजा-पाठ, आदि के द्वारा यह अनुभव कर सके कि सूर्यदेवता मुझ पर प्रसन्न हैं, मेरा कल्याण कर रहे हैं और मुझे जीवनदान दे रहे हैं, तो बहुत अंश में उसका अरिष्ट शांत हो जायेगा और वह अपने को सूर्यग्रहजन्य पीड़ा से बचा सकेगा ।
ग्रहशांति की ये दोनों प्रणालियाँ शास्त्रीय हैं पहली का नाम अहंग्रह उपासना और दूसरी का प्रतीक उपासना है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह सूर्यदेवता केवल उपासना के लिये ही हैं। वास्तव में समस्त देवताओं का अलग-अलग अस्तित्व है और सबके लोक, शक्ति, वाहन, क्रिया आदि अलग-अलग बँटे हुए हैं। जब तक विभिन्न शरीर, वस्तु, लोक और नक्षत्रमण्डल आदि पृथक-पृथक प्रतीत हो रहे हैं, इनके द्वारा पृथ्वीमण्डल प्रभावित हो रहा है, तब तक इनमें रहने वाले देवताओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान काल में सम्पूर्ण संसार राष्ट्रविप्लव, पारस्परिक द्रोह, पारिवारिक वैमनस्य, ईर्ष्या-द्वेष, रोग-शोक और उद्वेग अशांति से सर्वथा उपद्रुत हो रहा है। इसके अनेक कारणों में देवताओं की उपेक्षा और उनसे प्राप्त होने वाली सहायता को अस्वीकार कर देना भी है। अन्तर्जगत के नियमानुसार देवताओं को जागतिक पदार्थों के उत्पादन, विनिमय और वितरण का अधिकार प्राप्त है। मनुष्य देवताओं को सन्तुष्ट करें और देवता मनुष्यों को समृद्धि एवं अभिवृद्धि से सम्पन्न करें परन्तु मनुष्यों ने अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ का मिथ्या आश्रय लेकर स्वयं ही आत्मवञ्चना कर ली है, जिसका यह सब, जो दुःख दारिद्रय के रूप दिख रहा है, फल है।
वेदों ने और तदनुयायी शास्त्रों ने एक स्वर से ग्रहशांति की आवश्यकता स्वीकार की है। अर्थवेद में सब देवताओं की पूजा के साथ-साथ ग्रह शांति का भी वर्णन आता है। शन्नो ग्रहाश्चानद्रमसाः शमादिस्याश्च राहुणा इत्यादि प्राचीन आर्यों में इस वैदिक मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन होता था, इसी से वे सुखी थे। आज भी जहाँ प्राचीन प्रथाओं का पालन होता है, वहाँ प्रत्येक शांतिक और पौष्टिक कर्मों में पहले नवग्रह की पूजा होती है।
(क्रमशः)
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नवग्रहों की साधना (३)
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यह ध्यान रखना चाहिये कि इस पूजा का सम्बन्ध उन उन मण्डलों में रहने वाले देवताओं से है। यहाँ संक्षेप से नवग्रहों के ध्यान का उल्लेख कर दिया जाता है। पूजा पद्धति के अनुसार उनका अनुष्ठान करना चाहिये।
सूर्य
सूर्य ग्रहों का राजा है। ये कश्यप गोत्र के क्षत्रिय एवं कलिङ्ग देश के स्वामी हैं। जपाकुसुम के समान इनका रक्तवर्ण है। दोनों हाथों में कमल लिये हुए हैं, सिन्दूर के समान वस्त्र, आभूषण और माला धारण किये हुए हैं। जगमगाते हुए हीरे, चन्द्रमा और अग्रि को प्रकाशित करने वाला तेज, त्रिलोकी का अन्धकार दूर करने वाला प्रकाश । सात घोड़ों के एक वक्र रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए, प्रकाश के समुद्र भगवान सूर्य का ध्यान करना चाहिए। इनके अधिदेवता शिव हैं और प्रत्यधिदेवता अग्नि । इस प्रकार ध्यान करके मानस पूजा और बाह्य पूजा के अनन्तर मंत्र जप करना चाहिये।
चन्द्रमा
भगवान चन्द्रमा अत्रिगोत्र हैं। यामुन देश के स्वामी हैं। इनका शरीर अमृतमय है। दो हाथ हैं एक में वर मुद्रा हैं, दूसरे में गदा दूध के समान श्वेत शरीर पर श्वेत वस्त्र, माला और अनुलेपन धारण किये हुए हैं। मोती का हार है। अपनी सुधामयी किरणों से तीनों लोकों को सींच रहे हैं। इस घोड़ों के त्रिचक रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। इनके अधिदेवता हैं उमादेवी और प्रत्यधिदेवता जल हैं।
मङ्गल
मंगल भरद्वाज गोत्र के क्षत्रिय हैं। ये अवन्ति के स्वामी हैं। इनका आकार अग्नि के समान रक्त वर्ण है, इनका वाहन मेष है, रक्तवस्त्र और माला धारण किये हुए हैं। हाथों में शक्ति, वर अभय और गदा धारण किये हुए हैं। इनके अंग-अंग से कान्ति की धारा छलक रही है। मेष के रथ पर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए अपने अधिदेवता स्कन्ध और प्रत्यधिदेवता पृथ्वी के साथ सूर्य के अभिमुख जा रहे हैं।
बुध
बुध अत्रिगोत्र एवं मगध देश के स्वामी हैं। इनके शरीर का वर्ण पीला है। चार हाथों में ढाल, गदा, वर और खड्ग है। पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं, बड़ी ही सौम्य मूर्ति है, सिंह पर सवार हैं। इनके अधिदेवता हैं नारायण और प्रत्यधिदेवता हैं विष्णु ।
बृहस्पति
बृहस्पति अङ्गिरा गोत्र के ब्राह्मण हैं। सिन्धु देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण पीत है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, कमल पर बैठे हैं। चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता ब्रह्मा हैं और प्रत्यधिदेवता इन्द्र ।
शुक्र
शुक्र भृगु गोत्र के ब्राह्मण हैं। भोजकट देश के अधिपति हैं। कमल पर बैठे हुए हैं। श्वेत वर्ण हैं, चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड हैं। श्वेत वस्त्र धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता इन्द्र हैं और प्रत्यधिदेवता चन्द्रमा हैं।
शनि
ये कश्यप गोत्र के शूद्र हैं। सौराष्ट्रप्रदेश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण हैं, कृष्ण वस्त्र धारण किये हुए हैं। चार हाथों में बाण, वर, शूल और धनुष हैं। इनका वाहन गीध है। इनके अधिदेवता यमराज और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं।
राहु
राहु पैठीनस गोत्र के शूद्र हैं। मलय देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और वस्त्र भी कृष्ण ही हैं। इनका वाहन सिंह है। चार हाथों में खड्ग, वर, शूल और ढाल लिए हुए हैं। इनके अधिदेवता काल हैं और प्रत्यधिदेवता सर्प हैं।
केतु
ये जैमिनि गोत्र के शूद्र हैं। कुशद्वीप के अधिपति हैं । इनका वर्ण धुएँका सा है और वैसा ही वस्त्र भी धारण किये हुए हैं। मुख विकृत है, गिद्ध वाहन है। दो हाथों में वरमुद्रा तथा गदा हैं। इनके अधिदेवता हैं चित्रगुप्त तथा प्रत्यधि देवता हैं ब्रह्मा ।
(क्रमशः)
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यह ध्यान रखना चाहिये कि इस पूजा का सम्बन्ध उन उन मण्डलों में रहने वाले देवताओं से है। यहाँ संक्षेप से नवग्रहों के ध्यान का उल्लेख कर दिया जाता है। पूजा पद्धति के अनुसार उनका अनुष्ठान करना चाहिये।
सूर्य
सूर्य ग्रहों का राजा है। ये कश्यप गोत्र के क्षत्रिय एवं कलिङ्ग देश के स्वामी हैं। जपाकुसुम के समान इनका रक्तवर्ण है। दोनों हाथों में कमल लिये हुए हैं, सिन्दूर के समान वस्त्र, आभूषण और माला धारण किये हुए हैं। जगमगाते हुए हीरे, चन्द्रमा और अग्रि को प्रकाशित करने वाला तेज, त्रिलोकी का अन्धकार दूर करने वाला प्रकाश । सात घोड़ों के एक वक्र रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए, प्रकाश के समुद्र भगवान सूर्य का ध्यान करना चाहिए। इनके अधिदेवता शिव हैं और प्रत्यधिदेवता अग्नि । इस प्रकार ध्यान करके मानस पूजा और बाह्य पूजा के अनन्तर मंत्र जप करना चाहिये।
चन्द्रमा
भगवान चन्द्रमा अत्रिगोत्र हैं। यामुन देश के स्वामी हैं। इनका शरीर अमृतमय है। दो हाथ हैं एक में वर मुद्रा हैं, दूसरे में गदा दूध के समान श्वेत शरीर पर श्वेत वस्त्र, माला और अनुलेपन धारण किये हुए हैं। मोती का हार है। अपनी सुधामयी किरणों से तीनों लोकों को सींच रहे हैं। इस घोड़ों के त्रिचक रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। इनके अधिदेवता हैं उमादेवी और प्रत्यधिदेवता जल हैं।
मङ्गल
मंगल भरद्वाज गोत्र के क्षत्रिय हैं। ये अवन्ति के स्वामी हैं। इनका आकार अग्नि के समान रक्त वर्ण है, इनका वाहन मेष है, रक्तवस्त्र और माला धारण किये हुए हैं। हाथों में शक्ति, वर अभय और गदा धारण किये हुए हैं। इनके अंग-अंग से कान्ति की धारा छलक रही है। मेष के रथ पर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए अपने अधिदेवता स्कन्ध और प्रत्यधिदेवता पृथ्वी के साथ सूर्य के अभिमुख जा रहे हैं।
बुध
बुध अत्रिगोत्र एवं मगध देश के स्वामी हैं। इनके शरीर का वर्ण पीला है। चार हाथों में ढाल, गदा, वर और खड्ग है। पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं, बड़ी ही सौम्य मूर्ति है, सिंह पर सवार हैं। इनके अधिदेवता हैं नारायण और प्रत्यधिदेवता हैं विष्णु ।
बृहस्पति
बृहस्पति अङ्गिरा गोत्र के ब्राह्मण हैं। सिन्धु देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण पीत है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, कमल पर बैठे हैं। चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता ब्रह्मा हैं और प्रत्यधिदेवता इन्द्र ।
शुक्र
शुक्र भृगु गोत्र के ब्राह्मण हैं। भोजकट देश के अधिपति हैं। कमल पर बैठे हुए हैं। श्वेत वर्ण हैं, चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड हैं। श्वेत वस्त्र धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता इन्द्र हैं और प्रत्यधिदेवता चन्द्रमा हैं।
शनि
ये कश्यप गोत्र के शूद्र हैं। सौराष्ट्रप्रदेश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण हैं, कृष्ण वस्त्र धारण किये हुए हैं। चार हाथों में बाण, वर, शूल और धनुष हैं। इनका वाहन गीध है। इनके अधिदेवता यमराज और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं।
राहु
राहु पैठीनस गोत्र के शूद्र हैं। मलय देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और वस्त्र भी कृष्ण ही हैं। इनका वाहन सिंह है। चार हाथों में खड्ग, वर, शूल और ढाल लिए हुए हैं। इनके अधिदेवता काल हैं और प्रत्यधिदेवता सर्प हैं।
केतु
ये जैमिनि गोत्र के शूद्र हैं। कुशद्वीप के अधिपति हैं । इनका वर्ण धुएँका सा है और वैसा ही वस्त्र भी धारण किये हुए हैं। मुख विकृत है, गिद्ध वाहन है। दो हाथों में वरमुद्रा तथा गदा हैं। इनके अधिदेवता हैं चित्रगुप्त तथा प्रत्यधि देवता हैं ब्रह्मा ।
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नवग्रहों की साधना (४)
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ये सब ग्रह अपनी-अपनी गति से सूर्य ओर बढ़ रहे हैं, सबका मुख सूर्य की ओर हैं। पृथ्वी के साथ सब का सम्बन्ध है। प्रत्येक शांति और पुष्टिकर्म में इनकी आराधना होती है। पृथक-पृथक अरिष्ट के अनुसार भी इनकी पूजा की जाती है। इनमें से किसी एक को प्रसन्न करके उनसे वांछित फल भी प्राप्त किया जा सकता है। जिस ग्रह का जो वर्ण है, उसी रंग की वस्तुऐं प्रायः पूजा में लगायी जाती हैं। मंत्र का जितना जप होता है, उसका दशांश हवन होता है। हवन में भिन्न-भिन्न प्रकार की समिधाऐं काम में लायी जाती हैं। सूर्य के लिये मदार, चन्द्रमा, वृहस्पति के लिये पीपल, शुक्र के लिये गूलर, शनैश्वर के लिये शमी और राहु केतु के लिये दूर्वा का प्रयोग होता है। इस प्रकार पूजा करने से ये ग्रह सन्तुष्ट हो जाते हैं और किसी प्रकार का अनिष्ट न करके सब प्रकार से इष्टसाधन करते हैं। नवग्रह की दोष शांति के लिये रत्न धारण किये जाते हैं सूर्य के लिये माणिक्य, चन्द्रमा के लिये मोती,मंगल के लिये प्रवाल (मूंगा) बुध के लिये मरकतमणि, वृहस्पति के लिये पुष्पराग, शुक्र के लिये हीरा, शनि के लिये नीलकान्तमणि,राहु लिये गोमेद और केतुके लिए वैदूर्यमणि ।
इनके धारण करने से ग्रहों के दोष की शांति हो जाती है। जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं, इष्टदेव की आराधना करते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं, किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, सबका भला करते हैं, सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, शुद्ध हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ता उनको पीड़ा न पहुँचाकर वे उन्हें सुखी करते हैं। उस श्लोक का अंतिम चरण यह है
नो कुर्वन्ति कदाचिदेव पुरुषस्यैर्व ग्रहाः पीडनम् ।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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ये सब ग्रह अपनी-अपनी गति से सूर्य ओर बढ़ रहे हैं, सबका मुख सूर्य की ओर हैं। पृथ्वी के साथ सब का सम्बन्ध है। प्रत्येक शांति और पुष्टिकर्म में इनकी आराधना होती है। पृथक-पृथक अरिष्ट के अनुसार भी इनकी पूजा की जाती है। इनमें से किसी एक को प्रसन्न करके उनसे वांछित फल भी प्राप्त किया जा सकता है। जिस ग्रह का जो वर्ण है, उसी रंग की वस्तुऐं प्रायः पूजा में लगायी जाती हैं। मंत्र का जितना जप होता है, उसका दशांश हवन होता है। हवन में भिन्न-भिन्न प्रकार की समिधाऐं काम में लायी जाती हैं। सूर्य के लिये मदार, चन्द्रमा, वृहस्पति के लिये पीपल, शुक्र के लिये गूलर, शनैश्वर के लिये शमी और राहु केतु के लिये दूर्वा का प्रयोग होता है। इस प्रकार पूजा करने से ये ग्रह सन्तुष्ट हो जाते हैं और किसी प्रकार का अनिष्ट न करके सब प्रकार से इष्टसाधन करते हैं। नवग्रह की दोष शांति के लिये रत्न धारण किये जाते हैं सूर्य के लिये माणिक्य, चन्द्रमा के लिये मोती,मंगल के लिये प्रवाल (मूंगा) बुध के लिये मरकतमणि, वृहस्पति के लिये पुष्पराग, शुक्र के लिये हीरा, शनि के लिये नीलकान्तमणि,राहु लिये गोमेद और केतुके लिए वैदूर्यमणि ।
इनके धारण करने से ग्रहों के दोष की शांति हो जाती है। जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं, इष्टदेव की आराधना करते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं, किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, सबका भला करते हैं, सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, शुद्ध हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ता उनको पीड़ा न पहुँचाकर वे उन्हें सुखी करते हैं। उस श्लोक का अंतिम चरण यह है
नो कुर्वन्ति कदाचिदेव पुरुषस्यैर्व ग्रहाः पीडनम् ।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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पुनर्जन्म रहस्यम्
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आदि गुरु शंकराचार्य जी ने कहा है
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥
अर्थात फिर से जन्म, फिर से मरण और पुनः माता के गर्भ में शयन । इस संसार में कष्ट ही कष्ट हैं। समस्याऐं ही समस्याऐं हैं। हे प्रभु! आप मुझे इस चक्र से मुक्त कीजिए। पृथ्वी पर जन्म लेना ही अत्यधिक कष्टप्रद है। संसारी व्यक्तियों के लिए जन्म केवल माता के गर्भ से बाहर आने पर ही माना जाता है मृत्यु शरीर त्यागने को माना जाता है यह तो एक महाचक्र की कुछ कड़ियाँ हैं। सांसारिक दृष्टिकोण अत्यंत ही सीमित होता है। माता के गर्भ में जीवन के स्पंदन से पहले अनंत कड़ियाँ हैं और मृत्यु के पश्चात् भी अनंत स्थितियाँ हैं। अतः समग्रता के साथ पुनर्जन्म को समझना है, स्वयं की खोज करना है तो सभी कड़ियों को समझना पड़ेगा। उसी के हिसाब से चिंतन को ढालना होगा, कर्मों को सम्पादित करना होगा तब कहीं जाकर हमारे जन्म लेने की वास्तविकता से हम परिचित हो सकेंगे।
पुनर्जन्म विज्ञान महाविज्ञान है। इसको समझे बिना, इसको परखे बिना हम सामान्य व्यक्ति की श्रेणी से ऊपर नहीं उठ सकते। अध्यात्म की तो बात करना भी मुश्किल है। अतः सभी ऋषियों ने ज्ञानियों ने एवं इस पृथ्वी के सभी धर्मों ने किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म की महत्ता स्वीकार की है। विशेषकर इस पृथ्वी के सबसे शाश्वत् एवं मूल वैदिक धर्म ने तो इसकी विस्तृत व्याख्या की है। केवल चर्वाक दर्शन ही सनातन धर्म में एक ऐसा दर्शन हुआ है जिसने कि पुनर्जन्म की व्याख्या नहीं की है। इस कलियुग में अधिकांशतः देशों में चर्वाक दर्शन की निष्कृष्टता के कारण ही मनुष्य अत्यंत भोगी हो गया है। चर्वाक का तो कथन है कि
यावज्जीवं सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबे।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥
अर्थात घर में घी न हो तो उधार लेकर पियो। जितना हो सके मौज करो, जितना हो सके भोग करो। जो दिल चाहे वह स्वच्छंदतापूर्वक करो। सिर्फ अपने बारे में सोचो। स्वयं स्वार्थ सिद्धि करो एवं सभी रिश्तों को एक ताक पर रख दो जीवन का उद्देश्य भोग एवं केवल भोग है।
यह है चर्वाक दर्शन जो कि द्वापर में युधिष्ठिर के समक्ष चर्वाक ने रखा था। उस युग के अनुसार इन्हें जीवित चिता पर जला दिया गया था। वह प्रभु श्रीकृष्ण का युग था अधर्म के सम्पूर्ण नाश का युग था। उस युग में सभी अधर्मियों का युधिष्ठिर के नेतृत्व में प्रभु श्रीकृष्ण के द्वारा सर्वनाश हुआ था। चर्वाक का भी सर्वनाश हुआ। इसके पश्चात आज भी अनंत लोग इस पृथ्वी पर चर्वाक के सिद्धांत का अनुसरण जाने अनजाने में करते ही हैं। अंत क्या होता है? यह सबको मालुम है। भोगियों का अंत अत्यंत ही हृदय विदारक होता है। चर्वाक ने वास्तव में जो परम्परा स्थापित करने की कोशिश की उसका दण्ड तो उसे उसके जीवन में मिल ही गया। प्रभु श्रीकृष्ण ने यह दिखा दिया कि जो भी व्यक्ति चर्वाक के सिद्धांतों पर चलेगा उसका अंत उसके तथाकथित गुरु चर्वाक के समान ही होगा।
इसीलिए इस पृथ्वी पर रुदन है शोक है, धोखा है, रोग है, क्योंकि यह सब चर्वाक सिद्धान्त के फल हैं। कर्म के सार्वभौमिक सिद्धान्त को झुठलाने की प्रक्रिया ही चर्वाक सिद्धान्त है। चर्वाक को समझना अत्यधिक आवश्यक था अन्यथा पुनर्जन्म की व्याख्या संभव नहीं है। जिनके मस्तिष्क में चर्वाक घुसा हुआ हो वे पुर्नजन्म की बात न करें तो अच्छा है। चर्वाक रूपी मस्तिष्क ही इस संसार की समस्त वेदनाओं और समस्याओं की जड़ है। आजकल लोग कहते हैं कि साधु संतों की अत्यधिक भीड़ हो गई है। इसमें क्या बुराई है, यह क्यों हुआ ? इसे आपको समझना होगा। लोगों के दृष्टिकोण अत्यधिक सांसारिक हो गये हैं। इन्द्रियों की गहराई कम हो गई है। इन्द्रियाँ सिकुड़ एवं संकीर्ण हो गई हैं। लोच का हर जगह अभाव मिल रहा है। यंत्रवत जीवन शैली ही हर तरफ दिखाई पड़ती है। साधु संतों में प्रज्ञा का विकास सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक होता है। इसीलिए वे सत्य को अधिकतम सीमा तक पहचानते हैं। मनुष्य के अंदर समझने की शक्ति है। समझने की शक्ति ही ज्ञान प्राप्ति में अत्यधिक सहायक है। जैसे-जैसे समझने की शक्ति विस्तृत एवं सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है वैसे- वैसे मनुष्य गूढ़ ज्ञान, गुह्य ज्ञान, तत्व् ज्ञान, महाज्ञान एवं दिव्य ज्ञान और अंत में ब्रह्म ज्ञान की आवृत्तियों में प्रवेश करता जाता है।
ज्ञान प्राप्ति के अभाव में मुक्ति असम्भव है। साधु-संत अपनी स्थितिनुसार विभिन्न माध्यमों से ज्ञान को सामान्य जनों के सामने उपस्थित करते हैं। मानना न मानना अलग बात है। यह भी ईश्वर का एक विधान है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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आदि गुरु शंकराचार्य जी ने कहा है
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥
अर्थात फिर से जन्म, फिर से मरण और पुनः माता के गर्भ में शयन । इस संसार में कष्ट ही कष्ट हैं। समस्याऐं ही समस्याऐं हैं। हे प्रभु! आप मुझे इस चक्र से मुक्त कीजिए। पृथ्वी पर जन्म लेना ही अत्यधिक कष्टप्रद है। संसारी व्यक्तियों के लिए जन्म केवल माता के गर्भ से बाहर आने पर ही माना जाता है मृत्यु शरीर त्यागने को माना जाता है यह तो एक महाचक्र की कुछ कड़ियाँ हैं। सांसारिक दृष्टिकोण अत्यंत ही सीमित होता है। माता के गर्भ में जीवन के स्पंदन से पहले अनंत कड़ियाँ हैं और मृत्यु के पश्चात् भी अनंत स्थितियाँ हैं। अतः समग्रता के साथ पुनर्जन्म को समझना है, स्वयं की खोज करना है तो सभी कड़ियों को समझना पड़ेगा। उसी के हिसाब से चिंतन को ढालना होगा, कर्मों को सम्पादित करना होगा तब कहीं जाकर हमारे जन्म लेने की वास्तविकता से हम परिचित हो सकेंगे।
पुनर्जन्म विज्ञान महाविज्ञान है। इसको समझे बिना, इसको परखे बिना हम सामान्य व्यक्ति की श्रेणी से ऊपर नहीं उठ सकते। अध्यात्म की तो बात करना भी मुश्किल है। अतः सभी ऋषियों ने ज्ञानियों ने एवं इस पृथ्वी के सभी धर्मों ने किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म की महत्ता स्वीकार की है। विशेषकर इस पृथ्वी के सबसे शाश्वत् एवं मूल वैदिक धर्म ने तो इसकी विस्तृत व्याख्या की है। केवल चर्वाक दर्शन ही सनातन धर्म में एक ऐसा दर्शन हुआ है जिसने कि पुनर्जन्म की व्याख्या नहीं की है। इस कलियुग में अधिकांशतः देशों में चर्वाक दर्शन की निष्कृष्टता के कारण ही मनुष्य अत्यंत भोगी हो गया है। चर्वाक का तो कथन है कि
यावज्जीवं सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबे।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥
अर्थात घर में घी न हो तो उधार लेकर पियो। जितना हो सके मौज करो, जितना हो सके भोग करो। जो दिल चाहे वह स्वच्छंदतापूर्वक करो। सिर्फ अपने बारे में सोचो। स्वयं स्वार्थ सिद्धि करो एवं सभी रिश्तों को एक ताक पर रख दो जीवन का उद्देश्य भोग एवं केवल भोग है।
यह है चर्वाक दर्शन जो कि द्वापर में युधिष्ठिर के समक्ष चर्वाक ने रखा था। उस युग के अनुसार इन्हें जीवित चिता पर जला दिया गया था। वह प्रभु श्रीकृष्ण का युग था अधर्म के सम्पूर्ण नाश का युग था। उस युग में सभी अधर्मियों का युधिष्ठिर के नेतृत्व में प्रभु श्रीकृष्ण के द्वारा सर्वनाश हुआ था। चर्वाक का भी सर्वनाश हुआ। इसके पश्चात आज भी अनंत लोग इस पृथ्वी पर चर्वाक के सिद्धांत का अनुसरण जाने अनजाने में करते ही हैं। अंत क्या होता है? यह सबको मालुम है। भोगियों का अंत अत्यंत ही हृदय विदारक होता है। चर्वाक ने वास्तव में जो परम्परा स्थापित करने की कोशिश की उसका दण्ड तो उसे उसके जीवन में मिल ही गया। प्रभु श्रीकृष्ण ने यह दिखा दिया कि जो भी व्यक्ति चर्वाक के सिद्धांतों पर चलेगा उसका अंत उसके तथाकथित गुरु चर्वाक के समान ही होगा।
इसीलिए इस पृथ्वी पर रुदन है शोक है, धोखा है, रोग है, क्योंकि यह सब चर्वाक सिद्धान्त के फल हैं। कर्म के सार्वभौमिक सिद्धान्त को झुठलाने की प्रक्रिया ही चर्वाक सिद्धान्त है। चर्वाक को समझना अत्यधिक आवश्यक था अन्यथा पुनर्जन्म की व्याख्या संभव नहीं है। जिनके मस्तिष्क में चर्वाक घुसा हुआ हो वे पुर्नजन्म की बात न करें तो अच्छा है। चर्वाक रूपी मस्तिष्क ही इस संसार की समस्त वेदनाओं और समस्याओं की जड़ है। आजकल लोग कहते हैं कि साधु संतों की अत्यधिक भीड़ हो गई है। इसमें क्या बुराई है, यह क्यों हुआ ? इसे आपको समझना होगा। लोगों के दृष्टिकोण अत्यधिक सांसारिक हो गये हैं। इन्द्रियों की गहराई कम हो गई है। इन्द्रियाँ सिकुड़ एवं संकीर्ण हो गई हैं। लोच का हर जगह अभाव मिल रहा है। यंत्रवत जीवन शैली ही हर तरफ दिखाई पड़ती है। साधु संतों में प्रज्ञा का विकास सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक होता है। इसीलिए वे सत्य को अधिकतम सीमा तक पहचानते हैं। मनुष्य के अंदर समझने की शक्ति है। समझने की शक्ति ही ज्ञान प्राप्ति में अत्यधिक सहायक है। जैसे-जैसे समझने की शक्ति विस्तृत एवं सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है वैसे- वैसे मनुष्य गूढ़ ज्ञान, गुह्य ज्ञान, तत्व् ज्ञान, महाज्ञान एवं दिव्य ज्ञान और अंत में ब्रह्म ज्ञान की आवृत्तियों में प्रवेश करता जाता है।
ज्ञान प्राप्ति के अभाव में मुक्ति असम्भव है। साधु-संत अपनी स्थितिनुसार विभिन्न माध्यमों से ज्ञान को सामान्य जनों के सामने उपस्थित करते हैं। मानना न मानना अलग बात है। यह भी ईश्वर का एक विधान है।
(क्रमशः)
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पुनर्जन्म रहस्यम् (२)
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जिस प्रकार बरसात से पहले आकाश अचानक मेघमय हो जाता है और समझदार प्राणी अपने आपको सुरक्षित जगहों पर छिपा लेते हैं उसी प्रकार ईश्वर भी ज्ञानी पुरुषों के माध्यम से चेतावनी प्रकट करता है। आपके माता पिता आपको समझाते हैं कि आप पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो,व्यापार व्यवसाय पर ध्यान दो आप नहीं मानते हैं तो फिर उसका नतीजा भुगतते हैं। नतीजा भोगने वाले भी एक प्रकार से जीते जागते उदाहरण हैं सभी जनमानस के लिए जो कि ईश्वर द्वारा रचित परम सूक्ष्म कर्म व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं। चोरी करना महापाप है सभी को मालुम है फिर भी लोग चोरी करते हैं। उन्हें राज्य की तरफ से दण्ड मिलता है वे जीते जागते उदाहरण बन जाते हैं अन्य लोगों के लिए।
निरपेक्ष भाव से देखें तो इस संसार में दो स्थितियां सामने उभर कर आती हैं। प्रथम जिसमें ईश्वर एक ऐसी व्यवस्था निर्मित करता है जो कि सृष्टि संचालन के लिए अत्यधिक उपयुक्त हो। दूसरी तरफ ईश्वर मनुष्य के साथ-साथ प्रत्येक प्राणी को उसके कर्म सम्पादित करने के लिए एक विस्तृत सीमा तक छूट भी देता है। मनुष्य को पूर्ण स्वतन्त्रता है कर्म सम्पादित करने के लिए। सभी को मालुम है कि भोगवाद उचित नहीं है फिर भी इस पृथ्वी पर ईश्वर ने भोगवादी संस्कृति की भी पूरी छूट दे रखी है। यह प्रमाणीकरण का सबसे उपयुक्त तरीका है। भोग करके भी देख लो। अति में भी भोग करके देख लो। पाश्चात्य मुल्कों में भोग की इतनी अति भी निर्मित कर दी गई है कि वह परम विकृति के अंतिम बिन्दु तक पहुंच गई है।वहां पर भी पहुँचकर मनुष्य को संतुष्टि प्राप्त नहीं होती। यही ईश्वर की मार है। उसकी लाठी जब चलती है। तो दिखाई भी नहीं देती है और न ही आवाज होती है फिर भी चोट तगड़ी लगती है।
पुनर्जन्म की व्याख्या से पहले वर्तमान की भोग व्याख्या अत्यधिक आवश्यक थी।अब बात करते हैं पुनर्जन्म के कुछ अंतरंग पहलुओं की । पूर्वजन्म क्या है? कुछ भी नहीं सिर्फ जो वर्तमान चल रहा है बस उसी का भूतकाल। वर्तमान की प्राप्ति पूर्वजन्म आधारित है। सामान्य मनुष्य से ऊपर उठने की जैसे ही हम कोशिश करते हैं हमें तुरंत ही पूर्वजन्म की स्थितियों को जानना होगा। वर्तमान का विशेषण ही पूर्वजन्म की व्याख्या है। एक व्यक्ति जैसे अध्यात्म की तरफ बढ़ता है, स्वयं का निरीक्षण शुरू करता है, ध्यानस्थ होने के लिए बैठता है तो उसे क्रोध आने लगता है। कभी-कभी आँखों से आँसू भी आ जाते हैं, बचपन की यादें ताजा हो उठती हैं,उसे अपना अपमान याद आने लगता है। वह घबरा उठता है और तुंरत ही ध्यान से उठकर भागने लगता है। भागने से क्या होगा?अभी तो इसी शरीर से सम्पन्न किए गये कर्मों के अवशेष बाकी हैं। जैसे-जैसे व्यक्ति निरपेक्ष भाव से अपने मानस पर जमी धूल साफ करता जायेगा उसे अपना पूर्वजन्म दिखलाई पड़ने लगेगा।पूर्व जन्म कुछ भी नहीं है बस सिर्फ कर्मों की श्रंखला है।
कर्मों से मुक्ति किसी को भी नहीं है। कर्म सभी को सभी योनियों में, सभी लोकों में सम्पन्न करने पड़ते हैं। देवलोक में भी कर्म हैं, नर्क में भी कर्म हैं। श्रंखला सम्पन्न करने के लिए ही आत्मा को शरीर धारण करना पड़ता है। सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाने के लिए वृक्ष योनि में ही जाना पड़ेगा। नृत्य कर्म सम्पादित करने के लिए नर्तकी ही बनना पड़ेगा। दिव्य भोगों को भोगने के लिए स्वर्ग लोक में जाकर स्वर्गानुसार दिव्य देह ही धारण करती होगी। जैसा लोक होगा उसी के अनुसार देह की प्राप्ति होगी और उस लोक में लोकानुसार कर्मों को ही सम्पादित करना होगा। स्वर्ग में संतानोत्पत्ति नहीं की जाती।देव लोक में असुरी कर्म सम्पादित नहीं कर सकते।पितृलोक में रहकर अपने वंशजो द्वारा प्रदत्त तर्पण और श्राद्ध रूपी भोजन से ही स्वयं को तृप्त करना पड़ेगा। पूजन का दशांश प्रभु ने केवल देवताओं के लिए ही निश्चित किया है। यज्ञानुष्ठान की आहुतियां केवल देवता ही ग्रहण कर सकते हैं। यही तो मूल कारण है देवताओं और असुरों के बीच युद्ध का।
देवता और असुर दोनों एक ही पिता से उत्पन्न हुए हैं परन्तु प्रजापति ने असुरों को दिव्यनुष्ठानों एवं पूजन इत्यादि के दशांश से वंचित कर दिया और इसी कारण से असुर शक्तियाँ देवताओं पर कुपित हो उठीं। अनंत काल से बस यही बात युद्ध का कारण बनी हुई है। यही है पुनर्जन्म का मूल कर्म सिद्धान्त इसी कर्म सिद्धान्त की प्रभु श्री कृष्ण ने श्रीमद् भगवत गीता में व्याख्या की है।असुर अपना कर्म सम्पन्न करेंगे, देवता अपना कर्म एवं परम परमेश्वर को भी अपना कर्म सम्पादित करना पड़ता है। जितनी भी दिव्य महा शक्तियां हैं वे सबकी सब अपने मूल कर्मों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। महादेव भी प्रतिबद्ध है वरदान देने के लिए, विष्णु भी प्रतिबद्ध है ब्रह्माण्ड के पालन के लिए एवं दुष्टों के दलन के लिए ब्रह्मा भी प्रतिबद्ध हैं सृष्टि की रचना के लिए।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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जिस प्रकार बरसात से पहले आकाश अचानक मेघमय हो जाता है और समझदार प्राणी अपने आपको सुरक्षित जगहों पर छिपा लेते हैं उसी प्रकार ईश्वर भी ज्ञानी पुरुषों के माध्यम से चेतावनी प्रकट करता है। आपके माता पिता आपको समझाते हैं कि आप पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो,व्यापार व्यवसाय पर ध्यान दो आप नहीं मानते हैं तो फिर उसका नतीजा भुगतते हैं। नतीजा भोगने वाले भी एक प्रकार से जीते जागते उदाहरण हैं सभी जनमानस के लिए जो कि ईश्वर द्वारा रचित परम सूक्ष्म कर्म व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं। चोरी करना महापाप है सभी को मालुम है फिर भी लोग चोरी करते हैं। उन्हें राज्य की तरफ से दण्ड मिलता है वे जीते जागते उदाहरण बन जाते हैं अन्य लोगों के लिए।
निरपेक्ष भाव से देखें तो इस संसार में दो स्थितियां सामने उभर कर आती हैं। प्रथम जिसमें ईश्वर एक ऐसी व्यवस्था निर्मित करता है जो कि सृष्टि संचालन के लिए अत्यधिक उपयुक्त हो। दूसरी तरफ ईश्वर मनुष्य के साथ-साथ प्रत्येक प्राणी को उसके कर्म सम्पादित करने के लिए एक विस्तृत सीमा तक छूट भी देता है। मनुष्य को पूर्ण स्वतन्त्रता है कर्म सम्पादित करने के लिए। सभी को मालुम है कि भोगवाद उचित नहीं है फिर भी इस पृथ्वी पर ईश्वर ने भोगवादी संस्कृति की भी पूरी छूट दे रखी है। यह प्रमाणीकरण का सबसे उपयुक्त तरीका है। भोग करके भी देख लो। अति में भी भोग करके देख लो। पाश्चात्य मुल्कों में भोग की इतनी अति भी निर्मित कर दी गई है कि वह परम विकृति के अंतिम बिन्दु तक पहुंच गई है।वहां पर भी पहुँचकर मनुष्य को संतुष्टि प्राप्त नहीं होती। यही ईश्वर की मार है। उसकी लाठी जब चलती है। तो दिखाई भी नहीं देती है और न ही आवाज होती है फिर भी चोट तगड़ी लगती है।
पुनर्जन्म की व्याख्या से पहले वर्तमान की भोग व्याख्या अत्यधिक आवश्यक थी।अब बात करते हैं पुनर्जन्म के कुछ अंतरंग पहलुओं की । पूर्वजन्म क्या है? कुछ भी नहीं सिर्फ जो वर्तमान चल रहा है बस उसी का भूतकाल। वर्तमान की प्राप्ति पूर्वजन्म आधारित है। सामान्य मनुष्य से ऊपर उठने की जैसे ही हम कोशिश करते हैं हमें तुरंत ही पूर्वजन्म की स्थितियों को जानना होगा। वर्तमान का विशेषण ही पूर्वजन्म की व्याख्या है। एक व्यक्ति जैसे अध्यात्म की तरफ बढ़ता है, स्वयं का निरीक्षण शुरू करता है, ध्यानस्थ होने के लिए बैठता है तो उसे क्रोध आने लगता है। कभी-कभी आँखों से आँसू भी आ जाते हैं, बचपन की यादें ताजा हो उठती हैं,उसे अपना अपमान याद आने लगता है। वह घबरा उठता है और तुंरत ही ध्यान से उठकर भागने लगता है। भागने से क्या होगा?अभी तो इसी शरीर से सम्पन्न किए गये कर्मों के अवशेष बाकी हैं। जैसे-जैसे व्यक्ति निरपेक्ष भाव से अपने मानस पर जमी धूल साफ करता जायेगा उसे अपना पूर्वजन्म दिखलाई पड़ने लगेगा।पूर्व जन्म कुछ भी नहीं है बस सिर्फ कर्मों की श्रंखला है।
कर्मों से मुक्ति किसी को भी नहीं है। कर्म सभी को सभी योनियों में, सभी लोकों में सम्पन्न करने पड़ते हैं। देवलोक में भी कर्म हैं, नर्क में भी कर्म हैं। श्रंखला सम्पन्न करने के लिए ही आत्मा को शरीर धारण करना पड़ता है। सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाने के लिए वृक्ष योनि में ही जाना पड़ेगा। नृत्य कर्म सम्पादित करने के लिए नर्तकी ही बनना पड़ेगा। दिव्य भोगों को भोगने के लिए स्वर्ग लोक में जाकर स्वर्गानुसार दिव्य देह ही धारण करती होगी। जैसा लोक होगा उसी के अनुसार देह की प्राप्ति होगी और उस लोक में लोकानुसार कर्मों को ही सम्पादित करना होगा। स्वर्ग में संतानोत्पत्ति नहीं की जाती।देव लोक में असुरी कर्म सम्पादित नहीं कर सकते।पितृलोक में रहकर अपने वंशजो द्वारा प्रदत्त तर्पण और श्राद्ध रूपी भोजन से ही स्वयं को तृप्त करना पड़ेगा। पूजन का दशांश प्रभु ने केवल देवताओं के लिए ही निश्चित किया है। यज्ञानुष्ठान की आहुतियां केवल देवता ही ग्रहण कर सकते हैं। यही तो मूल कारण है देवताओं और असुरों के बीच युद्ध का।
देवता और असुर दोनों एक ही पिता से उत्पन्न हुए हैं परन्तु प्रजापति ने असुरों को दिव्यनुष्ठानों एवं पूजन इत्यादि के दशांश से वंचित कर दिया और इसी कारण से असुर शक्तियाँ देवताओं पर कुपित हो उठीं। अनंत काल से बस यही बात युद्ध का कारण बनी हुई है। यही है पुनर्जन्म का मूल कर्म सिद्धान्त इसी कर्म सिद्धान्त की प्रभु श्री कृष्ण ने श्रीमद् भगवत गीता में व्याख्या की है।असुर अपना कर्म सम्पन्न करेंगे, देवता अपना कर्म एवं परम परमेश्वर को भी अपना कर्म सम्पादित करना पड़ता है। जितनी भी दिव्य महा शक्तियां हैं वे सबकी सब अपने मूल कर्मों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। महादेव भी प्रतिबद्ध है वरदान देने के लिए, विष्णु भी प्रतिबद्ध है ब्रह्माण्ड के पालन के लिए एवं दुष्टों के दलन के लिए ब्रह्मा भी प्रतिबद्ध हैं सृष्टि की रचना के लिए।
(क्रमशः)
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पुनर्जन्म रहस्यम् (३)
जब भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जब-जब इस पृथ्वी पर अधर्म बढ़ेगा मुझे देह धारण करनी ही पड़ेगी। जैसे ही मुझे देह धारण करनी पड़ेगी हे पार्थ। तुझे भी देह धारण करनी ही पड़ेगी। जब- जब मैं इस पृथ्वी पर आऊंगा तुझे भी पृथ्वी पर आना ही पड़ेगा। यह तो निश्चित ही है। अतः तू मुझे पहचान। आगे प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं मैं इस पृथ्वी पर अनेकों बार आया हूँ। तू भी अनेकों बार आया है। तू अपने जन्मों को भूल गया है परन्तु मैं कुछ भी नहीं भूला हूँ। वृक्ष से निकला हुआ नया बीज पुनः पृथ्वी पर नये वृक्ष की रचना कर देता है। वृक्ष में लगे नये पत्ते सोचें कि अगर वे पहली बार उगे हैं तो यह मूर्खता है। अनंतकाल से हर वृक्ष में पत्ते होते हैं। हमारी आकाश गंगा रूपी महावृक्ष से पुनः बीज रूपी जीवन ब्रह्माण्ड में कहीं एक और समान आकाश गंगा उदित कर देगा। बीज सभी के होते हैं। उस आकाश गंगा में भी ठीक इस आकाश गंगा के समान ही सूर्य, चंद्र, ब्रहस्पति, शुक्र इत्यादि जैसे ग्रह नक्षत्रिकाएं अनेकों उपग्रह एवं असंख्य तारागण समूह होंगे। आकाश गंगाओं के भी बीज होते हैं। यही है महाज्ञान यही है ब्रह्मज्ञान । श्रंखलाबद्ध जीवन।
रामानुजाचार्य के गुरु ब्रह्मज्ञानी थे। मृत्यु के समय जैसे ही उनका प्रिय शिष्य रामानुजाचार्य उनके नजदीक पहुँचा वह देखता है कि गुरु की तीन उँगलियां उठी हुई हैं वह तुरंत ही समझ गये कि गुरु के तीन कार्य अधूरे रह गये हैं। उन्होंने तुरंत ही शपथ ली कि मैं अपने जीवन में ब्रह्मसूत्र, महाज्ञान प्रबंधन एवं वेदान्त दर्शन पर तीन टीकाएं अवश्य लिखूंगा। गुरु अपने अधूरे कार्यों की श्रंखला शिष्य को प्रदान करके चले गये। वैदिक दर्शन पूरी तरह से पुनर्जन्म आधारित है। इस दर्शन की एक एक श्रृंखला में पूर्वजन्म के कर्मों को सम्पादित करने की पूरी व्यवस्था है। वेदान्त दर्शन से भागने में क्या होगा ? जिस दिन मनुष्य भागने में सक्षम हो जायेगा पलायन का सिद्धान्त सफल हो जायेगा और उस दिन ईश्वर का मूल्य ही क्या रह जायेगा। ईश्वर की तो छोड़िये अगर स्थूल कर्मों का सिद्धान्त ही खण्डित हो जाये तो फिर सभी भगवान हो जायेंगे। जब सभी भगवान हो जायेंगे तो फिर भगवान को कौन पूजेगा। सभी भगवान नहीं हो सकते। सभी मनुष्य नहीं हो सकते, सभी देवता भी नहीं हो सकते एवं सभी असुर, पशु या वृक्ष भी नहीं हो सकते। यही तो विशेषता है ईश्वर की।
एक पेड़ से कई बीज गिरते हैं और कई वृक्ष उगते हैं। सभी के कर्म समान होते हैं और आम के सभी वृक्षों में से आम ही उँगेंगे। यह है देह धारण करने का सिद्धान्त । आपका गोत्र भारद्वाज है तो फिर आपके आदि ऋषि भारद्वाज की चेतनानुसार ही आप देह धारण करेंगे। आप अगर क्षत्रिय कुल में पैदा हुए हैं तो फिर क्षत्रियोचित्त कर्म आपकी जीवन शैली में निश्चित ही दिखाई पड़ेगें। इन कर्मों , को आपको सम्पादित करना ही पड़ेगा। इनसे आप भाग नहीं पायेंगे। कुछ दिन भागने के पश्चात् गड़बड़ होना शुरू हो जायेगी। आपको अपने कर्मों पर पुनः लौटना पड़ेगा। एक जगह राम लीला चल रही थी। रावण जोर से अट्टाहास कर रहा था, सीता हाय राम हाय राम कह विलाप कर रही थी। राम लक्ष्मण और हनुमान रावण से युद्ध कर रहे थे। जनता जनार्दन भावावेश में चिल्ला रही थी। तत्पश्चात् पर्दा गिरता है कुछ लोग पीछे जाकर देखते हैं कि ड्रेसिंग रूम में सीता रावण के पास खड़ी मुस्कुरा रही है। राम और लक्ष्मण हँस-हँस कर रावण से बात कर रहे हैं और हनुमान जी सबको चाय पिला रहें हैं।
आपके मस्तिष्क में इतनी ताकत होनी चाहिए कि आप राम लीला के पात्रों के इस दृश्य को पचा सकें। अगर इनको भी नहीं पचा पाओगे तो फिर ईश्वर की परम लीला के पीछे के दृश्यों को क्या पचाओगे। जीवन के रंगमंच पर नाटक तो करने ही पड़ते हैं। अभिनय तो जीवन का हिस्सा है। वर्तमान जीवन पूर्वजन्म के कर्मों को अभिनीत करने का अच्छा रंग मंच है। कर्म कष्ट, प्रायश्चितों और पापों को वर्तमान जीवन में ही धोया जा सकता है, काटा जा सकता है। इसके साथ ही वर्तमान के कर्मों को इस प्रकार से सम्पन्न किया जा सकता है कि आने वाला जीवन या जन्म हमारी इच्छानुसार ही प्राप्त हो। यही विधान है उचित लोक, उचित योनि एवं उचित भोग को प्राप्त करने का। जब तक पूर्व जन्मकृत कर्मों का सम्पादन नहीं होगा, पूर्व जन्मकृत ऋणों का भुगतान नहीं होगा तब तक स्वतंत्र और इच्छानुसार योनि प्राप्ति असम्भव है।
कष्ट, समस्यायें तो सिर्फ परिणाम हैं, भुगतान हैं हमारे पूर्व जन्मकृत कर्मों का। जैसे ही हम सूक्ष्मतम दृष्टिकोण अपनायेंगे हमें हमारी जिम्मेदारियां, हमारे वायदे, हमारे अधूरे कार्य एक-एक कर दिखाई पड़ते जायेंगे। जिन्हे हमने कभी किसी जीवन में अपूर्ण स्थिति में छोड़ दिया था। यही कर्म हमें पूरा करने के लिए बार-बार बाध्य करते हैं।ईश्वर एक पर्दा डालकर रखता है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
जब भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जब-जब इस पृथ्वी पर अधर्म बढ़ेगा मुझे देह धारण करनी ही पड़ेगी। जैसे ही मुझे देह धारण करनी पड़ेगी हे पार्थ। तुझे भी देह धारण करनी ही पड़ेगी। जब- जब मैं इस पृथ्वी पर आऊंगा तुझे भी पृथ्वी पर आना ही पड़ेगा। यह तो निश्चित ही है। अतः तू मुझे पहचान। आगे प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं मैं इस पृथ्वी पर अनेकों बार आया हूँ। तू भी अनेकों बार आया है। तू अपने जन्मों को भूल गया है परन्तु मैं कुछ भी नहीं भूला हूँ। वृक्ष से निकला हुआ नया बीज पुनः पृथ्वी पर नये वृक्ष की रचना कर देता है। वृक्ष में लगे नये पत्ते सोचें कि अगर वे पहली बार उगे हैं तो यह मूर्खता है। अनंतकाल से हर वृक्ष में पत्ते होते हैं। हमारी आकाश गंगा रूपी महावृक्ष से पुनः बीज रूपी जीवन ब्रह्माण्ड में कहीं एक और समान आकाश गंगा उदित कर देगा। बीज सभी के होते हैं। उस आकाश गंगा में भी ठीक इस आकाश गंगा के समान ही सूर्य, चंद्र, ब्रहस्पति, शुक्र इत्यादि जैसे ग्रह नक्षत्रिकाएं अनेकों उपग्रह एवं असंख्य तारागण समूह होंगे। आकाश गंगाओं के भी बीज होते हैं। यही है महाज्ञान यही है ब्रह्मज्ञान । श्रंखलाबद्ध जीवन।
रामानुजाचार्य के गुरु ब्रह्मज्ञानी थे। मृत्यु के समय जैसे ही उनका प्रिय शिष्य रामानुजाचार्य उनके नजदीक पहुँचा वह देखता है कि गुरु की तीन उँगलियां उठी हुई हैं वह तुरंत ही समझ गये कि गुरु के तीन कार्य अधूरे रह गये हैं। उन्होंने तुरंत ही शपथ ली कि मैं अपने जीवन में ब्रह्मसूत्र, महाज्ञान प्रबंधन एवं वेदान्त दर्शन पर तीन टीकाएं अवश्य लिखूंगा। गुरु अपने अधूरे कार्यों की श्रंखला शिष्य को प्रदान करके चले गये। वैदिक दर्शन पूरी तरह से पुनर्जन्म आधारित है। इस दर्शन की एक एक श्रृंखला में पूर्वजन्म के कर्मों को सम्पादित करने की पूरी व्यवस्था है। वेदान्त दर्शन से भागने में क्या होगा ? जिस दिन मनुष्य भागने में सक्षम हो जायेगा पलायन का सिद्धान्त सफल हो जायेगा और उस दिन ईश्वर का मूल्य ही क्या रह जायेगा। ईश्वर की तो छोड़िये अगर स्थूल कर्मों का सिद्धान्त ही खण्डित हो जाये तो फिर सभी भगवान हो जायेंगे। जब सभी भगवान हो जायेंगे तो फिर भगवान को कौन पूजेगा। सभी भगवान नहीं हो सकते। सभी मनुष्य नहीं हो सकते, सभी देवता भी नहीं हो सकते एवं सभी असुर, पशु या वृक्ष भी नहीं हो सकते। यही तो विशेषता है ईश्वर की।
एक पेड़ से कई बीज गिरते हैं और कई वृक्ष उगते हैं। सभी के कर्म समान होते हैं और आम के सभी वृक्षों में से आम ही उँगेंगे। यह है देह धारण करने का सिद्धान्त । आपका गोत्र भारद्वाज है तो फिर आपके आदि ऋषि भारद्वाज की चेतनानुसार ही आप देह धारण करेंगे। आप अगर क्षत्रिय कुल में पैदा हुए हैं तो फिर क्षत्रियोचित्त कर्म आपकी जीवन शैली में निश्चित ही दिखाई पड़ेगें। इन कर्मों , को आपको सम्पादित करना ही पड़ेगा। इनसे आप भाग नहीं पायेंगे। कुछ दिन भागने के पश्चात् गड़बड़ होना शुरू हो जायेगी। आपको अपने कर्मों पर पुनः लौटना पड़ेगा। एक जगह राम लीला चल रही थी। रावण जोर से अट्टाहास कर रहा था, सीता हाय राम हाय राम कह विलाप कर रही थी। राम लक्ष्मण और हनुमान रावण से युद्ध कर रहे थे। जनता जनार्दन भावावेश में चिल्ला रही थी। तत्पश्चात् पर्दा गिरता है कुछ लोग पीछे जाकर देखते हैं कि ड्रेसिंग रूम में सीता रावण के पास खड़ी मुस्कुरा रही है। राम और लक्ष्मण हँस-हँस कर रावण से बात कर रहे हैं और हनुमान जी सबको चाय पिला रहें हैं।
आपके मस्तिष्क में इतनी ताकत होनी चाहिए कि आप राम लीला के पात्रों के इस दृश्य को पचा सकें। अगर इनको भी नहीं पचा पाओगे तो फिर ईश्वर की परम लीला के पीछे के दृश्यों को क्या पचाओगे। जीवन के रंगमंच पर नाटक तो करने ही पड़ते हैं। अभिनय तो जीवन का हिस्सा है। वर्तमान जीवन पूर्वजन्म के कर्मों को अभिनीत करने का अच्छा रंग मंच है। कर्म कष्ट, प्रायश्चितों और पापों को वर्तमान जीवन में ही धोया जा सकता है, काटा जा सकता है। इसके साथ ही वर्तमान के कर्मों को इस प्रकार से सम्पन्न किया जा सकता है कि आने वाला जीवन या जन्म हमारी इच्छानुसार ही प्राप्त हो। यही विधान है उचित लोक, उचित योनि एवं उचित भोग को प्राप्त करने का। जब तक पूर्व जन्मकृत कर्मों का सम्पादन नहीं होगा, पूर्व जन्मकृत ऋणों का भुगतान नहीं होगा तब तक स्वतंत्र और इच्छानुसार योनि प्राप्ति असम्भव है।
कष्ट, समस्यायें तो सिर्फ परिणाम हैं, भुगतान हैं हमारे पूर्व जन्मकृत कर्मों का। जैसे ही हम सूक्ष्मतम दृष्टिकोण अपनायेंगे हमें हमारी जिम्मेदारियां, हमारे वायदे, हमारे अधूरे कार्य एक-एक कर दिखाई पड़ते जायेंगे। जिन्हे हमने कभी किसी जीवन में अपूर्ण स्थिति में छोड़ दिया था। यही कर्म हमें पूरा करने के लिए बार-बार बाध्य करते हैं।ईश्वर एक पर्दा डालकर रखता है।
(क्रमशः)
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पुनर्जन्म रहस्यम् (४)
एक कथा सुनाता हूँ। एक बार एक साधु हुए उनके पास अनेकों भक्त गण मिलने आते और सभी अपनी श्रद्धानुसार कुछ न कुछ उनको अर्पित करके जाते। सेठ जी भी उनके अनुयायी थे । वे भी भक्तिभाव से उन्हें कुछ न कुछ अर्पित करते रहते थे। धीरे-धीरे साधु महराज के पास एक लाख रुपया इकट्ठा हो गया। साधु महाराज कहाँ रखते पैसे को उन्होंने अपने विश्वसनीय शिष्य रूपी सेठ को एक लाख रुपये रखने को दे दिए। कालान्तर साधु ने मंदिर बनवाने के लिए सेठ से जब पैसे माँगे तो सेठ की नियत बदल गई। उसने मना कर दिया तुरंत ही साधु की हृदयघात से मृत्यु हो गई। कुछ समय पश्चात् सेठ जी के घर एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र बाल्यावस्था से ही अत्यधिक खर्चीला था। प्रतिदिन सेठ के पैसे उनकी मर्जी के खिलाफ खर्च करता रहता था। जब वह 15 वर्ष का हुआ तो उसने अपने जन्म दिवस पर एक अभूतपूर्व समारोह किया और भरपूर पैसा खर्च किया। समारोह के पश्चात् रात्रि को वह पान खाने गया । जैसे ही उसने पान खाकर पैसा दिया उसकी मृत्यु हो गई इकलौता पुत्र और वह भी युवा, सेठजी पर तो मानो वज्रघात हो गया। कुछ दिन बाद मुनीम ने सेठ जी के सामने हिसाब रखा तो उसमें ठीक एक लाख रुपये उनके पुत्र द्वारा फिजूल खर्च में उड़ाये गये थे। पान की कीमत के पूरा होते ही एक लाख रुपये की फिजूल खर्ची हो गई थी। अचानक सेठ जी को अपने पापकर्म याद आ गये और उनकी मृत्यु भी हृदयघात से हो गई। इसे कहते हैं लेखा जोखा वह भी पूर्व जन्मों का।
अगर आप किसी को एक बार अपशब्द भी कहते हैं तो उसका भी लेखा जोखा होता है। वह आपके पक्ष में जाता है या विपक्ष मे यह बात तो लेखा जोख पूर्ण होने पर ही मालुम पड़ेगी पुरन्तु प्रत्येक सूक्ष्म से सूक्ष्म कर्म की भी गणना निश्चित होती है और गणना का परिणाम ही आपके जन्म का कारण या फल बनता है। फल भी कौन देगा यह भी ईश्वर निश्चित करता है। नौकरी तो सभी करते हैं परन्तु तनख्वाह देने वाला मालिक कैसा है वह भी ईश्वर निश्चित कर देता है। स्थूल वेतन के साथ तनाव या सम्मान या संतुष्टि भी प्राप्त होती है। फल एकांगी नहीं होता है। शरीर एकांगी नहीं है। स्थूल देह में लिंग शरीर भी है, अधि भौतिक शरीर भी है, आत्मा भी है। इन सबका भी वेतन अलग-अलग है। प्रत्येक कोष का फल अलग होता है। यह सब भी लेखा जोखा की वृहद व्याख्या के अन्तर्गत आता है। तनख्वाह में प्राप्त होने वाले या व्यापार में प्राप्त होने वाले उस हजार रुपये के साथ-साथ कहीं तनाव मानस को तो नहीं मिल रहा है। अपमान या अपराध बोध से हृदय शक्ति तो कुण्ठित नहीं हो रही है। जिसे हम फल समझ रहें हैं वह कहीं आटे के बीच रखी हुई चूहे मार दवाई के समान विष तो नहीं है यही हमें समझना होगा।
कर्मों का सिद्धान्त बड़ा सीधा है। आप किसी को पकड़कर उससे पैसे छिना लीजिए। पैसे आपके पास आ गये। यह तो हुआ कर्म का प्रथम परिणाम अब इस कर्म की द्वितीय आवृत्ति में आपको भय भी मिलेगा, तृतीय आवृत्ति में आपको दण्ड भी भोगना पड़ेगा, चतुर्थ आवृत्ति में पाप का उदय होगा, पंचम आवृत्ति में आपकी छवि कलुषित होगी, छठवीं आवृत्ति में आपकी आत्मशक्ति कमजोर होगी। इस प्रकार से अनंत स्थितियां बनेगी प्रत्येक धरातल पर एवं आपको भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त होंगे। अंत में आत्मा की स्थिति आयेगी और इस पर अंकित परिणाम मृत्यु के पश्चात् आपको योनि प्रदान करने या लोक प्रदान करने में मदद 'करेगा। तीन तरह की योनियां हैं प्रथम योनि में भोगी जीव आते हैं। जैसा मर्जी चाहे वैसा करते रहो अज्ञानियों के समान, जो योनि मिल जाये ठीक है, पशु बने, वृक्ष बने,नरक में जायें, अधबने हमें क्या करना है ? हमें तो चर्वाक की नीति पर चलना है। दूसरी स्थिति ज्ञानमार्ग की है। यह अतिश्रेष्ठ स्थिति है। इसमें जीव एक-एक करके ज्ञान की आवृत्तियों को समझता हुआ अंत में ब्रह्म सूत्रों को भी समझ जाता है और फिर एकनिष्ठ हो उसके प्राण ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं। वह कामनाओं से मुक्त हो जाता है।वह कर्मों को समात कर लेता है। यह निर्बीज स्थिति है। सत्य का मार्ग है।इसमें उसे किसी सहारे की जरूरत ही है न वह बुरा करता है न वह बुरा सहता है।वह जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।कम से कम एक कल्पांत तक के लिए तो अवश्य ही।
तीसरी स्थिति सद्कर्मों की स्थिति है इसमें व्यक्ति या प्राणी ब्रह्मज्ञानी के समान पुनर्जन्म की सम्पूर्ण संरचना को समझ लेता है परन्तु वह अन्य लोकों में जाकर दिव्य भोगों के लिए सद्कर्म या श्रेष्ठ कर्मों की श्रृंखला को निरंतर सम्पादित करता रहता है।इसे कहते हैं सकाम पूजन।इस मार्ग पर चलने वाले संकल्पित कार्य करते हैं।उनमें संकल्प शक्ति अत्यधिक विकसित होती है।वे अपनी संकल्प शक्ति के सहारे मृत्यु पर्यन्त दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक में जाकर दिव्यतम' भोगों को सम्पन्न करते हैं, अमृत पान करते हैं और पुनः पुण्य
(क्रमशः)
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एक कथा सुनाता हूँ। एक बार एक साधु हुए उनके पास अनेकों भक्त गण मिलने आते और सभी अपनी श्रद्धानुसार कुछ न कुछ उनको अर्पित करके जाते। सेठ जी भी उनके अनुयायी थे । वे भी भक्तिभाव से उन्हें कुछ न कुछ अर्पित करते रहते थे। धीरे-धीरे साधु महराज के पास एक लाख रुपया इकट्ठा हो गया। साधु महाराज कहाँ रखते पैसे को उन्होंने अपने विश्वसनीय शिष्य रूपी सेठ को एक लाख रुपये रखने को दे दिए। कालान्तर साधु ने मंदिर बनवाने के लिए सेठ से जब पैसे माँगे तो सेठ की नियत बदल गई। उसने मना कर दिया तुरंत ही साधु की हृदयघात से मृत्यु हो गई। कुछ समय पश्चात् सेठ जी के घर एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र बाल्यावस्था से ही अत्यधिक खर्चीला था। प्रतिदिन सेठ के पैसे उनकी मर्जी के खिलाफ खर्च करता रहता था। जब वह 15 वर्ष का हुआ तो उसने अपने जन्म दिवस पर एक अभूतपूर्व समारोह किया और भरपूर पैसा खर्च किया। समारोह के पश्चात् रात्रि को वह पान खाने गया । जैसे ही उसने पान खाकर पैसा दिया उसकी मृत्यु हो गई इकलौता पुत्र और वह भी युवा, सेठजी पर तो मानो वज्रघात हो गया। कुछ दिन बाद मुनीम ने सेठ जी के सामने हिसाब रखा तो उसमें ठीक एक लाख रुपये उनके पुत्र द्वारा फिजूल खर्च में उड़ाये गये थे। पान की कीमत के पूरा होते ही एक लाख रुपये की फिजूल खर्ची हो गई थी। अचानक सेठ जी को अपने पापकर्म याद आ गये और उनकी मृत्यु भी हृदयघात से हो गई। इसे कहते हैं लेखा जोखा वह भी पूर्व जन्मों का।
अगर आप किसी को एक बार अपशब्द भी कहते हैं तो उसका भी लेखा जोखा होता है। वह आपके पक्ष में जाता है या विपक्ष मे यह बात तो लेखा जोख पूर्ण होने पर ही मालुम पड़ेगी पुरन्तु प्रत्येक सूक्ष्म से सूक्ष्म कर्म की भी गणना निश्चित होती है और गणना का परिणाम ही आपके जन्म का कारण या फल बनता है। फल भी कौन देगा यह भी ईश्वर निश्चित करता है। नौकरी तो सभी करते हैं परन्तु तनख्वाह देने वाला मालिक कैसा है वह भी ईश्वर निश्चित कर देता है। स्थूल वेतन के साथ तनाव या सम्मान या संतुष्टि भी प्राप्त होती है। फल एकांगी नहीं होता है। शरीर एकांगी नहीं है। स्थूल देह में लिंग शरीर भी है, अधि भौतिक शरीर भी है, आत्मा भी है। इन सबका भी वेतन अलग-अलग है। प्रत्येक कोष का फल अलग होता है। यह सब भी लेखा जोखा की वृहद व्याख्या के अन्तर्गत आता है। तनख्वाह में प्राप्त होने वाले या व्यापार में प्राप्त होने वाले उस हजार रुपये के साथ-साथ कहीं तनाव मानस को तो नहीं मिल रहा है। अपमान या अपराध बोध से हृदय शक्ति तो कुण्ठित नहीं हो रही है। जिसे हम फल समझ रहें हैं वह कहीं आटे के बीच रखी हुई चूहे मार दवाई के समान विष तो नहीं है यही हमें समझना होगा।
कर्मों का सिद्धान्त बड़ा सीधा है। आप किसी को पकड़कर उससे पैसे छिना लीजिए। पैसे आपके पास आ गये। यह तो हुआ कर्म का प्रथम परिणाम अब इस कर्म की द्वितीय आवृत्ति में आपको भय भी मिलेगा, तृतीय आवृत्ति में आपको दण्ड भी भोगना पड़ेगा, चतुर्थ आवृत्ति में पाप का उदय होगा, पंचम आवृत्ति में आपकी छवि कलुषित होगी, छठवीं आवृत्ति में आपकी आत्मशक्ति कमजोर होगी। इस प्रकार से अनंत स्थितियां बनेगी प्रत्येक धरातल पर एवं आपको भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त होंगे। अंत में आत्मा की स्थिति आयेगी और इस पर अंकित परिणाम मृत्यु के पश्चात् आपको योनि प्रदान करने या लोक प्रदान करने में मदद 'करेगा। तीन तरह की योनियां हैं प्रथम योनि में भोगी जीव आते हैं। जैसा मर्जी चाहे वैसा करते रहो अज्ञानियों के समान, जो योनि मिल जाये ठीक है, पशु बने, वृक्ष बने,नरक में जायें, अधबने हमें क्या करना है ? हमें तो चर्वाक की नीति पर चलना है। दूसरी स्थिति ज्ञानमार्ग की है। यह अतिश्रेष्ठ स्थिति है। इसमें जीव एक-एक करके ज्ञान की आवृत्तियों को समझता हुआ अंत में ब्रह्म सूत्रों को भी समझ जाता है और फिर एकनिष्ठ हो उसके प्राण ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं। वह कामनाओं से मुक्त हो जाता है।वह कर्मों को समात कर लेता है। यह निर्बीज स्थिति है। सत्य का मार्ग है।इसमें उसे किसी सहारे की जरूरत ही है न वह बुरा करता है न वह बुरा सहता है।वह जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।कम से कम एक कल्पांत तक के लिए तो अवश्य ही।
तीसरी स्थिति सद्कर्मों की स्थिति है इसमें व्यक्ति या प्राणी ब्रह्मज्ञानी के समान पुनर्जन्म की सम्पूर्ण संरचना को समझ लेता है परन्तु वह अन्य लोकों में जाकर दिव्य भोगों के लिए सद्कर्म या श्रेष्ठ कर्मों की श्रृंखला को निरंतर सम्पादित करता रहता है।इसे कहते हैं सकाम पूजन।इस मार्ग पर चलने वाले संकल्पित कार्य करते हैं।उनमें संकल्प शक्ति अत्यधिक विकसित होती है।वे अपनी संकल्प शक्ति के सहारे मृत्यु पर्यन्त दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक में जाकर दिव्यतम' भोगों को सम्पन्न करते हैं, अमृत पान करते हैं और पुनः पुण्य
(क्रमशः)
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