सनातन धर्म • Sanatan Dharma
10.5K subscribers
394 photos
31 videos
19 files
501 links
🙏 Explore ❛ सनातन धर्म • Sanatana Dharma ❜

🕉️ @HinduStuff • @Geeta_HinduStuff
Download Telegram
(४०) प्रेमवश्यः- अर्थात् भगवान् केवल प्रेम से प्रेमी के वश में हो जाते थे।

(४१) सर्वशुभंकरः - अर्थात् भगवान् सर्व हितकारी थे।

(४२) प्रतापी - अर्थात् भगवान्‌ की शूरता, पराक्रम तथा दुर्जेयता को सुनकर शत्रु कम्पायमान होते थे।

(४३) कीर्तिमान् - अर्थात् भगवान्‌ के उत्तम सद्‌गुणों से उनका निर्मल यश दसों दिशाओं में फैल गया था।

(४४) रक्तलोकः- अर्थात् भगवान्‌के प्रति सबका स्वाभाविक अनुराग था।

(४५) साधुसमाश्रयः - अर्थात् भगवान् सदा सत्पुरुषों का पक्षपात करते थे और उनकी सहायता करते थे।

(४६) नारीगणमनोहारी - अर्थात् सुन्दरियाँ उनके अलौकिक रूप लावण्य को देखकर उन पर मुग्ध हो जाया करती थीं।

(४७) सर्वांराध्यः - अर्थात् भगवान्‌ का सब लोग मान एवं पूजा करते थे।

(४८) समृद्धिमान् - अर्थात् भगवान् सब प्रकार की समृद्धियों से सम्पन्न थे।

(४९) वरीयान् - अर्थात् भगवान् सुर-मुनि सबसे श्रेष्ठ थे और इनके द्वार पर ब्रह्मादि देवताओं तथा महर्षियों की भीड़ लगी रहती थी।

(५०) ईश्वरः - अर्थात् भगवान्‌ को इच्छामें कोई बाधा नहीं डाल सकता था और न उनकी आज्ञा को ही टाल सकता था।

(५१) सदास्वरूपसम्प्राप्तः - अर्थात् भगवान् मायाके वश में नहीं थे। सदा अपने स्वरूप में स्थित थे।

(५२) सर्वज्ञः - अर्थात् भगवान् घट-घट की बात जानते थे और उनका ज्ञान देश, काल से अबाधित था, कोई वस्तु ऐसी नहीं थी, जिसका उन्हें ज्ञान न हो।

(५३) नित्यनूतनः - अर्थात् यद्यपि उनके प्रेमीजन उनके माधुर्य-रस का सदा आस्वादन करते थे फिर भी उन्हें उसमें नित्य नया स्वाद मिलता था।

(५४) सच्चिदानन्दसान्द्रांगः - अर्थात् उनका विग्रह सच्चिदानन्दमय ही था, साधारण मनुष्यों की भाँति पञ्च भूतों का बना हुआ नहीं था।

(५५) सर्वसिद्धिनिषेवितः - अर्थात् सारी सिद्धियाँ उनके वश में थीं।

(५६) अविचिन्त्यमहाशक्तिः - अर्थात् भगवान् अचिन्त्य महाशक्तियों से युक्त थे। वे अपने संकल्प मात्र से ही स्वर्गादि दिव्य लोकों की रचना कर सकते थे, ब्रह्मा एवं शिव आदि देवताओं को भी मोहित कर सकते थे और भक्तों के प्रारब्ध का भी नाश कर सकते थे।

(५७) कोटिब्रह्याण्डविग्रहः- अर्थात् उनका विग्रह असंख्य ब्रह्माण्ड-व्यापी था।

(५८) अवतारावलीबीजम् - अर्थात् सारे अवतारों को धारण करने वाले अवतारी वे ही थे।

(५९) हतारिगतिदायकः - अर्थात् जो शत्रु उनके हाथ से मारे जाते थे, वे मोक्ष को प्राप्त होते थे।

(६०) आत्मारामगणाकर्षी - अर्थात् उनकी ओर आत्माराम-पुरुषोंका भी मन हठात् आकृष्ट हो जाता था।

(६१) सर्वाद्भुतचमत्कारलीलाकल्लोलवारिधिः - अर्थात् उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक अद्भुत एवं चमत्कारपूर्ण लीलाएँ कीं।

(६२) अतुल्यमधुरप्रेममण्डितप्रियमण्डलः - अर्थात् भगवान्‌के प्रेमीजन उनके असाधारण माधुर्ययुक्त प्रेम से सर्वदा परिपूर्ण रहते थे।

(६३) त्रिजगन्मानसाकर्षी मुरलीकलकूजितैः - अर्थात् उनको मुरली के मधुर स्वर से तीनों लोकों के निवासियोंका मन आकर्षित हो जाता था।

(६४) असमानोर्ध्वरूपश्रीविस्मापितचराचरः - अर्थात् भगवान्‌ के असाधारण रूप लावण्य को देखकर चराचर जगत् विस्मयाविष्ट हो जाता था।


🙏🏼🌸 कृष्णम् वन्दे जगद्गुरू 🌸🙏🏼
👏9🙏7👍4🥰3
आइये इस जन्माष्टमी पर आठ संकल्प लीजियेः



1. आप स्वयं श्री मद् भगवद्गीता का न सिर्फ प्रतिदिन पाठ करेंगें अपितु उसे जीवन में आत्मसात भी करेंगें।


2. अपने परिवार में विशेषतयः युवक और युवतियों को भगवद्गीता पढ़ने को प्रोत्साहित करेंगे।


3. उपहार में बनावटी/सजावटी फूलों के स्थान पर श्री मद् भगवद्गीता का आदान प्रदान शुरू करेंगे।


4. वर्तमान परिस्थिति में युद्ध और प्रेम दोनों ही आवश्यक है अतएव आप कृष्ण के संपूर्ण चरित्र को बिना किसी पूर्वाग्रह के पूर्णतयः स्वीकार करेंगे।


5. अपने बच्चों को कृष्ण सा सामर्थ्यवान बनायेंगे जिससे वो द्रौपदी रूपी अपनी बहन-बेटी की लाज की रक्षा करने में सक्षम होने के साथ ही आधुनिक दुर्योधन की जंघा तोड़ने और दुशासन की छाती का खून निकाल लेने में सक्षम हो।


6. कृष्ण सी स्पष्टता और शत्रुबोध लायेंगे जो किसी भी तरह के सेक्यूलिज्म से दूर रहे और सामने चाहे पितामह भीष्म सा आत्मीय हो या गुरू द्रोणाचार्य सा सम्मानित उसका भी वध करने/कराने में संकोच न करें।


7. कर्मफलसिद्धांत, राष्ट्रवाद, स्व व्यक्तित्व निर्माण, कूटनीति, राजनीति, धर्मनीति, युद्धनीति सबमें ही कृष्णवत् भाव के साथ स्पष्ट और दीर्घकालीन आस्था रखेंगे और अपनी आगामी पीढ़ी को भी जाग्रत करेंगे।


8. जिस प्रकार कृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर से अश्वमेध करा संपूर्ण भारतवर्ष की एकता और अखंडता को सुनिश्चित किया था, एक भेदभाव मुक्त समाज निर्मित किया था ठीक उसी प्रकार एक संपूर्णता युक्त समाज वाले अखंड भारत के निर्माण में आप अपना कृष्णवत् सहयोग देंगें।


यदि आप इन आठ प्रतिज्ञाओं को लेकर संकल्पबद्ध हो जायेंगे तो विश्वास मानिये हर घर से एक कृष्ण निकलेगा और इस धरा को मुरली के संगीत के साथ ही सुदर्शन के सामर्थ्य से भगवामय कर देगा।

अशेष प्रेम और विश्वास के साथ आप सभी को जन्माष्टमी की कोटिशः शुभकामनायें।


"तुम उसे सांवरा, प्रेमी, नटखट, ग्वाला, माखनचोर, मुरारी ही समझते रहे,

और उसे देखो वो गीतामृत महोदधी महाभारत जीता कर आ गया...


~विठ्ठल


@Sanatan
👍12❤11
भावधारा से लंका सींचने वाली मैथिली सीता
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸


मिथिला की ही नहीं विश्व की नारियों में सीता जी का स्थान सर्वोच्च है। यद्यपि सीता जी परब्रह्मस्वरूपिणी जगज्जननी भगवती ही हैं, तथापि नारी रूप में आने के कारण उन्होंने भी परब्रह्म राम के तरह मानव लीलायें की। वे मिथिला की थीं इसीलिए उन्हें मैथिली कहा जाता है। मिथिला के आध्यात्मिक दर्शन का पूरा प्रभाव इनके जीवन में दिखता है। भारतीय मान्यता में क्षमा बहुत बड़े परमावश्यक मानव गुणों में लिया जाता है। भगवान् राम की अपेक्षा भी सीता में यह क्षमा गुण अत्यधिक है। इसकी सिद्धि लिए हम वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड के ११४वें अध्याय के प्रसंग पर जायेंगे।'

लडकाविजय के बाद रामाज्ञा से सीता को आश्वस्त करने गये हनुमान् ने पहले रावण की अनुकूल न बनने के कारण सीता को विविध मानसिक कष्ट देने वाली सीतारक्षिका राक्षसियों को दण्ड देने की बात कहने पर निम्नलिखित तीन श्लोकरत्नों के द्वारा सीता ने अपने मैथिल अध्यात्मवादी क्षमाप्रधान विचारधारा को स्पष्ट किया है। श्लोक इस प्रकार है-

पापानां वा शुभानां वा वयार्हाणां प्लवङ्गम।
कार्य करुणमार्येण न कश्विन्नापराध्यति ।।
न नरः पापमादत्ते परेषां पापकर्मणाम्।
समयो रक्षितव्यस्तु सन्तश्चारित्रभूषणाः ।।
लोकहिंसाविहाराणां क्रूराणां पापकर्मणाम्।
कुर्वतामपि पापानि नैव कार्यमशोभनम् ।।

( वाल्मीकीय रामायण, काण्ड ६, अध्याय ११४, श्लोक- ४३-४५)

इन श्लोकों का सारांश यह है कि "आत्मतत्त्व को जानने वाले आर्यजन को कभी भी अज्ञानी दूसरे की आज्ञा पर चलने वालों पर क्रोध नहीं करना चाहिये। ठीक से ढूँढा जाये तो कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो किसी न किसी के प्रति कुछ न कुछ अपराध न किया हो, अतः छोड़ दो इन बेचारियों को। सामर्थ्य के आने पर भी अपराधियों को बचाना ही क्षमा है। सज्जनों को हमेशा क्षमाशील रहना चाहिए। जो कुछ हमने इन लोगों के द्वारा कष्ट भोगे वे तो हमारे ही प्रारब्ध के फल के अलावा और कुछ नहीं थे। हम आर्यों को किसी भी स्थिति में अपनी क्षमाशीलता को गवाँकर क्रूर राक्षसपन के वश में नहीं होना है। ऐसा हो तो हमारी जातीय विशेषता ही क्या रही ? फिर तो हम भी वही दुनिया को कष्ट देकर आनन्द लूटने वाले राक्षस ही तो हुए। यद्यपि पिछली मेरी कष्टमयी स्थिति को इन लोगों ने अनावश्यक ढंग से और गहराया था, मेरे को कहीं भागने या किसी से विशेष बात करने से रोकना मात्र उनका राजकीय कर्त्तव्य था, इससे काफी आगे बढ़कर रावण की सेज बनने के लिए हम जैसी सती महिला को विवध प्रकार से फुसलाना तथा न मानने पर भयावह धमकी देना अवश्य ही इन लोगों का घोर अपराध था। इस प्रकरण को आपने पिछले दिनों अपने आँखों से ही देखा, अतः आज इन लोगों को दण्डित करना चाहते हैं। हे हनुमन् ! यह नीतिशास्त्र के अनुरूप भी है। आप श्रीराम के परम आराधक हैं, आप में अतुल रामभक्ति है। उन अत्यन्त विषम परिस्थिति के दिनों में आपने मेरे साथ रावण के बर्ताव को देखा और हमको परखा, साथ ही हमारे आँखों एवं चेहरे से छलकने वाली राम के प्रति अनन्य प्रीति एवं परतन्त्रता को भी गौर किया। आप तो उसी समय भी इन लोगों को दण्डित करना चाहे, पर कुछ सोचकर सहम गये, अब रावण इस लोक में नहीं है, अतः उचित दण्ड देने का अवसर आप को दिखायी दे रहा है। तीव्र प्रतिकार की भावना उबल रही है। ठीक है एक रामभक्त दूसरे रामभक्त के कष्ट को समझे, पर हम हिमालय की तलहटी की मैथिली हैं, हमारे हिमालय जितनी भी क्रूर हिमपात या वर्षा अनवरत होती रहे वे कभी डिगने वाले नहीं। उनमें कोई अन्तर आने वाला नहीं। इस व्यवहार से वे हमें सहनशीलता व क्षमा का पाठ पढ़ाते रहते हैं। हमें उबलना नहीं, सहम जाना चाहिए। क्षमा ही सबसे बड़ी साधुता है। यही असली आत्मवादियों की पहचान है हमें अपना पहचान कभी गवाँना नहीं है। हनुमन् ! मैं आपकी रामभक्ति एवं मेरे प्रति श्रद्धा खूब समझ रहीं हूँ, पर मेरे कहने से आप इनको क्षमा कर दीजिए।

इस प्रकार मैथिली सीता ने अपने अध्यात्मवादी दर्शन का परिचय देकर अपनी क्षमा- प्रधान विचारधारा से क्रूर राक्षसों की नगरी लंका में निरपराध पर जघन्य अपराध करने वाली राक्षसियों को विना शर्त पूरी क्षमा प्रदान कर अपने मैथिलदार्शनिक चरित्र को स्पष्ट किया है।
👍20❤4👏2
🙏18❤12🥰1👏1
।। श्रीहनुमते नमः ।।

वैसे तो हनुमानजी सभी अपने तथा श्रीराम भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, लेकिन उनका एक शक्तिशाली मंत्र है जो आपको बड़ी से बड़ी बुरी शक्तियों से रक्षा करता है।

मंत्र-
ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं ह्रीं हं ह्रौं ह्रः ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्म राक्षस शाकिनी डाकिनी यक्षिणी पूतना मारीमहामारी राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकान् क्षणेन हन हन,भंजय भंजय मारय मारय, क्षय शिक्षय महामहेश्वर रुद्रावतार।।

मंत्र जप-
अगर १२ बार इस मंत्र को जप लें तो, भयानक से भयानक डर भी खत्म हो जायेगा। इसमें सभी बुरी शक्तियों से बचाव का मार्ग हनुमानजी की विनती से बताया गया है।

।। 🙏🙏🌷🌹🌷🙏🙏 ।।
🙏21❤4👍4👏4
तो आइए, अब जानते है कि,

कितने देवी देवता है ? 33 कोटि या 33 करोड़ ?

चलिए, गणना करें।


• त्रिदेव : ब्रह्मा, विष्णु, महेश

• त्रिदेवी : सरस्वती, लक्ष्मी, काली

इनमे से भी भगवान विष्णु के असीमित रूपों में से कुछ रूप हैं,

• 3 विष्णु पुरुष :
कारणोदक्षायी विष्णु
गर्भोदक्षायी विष्णु
क्षीरोदक्षायी विष्णु

• 24 विष्णुरूप :
वासुदेव, केशव, नारायण, माधव, पुरुषोत्तम, अधोक्षजा, संकर्षण, गोविंदा, विष्णु, मधुसूदन, अच्युत, उपेंद्र, प्रद्युम्न, त्रिविक्रम, नरसिंह, जनार्दन, वामन, श्रीधर, अनिरुद्ध, हृषिकेश, पद्मनाभ, दामोदर, हरि और कृष्ण।

हालांकि ये रूप आध्यात्मिक दुनिया तथा हमारे ब्रह्मांड से बाहर स्थित हैं, इसलिए हम इनकी गणना देवताओं में नहीं करेंगे।

इनके उपरांत,
त्रिदेवियों के असंख्य रूपों में से, कुछ हैं ...

• 12 सरस्वती :
महाविद्या, महावाणी,भारती, सरस्वती, ब्राह्मी, महाधेनु, वेदगर्भ, ईश्वरी, महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती।

• 8 लक्ष्मी :
आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संताना लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी और विद्या लक्ष्मी।

• 12 गौरी :
उमा, पार्वती, ललिता, श्रोत्तमा, कृष्णा, हेमवंती, रंभा, सावित्री, श्रीखंड, तोता और त्रिपुरा।

• साथ ही 200+ क्षेत्रीय देवीयां जिनकी आज भी पूरे भारत में ग्रामीण तथा अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा की जाती है।

अभी, आगे बढ़ते है,

आदित्य-विश्व-वसवस् तुषिताभास्वरानिलाः महाराजिक-साध्याश् च रुद्राश् च गणदेवताः ॥10॥ - नामलिङ्गानुशासनम्

33 प्रमुख देवता +
36 तुशिता +
10 विश्वदेव +
12 साध्यदेव +
64 आभास्वर +
49 मारुत +
220 महाराजिक = 424 देवता और देवगणः


• गण : सेना, सेवक, घनिष्ट सहयोगी या विशेष देवता की सेवा करने वाला देवताओं का व्यक्तिगत सेवक समुदाय।

जैसे कि भगवान शिव के गणों को शिवगण कहा जाता है। इन्द्र के गण को इन्द्रगण कहते हैं। इसी प्रकार अधिक रूप से प्रमुख देवताओं में ऐसे गण समुदाय हैं और वे असंख्य हैं।

तथा, जैसे सभी देवों के देव देवाधिदेव महादेव हैं, वैसे ही सभी गणों के नेता गणाधिपति, गणपति गणेश हैं। उनकी पूजा करना अर्थात सभी गणों की पूजा करना।

इनके उपरांत, वेदों में भी 10 आंगिरसदेव एवं 9 प्रकार के देवगण का भी उल्लेख है।

• 33 प्रमुख देवता :
12 आदित्य + 8 वसु + 11 रुद्र + 1 इंद्र + 1 प्रजापति (कुछ शास्त्रों में इंद्र और प्रजापति के स्थान पर 2 अश्विनी कुमार स्थित होते हैं।)

• 12 आदित्य :
1. अंशुमान, 2. आर्यमन, 3. इंद्र, 4. त्वष्टा, 5. धातु, 6. परजंन्य, 7. पूषा, 8. भगा, 9. मित्रा, 10. वरुण, 11. विवस्वान और 12. विष्णु।

• 8 वसु :
1. आप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धार, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभास।

• 11 रुद्र :
1. शंभू, 2. पिनाकी, 3. गिरीश, 4. स्थानु, 5. भरगा, 6. भाव, 7. सदाशिव, 8. शिव, 9. हर, 10. शर्वाः और 11. कपाली।

ये 11 रुद्र, यक्षों और दस्युजन के भी देवता हैं तथा कल्प बदलने पर रुद्र और उनके नाम भी बदल जाते हैं।

- उदहारणः
ये अन्य कल्प के अन्य शास्त्रों में उल्लिखित अन्य रुद्रों के नाम हैं। 1. मनु, 2. मन्यु, 3. शिव, 4. महत, 5. ऋतुध्वज, 6. महिनस, 7. उमतेरस, 8. काल, 9. वामदेव, 10. भव तथा 11. धृत-ध्वज।

• 2 अश्विनी कुमार :
1. नस्तास्या तथा 2. दस्ता।

जो की आयुर्वेद के आदि आचार्य हैं तथा सूर्य देव के पुत्र हैं।

• 36 तुषित :
36 तुषित देवताओं का वो समूह है जो विभिन्न मन्वंतर में जन्म लेते हैं। उनका एक भिन्न स्वर्ग है तथा उनके नाम पर एक भिन्न ब्रह्मांड भी है।

• 10 विश्वदेव :
1. वासु 2. सत्य 3. क्रतु 4. दक्ष, 5. कला 6. काम 7. धृति 8. कुरु 9. पुरुरवा 10. मद्राव, तथा बाद में 2 और जोड़े गए 11. रोचक या लोचन, 12. ध्वनि धुरी

इनमे से पाँच विश्वदेव एक बार ऋषि विश्वामित्र के श्राप के कारण द्रौपदी के पाँच पुत्र पाँच उपपांडव के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। रात में अश्वत्थामा द्वारा मारे जाने के बाद वे अपने मूल स्वरूप में पुनः आ गए थे।

• 12 साध्यदेव :
1. अनुमन्ता 2. प्राण 3. नर 4. वीर्य 5. यान 6. चिट्टी 7. हय 8. नय 9. हंसा 10. नारायणः 11. प्रभव और 12. विभुः

• 64 अभास्वर :
तमोलोक में ये 3 देवनिकाय हैं।
1. भावेश्वरः
2. महाभास्वर और
3. सत्यमहाभास्वर । अभास्वर देवता का काम भूतों, इन्द्रियों और बुद्धि को नियंत्रण में रखना हैं।

• 12 यमदेव :
यदु, ययाति, देव, ऋतु और प्रजापति आदि को यमदेव कहा जाता हैं।

• 49 मारुतगण :
मारुत देवताओं के सैनिक हैं। वेदों में इन्हें रुद्र और वृष्णि के पुत्र बताया गया है, जबकि पुराणों में इन्हें कश्यप और दिति के पुत्र बताया गया है। कल्पभेद।

(1/2) @Sanatan
👍15❤6🙏2
• 7 मारुत : और उनके 7-7 मरुदगण तथा उनके आंदोलन क्षेत्र :
1. आवाह, ब्रह्मलोक
2. प्रवाह, इंद्रलोक
3. संवाद, अंतरिक्ष
4. उदवा, पृथ्वी के पूर्व
5. विवाह, भुलोक के पश्चिम में
6. परिवाह, भुलोक के उत्तर में
7. परवाह, पृथ्वी के दक्षिण में

इस प्रकार कुल 49 प्रमुख मरुत हैं। कुल संख्या को कभी-कभी 180 कही जाती है। वे अंतरिक्ष में और फूलों में रहते हैं। वे अपने देवता के लिए देवों के रूप में विचरण करते हैं

• 220 महाराजिक :
एक प्रकार के देवता है जिनकी संख्या 226 या 236 और कहीं पर 4000 भी बताई जाती है। महाराजिकाओं के संदर्भ में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

• 9 ग्रह देवता :
1. सूर्यदेव
2. सोमदेव (चंद्र देव)
3. मंगल / कुज
4. बुध
5. गुरु / बृहस्पति
6. शुक्र
7. शनिदेव
8. राहु
9. केतु

• मुख्य श्रेणियों के अतिरिक्त अन्य देवता :

गणाधीपति गणेश, कार्तिकेय, धर्मराज, चित्रगुप्त, आर्यमा, हनुमान, भैरव, वन, अग्निदेव, कामदेव, चंद्र, यम, शनि, सोम, रिभुः, द्युः सूर्य, बृहस्पति, वाक, काल, अन्ना, वनस्पति, पर्वत, धेनु, सनकादि गरुड़, अनंत शेष, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पिंगला, जय, विजय एवं बहुत सारे...

• मुख्य श्रेणियों के अतिरिक्त अन्य देवियाँ :

भैरवी, यामी, पृथ्वी, पूषा, आप, सविता, उषा, औषधि, अरण्य, ऋतु, त्वष्टा, सावित्री, गायत्री, श्री, भूदेवी, श्रद्धा, शची, दिति, अदिति एवं बहुत सारी...

• स्थानीय देवता :

1. द्यु-स्थानीयः : आकाश और स्वर्ग :
सूर्य (प्रमुख), वरुण, मित्र, पूषन, विष्णु, उषा, अपानपत, सविता, त्रिपा, विवस्ववत, आदित्यगण, अश्विनीकुमार आदि।

2. मध्य-स्थानीय : अंतरिक्ष :
पर्जन्य, वायु (प्रमुख), इंद्र, मारुत, रुद्र, मातरिश्वन, त्रिप्रपत्य, अज एकपाद, आप, अहितबुधन्य आदि।

3 . पृथ्वी-स्थानीय : पृथ्वी पर :
पृथ्वी, उषा, अग्नि (प्रमुख), सोम, बृहस्पति, नदियाँ आदि।

4. पाताल-लोकीय :
शेष नाग और वासुकी आदि।

5. पितृ लोकीय :
समस्त मानवता के नौ दिव्य पित्रो को अग्रिसवत्ता, बरहीशद अजयप, सोमेप, रश्मिपा, उपदूत, अयंतुन, श्राद्धभुक और नंदीमुख के रूप में जाना जाता है। समस्त पित्रुओं के देवता आर्यमा हैं।

6. नक्षत्र के अधिपति :
- चैत्र मास में धात,
- वैशाख में आर्यमा,
- ज्येष्ठ में मित्र,
- आषाढ़ में वरुण,
- श्रावण में इंद्र,
- भाद्रपद में विवस्वान,
- अश्विन में पूष,
- कार्तिक में पर्जन्या,
- मार्गशीर्ष में अंशु,
- पौष में भाग,
- माघ में त्वष्टा और
- फाल्गुन में विष्णु है।

सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हुए इनको याद करना चाहिए।

7. दस दिशाओं के 10 दिग्पाल :
- ऊपर के ब्रह्मा,
- उत्तर के शिव और ईश,
- पूर्व के इंद्र,
- अज्ञेय की अग्नि या वाहरी,
- दक्षिण के यम,
- नैरुत्य की नारुति,
- पश्चिम के वरुण,
- वायव्य के वायु और मारुत,
- उत्तर के कुबेर और
- नीचे के अनंत शेष।

इनके अतिरिक्त,

1. ऋग्वेद के केवल दो सूक्तों (3.9.9 और 10.52.6) में ही 3339 देवताओं का उल्लेख किया गया है।

2. मत्स्य पुराण में कई सौ देवियों की सूची भी है।

3. केवल अप्सराओं की संख्या भी 60 करोड़ को पार करती है, जो की समुद्र मंथन से निकलकर गंधर्व-लोक को चली गई थी।

4. हमने अभी यक्ष, किन्नर, गंधर्व, किमपुरूस आदि असंख्य अर्ध-देवताओं की गणना नहि की है, जो की सभी स्वर्गीय ग्रहों के निवासी हैं और देवताओं की तुलना में कम शक्तिशाली हैं परंतु पृथ्वी वासियों की तुलना में अधिक।

तो क्या मिला आपको हमारे लोकप्रिय प्रश्न का उत्तर,

कितने देवी-देवता है? 33 कोटि? या 33 करोड़?

ना तो 33 कोटि, ना ही 33 करोड़।

उत्तर है कि, वे बदलते रहते हैं। जैसे पृथ्वी पर मनुष्यों की कोई स्थिर संख्या नहीं है, वैसे ही स्वर्ग में देवताओं की भी कोई स्थिर संख्या नहीं है।

मनुष्य की तरह ही वे भी जन्म लेते हैं, उनका जीवन काल भी समाप्त होता है और फिर एक और बार नए देवताओं के साथ ये चक्र फिरसे चलने लगता है।

• क्रेडिट :
सनातन संस्कृति का मूलज्ञान
by प्रतीक प्रजापति

(2/2) @Sanatan
👍15❤7
👍9
#Thread

✶ किसी भी दुःख एवम् रोग की कारक संबंधित राशि जानें !

काल पुरुष अंग स्थान
﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌

जब किसी व्यक्ति के दुःख, पीड़ा, रोग को जानना होता है तब जन्म कुण्डली में राशियों की शरीर पर स्थिति क्या है? यह जानना भी जरूरी होता है। नीचे दिये गये चित्र द्वारा आप आसानी से समझ सकते हैं।

⇒ मेष राशि का मस्तक (सिर) पर अधिकार है।

⇒ वृष राशि का मुख पर अधिकार है।

⇒ मिथुन राशि का वक्ष, छाती, बाजू, श्वास की नली पर अधिकार है।

⇒ कर्क राशि का हृदय पर अधिकार है।

⇒ सिंह राशि का गर्भ एवं पेट पर अधिकार है।

⇒ कन्या राशि का कमर पर अधिकार है।

⇒ तुला राशि का मूत्र अंग पर अधिकार है।

⇒ धनु राशि का जंघा पर अधिकार है।

⇒ वृश्चिक राशि का लिंग एवं गुदा पर अधिकार है।

⇒ मकर राशि का घुटनों पर अधिकार है।

⇒ कुंभ राशि का पिंडलियों पर अधिकार है।

⇒ मीन राशि का पैरों पर अधिकार है।
👍14❤3
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
👍2
#Thread🧵

💫 सनातन संस्कृति के आश्चर्यों में से एक रहस्य -

🔺अग्नि के सर्वप्रथम आविष्कारक !
🔺वैदिक संस्कृति में अग्नि यज्ञों के प्रचलन कर्ता!
🔺 समुद्रों से प्राप्त पेट्रोल, गैस, केरोसिन के वैदिक खोजी !


विश्व के प्रथम वैज्ञानिक- अथर्वा ऋषि
༻───────§───────༺

आधुनिक काल में सबसे उच्च विश्वस्त विज्ञान विधा मानी जाती है तथा उनके शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक शब्दों से विभूषित किया जाता है, आज के अंग्रेजी भाषी वैज्ञानिकों की लंबी रेखा के बीच भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के एक वैदिक ऋषि पुरुष को विश्व का प्रथम वैज्ञानिक होने का रहस्य उद्घाटन किया जा रहा है विश्व के प्रथमतम वैज्ञानिक होने के श्रेय अथर्वा ऋषि को है। महर्षि अथर्वा ने ऋषि अंगिरस के साथ मिलकर अथर्ववेद की रचना की। महर्षि अथर्व का विवाह भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि कर्दम की पुत्री शांति 'चित्ति' के साथ हुआ। इस मिलाप से महानतम महर्षि दधीचि का जन्म हुआ। ऋग्वेद में अथर्वा ऋषि का उल्लेख १५ बार हुआ है। (ऋग्० १.८०.१६, १.८३.५, ९.११.२ आदि)। अथर्वा ऋषि ने अग्नि-विषयक तीन आविष्कार किए हैं। इनका साक्षात विशिष्ट प्रमाण तथा उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के श्लोकों में है।


💫 (१) अरणि वृक्ष के मंथन से अग्नि का आविष्कार (Fire with Friction) —

संसार के सभी काम अग्नि से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से चलते हैं। यजुर्वेद का भी कथन है कि विद्वानों ने अग्नि को उपयोगिता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान दिया है। ऋग्वेद ने अग्नि को ऊर्जा का सम्राट् कहा है।

(क) अयमिह प्रथमो धायि धातृ‌भिर्होता यजिष्ठः।
(यजु० ३.१५)
(ख) त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजम्०।
(ऋग्० ३.१०.१)

ऋग्वेद में अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न करने का वर्णन है। ऋग्वेद में कहा है कि अरणि नामक वृक्ष की समिधाओं में अग्नि है। दो अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है।

(क) अरण्योर्निहितो जातवेदाः।
(ऋग्० ३.२९.२)
(ख) नवं जनिष्टारणी।
(ऋग्०५.९.३)
(ग) अग्निं मन्थाम पूर्वथा।
(ऋग्० ३.२९.१)

अथर्वा ऋषि ने सर्वप्रथम अरणि नामक वृक्ष की लकड़ियों को रगड़ कर अग्नि का अविष्कार किया ऋग्वेद और यजुर्वेद में इसका विस्तृत उल्लेख है। यजुर्वेद का कथन है कि अथर्वा ऋषि ने मन्थन (घर्षण, Friction) के द्वारा अग्नि उत्पन्न की। यज्ञ में इस अग्नि का प्रयोग सर्वप्रथम अथर्वा के पुत्र दधीचि ऋषि ने किया ।

(क) अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्यद् अग्ने।
(यजु० ११.३२)
(ख) तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्र ईधे अथर्वणः।
(यजु० ११.३३)

💫 (२) जल के मन्थन से अग्नि (Hydroelectric, Hydel) —

महान दधीचि पितृ अथर्वा ऋषि का द्वितीय अविष्कार है जलीय विद्युत् । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और तैत्तिरीय संहिता में उल्लेख है कि अथर्वा ऋषि ने तालाब के जल से मन्थन (Friction) के द्वारा जलीय विद्युत् (Hydel) का आविष्कार किया था ।

त्वामग्ने पुष्करादधि-अथर्वा निरमन्बत।
(ऋग्० ६.१६.१३ । यजु० ११.३२ । साम० ९। तैत्ति० ३.५.११.३)

💫 (३) भूगर्भीय अग्नि (पुरीष्य अग्नि, Oil and Natural Gas) —

भूगर्भीय अग्नि (Gas) का पता चलाना और उसे उत्खनन द्वारा निकालना, अथर्वा ऋषि का तृतीय अविष्कार है। इसका विस्तृत वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और तैत्तिरीय संहिता में मिलता है। ऋग्वेद आदि में 'पुरीष्यासो अग्नयः' शब्द का प्रयोग है। साथ ही इसे पृथ्वी एवं समुद्र से खोदकर निकालने का उल्लेख है। भूगर्भीय अग्नि का बहुवचन में उल्लेख सिद्ध करता है कि पुरीष्य अग्नि शब्द के द्वारा भूगर्भीय प्रज्वलनशील सभी पदार्थों, पेट्रोल, गैस, किरोसिन तेल (मिट्टी का तेल) आदि का ग्रहण है। यजुर्वेद में मंत्रों (यजु० ११.२८ से ३२) में इसकी उच्च प्रज्वलनशीलता का विस्तृत वर्णन है।

(क) पुरीष्योऽसि विश्वभरा अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने।
(यजु०११.३२)
(ख) पृथिव्याः सधस्थाद् अग्निं पुरीष्यम्.. खनामः।
(यजु०११.२८)
(ग) अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रम् अभितः पिन्वमानम्।
(यजु०११.२९)
(घ) अग्निमन्तर्भरिष्यन्ती ज्योतिष्मन्तम् अजस्रमित् ।
(यजु०११.३१)
(ङ) पुरीष्यासो अग्नयः ।
(ऋग्० ३.२२.४, यजु० १२.५०, तैति० ४.२४३)

यजुर्वेद के मंत्र में 'योनिरग्नेः' से स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नि के कारण अत्यन्त प्रज्वलनशील पदार्थ हैं। 'समुद्रम् अभितः' के द्वारा स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नियाँ (गैस, पेट्रोल आदि) समुद्रों के बहुत विस्तृत भाग में फैली हुई हैं।

यजुर्वेद में 'पुरीष्योऽसि विश्वभरा' के द्वारा उल्लेख है कि भूगर्भीय पेट्रोल, गैस आदि विश्व के लिए अत्यन्त उपयोगी है और ये संसार का पालन-पोषण करते हैं।


💫जयतु सनातन💫
👍17❤2👏1🤔1
🕉️ ॐ हं हनुमते नमः
❤17🙏9👍4👏4
🕉️ हनुमान चालीसा का अर्थ

• पंक्ति 1:

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर

- अर्थ : हनुमान जी की जय हो जो ज्ञान और गुणों के सागर हैं। कपियों के राजा तीनों लोक (पाताल लोक, धरती लोक और आकाश लोक) में आपकी जय है, सम्मान है।

• पंक्ति 2 :

राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

- अर्थ : श्री राम के दूत आप बल के धाम हैं यानी आपके पास अतुलित (जिसको तौल नहीं सकते) बल है। आपकी माता का नाम अंजनि और पिता का नाम पवन है।

• पंक्ति 3 :

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी ॥

- अर्थ : हे हनुमान जी ! आप वीर नहीं महावीर हैं, विक्रम हैं यानी आपसे युद्ध में जीता नहीं जा सकता और आप का अंग वज्र (कठोर) है। जिसकी बुद्धि दूषित है, जिसकी बुद्धि केवल गलत कार्यों में ही लगी रहती है, यदि वह आपका निरंतर स्मरण करे तो उसकी बुद्धि श्रेष्ठ होती है और जिनकी बुद्धि अच्छे कार्यों में लगी हुई है उनके संग तो आप हमेशा रहते ही हैं।

• पंक्ति 4 :

कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा ॥

- अर्थ : आपके शरीर का रंग स्वर्ण के भाँती है और वस्त्र सुन्दर हैं। कानों में कुण्डल है और केश यानी बाल घुंगराले हैं।
अब यहाँ हनुमान जी हमें यह सन्देश दे रहे हैं कि हमें अपने शरीर को साफ़ रखना चाहिए और वस्त्र भी साफ़ ही पहनने चाहिए।

• पंक्ति 5 :

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेउ साजै ॥

- अर्थ : आपके एक हाथ में गदा है और एक हाथ में विजय ध्वज है। आपके कंधे पर मूँज (एक प्रकार की घास) का जनेऊ है।

• पंक्ति 6 :

शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जगवंदन ॥

- अर्थ : आप शंकर के अवतार हैं और केसरी के औरस पुत्र हैं। आपका तेज और आपकी महिमा का वंदन सारा जग करता है।

• पंक्ति 7 :

बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥

- अर्थ : आप विद्वान हो, गुणी हो और चतुर भी हो। आप राम का कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

अब यहाँ थोड़ा रुकते हैं और गहराई से विचार करते हैं राम के कार्य पर। राम का कार्य यानी अच्छे कार्य, नेक काम, हितकारी काम। तो जो मनुष्य निरंतर अच्छे कार्यों में लगा हुआ है वो सब कार्य राम के कार्य हैं और उसे पूरा कराने का सारा दायित्व हनुमान जी का है। आप बस अच्छे कार्य करिये - किसी का बुरा मत सोचिये, किसी की चुगली मत कीजिये, विश्वासघात मत करिये, पूरी ईमानदार से परिश्रम कीजिये । हनुमान जी आपका कार्य पूरा करवा देंगे।

• पंक्ति 8 :

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥

- अर्थ : हे हनुमान जी ! आपको श्री राम का चरित्र सुनने में आनंद आता है। आपके हृदय में राम, लक्ष्मण और सीता माँ विराजते हैं।

• पंक्ति 9 :

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा

- अर्थ : आपने सीता जी को अपना छोटा रूप दिखाया था। अपना विकराल रूप दिखाकर आपने लंका को जलाया था।

थोड़ा समझते हैं इन पंक्तियों को।

वाल्मीकि रामायण में प्रसंग आता है कि हनुमान जी बिल्ली का रूप धारण करके लंका में घुसे थे। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि उन्होंने बिल्ली का रूप बनाया था न कि बिल्ली का शरीर धारण कर लिया था। हज़ारों साल पहले मनुष्यों की औसत लम्बाई 8 से 10 फ़ीट होती थी पर आज साढ़े पांच फ़ीट रह गयी है। उसी प्रकार उस समय जानवरों की लम्बाई आज के जानवरों की लम्बाई से बहुत ज़्यादा थी। हनुमान जी ने बिल्ली की तरह अपनी चाल बनाई और लंका में प्रवेश कर गए।

दूसरी बात सूक्ष्म रूप का अर्थ है कि हनुमान जी जब सीता जी से मिले तो झुककर मिले, वे घुटनों पर बैठे हुए थे और उनके शरीर की दोनों बाजुएं सीने से चिपकी हुई थी। उनमें उस समय इस बात का बिलकुल भी अहंकार नहीं था कि उन्होंने शत्रु के देश में अकेले
सीता जी को खोज लिया।
और जब लंका को श्री राम जी के शक्ति का प्रदर्शन देने का समय आया तब उन्होंने अपना सीना चौड़ा किया, कंधे फैलाये और गर्जना की।

• पंक्ति 10:

भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥

- अर्थ : आपने विशालकाय रूप धरकर असुरों का विनाश किया। रामचंद्र जी के सभी कार्यों को आपने पूर्ण किया।

• पंक्ति 11:

लाय सजीवन लखन जियाए । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥

- अर्थ : आप संजीवनी बूटी लाये थे और लक्ष्मण जी के प्राण बचाये थे। तब श्री राम जी के होंठों पर मुस्कान आयी थी।

• पंक्ति 12:

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥

- अर्थ : श्री राम जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की। और आपको भारत के समान प्रिय भाई माना।

अब यहाँ एक प्रश्न उठता है की श्री राम को क्या लक्ष्मण जी प्रिय नहीं है ? राम जी के साथ वनवास लक्ष्मण जी गए थे। वनवास केवल श्री राम जी को हुआ था, लक्ष्मण जी को नहीं ।

इसका उत्तर भी बहुत सरल और आँखों में अश्रुओं को लाने वाला है, यदि आप अनुभव कर पाए तो ।
👍4❤1
राम जी को लक्ष्मण जी, भरत जी, सीता जी, हनुमान जी बहुत प्रेम करते थे । परन्तु वनवास में राम जी के साथ रहने का अवसर इन सबको मिला केवल एक को छोड़कर। और वे हैं भरत जी। भरत जी राम जी की चरण पादुका के साथ ही रहे पूरे 14 वर्ष । किस लिए ? राम जी की आज्ञा पर ।
और राम जी ने भरत को इसीलिए अपने से दूर रखा क्यूंकि यदि भरत जी भी राम जी के साथ 14 वर्ष वन में रहते तो अयोध्या को शत्रुओं के हाथ में जाते देर नहीं लगती। और राम जी स्वयं कहते हैं

| "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”

अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है।
क्यूंकि भरत जी परमात्मा की आज्ञा से परमात्मा से ही दूर रहे और परमात्मा के दिए हुए निर्देश से ही आगे का कार्य किया इसीलिए परमात्मा को भरत जी अधिक प्रिय हैं।
एक पल को विचार करते हैं कि यदि भरत जी के स्थान पर लक्ष्मण जी होते तो वे बिलकुल भी राम जी की बात ना मानते और राम जी से कहते कि यदि अयोध्या इन 14 वर्षों में शत्रुओं के हाथ लग भी जाती है तो वनवास समाप्त हो जाने के बाद फिर से अयोध्या शत्रुओं से जीत लेंगे। क्यूंकि लक्ष्मण जी को केवल राम जी का साथ चाहिए, वे उसके आगे नहीं विचरते हैं और ना ही विचारना चाहते हैं।

परन्तु भरत जी जानते थे कि प्रभु श्री राम की बात यदि वे नहीं मानेंगे तो 14 वर्ष समाप्त होने के बाद भी राम जी का कष्ट कम नहीं होगा क्यूंकि फिर शत्रुओं से अयोध्या जीतने के लिए राम जी को दोबारा से कष्ट उठाना पड़ेगा। भरत जी खुद को दुःख दे सकते हैं परन्तु राम जी के कष्ट को बढ़ा नहीं सकते हैं। राम जी यह बात जानते थे ।

मेरे विचार में यह कारण हो सकता है कि भरत जी राम जी को अधिक प्रिय हैं।अब तो हनुमान जी भी परमात्मा को अधिक प्रिय हो गए हैं।

हम भी परमात्मा को प्रिय हो जाएंगे यदि हम हनुमान चालीसा की सभी पंक्तियों का अर्थ अच्छे से समझेंगे और उसी अनुसार कार्य करेंगे। यह हनुमान चालीसा सूत्रों (formulas) से भरी हुई है। इसकी हर पंक्ति में जीवन को कैसे जीना है, इसका सूत्र है। जिस देश में हनुमान चालीसा है वहां यदि लोग अवसाद (depression) की गोलियां खाएंगे, आत्महत्या (suicide) करेंगे तो इसका सीधा सा मतलब यही है कि हनुमान चालीसा को अभी हमने सही से समझा नहीं ।

• पंक्ति 13:

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं

- अर्थः श्री राम जी कह रहे हैं हनुमान जी से कि मेरा पूरा शरीर तुम्हारे गुण गा रहा है। ऐसा कहते ही सियापति श्री राम जी ने हनुमान जी को गले से लगा लिया ।

• पंक्ति 14:

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥

- अर्थः ऋषि सनक इत्यादि ऋषि, ब्रह्मा जी, मुनि जन, नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी

• पंक्ति 15:

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥

- अर्थः यमराज, कुबेर, दिग्पाल (सभी दिशाओं के रक्षक) भी आपके गुणों नहीं गा सकते । तो कवि (तुलसीदास) तो क्या ही गा पाएंगे ।

• पंक्ति 16 :

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना । राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥

- अर्थः सुग्रीव जी को राम जी से मिलाने वाले हनुमान जी ही थे। राम जी से मिलते ही सुग्रीव और राम जी कि मित्रता हुई और बाली का अंत करके राम जी ने सुग्रीव को राजा बनाया ।

• पंक्ति 17:

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥

- अर्थ : जब हनुमान जी को बंधन में बांधकर मेघनाद रावण के समक्ष

लाया तब हनुमान जी ने बहुत सी हितकर बातें रावण को समझायीं । तब उस सभा में विभीषण जी भी थे जिन्होंने पूरे ध्यान से हनुमान जी की बातें सुनीं और बाद में जब रावण ने अपमान करके विभीषण जी को लंका से निकाला था तब विभीषण जी श्री राम के शरण में ही गए थे। राम जी की शरण में आने के बाद रावण का अंत करके प्रभु श्री राम ने विभीषण जी को ही लंका का राजा बनाया था ।

• पंक्ति 18:

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

- अर्थः सूर्य जो हज़ारों योजन दूर है उसे आपने मीठा फल समझकर निगल लिया था ।

अब यहाँ थोड़ा विचार करने की आवश्यकता है। क्यूंकि तुलसीदास जी कवि हैं और कवि कुछ पंक्ति दार्शनिक सन्दर्भ में भी लिखते हैं। जिनका अर्थ दर्शन से जुड़ा हुआ होता है, स्पष्ट अर्थ नहीं होता ।

यहाँ सूर्य अर्थात ज्ञान है और ज्ञान को अपने भीतर उतारना सूर्य को निगलने जितना ही कठिन है। कठिन तपस्या के बाद ही ज्ञान भीतर उतरता है। रटना सरल होता है परन्तु समझना कठिन होता है। हनुमान जी ने कठिन से कठिन विद्या को एक मीठे फल की तरह अपने मन, बुद्धि, चित्त में उतार लिया था ।
बाकी रह गयी सूर्य को निगलने वाली बात तो वह भी हनुमान जी के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। क्यूंकि जिनके साथ स्वयं राम हैं अर्थात परमात्मा हैं वे असंभव से असंभव कार्य भी कर सकते हैं।

• पंक्ति 19:

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं
👍2
- अर्थः हे हनुमान जी ! आप प्रभु श्री राम की अंगूठी अपने मुख में रखकर समुद्र को सरलता से पार कर गए थे।

• पंक्ति 20 :

दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

- अर्थः जगत में जितने भी कठिन से कठिन कार्य हैं सब आपके आशीर्वाद से पूर्ण हो जाते हैं।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि संसार में कोई भी कार्य कठिन या सरल नहीं होता । कार्य सारे ही सरल होते हैं। बस बल, बुद्धि और विद्या चाहिए किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए । और यह तीनों वरदान हनुमान जी अपने सभी भक्तों को देते हैं। बस करना यह है कि हनुमान जी की तरह अपना पूरा समय ज्ञान अर्जन में, बल को बढ़ाने में (योग, प्राणायाम, व्यायाम आदि करके) और विद्या (skills) को बढ़ाने में लगाना है। फिर देखिये कैसे हनुमान जी आप पर कृपा की वर्षा करेंगे ।

• पंक्ति 21 :

राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥

- अर्थः राम (परमात्मा) को पाने की कुंजी आपके पास है। आपकी आज्ञा के बिना राम जी से मिलना सुलभ नहीं है।

इन पंक्तियों में ध्यान देने वाली बात यह है कि पहले हनुमान जी को प्रसन्न करो तब हनुमान जी स्वयं आपको परमात्मा के दर्शन करा देंगे । अब प्रश्न यह उठता है कि हनुमान जी प्रसन्न होंगे कैसे ?

हनुमान जी को प्रसन्न करना बहुत सरल है। बहुत सरल विधि से हनुमान जी से प्रसन्न हो जाएंगे। आइये जानते हैं वह विधि कौन सी है?
सबसे पहले सुबह उठकर हमें धरती माँ को प्रणाम करना है, फिर योग, प्राणायाम, व्यायाम और स्नान आदि करके हमें माता और पिता के चरण स्पर्श करने हैं। इसके बाद थोड़ा समय निकालकर हनुमान चालीसा का जप अर्थ को ध्यान में रखते हुए करना है और फिर आँखों को बंद करके राम नाम का जप करना है। आँखों से अश्रु की धारा बहने लग जायेगी । यह आनंद के अश्रु होंगे। इसका अनुभव तो मैं बता नहीं सकता क्यूंकि यह अनुभव शब्दों में नहीं कह सकते । आपको स्वयं अनुभव करना होगा। अब इसके बाद अपनी दिनचर्या आरम्भ करनी है।
यही सरल सी विधि है हनुमान जी को प्रसन्न करने की ।

• पंक्ति 22 :

सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ॥

- अर्थः हे हनुमान जी ! जो आपकी शरण में आ गया उसको तो फिर संसार के सारे सुख घेर ही लेंगे और भय तो उसको लगेगा ही नहीं क्यूंकि तब स्वयं आप उसकी रक्षा कर रहे होंगे ।

• पंक्ति 23 :

आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तै काँपै ॥

- अर्थ: आपके दर्शन की अभिलाषा तो है मुझे पर आपका तेज, आपकी चमक मैं नहीं झेल पाऊंगा। आप हलकी सी भी गर्जना कर दें तो तीनों लोक में हाहाकार मच जाता है।

• पंक्ति 24 :

भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ॥

- अर्थः भूत, आत्माएँ उसके पास भी नहीं आती जो आपका नाम स्मरण में रखता है।

• पंक्ति 25 :

नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

- अर्थः हे वीर हनुमान ! जो हर समय आपके नाम का जप कर रहा है उसके समस्त रोग और पीड़ा का अंत हो जाता है।

अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि हनुमान जी का नाम भी एक औषधि ही है। यहाँ यह अर्थ नहीं लेना है कि शरीर में कोई भी रोग हो या पीड़ा हो तो अन्य औषधियां ना लेकर हनुमान जी के नाम की औषधि ही लेनी है। जो भी औषधि आप ले रहे हैं अपने रोग के लिए उसके साथ हनुमान जी का नाम भी स्मरण में रखना है।

• पंक्ति 26 :

संकट तै हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

- अर्थ : जो भी हनुमान जी का स्मरण करता है और साथ में परिश्रम भी करता है, तो उसके जीवन से सभी प्रकार के संकटों का अंत हो जाता है।

• पंक्ति 27 :

सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥

- अर्थः सभी राजाओं में श्री राम सर्वश्रेष्ठ हैं क्यूंकि वे तपस्वी राजा हैं । उनके सभी कार्यों को आप सदैव सफल बनाने में प्रयासरत रहते हैं।
श्री राम जी को तपस्वी इसलिए कहा गया है क्यूंकि वे राजा होने के बाद भी भोग और विलास में नहीं डूबे। उनके समय में एक राजा बहुत विवाह करता था परन्तु राम जी ने एक पत्नी व्रत ले रखा था ।

• पंक्ति 28 :

और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥

- अर्थ : जो मन को रथ के भाँती जानकार उसको साध लेता है वही जीवन भर अनगिनत फल (सुख) पाता है।
मन सधेगा तभी जब हनुमान जी का ध्यान लगाएगा ।

• पंक्ति 29 :

चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

- अर्थः हे हनुमान जी ! आपका नाम चारों युग में रहेगा और जब तक यह जगत रहेगा तब तक आपके नाम से यह जगत जगमग रहेगा ।

• पंक्ति 30 :

साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥

- अर्थः सभी साधु और संतों के आप रखवाले हैं और सभी असुरों के संहारक और राम जी के दुलारे हैं।

• पंक्ति 31 :

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता ॥
👍2❤1
- अर्थः संसार में आठ प्रकार की सिद्धियां हैं और नौ प्रकार की निधियां हैं। सभी सिद्धियां और निधियां आपके पास हैं क्यूंकि माता सीता ने आपको यह सब वरदान में दिया था। जो आपका ध्यान लगा कर परिश्रम करता है उसे भी जीवन में वह सब मिलता है जो वह पाना चाहता है।

आठ सिद्धि और नौ निधि, मैं यहाँ नहीं बताऊंगा क्यूंकि वह सब जानकार हमें कुछ मिलेगा नहीं। हमें केवल हनुमान जी का स्मरण और अपने कर्म पर ध्यान देना है, फिर जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ती होते देर नहीं लगेगी ।

• पंक्ति 32 :

राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥

- अर्थः राम नाम का रसायन (chemical) आपके पास है। आप सदैव श्री राम के दास बने रहना चाहते हैं।
यह पंक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे समझना बहुत ही आवश्यक है। यहाँ हमें हनुमान जी सिखा रहे हैं कि जीवन में तुम कितनी भी सफलता पा जाना परन्तु भीतर से सदैव खुद को परमात्मा का दास ही मानना और जानना । इससे कभी अहंकार हमारी बुद्धि पर हावी नहीं हो पायेगा और हम परमात्मा का ध्यान लगते हुए अपने जीवन में भी और जो हमसे जुड़े हैं उनके जीवन में भी खुशियां जोड़ पाएंगे ।

• पंक्ति 33 :

तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

- अर्थः हे हनुमान जी आपको स्मरण में रखने से आप हमें राम ( परमात्मा) से मिला देते हैं। जन्मों जन्मों के दुःख आपके ध्यान मात्र से समाप्त हो जाते हैं।

• पंक्ति 34 :

अंतकाल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

- अर्थ: हे हनुमान जी ! मैं अपने अंत काल में राम जी के धाम में जाऊं और अगला जन्म कभी भी लूँ तो राम का दास (परमात्मा का भक्त ) ही कहलाऊँ ।

• पंक्ति 35 :

और देवता चित्त ना धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥

- अर्थः किसी भी और देवता का स्मरण करने कि आवश्यकता नहीं है । केवल हनुमान जी का स्मरण करने से सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं

अब यहाँ एक प्रश्न उठता है कि क्या बाकी सभी देवता का नाम लेने से हनुमान जी की कृपा नहीं होगी ? क्या बाकी सभी देवता हनुमान जी से काम हैं ?

नहीं । यहाँ हनुमान जी के नाम के स्थान आप जिस भी देवी देवता को मानते हैं वो नाम रख सकते हैं। कोई देवी – देवता हम मनुष्यों की तरह नहीं हैं कि आप उनकी जगह किसी और का नाम लोगे तो वे रुष्ट हो जायेंगे । सब एक ही हैं।

• पंक्ति 36 :

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥

- अर्थः सभी संकट और सभी पीड़ा का अंत वीर हनुमान जी का ध्यान लगाते ही हो जाती हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि औषधि के साथ ध्यान लगाना है. औषधि छोड़कर नहीं आप जो भी औषधि ले रहे हैं अपने रोग के लिए या पीड़ा के लिए, वे सब लें और साथ में हनुमान जी का भी नाम जपते रहें ।

संसार में जितने भी संकट हैं सब मानसिक हैं और मानसिक बल बढ़ेगा तो संकट छोटे लगने लगेंगे। मानसिक बल बढ़ाने के लिए हनुमान चालीसा का ध्यान बहुत है।

• पंक्ति 37 :

जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥

- अर्थः इन्द्रियों के स्वामी हनुमान जी कि जय हो । हे हनुमान जी ! आप मुझ पर गुरु की भांति कृपा करें ।
हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और ब्रह्मचारी होना कोई सरल बात नहीं है। केवल जिसने अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर रखा है वही ब्रह्मचारी हो सकता है। अब आपके मन में एक प्रश्न आएगा कि हम तो विवाहित हैं तो क्या हम ब्रह्मचारी हो सकते हैं ? क्या राम जी ब्रह्मचारी थे ?

उत्तर है कि विवाह के बाद भी हम ब्रह्मचारी हो सकते हैं। बस विवाह के बाद हमें अपनी पत्नी के अलावा सभी स्त्रियों को माता और बहन के रूप में ही देखना है। तो राम जी भी ब्रह्मचारी थे और आप भी विवाह के बाद ब्रह्मचारी रह सकते हैं।

अब दूसरा प्रश्न है कि गुरु के भांति कृपा ही क्यों करें हनुमान जी हमारे उप्पर ? माता के भांति क्यों नहीं या पिता के भांति क्यों नहीं ?
इसका उत्तर यह है कि केवल गुरु ही है जो शिष्य से कुछ अपेक्षा नहीं रखता । गुरु अपने शिष्य को अपना समस्त ज्ञान दे देता है और उसे संसार में भेज देता है एक सुखमय जीवन जीने के लिए। गुरु को अपने शिष्य से ना ही अर्थ की कामना होती है और ना ही किसी पद प्रतिष्ठा की और ना ही उसे अपने शिष्य से कोई सम्मान की लालसा होती है।

• पंक्ति 38 :

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

- अर्थ : जो 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ करेगा उसके सभी दुखों का अंत हो जाएगा और सुख की प्राप्ति होगी ।
इस पंक्ति का अर्थ यह है कि हनुमान चालीसा की महिमा बहुत है। सुख और दुःख केवल मानसिक स्थिति है। हनुमान चालीसा अर्थ के साथ पाठ करने से मानसिक बल बढ़ाती है तो स्वतः ही जीवन के सभी दुःख छोटे लगने लगते हैं।

• पंक्ति 39 :

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
👍5❤3
- अर्थ : जो भी हनुमान चालीसा का पाठ करता है उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ती हो जाती है।
सत्य तो यह है कि जो हनुमान जी भक्ति में लीन हो गया उसकी फिर कुछ इच्छा शेष रही नहीं जाती ।

• पंक्ति 40 :

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥

- अर्थ : तुलसीदास सदा ही राम जी के दास हैं। आप हे हनुमान जी ! मेरे हृदय में निवास करिये ।

अब यहाँ कुछ साधकों का प्रश्न होता है कि क्या हम तुलसीदास के स्थान पर अपना नाम रख सकते हैं ?

इसका उत्तर बहुत सरल है। तुलसीदास का नाम इन पंक्तियों से हटाना ही क्यों है ? तुलसीदास जी के साथ आप अपना नाम भी जोड़ दें क्यों तुलसीदास जी भी तो राम जी के दास हैं।

इस पंक्ति को कैसे पढ़ना है मैं बताता हूँ। जैसे मेरा नाम जगदीश है तो मैं इस पंक्ति को ऐसे पढ़ता हूँ -

तुलसीदास एवं जगदीश सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥

॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

- अर्थ : हे पवन पुत्र ! संकटों के हरने वाले, मंगल के रूप । राम, लक्ष्मण और सीता सहित आप मेरे हृदय में निवास करें देवताओं के राजा ।

इन पंक्तियों में सुर का अर्थ है देवता और भूप का अर्थ है राजा ।

🙏 यहाँ हनुमान चालीसा अर्थ सहित पूर्ण हुई ।

🕉️ जय श्री महाकाल
👍21❤5🙏4
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
❤4👍1🙏1
➤ आपके पैरों के आकार प्रकार आपके लिए शुभ है या अशुभ ??
➤ जानिए आपके आपके पैरों का संपूर्ण शास्त्रीय फलादेश !!

#Thread


✧ मनुष्य के पैर - संपूर्ण लक्षण विचार ✧
﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌

✧ पैर (चरण) --

प्राचीन शास्त्रकारों ने पैर के २० भेद बताए है, परन्तु उन सबको निम्नलिखित ४ श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -

(१) सर्वोत्तम
(२) उत्तम
(३) मध्यम
(४) अधम
(५) निकृष्ट

(१) सर्वोत्तम --
इस श्रेणी के पैर वे होते हैं, जिनका रंग कमल के समान लाल होता है, तलवे कोमल होते हैं, नाबूनों का रंग तांबे के समान रक्‍ताभ होता है, उंगलियां परस्पर सटी हुई होती है तथा उनका ऊपरी भाग कछुए की पीठ की भांति उन्नत होता है, जिस पर नसें दिखाई नहीं देती। ऐसे पैरों के तलवों में पसीना नहीं आता, ग्रुल्फ छिपे रहते है, एड़ियां सुन्दर होती है तथा ऊपरी भाग में उष्णता बनी रहती है। ऐसे पैर वाले व्यवित राजा-महाराजा, विपुल ऐश्वर्यवान, धनवान गुणवानरु, यशस्वी, सौभाग्यशाली, दीर्घायु तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष होते है। इसकी सभी आकांक्षाएं पूर्ण होती रहती हैं ।

(२) उत्तम --
इस श्रेणी के पैर सर्वोत्तम कोटि से कुछ ही कम होते हैं। इनकी उंगलियां लम्बी तथा परस्पर मिली हुई, नाखून सामान्यतः लम्बे तथा त्वचा स्पर्श में कोमल होती है। शेष सभी गुण पूर्वोक्त प्रकार के ही समझने चाहिए। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति नीतिज्ञ, कार्यकुशल, तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी सलाह देने वाले, साहित्य-प्रेमी, यशस्वी, धनी, यात्राप्रिय, तथा सर्वत्र सम्मान एवं सुख प्राप्त करने वाले होते हैं ।

(३) मध्यम --
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कोमल तथा गेहूए रंग के, नाखून सर्पाकार तथा हल्के गुलावी गेरुआ अथवा पीले रंग के होते हैं । उन पर नसे सामान्य रूप से उभरी होती है तथा उगलियों पर बहुत ही सामान्य बाल होते है ।
ऐसे पैरों वाले व्यक्ति परिश्रमो, व्यवहार-कुशल, निर्भीक, दूरदर्शी, विद्वान, गणित अथवा विज्ञान में रुचि रखने वाले, साहित्यिक, पारिवारिक-चिन्ताग्रों से ग्रस्त तथा एक सीमित-क्षेत्र में यश-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं । उंगलियां कुछ मिली तथा कुछ छितरी हुईं होती हैं |

(४) अधम--
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कुछ-कुछ भूरापन लिए हुए श्वेत रंग के होते है, त्वचा स्पर्श मे कठोर, रूखी, तथा ठण्डी होती है । इनके भाग पर पसीना आता है। उंगलियां चौड़ी होती है और उनके ऊपर बाल जमे रहते है। नाखून चपटे, लम्बे अथवा अधिक चौड़े होते हैं । गुल्फ वाहर की ओर निकला रहता है । नाखूनों का रंग पीला अथवा सफेद होता है। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति अपने कुल के अ्भिमान में डूबे रहने वाले, विद्याओं के विशेष-प्रेमी, परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति की इच्छा रखने वाले, कामुक-प्रवृति के तथा दरिद्री होते है ।

(५) निकृष्ट --
इस श्रेणी के पैरों के तलवों का रंग मिट्टी जैसे रंग का होता है। एड़ी मोटी तथा स्थान-स्थान पर फटी हुई, त्वचा स्पर्श में कठोर, ऊपरी भाग पर नसें उभरी हुई । उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी तथा उनके ऊपर अधिक बाल जमे हुए, गुल्फ बाहर की ओर काफी निकले का नाखून छोटे, चपटे और कालापन अथवा नीलापन लिए हुए रहते हैं। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति दरिद्री, बीमारियों से ग्रस्त रहने वाले, दासवृत्ति के, लम्बे समय तक अपने घर से दूर रहने वाले, मिथ्याभिमानी, क्रोधी, निश्चिन्त, गंवार, मूर्ख तथा कुसंगति मे रहने वाले होते है ।

स्कन्द पुराण में लिखा है --

“पादौ समांसलौ रक्तौ समौ सूत्मों सुशोमनौ।
समगुल्फौ स्वेदहीनौ स्निग्ध वैश्वर्य सूचकौ।”

अर्थात मांसल, रकताभ, सुन्दर, समान ग्रुल्फ वाले, स्वेद-हीन, स्निग्ध तथा छोटे पैर ऐश्वर्य के सूचक होते है।

परन्तु अन्य ग्रन्थ में लिखा है --

“विशाल चरणों धनी”

अर्थात बड़े पैरोंवाला व्यक्ति धनी होता है।
अधिकांश विद्वानों के मत से पैर का छोटा होना शुभ लक्षण नहीं है। अब यहां पर विचार करने की बात यह रह जाती है कि पैर छोटा या बड़ा इसका निश्चय कैसे किया जाए ?

शरीर के अनुपात से पैर का छोटा-बड़ा आकार ज्ञात करने का तरीका शास्त्रकारों ने यह बताया है -

"आपार्ष्णि ज्येष्ठान्तं तल्लमत्र चतुर्दशांगुलायाम।
विस्तारेण षङ्गगुल मंगुष्ठो व्यङ्गुलायामः॥
पञचांगुल परिणाहः पादोनं तन्‍न खोऽङ्गुलं दैध् र्यात ।
अङ्गुष्ठ समा ज्येष्ठा मध्या तत्षोडशांशोना ॥
अष्ठांशोनानामा कनिष्ठिका पष्ठभाग परिहीना।
सर्वासाप्याप्तां नखा: स्वपर्व त्रिभाग मिताः ॥
सत्र्यंगुलि परिणाहा प्रथमाङ्गगुली विस्तृताङ्गगलौ भवति।
अप्टाष्ट भागहीनाः शेषा: क्रमशः परिज्ञेया:॥”

भावार्थ-- पैर की एड़ी से पैर की तर्जनी उंगली तक पैर की लम्बाई चौदह उंगल होनी चाहिए। लम्बाई के अंगुल का परिमाण यह है कि जिस व्यक्ति का पैर हो, उसी के हाथ की मध्यमा उंगली के द्वितीय अर्थात्‌ बीच वाले पर्व की जितनी चौड़ाई हो, उसे एक अंगुल के बराबर मानना चाहिए। इसी अनुपात से पैर की चौड़ाई ६ अंगुल, पैर के अंगूठे की लम्बाई
👍8🔥1