🧵#Thread
🕉️ श्री श्रावण मास 🕉️
🔺 श्री श्रावण मास का संपूर्ण वैदिक महात्म्य ।
🔺श्री श्रावण सोमवार व्रत विधान ।
🔺 श्रावण सोमवार में भगवान शिव का रुद्राभिषेक द्रव्य पूजन एवं शिववास विचार ।
🔺 भगवान शिव को अतिप्रिय रुद्र पाठ की अभिषेक विधि ?
🔺श्री श्रावण मास वैदिक महात्म्य —
मनुष्य अपने परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने हेतु हमारे पुराणों में विभिन्न तिथियों, पर्वों, मासों आदि में अनेकानेक कृत्यों का सविधि प्रेरक वर्णन प्राप्त होता है, जिनका श्रद्धापूर्वक पालन करके मनुष्य भोग तथा मोक्ष दोनों को प्राप्त कर सकता है। निष्काम भाव से किसी भी काल विशेष में जप, तप, दान, अनुष्ठान आदि करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है- यह निश्चित है। पुराणों में प्रायः सभी मासों का माहात्म्य मिलता है, परंतु वैशाख, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ तथा पुरुषोत्तम मास का विशेष माहात्य दृष्टिगोचर होता है, इन मासों में श्री श्रावण मास विशेष है।
श्री श्रावण मास के स्वामी आदिदेव भगवान शिव है, सबके आदि में आविर्भूत हुए हैं, अतः उनको आदि देव कहा गया है। जैसे एक की विधि बाधा से अन्य की विधि-बाधा होती है, वैसे ही अन्य देवताओं के अल्प देवत्व के कारण आपको महादेव माना गया है। तीनों देवताओं के निवास स्थान पीपल वृक्ष में सबसे ऊपर शिव जी की स्थिति है। कल्याण रूप होने के कारण वो शिव हैं और पाप समूह को हरने के कारण वो हर हैं, आदि देव होने में शिव जी का शुक्ल वर्ण प्रमाण है क्योंकि प्रकृति में शुक्ल वर्ण ही प्रधान है, अन्य वर्ण विकृत है। आदिदेव कर्पूर के समान गौर वर्ण के है, गणपति के अधिष्ठान रूप चार दल वाले मूलाधार नामक चक्र से, ब्रह्माजी के अधिष्ठान रूप छः दल वाले स्वाधिष्ठान नामक चक्र से और विष्णु के अधिष्ठान रूप दस दल वाले मणिपुर नामक चक्र से भी ऊपर महादेव के अधिष्ठित होने के कारण शिव ब्रह्मा तथा विष्णु के ऊपर स्थित हैं, यह महादेव प्रधानता को व्यक्त करता है। एकमात्र शिव जी ही पूजा से पंचायतन पूजा हो जाती है जो की दूसरे देवता की पूजा से किसी भी तरह संभव नहीं है, आदिदेव शिव की बाईं जाँघ पर शक्ति स्वरूपा दुर्गा, दाहिनी जाँघ पर प्रथम पूज्य गणपति, उनके नेत्र में सूर्य तथा हृदय में भक्तराज भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। सबको विरक्ति की शिक्षा देने हेतु आदिदेव श्मशान में तथा पर्वत पर निवास करते हैं।
श्रावण मास के लिए भगवान् ने स्वयं कहा है-
द्वादशस्वपि मासेषु श्रावणो मेऽतिवल्लभः।
श्रवणाईं यन्माहात्म्यं तेनासौ श्रवणो मतः ॥
श्रवणक्ष पौर्णमास्यां ततोऽपि श्रावणः स्मृतः।
यस्य श्रवणमात्रेण सिद्धिदः श्रावणोऽप्यतः ॥
(स्कन्दमहापु० श्रा० माहा० १।१७-१८)
अर्थात् बारहों मासों में श्रावण मुझे अत्यन्त प्रिय है। इसका माहात्म्य सुनने योग्य है। अतः इसे श्रावण कहा जाता है। इस मास में श्रवण-नक्षत्र युक्त पूर्णिमा होती है, इस कारण भी इसे श्रावण कहा जाता है। निर्मलता गुण के कारण यह आकाश के सदृश है इसलिए 'नभा' कहा गया है। इसके माहात्म्य के श्रवण मात्र से यह सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसलिये भी यह श्रावण संज्ञा वाला है।
श्रावणमास चातुर्मास के अन्तर्गत होने के कारण उस समय वातावरण विशेष धर्ममय रहता है। जगह-जगह प्रवासी संन्यासी- गणों तथा विद्वान् कथावाचकों द्वारा भगवान् की चरित कथाओं का गुणानुवाद एवं पुराणादि ग्रन्थों का वाचन होता रहता है। श्रवणमास भर शिवमन्दिरों में श्रद्धालुजनों की विशेष भीड़ होती है, प्रत्येक सोमवार को अनेक लोग व्रत रखते हैं तथा प्रतिदिन जलाभिषेक भी करते हैं। जगह-जगह कथा सत्रों का आयोजन, काशीविश्वनाथ, वैद्यनाथ, महाकालेश्वर आदि द्वादश ज्योतिर्लिंगों तथा उपलिंगों की ओर जाते काँवरियों के समूह, धार्मिक मेलों के आयोजन, भजन-कीर्तन आदि के दृश्यों के कारण वातावरण परम धार्मिक हो उठता है। महाभारत के अनुशासन पर्व (१०६। २७) में महर्षि अंगिरा का वचन है-
श्रावणं नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत्।
यत्र तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिवर्धनः ॥
अर्थात् 'जो मन और इन्द्रियों को संयममें रखकर एक समय भोजन करते हुए श्रावणमास को बिताता है, वह विभिन्न तीर्थों में स्नान करनेके पुण्यफल से युक्त होता है और अपने कुटुम्बी जनों की वृद्धि करता है।' स्कन्दमहापुराण में तो भगवान् यहाँ तक कहा है कि श्रावण मास में जो विधान किया गया है, उसमें से किसी एक व्रत का भी करनेवाला मुझे परम प्रिय है-
किं बहूक्तेन विप्रर्षे श्रावणे विहितं तु यत्।
तस्य चैकस्य कर्तापि मम प्रियतरो भवेत् ॥
(स्कन्दमहापु० श्रा०माहा० ३०।३६)
@Sanatan
🕉️ श्री श्रावण मास 🕉️
🔺 श्री श्रावण मास का संपूर्ण वैदिक महात्म्य ।
🔺श्री श्रावण सोमवार व्रत विधान ।
🔺 श्रावण सोमवार में भगवान शिव का रुद्राभिषेक द्रव्य पूजन एवं शिववास विचार ।
🔺 भगवान शिव को अतिप्रिय रुद्र पाठ की अभिषेक विधि ?
🔺श्री श्रावण मास वैदिक महात्म्य —
मनुष्य अपने परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने हेतु हमारे पुराणों में विभिन्न तिथियों, पर्वों, मासों आदि में अनेकानेक कृत्यों का सविधि प्रेरक वर्णन प्राप्त होता है, जिनका श्रद्धापूर्वक पालन करके मनुष्य भोग तथा मोक्ष दोनों को प्राप्त कर सकता है। निष्काम भाव से किसी भी काल विशेष में जप, तप, दान, अनुष्ठान आदि करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है- यह निश्चित है। पुराणों में प्रायः सभी मासों का माहात्म्य मिलता है, परंतु वैशाख, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ तथा पुरुषोत्तम मास का विशेष माहात्य दृष्टिगोचर होता है, इन मासों में श्री श्रावण मास विशेष है।
श्री श्रावण मास के स्वामी आदिदेव भगवान शिव है, सबके आदि में आविर्भूत हुए हैं, अतः उनको आदि देव कहा गया है। जैसे एक की विधि बाधा से अन्य की विधि-बाधा होती है, वैसे ही अन्य देवताओं के अल्प देवत्व के कारण आपको महादेव माना गया है। तीनों देवताओं के निवास स्थान पीपल वृक्ष में सबसे ऊपर शिव जी की स्थिति है। कल्याण रूप होने के कारण वो शिव हैं और पाप समूह को हरने के कारण वो हर हैं, आदि देव होने में शिव जी का शुक्ल वर्ण प्रमाण है क्योंकि प्रकृति में शुक्ल वर्ण ही प्रधान है, अन्य वर्ण विकृत है। आदिदेव कर्पूर के समान गौर वर्ण के है, गणपति के अधिष्ठान रूप चार दल वाले मूलाधार नामक चक्र से, ब्रह्माजी के अधिष्ठान रूप छः दल वाले स्वाधिष्ठान नामक चक्र से और विष्णु के अधिष्ठान रूप दस दल वाले मणिपुर नामक चक्र से भी ऊपर महादेव के अधिष्ठित होने के कारण शिव ब्रह्मा तथा विष्णु के ऊपर स्थित हैं, यह महादेव प्रधानता को व्यक्त करता है। एकमात्र शिव जी ही पूजा से पंचायतन पूजा हो जाती है जो की दूसरे देवता की पूजा से किसी भी तरह संभव नहीं है, आदिदेव शिव की बाईं जाँघ पर शक्ति स्वरूपा दुर्गा, दाहिनी जाँघ पर प्रथम पूज्य गणपति, उनके नेत्र में सूर्य तथा हृदय में भक्तराज भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। सबको विरक्ति की शिक्षा देने हेतु आदिदेव श्मशान में तथा पर्वत पर निवास करते हैं।
श्रावण मास के लिए भगवान् ने स्वयं कहा है-
द्वादशस्वपि मासेषु श्रावणो मेऽतिवल्लभः।
श्रवणाईं यन्माहात्म्यं तेनासौ श्रवणो मतः ॥
श्रवणक्ष पौर्णमास्यां ततोऽपि श्रावणः स्मृतः।
यस्य श्रवणमात्रेण सिद्धिदः श्रावणोऽप्यतः ॥
(स्कन्दमहापु० श्रा० माहा० १।१७-१८)
अर्थात् बारहों मासों में श्रावण मुझे अत्यन्त प्रिय है। इसका माहात्म्य सुनने योग्य है। अतः इसे श्रावण कहा जाता है। इस मास में श्रवण-नक्षत्र युक्त पूर्णिमा होती है, इस कारण भी इसे श्रावण कहा जाता है। निर्मलता गुण के कारण यह आकाश के सदृश है इसलिए 'नभा' कहा गया है। इसके माहात्म्य के श्रवण मात्र से यह सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसलिये भी यह श्रावण संज्ञा वाला है।
श्रावणमास चातुर्मास के अन्तर्गत होने के कारण उस समय वातावरण विशेष धर्ममय रहता है। जगह-जगह प्रवासी संन्यासी- गणों तथा विद्वान् कथावाचकों द्वारा भगवान् की चरित कथाओं का गुणानुवाद एवं पुराणादि ग्रन्थों का वाचन होता रहता है। श्रवणमास भर शिवमन्दिरों में श्रद्धालुजनों की विशेष भीड़ होती है, प्रत्येक सोमवार को अनेक लोग व्रत रखते हैं तथा प्रतिदिन जलाभिषेक भी करते हैं। जगह-जगह कथा सत्रों का आयोजन, काशीविश्वनाथ, वैद्यनाथ, महाकालेश्वर आदि द्वादश ज्योतिर्लिंगों तथा उपलिंगों की ओर जाते काँवरियों के समूह, धार्मिक मेलों के आयोजन, भजन-कीर्तन आदि के दृश्यों के कारण वातावरण परम धार्मिक हो उठता है। महाभारत के अनुशासन पर्व (१०६। २७) में महर्षि अंगिरा का वचन है-
श्रावणं नियतो मासमेकभक्तेन यः क्षिपेत्।
यत्र तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिवर्धनः ॥
अर्थात् 'जो मन और इन्द्रियों को संयममें रखकर एक समय भोजन करते हुए श्रावणमास को बिताता है, वह विभिन्न तीर्थों में स्नान करनेके पुण्यफल से युक्त होता है और अपने कुटुम्बी जनों की वृद्धि करता है।' स्कन्दमहापुराण में तो भगवान् यहाँ तक कहा है कि श्रावण मास में जो विधान किया गया है, उसमें से किसी एक व्रत का भी करनेवाला मुझे परम प्रिय है-
किं बहूक्तेन विप्रर्षे श्रावणे विहितं तु यत्।
तस्य चैकस्य कर्तापि मम प्रियतरो भवेत् ॥
(स्कन्दमहापु० श्रा०माहा० ३०।३६)
@Sanatan
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शंख - #Thread
🔹शंख की उत्पति
🔹शंख के प्रकार
🔹शंखनाद का हमारे जीवन में प्रभाव
🔹शंख पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस का मत 🧵
शंख सदैव से ही सनातन संस्कृति के अनेक प्रतीकों में से एक प्रतीक रहा हैं । प्राचीन काल में शंख सब घरों में होता था। इसे दैनिक पूजा-अर्चना में स्थान दिया गया था। साधु समाज ही नहीं, गृहस्थों के घरों में भी शंख अनिवार्य रूप से रहता था।
♦️शंखध्वनि मानव के लिए श्रवणोपयोगी है। इसमें वायु प्रदूषण दूर करने की अद्भुत क्षमता है। यही कारण है कि कथा-पूजा-आरती व प्रवचन के समय एकत्रित सदस्य समुदाय की श्वास-प्रश्वास क्रिया द्वारा फैलने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिये सर्व प्रथम शंख-ध्वनि करने की प्रथा है। इससे एकत्रित जन समुदाय का ध्यान भी एक ओर आकृष्ट कर केंद्रित किया जाता है। प्राचीन काल में शंख सब घरों में होता था। इसे दैनिक पूजा-अर्चना में स्थान दिया गया था। l आज भी सभी साधु समाज और देवताओं में शंख को प्रमुख स्थान प्राप्त है।
♦️शंख की उत्पति
शंख की उत्पति देवासुरों द्वारा किये गये समुद्र मंथन के दौरान चौदह रत्नों में से प्राप्त एक रत्न के रूप में हुई। पांचजन्य नामक शंख समुद्र मंथन के क्रम में प्राप्त हुआ था जो अद्भुत स्वर, रूप और गुणों से सम्पन्न था। उसे भगवान् विष्णु ने स्वयं ही धारण कर लिया। तब से विष्णु के आयुध के रूप में शंख की पूजा होने लगी। शंख समुद्र की घोंघा जाति का एक प्राणिज द्रव्य है।
♦️शंख के प्रकार:
यह मुख्यतः दो प्रकार का-दक्षिणावर्ती तथा वामवर्ती होता है।
▪️ दक्षिणावर्ती शंख का पेट दक्षिण की ओर खुला होता है। यह बजाने के काम में नहीं आता क्योंकि इसका मुंह बन्द होता है। इसका बजना अशुभ माना जाता है। इसका प्रयोग अघ्य देने के लिए विशेषतः किया जाता है।
▪️वामवर्ती शंख का पेट बायीं ओर खुला होता है। इसको बजाने के लिए छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं और अनेकानेक बीमारियां भाग खड़ी होती हैं। यह जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी का निवास माना जाता है।
♦️शंखनाद का हमारे जीवन में प्रभावः
अथर्ववेद के अनुसार शंख-ध्वनि व शंख जल के प्रभाव से बाधा आदि अशान्ति कारक तत्वों का पलायन हो जाता है। रणवीर भक्ति रत्नाकर में शंखनाद के विषय में लिखा गया है कि ध्वनि (नाद) से बड़ा कोई मंत्र नहीं है। ध्वनि के निस्सारण की विधि जानकर उसका यथोचित समय पर प्रयोग करने के समान कोई पूजा नहीं है। विधि विहीन स्वर हानिप्रद भी हो सकता है।
@Sanatan
🔹शंख की उत्पति
🔹शंख के प्रकार
🔹शंखनाद का हमारे जीवन में प्रभाव
🔹शंख पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस का मत 🧵
शंख सदैव से ही सनातन संस्कृति के अनेक प्रतीकों में से एक प्रतीक रहा हैं । प्राचीन काल में शंख सब घरों में होता था। इसे दैनिक पूजा-अर्चना में स्थान दिया गया था। साधु समाज ही नहीं, गृहस्थों के घरों में भी शंख अनिवार्य रूप से रहता था।
♦️शंखध्वनि मानव के लिए श्रवणोपयोगी है। इसमें वायु प्रदूषण दूर करने की अद्भुत क्षमता है। यही कारण है कि कथा-पूजा-आरती व प्रवचन के समय एकत्रित सदस्य समुदाय की श्वास-प्रश्वास क्रिया द्वारा फैलने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिये सर्व प्रथम शंख-ध्वनि करने की प्रथा है। इससे एकत्रित जन समुदाय का ध्यान भी एक ओर आकृष्ट कर केंद्रित किया जाता है। प्राचीन काल में शंख सब घरों में होता था। इसे दैनिक पूजा-अर्चना में स्थान दिया गया था। l आज भी सभी साधु समाज और देवताओं में शंख को प्रमुख स्थान प्राप्त है।
♦️शंख की उत्पति
शंख की उत्पति देवासुरों द्वारा किये गये समुद्र मंथन के दौरान चौदह रत्नों में से प्राप्त एक रत्न के रूप में हुई। पांचजन्य नामक शंख समुद्र मंथन के क्रम में प्राप्त हुआ था जो अद्भुत स्वर, रूप और गुणों से सम्पन्न था। उसे भगवान् विष्णु ने स्वयं ही धारण कर लिया। तब से विष्णु के आयुध के रूप में शंख की पूजा होने लगी। शंख समुद्र की घोंघा जाति का एक प्राणिज द्रव्य है।
♦️शंख के प्रकार:
यह मुख्यतः दो प्रकार का-दक्षिणावर्ती तथा वामवर्ती होता है।
▪️ दक्षिणावर्ती शंख का पेट दक्षिण की ओर खुला होता है। यह बजाने के काम में नहीं आता क्योंकि इसका मुंह बन्द होता है। इसका बजना अशुभ माना जाता है। इसका प्रयोग अघ्य देने के लिए विशेषतः किया जाता है।
▪️वामवर्ती शंख का पेट बायीं ओर खुला होता है। इसको बजाने के लिए छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं और अनेकानेक बीमारियां भाग खड़ी होती हैं। यह जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी का निवास माना जाता है।
♦️शंखनाद का हमारे जीवन में प्रभावः
अथर्ववेद के अनुसार शंख-ध्वनि व शंख जल के प्रभाव से बाधा आदि अशान्ति कारक तत्वों का पलायन हो जाता है। रणवीर भक्ति रत्नाकर में शंखनाद के विषय में लिखा गया है कि ध्वनि (नाद) से बड़ा कोई मंत्र नहीं है। ध्वनि के निस्सारण की विधि जानकर उसका यथोचित समय पर प्रयोग करने के समान कोई पूजा नहीं है। विधि विहीन स्वर हानिप्रद भी हो सकता है।
@Sanatan
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🧵कौन सा रत्न किस राशि या ग्रह के लिए लाभदायक या किस परिस्थिति में हानिकारक है?
(कृपया #Thread अंत तक पढ़े)
प्राचीन ग्रंथों में 84 से अधिक प्रकार के रत्नों का उल्लेख किया गया है। इनमें से कई अब उपलब्ध नहीं हैं। मुख्य रूप से 9 रत्न ही अधिक प्रचलित हैं !
जानिए इन 9 रत्नों का व्यक्ति के जीवन में क्या प्रभाव पड़ता हैं !
(कृपया #Thread अंत तक पढ़े)
प्राचीन ग्रंथों में 84 से अधिक प्रकार के रत्नों का उल्लेख किया गया है। इनमें से कई अब उपलब्ध नहीं हैं। मुख्य रूप से 9 रत्न ही अधिक प्रचलित हैं !
जानिए इन 9 रत्नों का व्यक्ति के जीवन में क्या प्रभाव पड़ता हैं !
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#Thread 🧵
🌸 ॥ चौंसठ गुणी भगवान् श्री कृष्ण ॥ 🌸
समस्त लोक ब्रह्मांड का कल्याण करने हेतु सगुण मूर्त्तिशिरोमणि आनन्दकन्द षोडशकलापूर्ण पूर्णावतारी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र रूप का जन्म हुआ जो साक्षात परब्रह्म श्री हरि का अंश रूप है। श्री हरि, जिनकी पूजा सभी ब्रह्मा, शिव और इंद्र करते हैं, सभी ज्ञान के सर्वोच्च स्रोत हैं। निराकार ब्रह्म सुंदर भगवान श्री श्री राधाकांत का शारीरिक तेज है। ब्रह्मांड के निर्माता भगवान विष्णु, जो दुग्ध के पारलौकिक सागर पर लेटे हैं, श्री हरि का केवल एक अंश हैं। श्री हरि स्वयं कोई और नहीं बल्कि हमारे गुणश्रेष्ठ श्री राधावल्लभ भगवान् कृष्ण चंद्र हैं। जिनका समस्त जीवन असीमित गुणों रसों का सागर है। शाब्दिक रूप में भगवान् के भग शब्द में 6 गुण हैं। ऐश्वर्य, जप, बल, श्री, वैराग्य और यश। इनमें ज्ञान और बल प्रधान है। अन्य गुण इन्हीं दो से सम्बंधित है। ज्ञान में ऐश्वर्य और वैराग्य निहित है। बल में श्री और यश आ जाते हैं। ब्रह्म और क्षत्र इन्हीं दोनों का अपर नाम हैं। इन सभी गुणों का कृष्ण में समन्वय था इसलिए हम उन्हें भगवान् कहकर पुकारते हैं ना की ईश्वर शब्द कहा गया है। एक प्रकार से भगवान् के ये सभी गुण अनन्त हैं। उनका कोई थाह नहीं लगा सकता। कहते हैं, शेष और शारदा तथा ब्रह्मा, रुद्र इत्यादि भी उनके गुणों का वर्णन नहीं कर सकते, फिर मनुष्य की तो बात ही क्या है।
श्रीमद्भागवत में भी लिखा है-
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं
हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य।
कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पै-
र्मूपांशवः खे मिहिकाद्युभासः ॥
अर्थात् हे भगवन्! संसार के हितके लिये अवतार धारण करने वाले आपके गुणों की थाह कौन लगा सकता है? क्योंकि आप गुणरूप ही हैं। पृथिवी के रजःकणों को अथवा आकाश के नक्षत्रों को और नीहारके कणों को कोई भले ही गिन सके, परन्तु आपके गुणों की गणना कदापि नहीं हो सकती। फिर भी भक्त जनों ने अपनी-अपनी भावना के अनुसार अपने मनस्तोष के लिये तथा अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये जो गुण जिसकी समझ में आये, उन्हीं का वर्णन किया है
भगवान कृष्ण भिन्न गुण रूपों का एक अथाह भंडार थे, महाभारत में श्री कृष्ण जी के विषय में लिखा है-
वेद वेदांग विज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा।
नृणां हि लोके कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः
अर्थात आज के समुदाय में वेद वेदांग के ज्ञान तथा शारीरिक शक्ति एवं सामरिक अस्त्र-शस्त्र की कुशलता में श्री कृष्ण सबसे उत्कृष्ट हैं। कोई भी दूसरा कृष्ण के तुल्य नहीं हैं। भीष्म पितामह के मुख से कहे गए यह शब्द अक्षरतः श्री कृष्ण जी के गुणों को सिद्ध करते हैं।
श्री कृष्ण के विषय में वेदव्यास जी कहते है कि श्री कृष्ण लोभ रहित तथा स्थिर बुद्धि हैं। उन्हें सांसारिक लोगों को विचलित करने वाली कामना, भय, लोभ या स्वार्थ आदि कोई भी विचलित नहीं कर सकता, अतएव श्री कृष्ण कदापि अन्याय का अनुसरण नहीं कर सकते। इस पृथ्वी पर समस्त मनुष्यों में श्री कृष्ण ही धर्म के ज्ञाता, परम धैर्यवान और परम बुद्धिमान हैं।
यो वै कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात्।
अन्यायमनुवत्र्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः ।
धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः ।।
(महाभारत उद्योग. अ. 83)
श्रीमद्भागवत में उनकी द्वारका-लीला के संबंध में उनके छिपे हुए व्यक्तिगत स्वरूप का एक उदाहरण है । कभी-कभी भगवान कृष्ण स्त्री की तरह वस्त्र पहनकर खेलने लगते थे। इस रूप को देखकर उद्धव ने कहा, "यह कितना अद्भुत है कि यह स्त्री ठीक उसी तरह मेरे आनंदमय प्रेम को आकर्षित कर रही है, जैसे भगवान कृष्ण करते हैं। मुझे लगता है कि यह स्त्री के वस्त्र से ढकी हुई कृष्ण ही होंगी!"
15 वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित श्रीहरि भक्ति रसामृत सिन्धु में भगवान् श्रीकृष्ण के समस्त चौंसठ गुणों का बड़ा ही मधुर वर्णन किया गया है -
अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः ॥
रुचिरस्तेजसायुक्तो बलीयान् वयसाऽन्वितः ।
विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदेः ॥
वावटूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः ।
विदग्धश्चतुरो दक्षः कुनैज्ञः सुदृढ़वतः ॥
देशकोलसुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिवंशी ।
स्थिरी दान्तः क्षमोशीलो गंभीरो धृतिमान् सम:॥
बदोन्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत् ।
दक्षिणो विनयी ह्नीमान् शरणागतपालकः ॥
सुखी भक्त सुहृत् प्रेमवैश्यः सर्वशुभेङ्करः।
प्रतापी कीर्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः ॥
नारीगणमनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ।
वरीयर्यानीश्वरेश्चेति गुणास्तस्याऽनुकीर्तिताः ॥
सदास्वरूपसम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्यनूतनः ।
सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गः सर्वसिद्धिनिषेवितः ॥
अविचिन्त्यमहाशक्तिः कोटिब्रह्याण्डविग्रहः ॥
अवतारावलीबीजं हतारिगतिदायकः।
आत्मारामगणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलाद्भुताः ॥
🌸 ॥ चौंसठ गुणी भगवान् श्री कृष्ण ॥ 🌸
समस्त लोक ब्रह्मांड का कल्याण करने हेतु सगुण मूर्त्तिशिरोमणि आनन्दकन्द षोडशकलापूर्ण पूर्णावतारी भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र रूप का जन्म हुआ जो साक्षात परब्रह्म श्री हरि का अंश रूप है। श्री हरि, जिनकी पूजा सभी ब्रह्मा, शिव और इंद्र करते हैं, सभी ज्ञान के सर्वोच्च स्रोत हैं। निराकार ब्रह्म सुंदर भगवान श्री श्री राधाकांत का शारीरिक तेज है। ब्रह्मांड के निर्माता भगवान विष्णु, जो दुग्ध के पारलौकिक सागर पर लेटे हैं, श्री हरि का केवल एक अंश हैं। श्री हरि स्वयं कोई और नहीं बल्कि हमारे गुणश्रेष्ठ श्री राधावल्लभ भगवान् कृष्ण चंद्र हैं। जिनका समस्त जीवन असीमित गुणों रसों का सागर है। शाब्दिक रूप में भगवान् के भग शब्द में 6 गुण हैं। ऐश्वर्य, जप, बल, श्री, वैराग्य और यश। इनमें ज्ञान और बल प्रधान है। अन्य गुण इन्हीं दो से सम्बंधित है। ज्ञान में ऐश्वर्य और वैराग्य निहित है। बल में श्री और यश आ जाते हैं। ब्रह्म और क्षत्र इन्हीं दोनों का अपर नाम हैं। इन सभी गुणों का कृष्ण में समन्वय था इसलिए हम उन्हें भगवान् कहकर पुकारते हैं ना की ईश्वर शब्द कहा गया है। एक प्रकार से भगवान् के ये सभी गुण अनन्त हैं। उनका कोई थाह नहीं लगा सकता। कहते हैं, शेष और शारदा तथा ब्रह्मा, रुद्र इत्यादि भी उनके गुणों का वर्णन नहीं कर सकते, फिर मनुष्य की तो बात ही क्या है।
श्रीमद्भागवत में भी लिखा है-
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं
हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य।
कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पै-
र्मूपांशवः खे मिहिकाद्युभासः ॥
अर्थात् हे भगवन्! संसार के हितके लिये अवतार धारण करने वाले आपके गुणों की थाह कौन लगा सकता है? क्योंकि आप गुणरूप ही हैं। पृथिवी के रजःकणों को अथवा आकाश के नक्षत्रों को और नीहारके कणों को कोई भले ही गिन सके, परन्तु आपके गुणों की गणना कदापि नहीं हो सकती। फिर भी भक्त जनों ने अपनी-अपनी भावना के अनुसार अपने मनस्तोष के लिये तथा अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये जो गुण जिसकी समझ में आये, उन्हीं का वर्णन किया है
भगवान कृष्ण भिन्न गुण रूपों का एक अथाह भंडार थे, महाभारत में श्री कृष्ण जी के विषय में लिखा है-
वेद वेदांग विज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा।
नृणां हि लोके कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः
अर्थात आज के समुदाय में वेद वेदांग के ज्ञान तथा शारीरिक शक्ति एवं सामरिक अस्त्र-शस्त्र की कुशलता में श्री कृष्ण सबसे उत्कृष्ट हैं। कोई भी दूसरा कृष्ण के तुल्य नहीं हैं। भीष्म पितामह के मुख से कहे गए यह शब्द अक्षरतः श्री कृष्ण जी के गुणों को सिद्ध करते हैं।
श्री कृष्ण के विषय में वेदव्यास जी कहते है कि श्री कृष्ण लोभ रहित तथा स्थिर बुद्धि हैं। उन्हें सांसारिक लोगों को विचलित करने वाली कामना, भय, लोभ या स्वार्थ आदि कोई भी विचलित नहीं कर सकता, अतएव श्री कृष्ण कदापि अन्याय का अनुसरण नहीं कर सकते। इस पृथ्वी पर समस्त मनुष्यों में श्री कृष्ण ही धर्म के ज्ञाता, परम धैर्यवान और परम बुद्धिमान हैं।
यो वै कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात्।
अन्यायमनुवत्र्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः ।
धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः ।।
(महाभारत उद्योग. अ. 83)
श्रीमद्भागवत में उनकी द्वारका-लीला के संबंध में उनके छिपे हुए व्यक्तिगत स्वरूप का एक उदाहरण है । कभी-कभी भगवान कृष्ण स्त्री की तरह वस्त्र पहनकर खेलने लगते थे। इस रूप को देखकर उद्धव ने कहा, "यह कितना अद्भुत है कि यह स्त्री ठीक उसी तरह मेरे आनंदमय प्रेम को आकर्षित कर रही है, जैसे भगवान कृष्ण करते हैं। मुझे लगता है कि यह स्त्री के वस्त्र से ढकी हुई कृष्ण ही होंगी!"
15 वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित श्रीहरि भक्ति रसामृत सिन्धु में भगवान् श्रीकृष्ण के समस्त चौंसठ गुणों का बड़ा ही मधुर वर्णन किया गया है -
अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः ॥
रुचिरस्तेजसायुक्तो बलीयान् वयसाऽन्वितः ।
विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदेः ॥
वावटूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः ।
विदग्धश्चतुरो दक्षः कुनैज्ञः सुदृढ़वतः ॥
देशकोलसुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिवंशी ।
स्थिरी दान्तः क्षमोशीलो गंभीरो धृतिमान् सम:॥
बदोन्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत् ।
दक्षिणो विनयी ह्नीमान् शरणागतपालकः ॥
सुखी भक्त सुहृत् प्रेमवैश्यः सर्वशुभेङ्करः।
प्रतापी कीर्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः ॥
नारीगणमनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ।
वरीयर्यानीश्वरेश्चेति गुणास्तस्याऽनुकीर्तिताः ॥
सदास्वरूपसम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्यनूतनः ।
सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गः सर्वसिद्धिनिषेवितः ॥
अविचिन्त्यमहाशक्तिः कोटिब्रह्याण्डविग्रहः ॥
अवतारावलीबीजं हतारिगतिदायकः।
आत्मारामगणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलाद्भुताः ॥
❤6👏5🙏4👍1
#Thread
✶ किसी भी दुःख एवम् रोग की कारक संबंधित राशि जानें !
काल पुरुष अंग स्थान
﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌
जब किसी व्यक्ति के दुःख, पीड़ा, रोग को जानना होता है तब जन्म कुण्डली में राशियों की शरीर पर स्थिति क्या है? यह जानना भी जरूरी होता है। नीचे दिये गये चित्र द्वारा आप आसानी से समझ सकते हैं।
⇒ मेष राशि का मस्तक (सिर) पर अधिकार है।
⇒ वृष राशि का मुख पर अधिकार है।
⇒ मिथुन राशि का वक्ष, छाती, बाजू, श्वास की नली पर अधिकार है।
⇒ कर्क राशि का हृदय पर अधिकार है।
⇒ सिंह राशि का गर्भ एवं पेट पर अधिकार है।
⇒ कन्या राशि का कमर पर अधिकार है।
⇒ तुला राशि का मूत्र अंग पर अधिकार है।
⇒ धनु राशि का जंघा पर अधिकार है।
⇒ वृश्चिक राशि का लिंग एवं गुदा पर अधिकार है।
⇒ मकर राशि का घुटनों पर अधिकार है।
⇒ कुंभ राशि का पिंडलियों पर अधिकार है।
⇒ मीन राशि का पैरों पर अधिकार है।
✶ किसी भी दुःख एवम् रोग की कारक संबंधित राशि जानें !
काल पुरुष अंग स्थान
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जब किसी व्यक्ति के दुःख, पीड़ा, रोग को जानना होता है तब जन्म कुण्डली में राशियों की शरीर पर स्थिति क्या है? यह जानना भी जरूरी होता है। नीचे दिये गये चित्र द्वारा आप आसानी से समझ सकते हैं।
⇒ मेष राशि का मस्तक (सिर) पर अधिकार है।
⇒ वृष राशि का मुख पर अधिकार है।
⇒ मिथुन राशि का वक्ष, छाती, बाजू, श्वास की नली पर अधिकार है।
⇒ कर्क राशि का हृदय पर अधिकार है।
⇒ सिंह राशि का गर्भ एवं पेट पर अधिकार है।
⇒ कन्या राशि का कमर पर अधिकार है।
⇒ तुला राशि का मूत्र अंग पर अधिकार है।
⇒ धनु राशि का जंघा पर अधिकार है।
⇒ वृश्चिक राशि का लिंग एवं गुदा पर अधिकार है।
⇒ मकर राशि का घुटनों पर अधिकार है।
⇒ कुंभ राशि का पिंडलियों पर अधिकार है।
⇒ मीन राशि का पैरों पर अधिकार है।
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#Thread🧵
💫 सनातन संस्कृति के आश्चर्यों में से एक रहस्य -
🔺अग्नि के सर्वप्रथम आविष्कारक !
🔺वैदिक संस्कृति में अग्नि यज्ञों के प्रचलन कर्ता!
🔺 समुद्रों से प्राप्त पेट्रोल, गैस, केरोसिन के वैदिक खोजी !
विश्व के प्रथम वैज्ञानिक- अथर्वा ऋषि
༻───────§───────༺
आधुनिक काल में सबसे उच्च विश्वस्त विज्ञान विधा मानी जाती है तथा उनके शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक शब्दों से विभूषित किया जाता है, आज के अंग्रेजी भाषी वैज्ञानिकों की लंबी रेखा के बीच भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के एक वैदिक ऋषि पुरुष को विश्व का प्रथम वैज्ञानिक होने का रहस्य उद्घाटन किया जा रहा है विश्व के प्रथमतम वैज्ञानिक होने के श्रेय अथर्वा ऋषि को है। महर्षि अथर्वा ने ऋषि अंगिरस के साथ मिलकर अथर्ववेद की रचना की। महर्षि अथर्व का विवाह भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि कर्दम की पुत्री शांति 'चित्ति' के साथ हुआ। इस मिलाप से महानतम महर्षि दधीचि का जन्म हुआ। ऋग्वेद में अथर्वा ऋषि का उल्लेख १५ बार हुआ है। (ऋग्० १.८०.१६, १.८३.५, ९.११.२ आदि)। अथर्वा ऋषि ने अग्नि-विषयक तीन आविष्कार किए हैं। इनका साक्षात विशिष्ट प्रमाण तथा उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के श्लोकों में है।
💫 (१) अरणि वृक्ष के मंथन से अग्नि का आविष्कार (Fire with Friction) —
संसार के सभी काम अग्नि से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से चलते हैं। यजुर्वेद का भी कथन है कि विद्वानों ने अग्नि को उपयोगिता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान दिया है। ऋग्वेद ने अग्नि को ऊर्जा का सम्राट् कहा है।
(क) अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठः।
(यजु० ३.१५)
(ख) त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजम्०।
(ऋग्० ३.१०.१)
ऋग्वेद में अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न करने का वर्णन है। ऋग्वेद में कहा है कि अरणि नामक वृक्ष की समिधाओं में अग्नि है। दो अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है।
(क) अरण्योर्निहितो जातवेदाः।
(ऋग्० ३.२९.२)
(ख) नवं जनिष्टारणी।
(ऋग्०५.९.३)
(ग) अग्निं मन्थाम पूर्वथा।
(ऋग्० ३.२९.१)
अथर्वा ऋषि ने सर्वप्रथम अरणि नामक वृक्ष की लकड़ियों को रगड़ कर अग्नि का अविष्कार किया ऋग्वेद और यजुर्वेद में इसका विस्तृत उल्लेख है। यजुर्वेद का कथन है कि अथर्वा ऋषि ने मन्थन (घर्षण, Friction) के द्वारा अग्नि उत्पन्न की। यज्ञ में इस अग्नि का प्रयोग सर्वप्रथम अथर्वा के पुत्र दधीचि ऋषि ने किया ।
(क) अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्यद् अग्ने।
(यजु० ११.३२)
(ख) तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्र ईधे अथर्वणः।
(यजु० ११.३३)
💫 (२) जल के मन्थन से अग्नि (Hydroelectric, Hydel) —
महान दधीचि पितृ अथर्वा ऋषि का द्वितीय अविष्कार है जलीय विद्युत् । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और तैत्तिरीय संहिता में उल्लेख है कि अथर्वा ऋषि ने तालाब के जल से मन्थन (Friction) के द्वारा जलीय विद्युत् (Hydel) का आविष्कार किया था ।
त्वामग्ने पुष्करादधि-अथर्वा निरमन्बत।
(ऋग्० ६.१६.१३ । यजु० ११.३२ । साम० ९। तैत्ति० ३.५.११.३)
💫 (३) भूगर्भीय अग्नि (पुरीष्य अग्नि, Oil and Natural Gas) —
भूगर्भीय अग्नि (Gas) का पता चलाना और उसे उत्खनन द्वारा निकालना, अथर्वा ऋषि का तृतीय अविष्कार है। इसका विस्तृत वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और तैत्तिरीय संहिता में मिलता है। ऋग्वेद आदि में 'पुरीष्यासो अग्नयः' शब्द का प्रयोग है। साथ ही इसे पृथ्वी एवं समुद्र से खोदकर निकालने का उल्लेख है। भूगर्भीय अग्नि का बहुवचन में उल्लेख सिद्ध करता है कि पुरीष्य अग्नि शब्द के द्वारा भूगर्भीय प्रज्वलनशील सभी पदार्थों, पेट्रोल, गैस, किरोसिन तेल (मिट्टी का तेल) आदि का ग्रहण है। यजुर्वेद में मंत्रों (यजु० ११.२८ से ३२) में इसकी उच्च प्रज्वलनशीलता का विस्तृत वर्णन है।
(क) पुरीष्योऽसि विश्वभरा अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने।
(यजु०११.३२)
(ख) पृथिव्याः सधस्थाद् अग्निं पुरीष्यम्.. खनामः।
(यजु०११.२८)
(ग) अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रम् अभितः पिन्वमानम्।
(यजु०११.२९)
(घ) अग्निमन्तर्भरिष्यन्ती ज्योतिष्मन्तम् अजस्रमित् ।
(यजु०११.३१)
(ङ) पुरीष्यासो अग्नयः ।
(ऋग्० ३.२२.४, यजु० १२.५०, तैति० ४.२४३)
यजुर्वेद के मंत्र में 'योनिरग्नेः' से स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नि के कारण अत्यन्त प्रज्वलनशील पदार्थ हैं। 'समुद्रम् अभितः' के द्वारा स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नियाँ (गैस, पेट्रोल आदि) समुद्रों के बहुत विस्तृत भाग में फैली हुई हैं।
यजुर्वेद में 'पुरीष्योऽसि विश्वभरा' के द्वारा उल्लेख है कि भूगर्भीय पेट्रोल, गैस आदि विश्व के लिए अत्यन्त उपयोगी है और ये संसार का पालन-पोषण करते हैं।
💫जयतु सनातन💫
💫 सनातन संस्कृति के आश्चर्यों में से एक रहस्य -
🔺अग्नि के सर्वप्रथम आविष्कारक !
🔺वैदिक संस्कृति में अग्नि यज्ञों के प्रचलन कर्ता!
🔺 समुद्रों से प्राप्त पेट्रोल, गैस, केरोसिन के वैदिक खोजी !
विश्व के प्रथम वैज्ञानिक- अथर्वा ऋषि
༻───────§───────༺
आधुनिक काल में सबसे उच्च विश्वस्त विज्ञान विधा मानी जाती है तथा उनके शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक शब्दों से विभूषित किया जाता है, आज के अंग्रेजी भाषी वैज्ञानिकों की लंबी रेखा के बीच भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के एक वैदिक ऋषि पुरुष को विश्व का प्रथम वैज्ञानिक होने का रहस्य उद्घाटन किया जा रहा है विश्व के प्रथमतम वैज्ञानिक होने के श्रेय अथर्वा ऋषि को है। महर्षि अथर्वा ने ऋषि अंगिरस के साथ मिलकर अथर्ववेद की रचना की। महर्षि अथर्व का विवाह भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि कर्दम की पुत्री शांति 'चित्ति' के साथ हुआ। इस मिलाप से महानतम महर्षि दधीचि का जन्म हुआ। ऋग्वेद में अथर्वा ऋषि का उल्लेख १५ बार हुआ है। (ऋग्० १.८०.१६, १.८३.५, ९.११.२ आदि)। अथर्वा ऋषि ने अग्नि-विषयक तीन आविष्कार किए हैं। इनका साक्षात विशिष्ट प्रमाण तथा उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के श्लोकों में है।
💫 (१) अरणि वृक्ष के मंथन से अग्नि का आविष्कार (Fire with Friction) —
संसार के सभी काम अग्नि से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से चलते हैं। यजुर्वेद का भी कथन है कि विद्वानों ने अग्नि को उपयोगिता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान दिया है। ऋग्वेद ने अग्नि को ऊर्जा का सम्राट् कहा है।
(क) अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठः।
(यजु० ३.१५)
(ख) त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजम्०।
(ऋग्० ३.१०.१)
ऋग्वेद में अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न करने का वर्णन है। ऋग्वेद में कहा है कि अरणि नामक वृक्ष की समिधाओं में अग्नि है। दो अरणियों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है।
(क) अरण्योर्निहितो जातवेदाः।
(ऋग्० ३.२९.२)
(ख) नवं जनिष्टारणी।
(ऋग्०५.९.३)
(ग) अग्निं मन्थाम पूर्वथा।
(ऋग्० ३.२९.१)
अथर्वा ऋषि ने सर्वप्रथम अरणि नामक वृक्ष की लकड़ियों को रगड़ कर अग्नि का अविष्कार किया ऋग्वेद और यजुर्वेद में इसका विस्तृत उल्लेख है। यजुर्वेद का कथन है कि अथर्वा ऋषि ने मन्थन (घर्षण, Friction) के द्वारा अग्नि उत्पन्न की। यज्ञ में इस अग्नि का प्रयोग सर्वप्रथम अथर्वा के पुत्र दधीचि ऋषि ने किया ।
(क) अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्यद् अग्ने।
(यजु० ११.३२)
(ख) तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्र ईधे अथर्वणः।
(यजु० ११.३३)
💫 (२) जल के मन्थन से अग्नि (Hydroelectric, Hydel) —
महान दधीचि पितृ अथर्वा ऋषि का द्वितीय अविष्कार है जलीय विद्युत् । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और तैत्तिरीय संहिता में उल्लेख है कि अथर्वा ऋषि ने तालाब के जल से मन्थन (Friction) के द्वारा जलीय विद्युत् (Hydel) का आविष्कार किया था ।
त्वामग्ने पुष्करादधि-अथर्वा निरमन्बत।
(ऋग्० ६.१६.१३ । यजु० ११.३२ । साम० ९। तैत्ति० ३.५.११.३)
💫 (३) भूगर्भीय अग्नि (पुरीष्य अग्नि, Oil and Natural Gas) —
भूगर्भीय अग्नि (Gas) का पता चलाना और उसे उत्खनन द्वारा निकालना, अथर्वा ऋषि का तृतीय अविष्कार है। इसका विस्तृत वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और तैत्तिरीय संहिता में मिलता है। ऋग्वेद आदि में 'पुरीष्यासो अग्नयः' शब्द का प्रयोग है। साथ ही इसे पृथ्वी एवं समुद्र से खोदकर निकालने का उल्लेख है। भूगर्भीय अग्नि का बहुवचन में उल्लेख सिद्ध करता है कि पुरीष्य अग्नि शब्द के द्वारा भूगर्भीय प्रज्वलनशील सभी पदार्थों, पेट्रोल, गैस, किरोसिन तेल (मिट्टी का तेल) आदि का ग्रहण है। यजुर्वेद में मंत्रों (यजु० ११.२८ से ३२) में इसकी उच्च प्रज्वलनशीलता का विस्तृत वर्णन है।
(क) पुरीष्योऽसि विश्वभरा अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने।
(यजु०११.३२)
(ख) पृथिव्याः सधस्थाद् अग्निं पुरीष्यम्.. खनामः।
(यजु०११.२८)
(ग) अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रम् अभितः पिन्वमानम्।
(यजु०११.२९)
(घ) अग्निमन्तर्भरिष्यन्ती ज्योतिष्मन्तम् अजस्रमित् ।
(यजु०११.३१)
(ङ) पुरीष्यासो अग्नयः ।
(ऋग्० ३.२२.४, यजु० १२.५०, तैति० ४.२४३)
यजुर्वेद के मंत्र में 'योनिरग्नेः' से स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नि के कारण अत्यन्त प्रज्वलनशील पदार्थ हैं। 'समुद्रम् अभितः' के द्वारा स्पष्ट किया गया है कि ये अग्नियाँ (गैस, पेट्रोल आदि) समुद्रों के बहुत विस्तृत भाग में फैली हुई हैं।
यजुर्वेद में 'पुरीष्योऽसि विश्वभरा' के द्वारा उल्लेख है कि भूगर्भीय पेट्रोल, गैस आदि विश्व के लिए अत्यन्त उपयोगी है और ये संसार का पालन-पोषण करते हैं।
💫जयतु सनातन💫
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➤ आपके पैरों के आकार प्रकार आपके लिए शुभ है या अशुभ ??
➤ जानिए आपके आपके पैरों का संपूर्ण शास्त्रीय फलादेश !!
#Thread
✧ मनुष्य के पैर - संपूर्ण लक्षण विचार ✧
﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌﹌
✧ पैर (चरण) --
प्राचीन शास्त्रकारों ने पैर के २० भेद बताए है, परन्तु उन सबको निम्नलिखित ४ श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
(१) सर्वोत्तम
(२) उत्तम
(३) मध्यम
(४) अधम
(५) निकृष्ट
(१) सर्वोत्तम --
इस श्रेणी के पैर वे होते हैं, जिनका रंग कमल के समान लाल होता है, तलवे कोमल होते हैं, नाबूनों का रंग तांबे के समान रक्ताभ होता है, उंगलियां परस्पर सटी हुई होती है तथा उनका ऊपरी भाग कछुए की पीठ की भांति उन्नत होता है, जिस पर नसें दिखाई नहीं देती। ऐसे पैरों के तलवों में पसीना नहीं आता, ग्रुल्फ छिपे रहते है, एड़ियां सुन्दर होती है तथा ऊपरी भाग में उष्णता बनी रहती है। ऐसे पैर वाले व्यवित राजा-महाराजा, विपुल ऐश्वर्यवान, धनवान गुणवानरु, यशस्वी, सौभाग्यशाली, दीर्घायु तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष होते है। इसकी सभी आकांक्षाएं पूर्ण होती रहती हैं ।
(२) उत्तम --
इस श्रेणी के पैर सर्वोत्तम कोटि से कुछ ही कम होते हैं। इनकी उंगलियां लम्बी तथा परस्पर मिली हुई, नाखून सामान्यतः लम्बे तथा त्वचा स्पर्श में कोमल होती है। शेष सभी गुण पूर्वोक्त प्रकार के ही समझने चाहिए। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति नीतिज्ञ, कार्यकुशल, तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी सलाह देने वाले, साहित्य-प्रेमी, यशस्वी, धनी, यात्राप्रिय, तथा सर्वत्र सम्मान एवं सुख प्राप्त करने वाले होते हैं ।
(३) मध्यम --
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कोमल तथा गेहूए रंग के, नाखून सर्पाकार तथा हल्के गुलावी गेरुआ अथवा पीले रंग के होते हैं । उन पर नसे सामान्य रूप से उभरी होती है तथा उगलियों पर बहुत ही सामान्य बाल होते है ।
ऐसे पैरों वाले व्यक्ति परिश्रमो, व्यवहार-कुशल, निर्भीक, दूरदर्शी, विद्वान, गणित अथवा विज्ञान में रुचि रखने वाले, साहित्यिक, पारिवारिक-चिन्ताग्रों से ग्रस्त तथा एक सीमित-क्षेत्र में यश-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं । उंगलियां कुछ मिली तथा कुछ छितरी हुईं होती हैं |
(४) अधम--
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कुछ-कुछ भूरापन लिए हुए श्वेत रंग के होते है, त्वचा स्पर्श मे कठोर, रूखी, तथा ठण्डी होती है । इनके भाग पर पसीना आता है। उंगलियां चौड़ी होती है और उनके ऊपर बाल जमे रहते है। नाखून चपटे, लम्बे अथवा अधिक चौड़े होते हैं । गुल्फ वाहर की ओर निकला रहता है । नाखूनों का रंग पीला अथवा सफेद होता है। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति अपने कुल के अ्भिमान में डूबे रहने वाले, विद्याओं के विशेष-प्रेमी, परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति की इच्छा रखने वाले, कामुक-प्रवृति के तथा दरिद्री होते है ।
(५) निकृष्ट --
इस श्रेणी के पैरों के तलवों का रंग मिट्टी जैसे रंग का होता है। एड़ी मोटी तथा स्थान-स्थान पर फटी हुई, त्वचा स्पर्श में कठोर, ऊपरी भाग पर नसें उभरी हुई । उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी तथा उनके ऊपर अधिक बाल जमे हुए, गुल्फ बाहर की ओर काफी निकले का नाखून छोटे, चपटे और कालापन अथवा नीलापन लिए हुए रहते हैं। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति दरिद्री, बीमारियों से ग्रस्त रहने वाले, दासवृत्ति के, लम्बे समय तक अपने घर से दूर रहने वाले, मिथ्याभिमानी, क्रोधी, निश्चिन्त, गंवार, मूर्ख तथा कुसंगति मे रहने वाले होते है ।
स्कन्द पुराण में लिखा है --
“पादौ समांसलौ रक्तौ समौ सूत्मों सुशोमनौ।
समगुल्फौ स्वेदहीनौ स्निग्ध वैश्वर्य सूचकौ।”
अर्थात मांसल, रकताभ, सुन्दर, समान ग्रुल्फ वाले, स्वेद-हीन, स्निग्ध तथा छोटे पैर ऐश्वर्य के सूचक होते है।
परन्तु अन्य ग्रन्थ में लिखा है --
“विशाल चरणों धनी”
अर्थात बड़े पैरोंवाला व्यक्ति धनी होता है।
अधिकांश विद्वानों के मत से पैर का छोटा होना शुभ लक्षण नहीं है। अब यहां पर विचार करने की बात यह रह जाती है कि पैर छोटा या बड़ा इसका निश्चय कैसे किया जाए ?
शरीर के अनुपात से पैर का छोटा-बड़ा आकार ज्ञात करने का तरीका शास्त्रकारों ने यह बताया है -
"आपार्ष्णि ज्येष्ठान्तं तल्लमत्र चतुर्दशांगुलायाम।
विस्तारेण षङ्गगुल मंगुष्ठो व्यङ्गुलायामः॥
पञचांगुल परिणाहः पादोनं तन्न खोऽङ्गुलं दैध् र्यात ।
अङ्गुष्ठ समा ज्येष्ठा मध्या तत्षोडशांशोना ॥
अष्ठांशोनानामा कनिष्ठिका पष्ठभाग परिहीना।
सर्वासाप्याप्तां नखा: स्वपर्व त्रिभाग मिताः ॥
सत्र्यंगुलि परिणाहा प्रथमाङ्गगुली विस्तृताङ्गगलौ भवति।
अप्टाष्ट भागहीनाः शेषा: क्रमशः परिज्ञेया:॥”
भावार्थ-- पैर की एड़ी से पैर की तर्जनी उंगली तक पैर की लम्बाई चौदह उंगल होनी चाहिए। लम्बाई के अंगुल का परिमाण यह है कि जिस व्यक्ति का पैर हो, उसी के हाथ की मध्यमा उंगली के द्वितीय अर्थात् बीच वाले पर्व की जितनी चौड़ाई हो, उसे एक अंगुल के बराबर मानना चाहिए। इसी अनुपात से पैर की चौड़ाई ६ अंगुल, पैर के अंगूठे की लम्बाई
➤ जानिए आपके आपके पैरों का संपूर्ण शास्त्रीय फलादेश !!
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✧ पैर (चरण) --
प्राचीन शास्त्रकारों ने पैर के २० भेद बताए है, परन्तु उन सबको निम्नलिखित ४ श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
(१) सर्वोत्तम
(२) उत्तम
(३) मध्यम
(४) अधम
(५) निकृष्ट
(१) सर्वोत्तम --
इस श्रेणी के पैर वे होते हैं, जिनका रंग कमल के समान लाल होता है, तलवे कोमल होते हैं, नाबूनों का रंग तांबे के समान रक्ताभ होता है, उंगलियां परस्पर सटी हुई होती है तथा उनका ऊपरी भाग कछुए की पीठ की भांति उन्नत होता है, जिस पर नसें दिखाई नहीं देती। ऐसे पैरों के तलवों में पसीना नहीं आता, ग्रुल्फ छिपे रहते है, एड़ियां सुन्दर होती है तथा ऊपरी भाग में उष्णता बनी रहती है। ऐसे पैर वाले व्यवित राजा-महाराजा, विपुल ऐश्वर्यवान, धनवान गुणवानरु, यशस्वी, सौभाग्यशाली, दीर्घायु तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष होते है। इसकी सभी आकांक्षाएं पूर्ण होती रहती हैं ।
(२) उत्तम --
इस श्रेणी के पैर सर्वोत्तम कोटि से कुछ ही कम होते हैं। इनकी उंगलियां लम्बी तथा परस्पर मिली हुई, नाखून सामान्यतः लम्बे तथा त्वचा स्पर्श में कोमल होती है। शेष सभी गुण पूर्वोक्त प्रकार के ही समझने चाहिए। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति नीतिज्ञ, कार्यकुशल, तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी सलाह देने वाले, साहित्य-प्रेमी, यशस्वी, धनी, यात्राप्रिय, तथा सर्वत्र सम्मान एवं सुख प्राप्त करने वाले होते हैं ।
(३) मध्यम --
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कोमल तथा गेहूए रंग के, नाखून सर्पाकार तथा हल्के गुलावी गेरुआ अथवा पीले रंग के होते हैं । उन पर नसे सामान्य रूप से उभरी होती है तथा उगलियों पर बहुत ही सामान्य बाल होते है ।
ऐसे पैरों वाले व्यक्ति परिश्रमो, व्यवहार-कुशल, निर्भीक, दूरदर्शी, विद्वान, गणित अथवा विज्ञान में रुचि रखने वाले, साहित्यिक, पारिवारिक-चिन्ताग्रों से ग्रस्त तथा एक सीमित-क्षेत्र में यश-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं । उंगलियां कुछ मिली तथा कुछ छितरी हुईं होती हैं |
(४) अधम--
इस श्रेणी के पैरों के तलवे कुछ-कुछ भूरापन लिए हुए श्वेत रंग के होते है, त्वचा स्पर्श मे कठोर, रूखी, तथा ठण्डी होती है । इनके भाग पर पसीना आता है। उंगलियां चौड़ी होती है और उनके ऊपर बाल जमे रहते है। नाखून चपटे, लम्बे अथवा अधिक चौड़े होते हैं । गुल्फ वाहर की ओर निकला रहता है । नाखूनों का रंग पीला अथवा सफेद होता है। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति अपने कुल के अ्भिमान में डूबे रहने वाले, विद्याओं के विशेष-प्रेमी, परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति की इच्छा रखने वाले, कामुक-प्रवृति के तथा दरिद्री होते है ।
(५) निकृष्ट --
इस श्रेणी के पैरों के तलवों का रंग मिट्टी जैसे रंग का होता है। एड़ी मोटी तथा स्थान-स्थान पर फटी हुई, त्वचा स्पर्श में कठोर, ऊपरी भाग पर नसें उभरी हुई । उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी तथा उनके ऊपर अधिक बाल जमे हुए, गुल्फ बाहर की ओर काफी निकले का नाखून छोटे, चपटे और कालापन अथवा नीलापन लिए हुए रहते हैं। ऐसे पैरों वाले व्यक्ति दरिद्री, बीमारियों से ग्रस्त रहने वाले, दासवृत्ति के, लम्बे समय तक अपने घर से दूर रहने वाले, मिथ्याभिमानी, क्रोधी, निश्चिन्त, गंवार, मूर्ख तथा कुसंगति मे रहने वाले होते है ।
स्कन्द पुराण में लिखा है --
“पादौ समांसलौ रक्तौ समौ सूत्मों सुशोमनौ।
समगुल्फौ स्वेदहीनौ स्निग्ध वैश्वर्य सूचकौ।”
अर्थात मांसल, रकताभ, सुन्दर, समान ग्रुल्फ वाले, स्वेद-हीन, स्निग्ध तथा छोटे पैर ऐश्वर्य के सूचक होते है।
परन्तु अन्य ग्रन्थ में लिखा है --
“विशाल चरणों धनी”
अर्थात बड़े पैरोंवाला व्यक्ति धनी होता है।
अधिकांश विद्वानों के मत से पैर का छोटा होना शुभ लक्षण नहीं है। अब यहां पर विचार करने की बात यह रह जाती है कि पैर छोटा या बड़ा इसका निश्चय कैसे किया जाए ?
शरीर के अनुपात से पैर का छोटा-बड़ा आकार ज्ञात करने का तरीका शास्त्रकारों ने यह बताया है -
"आपार्ष्णि ज्येष्ठान्तं तल्लमत्र चतुर्दशांगुलायाम।
विस्तारेण षङ्गगुल मंगुष्ठो व्यङ्गुलायामः॥
पञचांगुल परिणाहः पादोनं तन्न खोऽङ्गुलं दैध् र्यात ।
अङ्गुष्ठ समा ज्येष्ठा मध्या तत्षोडशांशोना ॥
अष्ठांशोनानामा कनिष्ठिका पष्ठभाग परिहीना।
सर्वासाप्याप्तां नखा: स्वपर्व त्रिभाग मिताः ॥
सत्र्यंगुलि परिणाहा प्रथमाङ्गगुली विस्तृताङ्गगलौ भवति।
अप्टाष्ट भागहीनाः शेषा: क्रमशः परिज्ञेया:॥”
भावार्थ-- पैर की एड़ी से पैर की तर्जनी उंगली तक पैर की लम्बाई चौदह उंगल होनी चाहिए। लम्बाई के अंगुल का परिमाण यह है कि जिस व्यक्ति का पैर हो, उसी के हाथ की मध्यमा उंगली के द्वितीय अर्थात् बीच वाले पर्व की जितनी चौड़ाई हो, उसे एक अंगुल के बराबर मानना चाहिए। इसी अनुपात से पैर की चौड़ाई ६ अंगुल, पैर के अंगूठे की लम्बाई
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🧵 पूजा में कलश स्थापन का महत्व तथा
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व #Thread
🔹 कलश का सरल अर्थ है जल से भरा हुवा सुशोभित पात्र है। हिंदू धर्म में सभी मांगलिक कार्यों में कलश स्थापित करने का विशेष महत्व माना गया हैं।
हिंदू संस्कृति में कलश को एक विशेष आकार के पात्र को कहा जाता हैं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु, मध्य में भगवान शिव और मूल में ब्रह्माजी का निवास होता है। इसलिए पूजन में कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर कलश स्थापित किया जाता है। हिंदू धर्म में कलश को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विभिन्न धार्मिक कार्यों एवं गृहप्रवेश इत्यादि शुभ कार्यों में कार्य की शुभता में वृद्धि एवं मंगल कामनाके उद्देश्य से पूजन के दोरान कलश स्थापित किया जाता है।
🔹कलश में प्रयुक्त होने वाली सामग्री
हिंदू शास्त्रों में उल्लेख हैं की कलश को बिना जल के स्थापित करना अशुभ होता है। इसीलिए कलश को हमेशा पानी इत्यादि सामग्री से भर कर रखना चाहिए। प्राय कलश में जल, पान के पत्ते, अक्षत, कुमकुम, केसर, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, श्रीफल, अनाज इत्यादि का उपयोग पूजन हेतु किया जाता हैं। विभिन्न पूजन हेतु जल के साथ भिन्न सामग्रीयों का प्रयोग किया जाता है।
🔹कलश का पवित्र जल मनुष्य के मन को स्वच्छ, निर्मल एवं शीतल बनाएं रखने का प्रतिक माना गया हैं। कलश पर स्वस्तिक चिह्न बनाने का प्रतिक को शास्त्रों में स्वस्तिक ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। स्वस्तिक को भगवान श्री गणेश का साकार रूप है। मान्त्यता हैं, कि स्वस्तिक के मध्य भाग को भगवान विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में प्रकट करने की भावना मानी जाती हैं।
🔹कलश के ऊपर श्रीफल स्थापित करना भगवान श्री गणेश का प्रतीक माना जाता है। कलश में सुपारी, पुष्प, दुर्वा इत्यादि आदि सामग्री मनुष्य की जीवन शक्ति का प्रतिक माना जाता हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व🧵
🔹नारियल शुभता का सूचक होने के कारण ही इसे "श्रीफल" कहा जाता हैं। श्रीफल का महत्व अत्याधिक एवं सर्वत्र रहा हैं। श्रीफल को हिंदी में नारियल, खोपरा, गरी, गोला आदि नाम से जाना जाता हैं, इस मराठी में नारळ, गुजराती में नारियर, श्रीफल, नारियेळ, बंगाली में, नारिकेल, डाबेर नारकेल, पयोधर, कन्नड में तेंगिनकायि, तेंगिन, कोब्बरि, तेंगिनकायिय मलयालम में नाळिकेर, वेळिच्चेण्ण, तेण्णा, नेपालि में नरिवल, नरिवलको तमिल में तैकाय, तेन्नै, तेनकु, तेलुगु कोब्बरि, आदि नामों से जाना जाता हैं।
🔹नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता हैं। हिंदू धर्म में सभी प्रकार के धार्मिक एवं मांगलिक कार्यों में श्रीफल अर्थात नारियल का विशेष महत्व पौराणिक काल से ही रहा है। हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुशार जब किसी नये कार्या या शुभ कार्य का प्रारंभ या शुभारंभ करना हो तो देवी-देवता के सम्मुख श्रीफल अर्पण करने और उसे फोड़ने का विशेष महत्व रहा है।
🔹यहि कारण हैं की सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों में अन्य पूजन सामग्रीयों के साथ में श्रीफल भी विशेष रुप से होता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुशार श्रीफल का उपयोग बलि कर्म के प्रतिक के रुप में भी किया जाता हैं। बलि कर्म अर्थात उपहार अथवा नैवेद्य की वस्तु। देवी-देवताओंको बलि अर्पण करने का तत्पर्य होता हैं उनकी विशेष कृपा प्राप्त करना या उनकी द्वारा प्राप्त हुई कृपा के प्रति कृतज्ञता अर्थात आभार व्यक्त करना।
🔹 श्रीफल को मनुष्य के मस्तक का प्रतिक मान कर बलि स्वरुप चढ़ाया जाता हैं। श्रीफल की जटा को मनुष्य के बाल, श्रीफल की जटा के निकट दिखने वाले तीन गोलाकार चिह्नों को को मनुष्य की आंखों एवं नाक, श्रीफल के कठोर कवच को मनुष्य की खोपड़ी, श्रीफल के पानी को मनुष्य के खून, श्रीफल के गूदे को मनुष्य का दिमाग माना जाता है।
🔹 श्रीफल फोड़ने का महत्व
श्रीफल फोड़ने मुख्य उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को दूर कर और स्वयं को भगवान समर्पित करने की भावना हैं। मान्यता हैं कि ऐसा करने पर मनुष्य की अज्ञानता एवं अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और यह आत्म शुद्धि और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के गूदे वाले सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है। श्रीफल को देवी-देवता को आर्पभ कर उसका प्रसाद बॉटने की प्रथा हिंदू संस्कृति में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। विद्वानों को मतानुशार श्रीफल के पानी को पीने से मनुष्य को अत्यधिक सुख एवं संतुष्टि की अनुभूति होती हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व #Thread
🔹 कलश का सरल अर्थ है जल से भरा हुवा सुशोभित पात्र है। हिंदू धर्म में सभी मांगलिक कार्यों में कलश स्थापित करने का विशेष महत्व माना गया हैं।
हिंदू संस्कृति में कलश को एक विशेष आकार के पात्र को कहा जाता हैं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु, मध्य में भगवान शिव और मूल में ब्रह्माजी का निवास होता है। इसलिए पूजन में कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर कलश स्थापित किया जाता है। हिंदू धर्म में कलश को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विभिन्न धार्मिक कार्यों एवं गृहप्रवेश इत्यादि शुभ कार्यों में कार्य की शुभता में वृद्धि एवं मंगल कामनाके उद्देश्य से पूजन के दोरान कलश स्थापित किया जाता है।
🔹कलश में प्रयुक्त होने वाली सामग्री
हिंदू शास्त्रों में उल्लेख हैं की कलश को बिना जल के स्थापित करना अशुभ होता है। इसीलिए कलश को हमेशा पानी इत्यादि सामग्री से भर कर रखना चाहिए। प्राय कलश में जल, पान के पत्ते, अक्षत, कुमकुम, केसर, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, श्रीफल, अनाज इत्यादि का उपयोग पूजन हेतु किया जाता हैं। विभिन्न पूजन हेतु जल के साथ भिन्न सामग्रीयों का प्रयोग किया जाता है।
🔹कलश का पवित्र जल मनुष्य के मन को स्वच्छ, निर्मल एवं शीतल बनाएं रखने का प्रतिक माना गया हैं। कलश पर स्वस्तिक चिह्न बनाने का प्रतिक को शास्त्रों में स्वस्तिक ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। स्वस्तिक को भगवान श्री गणेश का साकार रूप है। मान्त्यता हैं, कि स्वस्तिक के मध्य भाग को भगवान विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में प्रकट करने की भावना मानी जाती हैं।
🔹कलश के ऊपर श्रीफल स्थापित करना भगवान श्री गणेश का प्रतीक माना जाता है। कलश में सुपारी, पुष्प, दुर्वा इत्यादि आदि सामग्री मनुष्य की जीवन शक्ति का प्रतिक माना जाता हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व🧵
🔹नारियल शुभता का सूचक होने के कारण ही इसे "श्रीफल" कहा जाता हैं। श्रीफल का महत्व अत्याधिक एवं सर्वत्र रहा हैं। श्रीफल को हिंदी में नारियल, खोपरा, गरी, गोला आदि नाम से जाना जाता हैं, इस मराठी में नारळ, गुजराती में नारियर, श्रीफल, नारियेळ, बंगाली में, नारिकेल, डाबेर नारकेल, पयोधर, कन्नड में तेंगिनकायि, तेंगिन, कोब्बरि, तेंगिनकायिय मलयालम में नाळिकेर, वेळिच्चेण्ण, तेण्णा, नेपालि में नरिवल, नरिवलको तमिल में तैकाय, तेन्नै, तेनकु, तेलुगु कोब्बरि, आदि नामों से जाना जाता हैं।
🔹नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता हैं। हिंदू धर्म में सभी प्रकार के धार्मिक एवं मांगलिक कार्यों में श्रीफल अर्थात नारियल का विशेष महत्व पौराणिक काल से ही रहा है। हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुशार जब किसी नये कार्या या शुभ कार्य का प्रारंभ या शुभारंभ करना हो तो देवी-देवता के सम्मुख श्रीफल अर्पण करने और उसे फोड़ने का विशेष महत्व रहा है।
🔹यहि कारण हैं की सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों में अन्य पूजन सामग्रीयों के साथ में श्रीफल भी विशेष रुप से होता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुशार श्रीफल का उपयोग बलि कर्म के प्रतिक के रुप में भी किया जाता हैं। बलि कर्म अर्थात उपहार अथवा नैवेद्य की वस्तु। देवी-देवताओंको बलि अर्पण करने का तत्पर्य होता हैं उनकी विशेष कृपा प्राप्त करना या उनकी द्वारा प्राप्त हुई कृपा के प्रति कृतज्ञता अर्थात आभार व्यक्त करना।
🔹 श्रीफल को मनुष्य के मस्तक का प्रतिक मान कर बलि स्वरुप चढ़ाया जाता हैं। श्रीफल की जटा को मनुष्य के बाल, श्रीफल की जटा के निकट दिखने वाले तीन गोलाकार चिह्नों को को मनुष्य की आंखों एवं नाक, श्रीफल के कठोर कवच को मनुष्य की खोपड़ी, श्रीफल के पानी को मनुष्य के खून, श्रीफल के गूदे को मनुष्य का दिमाग माना जाता है।
🔹 श्रीफल फोड़ने का महत्व
श्रीफल फोड़ने मुख्य उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को दूर कर और स्वयं को भगवान समर्पित करने की भावना हैं। मान्यता हैं कि ऐसा करने पर मनुष्य की अज्ञानता एवं अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और यह आत्म शुद्धि और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के गूदे वाले सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है। श्रीफल को देवी-देवता को आर्पभ कर उसका प्रसाद बॉटने की प्रथा हिंदू संस्कृति में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। विद्वानों को मतानुशार श्रीफल के पानी को पीने से मनुष्य को अत्यधिक सुख एवं संतुष्टि की अनुभूति होती हैं।
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🔺 श्री हरि नारायण को सर्वाधिक प्रिय कार्तिक मास का अलौकिक वेदोक्त वर्णन ⁉️
🔺 कार्तिक मास की सर्वोपयुक्त व्रत विधि ⁉️
🔺 कार्तिक मास में वेदानुसार किन-किन पदार्थों का त्याज्य कर दें ⁉️
🔺 कार्तिक मास के लिए कितने प्रकार के महात्म्य बताए गए हैं ⁉️
🛑 विशेष ➺ कार्तिक मास स्नान की संपूर्ण विधि व्याख्या अवश्य पढ़ें।
#Thread 🧵
।। कार्तिक मास ।।
🪷━━━༻❁༺━━━🪷
सत्य सनातन धर्म में कार्तिक मास की महत्ता अति श्रेष्ठ मानी गई है। सभी बारह मासों में मार्गशीर्ष मास को अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है, उससे भी अधिक पुण्य देने वाला वैशाख मास कहा गया है, प्रयाग में माघ मास का अधिक महत्व है तथा इससे भी महान तथा अधिक फलदायी कार्तिक मास को कहा गया है, जब ब्रह्मा जी ने एक तरफ सभी प्रकार के दान, व्रत तथा नियम रखे और दूसरी ओर कार्तिक का स्नान रखकर तौला तो कार्तिक स्नान का पलड़ा ही भारी पाया।
सूर्य भगवान जब तुला राशि पर आते है तो कार्तिक मास का प्रारम्भ होता है इस मास का माहत्म्य पद्मपुराण तथा स्कन्दपुराण में विस्तार पूर्वक मिलता है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है इस मास को धर्म, अर्थ काम और मोक्ष को देने वाला बताया गया है नारायण भगवान ने स्वयं इसे ब्रम्हा को, ब्रम्हा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण सम्पन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है।
कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।
कार्तिक मास से श्रेष्ठ कोई अन्य मास नहीं,
सतयुग के समान कोई अन्य युग नहीं।
वेद के समान कोई अन्य शास्त्र नहीं और
गंगाजी के समान कोई और तीर्थ नहीं है।
भगवान नारायण के शयन और प्रबोधन से चातुर्मास्य का प्रारम्भ और समापन होता है उत्तरायण को देवकाल और दक्षिणायन को आसुरिकाल माना जाता है दक्षिणायन में सत्गुणों के क्षरण से बचने और बचाने के लिए हमारे शास्त्रों में व्रत और तप का विधान है सूर्य का कर्क राशि पर आगमन दक्षिणायन का प्रारम्भ माना जाता है और कातिक मास इस अवधि में ही होता है पुराण आदि शास्त्रों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है यूँ तो हर मास का अलग अलग महत्व है परन्तु व्रत, तप की दृष्टि से कार्तिक मास की महता अधिक है शास्त्रों में भगवान विष्णु और विष्णु तीर्थ के ही समान कर्तिक् मास को श्रेष्ट और दुर्लभ कहा गया है शास्त्रों में ये मास परम कल्याणकारी कहा गया है।
कार्तिक मास के व्रत नियम
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कार्तिक मास में जो भी व्रत आदि रखता है उसे सदा एक पहर रात बचते ही उठ जाना चाहिए फिर स्तोत्र आदि के द्वारा अपने इष्ट देव की स्तुति करते हुए दिन के बाकी कामों को करना चाहिए। गाँव अथवा नगर के अनुसार दैनिक कर्म मल-मूत्र त्याग आदि कर उत्तर की ओर मुँह करके बैठना चाहिए। इसके साथ ही दाँत व जिह्वा की शुद्धि के लिए वृक्ष के समीप जाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए -
आयुर्बल यशो वर्च: प्रजा पशुवसूनि च ।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेघां च त्वं नो देहि वनस्पते ।।
अर्थात हे वनस्पति! आप मुझे आयु, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, वैदिक ज्ञान, प्रज्ञा एवं धारणाशक्ति प्रदान करें. इस प्रकार कहकर वृक्ष से दाँतुन लेनी चाहिए. दूध वाले वृक्षों की दाँतुन लेना वर्जित माना गया है। दाँतों को विधिपूर्वक शुद्ध करके मुँह को जल से धोना चाहिए, इसके बाद कार्तिक का व्रत करने वाले को विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।
स्नान के बाद नए अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण करके तिलक लगाना चाहिए फिर अपनी गोत्र विधि के अनुसार अथवा अपने घर के नियमानुसार संध्या उपासना करनी चाहिए. जब तक सूर्योदय ना हो जाए तब तक गायत्री मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। संध्योपासना के अंत में विष्णु सहस्त्रनाम आदि का पाठ करना चाहिए, फिर व्यक्ति को अपनी दिनचर्या आरंभ करनी चाहिए जैसे वह जो भी काम करता हो उस पर जाना चाहिए। मध्यान्ह में दाल के अलावा शेष अन्न का भोजन करना चाहिए। जो व्यक्ति अतिथियों को भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करता है वह भोजन अमृततुल्य होता है।
मुख शुद्धि के लिए तुलसी का सेवन करना उत्तम है। उसके बाद शेष दिन सांसारिक व्यवहार में व्यतीत करना चाहिए, सायंकाल में पुन: भगवान के मन्दिर जाकर संध्या करके यथाशक्ति दीपदान करना चाहिए. भगवान विष्णु अथवा अपने देवता को प्रणाम करके आरती उतारनी चाहिए, प्रथम प्रहर में कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए, प्रथम प्रहर के बीत जाने पर शयन करना चाहिए, इस प्रकार जो व्यक्ति एक महीने तक शास्त्र अनुसार विधि का पालन करते हुए कार्तिक मास में स्नान-दान करता है, उसे भगवान का सालोक्य प्राप्त होता है।
@Sanatan
🔺 कार्तिक मास की सर्वोपयुक्त व्रत विधि ⁉️
🔺 कार्तिक मास में वेदानुसार किन-किन पदार्थों का त्याज्य कर दें ⁉️
🔺 कार्तिक मास के लिए कितने प्रकार के महात्म्य बताए गए हैं ⁉️
🛑 विशेष ➺ कार्तिक मास स्नान की संपूर्ण विधि व्याख्या अवश्य पढ़ें।
#Thread 🧵
।। कार्तिक मास ।।
🪷━━━༻❁༺━━━🪷
सत्य सनातन धर्म में कार्तिक मास की महत्ता अति श्रेष्ठ मानी गई है। सभी बारह मासों में मार्गशीर्ष मास को अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है, उससे भी अधिक पुण्य देने वाला वैशाख मास कहा गया है, प्रयाग में माघ मास का अधिक महत्व है तथा इससे भी महान तथा अधिक फलदायी कार्तिक मास को कहा गया है, जब ब्रह्मा जी ने एक तरफ सभी प्रकार के दान, व्रत तथा नियम रखे और दूसरी ओर कार्तिक का स्नान रखकर तौला तो कार्तिक स्नान का पलड़ा ही भारी पाया।
सूर्य भगवान जब तुला राशि पर आते है तो कार्तिक मास का प्रारम्भ होता है इस मास का माहत्म्य पद्मपुराण तथा स्कन्दपुराण में विस्तार पूर्वक मिलता है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है इस मास को धर्म, अर्थ काम और मोक्ष को देने वाला बताया गया है नारायण भगवान ने स्वयं इसे ब्रम्हा को, ब्रम्हा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण सम्पन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है।
कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।
कार्तिक मास से श्रेष्ठ कोई अन्य मास नहीं,
सतयुग के समान कोई अन्य युग नहीं।
वेद के समान कोई अन्य शास्त्र नहीं और
गंगाजी के समान कोई और तीर्थ नहीं है।
भगवान नारायण के शयन और प्रबोधन से चातुर्मास्य का प्रारम्भ और समापन होता है उत्तरायण को देवकाल और दक्षिणायन को आसुरिकाल माना जाता है दक्षिणायन में सत्गुणों के क्षरण से बचने और बचाने के लिए हमारे शास्त्रों में व्रत और तप का विधान है सूर्य का कर्क राशि पर आगमन दक्षिणायन का प्रारम्भ माना जाता है और कातिक मास इस अवधि में ही होता है पुराण आदि शास्त्रों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है यूँ तो हर मास का अलग अलग महत्व है परन्तु व्रत, तप की दृष्टि से कार्तिक मास की महता अधिक है शास्त्रों में भगवान विष्णु और विष्णु तीर्थ के ही समान कर्तिक् मास को श्रेष्ट और दुर्लभ कहा गया है शास्त्रों में ये मास परम कल्याणकारी कहा गया है।
कार्तिक मास के व्रत नियम
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कार्तिक मास में जो भी व्रत आदि रखता है उसे सदा एक पहर रात बचते ही उठ जाना चाहिए फिर स्तोत्र आदि के द्वारा अपने इष्ट देव की स्तुति करते हुए दिन के बाकी कामों को करना चाहिए। गाँव अथवा नगर के अनुसार दैनिक कर्म मल-मूत्र त्याग आदि कर उत्तर की ओर मुँह करके बैठना चाहिए। इसके साथ ही दाँत व जिह्वा की शुद्धि के लिए वृक्ष के समीप जाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए -
आयुर्बल यशो वर्च: प्रजा पशुवसूनि च ।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेघां च त्वं नो देहि वनस्पते ।।
अर्थात हे वनस्पति! आप मुझे आयु, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, वैदिक ज्ञान, प्रज्ञा एवं धारणाशक्ति प्रदान करें. इस प्रकार कहकर वृक्ष से दाँतुन लेनी चाहिए. दूध वाले वृक्षों की दाँतुन लेना वर्जित माना गया है। दाँतों को विधिपूर्वक शुद्ध करके मुँह को जल से धोना चाहिए, इसके बाद कार्तिक का व्रत करने वाले को विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।
स्नान के बाद नए अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण करके तिलक लगाना चाहिए फिर अपनी गोत्र विधि के अनुसार अथवा अपने घर के नियमानुसार संध्या उपासना करनी चाहिए. जब तक सूर्योदय ना हो जाए तब तक गायत्री मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। संध्योपासना के अंत में विष्णु सहस्त्रनाम आदि का पाठ करना चाहिए, फिर व्यक्ति को अपनी दिनचर्या आरंभ करनी चाहिए जैसे वह जो भी काम करता हो उस पर जाना चाहिए। मध्यान्ह में दाल के अलावा शेष अन्न का भोजन करना चाहिए। जो व्यक्ति अतिथियों को भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करता है वह भोजन अमृततुल्य होता है।
मुख शुद्धि के लिए तुलसी का सेवन करना उत्तम है। उसके बाद शेष दिन सांसारिक व्यवहार में व्यतीत करना चाहिए, सायंकाल में पुन: भगवान के मन्दिर जाकर संध्या करके यथाशक्ति दीपदान करना चाहिए. भगवान विष्णु अथवा अपने देवता को प्रणाम करके आरती उतारनी चाहिए, प्रथम प्रहर में कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए, प्रथम प्रहर के बीत जाने पर शयन करना चाहिए, इस प्रकार जो व्यक्ति एक महीने तक शास्त्र अनुसार विधि का पालन करते हुए कार्तिक मास में स्नान-दान करता है, उसे भगवान का सालोक्य प्राप्त होता है।
@Sanatan
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