🌹🌹नवरात्रि विशेष नवार्ण मंत्र साधना🌹🌹
🪄साधना किसी भी शुक्रवार या नवरात्रि से शुरू करे। रोज एक समय पर ही साधना करे। साधना के दिनों मे ब्रम्हचर्य का पालन करे । अगर साधना के दिनों मे स्वप्न हो जाए तब भी साधना शुरू रखे। रोज संकल्प करे की आज मे इतनी माला जाप करूँगा और उसे पुरा करे। अगर स्वप्न मे कोई शक्ति आप को कोई भी मंत्र बताये तो उसका जाप आपको नही करना है वरना आपको जो भी नुकसान होगा उसके जिमेदार आप स्वयं होंगे। अपने साधना के अनुभव गलती से भी किसी को ना बताये।
माला :- रुद्राक्ष
दिशा :- उत्तर
दीपक :- घी या तेल
आसन , वस्त्र :- लाल
दिन :- अपने सामर्थ्य अनुसार 9 दिन ,11 दिन , 21 दिन साधना करे।
॥ विनियोगः ॥
श्रीगणपतिर्जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
विनियोग करके ऋष्यादिन्यास करे :
॥ ऋष्यादिन्यासः ॥
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि॥ – सिर
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः, मुखे॥ – मुख
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि॥ – हृदय
ऐं बीजाय नमः, गुह्ये॥ – गुहा
ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः॥ – दोनों पैर
क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ॥ – नाभि
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” – इति मूलेन करौ संशोध्य ॥ – दोनों हाथ धो ले
॥ करन्यास ॥
करन्यास में सभी उंगलियों और करतल एवं करपृष्ठ का न्यास किया जाता है। अन्य सभी न्यासों में तो दाहिने हाथ की उंगलियों से निर्दिष्ट अङ्ग का स्पर्श करके न्यास किया जाता है किन्तु करन्यास में विधि अलग हो जाती है, जिसका निर्देश दिया गया है :
ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिलायें।
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ – पुनः दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिलायें।
क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और मध्यमा को मिलायें।
चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और अनामिका को मिलायें।
विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और कनिष्ठा को मिलायें।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ – पहले दोनों करतल को मिलाये फिर दोनों करपृष्ठ को मिलाये।
॥ हृदयादिन्यास ॥
हृदयादिन्यास के लिये दाहिने हाथ की पाँचों उंगुलियों से हृदय आदि अंगों का स्पर्श किया जाता है, कुछ लोग करतल से भी करते हैं :
ऐं हृदयाय नमः ॥ – दाहिने हाथ के पांचों उंगलियों को मिलाकर हृदय स्पर्श करे।
ह्रीं शिरसे स्वाहा ॥ – शिर स्पर्श करे।
क्लीं शिखायै वषट् ॥ – शिखा स्पर्श करे।
चामुण्डायै कवचाय हुम् ॥ – दोनों हाथों परस्पर दाहिने और बायीं बांहों का स्पर्श करे।
विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ – दाहिने हाथ की तर्जनी से दाहिना नेत्र, अनामिका से बांया नेत्र और मध्यमा से तृतीय नेत्र कल्पित करके मध्य मस्तक का स्पर्श करे।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ॥ – दाहिने हाथ को शिर के ऊपर से घुमाकर ताली बजाये। कुछ लोग तर्जनी और मध्यमा दो उंगलियों से ही निर्देश करते हैं तो कुछ लोग अप्रदक्षिण क्रम का भी निर्देश करते हैं।
॥ अंगन्यास ॥
अग्रांकित मंत्रों से क्रमशः शिखा आदि का स्पर्श करें :
नमः, शिखायाम् ॥ – शिखा
ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे ॥ – दाहिना नेत्र
क्लीं नमः, वामनेत्रे ॥ – बायां नेत्र
चां नमः, दक्षिणकर्णे ॥ – दाहिना कान
मुं नमः, वामकर्णे ॥ – बायां कान
डां नमः, दक्षिणनासापुटे ॥ – दाहिना नासिकापुट
यैं नमः, वामनासापुटे ॥ – बायां नासिकापुट
विं नमः, मुखे ॥ – मुख
च्चें नमः, गुह्ये ॥ – गुहा
॥ दिङ्न्यास ॥
दशों दिशाओं में चुटकी बजाये :
ऐं प्राच्यै नमः ॥ – पूर्व
ऐं आग्नेय्यै नमः ॥ – अग्निकोण
ह्रीं दक्षिणायै नमः ॥ – दक्षिण
ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः ॥ – नैर्ऋत्यकोण
क्लीं प्रतीच्यै नमः ॥ – पश्चिम
क्लीं वायव्यै नमः ॥ – वायव्यकोण
चामुण्डायै उदीच्यै नमः ॥ – उत्तर
चामुण्डायै ऐशान्यै नमः ॥ – ईशानकोण
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः ॥ – ऊपर
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः ॥ – नीचे
॥ ध्यानम् ॥
फिर पुष्पादि लेकर देवी का ध्यान करे :
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥
🪄साधना किसी भी शुक्रवार या नवरात्रि से शुरू करे। रोज एक समय पर ही साधना करे। साधना के दिनों मे ब्रम्हचर्य का पालन करे । अगर साधना के दिनों मे स्वप्न हो जाए तब भी साधना शुरू रखे। रोज संकल्प करे की आज मे इतनी माला जाप करूँगा और उसे पुरा करे। अगर स्वप्न मे कोई शक्ति आप को कोई भी मंत्र बताये तो उसका जाप आपको नही करना है वरना आपको जो भी नुकसान होगा उसके जिमेदार आप स्वयं होंगे। अपने साधना के अनुभव गलती से भी किसी को ना बताये।
माला :- रुद्राक्ष
दिशा :- उत्तर
दीपक :- घी या तेल
आसन , वस्त्र :- लाल
दिन :- अपने सामर्थ्य अनुसार 9 दिन ,11 दिन , 21 दिन साधना करे।
॥ विनियोगः ॥
श्रीगणपतिर्जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
विनियोग करके ऋष्यादिन्यास करे :
॥ ऋष्यादिन्यासः ॥
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि॥ – सिर
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः, मुखे॥ – मुख
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि॥ – हृदय
ऐं बीजाय नमः, गुह्ये॥ – गुहा
ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः॥ – दोनों पैर
क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ॥ – नाभि
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” – इति मूलेन करौ संशोध्य ॥ – दोनों हाथ धो ले
॥ करन्यास ॥
करन्यास में सभी उंगलियों और करतल एवं करपृष्ठ का न्यास किया जाता है। अन्य सभी न्यासों में तो दाहिने हाथ की उंगलियों से निर्दिष्ट अङ्ग का स्पर्श करके न्यास किया जाता है किन्तु करन्यास में विधि अलग हो जाती है, जिसका निर्देश दिया गया है :
ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिलायें।
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ – पुनः दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिलायें।
क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और मध्यमा को मिलायें।
चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और अनामिका को मिलायें।
विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ – दोनों हाथों के अंगूठे और कनिष्ठा को मिलायें।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ – पहले दोनों करतल को मिलाये फिर दोनों करपृष्ठ को मिलाये।
॥ हृदयादिन्यास ॥
हृदयादिन्यास के लिये दाहिने हाथ की पाँचों उंगुलियों से हृदय आदि अंगों का स्पर्श किया जाता है, कुछ लोग करतल से भी करते हैं :
ऐं हृदयाय नमः ॥ – दाहिने हाथ के पांचों उंगलियों को मिलाकर हृदय स्पर्श करे।
ह्रीं शिरसे स्वाहा ॥ – शिर स्पर्श करे।
क्लीं शिखायै वषट् ॥ – शिखा स्पर्श करे।
चामुण्डायै कवचाय हुम् ॥ – दोनों हाथों परस्पर दाहिने और बायीं बांहों का स्पर्श करे।
विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ – दाहिने हाथ की तर्जनी से दाहिना नेत्र, अनामिका से बांया नेत्र और मध्यमा से तृतीय नेत्र कल्पित करके मध्य मस्तक का स्पर्श करे।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ॥ – दाहिने हाथ को शिर के ऊपर से घुमाकर ताली बजाये। कुछ लोग तर्जनी और मध्यमा दो उंगलियों से ही निर्देश करते हैं तो कुछ लोग अप्रदक्षिण क्रम का भी निर्देश करते हैं।
॥ अंगन्यास ॥
अग्रांकित मंत्रों से क्रमशः शिखा आदि का स्पर्श करें :
नमः, शिखायाम् ॥ – शिखा
ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे ॥ – दाहिना नेत्र
क्लीं नमः, वामनेत्रे ॥ – बायां नेत्र
चां नमः, दक्षिणकर्णे ॥ – दाहिना कान
मुं नमः, वामकर्णे ॥ – बायां कान
डां नमः, दक्षिणनासापुटे ॥ – दाहिना नासिकापुट
यैं नमः, वामनासापुटे ॥ – बायां नासिकापुट
विं नमः, मुखे ॥ – मुख
च्चें नमः, गुह्ये ॥ – गुहा
॥ दिङ्न्यास ॥
दशों दिशाओं में चुटकी बजाये :
ऐं प्राच्यै नमः ॥ – पूर्व
ऐं आग्नेय्यै नमः ॥ – अग्निकोण
ह्रीं दक्षिणायै नमः ॥ – दक्षिण
ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः ॥ – नैर्ऋत्यकोण
क्लीं प्रतीच्यै नमः ॥ – पश्चिम
क्लीं वायव्यै नमः ॥ – वायव्यकोण
चामुण्डायै उदीच्यै नमः ॥ – उत्तर
चामुण्डायै ऐशान्यै नमः ॥ – ईशानकोण
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः ॥ – ऊपर
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः ॥ – नीचे
॥ ध्यानम् ॥
फिर पुष्पादि लेकर देवी का ध्यान करे :
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥
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ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥
फिर *“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः”* इस मन्त्र से माला की पूजा करके प्रार्थना करें –
*ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥*
इस मंत्र से माला को दाहिने हाथ में ग्रहण करे :
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणेकरे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि
साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ॥
मूल मंत्र :-
*“ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”*
Om Aing Hreeng Kling Chamundaye Vicche .
जाप पुरा होने के बाद इस श्लोक को पढ़े और भगवती को प्रणाम करे।
*ॐ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥*
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥
फिर *“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः”* इस मन्त्र से माला की पूजा करके प्रार्थना करें –
*ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥*
इस मंत्र से माला को दाहिने हाथ में ग्रहण करे :
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणेकरे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि
साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ॥
मूल मंत्र :-
*“ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”*
Om Aing Hreeng Kling Chamundaye Vicche .
जाप पुरा होने के बाद इस श्लोक को पढ़े और भगवती को प्रणाम करे।
*ॐ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥*
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दुर्गा सप्तशती का पाठ -
सबसे पहले सप्तशती का पंचोपचार पूजन करने के बाद ही उनका पाठ आरंभ करें।
जो लोग पहली बार सप्तशती पढ़ रहे हों या जिनको संस्कृत पढनी नहीं आती हो, वो लोग सामान्य हिंदी में ही पाठ करें।
जो लोग पूरी सप्तशती का पाठ एक दिन में नहीं कर सकते वो उसका पाठ महाविद्या क्रम में करें:-
प्रतिदिन अष्टोत्तर शतनाम, कवच,अर्गला, कीलक,रात्रि सूक्तम और देवी सूक्तम का पाठ करने के बाद आगे बताया गया पाठ करें;
प्रथम दिन:- 1 अध्याय
दूसरा दिन- 2,3 अध्याय
तीसरा दिन- 4 अध्याय
चौथा दिन-5,6,7,8 अध्याय
पंचम दिन - 9, 10 अध्याय
षष्ठी तिथि:- 11 अध्याय
सातवे दिन - 12, 13 अध्याय
अष्टमी - तीनो रहस्यो का पाठ
सप्तशती पाठ के बाद आप माँ भगवती के लिए अंग्यारी या हवन कर सकते हैं;
अंग्यारी की विधि- गाय के गोबर के उपले को गैस स्टोव पर जला दो जबतक उसकी उपरी सता बिल्कुल काली ना हो जाए।
अब उसे थोड़े समय तक कहीं खुली जगह पर रख दो। जब उपले में से निकले वाला धुआ 50% कम हो जायें तब उसको वापस माँ भगवती की चौकी के पास लेकर आओ। अब उसके ऊपर थोड़ा सा घी और कपूर जलाकर रख दो।
अग्नि प्रज्वलित हो जाएगी, ये होने के बाद आप सूखे मेवे, नैवेद्य, मिष्ठान, लौंग इलायची का भोग अर्पित कर सकते हैं।
यहा अंग्यारी की विधि संपूर्ण हुई
अब माँ भगवती और सभी शक्तियों की आरती करके उनको भोग अर्पित करके अपना पूजन संपूर्ण करें।
हर रोज़ क्या करना चाहिए ?
सबका पंचोपचार पूजन, दीपदान, दुर्गा सप्तशती का पाठ, अंग्यारी, आरती
कुछ खास करना चाहे तो:-
भगवती का अर्चन करें उनके 108 नमो से, (ये अर्चन बिल्व पत्र से अथवा कुमकुम में रंगे चावलो से अथवा कुमकुम से होसकता है)
जय माँ विंध्यवासिनी 🙏🏻
सबसे पहले सप्तशती का पंचोपचार पूजन करने के बाद ही उनका पाठ आरंभ करें।
जो लोग पहली बार सप्तशती पढ़ रहे हों या जिनको संस्कृत पढनी नहीं आती हो, वो लोग सामान्य हिंदी में ही पाठ करें।
जो लोग पूरी सप्तशती का पाठ एक दिन में नहीं कर सकते वो उसका पाठ महाविद्या क्रम में करें:-
प्रतिदिन अष्टोत्तर शतनाम, कवच,अर्गला, कीलक,रात्रि सूक्तम और देवी सूक्तम का पाठ करने के बाद आगे बताया गया पाठ करें;
प्रथम दिन:- 1 अध्याय
दूसरा दिन- 2,3 अध्याय
तीसरा दिन- 4 अध्याय
चौथा दिन-5,6,7,8 अध्याय
पंचम दिन - 9, 10 अध्याय
षष्ठी तिथि:- 11 अध्याय
सातवे दिन - 12, 13 अध्याय
अष्टमी - तीनो रहस्यो का पाठ
सप्तशती पाठ के बाद आप माँ भगवती के लिए अंग्यारी या हवन कर सकते हैं;
अंग्यारी की विधि- गाय के गोबर के उपले को गैस स्टोव पर जला दो जबतक उसकी उपरी सता बिल्कुल काली ना हो जाए।
अब उसे थोड़े समय तक कहीं खुली जगह पर रख दो। जब उपले में से निकले वाला धुआ 50% कम हो जायें तब उसको वापस माँ भगवती की चौकी के पास लेकर आओ। अब उसके ऊपर थोड़ा सा घी और कपूर जलाकर रख दो।
अग्नि प्रज्वलित हो जाएगी, ये होने के बाद आप सूखे मेवे, नैवेद्य, मिष्ठान, लौंग इलायची का भोग अर्पित कर सकते हैं।
यहा अंग्यारी की विधि संपूर्ण हुई
अब माँ भगवती और सभी शक्तियों की आरती करके उनको भोग अर्पित करके अपना पूजन संपूर्ण करें।
हर रोज़ क्या करना चाहिए ?
सबका पंचोपचार पूजन, दीपदान, दुर्गा सप्तशती का पाठ, अंग्यारी, आरती
कुछ खास करना चाहे तो:-
भगवती का अर्चन करें उनके 108 नमो से, (ये अर्चन बिल्व पत्र से अथवा कुमकुम में रंगे चावलो से अथवा कुमकुम से होसकता है)
जय माँ विंध्यवासिनी 🙏🏻
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नवरात्र में व्रत तीन प्रकार से हो सकता है-
• एकभुक्त: आधा दिन व्यतीत हो जाने पर हविष्यान्न भक्षण।
• नक्त: रात्रिकाल में एक समय हविष्यान्न भक्षण।
• उपवास: व्रत के दिन भोजन का पूर्णतः त्याग।
जो नवरात्र में एकभुक्त अथवा नक्त रूप से व्रक करेंगे वे हविष्यान्न भक्षण करें और आमिष वस्तु का सर्वथा त्याग करें।
ध्यातव्य- द्विजों के लिए भैंस का दुग्ध आदि निषिद्ध है।
सामान्य दिनों में भी अधिक से अधिक प्रयास रहना चाहिए कि आमिष भक्षण ना हो।
व्रत करने वाले-
• सूर्योदय से पूर्व स्नान इत्यादि समाप्त करें एवं दिन में शयन ना करें।
• भूमि पर ही शयन करें।
• प्यास लगने पर ही जल ग्रहण करें।
• पुरुष और अविवाहित स्त्रियाँ तेल, इत्र, शृंगार इत्यादि का त्याग करें।
● जो नौ दिन का व्रत नहीं कर सकते वे सप्तमी, अष्टमी, नवमी -इन तीन दिनों व्रत करके फल प्राप्त कर सकते हैं।
• एकभुक्त: आधा दिन व्यतीत हो जाने पर हविष्यान्न भक्षण।
• नक्त: रात्रिकाल में एक समय हविष्यान्न भक्षण।
• उपवास: व्रत के दिन भोजन का पूर्णतः त्याग।
जो नवरात्र में एकभुक्त अथवा नक्त रूप से व्रक करेंगे वे हविष्यान्न भक्षण करें और आमिष वस्तु का सर्वथा त्याग करें।
ध्यातव्य- द्विजों के लिए भैंस का दुग्ध आदि निषिद्ध है।
सामान्य दिनों में भी अधिक से अधिक प्रयास रहना चाहिए कि आमिष भक्षण ना हो।
व्रत करने वाले-
• सूर्योदय से पूर्व स्नान इत्यादि समाप्त करें एवं दिन में शयन ना करें।
• भूमि पर ही शयन करें।
• प्यास लगने पर ही जल ग्रहण करें।
• पुरुष और अविवाहित स्त्रियाँ तेल, इत्र, शृंगार इत्यादि का त्याग करें।
● जो नौ दिन का व्रत नहीं कर सकते वे सप्तमी, अष्टमी, नवमी -इन तीन दिनों व्रत करके फल प्राप्त कर सकते हैं।
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किसी भी बीमारी को नष्ट करने में असरकारक है यह नाम त्रय अस्त्र मंत्र!
विष्णु भगवान के तीन नामों को महारोगनाशक अस्त्र कहा गया है। अर्थात् इस तीन नाम के जप से कैंसर, किडनी, पैरालाइसिस आदि जैसी बड़ी से बड़ी बीमारी का संकट भी टल जाता है।
जो पूरे विष्णु सहस्रनाम को पढ़ने में असमर्थ हैं और किसी भयंकर व्याधि से पीड़ित हैं तो साधना में बैठकर भगवान विष्णु जी के इन तीन नामों का कम से कम 108 बार जाप प्रतिदिन सुबह अथवा शाम में करें।
जप नहीं कर सकते तो कॉपी या डायरी लेकर इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार लिखें। लिखने के बाद कॉपी को इधर-उधर रखने की जगह अपने पूजा कक्ष में रखें।
कोई बहुत बीमार है, और वो जाप नहीं कर सकता, लिख नहीं सकता, तो उनके परिवार का कोई सदस्य उनके सिरहाने बैठकर कम से कम 108 बार मंत्र जाप करे ताकि उनके कानों में मंत्र जाए।
इस मंत्र के उदय की कथा:-
मां ललिता त्रिपुरा महासुन्दरी और भंडासुर के मध्य जब युद्ध हुआ उस समय व्याधिनाशक इस महाअस्त्र मंत्र का उदय हुआ था।
युद्ध में पराजय जानकर भंडासुर ने महारोगास्त्र का प्रयोग किया, जिसे मां त्रिपुरा सुंदरी ने इस नामत्रय अस्त्र मंत्र का निर्माण कर उस महारोगास्त्र को नष्ट कर दिया। उसके बाद से ही किसी भी बीमारी को नष्ट करने में इस मंत्र का उपयोग सनातन धर्म में होता आ रहा है।
यह नामत्रय मंत्र है:-
अच्युताय नमः
अनंताय नमः
गोविंदाय नमः
इन तीन नामों की महिमा गाते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:-
अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारण भेषजात्।
नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।
हां, यह मंत्र काम तभी करेगा जब आपको भगवान विष्णु में संपूर्ण आस्था हो, उनके समक्ष आपका संपूर्ण समर्पण हो।
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्
@Sanatan
विष्णु भगवान के तीन नामों को महारोगनाशक अस्त्र कहा गया है। अर्थात् इस तीन नाम के जप से कैंसर, किडनी, पैरालाइसिस आदि जैसी बड़ी से बड़ी बीमारी का संकट भी टल जाता है।
जो पूरे विष्णु सहस्रनाम को पढ़ने में असमर्थ हैं और किसी भयंकर व्याधि से पीड़ित हैं तो साधना में बैठकर भगवान विष्णु जी के इन तीन नामों का कम से कम 108 बार जाप प्रतिदिन सुबह अथवा शाम में करें।
जप नहीं कर सकते तो कॉपी या डायरी लेकर इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार लिखें। लिखने के बाद कॉपी को इधर-उधर रखने की जगह अपने पूजा कक्ष में रखें।
कोई बहुत बीमार है, और वो जाप नहीं कर सकता, लिख नहीं सकता, तो उनके परिवार का कोई सदस्य उनके सिरहाने बैठकर कम से कम 108 बार मंत्र जाप करे ताकि उनके कानों में मंत्र जाए।
इस मंत्र के उदय की कथा:-
मां ललिता त्रिपुरा महासुन्दरी और भंडासुर के मध्य जब युद्ध हुआ उस समय व्याधिनाशक इस महाअस्त्र मंत्र का उदय हुआ था।
युद्ध में पराजय जानकर भंडासुर ने महारोगास्त्र का प्रयोग किया, जिसे मां त्रिपुरा सुंदरी ने इस नामत्रय अस्त्र मंत्र का निर्माण कर उस महारोगास्त्र को नष्ट कर दिया। उसके बाद से ही किसी भी बीमारी को नष्ट करने में इस मंत्र का उपयोग सनातन धर्म में होता आ रहा है।
यह नामत्रय मंत्र है:-
अच्युताय नमः
अनंताय नमः
गोविंदाय नमः
इन तीन नामों की महिमा गाते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:-
अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारण भेषजात्।
नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।
हां, यह मंत्र काम तभी करेगा जब आपको भगवान विष्णु में संपूर्ण आस्था हो, उनके समक्ष आपका संपूर्ण समर्पण हो।
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्
@Sanatan
🙏29❤11👍10
Forwarded from Sanatana Dharma Books • Hinduism Books (🤩 सागर 0.5 यतो धर्मस्ततो जयः)
रावण के प्रति नख भर का भी सम्मान वैदिक संस्कृति के प्रति द्रोह है।
रावण प्रतीक है व्यभिचार का जिसने अपनी पुत्रवधू तक पर कुदृष्टि डाली, अपनी पत्नी मंदोदरी की बहन के हेमा साथ कुकर्म किया और उसके पति को मारकर उसे उठा लाया।
रावण प्रतीक है अपने सगे संबंधियों को त्रास देने का। उसने अपनी बहन सूर्पनखा के पति विद्युत जिह्वा की हत्या कर दी। उसने अपने भाई से लंका छीन ली, अपने पिता को त्रास दिया, अपने मामा को स्वार्थ में मरवा दिया। अपने कुल खानदान को अपनी महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ा दिया। अपने भाई को लात मार कर भगा दिया।
रावण प्रतीक है अघन्या गाय के हत्यारे का, ऋषियों ब्राह्मणों के सामूहिक नरसंहार का। वैदिक व्यवस्था का परम शत्रु था रावण। यज्ञ और धर्म के किसी भी स्वरूप को अमान्य घोषित करने वाला रावण वैदिक देवताओं के प्रति घोर असभ्य था।
रावण प्रतीक है कृतघ्नता का। उसने भगवान शिव से कृतघ्नता की। वह उतना ही शिवभक्त था जितना भस्मासुर। वस्तुतः उसने महादेव के सामने दीन-हीन होने का ढोंग किया। वह भगवान शिव से भी अहंकार करता था। ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के बाद उनके प्रति भी वह कृतघ्न हो गया। अपने मित्रों से भी उसने कृतघ्नता की।
रावण प्रतीक है शक्ति और ज्ञान के दुरुपयोग का। कुसंस्कारित कुपात्र को विद्या मिलने पर वह क्या-कुछ करता है इसका जीता जागता उदाहरण रावण है।
रावण प्रतीक है क्षुद्र बुद्धि और मलिन मानस का, नारी जाति के प्रति घृणा का, सुर धेनु विप्र और मनुष्य के प्रति घृणा रखने वाला रावण प्रतीक है दम्भ, असभ्यता और विध्वंस का।
कुछ घृणित लोग रावण को महान बता रहे। यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कुछ नीच लोग महिषासुर को महान बताते हैं। पहले समाज के रावणों और महिषासुरों का सजीव दहन मर्दन होता था पर बलिहारी इस लोकतंत्र की कि हर टुच्चा आदमी अपनी दो कौड़ी की जबान हिला कर कुछ भी बोल सकता है।
पहचानिए ऐसे दुष्टात्माओं को और दहन करिये उनका।
और हां ये ब्रह्महत्या वाला पाप फर्जी नरेटिव है। ब्रह्मा जिसके वध की इच्छा स्वयं रखते हों ऐसे गोघाती, सुर त्रासी, ब्राह्मण द्रोही रावण के वध पर ब्रह्म हत्या लगने की बात कोई घृणित व्यक्ति ही कह सकता है।
जय जय श्रीराम
@Gurukul
@Sanatan
@Hindu
रावण प्रतीक है व्यभिचार का जिसने अपनी पुत्रवधू तक पर कुदृष्टि डाली, अपनी पत्नी मंदोदरी की बहन के हेमा साथ कुकर्म किया और उसके पति को मारकर उसे उठा लाया।
रावण प्रतीक है अपने सगे संबंधियों को त्रास देने का। उसने अपनी बहन सूर्पनखा के पति विद्युत जिह्वा की हत्या कर दी। उसने अपने भाई से लंका छीन ली, अपने पिता को त्रास दिया, अपने मामा को स्वार्थ में मरवा दिया। अपने कुल खानदान को अपनी महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ा दिया। अपने भाई को लात मार कर भगा दिया।
रावण प्रतीक है अघन्या गाय के हत्यारे का, ऋषियों ब्राह्मणों के सामूहिक नरसंहार का। वैदिक व्यवस्था का परम शत्रु था रावण। यज्ञ और धर्म के किसी भी स्वरूप को अमान्य घोषित करने वाला रावण वैदिक देवताओं के प्रति घोर असभ्य था।
रावण प्रतीक है कृतघ्नता का। उसने भगवान शिव से कृतघ्नता की। वह उतना ही शिवभक्त था जितना भस्मासुर। वस्तुतः उसने महादेव के सामने दीन-हीन होने का ढोंग किया। वह भगवान शिव से भी अहंकार करता था। ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के बाद उनके प्रति भी वह कृतघ्न हो गया। अपने मित्रों से भी उसने कृतघ्नता की।
रावण प्रतीक है शक्ति और ज्ञान के दुरुपयोग का। कुसंस्कारित कुपात्र को विद्या मिलने पर वह क्या-कुछ करता है इसका जीता जागता उदाहरण रावण है।
रावण प्रतीक है क्षुद्र बुद्धि और मलिन मानस का, नारी जाति के प्रति घृणा का, सुर धेनु विप्र और मनुष्य के प्रति घृणा रखने वाला रावण प्रतीक है दम्भ, असभ्यता और विध्वंस का।
कुछ घृणित लोग रावण को महान बता रहे। यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कुछ नीच लोग महिषासुर को महान बताते हैं। पहले समाज के रावणों और महिषासुरों का सजीव दहन मर्दन होता था पर बलिहारी इस लोकतंत्र की कि हर टुच्चा आदमी अपनी दो कौड़ी की जबान हिला कर कुछ भी बोल सकता है।
पहचानिए ऐसे दुष्टात्माओं को और दहन करिये उनका।
और हां ये ब्रह्महत्या वाला पाप फर्जी नरेटिव है। ब्रह्मा जिसके वध की इच्छा स्वयं रखते हों ऐसे गोघाती, सुर त्रासी, ब्राह्मण द्रोही रावण के वध पर ब्रह्म हत्या लगने की बात कोई घृणित व्यक्ति ही कह सकता है।
जय जय श्रीराम
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।। श्री हनुमत महामंत्र ।।
ॐ नमो हनुमते रूद्रावताराय वायु सुताय अञ्जनी गर्भ सम्भुताय अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत पालन तत्पराय धवली कृत जगत् त्रितयाया ज्वलदग्नि सूर्यकोटी समप्रभाय प्रकट पराक्रमाय आक्रान्त दिग् मण्डलाय यशोवितानाय यशोऽलंकृताय शोभिताननाय महा सामर्थ्याय महा तेज पुञ्ज:विराजमानाय श्रीराम भक्ति तत्पराय श्रिराम लक्ष्मणानन्द कारकाय कपिसैन्य प्राकाराय सुग्रीव सौख्य कारणाय सुग्रीव साहाय्य कारणाय ब्रह्मास्त्र ब्रह्म शक्ति ग्रसनाय लक्ष्मण शक्ति भेद निबारणाय शल्य लिशल्यौषधि समानयनाय बालोदित भानु मण्डल ग्रसनाय अक्षयकुमार छेदनाय वन रक्षाकर समूह विभञ्जनाय द्रोण पर्वतोत्पाटनाय स्वामि वचन सम्पादितार्जुन संयुग संग्रामाय गम्भिर शव्दोदयाय दक्षिणाशा मार्तण्डाय मेरूपर्वत पीठिकार्चनाय दावानल कालाग्नी रूद्राय समुद्र लङ्घनाय सीताऽऽश्वासनाय सीता रक्षकाय राक्षसी सङ्घ विदारणाय अशोकबन विदारणाय लङ्कापुरी दहनाय दश ग्रीव शिर:कृन्त्तकाय कुम्भकर्णादि वधकारणाय बालि निबर्हण कारणाय मेघनादहोम विध्वंसनाय इन्द्रजीत वध कारणाय सर्व शास्त्र पारङ्गताय सर्व ग्रह विनाशकाय सर्व ज्वर हराय सर्व भय निवारणाय सर्व कष्ट निवारणाय सर्वापत्ती निवारणाय सर्व दुष्टादि निबर्हणाय सर्व शत्रुच्छेदनाय भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी ध्वंसकाय सर्वकार्य साधकाय प्राणीमात्र रक्षकाय रामदुताय स्वाहा॥
।। जय श्री महाकाल।।
@Sanatan
ॐ नमो हनुमते रूद्रावताराय वायु सुताय अञ्जनी गर्भ सम्भुताय अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत पालन तत्पराय धवली कृत जगत् त्रितयाया ज्वलदग्नि सूर्यकोटी समप्रभाय प्रकट पराक्रमाय आक्रान्त दिग् मण्डलाय यशोवितानाय यशोऽलंकृताय शोभिताननाय महा सामर्थ्याय महा तेज पुञ्ज:विराजमानाय श्रीराम भक्ति तत्पराय श्रिराम लक्ष्मणानन्द कारकाय कपिसैन्य प्राकाराय सुग्रीव सौख्य कारणाय सुग्रीव साहाय्य कारणाय ब्रह्मास्त्र ब्रह्म शक्ति ग्रसनाय लक्ष्मण शक्ति भेद निबारणाय शल्य लिशल्यौषधि समानयनाय बालोदित भानु मण्डल ग्रसनाय अक्षयकुमार छेदनाय वन रक्षाकर समूह विभञ्जनाय द्रोण पर्वतोत्पाटनाय स्वामि वचन सम्पादितार्जुन संयुग संग्रामाय गम्भिर शव्दोदयाय दक्षिणाशा मार्तण्डाय मेरूपर्वत पीठिकार्चनाय दावानल कालाग्नी रूद्राय समुद्र लङ्घनाय सीताऽऽश्वासनाय सीता रक्षकाय राक्षसी सङ्घ विदारणाय अशोकबन विदारणाय लङ्कापुरी दहनाय दश ग्रीव शिर:कृन्त्तकाय कुम्भकर्णादि वधकारणाय बालि निबर्हण कारणाय मेघनादहोम विध्वंसनाय इन्द्रजीत वध कारणाय सर्व शास्त्र पारङ्गताय सर्व ग्रह विनाशकाय सर्व ज्वर हराय सर्व भय निवारणाय सर्व कष्ट निवारणाय सर्वापत्ती निवारणाय सर्व दुष्टादि निबर्हणाय सर्व शत्रुच्छेदनाय भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी ध्वंसकाय सर्वकार्य साधकाय प्राणीमात्र रक्षकाय रामदुताय स्वाहा॥
।। जय श्री महाकाल।।
@Sanatan
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