२ अंगुल, पैर के अंगूठे का परिणाह ( अर्थात् यदि धागे को अंगुठे के चारो ओर लपेटा जाए तो उस धागे की लम्बाई) ४ अंगुल होनी चाहिए। इससे अधिक लम्बा तथा मोटा पांव सामान्य से अधिक बड़ा समझना चाहिए और इससे छोटा तथा पतला पैर सामान्य से “कम लम्बा' समझना चाहिए।
पैर की प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुली की लम्बाई पैर के अंगूठे के बराबर होनी चाहिए । मध्यमा अंगुली की लम्बाई तर्जनी अंगुली से सोलहवां भाग कम, अनामिका की लम्बाई मध्यमा से आठवां भाग कम तथा कनिष्ठक़ा की लम्बाई मध्यमा से छठा भाग कम होनी चाहिए। अर्थात् अंगूठे और तर्जनी की लम्बाई तो बराबर की हो उसके बाद क्रमशः सभी उंगलियां एक दूसरी से कम लम्बी रहनी चाहिए। इन सभी उंगलियों के नाखून, पैर की ऊंगली के पर्व की लम्बाई से एक तिहाई लम्बे होने चाहिए। प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुली की मोटाई का परिणाह तीन अंगुल का होना चाहिए। प्रदेशिनी उंगली जितनी मोटी हो, मध्यमा उंगली उससे आठवां भाग कम मोटी, मध्यमा की मोटाई से अनामिका उंगली आठवां भाग कम मोटी तथा अनामिका की मोटाई से कनिष्ठा उंगली की मोटाई का आठवां भाग कम होनी चाहिए ।
इस प्रकार पैर की न्यूनाधिक लम्बाई का आनुपातिक परिमाण ज्ञात कर लेने के वाद उसके प्रभाव के सम्बन्ध में विचार करना उचित रहता है ।
✧ पैर का अंगूठा --
पैर के अंगूठे के सम्बन्ध में 'सामुद्र तिलक' में लिखा है-
“ वृत्तो भुजग फणाकृति स्तुंगों मांसल शुभोङ्खुष्टः। सशिरो हस्वाश्चिपिटो वक्रो विपुलः स पुनर शुभ:॥”
भावार्थ- 'पांव का अंगूठा यदि सर्प के फण के समान गोल ग्राकृति वाला, उन्नत तथा मांसल हो तो उसे शुभ समझना चाहिए। यदि अंगूठे पर नसे दिखाई देती हों, वह बहुत छोटा या बहुत बड़ा, टेढ़ा अथवा चिपटा हो तो उसे अशुभ जानना चाहिए।”
पांव के अंगूठे के विषय में अन्यत्र इस प्रकार कहा गया है-
“वृत्तेस्ताम्रनखै रक्तै रंगुष्ठै राज्यभागिनः।
अङ्गुष्ठा प्रथुला ये षां ते नारा भाग्यवर्जिताः॥
क्लिश्यन्ते विकृताङ्गुष्ठास्ते नरा वन गामिनः ।
चिपिटैर्वित्ततैर्भग्नेरङ्गुष्ठे: रतिनिन्दिता:॥
वक्रै: रुत्तैस्तथा हृस्वैरङ्गुष्ठै: कलेश भागिनः॥”
भावार्थ-- पांव का अंगूठा यदि गोल, ताम्रवर्ण नल वाला तथा लालिमा लिए हुए हो तो ऐसे व्यक्ति राज्यधिकार (ऐश्वर्य) प्राप्त करते है। जिन लोगों के पांव का अंगूठा बड़ा होता है, वे भाग्यहीन होते हैं । टेढ़े-मेढ़े अंगूठे वाले व्यक्ति जंगलों में (इधर-उधर) भटक ने वाले तथा कष्ट पाने वाले होते है। चपठे, कठे-फटे तथा टूटे हुए अंगूठे वाले व्यक्ति रति-निन्दित होते हैं तथा टेढ़े, रुखे और अधिक छोटे अंगूठे वाले व्यक्ति क्लेश उठाते है।
✧ पैरों की उंगलियां --
पुरुषों के पैरों की अंगुलियो के सम्बन्ध में शास्त्रकारो ने लिखा है-
“ प्रदेशिनी यदा दीर्घा अंगुष्ठं च व्यति क्रयेतू।
स्त्री भोगंलभते नित्यं पुरुषो नात्र संशयः॥
मध्यमा यांतु दीर्घावां भार्याहानिर्विनिर्दिशेत्।
अनामिकातु दीर्घायां विद्याभोगी भवेन्नरः:॥
सच हृस्वाभवेद्यस्य तत्वेद्या परदारगं।
यस्य प्रदेशिनी स्थूला भर्तिश्चेव कनिष्ठिका॥
हृस्वा क्लेशाप भोगायां गुल्ठादीर्घा प्रदेशिनी:।
समातुमध्यमा श्रेष्ठा श्रिये दीर्घा कनिष्ठिका।
आयतयामध्यमया कार्यविनाशो हृस्वया दुखं।
धनया समया पृत्रोत्पत्ति स्तोकं नृणामायु:।
असंहताभिहृस्वासि रंगुलीभिस्तु मानवः।
दासोवादासकर्मोवा समुद्र वचन यथा॥
अंगुल्यपि समादीर्घा संहृता श्चसमुन्नता।
तेपां प्रदत्तिणावर्ता प्रथिव्यास्तेन संशयः॥
दीर्घा कनिष्ठिका पिस्याद्यस्य स्वर्णभाज नं सनरः।
यदि सापिपुनर्लध्वी परदारापरायण: सततम्॥ ”
भावार्थ-- यदि पैर की तर्जनी उंगली अंगूठे से आगे निकली हुई (लम्बी) हो तो जातक को स्त्री-भोग का सुख नित्य प्राप्त होता है। यदि यह तर्जनी उंगली छोटी हो तो क्लेशकारक होती है। यदि अंगूठे के बराबर की हो तो मध्यम फल समझना चाहिए। अंगूठे से बड़ी तर्जनी उंगली शुभ फल देने वाली समझनी चाहिए।
यदि मध्यमा उंगली अगूठे से बड़ी हो तो जातक की पत्नी की हानि (मृत्यु) होती है । यदि तर्जनी के बराबर लम्बी हो तो श्रेष्ठ फल देने वाली कही गई है। (अधिक मोटी हो तो फल अशुभ होता है)। यदि अनामिक़ा उंगली लम्बी हो तो पुरुष विद्यानुरागी होता है। यदि छोटी हो तो पर- स्त्री गामी होता है। (इसकी लम्बाई का विचार मध्यमा उंगली की लम्बाई से करना चाहिए)।यदि तर्जनी उंगली स्थल तथा कनिष्ठा उंगली लम्बी हो तो जातक सुखी और धनी होता है। यदि कनिष्ठा उंगली छोटी हो तो पर-स्त्री-गामी होता है। यदि कनिष्ठा उंगली छोटी तथा लट्टू के समान मोटी हो तो जातक को बाल्यावस्था में ही मातृ-वियोग का दुःख उठाना पड़ता है। यदि मध्यमा उंगली अत्याधिक लम्बी हो तो अपयश प्राप्त होता है। यदि अधिक छोटी हो तो जातक दु:खी रहता है । यदि अन्य उंगलियों के समान ही लम्बी हो तथा सभी उंगलियां परस्पर मिलो हुई हों तो जातक पुत्रोत्पत्ति की क्षमता से युक्त, परन्तु अल्पायु होता है।
पैर की प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुली की लम्बाई पैर के अंगूठे के बराबर होनी चाहिए । मध्यमा अंगुली की लम्बाई तर्जनी अंगुली से सोलहवां भाग कम, अनामिका की लम्बाई मध्यमा से आठवां भाग कम तथा कनिष्ठक़ा की लम्बाई मध्यमा से छठा भाग कम होनी चाहिए। अर्थात् अंगूठे और तर्जनी की लम्बाई तो बराबर की हो उसके बाद क्रमशः सभी उंगलियां एक दूसरी से कम लम्बी रहनी चाहिए। इन सभी उंगलियों के नाखून, पैर की ऊंगली के पर्व की लम्बाई से एक तिहाई लम्बे होने चाहिए। प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुली की मोटाई का परिणाह तीन अंगुल का होना चाहिए। प्रदेशिनी उंगली जितनी मोटी हो, मध्यमा उंगली उससे आठवां भाग कम मोटी, मध्यमा की मोटाई से अनामिका उंगली आठवां भाग कम मोटी तथा अनामिका की मोटाई से कनिष्ठा उंगली की मोटाई का आठवां भाग कम होनी चाहिए ।
इस प्रकार पैर की न्यूनाधिक लम्बाई का आनुपातिक परिमाण ज्ञात कर लेने के वाद उसके प्रभाव के सम्बन्ध में विचार करना उचित रहता है ।
✧ पैर का अंगूठा --
पैर के अंगूठे के सम्बन्ध में 'सामुद्र तिलक' में लिखा है-
“ वृत्तो भुजग फणाकृति स्तुंगों मांसल शुभोङ्खुष्टः। सशिरो हस्वाश्चिपिटो वक्रो विपुलः स पुनर शुभ:॥”
भावार्थ- 'पांव का अंगूठा यदि सर्प के फण के समान गोल ग्राकृति वाला, उन्नत तथा मांसल हो तो उसे शुभ समझना चाहिए। यदि अंगूठे पर नसे दिखाई देती हों, वह बहुत छोटा या बहुत बड़ा, टेढ़ा अथवा चिपटा हो तो उसे अशुभ जानना चाहिए।”
पांव के अंगूठे के विषय में अन्यत्र इस प्रकार कहा गया है-
“वृत्तेस्ताम्रनखै रक्तै रंगुष्ठै राज्यभागिनः।
अङ्गुष्ठा प्रथुला ये षां ते नारा भाग्यवर्जिताः॥
क्लिश्यन्ते विकृताङ्गुष्ठास्ते नरा वन गामिनः ।
चिपिटैर्वित्ततैर्भग्नेरङ्गुष्ठे: रतिनिन्दिता:॥
वक्रै: रुत्तैस्तथा हृस्वैरङ्गुष्ठै: कलेश भागिनः॥”
भावार्थ-- पांव का अंगूठा यदि गोल, ताम्रवर्ण नल वाला तथा लालिमा लिए हुए हो तो ऐसे व्यक्ति राज्यधिकार (ऐश्वर्य) प्राप्त करते है। जिन लोगों के पांव का अंगूठा बड़ा होता है, वे भाग्यहीन होते हैं । टेढ़े-मेढ़े अंगूठे वाले व्यक्ति जंगलों में (इधर-उधर) भटक ने वाले तथा कष्ट पाने वाले होते है। चपठे, कठे-फटे तथा टूटे हुए अंगूठे वाले व्यक्ति रति-निन्दित होते हैं तथा टेढ़े, रुखे और अधिक छोटे अंगूठे वाले व्यक्ति क्लेश उठाते है।
✧ पैरों की उंगलियां --
पुरुषों के पैरों की अंगुलियो के सम्बन्ध में शास्त्रकारो ने लिखा है-
“ प्रदेशिनी यदा दीर्घा अंगुष्ठं च व्यति क्रयेतू।
स्त्री भोगंलभते नित्यं पुरुषो नात्र संशयः॥
मध्यमा यांतु दीर्घावां भार्याहानिर्विनिर्दिशेत्।
अनामिकातु दीर्घायां विद्याभोगी भवेन्नरः:॥
सच हृस्वाभवेद्यस्य तत्वेद्या परदारगं।
यस्य प्रदेशिनी स्थूला भर्तिश्चेव कनिष्ठिका॥
हृस्वा क्लेशाप भोगायां गुल्ठादीर्घा प्रदेशिनी:।
समातुमध्यमा श्रेष्ठा श्रिये दीर्घा कनिष्ठिका।
आयतयामध्यमया कार्यविनाशो हृस्वया दुखं।
धनया समया पृत्रोत्पत्ति स्तोकं नृणामायु:।
असंहताभिहृस्वासि रंगुलीभिस्तु मानवः।
दासोवादासकर्मोवा समुद्र वचन यथा॥
अंगुल्यपि समादीर्घा संहृता श्चसमुन्नता।
तेपां प्रदत्तिणावर्ता प्रथिव्यास्तेन संशयः॥
दीर्घा कनिष्ठिका पिस्याद्यस्य स्वर्णभाज नं सनरः।
यदि सापिपुनर्लध्वी परदारापरायण: सततम्॥ ”
भावार्थ-- यदि पैर की तर्जनी उंगली अंगूठे से आगे निकली हुई (लम्बी) हो तो जातक को स्त्री-भोग का सुख नित्य प्राप्त होता है। यदि यह तर्जनी उंगली छोटी हो तो क्लेशकारक होती है। यदि अंगूठे के बराबर की हो तो मध्यम फल समझना चाहिए। अंगूठे से बड़ी तर्जनी उंगली शुभ फल देने वाली समझनी चाहिए।
यदि मध्यमा उंगली अगूठे से बड़ी हो तो जातक की पत्नी की हानि (मृत्यु) होती है । यदि तर्जनी के बराबर लम्बी हो तो श्रेष्ठ फल देने वाली कही गई है। (अधिक मोटी हो तो फल अशुभ होता है)। यदि अनामिक़ा उंगली लम्बी हो तो पुरुष विद्यानुरागी होता है। यदि छोटी हो तो पर- स्त्री गामी होता है। (इसकी लम्बाई का विचार मध्यमा उंगली की लम्बाई से करना चाहिए)।यदि तर्जनी उंगली स्थल तथा कनिष्ठा उंगली लम्बी हो तो जातक सुखी और धनी होता है। यदि कनिष्ठा उंगली छोटी हो तो पर-स्त्री-गामी होता है। यदि कनिष्ठा उंगली छोटी तथा लट्टू के समान मोटी हो तो जातक को बाल्यावस्था में ही मातृ-वियोग का दुःख उठाना पड़ता है। यदि मध्यमा उंगली अत्याधिक लम्बी हो तो अपयश प्राप्त होता है। यदि अधिक छोटी हो तो जातक दु:खी रहता है । यदि अन्य उंगलियों के समान ही लम्बी हो तथा सभी उंगलियां परस्पर मिलो हुई हों तो जातक पुत्रोत्पत्ति की क्षमता से युक्त, परन्तु अल्पायु होता है।
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यदि पैर की सभी उंगलियां छोटी-छोटी और फैली हुई हों तो जातक दास अथवा दास प्रवृत्ति जैसा काम करने वाला होता है। यदि सब उंगलियां समान आनुपातिक लम्बाई, पुष्ट, ऊंची उठी हुई तथा एक दूसरी से मिली हुई हों तो उन्हें शुभ फलदायक समझना चाहिए।
पैरों की उंगलियों के सम्बन्ध में अन्य विद्वानों के मत का सार संक्षेप यह है -
(१) यदि पैरों की उंगलियां समात आनुपातिक लम्बाई की हों, कुछ दाई ओर को झुकी हुई हों, कोमल, उन्नत, अग्रभाग पर गोल, चिकनी, चमकदार तथा परस्पर मिली हुई हों तो ऐसा जातक अत्यन्त ऐशर्यशाली, उच्च-पदाधिकारी तथा यशस्वी होता है ।
(२) यदि मध्यमा उंगली अनामिका उंगली से छोटी हो तो स्त्री हानि होती है।
(३) यदि अनामिका उंगली मध्यमा से बड़ी हो तो जातक को स्वर्ण का लाभ होता है ।
✧ पैरों की उंगलियों के नाखून --
(१) यदि पैरों की उंगलियों के नाखून लाल रंग के, शंख की भाँति घुमाव वाले तथा चमकदार हों तो ऐसे जातक उच्च पद प्राप्त करते हैं ।
(२) यदि पैरों के नाखून चिकने तथा श्वेत-बिन्दु-चिन्ह से युक्त हों तो जातक सौभाग्यशाली होता है | उंगलियों के नाखूनों पर श्वेतविन्दु-चिन्हों के विषय में विद्वानों के विभिन्न मत है। कुछ लोग इन्हे शुभ तथा कुछ लोग अशुभ मानते हैं ।
(३) कुछ विद्वानों के मतानुसार यदि दाएं पैर के नाखूनो में सफेद, पीले, काले अथवा लाल रग के बिन्दु-चिन्ह हों तो उन्हे “उत्पात जनक' समझना चाहिए । यदि दाएं पैर के अंगुठे के नख में ऐसे चिन्ह हों तो जातक के धन का विनाश होता है तथा उसे अपयश प्राप्त होता है। यदि तर्जनी उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हों तो जातक का किसी से झगड़ा होता है। यदि मध्यमा उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हो तो वे जातक के लिए चिन्ता एवं उद्वेगजनक होते हैं। यदि अनामिका उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हों तो ये जातक के लिए शुभ होते है। यदि कनिष्ठा उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हो तो नवीन सन्तान का जन्म होता है अथवा पुत्र को धन-लाभ होता है। बाएं पैर के नाखूनों में इसका उल्टा फल समझना चाहिए ।
✧ पैर का ऊपरी भाग --
पैर का ऊपरी भाग मांसल, उन्नत तथा कोमल हो तो उसे शुभ समझना चाहिए। यदि इस भाग पर नसे दिखाई देती हों, पसीना आता हो अथवा बाल (केश) हों तो उसे अशुभ लक्षण समझना चाहिए ।
✧ गुल्फ (टखने) --
पैर के टखने मांस से ढके हुए हों तो उन्हे शुभ समझना चाहिए। टखनों का टेढ़ा होना अशुभ होता है। शुकर को गुल्फ जैसे गुल्फ वाले व्यक्ति कष्ट उठाते है। तथा भैसे के टखनों की भांति टखने वाले व्यक्ति पापो तथा दु:खी होते है| यदि गुल्फों पर रोम हों तो संन्तान का अभाव होता है अथवा पुत्र-सुख कम प्राप्त होता है।
✧ एड़ी --
यदि एड़ी बड़ी हो तो जातक दीर्घायु होता है। पैर के अनुपात के बराबर हो तो कभी दु.खी और कभी सुखी रहता है। यदि एड़ी छोटी हो तो जातक दरिद्र होता है और यदि एड़ी उठी हुई हो तो शत्रुओ पर विजय पाता है। एड़ी गुदगदी हो तो उत्तम होतो है और कड़ी हो तो सन्तान-सुख में कमी रहती है।
✧ पिडली, जाँघ और टांग --
(१) यदि पांव को पिंडलियां गोल, गुदगुदी तथा रोमरहित हो तो उन्हे शुभ अथवा विपरीत हो तो अशुभ समझना चाहिए ।
(२) गोल, छोटी, गुदगुदी तथा हाथी की सुड की भाँति ढलवां जांघों वाला व्यक्ति भाग्यशाली होता है। पतली जांघो वाले मनुष्य दरिद्र होते हैं।
(३) ऊपर के घड़ से अधिक लम्बी टाँगे शुभ होती है, ऐसा व्यक्ति शीघ्रगामी होता है। यदि टांगे कम लम्बी हों तो शूरवीर होता है ।
(४) टांगों का निचला आधा भाग हिरन अथवा घोडे जैसा हो तो जातक भाग्यवान होता है ।
(५) व्याघ्र अथवा सिंह जैसी पिंडलियों वाले व्यक्ति धूर्त होते हैं ।
(६) मछली जैसी जांघ वाले व्यक्ति ऐश्वर्यवान होते हैं।
(७) सियार कुत्ता, गधा अथवा रीछ जैसी जांघो वाले व्यक्ति दुर्भाग्यशाली तथा कौए जँसी टांगी वाले दुःखी होते हैं।
(८) जांघ का अधिक बड़ा तथा मोटा होना तथा पिडलियों पर अधिक रोमो का होना दरिद्रता का लक्षण समझना चाहिए ।
(६) कमर तथा मुलायम रोमों वाली जांघें शुभ तथा सौभाग्यदायक होतो हैं ।
✧ रोमें (रोएं ) --
(१) यदि रोम-कूप से ही एक ही रोम निकले तो जातक अत्यन्त उच्च-पद प्राप्त करता है। यदि एक रोम- कूप में से दो-दो रोम निकले तो जातक परम-विद्वान् तथा बुद्धिमात् होता हैं। यदि एक रोम-कृप में से तीन अथवा अधिक रोम निकले तो जातक दुखी तथा दरिद्र होता है।
(२) भ्रमर के समान काले, चिकने, पतले, सुन्दर तथा मुलायम रोमों वाला व्यक्ति अत्यन्त उच्च पद प्राप्त करता है। अधिक घने रोमों वाला व्यक्ति विद्वान तथा बुद्धिमान होता है। रोम-हीन अंगों वाला व्यक्ति 'सन्यासी होता है । पीर्तवर्ण रोमों वाला व्यक्ति पापी होता है। मोटे तथा रूखे रोमों वाला व्यक्ति अधम होता है। यदि रोम श्रपने अग्रभाग में घिरे हुए हों तो जातक धनी होता है ।
पैरों की उंगलियों के सम्बन्ध में अन्य विद्वानों के मत का सार संक्षेप यह है -
(१) यदि पैरों की उंगलियां समात आनुपातिक लम्बाई की हों, कुछ दाई ओर को झुकी हुई हों, कोमल, उन्नत, अग्रभाग पर गोल, चिकनी, चमकदार तथा परस्पर मिली हुई हों तो ऐसा जातक अत्यन्त ऐशर्यशाली, उच्च-पदाधिकारी तथा यशस्वी होता है ।
(२) यदि मध्यमा उंगली अनामिका उंगली से छोटी हो तो स्त्री हानि होती है।
(३) यदि अनामिका उंगली मध्यमा से बड़ी हो तो जातक को स्वर्ण का लाभ होता है ।
✧ पैरों की उंगलियों के नाखून --
(१) यदि पैरों की उंगलियों के नाखून लाल रंग के, शंख की भाँति घुमाव वाले तथा चमकदार हों तो ऐसे जातक उच्च पद प्राप्त करते हैं ।
(२) यदि पैरों के नाखून चिकने तथा श्वेत-बिन्दु-चिन्ह से युक्त हों तो जातक सौभाग्यशाली होता है | उंगलियों के नाखूनों पर श्वेतविन्दु-चिन्हों के विषय में विद्वानों के विभिन्न मत है। कुछ लोग इन्हे शुभ तथा कुछ लोग अशुभ मानते हैं ।
(३) कुछ विद्वानों के मतानुसार यदि दाएं पैर के नाखूनो में सफेद, पीले, काले अथवा लाल रग के बिन्दु-चिन्ह हों तो उन्हे “उत्पात जनक' समझना चाहिए । यदि दाएं पैर के अंगुठे के नख में ऐसे चिन्ह हों तो जातक के धन का विनाश होता है तथा उसे अपयश प्राप्त होता है। यदि तर्जनी उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हों तो जातक का किसी से झगड़ा होता है। यदि मध्यमा उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हो तो वे जातक के लिए चिन्ता एवं उद्वेगजनक होते हैं। यदि अनामिका उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हों तो ये जातक के लिए शुभ होते है। यदि कनिष्ठा उंगली के नाखून पर ऐसे चिन्ह हो तो नवीन सन्तान का जन्म होता है अथवा पुत्र को धन-लाभ होता है। बाएं पैर के नाखूनों में इसका उल्टा फल समझना चाहिए ।
✧ पैर का ऊपरी भाग --
पैर का ऊपरी भाग मांसल, उन्नत तथा कोमल हो तो उसे शुभ समझना चाहिए। यदि इस भाग पर नसे दिखाई देती हों, पसीना आता हो अथवा बाल (केश) हों तो उसे अशुभ लक्षण समझना चाहिए ।
✧ गुल्फ (टखने) --
पैर के टखने मांस से ढके हुए हों तो उन्हे शुभ समझना चाहिए। टखनों का टेढ़ा होना अशुभ होता है। शुकर को गुल्फ जैसे गुल्फ वाले व्यक्ति कष्ट उठाते है। तथा भैसे के टखनों की भांति टखने वाले व्यक्ति पापो तथा दु:खी होते है| यदि गुल्फों पर रोम हों तो संन्तान का अभाव होता है अथवा पुत्र-सुख कम प्राप्त होता है।
✧ एड़ी --
यदि एड़ी बड़ी हो तो जातक दीर्घायु होता है। पैर के अनुपात के बराबर हो तो कभी दु.खी और कभी सुखी रहता है। यदि एड़ी छोटी हो तो जातक दरिद्र होता है और यदि एड़ी उठी हुई हो तो शत्रुओ पर विजय पाता है। एड़ी गुदगदी हो तो उत्तम होतो है और कड़ी हो तो सन्तान-सुख में कमी रहती है।
✧ पिडली, जाँघ और टांग --
(१) यदि पांव को पिंडलियां गोल, गुदगुदी तथा रोमरहित हो तो उन्हे शुभ अथवा विपरीत हो तो अशुभ समझना चाहिए ।
(२) गोल, छोटी, गुदगुदी तथा हाथी की सुड की भाँति ढलवां जांघों वाला व्यक्ति भाग्यशाली होता है। पतली जांघो वाले मनुष्य दरिद्र होते हैं।
(३) ऊपर के घड़ से अधिक लम्बी टाँगे शुभ होती है, ऐसा व्यक्ति शीघ्रगामी होता है। यदि टांगे कम लम्बी हों तो शूरवीर होता है ।
(४) टांगों का निचला आधा भाग हिरन अथवा घोडे जैसा हो तो जातक भाग्यवान होता है ।
(५) व्याघ्र अथवा सिंह जैसी पिंडलियों वाले व्यक्ति धूर्त होते हैं ।
(६) मछली जैसी जांघ वाले व्यक्ति ऐश्वर्यवान होते हैं।
(७) सियार कुत्ता, गधा अथवा रीछ जैसी जांघो वाले व्यक्ति दुर्भाग्यशाली तथा कौए जँसी टांगी वाले दुःखी होते हैं।
(८) जांघ का अधिक बड़ा तथा मोटा होना तथा पिडलियों पर अधिक रोमो का होना दरिद्रता का लक्षण समझना चाहिए ।
(६) कमर तथा मुलायम रोमों वाली जांघें शुभ तथा सौभाग्यदायक होतो हैं ।
✧ रोमें (रोएं ) --
(१) यदि रोम-कूप से ही एक ही रोम निकले तो जातक अत्यन्त उच्च-पद प्राप्त करता है। यदि एक रोम- कूप में से दो-दो रोम निकले तो जातक परम-विद्वान् तथा बुद्धिमात् होता हैं। यदि एक रोम-कृप में से तीन अथवा अधिक रोम निकले तो जातक दुखी तथा दरिद्र होता है।
(२) भ्रमर के समान काले, चिकने, पतले, सुन्दर तथा मुलायम रोमों वाला व्यक्ति अत्यन्त उच्च पद प्राप्त करता है। अधिक घने रोमों वाला व्यक्ति विद्वान तथा बुद्धिमान होता है। रोम-हीन अंगों वाला व्यक्ति 'सन्यासी होता है । पीर्तवर्ण रोमों वाला व्यक्ति पापी होता है। मोटे तथा रूखे रोमों वाला व्यक्ति अधम होता है। यदि रोम श्रपने अग्रभाग में घिरे हुए हों तो जातक धनी होता है ।
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यह फलादेश शरीरस्थ किसी भी अंग पर पाए जाने वाले रोगों के सम्बन्ध में लागू होता है। पांव के रोगों पर भी यही फल समझना चाहिए ।
✧ घुटने --
(१) जिस व्यक्ति के छुटने भीतर को धंसे हुए हों, वह अपनी स्त्री अथवा अन्य स्त्रियों के वश में रहता है तथा उसकी मृत्यु परदेश में होती है ।
(२) खुब मोटे तथा मांसल छुटनों वाला व्यक्ति ऐश्वर्यशाली, भू-स्वामी तथा दीर्घजीवी होता है।
(३) हाथी के समान घुटनों वाला व्यक्ति भोगी होता है ।
(४) घोड़े के समान घुटनों वाला व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त होता है।
(५) तालफल जैसे घुटनों वाला व्यक्ति अत्यन्त दुःख प्राप्त करता है।
(६) टेढे-मेढे, विकराल अथवा बहुत छोटे घुटनों वाला व्यक्ति दरिद्र होता है ।
(७) ऊंचे- नीचे तथा कमजोर घुटनों वाला व्यक्ति दरिद्र होता है तथा दास-वृत्ति करता है।
(८) यदि घुटनों पर मांस एक जैसा न हो, कही कम और कहीं अधिक हो तो ऐसा व्यक्ति निर्धन होता है। ऐसे घुटनो को अशुभ समझना चाहिए।
✧ अन्य बातें --
(१) यदि पुरुष के दाएं पैर के तलवे मे पसीना आता हो तो उसे अशुम तथा भयकारक समझना चाहिए । ऐसे लोगो को यात्राए करनी पड़ती हैं ।
(२) यदि पुरुप के दाए पैर के तलवे मे पसीना आता हो तो उसे अशुभ लक्षण समझना चाहिए।
(३) यदि पैर में खुजली मचे तो रोग, यात्रा अथवा धन की हानि आदि अशुभ फल होते है। पैर की खुजली का प्रभाव एक पखवाड़े (१५ दिन) के भीतर प्रकट हो जाता है ।
✧🙏✧
✧ घुटने --
(१) जिस व्यक्ति के छुटने भीतर को धंसे हुए हों, वह अपनी स्त्री अथवा अन्य स्त्रियों के वश में रहता है तथा उसकी मृत्यु परदेश में होती है ।
(२) खुब मोटे तथा मांसल छुटनों वाला व्यक्ति ऐश्वर्यशाली, भू-स्वामी तथा दीर्घजीवी होता है।
(३) हाथी के समान घुटनों वाला व्यक्ति भोगी होता है ।
(४) घोड़े के समान घुटनों वाला व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त होता है।
(५) तालफल जैसे घुटनों वाला व्यक्ति अत्यन्त दुःख प्राप्त करता है।
(६) टेढे-मेढे, विकराल अथवा बहुत छोटे घुटनों वाला व्यक्ति दरिद्र होता है ।
(७) ऊंचे- नीचे तथा कमजोर घुटनों वाला व्यक्ति दरिद्र होता है तथा दास-वृत्ति करता है।
(८) यदि घुटनों पर मांस एक जैसा न हो, कही कम और कहीं अधिक हो तो ऐसा व्यक्ति निर्धन होता है। ऐसे घुटनो को अशुभ समझना चाहिए।
✧ अन्य बातें --
(१) यदि पुरुष के दाएं पैर के तलवे मे पसीना आता हो तो उसे अशुम तथा भयकारक समझना चाहिए । ऐसे लोगो को यात्राए करनी पड़ती हैं ।
(२) यदि पुरुप के दाए पैर के तलवे मे पसीना आता हो तो उसे अशुभ लक्षण समझना चाहिए।
(३) यदि पैर में खुजली मचे तो रोग, यात्रा अथवा धन की हानि आदि अशुभ फल होते है। पैर की खुजली का प्रभाव एक पखवाड़े (१५ दिन) के भीतर प्रकट हो जाता है ।
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॥मां महिषासुरमर्दिनी स्रोत॥
॥जय मा दुर्गा॥
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
@Sanatan
॥जय मा दुर्गा॥
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
@Sanatan
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🌹रोजगार प्राप्ति के लिए करे🌹
🌹मां काली पञ्च बाण 🌹
इस साबर मंत्र का प्रयोग नवरात्रि से शुरू कर सकते हैं।
आज के इस युग में प्रत्येक व्यक्ति अच्छे रोजगार की प्राप्ति में लगा हुआ है पर बहुत प्रयत्न करने पर भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती है ! रोजगार सम्बन्धी किसी भी समस्या के समाधान के लिए इस मन्त्र का प्रतिदिन 11बार सुबह और 11बार शाम को जप करे !
प्रथम वाण—-
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
द्वितीय वाण ——-
ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू
पान मिठाई !
तृतीय वाण ———
ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
चतुर्थ वाण ———
ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई !
पंचम वाण ———
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई !
विधि
इस मन्त्र को सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है ! यह मन्त्र स्वयं सिद्ध है। केवल माँ काली के सामने अगरबती जलाकर 11 बार सुबह और 11 बार शाम को जप कर ले ! मन्त्र एक दम शुद्ध है। भाषा के नाम पर हेर फेर न करे !शाबर मन्त्र जैसे लिखे हो वैसे ही पढने पर फल देते है। शुद्ध करने पर निष्फल हो जाते है !
@Sanatan
🌹मां काली पञ्च बाण 🌹
इस साबर मंत्र का प्रयोग नवरात्रि से शुरू कर सकते हैं।
आज के इस युग में प्रत्येक व्यक्ति अच्छे रोजगार की प्राप्ति में लगा हुआ है पर बहुत प्रयत्न करने पर भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती है ! रोजगार सम्बन्धी किसी भी समस्या के समाधान के लिए इस मन्त्र का प्रतिदिन 11बार सुबह और 11बार शाम को जप करे !
प्रथम वाण—-
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
द्वितीय वाण ——-
ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू
पान मिठाई !
तृतीय वाण ———
ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
चतुर्थ वाण ———
ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई !
पंचम वाण ———
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई !
इस मन्त्र को सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है ! यह मन्त्र स्वयं सिद्ध है। केवल माँ काली के सामने अगरबती जलाकर 11 बार सुबह और 11 बार शाम को जप कर ले ! मन्त्र एक दम शुद्ध है। भाषा के नाम पर हेर फेर न करे !शाबर मन्त्र जैसे लिखे हो वैसे ही पढने पर फल देते है। शुद्ध करने पर निष्फल हो जाते है !
@Sanatan
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🧵 पूजा में कलश स्थापन का महत्व तथा
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व #Thread
🔹 कलश का सरल अर्थ है जल से भरा हुवा सुशोभित पात्र है। हिंदू धर्म में सभी मांगलिक कार्यों में कलश स्थापित करने का विशेष महत्व माना गया हैं।
हिंदू संस्कृति में कलश को एक विशेष आकार के पात्र को कहा जाता हैं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु, मध्य में भगवान शिव और मूल में ब्रह्माजी का निवास होता है। इसलिए पूजन में कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर कलश स्थापित किया जाता है। हिंदू धर्म में कलश को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विभिन्न धार्मिक कार्यों एवं गृहप्रवेश इत्यादि शुभ कार्यों में कार्य की शुभता में वृद्धि एवं मंगल कामनाके उद्देश्य से पूजन के दोरान कलश स्थापित किया जाता है।
🔹कलश में प्रयुक्त होने वाली सामग्री
हिंदू शास्त्रों में उल्लेख हैं की कलश को बिना जल के स्थापित करना अशुभ होता है। इसीलिए कलश को हमेशा पानी इत्यादि सामग्री से भर कर रखना चाहिए। प्राय कलश में जल, पान के पत्ते, अक्षत, कुमकुम, केसर, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, श्रीफल, अनाज इत्यादि का उपयोग पूजन हेतु किया जाता हैं। विभिन्न पूजन हेतु जल के साथ भिन्न सामग्रीयों का प्रयोग किया जाता है।
🔹कलश का पवित्र जल मनुष्य के मन को स्वच्छ, निर्मल एवं शीतल बनाएं रखने का प्रतिक माना गया हैं। कलश पर स्वस्तिक चिह्न बनाने का प्रतिक को शास्त्रों में स्वस्तिक ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। स्वस्तिक को भगवान श्री गणेश का साकार रूप है। मान्त्यता हैं, कि स्वस्तिक के मध्य भाग को भगवान विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में प्रकट करने की भावना मानी जाती हैं।
🔹कलश के ऊपर श्रीफल स्थापित करना भगवान श्री गणेश का प्रतीक माना जाता है। कलश में सुपारी, पुष्प, दुर्वा इत्यादि आदि सामग्री मनुष्य की जीवन शक्ति का प्रतिक माना जाता हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व🧵
🔹नारियल शुभता का सूचक होने के कारण ही इसे "श्रीफल" कहा जाता हैं। श्रीफल का महत्व अत्याधिक एवं सर्वत्र रहा हैं। श्रीफल को हिंदी में नारियल, खोपरा, गरी, गोला आदि नाम से जाना जाता हैं, इस मराठी में नारळ, गुजराती में नारियर, श्रीफल, नारियेळ, बंगाली में, नारिकेल, डाबेर नारकेल, पयोधर, कन्नड में तेंगिनकायि, तेंगिन, कोब्बरि, तेंगिनकायिय मलयालम में नाळिकेर, वेळिच्चेण्ण, तेण्णा, नेपालि में नरिवल, नरिवलको तमिल में तैकाय, तेन्नै, तेनकु, तेलुगु कोब्बरि, आदि नामों से जाना जाता हैं।
🔹नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता हैं। हिंदू धर्म में सभी प्रकार के धार्मिक एवं मांगलिक कार्यों में श्रीफल अर्थात नारियल का विशेष महत्व पौराणिक काल से ही रहा है। हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुशार जब किसी नये कार्या या शुभ कार्य का प्रारंभ या शुभारंभ करना हो तो देवी-देवता के सम्मुख श्रीफल अर्पण करने और उसे फोड़ने का विशेष महत्व रहा है।
🔹यहि कारण हैं की सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों में अन्य पूजन सामग्रीयों के साथ में श्रीफल भी विशेष रुप से होता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुशार श्रीफल का उपयोग बलि कर्म के प्रतिक के रुप में भी किया जाता हैं। बलि कर्म अर्थात उपहार अथवा नैवेद्य की वस्तु। देवी-देवताओंको बलि अर्पण करने का तत्पर्य होता हैं उनकी विशेष कृपा प्राप्त करना या उनकी द्वारा प्राप्त हुई कृपा के प्रति कृतज्ञता अर्थात आभार व्यक्त करना।
🔹 श्रीफल को मनुष्य के मस्तक का प्रतिक मान कर बलि स्वरुप चढ़ाया जाता हैं। श्रीफल की जटा को मनुष्य के बाल, श्रीफल की जटा के निकट दिखने वाले तीन गोलाकार चिह्नों को को मनुष्य की आंखों एवं नाक, श्रीफल के कठोर कवच को मनुष्य की खोपड़ी, श्रीफल के पानी को मनुष्य के खून, श्रीफल के गूदे को मनुष्य का दिमाग माना जाता है।
🔹 श्रीफल फोड़ने का महत्व
श्रीफल फोड़ने मुख्य उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को दूर कर और स्वयं को भगवान समर्पित करने की भावना हैं। मान्यता हैं कि ऐसा करने पर मनुष्य की अज्ञानता एवं अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और यह आत्म शुद्धि और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के गूदे वाले सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है। श्रीफल को देवी-देवता को आर्पभ कर उसका प्रसाद बॉटने की प्रथा हिंदू संस्कृति में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। विद्वानों को मतानुशार श्रीफल के पानी को पीने से मनुष्य को अत्यधिक सुख एवं संतुष्टि की अनुभूति होती हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व #Thread
🔹 कलश का सरल अर्थ है जल से भरा हुवा सुशोभित पात्र है। हिंदू धर्म में सभी मांगलिक कार्यों में कलश स्थापित करने का विशेष महत्व माना गया हैं।
हिंदू संस्कृति में कलश को एक विशेष आकार के पात्र को कहा जाता हैं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु, मध्य में भगवान शिव और मूल में ब्रह्माजी का निवास होता है। इसलिए पूजन में कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर कलश स्थापित किया जाता है। हिंदू धर्म में कलश को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विभिन्न धार्मिक कार्यों एवं गृहप्रवेश इत्यादि शुभ कार्यों में कार्य की शुभता में वृद्धि एवं मंगल कामनाके उद्देश्य से पूजन के दोरान कलश स्थापित किया जाता है।
🔹कलश में प्रयुक्त होने वाली सामग्री
हिंदू शास्त्रों में उल्लेख हैं की कलश को बिना जल के स्थापित करना अशुभ होता है। इसीलिए कलश को हमेशा पानी इत्यादि सामग्री से भर कर रखना चाहिए। प्राय कलश में जल, पान के पत्ते, अक्षत, कुमकुम, केसर, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, श्रीफल, अनाज इत्यादि का उपयोग पूजन हेतु किया जाता हैं। विभिन्न पूजन हेतु जल के साथ भिन्न सामग्रीयों का प्रयोग किया जाता है।
🔹कलश का पवित्र जल मनुष्य के मन को स्वच्छ, निर्मल एवं शीतल बनाएं रखने का प्रतिक माना गया हैं। कलश पर स्वस्तिक चिह्न बनाने का प्रतिक को शास्त्रों में स्वस्तिक ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। स्वस्तिक को भगवान श्री गणेश का साकार रूप है। मान्त्यता हैं, कि स्वस्तिक के मध्य भाग को भगवान विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में प्रकट करने की भावना मानी जाती हैं।
🔹कलश के ऊपर श्रीफल स्थापित करना भगवान श्री गणेश का प्रतीक माना जाता है। कलश में सुपारी, पुष्प, दुर्वा इत्यादि आदि सामग्री मनुष्य की जीवन शक्ति का प्रतिक माना जाता हैं।
शुभ कार्यों में श्रीफल चढ़ाने का महत्व🧵
🔹नारियल शुभता का सूचक होने के कारण ही इसे "श्रीफल" कहा जाता हैं। श्रीफल का महत्व अत्याधिक एवं सर्वत्र रहा हैं। श्रीफल को हिंदी में नारियल, खोपरा, गरी, गोला आदि नाम से जाना जाता हैं, इस मराठी में नारळ, गुजराती में नारियर, श्रीफल, नारियेळ, बंगाली में, नारिकेल, डाबेर नारकेल, पयोधर, कन्नड में तेंगिनकायि, तेंगिन, कोब्बरि, तेंगिनकायिय मलयालम में नाळिकेर, वेळिच्चेण्ण, तेण्णा, नेपालि में नरिवल, नरिवलको तमिल में तैकाय, तेन्नै, तेनकु, तेलुगु कोब्बरि, आदि नामों से जाना जाता हैं।
🔹नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता हैं। हिंदू धर्म में सभी प्रकार के धार्मिक एवं मांगलिक कार्यों में श्रीफल अर्थात नारियल का विशेष महत्व पौराणिक काल से ही रहा है। हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुशार जब किसी नये कार्या या शुभ कार्य का प्रारंभ या शुभारंभ करना हो तो देवी-देवता के सम्मुख श्रीफल अर्पण करने और उसे फोड़ने का विशेष महत्व रहा है।
🔹यहि कारण हैं की सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों में अन्य पूजन सामग्रीयों के साथ में श्रीफल भी विशेष रुप से होता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुशार श्रीफल का उपयोग बलि कर्म के प्रतिक के रुप में भी किया जाता हैं। बलि कर्म अर्थात उपहार अथवा नैवेद्य की वस्तु। देवी-देवताओंको बलि अर्पण करने का तत्पर्य होता हैं उनकी विशेष कृपा प्राप्त करना या उनकी द्वारा प्राप्त हुई कृपा के प्रति कृतज्ञता अर्थात आभार व्यक्त करना।
🔹 श्रीफल को मनुष्य के मस्तक का प्रतिक मान कर बलि स्वरुप चढ़ाया जाता हैं। श्रीफल की जटा को मनुष्य के बाल, श्रीफल की जटा के निकट दिखने वाले तीन गोलाकार चिह्नों को को मनुष्य की आंखों एवं नाक, श्रीफल के कठोर कवच को मनुष्य की खोपड़ी, श्रीफल के पानी को मनुष्य के खून, श्रीफल के गूदे को मनुष्य का दिमाग माना जाता है।
🔹 श्रीफल फोड़ने का महत्व
श्रीफल फोड़ने मुख्य उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को दूर कर और स्वयं को भगवान समर्पित करने की भावना हैं। मान्यता हैं कि ऐसा करने पर मनुष्य की अज्ञानता एवं अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और यह आत्म शुद्धि और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के गूदे वाले सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है। श्रीफल को देवी-देवता को आर्पभ कर उसका प्रसाद बॉटने की प्रथा हिंदू संस्कृति में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। विद्वानों को मतानुशार श्रीफल के पानी को पीने से मनुष्य को अत्यधिक सुख एवं संतुष्टि की अनुभूति होती हैं।
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*नवरात्रि में 9 तिथियाँ*
नवरात्रि में 9 तिथियों को 3-3-3 तिथि में बाँटा गया है। प्रथम 3 दिन मां दुर्गा की पूजा (तामस को जीतने की आराधना) बीच की तीन तिथि माँ लक्ष्मी की पूजा(रजस)को जीतने की आराधना) तथा अंतिम 3 दिन माँ सरस्वती की पूजा (सत्व को जीतने आराधना) विशेष रुप से की जाती है।
दुर्गा की पूजा करके प्रथम दिनों में मनुष्य अपने अंदर उपस्थित दैत्य,अपने विघ्न,रोग,पाप तथा शत्रु का नाश कर डालता है। उसके बाद अगले तीन दिन सभी भौतिकवादी,आध्यात्मिक धन
और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है।अंत में आध्यात्मिक ज्ञान के उद्देश्य से कला तथा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना करता है।
अब तीनों देवी के आराधना हेतू मंत्रोँ का वर्णन करता हूँ- माँ दूर्गा के लिए नवार्ण मंत्र महाम्ंत्र है, इसको मंत्रराज कहा गया है। नवार्ण मंत्र की साधना से धन-धान्य,सुख-समृद्धि
आदि सहित सभी मनोकामनाएं
पूरी होती है।
*"ऐं हीं क्लीँ चामुण्डायै विच्चे"*
श्री लक्ष्मी जी का मूल मंत्र
*"ऊँ श्री हीं क्लीँ ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा"*
श्री माँ सरस्वती जी का वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र
जिसे भगवान शिव ने कणादमुनी तथा गौतम मुनि, श्री नारायण ने वाल्मीकि को, ब्रह्मा जी ने भृगु को, भृगुमुनि ने शुक्राचार्य को, शुक्राचार्य ने कश्यप को, कश्यप ने बृहस्पति को दिया था। जिसको सिद्ध करने से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है--
*"श्री हीं सरस्वत्यै स्वाहा"*
नवरात्रि में 9 तिथियों को 3-3-3 तिथि में बाँटा गया है। प्रथम 3 दिन मां दुर्गा की पूजा (तामस को जीतने की आराधना) बीच की तीन तिथि माँ लक्ष्मी की पूजा(रजस)को जीतने की आराधना) तथा अंतिम 3 दिन माँ सरस्वती की पूजा (सत्व को जीतने आराधना) विशेष रुप से की जाती है।
दुर्गा की पूजा करके प्रथम दिनों में मनुष्य अपने अंदर उपस्थित दैत्य,अपने विघ्न,रोग,पाप तथा शत्रु का नाश कर डालता है। उसके बाद अगले तीन दिन सभी भौतिकवादी,आध्यात्मिक धन
और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है।अंत में आध्यात्मिक ज्ञान के उद्देश्य से कला तथा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना करता है।
अब तीनों देवी के आराधना हेतू मंत्रोँ का वर्णन करता हूँ- माँ दूर्गा के लिए नवार्ण मंत्र महाम्ंत्र है, इसको मंत्रराज कहा गया है। नवार्ण मंत्र की साधना से धन-धान्य,सुख-समृद्धि
आदि सहित सभी मनोकामनाएं
पूरी होती है।
*"ऐं हीं क्लीँ चामुण्डायै विच्चे"*
श्री लक्ष्मी जी का मूल मंत्र
*"ऊँ श्री हीं क्लीँ ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा"*
श्री माँ सरस्वती जी का वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र
जिसे भगवान शिव ने कणादमुनी तथा गौतम मुनि, श्री नारायण ने वाल्मीकि को, ब्रह्मा जी ने भृगु को, भृगुमुनि ने शुक्राचार्य को, शुक्राचार्य ने कश्यप को, कश्यप ने बृहस्पति को दिया था। जिसको सिद्ध करने से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है--
*"श्री हीं सरस्वत्यै स्वाहा"*
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*शारदीय नवरात्रि 2024 तिथियाँ*
*पञ्चाङ्ग के अनुसार इस वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 02 अक्तूबर 2024 की रात्रि 12 बजकर 19 मिनट से हो रहा है। इसका समापन 4 अक्टूबर को प्रातः 02 बजकर 58 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 03 अक्टूबर 2024 को होगा, और इस दिन से ही नवरात्रि की शुरूआत होगी।*
*पहला दिन - माँ शैलपुत्री की पूजा*
*दूसरा दिन- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा – 4 अक्तूबर 2024*
*तीसरा दिन- मां चंद्रघंटा की पूजा – 05 अक्तूबर 2024*
*चौथा दिन- मां कूष्मांडा की पूजा 06 अक्तूबर 2024*
*पांचवां दिन- मां स्कंदमाता की पूजा – 7 अक्तूबर 2024*
*छठा दिन- मां कात्यायनी की पूजा – 8 अक्तूबर 2024*
*सातवां दिन- मां कालरात्रि की पूजा – 9 अक्तूबर 2024*
*आठवां दिन- मां सिद्धिदात्री की पूजा – 10 अक्तूबर 2024*
*नौवां दिन- मां महागौरी की पूजा – 11 अक्तूबर 2024*
*विजयदशमी – 12 अक्टूबर 2024, दुर्गा विसर्जन*
*पञ्चाङ्ग के अनुसार इस वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 02 अक्तूबर 2024 की रात्रि 12 बजकर 19 मिनट से हो रहा है। इसका समापन 4 अक्टूबर को प्रातः 02 बजकर 58 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 03 अक्टूबर 2024 को होगा, और इस दिन से ही नवरात्रि की शुरूआत होगी।*
*पहला दिन - माँ शैलपुत्री की पूजा*
*दूसरा दिन- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा – 4 अक्तूबर 2024*
*तीसरा दिन- मां चंद्रघंटा की पूजा – 05 अक्तूबर 2024*
*चौथा दिन- मां कूष्मांडा की पूजा 06 अक्तूबर 2024*
*पांचवां दिन- मां स्कंदमाता की पूजा – 7 अक्तूबर 2024*
*छठा दिन- मां कात्यायनी की पूजा – 8 अक्तूबर 2024*
*सातवां दिन- मां कालरात्रि की पूजा – 9 अक्तूबर 2024*
*आठवां दिन- मां सिद्धिदात्री की पूजा – 10 अक्तूबर 2024*
*नौवां दिन- मां महागौरी की पूजा – 11 अक्तूबर 2024*
*विजयदशमी – 12 अक्टूबर 2024, दुर्गा विसर्जन*
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