Forwarded from पुराण प्रवचन
महर्षी दयानंद जी अपने ग्रंथ ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका में वेद में पृथ्वी के भ्रमण सिद्धि के लिए यजुर्वेद (३/६) का मंत्र "
" उपस्थित किए है।
जिसपे पौराणिकों के करपात्री ने आपत्ति उठा कर अपने किताब वेदार्थ पारिजात में लिखते हैं की इसमें पृथ्वी घूमने की बात नहीं है अपितु सूर्य घूमती है पृथ्वी के चारों ओर यह लिखा है।
सायद करपात्री ने इस मंत्र पर जैमिनीय ब्राह्मण का व्याख्या नहीं पढ़ा था 🤣 और अपने सायण के भाष्य उठा के चेप दिया। 😂
सायण ने अपने ऋग्वेद (१०/१८९/१) में आए यही आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒द वाला मंत्र के भाष्य में में गौः शब्द तथा पृश्निः को सूर्य के विशेषण में व्याख्या किया है।
जब की जैमिनीय ब्राह्मण (३/३०४) में आयं गौः पृश्निः का व्याख्या कुछ इस प्रकार आया है की "इयं पृथिवी पृश्निं वर्णम्" अर्थात यहां पृथ्वी की परिपेक्ष में व्याख्या किया जा सकता है। स्वामी दयानंद जी का मत ब्राह्मण ग्रंथों से सिद्ध है।
और इसी मंत्र में आगे पृथ्वी के लिए अक्रमीत् शब्द भी आया है जिसका अर्थ है गमनशील
इसपर मेरा ब्लाग आर्टिकल अवश्य पढ़ें।
👇👇😎
https://vedkabhedexposse.blogspot.com/2024/08/36.html?m=1
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒द
" उपस्थित किए है।
जिसपे पौराणिकों के करपात्री ने आपत्ति उठा कर अपने किताब वेदार्थ पारिजात में लिखते हैं की इसमें पृथ्वी घूमने की बात नहीं है अपितु सूर्य घूमती है पृथ्वी के चारों ओर यह लिखा है।
सायद करपात्री ने इस मंत्र पर जैमिनीय ब्राह्मण का व्याख्या नहीं पढ़ा था 🤣 और अपने सायण के भाष्य उठा के चेप दिया। 😂
सायण ने अपने ऋग्वेद (१०/१८९/१) में आए यही आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒द वाला मंत्र के भाष्य में में गौः शब्द तथा पृश्निः को सूर्य के विशेषण में व्याख्या किया है।
जब की जैमिनीय ब्राह्मण (३/३०४) में आयं गौः पृश्निः का व्याख्या कुछ इस प्रकार आया है की "इयं पृथिवी पृश्निं वर्णम्" अर्थात यहां पृथ्वी की परिपेक्ष में व्याख्या किया जा सकता है। स्वामी दयानंद जी का मत ब्राह्मण ग्रंथों से सिद्ध है।
और इसी मंत्र में आगे पृथ्वी के लिए अक्रमीत् शब्द भी आया है जिसका अर्थ है गमनशील
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इस जाहिल थोर ने वेद में पृथ्वी को स्थिर साबित करने के लिए ऋग्वेद (२/१२/२) का सायण भाष्य से प्रमाण दिया की आचार्य सायण ने वहां पृथ्वी को दृढ़ का अर्थ स्थिर किया हुआ है। 😂😂
जब की आचार्य सायण ने ऋग्वेद (२/१२/२) में दृढ़ का अर्थ करते हुए लिखते हैं "शर्करादिभिर्दृढामकरोत्" जिसका अर्थ है परमात्मा ने भूमि को सुखा कर पाषाण बना के दृढ़ ( ठोस) किया। जैसा कि धरती के नीचे के लावा ऊपर आने से वह सुख कर पाषाण बन जाती है उस से भूमि ठोस बनती है।
तैत्तिरीयब्राह्मण (१/१/३/६-७) में भी यही बात लिखा है "तां शर्कराभिः अदूंहत्" अर्थात उस पृथ्वी को प्रजापति ने पाषाण आदि से दृढ़ (ठोस) बनाया ।
इस जाहिल Thor ने ढंग से आचार्य सायण के भाष्य भी नही पढ़ा और जो मन में आया वही चेप दी। 😂😂
जब की आचार्य सायण ने ऋग्वेद (२/१२/२) में दृढ़ का अर्थ करते हुए लिखते हैं "शर्करादिभिर्दृढामकरोत्" जिसका अर्थ है परमात्मा ने भूमि को सुखा कर पाषाण बना के दृढ़ ( ठोस) किया। जैसा कि धरती के नीचे के लावा ऊपर आने से वह सुख कर पाषाण बन जाती है उस से भूमि ठोस बनती है।
तैत्तिरीयब्राह्मण (१/१/३/६-७) में भी यही बात लिखा है "तां शर्कराभिः अदूंहत्" अर्थात उस पृथ्वी को प्रजापति ने पाषाण आदि से दृढ़ (ठोस) बनाया ।
इस जाहिल Thor ने ढंग से आचार्य सायण के भाष्य भी नही पढ़ा और जो मन में आया वही चेप दी। 😂😂
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स्वयं नारायणावतार श्रीकृष्ण द्वारा स्त्री के स्वाभाविक गुणों की प्रशंसा |
~ श्रीमद्भगवद्गीता 10/34
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( Garuda is offline nowadays due to his exams , so please manage for a few more days )
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भक्ष्य एवं अभक्ष्य के विषय में श्येन एवं शालंकायन का संवाद :
श्येन प्राचीन धर्म को प्रस्तावित करते हुए कहता है :
" जिस प्रकार आप (मनुष्य) के भक्षण हेतु सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने अन्न का निर्माण किया है , उसी प्रकार हमारे (बाज़ आदि शिकार पक्षियों) ने मूषक (चूहे) का निर्माण किया है। "
श्येन के इस वचन से हमें वैदिक धर्म में मानव के भोजन के रूप में अन्न का महत्व पता चलता है। साथ ही मनुष्य का भोजन भी अन्न ही है , यह भी समझ आता है।
आगे श्येन कहता है कि द्विजातियों के लिए मद्यपान निषेध है और उसी प्रकार मद्यपान करने के कारण शराबियों को यज्ञीय हविष्य अभक्ष्य है।
अत: हमें मद्यपान जैसे दुर्व्यसनों को त्याग और शाकाहारी बन सात्विक प्रवृत्ति की और बढ़ना चाहिए ।
सन्दर्भ : काकोलुकीयम् , पंचतन्त्र
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Post Credit : Mystical Garuda 🦅
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Posts will be recontinued from 29/30 of September.
Sorry for inconvenience..
Some posts are being scheduled. They will be uploaded in between these 2-3 days gap.
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हमारी दिनचर्या में, हमारे जीवन से जुड़े कई सवाल होते हैं। हम सभी बेसब्री से उनके जवाब जानना चाहते थे ।
यहां आपके दैनिक जीवन से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। इसके अलावा, आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझाव भी हैं।
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यहां आपके दैनिक जीवन से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। इसके अलावा, आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझाव भी हैं।
सन्दर्भ: विदुर नीति, तृतीय अध्याय
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कन्याकुमारी का इतिहास :
हम सभी जानते हैं कि माता पार्वती कितनी बड़ी तपस्विनी थीं। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई वर्षों तक कठिन तपस्या की।
भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिणी सिरे पर स्थित कन्याकुमारी उनकी तपस्या का एक प्रमुख केंद्र था जहाँ वे देवी कुमारी के रूप में भगवान शिव की पूजा करती थीं।
क्या आप जानते हैं कि यह कितने वर्षों से वैदिक लोगों के लिए एक धार्मिक तीर्थस्थल रहा है ?
1st century CE में लिखी गई Periplus of Erythraean Sea , जो हिंद महासागर में व्यापार मार्ग से संबंधित एक यूनानी पुस्तक है । इसमें उल्लेख है कि :-
" कुमारी भारतीय लोगों के लिए एक बंदरगाह और तीर्थस्थल था। यहां बहुत से लोग पवित्र स्नान करने आते हैं।
यहां पुरुष और महिलाएं आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने भी आते हैं। इससे जुड़ी कहानी कहती है कि एक बार एक देवी यहां रहती थी और स्नान करती थी । "
कन्याकुमारी में शाक्त परंपरा की जड़ें बहुत प्राचीन काल से हैं।
नमो दैव्यै महा दैव्यै 🙏🙏
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
कन्याकुमारी का इतिहास : हम सभी जानते हैं कि माता पार्वती कितनी बड़ी तपस्विनी थीं। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई वर्षों तक कठिन तपस्या की। भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिणी सिरे पर स्थित कन्याकुमारी उनकी तपस्या का एक प्रमुख केंद्र था जहाँ…
अत: यहां से तीन बातें सिद्ध होती हैं:-
1. प्राचीन भारत में महिलाएं भी ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करती थीं (अगर ब्रह्मचर्य पालन होता होगा तो जाहिर सी बात है कि गुरुकुल , वेदादि ग्रन्थ , वैदिक शिक्षाप्रणाली आदि भी होती होगी )
2. भारत के लोगो की माँ आदिशक्ति में आस्था और भक्ति का भी पता चलता है।
3. देवी माँ की पूजा का प्राचीन इतिहास।
1. प्राचीन भारत में महिलाएं भी ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करती थीं (अगर ब्रह्मचर्य पालन होता होगा तो जाहिर सी बात है कि गुरुकुल , वेदादि ग्रन्थ , वैदिक शिक्षाप्रणाली आदि भी होती होगी )
2. भारत के लोगो की माँ आदिशक्ति में आस्था और भक्ति का भी पता चलता है।
3. देवी माँ की पूजा का प्राचीन इतिहास।
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कुछ दिन पहले मैंने कुछ सज्जनों को आपातकाल में अभक्ष्य-भक्षण का अंध-समर्थन करते देखा था।
उन्हें हमने सर्वकालिक निषेध भी दिखाया परंतु उन्हें संतुष्टि नहीं मिली।
पंचतंत्र में भी प्राचीन ग्रंथों को उद्धृत करते हुए कहा गया है:
" प्राण कंठ में आ जाए, तब भी विद्वान मनुष्य को अभक्ष्य भक्षण नहीं करना चाहिए क्योंकि ये लोक और परलोक दोनों के लिए अच्छे नहीं हैं। "
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उन्हें हमने सर्वकालिक निषेध भी दिखाया परंतु उन्हें संतुष्टि नहीं मिली।
पंचतंत्र में भी प्राचीन ग्रंथों को उद्धृत करते हुए कहा गया है:
" प्राण कंठ में आ जाए, तब भी विद्वान मनुष्य को अभक्ष्य भक्षण नहीं करना चाहिए क्योंकि ये लोक और परलोक दोनों के लिए अच्छे नहीं हैं। "
संदर्भ : पंचतंत्र, मित्रभेदः
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