Video Story by The Narrative
> हिन्दू विरोधी पन्नालाल का सच!
📍 ईसाई पादरी अरुण पन्नालाल का आपत्तिजनक बयान!
📍 पहलगाम पोस्ट पर पहले भी हो चुकी है FIR!
📍 आखिर बार-बार क्यों हिन्दू विरोधी बयान?
YouTube Link - https://youtu.be/cuGOVkIUr4c
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हिन्दू विरोधी पन्नालाल का सच! | The Narrative
पहलगाम हमले से जुड़े पुराने सोशल मीडिया पर विवाद, CNI Diocese द्वारा प्रतिनिधित्व के दावे से इनकार और अब गिरफ्तारी – अरुण पन्नालाल एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। जानिये अरुण पन्नालाल से जुड़े पूरे विवाद की कहानी इस वीडियो में।
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स्वदेशी आंदोलन - आत्मनिर्भरता से जागा राष्ट्रीय स्वाभिमान
> भारत की स्वाधीनता के लिए किए गए संघर्षों की गाथा
वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध से उभरा स्वदेशी आंदोलन, केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं था. यह भारतीयों में आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला व्यापक जनआंदोलन बन गया.
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष जैसे नेताओं ने स्वदेशी के विचार को जन-जन तक पहुँचाया.
इस आंदोलन ने विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा.
स्वदेशी की वह चेतना आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला बनी और आज भी आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रेरणा देती है.
मेरी संस्कृति…मेरा देश…मेरा अभिमान 🚩
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> भारत की स्वाधीनता के लिए किए गए संघर्षों की गाथा
वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध से उभरा स्वदेशी आंदोलन, केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं था. यह भारतीयों में आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला व्यापक जनआंदोलन बन गया.
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष जैसे नेताओं ने स्वदेशी के विचार को जन-जन तक पहुँचाया.
इस आंदोलन ने विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा.
स्वदेशी की वह चेतना आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला बनी और आज भी आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रेरणा देती है.
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भारत - विचार
> एक तरफ गालियाँ, अराजकता और कैमरों के सामने हंगामा; दूसरी तरफ बिना पत्थर उठाए अनुशासित छात्र आंदोलन! आखिर किसका प्रतिरोध अधिक शक्तिशाली है और क्यों? पढ़िए पूरा विश्लेषण!
https://tinyurl.com/96t6zhkb
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भारत - विचार
> एक तरफ गालियाँ, अराजकता और कैमरों के सामने हंगामा; दूसरी तरफ बिना पत्थर उठाए अनुशासित छात्र आंदोलन! आखिर किसका प्रतिरोध अधिक शक्तिशाली है और क्यों? पढ़िए पूरा विश्लेषण!
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जब कोई आंदोलन पत्थर नहीं उठाता
आंदोलन की शक्ति पत्थरों, गालियों और अराजकता में नहीं, बल्कि विचार, अनुशासन और स्पष्ट माँगों में होती है।
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भारत की स्वाधीनता के लिए जब 'भारत छोड़ो आंदोलन' किया जा रहा था, तब कम्युनिस्ट समूह इसका विरोध कर रहे थे. ब्रिटिश हुकूमत का पक्ष लेने वाले यही वामपंथी आज स्वतंत्रता पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. आखिर क्या चाहते थे कम्युनिस्ट? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!
> THE QUIT INDIA QUESTION - WHEN COMMUNISTS OPPOSED INDIA'S FREEDOM STRUGGLE
✒️ The Narrative
भारत की स्वाधीनता के लिए जब 'भारत छोड़ो आंदोलन' किया जा रहा था, तब कम्युनिस्ट समूह इसका विरोध कर रहे थे. ब्रिटिश हुकूमत का पक्ष लेने वाले यही वामपंथी आज स्वतंत्रता पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. आखिर क्या चाहते थे कम्युनिस्ट? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!
> THE QUIT INDIA QUESTION - WHEN COMMUNISTS OPPOSED INDIA'S FREEDOM STRUGGLE
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15 अगस्त: भारतीय स्वाधीनता दिवस
लगभग 800 वर्षों तक आक्रमणकारी इस्लामिक एवं ईसाई शक्तियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के पश्चात अंततः 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वाधीन हुआ.
शताब्दियों तक लाखों - करोड़ों भारतीयों ने आक्रमणकारियों के साथ युद्ध लड़ें, क्रांति की और भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी.
क्रांतिकारियों और वीरांगनाओं के साथ-साथ सर्व समाज के प्रयासों के कारण अंग्रेजों ने भारत छोड़ा और हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई.
> स्वाधीनता दिवस की आप सभी को अनंत शुभकामनाएं !!
मेरी संस्कृति…मेरा देश…मेरा अभिमान 🇮🇳
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लगभग 800 वर्षों तक आक्रमणकारी इस्लामिक एवं ईसाई शक्तियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के पश्चात अंततः 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वाधीन हुआ.
शताब्दियों तक लाखों - करोड़ों भारतीयों ने आक्रमणकारियों के साथ युद्ध लड़ें, क्रांति की और भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी.
क्रांतिकारियों और वीरांगनाओं के साथ-साथ सर्व समाज के प्रयासों के कारण अंग्रेजों ने भारत छोड़ा और हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई.
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फूलों की घाटी, उत्तराखंड
उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, हिमालय की गोद में बसा ऐसा प्राकृतिक धरोहर स्थल है, जहाँ वर्षा ऋतु में हजारों प्रजातियों के रंग-बिरंगे पुष्प धरती को स्वर्ग जैसा स्वरूप प्रदान करते हैं.
समुद्र तल से लगभग 3,200 से 3,600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह घाटी, दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियों और जैव विविधता का अनमोल भंडार है। इसी अद्वितीय प्राकृतिक संपदा के कारण इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है.
जुलाई से सितंबर के बीच पूरी घाटी रंग-बिरंगे फूलों से आच्छादित हो जाती है. यहाँ ब्रह्मकमल, ब्लू पॉपी, प्रिमूला, एनीमोन सहित सैकड़ों दुर्लभ पुष्प प्रजातियाँ और अनेक वन्यजीव प्राकृतिक संतुलन की अद्भुत छटा प्रस्तुत करते हैं.
यह क्षेत्र देवताओं और ऋषियों की तपोभूमि रहा है. निकट स्थित हेमकुंड साहिब और लोकआस्थाओं से जुड़ी यह पावन भूमि प्रकृति और आध्यात्मिकता के सुंदर संगम का अनुभव कराती है.
मेरी संस्कृति…मेरा देश…मेरा अभिमान 🚩
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उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, हिमालय की गोद में बसा ऐसा प्राकृतिक धरोहर स्थल है, जहाँ वर्षा ऋतु में हजारों प्रजातियों के रंग-बिरंगे पुष्प धरती को स्वर्ग जैसा स्वरूप प्रदान करते हैं.
समुद्र तल से लगभग 3,200 से 3,600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह घाटी, दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियों और जैव विविधता का अनमोल भंडार है। इसी अद्वितीय प्राकृतिक संपदा के कारण इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है.
जुलाई से सितंबर के बीच पूरी घाटी रंग-बिरंगे फूलों से आच्छादित हो जाती है. यहाँ ब्रह्मकमल, ब्लू पॉपी, प्रिमूला, एनीमोन सहित सैकड़ों दुर्लभ पुष्प प्रजातियाँ और अनेक वन्यजीव प्राकृतिक संतुलन की अद्भुत छटा प्रस्तुत करते हैं.
यह क्षेत्र देवताओं और ऋषियों की तपोभूमि रहा है. निकट स्थित हेमकुंड साहिब और लोकआस्थाओं से जुड़ी यह पावन भूमि प्रकृति और आध्यात्मिकता के सुंदर संगम का अनुभव कराती है.
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The Narrative
रविवार विशेष - पॉजिटिव नैरेटिव
> असम की बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, लेकिन संकट के बीच लोगों की एकजुटता और मानवता ने आशा की किरण पेश की। पढ़िए पूरा लेख!
https://short-url.cc/1vVyZ
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रविवार विशेष - पॉजिटिव नैरेटिव
> असम की बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, लेकिन संकट के बीच लोगों की एकजुटता और मानवता ने आशा की किरण पेश की। पढ़िए पूरा लेख!
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Indian - Internal Security
> India’s August 2026 map exercise should therefore be understood precisely: New Delhi has not “renamed” Arunachal Pradesh. It has formally identified 27 places and features using standard names on Survey of India maps, creating a clearer official reference for public recognition.
https://shorturl.at/uXjzQ
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Indian - Internal Security
> India’s August 2026 map exercise should therefore be understood precisely: New Delhi has not “renamed” Arunachal Pradesh. It has formally identified 27 places and features using standard names on Survey of India maps, creating a clearer official reference for public recognition.
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India Draws The Line : Bharat Counters China’s Cartographic Aggression In Arunachal Pradesh
From repeated renaming exercises to frontier villages, Beijing's claim over Arunachal Pradesh now faces a more explicit Indian response
नामपल्ली गुट्टा मंदिर, तेलंगाना 🐍
वेमुलावाड़ा क्षेत्र में स्थित यह नाग मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्यकला एवं उत्कृष्ट वास्तुकला के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है. क्षेत्र के प्रसिद्ध लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर के समीप यह स्थल अवस्थित है.
इस नाग मंदिर की आकृति ही सर्पनुमा बनाई गई है, जिसके शीर्ष पर भगवान श्री कृष्ण विराजमान हैं, जो श्रीकृष्ण कथा के कालिया नाग से जुड़ी घटना को याद दिलाता है.
इस नाग मंदिर में भीतर प्रवेश करने के किए सर्प के पेट से प्रवेश करना होता है, जो कि श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को अत्यंत ही रोमांचित करता है.
आप सभी को नाग पंचमी की शुभकामनाएं 🐍
मेरी संस्कृति...मेरा देश…मेरा अभिमान 🚩
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वेमुलावाड़ा क्षेत्र में स्थित यह नाग मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्यकला एवं उत्कृष्ट वास्तुकला के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है. क्षेत्र के प्रसिद्ध लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर के समीप यह स्थल अवस्थित है.
इस नाग मंदिर की आकृति ही सर्पनुमा बनाई गई है, जिसके शीर्ष पर भगवान श्री कृष्ण विराजमान हैं, जो श्रीकृष्ण कथा के कालिया नाग से जुड़ी घटना को याद दिलाता है.
इस नाग मंदिर में भीतर प्रवेश करने के किए सर्प के पेट से प्रवेश करना होता है, जो कि श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को अत्यंत ही रोमांचित करता है.
आप सभी को नाग पंचमी की शुभकामनाएं 🐍
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देवघर बाबा धाम - जहां महादेव बने वैद्यनाथ 🛕
झारखंड के देवघर में स्थित महादेव को समर्पित ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के वैद्य रूप की उपासना का केंद्र है.
पौराणिक आख्यानों के अनुसार यहीं माता सती का हृदय गिरा था, इसलिए यहां एक शक्तिपीठ भी है.
श्रावण मास में लाखों कांवड़िए बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करते हैं.
यहाँ एक अनोखा अनुष्ठान भी है, भगवान शिव के मंदिर से शिखर तक लाल धागे से ‘गठबंधन’ किया जाता है जो मां पार्वती के मंदिर से जुड़ा होता है. इस विशिष्ट प्रक्रिया को 'गठजोड़वा' परंपरा कहा जाता है.
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झारखंड के देवघर में स्थित महादेव को समर्पित ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के वैद्य रूप की उपासना का केंद्र है.
पौराणिक आख्यानों के अनुसार यहीं माता सती का हृदय गिरा था, इसलिए यहां एक शक्तिपीठ भी है.
श्रावण मास में लाखों कांवड़िए बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करते हैं.
यहाँ एक अनोखा अनुष्ठान भी है, भगवान शिव के मंदिर से शिखर तक लाल धागे से ‘गठबंधन’ किया जाता है जो मां पार्वती के मंदिर से जुड़ा होता है. इस विशिष्ट प्रक्रिया को 'गठजोड़वा' परंपरा कहा जाता है.
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The Narrative
Politics - Appeasement
> Revanth Reddy’s free-power pitch and Muslim quota push have reignited scrutiny over Congress’s minority-focused welfare and vote-bank politics
https://short-url.cc/1BTgg
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> Revanth Reddy’s free-power pitch and Muslim quota push have reignited scrutiny over Congress’s minority-focused welfare and vote-bank politics
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कोठवालगुड़ा इको पार्क, भाग्यनगर
तेलंगाना के भाग्यनगर में स्थित कोठवालगुड़ा इको पार्क, शहरी जीवन के बीच प्रकृति, जल और जैव-विविधता को सहेजने का सुंदर उदाहरण है.
झील, हरित क्षेत्र, देशी वनस्पतियाँ और पक्षियों की उपस्थिति इस स्थान को केवल मनोरंजन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भारतीय जीवनदृष्टि का आधुनिक रूप प्रदान करती है.
यहाँ प्रकृति-पथों पर चलते हुए, जलाशय के किनारे बैठकर और हरियाली के बीच समय बिताते हुए महानगर की भागदौड़ से अलग एक शांत अनुभव मिलता है.
भाग्यनगर के मध्य विकसित यह हरित स्थल आधुनिक भारत में प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का सुंदर संदेश देता है.
मेरी संस्कृति...मेरा देश…मेरा अभिमान 🚩
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तेलंगाना के भाग्यनगर में स्थित कोठवालगुड़ा इको पार्क, शहरी जीवन के बीच प्रकृति, जल और जैव-विविधता को सहेजने का सुंदर उदाहरण है.
झील, हरित क्षेत्र, देशी वनस्पतियाँ और पक्षियों की उपस्थिति इस स्थान को केवल मनोरंजन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भारतीय जीवनदृष्टि का आधुनिक रूप प्रदान करती है.
यहाँ प्रकृति-पथों पर चलते हुए, जलाशय के किनारे बैठकर और हरियाली के बीच समय बिताते हुए महानगर की भागदौड़ से अलग एक शांत अनुभव मिलता है.
भाग्यनगर के मध्य विकसित यह हरित स्थल आधुनिक भारत में प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का सुंदर संदेश देता है.
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Short Video Story by The Narrative
> ‘दिमागी नक्सल’ पर गर्व? चिदंबरम से बस्तर के पीड़ितों का सवाल!
📍दिल्ली पहुंचे बस्तर के पीड़ित!
📍चिदंबरम का विवादित बयान!
📍देखिये पूरा वीडियो!
YouTube Link - https://youtube.com/shorts/m7iZDq_i2T4
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> ‘दिमागी नक्सल’ पर गर्व? चिदंबरम से बस्तर के पीड़ितों का सवाल!
📍दिल्ली पहुंचे बस्तर के पीड़ित!
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दिमागी नक्सल’ पर गर्व? चिदंबरम से बस्तर के पीड़ितों का सवाल | The Narrative
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ के विवादित बयान के बाद ...
The Narrative Graphical Document
दिमागी नक्सल क्या है? कौन हैं? क्या है इनकी कार्यशैली? क्या भारत में अराजकता फैलाने वाले दिमागी नक्सल हैं? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!
> दिमागी नक्सल - नक्सलवाद के वैचारिक समर्थक कौन?
✒️ The Narrative
दिमागी नक्सल क्या है? कौन हैं? क्या है इनकी कार्यशैली? क्या भारत में अराजकता फैलाने वाले दिमागी नक्सल हैं? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!
> दिमागी नक्सल - नक्सलवाद के वैचारिक समर्थक कौन?
✒️ The Narrative
महरौली का लौह स्तंभ - 1600 वर्षों अडिग खड़ा भारतीय धातुकर्म
दिल्ली के महरौली स्थित लौह स्तंभ, प्राचीन भारत की धातुकर्म और शिल्पकला की असाधारण उपलब्धि का जीवंत प्रमाण है. लगभग 7.2 मीटर ऊँचा यह स्तंभ गुप्तकाल का है और इसके अभिलेख में राजा चंद्र का उल्लेख मिलता है.
लगभग 1,600 वर्षों से खुले वातावरण में खड़े इस लौह स्तंभ पर अभी तक कोई गंभीर जंग दिखाई नहीं देती है. इसके पीछे इसके लौह की संरचना, निर्माण तकनीक और दिल्ली की स्थानीय जलवायु, इन सभी का योगदान माना जाता है.
स्तंभ पर संस्कृत में उत्कीर्ण अभिलेख राजा चंद्र की विजयों और भगवान विष्णु के प्रति उनकी भक्ति का उल्लेख करता है. इससे यह केवल धातु की अद्भुत वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास, भाषा, धर्म और विज्ञान, चारों का संगम बन जाता है.
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दिल्ली के महरौली स्थित लौह स्तंभ, प्राचीन भारत की धातुकर्म और शिल्पकला की असाधारण उपलब्धि का जीवंत प्रमाण है. लगभग 7.2 मीटर ऊँचा यह स्तंभ गुप्तकाल का है और इसके अभिलेख में राजा चंद्र का उल्लेख मिलता है.
लगभग 1,600 वर्षों से खुले वातावरण में खड़े इस लौह स्तंभ पर अभी तक कोई गंभीर जंग दिखाई नहीं देती है. इसके पीछे इसके लौह की संरचना, निर्माण तकनीक और दिल्ली की स्थानीय जलवायु, इन सभी का योगदान माना जाता है.
स्तंभ पर संस्कृत में उत्कीर्ण अभिलेख राजा चंद्र की विजयों और भगवान विष्णु के प्रति उनकी भक्ति का उल्लेख करता है. इससे यह केवल धातु की अद्भुत वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास, भाषा, धर्म और विज्ञान, चारों का संगम बन जाता है.
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