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प्र. ३२२. क्या यज्ञ कर्म को यंत्रीकरण द्वारा स्वचालित बनाकर भी सम्पन्न किया जा सकता है ? उत्तर : हाँ, किया जा सकता है किन्तु स्वयं करने से जो लाभ होते हैं वे नहीं मिल पायेंगे । @vaidic_gyan
प्र. ३२३. क्या मन्त्रों का अशुद्ध उच्चारण करने वाले यज्ञकर्त्ता को पाप लगता है या लाभ नहीं होता है या कोई हानि होती है ?
उत्तर : अशुद्ध मंत्रों का उच्चारण करके यज्ञ करने से भी भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। लेकिन वे मंत्रों को गलत तरीके से सीखते हैं और गलत परंपरा का पालन करते हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : अशुद्ध मंत्रों का उच्चारण करके यज्ञ करने से भी भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। लेकिन वे मंत्रों को गलत तरीके से सीखते हैं और गलत परंपरा का पालन करते हैं।
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प्र. ३२३. क्या मन्त्रों का अशुद्ध उच्चारण करने वाले यज्ञकर्त्ता को पाप लगता है या लाभ नहीं होता है या कोई हानि होती है ? उत्तर : अशुद्ध मंत्रों का उच्चारण करके यज्ञ करने से भी भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। लेकिन वे मंत्रों को गलत तरीके से सीखते हैं और गलत परंपरा…
प्र. ३२४. जो व्यक्ति बिना ही आहुति दिये, बिना ही मंत्रों को बोले यज्ञ शाला में बैठे होते हैं उनको भी यज्ञ का लाभहोता है ?
उत्तर : हाँ होता है। उन्हें भी भेषज वायु मिलता है। मन्त्रों से प्रेरणा मिलती है। मन्त्र याद भी होते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : हाँ होता है। उन्हें भी भेषज वायु मिलता है। मन्त्रों से प्रेरणा मिलती है। मन्त्र याद भी होते हैं ।
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प्र. ३२४. जो व्यक्ति बिना ही आहुति दिये, बिना ही मंत्रों को बोले यज्ञ शाला में बैठे होते हैं उनको भी यज्ञ का लाभहोता है ? उत्तर : हाँ होता है। उन्हें भी भेषज वायु मिलता है। मन्त्रों से प्रेरणा मिलती है। मन्त्र याद भी होते हैं । @vaidic_gyan
प्र. ३२५. यज्ञ करते समय मन को कहाँ पर केन्द्रित करना चाहिये मंत्र के अर्थ पर, अग्नि पर, ध्वनि पर या अन्य स्थान पर ?
उत्तर : उत्तम तो यह है कि मन को मन्त्र के अर्थों में लगाना चाहिए या ईश्वर में लगाना चाहिए या फिर अग्नि की लपटों में लगाना चाहिए।
@vaidic_gyan
उत्तर : उत्तम तो यह है कि मन को मन्त्र के अर्थों में लगाना चाहिए या ईश्वर में लगाना चाहिए या फिर अग्नि की लपटों में लगाना चाहिए।
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17.5.2026
*"हर व्यक्ति अपने गुणों के माध्यम से चमकना चाहता है।"* अच्छी बात है, चमकना चाहिए। इसके लिए आपको सुबह से ही पुरुषार्थ करना होगा।
*"रात को सोने से पहले अगले दिन की योजना बना लें, कि कल मुझे क्या-क्या करना है।उसके लिए सभी आवश्यक साधन सामग्री रात को ही जुटा लें। और सुबह उठते ही चमकने के लिए तैयार हो जाएं।"*
सुबह का सूर्योदय प्रतिदिन आपको एक उत्तम अवसर देता है। *"अब यह आप पर निर्भर करता है, कि आप कितना पुरुषार्थ करते हैं, और कितना चमकते हैं!"*
सुबह का सूर्य उदय देखकर बहुत उत्साह उत्पन्न होता है, उस उत्साह का लाभ उठाएं और चमकने के लिए तैयार हो जाएं। *"पूरा दिन पुरुषार्थ करें, और संसार को अपनी योग्यता दिखलाएं। उसी से जब आप संसार में चमकेंगे, तभी कोई आपको धन और सम्मान देगा, और तभी आपका जीवन सफल होगा।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
*"हर व्यक्ति अपने गुणों के माध्यम से चमकना चाहता है।"* अच्छी बात है, चमकना चाहिए। इसके लिए आपको सुबह से ही पुरुषार्थ करना होगा।
*"रात को सोने से पहले अगले दिन की योजना बना लें, कि कल मुझे क्या-क्या करना है।उसके लिए सभी आवश्यक साधन सामग्री रात को ही जुटा लें। और सुबह उठते ही चमकने के लिए तैयार हो जाएं।"*
सुबह का सूर्योदय प्रतिदिन आपको एक उत्तम अवसर देता है। *"अब यह आप पर निर्भर करता है, कि आप कितना पुरुषार्थ करते हैं, और कितना चमकते हैं!"*
सुबह का सूर्य उदय देखकर बहुत उत्साह उत्पन्न होता है, उस उत्साह का लाभ उठाएं और चमकने के लिए तैयार हो जाएं। *"पूरा दिन पुरुषार्थ करें, और संसार को अपनी योग्यता दिखलाएं। उसी से जब आप संसार में चमकेंगे, तभी कोई आपको धन और सम्मान देगा, और तभी आपका जीवन सफल होगा।"*
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प्र. ३२५. यज्ञ करते समय मन को कहाँ पर केन्द्रित करना चाहिये मंत्र के अर्थ पर, अग्नि पर, ध्वनि पर या अन्य स्थान पर ? उत्तर : उत्तम तो यह है कि मन को मन्त्र के अर्थों में लगाना चाहिए या ईश्वर में लगाना चाहिए या फिर अग्नि की लपटों में लगाना चाहिए। @vaidic_gyan
प्र. ३२६. क्या किसी पण्डित, ब्राह्मण को धन देकर अपने लाभ के लिये यज्ञ कराया जा सकता है ?
उत्तर : हाँ, धन देकर यज्ञ कराया जा सकता है। जितने धन से घृत-सामग्री आदि का यज्ञ होगा उसका तो पुण्य मिलेगा किन्तु करने का पुण्य लाभ कर्त्ता (पण्डित, ब्राह्मण) को मिलेगा ।
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उत्तर : हाँ, धन देकर यज्ञ कराया जा सकता है। जितने धन से घृत-सामग्री आदि का यज्ञ होगा उसका तो पुण्य मिलेगा किन्तु करने का पुण्य लाभ कर्त्ता (पण्डित, ब्राह्मण) को मिलेगा ।
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प्र. ३२६. क्या किसी पण्डित, ब्राह्मण को धन देकर अपने लाभ के लिये यज्ञ कराया जा सकता है ? उत्तर : हाँ, धन देकर यज्ञ कराया जा सकता है। जितने धन से घृत-सामग्री आदि का यज्ञ होगा उसका तो पुण्य मिलेगा किन्तु करने का पुण्य लाभ कर्त्ता (पण्डित, ब्राह्मण) को मिलेगा…
प्र. ३२७. यज्ञ एक समय करना चाहिये या दो समय ?
उत्तर : सामर्थ्य, साधन, समय, श्रद्धा रूचि हो तो दो समय (प्रातः व सांय) करना चाहिए ।
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उत्तर : सामर्थ्य, साधन, समय, श्रद्धा रूचि हो तो दो समय (प्रातः व सांय) करना चाहिए ।
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प्र. ३२७. यज्ञ एक समय करना चाहिये या दो समय ? उत्तर : सामर्थ्य, साधन, समय, श्रद्धा रूचि हो तो दो समय (प्रातः व सांय) करना चाहिए । @vaidic_gyan
प्र. ३२८. पंचमहायज्ञ किसे कहते हैं ?
उत्तर: प्रत्येक घर के लिए आवश्यक पाँच कृत्यों को पंचमहायज्ञ कहा जाता है। जैसे (1) ब्रह्मयज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) बलिवैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।
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उत्तर: प्रत्येक घर के लिए आवश्यक पाँच कृत्यों को पंचमहायज्ञ कहा जाता है। जैसे (1) ब्रह्मयज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) बलिवैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।
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प्र. ३२८. पंचमहायज्ञ किसे कहते हैं ? उत्तर: प्रत्येक घर के लिए आवश्यक पाँच कृत्यों को पंचमहायज्ञ कहा जाता है। जैसे (1) ब्रह्मयज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) बलिवैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ। @vaidic_gyan
प्र. ३२९. परिभाषा सहित पाँच महायज्ञों का वर्णन करो ?
उत्तर :
(1) ब्रह्मयज्ञ
= नित्य प्रातः, सायं ईश्वर का ध्यान करना वेदों का स्वाध्याय करना ।
(2) देव-यज्ञ
= अग्निहोत्र (हवन करना) ।
(3) पितृ यज्ञ
= माता-पिता, सास-ससुर आदि की सेवा सुश्रुषा करना ।
(4) बलिवैश्वदेव यज्ञ
पशुओं, पक्षियों, अनाथों, विकलांगों, बीमारों और अन्य जीवित प्राणियों को भोजन अन्न आदि प्रदान करना।
(५) अतिथियज्ञ
= घर में पधारे संन्यासी, विद्वान, उपदेशक आदि की सेवा-सत्कार करना उनसे उपदेश ग्रहण करना ।
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उत्तर :
(1) ब्रह्मयज्ञ
= नित्य प्रातः, सायं ईश्वर का ध्यान करना वेदों का स्वाध्याय करना ।
(2) देव-यज्ञ
= अग्निहोत्र (हवन करना) ।
(3) पितृ यज्ञ
= माता-पिता, सास-ससुर आदि की सेवा सुश्रुषा करना ।
(4) बलिवैश्वदेव यज्ञ
पशुओं, पक्षियों, अनाथों, विकलांगों, बीमारों और अन्य जीवित प्राणियों को भोजन अन्न आदि प्रदान करना।
(५) अतिथियज्ञ
= घर में पधारे संन्यासी, विद्वान, उपदेशक आदि की सेवा-सत्कार करना उनसे उपदेश ग्रहण करना ।
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प्र. ३२९. परिभाषा सहित पाँच महायज्ञों का वर्णन करो ? उत्तर : (1) ब्रह्मयज्ञ = नित्य प्रातः, सायं ईश्वर का ध्यान करना वेदों का स्वाध्याय करना । (2) देव-यज्ञ = अग्निहोत्र (हवन करना) । (3) पितृ यज्ञ = माता-पिता, सास-ससुर आदि की सेवा सुश्रुषा करना । (4)…
प्र. ३३०. संस्कार किसे कहते हैं ? व कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर : जिससे शरीर, मन और आत्मा उत्तम बनते हैं उसको संस्कार कहते है ।
संस्कार १६ प्रकार के होते हैं -
(१) गर्भाधान
(२) पुंसवन
(3) सीमंतोन्नयन
(4) जातकर्म
(५) नामकरण
(६) अन्नप्राशन
(7) निष्क्रमणम
(८) चूड़ाकर्म
(९) कर्णवेध
(१०) उपनयन
(११) वेदारंभ
(१२) समावर्तन
(13) विवाह
(१४) वानप्रस्थ
(१५) संन्यास
(16) अंत्येष्टि
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उत्तर : जिससे शरीर, मन और आत्मा उत्तम बनते हैं उसको संस्कार कहते है ।
संस्कार १६ प्रकार के होते हैं -
(१) गर्भाधान
(२) पुंसवन
(3) सीमंतोन्नयन
(4) जातकर्म
(५) नामकरण
(६) अन्नप्राशन
(7) निष्क्रमणम
(८) चूड़ाकर्म
(९) कर्णवेध
(१०) उपनयन
(११) वेदारंभ
(१२) समावर्तन
(13) विवाह
(१४) वानप्रस्थ
(१५) संन्यास
(16) अंत्येष्टि
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प्र. ३३०. संस्कार किसे कहते हैं ? व कितने प्रकार के होते हैं ? उत्तर : जिससे शरीर, मन और आत्मा उत्तम बनते हैं उसको संस्कार कहते है । संस्कार १६ प्रकार के होते हैं - (१) गर्भाधान (२) पुंसवन (3) सीमंतोन्नयन (4) जातकर्म (५) नामकरण (६) अन्नप्राशन (7)…
प्र. ३३१. समाज में संन्यासियों की क्या आवश्यकता है ? क्या वे समाज पर भार रूप नहीं हैं ?
उत्तर : जैसे शरीर में सिर की आवश्यकता होती है वैसे ही समाज के सुसंचालन हेतु, धार्मिक, विद्वान्, तपस्वी, धन, मान और पुत्र/शिष्य की इच्छा का त्याग करने वाले संन्यासियों की आवश्यकता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : जैसे शरीर में सिर की आवश्यकता होती है वैसे ही समाज के सुसंचालन हेतु, धार्मिक, विद्वान्, तपस्वी, धन, मान और पुत्र/शिष्य की इच्छा का त्याग करने वाले संन्यासियों की आवश्यकता है।
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