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प्र. ३३६. क्या स्वर्ग-नरक किसी स्थान विशेष का नाम है ? उत्तर : नहीं स्वर्ग या नरक कोई स्थान विशेष का नाम नहीं है। @vaidic_gyan
प्र. ३३७. स्वर्ग का वास्तविक अर्थ क्या है ?
उत्तर : सुख विशेष की प्राप्ति को स्वर्ग कहते हैं ।
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उत्तर : सुख विशेष की प्राप्ति को स्वर्ग कहते हैं ।
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प्र. ३३७. स्वर्ग का वास्तविक अर्थ क्या है ? उत्तर : सुख विशेष की प्राप्ति को स्वर्ग कहते हैं । @vaidic_gyan
प्र. ३३८. स्वर्गलोक में इन्द्र, रुद्र, वरुण आदि देवता रहते हैं, क्या यह मान्यता सही है ?
उत्तर : नहीं, यह मान्यता सही नहीं है।
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प्र. ३३८. स्वर्गलोक में इन्द्र, रुद्र, वरुण आदि देवता रहते हैं, क्या यह मान्यता सही है ? उत्तर : नहीं, यह मान्यता सही नहीं है। @vaidic_gyan
प्र. ३३९. वास्तव में देवता किसे कहते हैं ?
उत्तर: माता, पिता, शिक्षक, विद्वान, अतिथि आदि तथा दाता, उपकारक, धर्मात्मा लोग देवता कहलाते हैं।
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उत्तर: माता, पिता, शिक्षक, विद्वान, अतिथि आदि तथा दाता, उपकारक, धर्मात्मा लोग देवता कहलाते हैं।
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प्र. ३४०. नरक किसे कहते हैं ? उत्तर : दुःख विशेष की प्राप्ति को नरक कहते हैं। @vaidic_gyan
प्र. ३४१. नरक प्राप्ति का अर्थ क्या है ?
उत्तर : जीवन में अभाव कष्ट, दुःख, पीडा और मरणोपरांत कीट, पतंग, सूअर, कुत्ता, बिल्ली आदि दुःखमय योनि में जन्म लेना तथा घोर दुःख कष्ट पाना नर्क प्राप्ति कहलाती है।
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उत्तर : जीवन में अभाव कष्ट, दुःख, पीडा और मरणोपरांत कीट, पतंग, सूअर, कुत्ता, बिल्ली आदि दुःखमय योनि में जन्म लेना तथा घोर दुःख कष्ट पाना नर्क प्राप्ति कहलाती है।
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प्र. ३४१. नरक प्राप्ति का अर्थ क्या है ? उत्तर : जीवन में अभाव कष्ट, दुःख, पीडा और मरणोपरांत कीट, पतंग, सूअर, कुत्ता, बिल्ली आदि दुःखमय योनि में जन्म लेना तथा घोर दुःख कष्ट पाना नर्क प्राप्ति कहलाती है। @vaidic_gyan
प्र. ३४२. क्या कुत्ते, बिल्ली, सुअर और मनुष्य को समान सुख दुःख है, "वह अपने शरीर में सुखी, हम अपने शरीर में" क्या यह मान्यता ठीक है ?
उत्तर : कुत्ते, बिल्ली, सूअर और मनुष्य को समान सुख-दुःख नहीं है अपितु पशुओं को दुःख अधिक होता है। "वह अपने शरीर में सुखी, हम अपने शरीर में" यह मान्यता ठीक नहीं है। मनुष्यों को उत्कृष्ट बुद्धि, हाथ, वाणी ये विशेष उपलब्ध है जिससे वे अधिकाधिक सुख प्राप्त कर सकते हैं। जबकि पशु आदि को विशेष साधन न होने से व इनकी स्वतंत्रता की सीमा होने से इन्हें दुःख अधिक होता है।
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उत्तर : कुत्ते, बिल्ली, सूअर और मनुष्य को समान सुख-दुःख नहीं है अपितु पशुओं को दुःख अधिक होता है। "वह अपने शरीर में सुखी, हम अपने शरीर में" यह मान्यता ठीक नहीं है। मनुष्यों को उत्कृष्ट बुद्धि, हाथ, वाणी ये विशेष उपलब्ध है जिससे वे अधिकाधिक सुख प्राप्त कर सकते हैं। जबकि पशु आदि को विशेष साधन न होने से व इनकी स्वतंत्रता की सीमा होने से इन्हें दुःख अधिक होता है।
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प्र. ३४२. क्या कुत्ते, बिल्ली, सुअर और मनुष्य को समान सुख दुःख है, "वह अपने शरीर में सुखी, हम अपने शरीर में" क्या यह मान्यता ठीक है ? उत्तर : कुत्ते, बिल्ली, सूअर और मनुष्य को समान सुख-दुःख नहीं है अपितु पशुओं को दुःख अधिक होता है। "वह अपने शरीर में सुखी…
प्र. ३४३. स्वर्ग प्राप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर : धन, ऐश्वर्य से सम्पन्न विद्वान माता-पिता के यहां जन्म लेना तथा विशेष सुख, शांति, आनन्द उत्साह, निर्भयता आदि को प्राप्त करना स्वर्गप्राप्ति कहलाती है।
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उत्तर : धन, ऐश्वर्य से सम्पन्न विद्वान माता-पिता के यहां जन्म लेना तथा विशेष सुख, शांति, आनन्द उत्साह, निर्भयता आदि को प्राप्त करना स्वर्गप्राप्ति कहलाती है।
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प्र. ३४३. स्वर्ग प्राप्ति किसे कहते हैं ? उत्तर : धन, ऐश्वर्य से सम्पन्न विद्वान माता-पिता के यहां जन्म लेना तथा विशेष सुख, शांति, आनन्द उत्साह, निर्भयता आदि को प्राप्त करना स्वर्गप्राप्ति कहलाती है। @vaidic_gyan
प्र. ३४४. स्वर्ग प्राप्ति के साधन कौन कौन से हैं ?
उत्तर : पंचमहायज्ञ का अनुष्ठान करना, विद्या अध्ययन करना, दान करना, पुण्य करना आदि स्वर्ग प्राप्ति के साधन हैं।
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उत्तर : पंचमहायज्ञ का अनुष्ठान करना, विद्या अध्ययन करना, दान करना, पुण्य करना आदि स्वर्ग प्राप्ति के साधन हैं।
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प्र. ३४४. स्वर्ग प्राप्ति के साधन कौन कौन से हैं ? उत्तर : पंचमहायज्ञ का अनुष्ठान करना, विद्या अध्ययन करना, दान करना, पुण्य करना आदि स्वर्ग प्राप्ति के साधन हैं। @vaidic_gyan
प्र. ३४५. नरक प्राप्ति के कारण क्या हैं ?
उत्तर : भ्रष्टाचार, व्यभिचार, मांसाहार, चोरी, झूठ कपट आदि अशुभकर्म नरक प्राप्ति के कारण हैं।
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प्र. ३४५. नरक प्राप्ति के कारण क्या हैं ? उत्तर : भ्रष्टाचार, व्यभिचार, मांसाहार, चोरी, झूठ कपट आदि अशुभकर्म नरक प्राप्ति के कारण हैं। @vaidic_gyan
प्र. ३४६. स्वर्ग और नरक की प्राप्ति क्या इसी जन्म में भी हो सकती है ?
उत्तर : हाँ, स्वर्ग और नरक की प्राप्ति इसी जन्म में भी हो सकती है। जीते जी दुःख, अभाव, बन्धन, भय पीडा, रोग, वियोग आदि की प्राप्ति नरक और उत्तम स्वास्थ्य, धन सम्पति, ऐश्वर्य, सुख शान्ति की प्राप्ति स्वर्ग कहलाती है ।
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उत्तर : हाँ, स्वर्ग और नरक की प्राप्ति इसी जन्म में भी हो सकती है। जीते जी दुःख, अभाव, बन्धन, भय पीडा, रोग, वियोग आदि की प्राप्ति नरक और उत्तम स्वास्थ्य, धन सम्पति, ऐश्वर्य, सुख शान्ति की प्राप्ति स्वर्ग कहलाती है ।
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प्र. ३४६. स्वर्ग और नरक की प्राप्ति क्या इसी जन्म में भी हो सकती है ? उत्तर : हाँ, स्वर्ग और नरक की प्राप्ति इसी जन्म में भी हो सकती है। जीते जी दुःख, अभाव, बन्धन, भय पीडा, रोग, वियोग आदि की प्राप्ति नरक और उत्तम स्वास्थ्य, धन सम्पति, ऐश्वर्य, सुख शान्ति…
प्र. ३४७. श्राद्ध किसे कहते हैं ?
उत्तर : जीवित माता-पिता गुरु, विद्वान आदि की सेवा करना श्राद्ध कहलाता है ।
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प्र. ३४७. श्राद्ध किसे कहते हैं ? उत्तर : जीवित माता-पिता गुरु, विद्वान आदि की सेवा करना श्राद्ध कहलाता है । @vaidic_gyan
प्र. ३४८. क्या माता-पिता की मृत्यु के बाद दान-पुण्य, भोज आदि कर्मों को करना उनका श्राद्ध होता है ?
उत्तर : जी नहीं, माता-पिता की मृत्यु के बाद दान-पुण्य, भोज आदि कर्मों को करने से उनका श्राद्ध नहीं होता ।
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प्र. ३४८. क्या माता-पिता की मृत्यु के बाद दान-पुण्य, भोज आदि कर्मों को करना उनका श्राद्ध होता है ? उत्तर : जी नहीं, माता-पिता की मृत्यु के बाद दान-पुण्य, भोज आदि कर्मों को करने से उनका श्राद्ध नहीं होता । @vaidic_gyan
प्र. ३४९. क्या माता-पिता के मरणोपरांत उन्हें पिण्ड दान करना वेदोक्त है ?
उत्तर : जी नहीं, माता-पिता के मरणोपरांत उन्हें पिण्ड दान वेदोक्त नहीं है।
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उत्तर : जी नहीं, माता-पिता के मरणोपरांत उन्हें पिण्ड दान वेदोक्त नहीं है।
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