प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
1.95K subscribers
1.06K photos
197 videos
100 files
963 links
सादर नमस्ते जी 🙏🏻 🙏🏻 🚩🚩
यहां पर आपको प्राचीन वैदिक ज्ञान से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर दिया जाएगा।
चैनल से जुड़ कर अपना ज्ञानवर्धन करें👍🏻🚩🚩
धन्यवाद् 🙏🏻

https://t.me/vaidic_gyan/5
https://t.me/vaidic_gyan/2206
Download Telegram
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. १७७. फल की दृष्टि से कर्म कितने प्रकार के होते हैं ? और वे कौन कौन से ? उत्तर : फल की दृष्टि से कर्म तीन प्रकार के हैं- (१) संचित (२) प्रारब्ध (३) क्रियमाण @vaidic_gyan
प्र. १७८. कर्त्ता की दृष्टि से कर्म कितने प्रकार के हैं और कौन कौन से हैं ?

उत्तर : कर्त्ता की दृष्टि से तीन प्रकार के कर्म हैं :
(१) कृत कर्म,
(२) कारित कर्म,
(३) अनुमोदित कर्म ।

@vaidic_gyan
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. १७९. कृत कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर : ऐसे कर्म जिनका कर्त्ता स्वयं ही होता है वे 'कृत' कर्म कहलाते हैं । @vaidic_gyan
प्र. १८०. कारित कर्म किसे कहते हैं ?

उत्तर : जो कर्म स्वयं न करके दूसरों को आज्ञा देकर कराये जाते हैं उसे कारित कर्म कहते हैं ।

@vaidic_gyan
👍3
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. १८०. कारित कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर : जो कर्म स्वयं न करके दूसरों को आज्ञा देकर कराये जाते हैं उसे कारित कर्म कहते हैं । @vaidic_gyan
प्र. १८१. अनुमोदित कर्म किसे कहते हैं ?

उत्तर : जिन कर्मों को साक्षात् स्वयं न करता है न ही कराने के लिए किसी को प्रेरित/आदेश करता है किन्तु किसी के किये गये कर्म का अनुमोदन वा समर्थन करता है, वे 'अनुमोदित' कर्म कहलाते हैं ।

@vaidic_gyan
👍6
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. १८१. अनुमोदित कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर : जिन कर्मों को साक्षात् स्वयं न करता है न ही कराने के लिए किसी को प्रेरित/आदेश करता है किन्तु किसी के किये गये कर्म का अनुमोदन वा समर्थन करता है, वे 'अनुमोदित' कर्म कहलाते हैं । @vaidic_gyan
प्र. १८२. क्या बिना कोई इच्छा कामना (सांसारिक या मोक्ष) के कर्म करना संभव है ?

उत्तर : नहीं । सांसारिक या मोक्ष दोनों मे से कोई एक इच्छा (कामना) तो रहेगी ही। क्योंकि बिना इच्छा किये कर्म करना असंभव है ।

@vaidic_gyan
💯4
प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. १८२. क्या बिना कोई इच्छा कामना (सांसारिक या मोक्ष) के कर्म करना संभव है ? उत्तर : नहीं । सांसारिक या मोक्ष दोनों मे से कोई एक इच्छा (कामना) तो रहेगी ही। क्योंकि बिना इच्छा किये कर्म करना असंभव है । @vaidic_gyan
प्र. १८३. क्या जो कुछ कर्म संसार में हो रहा है, जो हुआ है और जो होने वाला है वह सब ईश्वर की इच्छानुसार, ईश्वर की ही लीला है अर्थात् ईश्वर ही कर रहा है, जीव नहीं । यह मान्यता ठीक है ?

उत्तर : जी नहीं, जितने बुरे कर्म हैं वह सब अपनी स्वतन्त्रता से कुसंस्कारों के कारण व्यक्ति = जीव करता है। जितने अच्छे कर्म हैं उनमें ईश्वर का भी हाथ है। अर्थात् जब जीव अच्छा कर्म करना चाहता है, उसे ईश्वर प्रेरणा, उत्साहा आदि प्रदान करता है।

@vaidic_gyan
👍6👏2🙏1
*प्र०- देवता किसे कहते है?*
उ०-देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा द्योतनाद्वा , द्युस्थानो भवतीति वा । दान देने वाले देव कहाते हैं दीपन अर्थात विद्या रुपी प्रकाश करने वाले देव कहाते हैं । द्योतन अर्थात सत्योपदेश करने वाले देव कहाते हैं ।विद्वान भी विद्या आदि का दान करने से देव कहाते हैं । सब मूर्ति मान पदार्थों का प्रकाश करने से सूर्य आदि को भी देवता कहते हैं । देव देवी देवता- इन सबका एक ही अर्थ है ।इन सब का देव होने से ईशवर महादेव कहलाता है।
(कोई स्वयं का नाम महादेव रख ले तो वे ईशवर नही बन सकता )

प्र०- देवता कितने प्रकार के होते है?
उ०- देवता दो प्रकार के होते हैं-
जड देवता और चेतन देवता ।

प्र०- चेतन देवता कौन से है?
उ०- माता , पिता , गुरु , आचार्य , अतिथि , पति पत्नी ये सब चेतन देवता है।

प्र०- क्या चेतन देवों की पूजा करनी चाहिये और करे तो कैसे ?
उ०- हां करनी चाहिये क्योंकि ये हमारा पालन पौषण करते हैं, हमारी रक्षा करते हैं, हमे ज्ञान देकर मनुष्य बनाते हैं । और पूजा का अर्थ है सत्कार करना, इन सबका सम्मान करना इनकी आज्ञा का पालन करना , इनकी आवश्यकता पूरी करना यही इनकी पूजा है ।और जो ऐसा नहीं करता उसे कृतघ्नता का पाप लगता है।

प्र०- क्या यदि माता पिता उल्टी गलत शिक्षा दे तो उसे भी मानना चाहिये ?
उ०- नहीं, यदि माता पिता दुष्ट हैं तो उनकी गलत बात बिल्कुल न माने, यदि वे चोरी आदि या मद्यपान आदि बुरी सलाह दे तो उसको न माने लेकिन सेवा फिर भी करे।

प्र०- पौराणिक लोग कहते हैं कि तैंतीस करोड़ देवता हैं , क्या यह सच है ?
उ०- नहीं , कोटि शब्द के दो अर्थ हैं, पहला कोटि का अर्थ करोड़ और दूसरा कोटि का अर्थ प्रकार । जड देवता तैंतीस प्रकार के है।

प्र०- जड़ देवता कौन से है?
उ०- आठ वसु- अग्नि पृथ्वी वायु अन्तरिक्ष आदित्य द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र, इन्हें वसु इसलिए कहते हैं कि सब पदार्थ इन्हीं में वसते हैं । ग्यारह रुद्र - प्राण अपान व्यान उदान समान नाग कुर्म कृकल देवदत्त धनञ्जय और जीवात्मा क्योंकि जब ये शरीर से निकलते हैं तो मरण होने से सब सम्बन्धी रोते हैं इसलिए इन्हें रुद्र कहते हैं । आदित्य बारह महिनों को कहते हैं क्योंकि सब जगत के पदार्थों का ये आदान करते हैं और सबकी आयु को ग्रहण करते हैं । इन्द्र बिजली को कहते हैं क्योंकि सब ऐश्वर्य की विद्या का आधार वही है। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते हैं क्योंकि सब वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है, पशुओं को भी यज्ञ कहते है क्योंकि उनसे भी प्रजा का पालन होता है। ये तैंतीस देव कहाते हैं । इनके अतिरिक्त तीन देव स्थान नाम जन्म को कहते हैं और अन्न व प्राण को भी देव कहते हैं ।

प्र०- क्या इन जड देवो की पूजा करनी चाहिये और कैसे?
उ०- जी हां, ईश्वर द्वारा दिये जड पदार्थों का अपने व दूसरे के सुख के लिए सदुपयोग करना ही जड पूजा है। ईश्वर द्वारा बनाये पदार्थों की रक्षा करना उन्हें गन्दा न करना ही पूजा है क्योंकि ये अमूल्य है ।

प्र०- क्या ये सारे देव उपास्य है?
उ०- नहीं । ईश्वर सब देवो का देव होने से महादेव कहाता है और केवल वही उपास्य है दूसरा नहीं।

प्र०- वेद मन्त्रों के साथ देवता लिखा होता है क्यों ?
उ०- जिस मन्त्र का जो विषय जिस ऋषि ने समाधि अवस्था मे बैठकर साक्षात्कार किया उस मन्त्र का वही देवता व ऋषि होता है।
👍7🔥2